रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अंधेरा 17

- प्रसून जी ! अचानक उसे कुछ याद सा आया । और वह हँसती हुयी बोली - आपको मालूम है । मैं मर चुकी हूँ । ओह गाड ! कितना अजीव है ना । अब मैं मर चुकी हूँ ।
ये बात उसने ऐसी मासूमियत से कही थी कि सब कुछ भूलकर वह जोर जोर से हँसने लगा । उस अजीव सी लाइट में वह उसके सुन्दर मुखङे को देखता रह गया ।  उसने आसमान को देखा । वहाँ चाँद कहीं नहीं था । पर तारे बहुत नजर आ रहे थे । गहरे काले घुप्प अंधेरे में वे मद्धिम चमक वाले तारे रात की रानी की काली चुनरी में टंके सितारों के समान थे ।
- जस्सी ! क्या पागल हो तुम । वह हँसता हुआ ही बोला - अगर तुम मर गयी हो । फ़िर मेरे सामने बैठी कैसे हो । बोल कैसे रही हो । क्या तुम्हें किसी तरह लग रहा है कि तुम मर गयी हो । मरा इंसान तो बस बिना हिले डुले एक ही स्थान पर पङा रहता है । क्या तुम्हे अपने अन्दर कोई मरने वाली बात लग रही है ?
वह एकदम झुंझलाई सी हो गयी कि इस पागल को क्या समझाये । फ़िर वह मानों और भी चौंकती हुयी बोली - उफ़ ! आप मेरा यकीन क्यों नहीं करते । सच्चाई..सच्चाई तो ये है । सिर्फ़ मैं ही नहीं आप भी मर चुके हो ।
- ओ गाड । ओ गाड । अबकी वह दुगनी जोर से हँसा - लङकी कहीं तू पागल तो नहीं है । उसने मुझे भी मार डाला । फ़िर ये जो मैं हट्टा कट्टा तेरे सामने बैठा हूँ । ये क्या मेरा भूत है । भूत..हा हा हा हू हू..डर अब तू डर ।
उसने अजीव से असमंजस में नजरें झुका लीं । अब वह क्या बोले । अब वह प्रसून को क्या समझाती कि वाकई वह दोनों मर चुके थे । उसने खुद सब कुछ देखा था । प्रसून उसकी हालत का मजा ले रहा था । जीवन के पार जीवन का ये उसका इस जीवन में पहला अनुभव था । वह उससे अपने पीछे के हालात जानना चाहता था । उसने ऐसा क्या किया था । जो यहाँ तक आ गयी थी । पर ये सब अभी पूछने का समय नहीं था । क्योंकि अपने बारे में तो वह बता आया था । पर जस्सी को मरा देखकर राजवीर और बराङ पर क्या गुजरी होगी ? बस यही ख्याल उसे हलकान कर रहा था । खास उसे बस एक ही चिन्ता थी कि कहीं वे वाकई उनके शरीर का संस्कार करके उसे नष्ट न कर दें । बस उसके दिल में एक ही आशा बनती थी कि अगर वे योग स्थितियों के बारे में थोङा भी जानते होंगे । उसके कहे पर विचार करेंगे । तो फ़िर ऐसा नहीं करेंगे । कम से कम उसने अपनी बातों में उन्हें ऐसी झलक सी महसूस करवा दी थी कि वह उन्हें मरा हुआ भी लग सकता है । और तब वे शायद बाधा के चलते जस्सी को भी ऐसा ही कुछ समझ लें । और धैर्य से कुछ दिन इन्तजार करें । जो भी हो । उसकी समझ में नहीं आ रहा था । वाकई वे क्या सोचेंगे । और फ़िर क्या करेंगे ?
कुछ लोग अतिथि भाव से भोजन ले आये थे । और वे सब भोजन कर रहे थे । पर वह भोजन करता हुआ भी आगे के लिये विचार मग्न था । आगे क्या करना चाहिये ।
- ये सुन्दर सी लङकी मेरी प्रेमिका है । भोजन आदि के बाद वह उन सबका संस्पेंस दूर करता हुआ बोला - मैं अचानक चला आया । तो मेरे पीछे पीछे यह भी चली आयी......।
पर बूङा उनकी बात नहीं सुन रहा था । वह बङे गौर से अति सुन्दर जस्सी को देख रहा था । उसके होंठ कंपकपा रहे थे । उसकी आँखें दूर शून्य 0 में स्थिर हो चुकी थी । उन दोनों को पास पास बैठा हुआ देखकर उसका शरीर जोर जोर से कांप रहा था । उसकी गर्दन हिलने लगी थी ।
क्योंकि सभी लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ नहीं था । सो जैसे ही यकायक उसने ढोल पर जोरदार थाप दी । सब चौंक ही गये । प्रसून भी चौंक गया । जस्सी ने अजीव भाव से उसकी तरफ़ देखा । पर बूङा अब किसी को नहीं देख रहा था । वह कृमबद्ध लय से धीरे धीरे ढोल को थाप दे रहा था । जो हर थाप पर तेज हो रही थी । फ़िर ढोल बजने लगा । क्या संगीत था । क्या लय थी । क्या ताल थी । मानों प्रकृति भी झूम उठी हो । पूरा हुजूम संगीत में डूबने लगा । अब उससे किसी को कोई मतलब नहीं रह गया था । सबने अपने अपने सहायक वाध यन्त्र उठा लिये थे । और ताल से ताल मिला रहे थे ।
- हे प्रभु ! वह आसमान की ओर हाथ उठाकर बोला - आपकी लीला अपरम्पार है । इसे बङे से बङे ज्ञानी भी नहीं समझ सकते । मैं मूर्ख कर्ता बना हुआ अभी भी सोच रहा था कि आगे क्या और कैसे करूँगा । पर आपने पल में ही मेरा ये अहम भी चूर चूर कर दिया । कोटिष वन्दन ।

किसी आदिवासी इलाके जैसा माहौल बन गया था । संगीत धीरे धीरे अपने चरम पर पहुँच रहा था । प्रसून की गहरी आँखों में अनोखी चमक सी पैदा होती जा रही थी । वह बङी दिलचस्पी से आने वाले क्षणों का इन्तजार कर रहा था । और सावधानी से अनदेखा सा करते हुये बेहद लापरवाही का प्रदर्शन करता हुआ जस्सी को ही देख रहा था । फ़िर अचानक उसे कुछ याद आया । और वह चौंककर उसके पास से हटकर अलग टहलने लगा । जस्सी मन्त्रमुग्ध सी वहीं बैठी रह गयी । वह पूरी तन्मयता से उन्हें देखती हुयी सुन रही थी ।
फ़िर अचानक उसका शरीर हिलने लगा । उसमें किसी प्रेत के आवेश की भांति वायु भरने लगी । उसका सर बहुत तेज चकरा रहा था । और वह गोल गोल घूम रही थी । घूमती ही चली जा रही थी ।
प्रसून गौर से उसकी एक एक गतिविधि देख रहा था । वह थोङा और थोङा और करके पीछे हटता जा रहा था । उसकी यहाँ मौजूदगी इस रहस्य के खुलने में बाधा हो सकती थी । अतः उस संगीत से और उससे जुङे भावों से जो विचार वृत बन रहा था । वह उससे दो कदम पीछे हटता ही चला जा रहा था । जैसे किसी भीङ के गोल घेरे में किसी जादूगर को तमाशा करता हुअ देख रहा हो ।
- नल्लाऽऽऽऽ ! अचानक संगीत के बीच वह बूङा गला फ़ाङकर चिल्लाया - देख तेरी दमयन्ती आ गयी । वो लौट आयी । नल्ला मेरे लाल । अब तू भी लौट आ । लौट आ मेरे बच्चे ।
ये दर्द भरी पुकार उसने ढोल बजाने के मध्य कही थी । और फ़िर से झूमता हुआ ढोल बजाने लगा था । विचार वृत गहराता जा रहा था । उसके शरीर की भाव रूपी तरंगों से निकली किरणों में अणु परमाणु जमा होते जा रहे थे । तमाम रंगों के अणु परमाणु मानवीय आकार लेते हुये लहराते हुये से उङ रहे थे । और एक बङे गोल दायरे में कैद थे । और फ़िर वो हुआ । जिसका प्रसून जाने कब से बेकरारी से इन्तजार कर रहा था । उन सभी विचार वृतियों का एक छोटा बवंडर बनने लगा । और किसी लट्टू की भांति तेजी से घूमने लगा । धुनी हुयी रुई के बहुत छोटे छोटे रंगीन टुकङों की भांति वे सभी मानव आकृतियाँ उस बवंडर में फ़ँसकर गोल गोल घूमने लगी ।
तब वो क्षण आ गया । जो आगे आना ही चाहिये था । जस्सी अपनी जगह से मदहोश सी उठी । और झूमती हुयी नाचने लगी । उसने पास ही से एक बांस के समान लम्बा डण्डा उठा लिया था । और किसी कुशल नटनी की भांति कलाबाजियाँ दिखा रही थी । पर सिवाय उसके कोई किसी को नहीं देख रहा था ।
सिर्फ़ वह किसी साक्षी की भांति दिलचस्पी से इस खेल को देख रहा था । खेल । असली खेल । जो अब शुरू हुआ था ।
प्रसून इस बात को लेकर स्योर था । अगर नटों की कलाबाजी के तमाशे हेतु बंधी रस्सी पहिया और थाली आदि दूसरे उपकरण होते ।  तो उसे खूबसूरत जस्सी के यादगार क्षण देखने को मिलते । काश ! ये क्रिया उसके स्थूल शरीर से होती । और उसे शूट करने का कोई साधन उसके पास होता । पर ये दोनों ही बातें फ़िलहाल तो संभव नहीं थी ।
उसने कैसा भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया । और जो हो रहा था । उसे साक्षी बनकर सिर्फ़ देखता रहा । काली रात गहराती जा रही थी । स्याह काले अंधेरे ने उस रहस्यमय लोक को अपनी लपेट में ले लिया था ।
उस अंधेरे के बीच मद्धिम प्रकाश में वह दृश्य प्रेतों के उत्सव जैसा नजर आ रहा था ।
तभी उसे एक बात सूझी । उसने जस्सी को मध्यम स्वर में पुकारा । जो उसकी आवाज उस तक आरा्म से पहुँच सके । पर जस्सी की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी । वह पूर्ववत नाचती ही रही । तब उसके चेहरे पर गहन सन्तुष्टि के भाव आये । यानी सब कुछ सही था । उसे बहुत बेकरारी से अगले क्षणों का इन्तजार था । और उन्हीं की सफ़लता पर सारा दारोमदार निर्भर भी था । अगले क्षण । जो अब आने ही वाले थे ।

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