रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अंधेरा 19

- हमेशा बहुत भूखी ही रहती है ये मौत भी । बूङा दूर कहीं शून्य 0 में देखता हुआ कह रहा था - सदियाँ हो गयी । इसे जिन्दगियों को खाते खाते । पर इसकी भूख नहीं मिटी । ये अपनी भूख के चलते कभी यह भी नहीं देखती कि उससे कौन मिट रहा है । कौन उजङ रहा है ।.. उस हाहाकारी तूफ़ान के साथ ताण्डव नृत्य करती आयी मौत चारू को खा गयी । मेरी घरवाली को भी खा गयी । उसका नाम दुष्यन्ती थी । बङी अच्छी और सुन्दर नटनी थी वो ।
जस्सी एक तरफ़ बिछावन पर लुढकी हुयी सी सो गयी थी । सभी लोकवासी अपने अपने घरों को चले गये थे । सिर्फ़ प्रसून और वह बूङा जाग रहे थे । शायद आज वह किसी को अपना गम सुना पा रहा था । गम जो हजारों साल से उसके सीने में दफ़न था । तब प्रसून को एक बात की कुछ हैरत सी हुयी । बूङा चिलम सुलगा रहा था । वास्तव में उसे भी धूमृपान की तेज इच्छा हो रही थी । सिगरेट तो शायद ही यहाँ मिलती ।
- धुँआ पीते हो कभी । वह उसकी और प्रस्तावित करता हुआ बोला - जिन्दगी भी एक धुँआ ही हैं । ये धुँआ धुँआ कर जलती रहती है ।
उसने चिलम ले ली । और तेज सुट्टा मारा । लम्बे समय बाद तम्बाकू युक्त धुँआ उसको पान करने को मिला था । उसे एक अजीव सी राहत मिली । और वह एक नयी स्फ़ूर्ति का अनुभव करने लगा । कमाल था । बिना धूप के भी यहाँ उगने वाली तम्बाकू एक अलग शाही टेस्ट वाली थी । बूङे ने अपने लिये दूसरी चिलम सुलगा ली थी ।
- आधी रात हो गयी है । बूङा दम लगाता हुआ बोला - परदेसी बाबू ! आपको नींद आ रही होगी ।
- नहीं । नहीं आ रही । फ़िर.. । वह उत्सुकता से बोला - फ़िर क्या हुआ ?
वास्तव में यह सब पूछने की अब उसे कोई जरूरत नहीं थी । घटना का मुख्य विवरण उसके दिमाग में पूरे सही आंकङों सहित अंकित हो चुका था । वह चाहता । तो तुरन्त जस्सी के साथ वापिस प्रथ्वी पर लौट सकता था । और बाधा का समाधान आसानी से कर सकता था । पर उसके अन्दर का योगी उसे ऐसा नहीं करने दे रहा था ।
नल्ला प्रेत योनि में था । दुष्यन्ती मनुष्य रूप में जन्म ले चुकी थी । प्रेत योनि में जा चुके पुत्र के अति मोह वश वह इस सजायाफ़्ता लोक में गिर चुका था । जिसके बहुत से कारण बनते थे । अब उसका एक साधु के तौर पर फ़र्ज था कि वह इन सबके लिये क्या कर सकता था । यही उसकी योग परीक्षा थी । अब वह निमित्त भी था । और कर्ता भी । प्रकृति अपना काम कर चुकी थी । अब उसकी बारी थी ।
- बङा भयानक दिन था । बूङा फ़िर बोला - बहुत भयंकर तूफ़ान आया था । सो तमाशा दिखाकर मैं घर लौट आया था । पर मुझे क्या पता था । मेरे घर में खुद मौत का असली तमाशा हो रहा था । वह जलजला मेरे घर को ही उजाङने आया था ।
उस दोपहर को नल्ला पेङ पर बाँसुरी बजा रहा था । चारू बंसी लेकर दरिया में मछलियाँ पकङने चली गयी थी । वह दो तरह से मछलियाँ पकङती थी । अपनी और नल्ला की पाँच छह बंसी दरिया में चुग्गा लगाकर डुबो देती थी । और फ़िर डण्डे से दरिया की लहरों में उछलती मछलियों को अलग से मारती थी । ऐसे वह अकेले ही दोनों परिवारों के लिये पूरा खाना ले आती थी ।
ये इत्तफ़ाक ही था कि ज्यादातर उसके साथ रहने वाला नल्ला आज उसके साथ नहीं था । उछलती लहरों में मछलियों पर डण्डे चलाती खुद भी उछलती कूदती चारू कितनी दूर निकल गयी थी । उसे ख्याल ही नहीं रहा था । नल्ला उससे बहुत दूर हो चुका था । और तब उत्तर दिशा से तूफ़ान उठा । आसमान में विशाल बवंडर घूमने लगा । मौत का बवंडर । इतनी मूसलाधार बारिश मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी ।
मैं घर पर लौट आया था । दुष्यन्ती रह रहकर दरबाजे पर देख रही थी । उसे जंगल से नल्ला और चारू के लौटने का इन्तजार था । तूफ़ान के जोर पकङने से पहले ही हमारे ढोर मवेशी खुद भागते हुये घर आ गये थे । नहीं आये । तो नल्ला और चारू । जब इन्तजार करते करते घण्टा भर से अधिक हो गया । और चारू नल्ला नहीं लौटे । तब मैं उनकी तलाश में जाने लगा । पर दुष्यन्ती ने ये कहकर कि तुम थक गये हो । मैं जाती हूँ । कहकर वह भी चली गयी । और फ़िर कभी नहीं लौटी । आज तक नहीं लौटी ।

तूफ़ान बीच बीच में हल्का होकर फ़िर भयंकर रूप धारण कर लेता था । जब दुष्यन्ती को जाये भी धीरे धीरे एक घण्टा फ़िर दो घण्टा हो गया । तब मुझे बेहद चिन्ता हुयी । पर मुश्किल यह थी कि घर अकेला था । उस तूफ़ान में मवेशी कौन देखता । इसीलिये मैं बारबार जाने की सोचकर भी रह ही जाता था । फ़िर आखिर में मैं उनकी चिन्ता छोङकर दूर दूर तक देखने गया ।
एक भयानक काला अंधेरा सर्वत्र फ़ैला हुआ था । जिन्दगी का चप्पा चप्पा वह अंधेरा निगल गया था । मैं देर तक उस सुनसान जंगल में दरिया के किनारे भटकता हुआ अब उन तीनों को तलाशता रहा । और कोई चार घण्टे बाद निराश खाली हाथ बिना साथ लौट आया । मेरी औरत भी जाने उस तूफ़ान में कहाँ खो गयी थी ।
तब कोई रात के दो बजे आहट हुयी । और मैं चौंक गया । तूफ़ान थम चुका था । नल्ला लौट आया था । मैं जानता था । ये भयंकर तूफ़ान भी उस जवान का कुछ नहीं बिगाङ सकता था । पर वह बेहद निराश था । चारू कहीं नहीं मिली थी । तब उसे और भी झटका लगा । जब उसे पता चला कि उन दोनों को तलाश करने गयी । उसकी माँ भी तूफ़ान से वापिस नहीं लौटी है । वह बेहद थका हुआ था । पर उसी वक्त मशालों का इन्तजाम करके फ़िर से तलाश में जाने लगा । वह मुझे वहीं रोक रहा था । पर अब मुझे उसकी चिन्ता थी । मैं उसको खोना नहीं चाहता था । मैं भी उसके साथ चला गया ।
नल्ला ने कश्ती दरिया में वापिस उतार दी थी । हम दोनों सुबह तक उन दोनों को तलाश करते रहे । तब दुष्यन्ती मिल गयी । मगर मुर्दा । वह मर चुकी थी । वह बवंडर एक साथ हमारी पत्नियों को छीन ले गया था । मेरा भी अब किसी काम में मन नहीं लगता था । मैंने तमाशा दिखाना छोङ दिया था । चारू का कुछ पता नहीं चला था । पर दीवाना सा नल्ला सुबह होते ही उसकी तलाश में निकल जाता था ।
फ़िर महीनों गुजर गये । पर वो नहीं मिली । वह दीवाना सा उसकी याद में जंगल में बाँसुरी बजाता । चारू चारूलता पुकारता । पर वो निर्मोही लङकी उसकी पुकार पर कोई ध्यान नहीं देती थी । उसने बहुत बङी बेबफ़ाई की थी ।
अब ढोल ही मेरा साथी था । और नल्ला का जंगल । वह जंगल में बाँसुरी पर दर्द भरे जुदाई के गीत गाता । और फ़िर एक दिन दोबारा तूफ़ान आया । नल्ला के पास मवेशी चराने गये नटों के लङके भी खेल रहे थे । वह पहले से बहुत कमजोर हो गया था । उसमें अब वो दम खम नहीं था । उसे खाने पीने से कोई मतलब ही नहीं रह गया था । जीने मरने से भी अब उसे कोई मतलब नहीं था ।
तब फ़िर एक दिन तूफ़ान आया । और नल्ला खुशी से चीख पङा । वह अपने साथियों से बोला - देखो चारू लौट आयी । मेरी माँ भी लौट आयी । सुनो । तुम.. सुनो । वे मुझे पुकार रही हैं । ये तूफ़ान ही उन दोनों को ले गया था । और अब लौटा भी लाया है ।
लङके हैरत से उसे देख रहे थे । उन्हें कहीं कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी । और न हीं कोई दिखाई दे रहा था । नल्ला ने कश्ती दरिया में डाल दी थी । और तेजी से उसे आगे ले जा रहा था । अचानक बूङे का चेहरा तेजी से कंपकंपाने लगा । वह फ़फ़कता हुआ रोने लगा ।
और हिचकियाँ भरता हुआ बोला  - पर नल्ला नहीं जानता था कि उसे पुकारने वाली चारू नहीं मौत थी । मौत । डरावनी मौत । जो उस दिन मेरी एकमात्र बुङापे की आस को भी खा गयी ।
बङे बङे तूफ़ानों का मुँह मोङ देने वाले नल्ला को वो छोटा सा तूफ़ान लील गया था । उसकी कश्ती चट्टान से टकरायी । और उसका सर कहीं टकराकर फ़ट गया । नट समुदाय उसकी लाश लेकर आया था । मैं उस दिन भी बैठा ढोल बजा रहा था । जब दो पैरों पर चलने वाला मेरा बेटा उस दिन आखिरी बार चार कन्धों पर चलकर आया । और फ़िर वो भी मुझसे विदा लेकर हमेशा को चला गया ।
अजीव थी । इस लोक की रात भी । प्रसून बारबार आसमान पर निगाह डाल रहा था । पर उसे अब तक कहीं चांद नजर नहीं आया था । क्या दुनियाँ थी । इन लोगों की भी । न सूरज । न चाँद । बस अंधेरा । अंधेरा ही अंधेरा । उजाले का सबसे बङा शत्रु अंधेरा ।
पर आज एक चाँद इस लोक में निकला था । खूबसूरत जस्सी के रूप में । उसने गौर से उसे देखा । वह किसी मासूम बच्चे की भांति सो रही थी । उसका चाँद सा मुखङा इस अंधेरे में भी चमक रहा था । अब सारी कहानी उसके सामने शीशे की तरह साफ़ हो चुकी थी ।
- बाबा ! वह गम्भीरता से बोला - क्या आप चाहते हो कि आपका बेटा नल्ला और पत्नी और चारू जहाँ भी हैं । हमेशा खुश रहें । तो फ़िर आपको मेरी एक बात माननी होगी ।
बूङे को उसकी बात पर बङी हैरत सी हुयी । उसने चौंककर उसकी तरफ़ देखा । और फ़िर बिना कुछ समझे ही समर्थन में सिर हिलाया ।
- बाबा ! उसने एक बार जस्सी की तरफ़ देखा । फ़िर एक अजीब सी निगाह ढोल पर डाली । और बोला - ये ढोल अभी का अभी फ़ोङ दो । इसके बाद जीवन में कभी ढोल मत बजाना ।
बूङा हैरान रह गया । और इस विलक्षण योगी को देखने लगा ।

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