रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अंधेरा 21

बराङ साहब के घर में एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था । शाम के सात बज चुके थे । सुबह से लेकर अब तक बारह घण्टे गुजर चुके थे । बारबार राजवीर की रुलाई सी फ़ूट रही थी । मनदीप भी भौचक्का सा कुछ समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करे । प्रसून और जस्सी कमरे में मरे पङे थे ।
और वे ठीक से यह भी नहीं कह सकते थे । वे वाकई मरे पङे थे । प्रसून ने कहा था । हो सकता है । उन्हें ऐसा लगे कि वह मर गया है । लेकिन वास्तव में वह मरा नहीं होगा । पर यह बात उसने सिर्फ़ अपने लिये कही थी । उसकी बेटी के लिये नहीं । तब जस्सी क्या मर गयी थी । वह कब और कैसे प्रसून के कमरे में पहुँच गयी थी ।
राजवीर को रह रहकर अपने आप पर क्रोध आ रहा था । क्यों उसने जस्सी को उस रात अकेला छोङ दिया था । सुबह वह उठी । तो जस्सी घर में कहीं नहीं थी । वह देर तक चारों तरफ़ उसे देखती रही । उसने हर तरफ़ जस्सी को खोजा । पर वह कहीं नहीं थी । तब यकायक उन सबका ध्यान प्रसून की तरफ़ गया । क्या वह घर में ही था । या कहीं..कहीं वो साधु युवक उनकी लङकी को चुपके से भगा ले गया था ।
और जैसे ही वो उस कमरे के द्वार पर आये । उनका शक विश्वास में बदल गया । कमरे का लाक खुला था । जस्सी उसके साथ घर छोङकर भाग गयी थी । उन्होंने हङबङाहट में दरबाजे को धक्का मारा । पर दरबाजा अन्दर से बन्द था । अब उनकी उलझन और भी बङ गयी थी । दरबाजा बाहर से लाक था । उसकी चाबी जस्सी के पास थी । क्या वे दोनों अन्दर बन्द थे । फ़िर वे अभी तक क्या कर रहे थे ?
बहुत आवाजें लगाने के बाद आखिर दरबाजा तोङ दिया गया । और अन्दर का दृश्य देखकर उन सबके छक्के छूट गये । वे दोनों मरे पङे थे । इस नई स्थिति की किसी को कल्पना भी नहीं थी । उन्होंने भली प्रकार से चैक किया था । दोनों की सांस नब्ज नाङी का कुछ भी पता नहीं था । बस एक ही बात थी । उनके शरीर हल्के गर्म थे । और मरे के समान नहीं हुये थे । वे दोनों किसी प्रेमी प्रेमिका के समान एक दूसरे से सटे पङे थे । जस्सी उसकी छाती पर सिर रखकर सो रही थी । अब वे कर भी क्या सकते थे ।
उन्होंने कमरा ज्यों का त्यों बन्द कर दिया । और गौर से प्रसून की समझायी हुयी बातों को याद करने लगे । तब उन्हें शान्ति से बिना कोई हंगामा किये इन्तजार करना ही उचित लगा । चाहे इस इन्तजार में दस दिन ही क्यों न लग जायें ।
जीवन में कभी कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं । जब अच्छे से अच्छा इंसान भी कोई निर्णय नहीं ले पाता । सही गलत को नहीं सोच पाता । बराङ को भी जब कुछ नहीं सूझा । तो उसने एक बङा सा पैग बनाया । और धीरे धीरे घूँट भरने लगा । उसके माथे पर बल पङे हुये थे । घर में एक अजीब सी उदासी छायी हुयी थी । वे सब हाल में टीवी के सामने सिर झुकाये गमगीन से बैठे थे ।
और तभी एक चमत्कार सा हुआ । उस रहस्यमय कमरे का दरबाजा खुलने की आवाज आयी । और फ़िर जस्सी प्रसून का हाथ थामे हुये बाहर आयी । राजवीर खुशी से रो पङी । और दौङकर जस्सी से लिपट गयी । बराङ की आँखे भी भीगने लगी ।


- बराङ साहब ! प्रसून उसके सामने बैठता हुआ बोला - नाउ आल इज वेल । जस्सी पूरी तरह ठीक हो चुकी है । इसी खुशी में एक पटियाला पैग हो जाये ।
- ओये जुरूर जुरूर । बराङ भावुक सा होकर आँसू पोंछता हुआ बोला - ज्यूँदा रह पुत्तर । मेरा शेर । पंजाब दा शेर । बब्बर शेरया । वह बाटल से उसके लिये गिलास में व्हिस्की उङेलता हुआ बोला - राजवीर अब तू बैठी बैठी क्या देख रही है । बच्चों के लिये खाना वाना ला । इन्हें भूख लगी होगी ।
-  हाँ जी । सरदार जी । वह उठते हुये बोली - आप ठीक ही बोल रहे हो ।
- डैड । जस्सी मनदीप के पास आकर बोली - एक बार एक सरदार था । पर वह कोई सन्ता बन्ता नहीं था । वह बहुत अच्छा और रब्ब दा नेक बन्दा था । और वह आप हो । मेरे प्यारे पप्पा । सच आय लव यू वेरी मच डैड ।
बराङ ने उसे सीने से लिपटा लिया । और कसकर भींचते हुये सुबकने लगा । वाकई सबको ऐसा ही लग रहा था । जैसे जस्सी मरकर जीवित हुयी हो । उसे नयी जिन्दगी मिली हो । सो उस कोठी में अजीब सा खुशी गम का मिश्रित माहौल था ।
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इसके आठ दिन बाद जब जस्सी कालेज में थी । अचानक उसका सेलफ़ोन बजा । कालर आई डी पर निगाह पङते ही वह मुस्करा उठी । अभी वह क्लास से बाहर थीं । उसने चिकन वाली का हाथ पकङा । और तेजी से एक तरफ़ ले गयी । दूसरी तरफ़ से प्रसून बोल रहा था । जस्सी ने जानबूझकर चिकन वाली गगन को उत्तेजित करने हेतु इतना वाल्यूम बङा दिया था कि वह आराम से सुन सके । उसने ये बात प्रसून को भी बता दी थी । जब उसने गगन का हालचाल पूछा था कि वह उसके पास ही खङी है । और आपकी बात भी सुन रही है ।
तब जैसे प्रसून को यकायक कुछ याद आया । और वह सीधा गगन से सम्बोधित होता हुआ बोला - ओ सारी ..सारी गगन जी । वेरी सारी । जल्दी में मैं आपको एक बात बताना भूल गया था । जो आपने खास तौर पर पूछी थी । चलिये अब बताये देता हूँ । मैं राजीव जी को जानता हूँ । और नीलेश को भी । और उसकी गर्लफ़्रेंड मानसी को भी.. । अब तो आपको विश्वास हो गया । मैं नकली प्रसून नहीं हूँ ।
- क्याऽऽ । गगन एकदम से उछलकर बोली - सालिया डफ़र । यू चीटर । भैण..भैण..देख जस्सी..समझा दे इसको । मेरा मूड बिगङ गया है । अब मुझे बहुत गुस्सा चङ गया है । ऐसा न हो कि साली तू भी कुछ और बात कर दे । नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगी । उदास हो जाऊँगी । निराश हो जाऊँगी । मैं रो पङूँगी । गुस्से में आकर प्रसून का... काट दूँगी । टुईं.. टुईं । आई लव यू लल्लू बाबा । बाय बाय ।
जस्सी हौले हौले हँस रही थी । उसे पता था । प्रसून उसकी पगली सहेली का गुस्सा सुन रहा था । उसने फ़ोन काटने की कोई कोशिश नहीं की थी । फ़िर उसने फ़ोन को बेहद करीब लाकर स्वीट किस की ध्वनि की । और शरमा कर जल्दी से फ़ोन काट दिया ।
और अन्त में - वास्तव में इस पूरी कहानी की प्रेरणा मुझे मेरी सहेली से मिली है । उसका बहुत बङा योगदान इसमें रहा है । मैंने तो बस इसे शब्द ही दिये हैं । बाकी सब कुछ उसी का है । अतः मेरी ये कहानी उसी को समर्पित है । उसको जो मुझे बहुत प्रिय है । और सदा मेरी यादों में रहती है -राजीव कुलश्रेष्ठ ।

1 टिप्पणी:

Rakesh kumar yadav ने कहा…

rajeev ji kahani bahut badhiyan lagi,lekin 4,5 page padhane par dimag ki tuin. tuin. hone lagi thi.par kahani ka antim padav kabhi updeshatmak aur dimag par achchhi chhap chhodta hai.

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