शनिवार, नवंबर 19, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 19


सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः । 17-15
सुख में । दुःख में । नर ( पुरुष ) में । नारी ( स्त्री ) में । संपत्तियों में । विपत्तियों में । ज्ञानी बिशेष रूप से । सर्वत्र समदर्शी ( भेद रहित ) है । 15
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे । 17-16
जिस मनुष्य के लिए । न हिंसा है । न दयालुता है । न उदंडता है । न दीनता है । न आश्चर्य है । और न क्षोभ है । उसी का संसार क्षीण हुआ है । ( वही जीवन मुक्त है ) 16
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते । 17-17
जो न बिषयों में । द्वेष करने वाला । और न ( ही ) बिषयों में । लोभ करने वाला है । तथा जो सदा । आसक्ति रहित । मन से प्राप्त । और अप्राप्त । वस्तुओं का । भोग करता है । वही जीवनमुक्त है । 17
समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः । 17-18
जो समाधान । और असमाधान । हित और अहित की । कल्पना को । नहीं जानता है । ऐसा शून्य चित्त वाला ( ज्ञानी ) कैवल्य को प्राप्त हुआ ( मोक्ष रूप से ) स्थित है । वही जीवनमुक्त है । 18
निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न । 17-19


जो ममता । और अहंकार । रहित है । जिसकी आशाएं । उसके अभ्यंतर में । गल ( विलीन हो ) गयी हैं । जो कुछ भी ( मेरा ) नहीं है । ऐसा निश्चय करके । कर्म करता है । वह ( कर्मों में कभी ) लिप्त । नहीं होता है । 19
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि संप्राप्तो भवेद गलितमानसः । 17-20
जिसका मन । गल ( नष्ट हो ) गया है । वह मन के प्रकाश से । चित्त की शांति से । स्वपन और सुषुप्ति से भी । ऊपर उठकर । अनिर्वचनीय ( आत्मानंद ) की दशा को प्राप्त होता है । ( वही जीवन मुक्त है ) 20
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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