शनिवार, नवंबर 19, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 21


बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः । 17-5
इस संसार में । भोग और मोक्ष की । इच्छा वाले ( अनेकों मनुष्य ) देखे जाते हैं । परन्तु । भोग और मोक्ष की । आकांक्षा से रहित । कोई विरला ही महापुरुष है । 5
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि । 17-6
धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष । जीवन । और मरण । किस उदार चित्त के लिए । गृहण और त्याग करने योग्य । नहीं है ? ( अर्थात इनसे कौन उदासीन है ।) 6
वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथा जीविकया तस्माद धन्य आस्ते यथा सुखम । 17-7
विश्व के । लय होने में । जिसका राग नहीं है । उसकी स्थिति में । जिसको द्वेष नहीं है । यथा प्राप्य जीविका द्वारा । जो पुरुष । सुख पूर्वक रहता है । इसी कारण । वह धन्य है । 7 
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन्नास्ते यथा सुखम । 17-8
इस ज्ञान से । मैं कृतार्थ हूँ । इस प्रकार । जिसकी बुद्धि । गलित ( निष्ठ ) हो गयी है । ऐसा ज्ञानी पुरुष । देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । सुख पूर्वक रहता है । 8 

इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।


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