शनिवार, नवंबर 19, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 22


अष्टावक्र उवाच - तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः । 17-1
अष्टावक्र बोले - जो पुरुष । नित्य तृप्त है । शुद्ध इन्द्रिय वाला है । और अकेला रमता है । उसे ही ज्ञान का फल । और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है । 1  
न कदाचिज्जगत्यस्मिन तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम । 17-2
तत्व ज्ञानी । इस जगत के लिए । कभी भी । खेद को । प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि ( वह जानता है कि ) उसी एक से । यह बृह्मांड मंडल पूर्ण है । 2 
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः । 17-3
ये कोई भी बिषय । स्वात्माराम ( आत्मा में रमण करने वाले ) को । कभी भी । हर्षित नहीं करते हैं । जैसे सल्लकी ( गन्नों ) के पत्तों से प्रसन्न हुए । हाथी को । नीम के पत्ते । हर्षित नहीं करते । 3
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता । अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः । 17-4
जो भोगे हुए । भोगों में । आसक्त नहीं । होता है । और अभुक्त । पदार्थों के प्रति । आकांक्षा रहित है । ऐसा मनुष्य । संसार में दुर्लभ है । 4
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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