रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 1

हरेक लङकी बङे अरमानों से अपनी जिन्दगी के हसीन सपने संजोती है । उसके सपनों में वह होती है । उसका प्रेमी होता है । और फ़िर वही पति होता है । एक सजा धजा सुन्दर सा घर होता है । उसके हँसते खिलखिलाते खूबसूरत गोल मटौल बच्चे होते हैं । और ऐसे ही भोग ऐश्वर्य की खुशियों के बगीचे में फ़ूलों की तरह मुस्कराती एक लम्बी जिन्दगी की इच्छा ही उसकी सबसे बङी इच्छा होती है । बिलकुल यही सब मंजरी सोचती थी । और उसे पूर्ण विश्वास था । ऐसा ही उसकी जिन्दगी में होगा ।
पर शायद ऐसा कभी नहीं होता । जीवन के रंग अजीव हैं । इसके रास्ते सीधे सपाट न होकर भूल भुलैया में भटकाने वाले हैं । कदम कदम पर जिन्दगी हर इंसान को एक ऐसे मोङ पर लाकर खङा कर देती हैं । जब उसकी समझ में नहीं आता । अब क्या करना चाहिये । और किधर जाना चाहिये । और इसका सही उत्तर देने वाला भी कोई नहीं होता ।
इंसानी जिन्दगी की इस रामलीला में उसकी चाहतों की कामलीला ऐसे विचित्र चित्र बनाती हैं कि हरेक कोई भौंचक्क सा रह जाता है । रामलीला । उसे भी रामलीला बहुत अच्छी लगती थी । जीवन के प्रत्येक उतार चङाव का उत्तर भगवान राम की जीवन कथा रामलीला में ही तो छुपा हुआ था ।
वह सीधी होकर लेट गयी । उसने आँखें मूँद ली । ये जिन्दगी भी एक तरह की रामलीला ही है । वह समय के पंखों पर सवार अतीत में उङने लगी ।
- सीते‍ऽऽऽ ! काले पहाङ सा विशाल दैत्य रावण बोला - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये सदा पछताना होगा ।
उस आन लगी रेखा से बाहर आते ही साधु से राक्षस में परिवर्तित हुआ रावण का ये प्रचण्ड रूप देखकर सीता घबरा गयी । और सूखे पत्ते की तरह थर थर कांपने लगी ।
मंजरी का कलेजा धक से रह गया । उसके सीने में छुपा दिल धाङ धाङ कर बजने लगा । उसने पालिका ग्राउण्ड की चहारदीवारी पर बैठे पुष्कर की तरफ़ देखा । वह न जाने कब से उसे ही देख रहा था । जैसे ही उसकी नजरें उससे मिलीं । उसने एक गुप्त इशारा किया ।
वह सिटपिटाकर फ़िर से सामने देखने लगी । स्टेज पर लटके दर्जनों बल्बों पर तमाम पतंगे मंडरा रहे थे । और इस आधुनिक शमा पर किसी प्राचीन परवाने की तरह से गर्म बल्ब से झुलसकर तत्काल मृत्यु को प्राप्त होते थे । 


इस निश्चित अंजाम को प्राप्त होते उन्हें नये परवाने देखते थे । फ़िर भी भयानक मौत की परवाह न करते हुये वे रोशनी के दीवाने एक एक कर सूली पर चढते जाते थे ।
मंजरी के दिलोदिमाग में ऐसे ही अशान्त कर देने वाले विचारों का तूफ़ानी कोलाहल सा उठ रहा था । फ़िर रावण के संवाद ने तो मानों उसकी आत्मा को ही हिला दिया । उसे लगा । जैसे ये बात रावण ने सीता से न कहकर खुद उससे कही हो । कहीं वह भी तो नहीं पतिवृता की लक्ष्मण रेखा लांघने जा रही थी ।
उसने अपनी नाजुक कलाई में बँधी बहुत छोटे आकार की डिजायनर घङी पर निगाह डाली । बारह बजने में बीस मिनट बाकी थे ।
चारों तरफ़ घुप्प अँधेरा फ़ैला हुआ था । बस नगर पालिका के इस ग्राउण्ड में जो रामलीला मंचन के समय रात को आवाद रहता था । बल्बों का प्रकाश फ़ैला हुआ था । यह प्रकाश भी बेहतर मंचन प्रदर्शन हेतु सिर्फ़ स्टेज पर ही अधिक था । बाकी दर्शकों वाला स्थान लगभग अँधेरे में था । और वहाँ बहुत मामूली प्रकाश ही था । सभी दर्शक हजारों साल पहले घटित राम कथा का नाटय मंचन कई बार देखा होने के बाबजूद भी उसी उत्सुकता से देख रहे थे । मंजरी भी देख रही थी । और कुछ देर पहले तक उसके मन में कोई बात नहीं थी ।
पर अचानक ही उसके दिल में कोलाहल सा उठने लगा था । कितनी समानता थी । गर्म बल्ब से झुलसकर मरते इन पतंगों में । और रावण में । रावण भी देवी सीता की सुन्दरता का दीवाना था । और जान की कीमत पर उसे पाना चाहता था । जान की कीमत पर भी । जानकी जान की प्यासी है ।
लेकिन फ़िर भी उल्टा सीता को समझा रहा था । रामलीला का दृश्य आगे बढ चुका था । पर मंजरी के दिमाग में वही दृश्य अटका हुआ था ।
- सीते‍ऽऽऽ ! काले पहाङ सा विशाल दैत्य रावण उसके दिमाग में बोला - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये बहुत पछताना होगा ।
मंजरी का दिल एकदम जोरों से उछला । उसका समूचा अस्तित्व निकलकर स्टेज की सीता में समा गया । अब उसके सामने ही रावण खङा था ।
- मंजरीऽऽऽ ! उसके दिमाग में रावण की आवाज गूँजी - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये बहुत पछताना होगा ।
वह अचानक ही बिना बात के हङबङा गयी । उसकी निगाह फ़िर से चहारदीवारी पर गयी । 6 फ़ुट ऊँची चहारदीवारी की लेफ़्ट साईड पर तमाम पुरुष लाइन से बैठे हुये थे । फ़िर चहारदीवारी के बाद ठीक गली के पार बनी मस्जिद की 11 फ़ुट ऊँची दीवाल पर भी जमा भीङ बेहद शान्ति से हरण कर ले जायी जाती सीता का विलाप देख रहे थे । पूरा रामलीला मैदान स्त्री पुरुषों की भीङ से भरा था ।

वह सोच में पङ गयी । सीता की सिर्फ़ एक गलती ने कितने बङे खेल को जन्म दिया । या रावण की सिर्फ़ एक काम चाहत ने लंका के हाहाकारी विनाश की नींव डाली । या काम पिपासु शूर्पनखा की कामवासना के चलते ये सब हुआ । या फ़िर कैकयी । या फ़िर दासी मन्थरा । आखिर कहाँ था । इसका सिरा सूत्र ।
जसराम पुर । पश्चिमी यू पी का एक छोटा सा शहर था । और लगभग 20 किमी दायरे में बसा था । आधुनिकता की तेज हवा के झोंके इस शहर में भी आने लगे थे । और कुछ ही साल पहले किसी विकसित गाँव जैसे लगने वाले इस शहर का तेजी से आधुनिकीकरण हो रहा था । फ़ैशनेवल कपङों में सुसज्जित हाथ में महँगा मोबायल थामे बाइक स्कूटी पर लहराकर निकलते हुये युवा लङके लङकियों के दृश्य दिखायी देना आम बात हो गयी थी । पर जसराम पुर अभी भी ग्रामीण सभ्यता के बेहद नजदीक था । और आसपास के 30 गाँवों के लगातार सम्पर्क में था । इसलिये यहाँ पर सब्जी दूध घी अनाज आदि जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण चीजों पर उतनी महँगाई नहीं थी । और सबसे बङी बात वे बहुत हद शुद्ध रूप में उपलब्ध थी । ये शहर किसी निरन्तर वाहनों की भागमभाग वाली रोड से भी नहीं जुङा था । सो यहाँ की हवा भी एक अनोखी ताजगी और दिल को सुकून सा पहुँचाती थी । बस महामारी फ़ैलाने वाली बीमारी की तरह फ़ैल गये केबल टी्वी और इंटरनेट ने तमाम स्थानों की तरह यहाँ भी मानसिक वैचारिक प्रदूषण फ़ैलाया था । और तमाम युवा लङके लङकियाँ उन्मुक्त सेक्स की लहरों में बहने लगे थे ।
उन्मुक्त कामवासना । वास्तव में वह भी तो रामलीला का सिर्फ़ बहाना करके शरीर में भङकती इस कामलीला की पूर्ति के लिये आयी थी । और 1 घण्टा पहले से ही रामलीला मैदान के बाद मस्जिद के पीछे  स्थित खेतों में पहुँच जाना चाहती थी । लेकिन उसे क्या पता था कि आज की रामलीला उसके दिलोदिमाग को झिंझोङकर रख देगी । वह बारबार उठना चाहती थी । पर जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसके पाँवों को जकङ दिया था ।
फ़िर उसने फ़ैसला किया । पुष्कर से सख्ती से मना करके सीधा घर चली जाती हूँ । जब मैं यहाँ होऊँगी ही नहीं । तो उसकी समीपता के अहसास से अन्दर उठने वाली कामवासना स्वतः शान्त हो जायेगी । न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी । ये सोचते ही उसके चेहरे पर अनोखी दृणता आ गयी । उसने फ़िर से दीवाल पर बैठे पुष्कर की तरफ़ देखा । पर अब वह दूसरी तरफ़ देख रहा था । लेकिन इसकी परवाह किये बिना वह उठी । और स्टेज के पीछे जहाँ महिलायें लघुशंका के लिये जाती थी । उधर तेजी से जाने लगी । स्टेज पर हरण होती सीता आन लगी लक्ष्मण रेखा लाँघने पर पश्चाताप करती हुयी करुण विलाप कर रही थी । और कामी राक्षस रावण मुक्त अट्टाहास कर रहा था - देखूँ अब तुझे रावण से कौन बचाता है । अब तू स्त्री की आन लक्ष्मण रेखा से बाहर आ गयी है सीता ।
कुछ ही देर में बारबार उसकी तरफ़ देखते पुष्कर का ध्यान अचानक उसकी तरफ़ गया । और उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौङ गयी । उसने दीवाल पर उल्टी तरफ़ पाँव घुमाये । और धप्प से नीचे कूद गया । फ़िर वह तेजी से मस्जिद के पीछे की तरफ़ बढा ।
मस्जिद के पीछे की तरफ़ बढती मंजरी का दिल जोरों से उछला । और हलक में अटक गया । काला घुप्प अँधेरा सांय सांय कर रहा था । सिर्फ़ सौ मीटर की दूरी पर लोगों की भीङ की भीङ जमा थी । पर यहाँ डरावना वीरान सन्नाटा पसरा हुआ था ।
वह दिन में कई बार इस स्थान पर आ चुकी थी । पर आज जैसी भयानकता उसे कभी महसूस नहीं हुयी थी । नगरपालिका की लेफ़्ट साइड चहारदीवारी के ठीक पीछे एक सङक थी । जो महज रामलीला स्टेज तक आकर खत्म हो गयी थी । गली के बाद बाँये हाथ पर मस्जिद थी । लेकिन उसकी भी पिछली दीवाल रामलीला ग्राउण्ड से भी सौ फ़ुट पहले ही खत्म हो जाती थी । मस्जिद के ठीक पीछे दो बङे खेत थे । फ़िर उनके बाद बाँये हाथ पर ही नदी आ जाती थी । नदी के बाद दूर दूर तक खेतों का अन्तहीन सिलसिला था ।
वह मस्जिद की दीवाल के ठीक पीछे पहुँच गयी । और तब अचानक उसे ख्याल आया । उसने यहाँ आकर भी गलती की । उसे सीधा घर जाना चाहिये था । और कल सल पुष्कर को बताना चाहिये था कि अब वह उससे कोई सम्बन्ध नहीं रख सकती । क्योंकि अब वह उसकी प्रेमिका नहीं । बल्कि किसी की विवाहिता है ।
अपनी यही सोच उसे उचित लगी । और वह घर जाने के लिये हुयी ।
तभी पीछे से किसी ने उसे बाँहों में भर लिया । और कस कर भींचने लगा । वह एकदम से हङबङा गयी । उसकी जबान मानों सिल ही गयी । पुष्कर में काम प्रवाह अनियन्त्रित होकर बह रहा था । वह मंजरी के स्तनों को सहलाने लगा । और बेहद उतावले पन का परिचय दे रहा था । एक अजीव सी मुर्दानी बदबू भी उसे अपने इर्द गिर्द महसूस हो रही थी । पर सब कुछ अचानक सा था ।
स्थिति एकदम उसकी सोच के विपरीत हो गयी । वह सोच रही थी । पुष्कर से बात करते हुये रूखा बरताव करके उसके अरमानों पर तुषारपात कर देगी । पर उस दीवाने ने तो उसे कोई मौका ही नहीं दिया । और कुछ ही क्षणों में उसका ब्लाउज खोल दिया । नैतिक बोध जागते ही वह थोङा कसमासाई भी । और बोली -  छोङो मुझे । क्या कर रहे हो ये सब ।
- चुप रहो । वह अजीब से ठण्डे स्वर में बोला - मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।
वह कमजोर पङ गयी । वह सच ही तो कह रहा था । फ़िर भी वह तर्क देना चाहती थी । पर प्रेमी उसे मौका ही नहीं दे रहा था । और बे सबरा सा उसके अंग प्रत्यंग को सहलाये जा रहा था । नैतिक बोध उसे रोक रहा था । और शरीर की भङकती भूख तङपते प्रेमी के आगे समर्पित सहयोग करती चली जा रही थी । इन दोनों के मध्य उसका अंतर्मन आगे पीछे जाते झूले की भांति झूल रहा था । इसलिये दोनों के मध्य दबंग पुरुष के समक्ष बेबस औरत का सा व्यवहार जारी था ।
काले अँधेरे में काली कामनायें ही खेल रही थी । वे एक दूसरे को देख नहीं पा रहे थे । बस महसूस ही कर रहे थे । और तब उसने पुष्कर को उसके उन्मादी लक्ष्य पर महसूस किया । उसे तेज गरमाहट सी स्पर्श करने लगी । और उसका विरोध क्षीण होने लगा । पुष्कर का चेहरा उसके पुष्ट उरोजों से सटा हुआ था । लेकिन उसकी हङबङाहट उसे बारबार असफ़ल कर रही थी ।
तब उसमें एक साथ कई मिश्रित भावनाओं का संचार हुआ । उसका प्रेमी । उसका मिलन का वादा । कभी साथ गुजारे उनके प्रेम के मधुर क्षण । और इन सबसे अधिक शक्तिशाली । दो तपते जवान जिस्मों का संगम । एक दूसरे में समा जाने को तत्पर ।
उसके सुन्दर चेहरे पर उस घोर अँधेरे में भी उसके अन्दर की प्रेमिका मुस्कराई । और सहयोग करते हुये उसने उस अनाङी घुङसवार की लगाम थामकर सही रास्ता दिखा दिया । समर्पित औरत के प्रेम का लरजता स्पर्श । उसके नाजुक हाथ का साथ पाते ही उसमें अदम्य ऊर्जा भरती गयी । और वह कामना की गहराईयों में उतरता चला गया ।
उसका समस्त नैतिक अपराध बोध वासना की आँधी उङा ले गयी । और सब कुछ भूलकर वह अपने प्रेमी के साथ उस अरमानों की सुरंग में दौङने लगी । वह उछलकर उमंगो के घोङे पर सवार हो चुकी थी । और घोङा बेलगाम दौङ रहा था । उन्मुक्त । उन्मादी । पागल । आवारा ।
वह हाँफ़ने लगी । और कसकर पुष्कर के साथ चिपक गयी । उसने तेजी से उसे जकङ लिया । और उस घुङसवार की मजबूत टाप महसूस करने लगी । लेकिन हर दौङ की कोई न कोई मंजिल होती है । अश्वारोही ऊर्जाहीन हो चुका था । उसका संगठित हुआ काम अस्तित्व पिघलने लगा था । तब वह लावे के समान फ़ैलने लगा । अनोखी तृप्ति के अहसास से मंजरी की आँखें बन्द हो गयीं ।

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