रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 10

- मालिक । पिशाच गिङगिङाता हुआ सा बोला - मुझ पर दया करो । इस योग किरण से मुझे बचाओ । ये मुझे जला देगी ।
जोगी के चौङे माथे पर चिंता की गहरी लकीरें उभर रहीं थी । अपने अब तक के जीवन में उसे ऐसी शिकस्त कभी न मिली थी । वह रह रहकर उस बाल को देख रहा था । और मानों अपने बाल नोच रहा था । एक साधारण सा स्त्री बाल । उसके मारण तंत्र को काट सकता है । और बाल जैसे बारबार उसका उपहास कर रहा हो ।
आज की रात मानों अमरकंटक के उस जंगल में कहर की रात बनकर आयी थी । उसे कदम दर कदम अपशकुन हो रहे थे । भूत चुङैल प्रेत पिशाच जिन्न वेताल डायन कपाली आदि मुर्दाखोरों का राजा आज गहरी सोच में डूबा हुआ था । आज उसे बारबार वह औरत याद आ रही थी । पगली औरत । उसकी दीन पुकार उसके कानों में गूँज रही थी ।
 - याद रख जोगी ।... भगवान भी कुछ है । वह दूर आसमान पर बैठा हुआ भी । चींटी तक की फ़रियाद सुनता है । उसके न्याय में देर है । पर अंधेर नहीं । तूने साधुता का अपमान किया है । इसलिये अब भी संभल जा । अरे.. फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत ।
- हे ऊपर वाले ।  हे सच्चे शहंशाह । मेरी फ़रियाद कबूल कर । इस बाबा की वजह से मेरा घर उजङ गया । तू इसको जिन्दगी से उजाङ दे । अगर तू सच्चा है । निर्बलों का बल है । तो फ़िर आसमान पर मत बैठा रह । मुझ दुखियारी के लिये नीचे आ । तुझे आना ही होगा ।
फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत । उसने गहरी सांस ली । शायद वाकई चिङिया खेत चुग गयी थी । वह हवाओं का राजा था । किस्म किस्म की प्रेत वायु उसकी चाकरी में रहती थी । पर आज जिन अशरीरी रूह बयारों को वह देख रहा था । उसने जीवन में न देखी थी । दाँत किटकिटाती । भालू जैसे बालों से भरी । काली नग्न डायनें । मृत्युकन्या की भयंकर गण । हाथ में हड्डी का मुगदर थामे । अट्टहास करती नग्न कालिकायें । उस पर झपटने को आतुर । बस मानों किसी आदेश की प्रतीक्षा में थी । वह अन्दर तक कांप  गया । उसकी मृत्यु ऐसे होगी । यह तो उसने ख्वाव में भी न सोचा था । उसकी भी मृत्यु होगी । यह तो कभी उसे विचार ही न आता था । डर जैसा भी कुछ होता है । ये उसे आज ही अनुभव हो रहा था । उसका आत्मविश्वास खोता जा रहा था । और किसी जुनून की भांति भय हावी होता जा रहा था । अपने डगमगाते अस्तित्व को भावनात्मक सहारा देने हेतु उसे मदिरा की सख्त जरूरत थी । उसने कलश में से लोटा भरा । और गटागट मदिरा पीने लगा । भयंकर नशे से उसकी आँखे अंगारा होकर जलने लगी ।
- मालिक । उसे पिशाच की दयनीय आवाज सुनाई दी - मुझ पर दया करो । इस योग किरण से मुझे बचाओ । ये मुझे जला रही है ।
- सब खत्म हो गया । वह नशे में लङखङाती हुयी आवाज में बोला - मेरी सोने की लंका जल गयी । अब .तुम लोग जाओ । कोई ओर आसरा खोजो । ये गाँव उजङने वाला है  ।
कमाल का खेल था । हर बात उल्टी हो रही थी । शक्ति के मद से मदमदाता जोगी दीन हीन हो रहा था । पाशविक अट्टाहास गुंजाने वाली प्रेतक वृतियाँ भयभीत थी । सुरक्षा की तलाश में थी । अमरकंटक का वह शान्त वन रात की निस्तब्धता में आश्चर्य से यह तमाशा देख रहा था । झुण्ड के झुण्ड प्रेत इस मृत्युदूत को खुद मृत्यु की खन्दक में गिरता देख रहे थे ।
- भाग जाओ । वह अजीब सी नफ़रत से विकृत स्वर में बोला - अब यहाँ मौत की देवी नृत्य करेगी । अगला दिन मेरी मृत्यु का सन्देश लेकर ही आयेगा ।
अगला दिन ।
शायद इसी को कहते हैं - मालिक से सब होत हैं । बन्दे से कुछ नाहिं । राई को पर्वत करे । पर्वत राई माँहि । अगला दिन । जहाँ जोगी के लिये मृत्यु सन्देश ला रहा था । तारा के घर में नवजीवन की सुनहली किरणें फ़ैलने वाली थी । दूर क्षितिज में सूरज का उजाला फ़ैलने लगा था । मंजरी चाय बना लायी थी । वे गर्म चाय की चुस्कियाँ भर रहे थे ।
तभी पङोस की लङकी हाथ में मोबायल थामें तेज तेज सांसे लेती हुयी आयी । और बोली - आण्टी ! अस्पताल से

आपका फ़ोन । रात को भी आया था ।
तारा ने एकदम चौंककर देखा । मंजरी हङबङा गयी । अशुभ की आशंका उनके चेहरों पर लहराने लगी । एकाएक उन्हें कुछ न सूझा । तब उसी ने फ़ोन लिया । और बोला - हल्लो !
- देखिये । उस तरफ़ से आवाज आयी । तो उसने लाउड मोड सैट किया - खुशखबरी है । आपके पेशेंट को कल रात होश आ गया है । एक चमत्कार सा हुआ है । वह अपनी माँ पत्नी को बहुत याद कर रहा है । आप शीघ्र आने की कोशिश करें ।
तारा अपने आपको रोक न सकी । उसकी जबरदस्त रुलाई फ़ूट पङी । वह दौङकर रोती हुयी प्रसून के पैरों से लिपट गयी । और बिलखते स्वर में बोली - हे देवता  ! मुझे माफ़ कर देना । मैं आपको पहचान न सकी । आप मेरे लिये भगवान हो ।
वह एकदम सिटपिटा कर रह गया । और मुश्किल से उसने तारा को अलग किया । दोनों सास बहू आपस में लिपट कर रोने लगी । भौंचक्क सी लिली की आँखें भी भीगने लगी ।
आँसू । खुशी के आँसू । गम के आँसू । दिल का बोझ हल्का कर देने वाले आँसू । आँसू आज दिनकर जोगी की आँखों से भी बह रहे थे । पश्चाताप के आँसू । जीवन की सभी अच्छी बुरी घटनायें उसे रह रहकर याद आ रही थीं । अपने अखण्ड साम्राज्य के बीच वह खुद को नितांत अकेला महसूस कर रहा था । जिस विशाल प्रेत समुदाय पर कभी उसे गर्व था । वही आज उसे भयंकर यमदूत नजर आ रहे थे । वह रात भर तङपता रहा था । और पीता रहा था । ये कौन सा तूफ़ान आया था । जो उसका समस्त आशियाना ही उजाङ गया था ।
प्रसून की गाङी तूफ़ानी रफ़्तार से उङ रही थी । यकायक अस्पताल से आये फ़ोन ने पूरा खेल उलट पलट कर दिया था । उसकी समस्त योजना ही बदल गयी थी । वह आज तारा और मंजरी को अमरकंटक लाने वाला था । पर केशव की खबर आने के बाद ये असंभव ही था । और स्थिति दोनों तरफ़ से बेहद विकट हो चुकी थी । एक ही समय निर्धारित था । जब उस परिवार का कोमा से उबरे केशव से मिलन होना था । और जब दिनकर जोगी का इस संसार से वियोग हो जाना था ।
सबसे बङी मुश्किल थी । वह लिली को भी उनके साथ नहीं भेज सकता था । खुद भी नहीं जा सकता था । तब उसने तारा के परिचितों के साथ उन दोनों को रवाना कर दिया । और स्वयं अमरकंटक के लिये गाङी दौङा दी । वह बङी दक्षता से कार चला रहा था । स्टेयरिंग पर उसके हाथ मजबूती से जमे हुये थे ।
- प्रसून जी । सङक पर देखती हुयी लिली अचानक उससे चिपक कर बोली - तुम आदमी हो कि पूरे खचेङूमल । मैं यहाँ प्रेत रिसर्च के सिलसिले में प्रेत दर्शन हेतु आयी हूँ । और तुम मुझे भारत दर्शन करवा रहे हो । मुझे पागल समझा है क्या ?
- लिली ! वह कुछ सोचता हुआ सा बोला - याद है । तुमने जंगल में उस साधु से कहा था । पहचाना मुझे । तुम उसे कैसे जानती हो ?
- मेरी अम्मा का आशिक है वो । वह झुँझलाकर बोली - साले रास्कल । बात घुमाना तो कोई तुझसे सीखे ।..ठीक है । मैं एक बार इण्डिया आयी थी । तब उससे नर्मदा माता के मन्दिर में मुलाकात हुयी है । बङा खास बना है ये मन्दिर । मन्दिर के तीन तरफ़ पानी ही पानी है । आने जाने का सिर्फ़ एक ही रास्ता है । तब मैंने उससे प्रेतों के बारे में पूछा था । तब पता नहीं मुझे बैठाकर वह क्या जन्तर मन्तर सा करता रहा ।
प्रसून के दिमाग में एक विस्फ़ोट सा हुआ । वह अन्दर तक हिल गया । फ़िर उसने खुद को संभाला । और आगे देखते हुये ड्राइव करने लगा । गाङी जंगल की सीमा में प्रवेश कर गयी । और बमुश्किल ही जोगी के सिद्ध मठ तक पहुँची ।
दिनकर जोगी अर्द्ध बेहोशी की सी स्थिति में था । उसने घबराकर उन्हें देखा । जैसे मौत आयी हो । फ़िर वह लिली को देखकर चौंका ।
- याद आया । वह रुँधे कण्ठ से कठिन स्वर में बोला - अब सब याद आया । शायद यही कील अटकी हुयी थी । जो मेरे प्राण न निकल रहे थे ।..तो तू है । वो मौत की देवी ।..मैं व्यर्थ ही उस पगली को सोचे जा रहा था ।..नर्मदा माता के मन्दिर से तू मिली थी । और बङी खास पात्र थी तू । खास । तेरा कौमार्य अक्षुण्ण था । कामवासना का कोई अंश तक न था तेरे अन्दर । ये विलक्षण बात थी ।..और तुझे सिद्धों के ज्ञान में गहरी दिलचस्पी थी । अदृश्य रूहों के प्रति अदभुत लगाव । मेरे अन्दर लोभ जागा । तुझे शिष्या बनाने का लोभ । लेकिन निष्काम भाव से नहीं । कामभाव से । तेरे मनमोहक सौन्दर्य और अछूते यौवन को भोगने का लोभ । मैंने तुझे आँख बन्द कर बैठाया । चुपचाप तेरे कुछ केश लिये । और वशीकरण किया कि एक दिन तू खुद ही खिंची चली आयेगी । यही बात थी । देख मेरा वशीकरण सफ़ल हुआ । देख तू आयी । मगर मृत्यु का उपहार लेकर । देख..उसने बमुश्किल उँगली उठाकर उसमें लिपटा हुआ बाल दिखाया - वही बाल । ये एक बाल । जो मेरी मौत का फ़रमान बना ।


लिली भौंचक्का रह गयी । प्रसून ने एक गहरी सांस ली । और ढेर सारा पानी जोगी के सर पर उङेल दिया ।
- आप । फ़िर वह दुखी स्वर में बोला - बच जाओगे महाराज । आप महान साधु हो । तंत्र के महान ज्ञाता हो ।
वह मुश्किल से लङखङाता हुआ उठा - नहीं । अन्त बुरे का बुरा । अब मेरा वक्त आ गया । हे पवित्र आत्मा । तुम मेरे साक्षी बनो । मैं प्रायश्चित बोध से इस देवी से क्षमा माँगता हूँ ।
वह लिली की तरफ़ बढा । हाथी जैसा उसका विशालकाय शरीर डांवाडोल हो रहा था । वह हवन कुण्ड के पास आ गया । अचानक वह ठोकर लगने के समान गिरा । कुण्ड के पास गङा तीखा त्रिशूल सीधा उसकी गर्दन में समा गया । लिली की चीख निकल गयी । घने बालों से आच्छादित । उस स्थूल शरीर की काली भयानक देह हारिणी अंतागदा गण ने क्रूर हँसी हँसते हुये हाथ में थमे मुगदर को देखा । उस मुगदर को । जिसका वज्र प्रहार अभी अभी उसने जोगी के सिर में किया था ।
- दिव्य । फ़िर वह बोली - आप थोङा अलग हो जायें । ये कठिनता से शरीर त्यागेगा ।
प्रसून लिली का हाथ थामे परे हो गया । मृत्युकन्या की भयानक गण सेना जोगी पर बेतहाशा टूट पङी । वे अपने घातक हथियारों का ताबङतोङ प्रहार उस पर करने लगे ।
उसने लिली की तरफ़ देखा । वह बुरी तरह घबरायी हुयी थी । अपावन रूहों का सैलाब सा उमङ रहा था वहाँ । उसने लिली का हाथ थामा । और वापिस कार में आ गया । गाङी फ़िर से उल्टी जाने लगी । वे वहीं आ पहुँचे । जहाँ रात को ठहरे थे । लिली का जी सा मिचला रहा था । वह बाहर निकल कर टहलने लगी ।
उसकी निगाह बचाकर उसने बैग से वह गुङिया निकाली । और टहलता हुआ सा नदी के किनारे आ गया ।
उसने गुङिया को अलग किया । और नदी में उछाल दिया । फ़िर उसने खाली बोतल को देखा ।
- मुझे माफ़ कर दो । बोतल से बँधा पिशाच गिङगिङाया - जोगी की शक्ति पाकर मैं मतवाला हो गया था । प्रेतत्व की मर्यादा भूल गया था । मैंने एक पतिवृता स्त्री की लक्ष्मण रेखा में घुसने का भयंकर अपराध किया । पर अब क्षमा ही माँग सकता हूँ ।
- दस महीने । वह भावहीन स्वर में बोला - और अब दस साल । किसी की हँसती खेलती जिन्दगी को उजाङ देना । यहाँ तक कि उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा देना । मैं सोचता हूँ । यह सजा कुछ अधिक नहीं । तुम भाग्यशाली हो पिशाच । जो तुमने उन्हें जल्द छोङ दिया । सोचो । वरना ये सजा कितनी लम्बी हो सकती थी ।
- पर । वह बिलखता हुआ बोला - सजा कैसी  होगी ? क्या होगी ?
- अपनी सजा के तौर पर । वह रूखे स्वर में बोला - तुम इस बोतल से बँधे रहोगे । ये तंत्र की आन है । तुम इस पवित्र नदी के जल में दस साल तक तैरते हुये  बहते रहोगे । तुम इस बोतल के आसपास कुछ ही दूर तक विचरण कर पाओगे । फ़िर दस साल पूरे होने पर तुम स्वयं ही इससे मुक्त हो जाओगे ।
- कोई रियायत नहीं हो सकती ।
- ये रियायत ही है । वह गहरी सांस लेकर बोला - प्रभु बहुत दयालु हैं । वह सब पर दया ही करते हैं ।
फ़िर उसने हाथ को घुमाया । और बोतल को नदी में उछाल दिया । बोतल नदी की तेज धारा में डूबती उतराती सी बहने लगी ।
- इस कहानी के पात्र स्थान आदि काल्पनिक हैं । कोई भी समानता सिर्फ़ संयोग मात्र ही होगी ।

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