रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 2

अगली रात । नौ बज चुके थे । वह बिस्तर पर लेटी हुयी थी । कमरे में अंधेरा फ़ैला हुआ था । आँखे बन्द होने के बाबजूद भी कल का दृश्य रह रहकर उसकी आँखों के सामने आ रहा था । एक औरत । दो मर्द । एक उसका प्रेमी । एक उसका पति । और शायद दोनों की एक ही ख्वाहिश । उसकी जवान देह को भोगना । जब तक वह जवान रहती । क्या उन दोनों में से कोई उसे वास्तविक प्रेम करता है । वास्तविक प्रेम । शायद नहीं ।
- देख मंजरी । उसके कानों में अपनी सहेली सोनी की आवाज सुनाई दी - मोस्टली ये दो हरेक की जिन्दगी में कभी न कभी आते ही हैं । एक प्रेमी । एक पति । कभी पति पहले आता है । तो कभी प्रेमी । पर आते निश्चित हैं । और ये दोनों कभी एक ही इंसान में नहीं होते । हो ही नहीं सकते ।
- लेकिन सोनी । वह हैरानी से बोली - मैं तो प्रेम का अनुभव करना चाहती हूँ । कोई ऐसा । जो मेरे दिल के तार तार छेङ दे । मेरे तन मन को उमंगो से भर दे । मुझे आगोश में लेकर आसमां में उङ जाये । चाँद तारे तोङकर मेरा आँचल सजा दे ।
- धत तेरे की । सोनी ने माथे पर हाथ मारा - साली गधी । अरे कोई तुझे बाग बगीचे में घुमाने वाला भी मिल जाये । कोई तुझे सेव अंगूर खिलाने वाला ही मिल जाये । उसको ही तू बहुत समझ । आसमान में जायेगी । पागल नहीं तो । मैं कहीं कवि न बन जाऊँ । तेरे इश्क में ऐ कविता ।
विचार प्रवाह से उकताकर उसने करवट बदली । और सोने की कोशिश करने लगी ।
19 को पार कर रही मंजरी गोस्वामी खूबसूरत देहयष्टि की मालकिन थी । और सोसायटी में डीजे गर्ल के नाम से मशहूर थी । वह एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी । और बङे परिवार के साथ साथ आर्थिक स्थिति से कमजोर थी । तब 15 वर्ष की आयु से ही वह आर्केस्ट्रा पार्टी से जुङकर नाचने गाने लगी । पर शायद पहले उसे अपनी ही खूबियों का पता न था । उसकी आवाज में वीणा की झंकार थी । तो देह में हिरनी सी लचक । 


उसके नृत्य में मोरनी की थिरक थी । तो अदाओं में बिजली की चमक । किसी को वह स्टेज पर उङती मैंना सी नजर आती थी । तो किसी को पंख फ़ङफ़ङाती हुयी बुलबुल ।
इन सब खूबियों के चलते उसका भाव बढने लगा । और जल्द ही वह सबसे महंगी आर्केस्ट्रा कलाकार बन गयी । धनाढय व्यक्ति किसी भी कीमत पर उसे अंकशायिनी बनाने के ख्वाव सजाने लगे । अप्रत्यक्ष उसके पास ऊँची कीमत के प्रस्ताव आने लगे । पर मंजरी भी खास स्वभाव वाली थी । देह को बेचने से उसे सख्त नफ़रत थी । उसकी सीमा सिर्फ़ गायन नृत्य प्रदर्शन तक ही तय थी । और इससे पहले कि ये सीमा टूटती । उसकी शादी मध्य प्रदेश में हो गयी । और सब कुछ पीछे छोङकर वह ढेरों अरमान लिये पिया के घर आ गयी ।
विचारों में खोयी हुयी मंजरी अचानक हङबङा गयी । उसने सीने पर तेज कम्पन महसूस किया । वह एकदम व्यर्थ ही डर सी गयी थी । उसने वायब्रेट करते हुये ब्रा में दबे स्लिम सेलफ़ोन को निकालकर काल रिसीव की ।
- क्याऽऽऽ ? वह चौंककर बोली - फ़िर..फ़िर..। ये क्या कह रहे हो तुम ?
दूसरी तरफ़ से पुष्कर की बात सुनकर उसके होश उङ गये । वह काफ़ी हताश निराश दुखी सा था । और अपनी बात कहे चले जा रहा था । पर अब उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । कुछ भी । वह तो मानों अज्ञात रहस्यमय भंवर में डूबती जा रही थी ।
वह कह रहा था । रात में जब वह हङबङी में मस्जिद के कोने से मुङा ही था । तभी उसे जमीन में गङे पत्थर की जबरदस्त ठोकर लगी । और वह मुँह के बल गिरा । उसका माथा फ़ट गया । वह काफ़ी देर अचेत सा पङा रहा । बहुत खून बह गया । किसी तरह वह घर पहुँचा । और अभी थोङा सुधार होते ही सीधा उसी को फ़ोन कर रहा है ।
बङी अजीव बात थी । उसे संवेदना प्रकट करनी चाहिये थी । पर उसके मुँह से बोल तक न निकल रहा था । उसके दिमाग में डरावनी सांय सांय गूँज रही थी । हे भगवान । वह अचानक उछल ही पङी । उस समय की सम्मोहक कामवासना में उसका ध्यान ही नहीं गया । अब तक की दिमागी उथल पुथल ने उसे सोचने का मौका ही नहीं दिया । और तब उसके समस्त शरीर में एक भयानक झुरझुरी सी दौङ गयी । वह मुर्दा जैसी बदबू । उसके स्पर्श का लीचङ अहसास । उसके स्पर्श का अजनबी पन । और..और उसका स्वर भी । सब कुछ अलग था । वह सब पुष्कर का हरगिज नहीं था । उस समय भी उसे झटका सा लगा था । पर वह किसी जादू से मोहित सी हो रही थी । और कामवासना में बही जा रही थी ।

वह बिस्तर पर उठकर बैठ गयी । और तेज तेज सांसे लेने लगी । वह पुष्कर नहीं था । फ़िर वह कौन था ?
एक अबूझ पहेली की तरह यह रहस्य उसके जीवन की किताब में लिख गया था । वह पुष्कर नहीं था । फ़िर वह कौन था ? पर इसका उत्तर दूर दूर तक उसके पास न था ।
लेकिन समय की इस किताब में यदि प्रश्न लिखे होते हैं । तो अगले पन्नों पर इनके उत्तर भी लिखे होते हैं । कभी ये उत्तर प्रश्न को सुलझा देते हैं । और कभी ये उत्तर किसी जिन्दगी को भयानक जंजाल में उलझा देते हैं ।
- तारा देवी । एक दिन काली मन्दिर का वह साधु उसकी सास से बोला - ये तेरी बहू है ना ।
अपना जिक्र आते ही उसके कान चौकन्ने हो गये । वह अपनी सास के साथ मन्दिर आयी थी । उसकी सास मन्दिर में बंगाली साधु के पास बैठी थी । जो बंगाली बाबा के नाम से प्रसिद्ध था । और वह ओट में बरामदे के पास पीपल के नीचे खङी थी ।
- हाँ स्वामी जी । उसे सास की आवाज सुनाई दी - ये मेरी बहू है । मंजरी । अभी साल भर पहले विवाह हुआ है । पहली बार इसे यहाँ लायी हूँ । बङे अच्छे और पवित्र भावों वाली हैं ।
वह तेजी से ऐसे स्थान पर गयी । जहाँ से वह दोनों को छिपकर देख भी सके । और सुन भी सके ।
साधु जैसे किसी गहरी सोच में डूब गया । उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें गहरा गयी । तारा हैरान थी । महात्मा उसकी नयी नवेली बहू को लेकर किस चिन्ता में डूबा हुआ था । वह आश्चर्यचकित सी उसके बोलने का इंतजार कर रही थी । पर वह जैसे शून्य 0 में चला गया था ।
- आखिर । तारा जब अपनी उत्सुकता न रोक सकी । तो व्यग्रता से बोली - बात क्या है महाराज ?  कुछ तो बतायें ।
- या देवी सर्व भूते । बंगाली साधु धीरे से बुदबुदाया - इसके परिवार की रक्षा कर ।
ये सुनते ही दोनों सास बहू के होश उङ गये ।
- क्या । तारा बौखलाकर बोली - ये क्या कह रहें आप ।
- सुनो देवी । साधु जैसे अपने में वापिस लौटा - अपने पुत्र और बहू को समझा देना कि अभी पति पत्नी व्यवहार न करें । तब मैं देवी की सहायता से इस बाधा का उपचार सोचता हूँ । तुम्हारी बहू पर पिशाच की छाया है ।
मंजरी को एकदम तेज चक्कर सा आया । और संभालते संभालते भी वह जमीन पर ढेर हो गयी ।
उत्तर मिल चुका था । मगर ये उत्तर बेहद भयानक साबित हुआ था । उसकी समस्त जिन्दगी में जहर घोल देने वाला उत्तर ।
वो मुर्दा जिस्म सी बदबू । मुर्दा स्पर्श का अहसास । और मुर्दे जैसा ही स्वर  - चुप रहो । उसे जैसे फ़िर से सुनाई दिया - मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।..चुप रहो । मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।..चुप रहो । मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।
उसके साथ सम्भोग करने वाला पिशाच था । नदी में बहायी गयी ताजा ताजा लाश का उपयोग करके उसने उसके साथ मनमानी की । और ये ख्याल आते ही उसे अब अपने समूचे अस्तित्व से घिन आने लगती थी । उसके साथ एक मुर्दा देह द्वारा कामवासना की पूर्ति । उसकी जिन्दगी नरक हो गयी । उन्मुक्त मचलती पति मिलन की मांग पर प्रतिबन्ध लग गया ।
बंगाली बाबा उसका यथाशक्ति उपचार करने लगा । और जल्द ही हार मान गया । उसके चेहरे पर गहरी निराशा छायी हुयी थी ।
- मुझे दुख है देवी । वह एक महीना बाद दोपहर को उसके घर आकर बोला - मामला साधारण नहीं है । और मेरी पहुँच के बाहर है । पिशाच पोषित है । उसे महा दुष्ट दिनकर जोगी से पोषण मिलता है ।.. अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ । वह महान तान्त्रिक है । पर तामसिक वृति का है । उसने जंगल में अपना साम्राज्य कायम कर रखा है । हजारों ताकतवर हवायें उसके अधीन हैं । केवल भक्ति प्रसाद के चलते मैं जीवित रह सका हूँ । वरना उससे भिङने की मेरी सामर्थ्य नहीं थी । न है ।
तारा का मुँह खुला का खुला रह गया । दरबाजे के पीछे खङी मंजरी थरथर कांप रही थी ।
- पर बाबा । देवी माँ तो.. । अचानक बौखलायी सी तारा संभलकर बोली - कोई तान्त्रिक देवी से बढा हो गया ।
- माँ पर शंका मत करो । वह अफ़सोस भरे स्वर में बोला - पर उपचार के लिये कोई माध्यम चाहिये । कोई सशक्त योगी । जो जोगी के हर तन्त्र के तोङ को जानता हो । बल्कि मुँह तोङ जानता हो । उसके राज्य में उसी की पेश जायेगी । जोगी के पास उसकी अर्जित तन्त्र शक्तियाँ हैं । इसलिये लोहा ही लोहे को काटेगा ।
तारा में तो मानों कुछ सोचने समझने की शक्ति ही नहीं रही । वह एकदम दिमागी रूप से शून्यवत हो गयी ।
- बाबा । कुछ देर बाद अचानक वह होश में आते हुये बोली - वह जोगी महात्मा कहाँ रहते हैं । मैं उनके पास जाकर अपना आंचल फ़ैला दूँगी । दया की भीख माँगूगी । उनके चरणों में सिर रख दूँगी । अपनी बहू के जीवन का सुख माँगूगी । आप मुझे उनका पता दीजिये । वे मुझ अभागन पर अवश्य रहम करेंगे ।
बंगाली साधु के चेहरे पर घनी पीङा के भाव उभरे । वह इस घरेलू मामूली ज्ञान वाली औरत को क्या और कैसे समझाता । घोङा घास से कभी यारी नहीं कर सकता । अगर वह तामसिक स्वभाव का न होता । तो ऐसी वायु को पोषण ही क्यों देता । बूढा मरे या जवान । मुझे हत्या से काम ही जिसका सिद्धांत होता है । उस निर्दयी से क्या दया की उम्मीद रखी जाय । फ़िर भी तारा की जिद देखकर उसने जोगी का स्थान उसको बता दिया । शायद उसका सोचना सही ही हो । शायद जोगी को दया आ ही जाय । शायद ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...