रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 3

पर शायद शब्द ही बङा अजीव है । इसमें हाँ और ना दोनों ही छिपी हैं ।
- हुँऽऽ । डरावना दिनकर जोगी एक उपेक्षित सी निगाह दोनों सास बहू पर डालता हुआ बोला - पर इस बात से मेरा क्या सम्बन्ध है देवी । भूत प्रेत पिशाच डायन चुङैल ये सब मेरे लिये काम करते हैं । मेरी प्रजा हैं । मेरे बालक हैं । तब मैं इनको पोषण देता हूँ । तो इसमें क्या गलत है । उन्हें पालना । उनकी सुरक्षा करना मेरा फ़र्ज है । तेरी बहू मेरे किसी पिशाच का शिकार हो गयी । तो उससे भी मेरा क्या सम्बन्ध है ।
ये...कहते कहते वह रुका । उसने मंजरी पर फ़िर से निगाह डाली - जरूर किसी दूषित स्थान पर असमय गयी होगी । तब यह प्रेत आवेश के नियम में आ गयी । तेरी सीता से गलती हुयी । जो वह लक्ष्मण रेखा से बाहर आ गयी । उसने इसको शिकार बना लिया । सृष्टि के नियमानुसार देह रहित जीव वृतियाँ ऐसे ही पोषण पाती हैं । उनकी भूख ऐसे ही तृप्त होती है ।..हाँ मेरा कोई गण नियम के विरुद्ध तेरे घर में गया होता । तेरी बहू पर छाया देता । तो उस नीच को अभी तेरे सामने ही जला देता । पर अभी तू बता । मैं क्या करूँ । क्या करूँ मैं ।
मंजरी सहमी सहमी सी छिपी निगाहों से उसे ही देख रही थी । काले तांबई रंग सा चमकता वह विशालकाय पहाङ जैसा था । और गोगा कपूर जैसी मुखाकृति का था । उस वीरान जंगल में उसकी उपस्थित आदमखोर शेर के समान थी । उसको देखकर अजीव सा भय होने लगता था ।
- महाराज । भयभीत हुयी तारा ने अपना आंचल फ़ैलाकर उसके पैरों में डाल दिया - मेरी बहू के मुख पर एक करुणा दृष्टि डालिये । इसके जीवन की अभी शुरूआत हुयी है । यह बहुत अच्छे स्वभाव की है । इससे जो भी गलती हुयी । उसके लिये मैं इसकी तरफ़ से क्षमा मांगती हूँ ।..पिशाच जो भी भोग मांगेगा । वह मैं उसको दूँगी । बाबा आज एक अभागन माँ । अपने पुत्र और पुत्र वधू के जीवन की आपसे भीख मांगती है । हाथ जोङकर मांगती हैं ।
जोगी विचलित सा हो गया । उसके खुरदरे सख्त चेहरे पर आङी तिरछी रेखायें बनने लगी । वह गहरी सोच में पङ गया । पिशाच को रोकने का आदेश देने से गणों में असन्तोष व्याप्त हो सकता था । वे उस पर जो विश्वास करते 


हुये सन्तुष्ट रहते हैं । उनमें अन्दर ही अन्दर बगाबत फ़ैल सकती है । दूसरे उसके एकक्षत्र कामयाब राज्य का जो दबदबा कायम है । उसमें असफ़लता की एक कहानी जुङ जाने वाली थी । फ़िर तो प्रेतबाधा से पीङित हर कोई दीन दुखी रोता हुआ इधर ही आने वाला था - महाराज उसे बचाया । तो मुझे भी बचाओ ।
- बाबाजी । तारा उसके विचार भंवर से उबरने से पहले ही बोली - साधु का जीवन ही दीन दुखियों पर उपकार के लिये होता है । अगर कोई गलती हुयी भी है । तो वो हम जैसे अज्ञानियों से होना स्वाभाविक है । और उसको क्षमा करना । आपका बङप्पन ।
जोगी भी आखिर तान्त्रिक से पहले एक इंसान ही था । सामने दया याचना लिये खङी नवविवाहिता लङकी । और उसके लिये दया की भीख मांगती वो अबला । उसको अन्दर तक झिंझोङ गयी । उसने गम्भीरता से भारी स्वर में " हुँ " कहते हुये सिर हिलाया ।
और बोला - ठीक है । अपनी बहू को लेकर जाओ देवी । अब पिशाच इसको छाया नहीं देगा ।
दोनों के चेहरे पर अप्रत्याशित खुशी की लहर दौङ गयी । तारा ने मंजरी को तेजी से संकेत किया । और वे दोनों उसके चरणों में झुक गयी - आशीर्वाद दें स्वामी जी ।
- अरे नहीं नहीं । कहता हुआ जोगी तेजी से पीछे हटा - ये क्या कर रही है तू । ठीक है । ठीक है ।
इंसान का जीवन भी एक अजब पहेली है । इसका एक प्रश्न हल होता है । तो दूसरा पैदा हो जाता है । दूसरा हल होता है । तो तीसरा उत्पन्न हो जाता है । फ़िर कभी कभी एक साथ ही कई प्रश्न पैदा हो जाते है । और कभी कभी तो ऐसा होता है कि पैदा हुये प्रश्नों का कोई हल ही नहीं होता ।
अपने एकमात्र पुत्र का मुँह देखकर जीती हुयी विधवा तारा की जिन्दगी भी ऐसे ही कठिन और अनसुलझे प्रश्नों से भरी हुयी थी । एक अबला औरत । और काले नाग से फ़ुंफ़कारते जहरीले प्रश्न । पागल कर देने वाले प्रश्न । क्या करे वह । कहाँ जाये । किसका सहारा तके ।
और फ़िर एक दिन...।
- अरे हत्यारे साधु । वह तेजी से जंगल में भागती हुयी चली गयी - ले अब मुझे भी मार डाल । तेरी छाती ठण्डी हो जाये । तूने मेरा घरौंदा तो उजाङ दिया । हाय ..अब मैं जीकर क्या करूँगी । निर्दयी मार डाल मुझे भी । छोङ दे ।

अपनी प्रेतों की सेना मुझ पर । अरे पिशाचों खून पी लो मेरा । अब मैं भी जीवित न रहूँगी ।
भयानक काली अंधेरी रात । समूचा जंगल सांय सांय कर रहा था । जिसमें घुसते हुये कोई जिगरवाला भी कांप जाये । तारा बेखौफ़ दौङी जा रही थी । वह प्रेतवासा में आ पहुँची थी । और उच्च स्वर में रोती चीखती जा रही थी ।
जोगी जलते अलाव के पास बैठा कच्ची मदिरा का सेवन कर रहा था । नशे की खुमारी उस पर चढने लगी थी । उसकी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थी । किसी शहंशाह की भांति बैठा हुआ वह कुछ दूर विचरते प्रेतों को देख रहा था कि अचानक दूर से आता नारी विलाप सुनकर चौंका । और झटके से खङा होता हुआ उसी तरफ़ आने लगा । लालटेन उसके हाथ में थी । फ़िर वह उसके पास आकर रुक गया । तारा अर्द्धविक्षिप्त सी छाती पीट पीटकर विलाप कर रही थी । वह हैरानी से उसे देखता रहा । पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया ।
- क्या हुआ । वह भौंचक्का सा बोला - क्या हुआ । तू इस तरह क्यों रो रही है ?
- अरे हत्यारे ! ये पूछ । वह दहाङ कर बोली - क्या नहीं हुआ । मैं बरबाद हो गयी । मेरा घर उजङ गया । मेरा इकलौता बेटा...। मेरा बेटा..बहू..। सब ..सब तेरे उस पिशाच की...। वो अब..। और ये सब..तेरी वजह से हुआ ।
जोगी हक्का बक्का रह गया । वह क्या बोले जा रही थी । उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । वह पागल सी हो गयी थी । और कुछ भी सुनने समझने की स्थिति में नहीं थी । वह किसी भारी सदमे का शिकार हुयी थी । क्या पिशाच ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया था । अभी वह कुछ समझ भी नहीं पाया था कि उसने खूँखार निगाहों से उसे देखा ।
- जोगी । अचानक वह सख्त होकर निर्णायक स्वर में बोली - याद रख भगवान भी कुछ है । वह दूर आसमान पर बैठा हुआ भी । चींटी तक की फ़रियाद सुनता है । उसके न्याय में देर है । पर अंधेर नहीं । तूने साधुता का अपमान किया है । इसलिये अब भी संभल जा । फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत ।
हे ऊपर वाले । वह आसमान की ओर हाथ उठाकर बोली - हे सच्चे शहंशाह । मेरी फ़रियाद कबूल कर । इस बाबा की वजह से मेरा घर उजङ गया । तू इसको जिन्दगी से उजाङ दे । अगर तू सच्चा है । निर्बलों का बल है । तो फ़िर आसमान पर मत बैठा रह । मुझ दुखियारी के लिये नीचे आ । तुझे आना ही होगा ।
जोगी अन्दर तक हिल गया । उसने गहरे असंजस में आसमान की ओर सिर उठाकर देखा ।

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