रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 5

धीरे धीरे चाँद आसमान पर ऊपर उठता जा रहा था । चन्द्रमुखी कार में आराम से सोयी हुयी थी । पर प्रसून की आँखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था । एक लङकी की साधारण सी चाहत ने उसे गहरी उलझन में डाल दिया था । सर्प के मुँह में छछूँदर । न उगलते बने । न ही निगलते । लङकी मामूली हैसियत वाली नहीं थी । उसे कुछ भी हो जाने का मतलब था । पूरे शासन प्रशासन का हरकत में आ जाना । दोनों देशों में । बल्कि दुनियाँ में तहलका मच जाना । तमाम मीडिया की महीनों की चीख चिल्लाहट । तमाम पुलिस विभाग की हाहाकारी खोजबीन । और इस सबका पूरा ठीकरा उसी के सर फ़ूटना था । वह सबकी पूरी जानकारी में । एक साइंटिस्ट के तौर पर । न सिर्फ़ उसकी मेहमान थी । बल्कि उसके साथ थी ।
पर वह यह सब क्यों सोच रहा था ? उसने अपने आपसे ही प्रश्न किया । ऐसा क्या हो सकता था ?
कुछ भी । उसने स्वयं ही जबाब दिया । अब उसका अनुभव कह रहा था । लिली अर्द्ध विक्षिप्त थी । एक विशेष प्रकार की पागल । जिसे उसके आसपास के लोग कभी नहीं समझ पायेंगे कि वह खास पागल है । दरअसल इस लङकी का भीङ में बने रहना । व्यस्त रहना ही इसका कुदरती इलाज था । या फ़िर । अगर रोग प्रकट होने लगे । तो कोई मनोबैज्ञानिक इलाज । किसी भी पुरुष की एकान्तमय निकटता में उसका रोग प्रकट होना ही होना था । तब जबकि वह पुरुषों से घोर नफ़रत करती थी ।
उसे चक्कर सा आने लगा । बल्कि घनचक्कर आने लगा । ऐसी मुसीबत में वह कभी नहीं फ़ँसा था । उसके किसी भी कदम का जिम्मेवार वह होगा । ये कितनी अजीब बात थी । क्योंकि वह पुरुष था । वह उसकी मेहमान थी । पराये देश में थी ।
उसने व्यर्थ ही दूर तक निगाह डाली । अपनी उधेङबुन में फ़ँसा वह गाङी के इधर उधर दोनों दिशाओं में काफ़ी दूर तक हो आया था । गाङी के पीछे पूरब दिशा में कुछ ही फ़र्लांग दूर एक बङी नदी बह रही थी । जबकि गाङी के आगे पश्चिम में दूर दूर तक जंगली इलाका था । पर उस हिसाब से घने पेङों की अधिकता नहीं थी । और गाङी किसी ऊबङ खाबङ से मैदान में खङी मालूम होती थी ।
अब इस जाल से यकायक बचने का भी कोई उपाय नहीं था । उसने फ़िर से खुद ही सोचा । लिली को यकायक भी बीच पर्यटन में नहीं छोङा जा सकता था । तब वह और मनमानी करने वाली थी । और साथ रहने पर क्या कर बैठे

। इसका कोई भरोसा नहीं था । तब जबकि प्रसून के प्रति उसके ऐसे ख्यालात थे ।
उसके ऐसे विचारों के पीछे ठोस वजह थी । ये संयोग ही था कि प्रसून से उसकी नितांत अकेले में मुलाकात यहीं और पहली बार हुयी थी । और एकाएक उसके सानिंध्य से जब उसकी भावनायें जागृत होकर प्रकट होने लगी । तब उसे एकदम झटका सा लगा । और जब वह हजार डिग्री सेंटीग्रेड पर खौलते लावे के समान । पुरुषों के प्रति अपने मधुर इजहार बयान कर रही थी । तब वह वाकई अन्दर ही अन्दर कांप रहा था । उसने अपनी कलाकारी दिखायी थी । और उसके दिमाग से कनेक्ट था । और यह 440 के झटके दिमाग से ही निकले थे । न कि उसकी उपरली बातों से ।
- इस साले हीरो ने कोई हीरोगीरी दिखाई । तो फ़ौरन से पहले इसे शूट कर दूँगी । इसने मेरा आमन्त्रण स्वीकार नहीं किया । तो सोते समय इसको मार डालूँगी । इसने मुझे किस किया । तो इसे जान से मार दूँगी । इसने मुझे किस नहीं किया । तो सोते में इसका गला दबा दूँगी । इसने यस की तो भी मार दूँगी । नो की तो भी शूट कर दूँगी ।
ये दो विपरीत भाव पर एक ही एक्शन उसके दिमाग में था । बस उसी क्षण से प्रसून का दिमाग हवा हवाई उङ रहा था । वह प्रेतों की तलाश में आयी थी । जबकि प्रेत भी इतने भयंकर नहीं होते । और तब वह समझा । क्यों इसे प्रेत दिखे । क्यों इसने प्रेतों को महसूस किया । वह पागलपन की हद तक जुनूनी एकाकी औरत जिस भी स्थिति में होती थी । पूरी तीवृता में होती थी । फ़ुल फ़ार्म में होती थी ।
और अपनी दमित कुण्ठित असहज मानसिकता के चलते भयंकर रोग की चपेट में थी । आंतरिक रूप से वह आदमखोर शेरनी बन चुकी थी । और निश्चित ही वह डर से मिमियाता बकरा । इसका एक ही इलाज था । भरपूर रूप से पुरुष का प्यार । भरपूर ही शरीर सम्बन्ध । और उसकी हर इच्छा को स्वस्थ होने तक मानना । और ये सब भी उसे बेङियों में जकङ कर किया जाय । क्योंकि उसकी अजीब सी नफ़रत । करने और न करने । दोनों को लेकर थी । किया तो क्यों किया । नहीं किया । तो क्यों नहीं किया । ऐसी बढी  हुयी विकृत मनोग्रन्थि के बहुत कम केस होते हैं । और निश्चित ही इसका एक ही कारण था । पुरुष सुख से अब तक वंचित रहना ।
- हे भगवान ! वह आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर बोला - इसकी डाक्टरी के लिये । मैं ही आपको निमित्त जंचा । कुछ तो रहम किया होता मालिक ।
पर आसमान के शून्य 0 से कोई उत्तर नहीं आया । उसने घङी पर निगाह डाली । बारह बजने जा रहे थे ।
उसने एक नम्बर डायल किया । और ईयर फ़ोन कानों में लगा लिया ।
- ओह थैंक गाड ! उधर से मार्था बोली - आपको मेरी याद तो आई ।
- मुझे एक मुसीबत से निकालो । वह अजीब से स्वर में बोला - पहली उङान से इण्डिया आओ । ये मुसीबत

तुम्हारी वजह से मिली है । तुम आ जाओगी । तो शायद मैं जीता रहूँ ।
उधर से जल तरंग के समान मार्था के खिलखिलाने की आवाज देर तक आती रही । वह समझी । गहरा मजाक कर रहा है । पर वह सीरियस था । फ़िर मार्था भी चौंकी । उसे पता नहीं था कि लिली उसके पास है । वह अपने किसी प्रोजेक्ट में व्यस्त थी । किसी भी हालत में बीस दिन से पहले फ़्री नहीं थी । और मजे की बात । प्रसून लिली को लेकर टेंशन में था । इस बात से तो उसको बहुत ही हैरत थी । लिली का साथ होना तो मजे की बात थी । लेकिन अब उसकी टेंशन डबल हो गयी थी । वह मार्था को कुछ भी नहीं बता सकता था । और बताता नहीं । तो फ़िर पूछता क्या ? उसने तो यही सोचा था । उसके आने से बीमारी ही न रहेगी ।
- प्रसून जी ! फ़ुल एंजाय करिये । मार्था मादक स्वर में बोली - आप बहुत लकी हो । आप यकीन नहीं करोगे । हालीवुड स्टार्स को घास नहीं डालती । मुझे पक्का पता है । आज तक उसकी जिन्दगी में कोई मर्द नहीं आया ।...अच्छा उसका सामान्य व्यवहार । बङा ही अच्छा और नेक है । गरीबों बच्चों वृद्धों के प्रति बहुत ही दयालु । सबके प्रति बहुत ही सहयोगात्मक ।..उसकी शादी सेक्स आदि । ये अपनी अपनी सोच है । उसे शायद कोई अच्छा नहीं लगा । उसकी पर्सनल अन्य बातें भी हो सकती हैं । ओके डियर डाण्ट वरी । शीज गुड गर्ल । वेरी गुड गर्ल ।
उसने फ़ोन काट दिया । कुछ ज्यादा ही गुड गर्ल थी । तभी तो आराम से सो रही थी । और वह उल्लूओं की तरह घूम रहा था । मार्था से बात करके भी कोई बात नहीं बनी थी । कोई बात बननी भी नहीं थी । सिर्फ़ उसके आ जाने से वो बच जाना था । मार्था ठीक ही कह रही थी । उसमें कोई असामान्य वाली बात नहीं थी । दरअसल सामाजिक दायरे के मध्य ऐसे पागल बिलकुल सही नजर आते हैं । बल्कि आम लोगों की अपेक्षा वे अधिक मधुर मीठा व्यवहार करते हैं । जब तक उनके लक्षण पूर्ण वेग से न उभरें । इसलिये अब कोई पागल नहीं था । मार्था भी नहीं । लिली भी नहीं । उससे जुङे तमाम लोग भी नहीं । सिर्फ़ वह पागल था । एकदम बौङम था । जो अनजाने ही इस लफ़ङे में फ़ँस चुका था ।
थकान उस पर हावी होने लगी थी । उसका रात्रि योग का समय भी गुजरता जा रहा था । उसे अपने तमाम योग स्थल याद आ रहे थे । जहाँ पर समाधि में डूबा वह इस समय शान्त अनन्त असीम अंतरिक्ष में बाज की तरह उङते हुये तैर रहा होता । कहाँ वह अदभुत समाधि आनन्द । और कहाँ ये फ़ालतू की लमझेङ ।
वह धीरे धीरे टहलता हुआ गाङी के समीप आया । लिली आराम से सीट पर पसरी हुयी सो रही थी । और वाकई अपूर्व सुन्दरी लग रही थी । अभी तक सुरक्षित कौमार्य की आभा उसके चेहरे पर चमक रही थी । और हैरानी की बात थी । वह सब प्रकार की कामभावना से रहित सो रही थी । किसी छोटी सुन्दर मासूम लङकी की भांति । प्रसून के शरीर में अनजाने भय की झुरझुरी सी दौङ गयी । इस मासूमियत के पीछे क्या राज था । कौन जानता था । तूफ़ान आने से पहले की शान्ति । उसने कार के अन्दर जाने का इरादा त्याग दिया । और कार से एक शीट निकाल कर वहीं पास में जमीन पर बिछा कर लेट गया । उसकी आँखें बन्द होने लगी ।
योग और उस संक्रामक रोग के मिश्रित विचार स्वाभाविक ही उसके मन में आने लगे । तब योग रोग से जुङकर समाधान देने की क्रिया करने लगा । उसने अपने आपको हालात के सहारे छोङ दिया । उसे तांत्रिक लोक के उन सिद्धों की याद आ रही थी । जहाँ इसका उपाय शायद मौजूद था ।
स्मृति के शुरू होते ही चेतना क्रियाशील हो उठी । उसका आंतरिक शरीर प्राण समूह के साथ एकत्र होने लगा । और फ़िर वह अपने स्थूल शरीर से निकल कर सूक्ष्म शरीर से गतिशील हो उठा । कुण्डलिनी योग की एक विशेष क्रिया द्वारा वह उसी लेटी हालत में ही उस क्षेत्र में हैलीकाप्टर के पंखे के समान घूमता हुआ उठता चला गया । उसने खुद पर कोई नियन्त्रण करने की कोशिश नहीं की । और समग्र चेतना से जुङ गया । वह देर तक 25 किमी के क्षेत्र में गोल गोल इस तरह घूमता रहा । जैसे हैलीकाप्टर के पंखे के स्थान पर उसका शरीर हो । और बिना हैलीकाप्टर के सिर्फ़ पंखा ही आसमान में उङ रहा हो ।
और तब उसके दिमाग में स्वतः एक शब्द गूँजा - विश्वबन्धु । विश्वबन्धु एक उच्च स्तर का सह्रदय तांत्रिक था । और अब शरीर छोङ कर तान्त्रिक लोक में स्थान पा चुका था । उसने कुछ सोचा नहीं । कोई प्रयत्न नहीं किया । बल्कि योग की स्व स्फ़ूर्त क्रिया से सब होने लगा । और तब उसका शरीर किसी उङन तश्तरी के समान सीधा ऊपर उठता चला गया । और तांत्रिक लोक की सीमा में पहुँचकर खुद ही सीधा हो गया । फ़िर वह बर्फ़ पर फ़िसलने के समान तेजी से उस क्षेत्र में सरकता गया । जहाँ विश्वबन्धु का आलीशान निवास था ।
- खुश आमदीद बन्धु ! विश्वबन्धु बाँहें फ़ैला कर गले लगता हुआ बोला - आज तुम्हें देख कर कितनी ठण्डक सी महसूस कर रहा हूँ । बयान नहीं कर सकता । शायद नहीं । बल्कि निश्चित ही तुम अकेले आत्मा हो । जिसकी समीपता से मैं आनन्द महसूस करता हूँ । तुम इस विध्या के गौरव हो मेरे दोस्त । मुझे यकीन है । तुम जरूर अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त होओगे । अफ़सोस जो मैं न हो सका । अन्य नहीं हो पाते ।
एकदम साइलेंट जोन सी स्थिति को प्राप्त यह स्थान कई मायनों में अदभुत था । प्रसून कई बार यहाँ आ चुका था । यहाँ के तमाम तान्त्रिकों से उसका परिचय था ।  विधाता की अजीव लीला में ये तान्त्रिक लोक भी प्रथ्वी की तरह खास निर्मित था । यहाँ एकदम आलीशान बंगले भी आवंटित हुये थे । वहीं टूटे फ़ूटे खण्डहरों में भी छोटे तान्त्रिक निवास करते थे । अजीवोगरीब रहस्यमय भवन भी थे । और किसी बेहद प्राचीन सभ्यता के समान गली मकान भी । जगह जगह होते तान्त्रिक प्रयोग । नयी जीवात्माओं को स्थित करना । और तन्त्र क्रियाओं से उठता कसैला धुँआ । यहाँ आम दृश्य थे ।
- आओ मेरे साथ । विश्वबन्धु उसकी बात सुनकर बोला - मुझे नहीं लगता । इसमें चिन्ता वाली कोई बात है । योग के विलक्षण रहस्यों में ऐसे प्रयोगों से गुजरना ही होता है । पर ये प्रारम्भ है । बात कुछ और भी है ।
वह अपने भवन के एक हिस्से में बने चौङे हाल में उसके साथ आ गया । जहाँ दीवाल पर काफ़ी लम्बा चौङा तेल कालिख मिलाकर पोता गया दर्पण लगा था । उसके तन्त्र शुरू करते ही दर्पण पर दृश्य उभरने लगा । उस वैन का दृश्य । जिसमें लिली सो रही थी । विश्वबन्धु ने एक लम्बी मुठिया सी उठा ली । और दर्पण पर वैन के आगे सरकाता हुआ जंगल की तरफ़ ले जाने लगा । आगे का दृश्य देखते ही प्रसून के छक्के छूट गये । वह हाहाकार करने लगा । लङकी सिर्फ़ मोहरा थी । वाकई विश्वबन्धु ठीक कह रहा था - बात कुछ और भी है । बात कुछ और ही थी ।

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