रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 6

- कोई बात नहीं है । लिली खिलखिलाती हुयी बोली - और कोई बात ही नहीं है । बस बात इतनी ही है कि तुम एकदम नपुंसक हो । नामर्द साले ।..एक कुंवारी कली । एक महकती कली । तुम्हें सहज मिली थी । और तुम फ़्यूज बने रहे ।..ओह..ओ गाड । तुमसे बङा फ़ूल इस अर्थ पर नहीं होगा । निश्चय ही नहीं । साले तुम मेरी बातों में आ गये । डर गये । अरे औरत की ना का मतलब हाँ होता है । मैंने कहा । कुछ मत करना । इसका मतलब था । कोई कसर मत रखना । पूरी पूरी मनमानी करना ।
वह सिर्फ़ मुस्कराकर रह गया । अजीब ही है ये दुनियादारी । उसके मन में कुछ और था । और उसके मन में कुछ और ही था । पर वह हैरान था । विश्वबन्धु ने जो उसे दिखाया था । उसमें ऐसा क्या था । जो उसे पता नहीं लगना था । या जो उसकी ताकत के बाहर था । वह अगर लिली में न उलझा होता । तो जो बात उसे सबसे पहले पता लगनी थी । वो यही होती । तब इसमें रहस्य का एक ही बिन्दु बचता है । जो विश्वबन्धु की भूमिका को बता सकता है । वो यही कि समस्या से अलग हटकर प्रकृति में उसकी हलचल देखना । आखिर इस समस्या की वजह क्या है । और इसका स्व निदान क्या है । और प्रकृति जब उसे विश्वबन्धु के पास ले जाकर छोङ देती है । तब इसका साफ़ साफ़ मतलब है । उसका भी इस खेल में रोल बनता है । बन चुका था । विश्वबन्धु की बाहरी सपोर्ट । उसकी खातिर । लेकिन इससे उसकी समस्या खत्म नहीं हुयी थी । बल्कि उसे बङी और असली समस्या पता चली थी ।
- लिली । वह सोचता हुआ सा बोला - तुम अपना भूतिया पर्यटन कर लो । पर मेरे ख्याल से ये सिर्फ़ समय की बरबादी होगी । मेरे ख्याल से इससे बेहतर हम लोग हिमालय चलते है । वहाँ मैं तुम्हें कुछ सिद्धों से मिलाता हूँ । जो तुम्हें कुछ ठोस बतायेंगे । या फ़िर दिखायें..शायद ।
धीरे धीरे सुबह हो रही थी । अभी ठीक से सूरज नहीं निकला था । पर वह अपने सौन्दर्य की गुलावी आभा से दमक रही थी । उसमें कोई भी अजीब सा लक्षण नहीं था । वह बेहद गौर से पश्चिम के जंगली इलाके की तरफ़ देख रही थी । उसकी आँखें शून्य 0 में स्थिर थी । और वह गम्भीर हो रही थी ।
- प्रसून जी । अचानक वह बोली - हमें वैन उधर ले जाना चाहिये । उधर प्रेत हो सकते हैं ।

अगर वह कल विश्वबन्धु से न मिला होता । तो निश्चय ही इस बात पर हकबका जाता । पर अब ऐसी कोई बात नहीं थी । उसने अन्दर से चौंकते हुये भी इसे एक सामान्य बात की तरह लिया । और सहमति में सिर हिलाया ।
- मुझे । वह मधुर स्वर में बोला - बङी हैरानी है कि तुमने भूतों को देखा । कभी मुझे भी भूतों में बहुत दिलचस्पी थी । पर जहाँ तक मेरी जानकारी है । भूतों के बारे में साइंटिफ़िक बेस पर कोई प्रमाणिक विवरण अभी तक उपलब्ध नहीं । इसलिये बहुत माथापच्ची के बाद इसे मिथक मानते हुये मैंने छोङ दिया । इसलिये मुझे वाकई हैरानी है । जो तुमने देखा । भूत । वह कैसा था । डरावनी हँसी हँसने वाला नर कंकाल । या जैसा फ़िल्मों में भयानक सा चेहरा दिखाते हैं ।
- नहीं । वह दृणता से बोली - वह सब बकबास है । ऐसा कुछ भी नहीं था । कोई भी भूत  बिलकुल हमारे जैसा ही होता है । बस हम में और भूत में मुझे एक ही अन्तर नजर आया । मैंने खास जिस भूतनी को देखा था । उसे मैंने जीवित भी देखा था । और आफ़्टर डैथ भी । वह एक अधेङ गोरी अंग्रेज महिला थी । लेकिन जब मैंने उसे मृत्यु के बाद देखा । तब वह गहरे सांवले रंग की थी । उसकी आँखों में मुर्दनी छाई थी । और वह स्थिर थीं । वह अपलक घूरने के समान देखती थी । उसका  शरीर जल में प्रतिबिम्ब के समान नजर आता था । मतलब भासित छाया । जैसे कभी धुँधला । कभी उससे स्पष्ट । कभी एकदम स्पष्ट । ठीक उसी तरह । जैसे जल में बनती छाया वाले जल को हिला देने पर । उसके शान्त होने तक जितनी स्थितियाँ बने ।
उसने कहना चाहा । वह उसका दृष्टि भृम भी हो सकता है । पर उसके स्वर में छिपी दृणता ने उसे चुप रहने पर मजबूर कर दिया । लङकी ने उसे एकदम असहाय सा बना दिया  था ।
- मगर । फ़िर वह उत्सुकता प्रकट करता हुआ बोला - कोई बोलचाल । कोई बातचीत वगैरह ।
- हाँ । वह जैसे समय में वापिस लौट गयी - बातचीत । वह भी थी । जब मैं उसको देखते हुये उससे एक हो जाती थी । वह मेरे दिमाग में बोलती थी । और आगे जब मैं उसके प्रभाव में आ जाती । एक सम्मोहन सा हो जाता । तब उसकी आवाज बाहर भी स्पष्ट सुनाई देती ।
प्रसून आहिस्ता से कुछ सोचते हुये सिर हिलाने लगा । पर एक तरह से उसका दिमाग ही काम नहीं कर रहा था ।
- चलो माना । वह बोला - सब माना । मगर भूत होते है । और तुमने देखे भी हैं । पर उनसे तुम्हारा क्या वास्ता । वह इस दुनियाँ के सम्बन्ध से दूर हो गये । आखिर उनसे क्या चाहती हो अब ।
लिली ने इस तरह माथे पर हाथ मारा । जैसे उसके सामने दुनियाँ का सबसे बङा मूर्ख बैठा हो ।
- मेरा मतलब ? वह झुँझलाकर बोली - ये तुम क्या बोल रहे हो । इसका तो कोई मतलब ही नहीं हुआ । तुम एक साइंटिस्ट हो । और अगर किसी प्रयोग को सिद्ध कर लेते हो । फ़िर उसका क्या मतलब होता है ।
क्या अजीब बात थी । वह उसका आंकलन एक पागल दिमागी बीमार के तौर पर कर रहा था । और वह होशियारी में उसी के कान काटने पर तुली थी । तब उसने संक्षिप्त में ओके ही कहा ।
वह सुबह पाँच बजे ही उठ गया था । और अब सात बजने वाले थे । लिली ने रात भर भरपूर नींद ली थी । और एकदम फ़्रेश अनुभव कर रही थी । वह कब उठी थी । उसे पता नहीं था । जब वह रुटीन के बाद नदी से लौटा था । वह उसे बहीं टहलती मिली थी । अब पूरी कङियाँ एक दूसरे में उलझ गयी थी । और उसे तीन काम एक साथ करने थे । लिली की रिसर्च पूरी कराना । यानी उसके सिर से भूत का भूत उतारना । उसकी विचित्र मनोग्रन्थि को ठीक करना । और जंगल का रहस्य । जो शायद सबसे बङा काम था ।
उसने लिली की तरफ़ देखा । वह नदी पर पहुँच गयी थी । और शायद नहाने को उतर गयी थी । वह धीरे धीरे कदम बढाता हुआ वहीं पहुँच गया । लिली का फ़्राक किनारे पर पङा था । वह अंतःवस्त्र में मुक्त भाव से नदी की तेज लहरों में तैर रही थी ।
- फ़िर क्या प्रोग्राम है । वह वहीं बैठता हुआ बोला - आज किधर जाओगी ।
- फ़िलहाल तो । उसने उँगली से मादक इशारा किया - तुम पानी में आओ । देखो मुझे छूकर कैसी गरमाहट इसमें समा गयी है ।
इसकी बात मानने पर खतरा । न मानने पर भी खतरा । लेकिन जब ओखली में सिर डाल ही दिया । तो मूसलों से

क्या डरना । वह वस्त्र उतार कर नदी में कूद गया । तब वह वास्तव में उसे खतरनाक व्हेल के समान निगलने को तत्पर हो उठी । वह संयम और सतर्कता से उससे बचता ही रहा ।
अजीब थी लिली भी । वह कहीं नहीं गयी । और दोपहर दो बजे तक कार में ही रही । वह उससे ढेरों बातें करती रही । अपने बारे में । उसके बारे में । भूत प्रेतों के बारे में । पारलौकिकता के बारे में । और ये बहुत अच्छा था । बातचीत से उसकी विकृत मनोग्रन्थि खुलने लगी थी । उसके अंतर में अब तक वर्जित पुरुष घुलने लगा था ।
- प्रसून जी । वह एक लम्बी पतली सी सिगरेट सुलगाती हुयी बोली - मेरी एक अजीब सी सोच है । और ये सोच भारतीय धर्म ग्रन्थों से ही पैदा हुयी है । कहते हैं । जीसस अभी स्वर्ग में हैं । और जो भी जीसस से प्रेम करता है । वह स्वर्ग में जाता है । बट आफ़्टर डैथ । पर भारतीय धर्म ग्रन्थ कुछ अलग कहते हैं । इंसान जीते जी स्वर्ग में आ जा सकता है । अन्य दुनियाँओं में आ जा सकता है । वह भूतकाल में भी जा सकता है । और फ़्यूचर में भी । ये अदभुत है ना । भविष्य । जो अभी आया ही नहीं । उसकी यात्रा ।
तब मैं उसी योग पुरुष की तलाश में हूँ । जो जीते जी मुझे इन चाँद तारों में ले जाये । दूर गगन में उङाता फ़िरे । हम वायु के पंखों पर बैठकर मुक्त भाव से तैरते हुये रोमांस करें । और जाने क्यों । मुझे लगता है । वह तुम हो । एकमात्र तुम । मैं इस सृष्टि में सिर्फ़ एक पुरुष की दीवानी हूँ । जिसकी लगभग सभी दीवानी हैं । और वह है । भगवान कृष्ण । फ़िर क्यों ऐसा लगता है कि मेरी वो तलाश तुम पर आकर पूरी होती है । हे तुम्हें देखकर क्यूँ होती है । मुझे अजीव सी उत्तेजना । अबे स्साले..तू कुछ बोलता क्यों नहीं । मैं पागल क्यूँ हुयी जाती हूँ । क्यूँ लगता है । तुम यहाँ के नहीं हो । वहाँ के हो । हे ..क्यूँ भङकता है मेरा रोम रोम । कुछ तो बोल । दुष्ट मनुष्य । क्यों तेरे पास ही बेकाबू हो जाती हूँ मैं ।
वह हाँफ़ने सी लगी । उसने अपना टाप निकाल कर दूर उछाल दिया । और तेज तेज सांसे लेने लगी । उसका सीना तेजी से ऊपर नीचे हो रहा था । फ़िर वह प्रसून पर झपट पङी । और पागलों की तरह नोचने लगी । किसी खूंखार शेरनी के खतरनाक पंजो में दबे मेमने के समान वह इधर उधर होता रहा । और तब वह उसके दोनों गालों पर एक लय में थप्पङ मारने लगी ।
योगी योगस्थ हो गया । सात्विक हो गया । सत ऊर्जा उसके शरीर से बहने लगी । दिव्य किरणें उसके शरीर से फ़ूटने लगी थी । आज उल्टा हो गया । शमा परवाने पर गिरती हुयी जलने लगी । जैसे बरसों से दबा रहा ज्वालामुखी फ़टा हो । उसने कोई काम व्यवहार कोई काम चेष्टा नहीं की थी । बस दीवानी सी उसे झिंझोङती रही थी ।
फ़िर वह सुबकती हुयी सी उसके सीने से दुबक गयी । वह किसी शिकारी के तीर से घायल हो चुकी नन्हीं चिङिया की भांति सहमी हुयी सी उससे चिपक गयी थी ।
- प्रसून जी । वह बच्चों जैसी सरल भोली आवाज में बोली - आदमी बहुत खराब होता है । ये औरत को खिलौना समझता है । कभी भी उसका दिल तोङ देता है । मेली मम्मी ..को ना । वह रेप करता है । सिगरेट से जलाता है । मैं..वह चीखी - मार डालूँगी..साले को । उन सबको मार डालूँगी । नफ़रत है । उनसे मुझे ।.. स्साले ..मैं तुझे भी मार डालूँगी । प्रसून के बच्चे ।.. यू यू बास्टर्ड । तू मुझे यहाँ फ़ँसाकर लाया । पर मैं कमजोर नहीं हूँ ।
प्रसून जी । सच में ना । आप बहुत अच्छे हो । आप सबसे अलग हो । भगवान हो । कृष्ण भगवान । मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ । तुम मुझे मुरली सुनाओगे ना । तुम..तुम मुझे खूब..खूब प्यार करना । और कभी..कभी जरा भी दुख न देना ।
- ओह गाड । निश्चय ही तेरे खेल निराले हैं । उसने सोचा । और सिगरेट का कश लगाया । चार बजने जा रहे थे । लिली सामान्य हो गयी थी । और जिन पीकर सो चुकी थी । वह कार से बाहर आकर टहलने लगा ।
अगले पल । अगले दिन । अगले महीने क्या होगा । शायद कोई नहीं जान सकता । जो हुआ । सो क्यों हुआ । शायद ये भी नहीं । क्या सोचकर वह आया था । और क्या हो रहा था । आगे क्या होगा । ये भी पता नहीं था । अचानक वह पागलों की भांति जोर जोर से हँसने लगा । क्या अजीव गङबङ झाला थी । और वह कैसे लेना एक न देना दो होते हुये भी खामखाह ही फ़ँसा हुआ था । खामखाह । शायद नहीं । शायद हाँ । वह अभी लिली को उसके हाल पर छोङ दे । पता नहीं वह क्या हंगामा करे । उसके बारे में क्या बोले । तब जबकि वह रिकार्ड में बाकायदा उसकी मेहमान थी । उसके हर एक्शन का री एक्शन उससे जुङा हुआ था ।
और एक्शन । री एक्शन का ठीक वक्त आ चुका था । वह सो रही थी । और निश्चय ही दिमागी तौर पर शून्यवत 0 थी । उसने एक निगाह इधर उधर डाली । कुछ ही दूर पर शाल्मली का वृक्ष था ।
वह एकाग्र होकर उसके नीचे बैठ गया । और केन्द्रित होने लगा । सबसे पहले उसने कार के आसपास दो सौ फ़ुट की मर्यादा बाँध दी । फ़िर उसने लिली को तन्त्र से जोङकर प्रेतवायु से सुरक्षित कर दिया । अगला कदम उठाने से पहले वह कुछ ठिठका । और एक रहस्यमय निगाह पश्चिम के जंगल पर डाली । वह कुछ सोचता रहा । फ़िर उसने आँखें मूँद ली ।
- विश्वबन्धु । वह होठों ही होठों में बोला - क्या ये नियम के विपरीत न होगा ।
- नहीं । विश्वबन्धु बोला - वह तन्त्र ज्ञान का दुरुपयोग कर रहा है । तुम उसे अच्छा सबक सिखाओ ।
उसने सहमति में सिर हिलाया । और घूमकर जंगल की तरफ़ देखने लगा ।

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