रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 7

धीरे धीरे शाम गहराती जा रही थी । लिली सोकर उठ चुकी थी । और काफ़ी शान्त नजर आ रही थी । वह उस जगह को एक ऊब तिरस्कार और घृणा से देख रही थी । और जैसे असमंजस में थी कि आखिर वह यहाँ आ कैसे गयी ।
- प्रसून जी । एकाएक वह बोली - वापिस चलिये । बेकार है सब । कुछ नहीं रखा यहाँ । मैं हैलीकाप्टर बुलाती हूँ ।
वह रहस्यमय ढंग से मुस्कराया । दवा असर करने लगी थी । पर प्रत्यक्ष उसकी सहमति में सिर हिलाने लगा । एक नारी के दो रूप । ये बङा ही अजीब सा मामला था । क्योंकि लिली उसके साथ थी । अगर वह उसके साथ न होती । तो उसके लिये फ़िर ये कोई मामला ही न था । अगर वह सामान्य होती । तो बस थोङा सा टेङा मामला था ।
कुछ भी हो । सूत्र उसकी पकङ में आने लगे थे । अब उसे उनको सुलझाना भर था । अभी वह आगे कोई बात सोचता । उसे कुछ दूर उत्तर दिशा में एक रोशनी चमकती हुयी दिखाई दी । और उसी के धुंधले से प्रकाश में एक साया नजर आया ।
- भगवान पर विश्वास रखो । वह पागल सी दिखने वाली औरत बोली - वह एक दिन हर रावण को मार देगा । तब प्रथ्वी पर सतयुग होगा ।
लिली हैरानी से उसे देख रही थी । वह एक समाधि जैसे चबूतरे के पास टिकी बैठी थी । और उसी ने तेल से भरा वह बङा सा दिया जलाया था । वह बीमार थकी सी निढाल चौरे से लगी हुयी थी । और पश्चिम के जंगल की तरफ़ देख रही थी ।
- उधर । उसने पश्चिम की ओर उंगली उठाई - उधर रहता है । वह रावण । जो मेरी बहू को हर ले गया है । वह बहुत ताकतवर है । उसके प्रेतों की सेना बहुत बङी है ।...तू यहाँ से भाग जा बेटी - वह लिली को देखते हुये बोली - वह तुझे भी मार डालेगा । उसके प्रेत बहुत क्रूर हैं ।
प्रत्यक्ष प्रेत शब्द सुनते ही लिली के दिल में फ़िर झंकार सी गूँजी । उसके चेहरे पर गहन दिलचस्पी के भाव पैदा होने लगे । ये प्रसून के लिये काफ़ी राहत की बात थी । शायद अब यकायक वह जाने की जिद न करे ।
अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि एकाएक वह औरत फ़िर बोली - अरे मैं तो बताना ही भूल गयी । मेरा नाम तारा

है । पर लोग मुझे पगली कहते हैं ।..ये दिया देख रहे हो । ये मौत का दिया है । दिनकर जोगी की मौत का दिया । जिस दिन ये दिया जलते जलते बीच में ही अचानक बुझ जायेगा । उस दिन जोगी की मौत निश्चित है । दरअसल इस तंत्र दिये में तेल नहीं । जोगी का जीवन जलता है । और मैं इसे पूरे जतन से जलाती हूँ ।
प्रसून का सिर स्वयं सहमति में हिला । एक शान्त और सशक्त तांत्रिक प्रयोग । किसी अच्छे जानकार द्वारा सुझाया गया होगा । पर वह खुद लिली के साथ रहते अजीब से हालात में फ़ँसा था । इस औरत से क्या पूछे । कैसे पूछे । उसका दिमागी संतुलन भी सही नहीं था ।
कैसे रहस्यमय मोङ पर ले आयी थी जिन्दगी । रात के नौ बजने वाले थे । इस वीराने में वह दूसरी रात थी । और शायद कुछ भी नहीं हुआ था । और शायद बहुत कुछ हुआ था । वह मिनी गैस पर काफ़ी बना रहा था । लिली कार के सहारे टिकी हुयी खङी थी । उसके सामने बस एक खास अङचन थी । लिली का साथ । उसके हर कदम में यही सबसे बङी बाधा थी । और वह एक सामान्य लङकी की भांति उसे समझा बुझा भी नहीं सकता था । बस आगे वह क्या करने वाली है । यही देख सकता था ।
- प्रसून जी । अचानक वह बोली - मैं सोचती हूँ कि...
और यकायक ही वह सतर्क हो गया । वह घङी आ पहुँची थी । जिसका उसे इंतजार था । चार बङे प्रेत उधर ही आ रहे थे । और किसी सतर्क पुलिस दल की भांति चौंकन्ने से थे । लिली अकस्मात ही कुछ बैचेनी सी महसूस करने लगी । वह गौर से उसे ही देख रहा था । और प्रेतों को अनदेखा कर रहा था । वह ठीक उसी स्थान पर देख रही थी । जहाँ प्रेत थे । और कसमसाती सी कुछ कहना चाह रही थी । पर कह नहीं पा रही थी । प्रेत दो सौ फ़ुट बंध के पास आकर रुक गये थे । और आपस में कानाफ़ूसी सी कर रहे थे ।
- हे ..प्रसून प्रसून जी । लिली उँगली उठाकर बोली - शायद..शायद उधर प्रेत हैं । मेरा यकीन करो ।
वह इस तरह देखने लगा । जैसे बहुत आश्चर्य हो रहा हो । उसने लिली को दिखाते हुये बारबार देखने का असफ़ल अभिनय किया ।
और फ़िर निराश स्वर में बोला - मुझे कुछ नहीं दिख रहा ।
लिली उत्साहित थी । उसकी खोज सफ़ल हो रही थी । ये अवश्य था । उसने उन्हें बहुत हल्के रूप में महसूस किया था ।
- वह पागल औरत सही कह रही थी । वह खुशी से चीखती हुयी सी बोली - वहाँ प्रेत हैं । तुमने देखा । वह पश्चिम की तरफ़ से आये थे । मैं वहाँ जाना चाहती हूँ ।
जाना तो वह भी चाहता था । पर सवाल यही था कि उसके साथ रहते जाये कैसे । प्रहरी गण वापिस हो गये थे । दिनकर जोगी के लिये खतरे का सायरन बज चुका था । एक लक्ष्मण रेखा के समान योगी की आन लगा हुआ सशक्त बँध उसकी नींद हराम कर देने वाला था । ये उसके अखण्ड साम्राज्य को खुली चुनौती थी । इसलिये शायद युद्ध का बिगुल बज गया था । अब उसका अगला कदम क्या होगा । उसने सोचा । खुद उसका अगला कदम क्या होगा । उसने सोचना चाहा । पर कामयाब नहीं हुआ ।
बहुत देर बाद उसने एक सिगरेट सुलगाई । और गम्भीरता से लिली को देखा । जो बारबार उधर ही अभी जाने को जिद कर रही थी । पर उसने किसी तरह समझा बुझाकर उसे दिन के लिये राजी कर लिया था । क्योंकि आगे का जंगली क्षेत्र उसके लिये अपरिचित था । पर वह जानता था । दिन अभी बहुत दूर है । और तांत्रिको का असली दिन रात होता है । महान तांत्रिक दिनकर जोगी ।
और महान लोगों के लिये इंतजाम भी महान होते हैं । तब क्या विश्वबन्धु भी इस महान खेल में शामिल होगा । अब जो वह सोच रहा था । उसमें एक बङी समस्या थी । बङी अजीब बात थी । यदि वह लिली को शून्यवत 0 कर देता । और सारे खेल से वह अनभिज्ञ रहती । सोती सी ही रहती । तो फ़िर ये उस पर जुल्म ही होता । उसके भूत खोजी अभियान का भूत न उतरता । और उसका मानसिक उपचार भी न हो पाता । इसलिये उसे बङी सावधानी से एक ही तीर से सभी लक्ष्यों पर निशाना साधना था । लेकिन सबसे बङी बात थी । सभी स्थित परिस्थितियाँ जैसे उसके नियन्त्रण से बाहर थी । और परत दर परत रहस्य की भांति स्वयं खुल रही थी ।
ऐसे ही विचारों में वह वहीं आसपास टहल रहा था कि अचानक सतर्क हो उठा । जोगी तेज कदमों से उधर ही आ रहा था । प्रसून रहस्यमय ढंग से मुस्कराया । वह उसकी बौखलाहट देख रहा था । वह कार के समीप आ पहुँचा था 


। और वहाँ किसी बँध को न पाकर भौंचक्का सा था । बँध जो अब प्रसून हटा चुका था ।
लिली ने उसे आते हुये पहले ही देख लिया था । और वह उत्सुकता से उसे अपनी तरफ़ ही आते हुये देख रही थी । फ़िर उसके पास आते ही वह उछल ही पङी । और खुशी से चीखती हुयी बोली - प्रणाम स्वामी जी । मेरा नमस्कार स्वीकार करें । आपने पहचाना मुझे ।
वे दोनों भौंचक्के रह गये । जोगी को इस बात की कल्पना भी नहीं थी । वह आँखें फ़ाङे हैरत से उसे देख रहा था । बल्कि उन दोनों को ही देख रहा था । एक जवान लङका लङकी । एक आलीशान कार के साथ इस भूतिया वीराने में क्यों हैं । किस मकसद से है । एकाएक उसकी समझ में नहीं आया ।
- ये लिली है । प्रसून शालीनता से उसका अभिवादन करने के बाद बोला - और मैं इनका ड्राइवर ।
- नहीं नहीं । लिली जल्दी से बात काटती हुयी बोली - ये झूठ बोल रहे हैं । ये मेरे हसबैंड हैं । देखो जी साधुओं से झूठ नहीं बोलते । ये बहुत पाप है ।
दिनकर अपनी हालिया उलझन भूल गया । वह लिली को पहचानने की कोशिश में भी असफ़ल रहा था । और उसकी नयी समस्या थी कि वे आखिर यहाँ किस उद्देश्य से आये हैं ?
- इसको । प्रसून उसकी मनस्थिति को भांपता हुआ बोला - प्रेतों की खोज में बहुत दिलचस्पी है । मैंने बहुत समझाया । भूत प्रेत जैसा दुनियाँ में कुछ नहीं होता । पर इसका दावा है । इसने प्रेतों को देखा है । इसी को सिद्ध करने हेतु यह पवित्र भारत भूमि में किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में आयी है । जो आपके दर्शन के बाद लगता है । पूरी हुयी । मैं भी आपके दर्शन से धन्य हुआ महाराज ।
- आप लोग । जोगी कुछ सशंकित सा बोला - कब से यहाँ हो । और किसी अन्य को भी देखा इधर ।
- एकोहम द्वितीयोनास्ति । वह भावहीन स्वर में प्रथम उंगली उठाकर बोला - न भूतो । न भविष्यति । एक वही है । दूसरा अन्य है ही नहीं । न भूतकाल में था । न भविष्य में कभी होगा । फ़िर अन्य हम किसको देखते महाराज । ऐसा मैंने अखबार के धर्म पेज में पढा था । वैसे अभी अभी तो मैंने यहाँ सिर्फ़ आपको ही देखा है ।
जोगी की आँखें गोल गोल हो उठी । जैसे अचानक वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहा हो ।
- हुँ । फ़िर वह गम्भीरता से बोला - कोई बात नहीं । तुम लोग चाहो । तो कल दिन में मठ पर आना । मेरा स्थान बहुत दूर है । और अभी रात भी बहुत है । शायद उधर तुम्हें भय लगे ।
दाता ! उसने सोचा । एक तू ही करतार । जिसको वह अजीब झमेला समझ रहा था । उसकी कङियाँ खुद ब खुद जुङती जा रही थी । लिली की प्रसन्नता की कोई सीमा न थी । जोगी के जाते ही वह दौङकर प्रसून से चिपक गयी । और आँखे बन्द करते हुये अपने होठों को उसके होठों के पास कर दिया । वह फ़िर से अजीव मुश्किल में फ़ँस गया । लिली ब्रा नहीं पहने थी । सिल्की टाप में कसमसाते उसके सुडौल मखमली स्तन प्रसून के सीने से दबने लगे । उसके ह्रदय की तेज धङकन उसे अपने दिल की धङकन सी महसूस होने लगी । इंकार इकरार इजहार में से क्या किया जाये । इस लङकी के बारे में सोचना मुश्किल था । पासा पलट सकता था । खेल बिगङ सकता था । उसने लिली को बाँहों में उठाकर कार में डाल दिया ।
औरत । इस सृष्टि की सबसे अदभुत और सबसे खूबसूरत रचना । स्वयं प्रकृति देवी का रूप ही है औरत । पुरुष के प्यार में अपने तन मन को सदैव भिगोने की आंकाक्षा रखने वाली औरत । तब लिली के अन्दर भी वही औरत ही थी ।
कितनी गलतफ़हमी थी उसकी । वह शादी नहीं करेगा । औरत से दूर रहेगा । जीवन का लक्ष्य । आत्मा का रहस्य जानने में ही जिन्दगी बिता देगा । पर क्या ऐसा हो सका । औरत हर कदम पर उसके साथ थी । उसकी जिन्दगी में थी । नये नये रूपों में थी । शायद उसका सोचना ही उल्टा था । उसने सोचा । अगर वह शादी कर लेता । तब शायद एक ही औरत होती । पर शादी रहित पुरुष के जीवन में औरत का खाली स्थान पूर्ण करने को बारबार नयी औरत मौजूद थी । दरअसल औरत आदमी तो अर्द्धांग होकर एक दूसरे में अलग अलग होते हुये भी समाये हैं । फ़िर औरत से दूरी त्याग का ख्याल ही बेबकूफ़ाना है । यहाँ भी यही तो था । उसके योग में । सत्ता के कार्य निमित्त होने में । एक चमत्कार की भांति औरत मौजूद थी ।
उसने लिली की तरफ़ देखा । वह अधखुले कामुक नेत्रों से उसी की ओर देख रही थी । पर अब वह लिली नहीं थी । सिर्फ़ औरत थी । एक मनवांछित । खोये । पूर्ण पुरुष को युगों युगों से तलाशती औरत । और यह पुरुष एकान्त के बगीचे में ही मिलता है । वह बगीचा । जिसमें वर्जित फ़ल लगा होता है । कामफ़ल ।
उसकी जिन्दगी में अनेक औरतें आयी थीं । योग स्त्रियाँ आयी थी । पर एक सघन उपचार की आवश्यकता की भांति कामफ़ल की असली जरूरत सिर्फ़ इसे ही थी । पुरुषों से घोर नफ़रत का इलाज भी पुरुष ही था । जहर ही जहर को मारता है ।
उसके अन्दर आते ही लिली उसकी गोद में लेट गयी । उसके कपङे अस्त व्यस्त हो गये थे । उसका टाप ऊपर को खिसक गया था । और उसके अधखुले दूधिया स्तन बाहर झांक रहे थे । क्या अजीब बात थी । आज कामवासना का प्रयोग वह मानसिक उपचार हेतु कर रहा था । और इसकी पूर्णता के लिये उसमें भी कामवासना होना जरूरी थी । मधुर कामरस की पूर्ण मात्रा ही लिली की औषधि थी ।
उसने लिली की नाभि से नीचे हाथ सरकाया । और मजबूती से जमा दिया । बँधन में फ़ँसी कोई अदृश्य मेंढकी सी उसकी हथेली से दबी उछल कूद करने लगी । उसने लिली का टाप खोल दिया । कामफ़ल । कामरस से लबालब भरे । दो सुन्दर कामफ़ल । जिनके रस का निचोङ पुरुष को अनोखी पुष्टता से भर देता है । अदभुत ऊर्जा से भर देता है । उसकी बेलाग हरकतों से वह बैचेन हो उठी । बङा निर्दयी भंवरा था । एक बार में ही सब रस पिये जा रहा था । वह छटपटाकर उठ बैठी । उसने तङपकर उसके गले में बाँहें डाल दी । उसके अधर सूखने लगे थे । उनमें उत्तेजना से भरी प्यास जाग चुकी थी । उसने प्रसून को कोई मौका न दिया । और स्वयं ही उसके होठों से जुङ गयी । उपचार शुरू हो चुका था । उल्टा खेल । जिसमें वह एक निरीह लाचार गुलाम पुरुष की तरह उसका मनमाना उपयोग कर सके । इसलिये वह बहुत सावधान था । उसने अपने वस्त्र कब खोल दिये । ये लिली को पता न चला । वह उन्मुक्त सी उसे चूमे जा रही थी । तभी खिलाङी के कुशल हाथों से उसकी स्कर्ट खुलकर सरक गयी । अपनी इन्हीं चेष्टाओं के बीच उसने सीट को फ़ैला दिया था । मनमोहक कलाबाजियों के बीच काम नृत्य चरम पर था । काम रानी का दरबार सज चुका था । उसे पुरुष से नफ़रत और मुहब्बत का जजबाती फ़ैसला करना था । उसके दिल की अदालत में यह पुरुष की पहली पेशी थी । वह पुरुष । जिसे वह भरपूर नफ़रत करती थी । और शायद उसी नफ़रत का सिला कहीं भरपूर मुहब्बत थी । तब वह मुख्य अभियुक्त को देखने का लोभ न रोक सकी । उसने आँखें खोली । और बँधनों से मुक्त उस काले आजाद बलिष्ठ पुरुष को देखते ही वह कांप गयी । एक भय की सिहरन सी उसके समूचे अस्तित्व में दौङ गयी । उसके अंतर में चींटिया रेंगने लगी । एक डर भरी चाहत उसके अन्दर उमङने लगी । यही डर तो कहीं उसके अंतर्मन में छुपा हुआ बैठा था ।
- नहीं । वह कंपकंपाती आवाज में बोली - जाओ यहाँ से । मुझे नफ़रत है ।..नहीं.. नहीं आओ ।
खिलाङी के सधे हाथ उसके स्तनों पर जाकर ठहर गये । फ़िर किसी कुशल घुङसवार की तरह उसने घोङे को एङ लगाई । और घोङा वासना की घाटी में दौङता चला गया । उसकी कदम दर कदम मजबूत टाप उसके अस्तित्व पर चोट कर रही थी । उसकी नफ़रत का जहर बाहर बहने लगा । वह किसी कसाई की भांति उसके नफ़रती अस्तित्व का कीमा कीमा काट रहा था । उसकी बोटी बोटी रोम रोम उछल रही थी । बारबार वह एक आनन्दमय मूर्छा में चली जाती । पर जादूगर हर बार उसकी मूर्छा तोङ देता । ये घुङसवार अदभुत था । सो घोङा घाटी की तलहटी में नृत्य सा कर रहा था । उसकी टापों की ठक ठक चोट उसे बेहाल कर रही थी । उससे सहन होना मुश्किल हो रहा था । फ़िर वह अपने आपको रोक न सकी । और घायल कराहती हुयी सी बेहोश हो गयी । आनन्दमय मूर्छा । मरने की इच्छा । अस्तित्व का मिट जाना । वह धीरे से उससे अलग हो गया । और खुद को व्यवस्थित कर बाहर निकल आया । पूर्ण तृप्ति के अहसास में डूबी निढाल सी वह कहाँ विचरण कर रही होगी । कौन जानता था ।

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