रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 8

सुखिया सब संसार है । खावे और सोवे । यह कितनी अजीब सी बात थी । अपने घर से हजारों मील दूर वह इस वीराने में भटक रहा था । रात के बारह बजने वाले थे । लिली अब भी कार में ही पङी हुयी थी । सिर्फ़ उसको लेकर ही उसकी सारी अङचन थी । वरना यह काम आधा निबट गया होता । वह अदृश्य बेङियों की भांति उसके पैरों से जकङी हुयी थी । और उसे अकेले छोङने में भी उसे अज्ञात भय सा महसूस होता था ।
तब पहली बार उसका ध्यान उस औरत पर गया । क्या था । उस औरत का राज । जोगी से उसका क्या सम्बन्ध था । और तभी उसका ध्यान लिली पर भी गया । क्या वह जोगी से परिचित थी । उसने यह भी सोचा । क्या दिनकर जोगी । एक महान तांत्रिक । निरा माटी का माधौ है । जो उन दोनों की बात ज्यों की त्यों मानकर चैन से सोया होगा । और कल का इंतजार करेगा । अगर नहीं करेगा । तो क्या करेगा ।
क्या उसकी आज की रात भी बेकार जाने वाली है । यदि नहीं । तो फ़िर उसे क्या करना चाहिये । और फ़िर उसे यही उचित लगा । आज की रात वह फ़िर से तांत्रिक लोक जाये । और विश्वबन्धु से सलाह मशविरा करे ।
यह सोचते ही वह सक्रिय हो उठा । उसने देखा । लिली उसी हालत में सो गयी थी । पर उसकी कोई परवाह न करते हुये उसने गाङी का गेट लाक किया । और जगह बनाते हुये लेट गया । तांत्रिक लोक अधिक दूरी पर नहीं था । बस एक दो घण्टे में वह लौट भी आना था । उसने आँखे मूँद ली । और केन्द्रित होने लगा ।
तभी उसके दिमाग में खतरे का सायरन गूँजने लगा । तांत्रिक हमला । तीन तंत्र कमल हवा में तैरते हुये से उनकी तरफ़ आ रहे थे । तीन । दो । उन दोनों की मौत के । या मृत्यु सम आघाती । और एक परिणाम के बाद का वाहक । मतलब साफ़ था । जोगी ने प्रेतों की सूचना को हल्के नहीं लिया था । और उन दोनों की बातों पर कोई गम्भीरता नहीं दिखाई थी । ये उसके सख्त नियम होने का पक्का सबूत था ।
पर ये अहम भी बहुत अच्छा नहीं था । जब वह उसके किसी योग से जुङे होने को भांप रहा था । तो दोस्ती का हाथ बढाता । समझौते का रास्ता खोजता । उसने तो सीधा मौत का ही इंतजाम कर दिया था । उसने  सोती हुयी लिली के मासूम चेहरे पर निगाह डाली । और सावधानी से उसके सिर से एक बाल तोङ लिया ।
तंत्र कमल कार के शीशे से आकर ठहर गये थे । लक्ष्य पर आघात करने की शक्ति उनमें नहीं थी । उसने बाल को कुछ सेकेण्ड तक देखा । और हाथ से छोङ दिया । बाल तीनों कमल पुष्प को डण्डी रहित करता हुआ डण्डी के साथ ही जंगल लौट गया । डण्डी के ऊपर के फ़ूल प्रसून के हाथ में आ गये । अदृश्य जगत के अदृश्य फ़ूल । उसने तीनों फ़ूल लिली के बालों से बाँध दिये । फ़िर वह रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया ।
दिनकर कितना ही अहमी तांत्रिक हो । इस शक्तिशाली वार के खाली अपमानित होकर वापिस आने पर कितना ही तिलमिलाये । पर अब बौखलाकर कोई कदम नहीं उठायेगा । बल्कि अब तो वह फ़ूँक फ़ूँक कर कदम रखेगा । आज की रात उसकी नींद हराम हो चुकी थी ।

इसलिये आज की रात के लिये वह निश्चिंत था । उसने लिली पर एक निगाह डाली । और कुछ ही क्षणों में उसका आंतरिक शरीर अंतरिक्ष में जाने लगा ।
- विश्वबन्धु । वह उसके साथ चलता हुआ बोला - ऐसा कोई भी अभियान मुझे हमेशा ही नैतिक अपराध के बोध से गृस्त करता है । दिनकर हमारी बिरादरी का ही है । स्वाभाविक ही तंत्र मन्त्र शिक्षा की सफ़लता से उसका अहम प्रबल हो उठा है । उसे उचित मार्गदर्शन नहीं हुआ । उसकी जगह मैं होता । आप होते । तब हम भी यही करते । फ़िर उसके खिलाफ़ ये सब कितना उचित है ।
- वाह । विश्वबन्धु के स्वर में आदर और प्रशंसा थी - इसीलिये मुझे तुम्हारी मित्रता पर अभिमान है मेरे मित्र । इंसान कुछ भी क्यों न हो जाये । अगर उसके अन्दर का इंसान जीवित बना रहता है । तो वह सबसे बङा पूज्य है । इंसान का इंसान ही बने रहना बहुत बङी शक्ति होती है ।
मैंने तिलिस्मी दर्पण पर वह देखा था । किस तरह तुमने उसके मारण तंत्र को एक स्त्री के बाल से नष्ट कर दिया । ऐसी योग प्रतिभा कभी कभी ही हो पाती है । और इस सबके बाद भी खुद पर कोई गर्व नहीं ।
प्रसून ने एक गहरी सांस ली । शायद हर बात का उत्तर होता ही नहीं है । वह कुछ और ही कह रहा था । और विश्वबन्धु प्रत्युत्तर में कुछ और ही कह रहा था ।
- सिद्ध पुरुष । वह फ़िर से बोला - मेरा तात्पर्य कुछ और है । दिनकर जोगी जैसी सिद्ध आत्मा वर्षों की कङी मेहनत लगन और तपस्या से उच्चता को प्राप्त होती है । वह महान है । हजारों वायु शरीरों का नियन्ता है । वह सत्ता के कार्य में ही सहयोगी है । आखिर उसकी क्या गलती है । जो वह घोर दुर्गति को प्राप्त हो । उसकी तमाम मेहनत निरर्थक हो जाये । और अब फ़िर से झूठी प्रशंसा में समय मत गंवाना ।
- एक ही गलती । विश्वबन्धु उसकी बात समझकर गम्भीरता से बोला - जो प्रायः हर जीवात्मा करता है । अज्ञानता जनित अभिमान वश करता है । स्वयंभू होना । भगवान होना । अरे माना । वह गलती अज्ञान के वशीभूत करता है । तो फ़िर वह भोजन के स्थान पर मल क्यों नहीं खा लेता । जल के स्थान पर मूत्रपान क्यों नहीं करता । इस बात का बोध उसे कैसे है कि ये गलत है । उससे अपने प्रति गलती क्यों नहीं होती ।
सत्ता से शक्तियाँ जीव के परमार्थ लाभ हेतु हासिल होती है । न कि उनकी जिन्दगी उजाङने के लिये । ऐसे तो रावण भी हमारा ही बन्धु था । आप बताओ । देवी सीता ने लक्ष्मण रेखा खुद लांघी । या उसने विवश किया । मेरे मित्र । हर जीवात्मा अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा की मर्यादा में रहता है । तब दिनकर जैसे अधर्मी लोग उन्हें बाहर आने को विवश कर देते हैं । फ़िर तारा उसका मृत्यु दीप जला रही है । उस तंत्र का क्या परिणाम होगा । उसकी उम्मीद का दीपक क्या यूँ ही बुझ जायेगा ।
प्रसून को कोई जबाब न सूझा । इसीलिये शायद हर बात का जबाब होता भी नहीं है ।
विलक्षण है ये कालचक्र भी । कोई जिये । कोई मरे । कोई हँसे । कोई रोये । इसे किसी से कोई मतलब नहीं । सबका साक्षी बना हुआ ये निरन्तर गतिमान रहता है । कभी कोई सत्य इसके अतीत खण्ड में छिपा होता है । और कभी कोई सत्य इसके भविष्य काल में । अनवरत घूमता ये चक्र सभी घटनाओं पर रहस्य का आवरण चढाता रहता है । और तब सत्य के खोजी आगे पीछे की यात्रा करते हैं । यात्रा ।
उसने स्टेयरिंग घुमाया । और सिगरेट सुलगाते हुये समय देखा । सुबह के चार बजने वाले थे । कोई आधा घण्टे पहले वह प्रथ्वी पर आ गया था । सब कुछ उसकी आशा के अनुरूप ठीक ही था । लिली अब भी सो रही थी । उसे एक गर्मागरम चाय काफ़ी की जबरदस्त तलब हो रही थी । लेकिन फ़िर कुछ सोचते हुये उसने ये इरादा त्याग दिया । और गाङी स्टार्ट करके शहर के रास्ते पर दौङाने लगा । अन्दाजे से उसी रास्ते पर । जिस पर गाङी आयी थी । सब कुछ उसके लिये अपरिचित ही था । कोई एक घण्टे में गाङी मुख्य सङक पर आ गयी । तब उसने चाय के खोखे पर गाङी रोक दी । और आराम से बाहर आ गया ।
- तारा पगली ...तो साहब । दुकानदार उन दोनों को चाय का गिलास थमाता हुआ बोला - यहाँ प्रसिद्ध ही है । वह अक्सर सङकों पर घूमती चिल्लाती हुयी मिल जाती है - एक दिन ये रावण भी मरेगा । बहुत बुरा हुआ साहब । वह औरत पहले पागल नहीं थी । और तब उसे कोई जानता भी नहीं था । पर जब से सास बहू दोनों पागल हो गयीं । उन्हें सब जान गये ।...कुछ ही देर बाद । उसने एक तरफ़ उँगली उठाई - वो जो वाटर वर्क्स की टंकी है । वहाँ उसकी बहू घूमते हुये मिल जायेगी ।
- तारा के बेटे का । वह टंकी की तरफ़ देखता हुआ बोला - क्या हुआ । क्या वह..?


- ठीक कुछ पता नहीं साहब । चाय वाला चोर निगाह से लिली को देखता हुआ बोला - पर सुना है । वह कोमा जैसी स्थिति में है । और किसी धर्मार्थ संस्था द्वारा चलाये जा रहे अस्पताल में है । वह किसी दूसरे शहर में है ।...उनका घर । वह बताने लगा ।
अणुपुर । मध्य प्रदेश का अणुपुर जिला न तो बहुत बङा है । और न ही बहुत छोटा । इस जिले के गाँवों में देशी कल्चर है । और शहरों में विदेशी कल्चर । कस्बों में देशी विदेशी मिश्रित संस्कृति है । अणुपुर में हरियाली बहुत है । इसी जिले का एक बहुत छोटा शहर । राजपुरा । राजपुरा की आबादी कम है । अधिकतर मध्य वर्गीय लोगो का शहर है ये । अमीर इस शहर में हैं । लेकिन कम हैं । इसी राजपुरा नाम के छोटे से शहर से थोडा दूर एक और एरिया है । जिसे बस्ती कहते है । ये पुरानी बस्ती शहर भी नही है । गाँव भी नही है । इस पुरानी बस्ती को कस्बा कहें । या न कहें । समझ में नहीं आता । अलग सा ही एरिया है यह । यहाँ गरीब लोग या निम्न मध्य वर्गीय लोग ही रहते हैं । जैसे ड्राइवर । कसाई । नाई । दर्जी । मैकेनिक । आटो वाले । रिकशे वाले । रेहडी वाले । बहुत ही छोटी किस्म के दुकानदार । चपरासी आदि । ये बस्ती इस तरह के लोगों के रहने की जगह है । ये लोग सिर्फ़ इस बस्ती में रहते हैं । लेकिन काम काज, नौकरी आदि आसपास या दूर नजदीक के शहरों में जाकर करते है ।
पुरानी बस्ती थोङी सुनसान जगह पर है । आसपास कांटेदार झाङियाँ । जंगली पेड पौधे आदि हैं । यहाँ देह व्यापार करने वाली सेक्स वर्कर भी हैं । जो गरीब हैं । वो बस्ती में ही धन्धा करती हैं । जो निम्न मध्य वर्गीय लडकियाँ हैं । वो बस्ती से बाहर आसपास के शहरों में काम करती हैं । कोई लडकी ब्यूटी पार्लर में काम करती है । कोई बुटीक में । और कोई छोटी मोटी प्राइवेट जाब । कुछ लडकिया इस तरह की जाब की आड में सेक्स वर्क करती हैं ।
इनके सुन्दर गोरे चेहरे । तीखे नैन नक्श । सेक्सी कामुक आवाज । लम्बा कद । दिलकश फ़िगर । आकर्षक स्तन । और उभरे हुए नितम्ब सहज ही आकर्षित करते हैं । इस बस्ती में घटिया जादू टोना करने वाले लोग भी हैं । भले ही कम है । इनको तंत्र विधा तन्त्र शास्त्र आदि का कोई सही ग्यान नहीं । ये किसी छोटे मोटे काले इल्म से लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं । या यूँ समझो । ये भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...