रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 9

उसकी अब तक की जिन्दगी में ऐसा उलझाव वाला केस आज तक न आया था । जिसमें चार चार लोग एक साथ ही इस तरह प्रभावित हुये हों कि उनके पागल होने की नौबत आ गयी । जो उजङने के कगार पर जा पहुँचें । जिसका सम्बन्ध तांत्रिक लोक से जुङता हो । जिसके तार एक महान तांत्रिक से जुङे हों । और जिसमें बहुत सारी गुत्थियाँ बुरी तरह से उलझी हों । और सबसे बङी  बात । इन गुत्थियों को सुलझाने का सही सिरा उसकी पकङ से बाहर था ।
- आप ही मंजरी जी हैं ना । वह मधुर स्वर में प्रेम से बोला - एक कामयाव नर्तकी । हजारों कदरदानों की चाहत । मैं बहुत दूर से आपसे मिलने आया हूँ । पहले जसराम पुर...भी ।
उसने एकदम चौंककर देखा । इतने मधुर भाव से । प्रेम के बोल । बहुत दिनों बाद । आज कोई बोला था । उसका चेहरा बिगङने लगा । फ़ूटती रुलाई के लिये सिकुङते फ़ैलते होंठ उसके सुन्दर चेहरे को विकृत करने लगे ।
स्वार्थ के संसार में शहद घुले ऐसे मीठे बोल । तन मन को शीतल करती दिव्य वाणी । और निगाह में कोई वासना नहीं । अब तक तो जिसने देखा था । उसके अस्त व्यस्त उघङे बदन को ही देखा था । वासना से देखा था । वासना से छुआ था । वासना से बोला था । वासना । वासना । सिर्फ़ वासना । कामवासना ।
फ़िर ये अदभुत आसमान का मसीहा कहाँ से आया था । जिसको देखने मात्र से उसका दिमाग शान्त होने लगा था । उसके मष्तिष्क में घुसा हुआ सारा भय भाग गया था । और वह चौंक रही थी । बारबार चौंक रही थी । उसे कुछ याद आ रहा था । वह सब कुछ । जो वह भूलती जा रही थी । भूल चुकी थी ।
- म..म..मम्मी॓ऽऽऽ । अचानक वह गला फ़ाङकर चिल्लाई - मेरी सास.. । वो कहाँ हैं । मेरे पति.. हटो मुझे जाने दो ।
मंजरी उसे वाटर वर्क्स पर नहीं मिली थी । बल्कि सङक पर मिली थी । और आसानी से मिल गयी थी । सङक पर राहगीरों का हजूम इकठ्ठा होता जा रहा था । एक महंगी गाङी । एक विदेशी महिला । और एक आकर्षक पुरुष । और चिर परिचित पगली । आखिर बात क्या थी । सब यही जानना चाहते थे । और बारबार पूछते हुये रुकावट खङी कर रहे थे ।
- मैं । वह थोङा उच्च स्वर में भीङ से बोला - मंजरी जी की बुआ का लङका हूँ । मैं विदेश में था । जैसे ही मुझे खबर मिली । मैं आया । अब इनको घर ले जा रहा हूँ ।
घर । मंजरी के अरमानों में सजा । उसके पिया का घर । जो अब उजङ चुका था । प्रेत वायु से अभिशप्त हो चुका था । उसने चारों तरफ़ एक सरसरी निगाह डाली । घर में गन्दगी के अलावा शायद कुछ नहीं था । महीनों से झाङू नहीं लगी थी । प्रेतों और पिशाच की मौजूदगी के निशान घर के चप्पे चप्पे पर अंकित थे । उसकी आँखें भीगने लगी ।
उसने अपनी भावुकता पर नियन्त्रण किया । सिगरेट सुलगाई । और यूँ ही घर में टहलने लगा । पूजा की आलमारी से उसने धूपबत्ती ली । होठों में कुछ बुदबुदाया । और पूरी ही सुलगाकर रख दी । अभिशप्त स्थान को प्रेत वायु रहित करने वाला सुगन्धित धुँआ घर के कोने कोने में फ़ैलने लगा । मुर्दा रूहों की तरंगे कांपती हुयी भागने लगी । जिन्दगी की उमंगे नयी किरणों के साथ फ़ैलने लगी । सात्विकता की महक घर के कण कण में समाने लगी ।
तम का अँधेरा मिट रहा था । सत का उजाला फ़ैल रहा था । अभी मंजरी के उस प्रेम घरौंदे की खुशियाँ तो नहीं लौटी थी । तारा के बगीचे के वे दो चिङा चिङी भी अभी नहीं चहचहाये थे । पर जैसे गुजरा हुआ समय वापिस

आकर खङा हो गया था । वो समय । जब तारा के खुशहाल घर को प्रेतों की नजर लग गयी थी ।
शाम के सात बजने ही वाले थे । गली गली सङक सङक द्वार द्वार भटकने वाली दोनों सास बहू आज घर में ही थी । और अर्द्ध विक्षिप्तता से बहुत हद उबर चुकी थी ।
उस घर के लिये माकूल तंत्र इंतजाम करने के कोई एक घण्टे बाद । वह लिली को वहीं छोङकर तारा की तलाश में निकल गया था । और जल्दी ही लौट आया था । सङक पर गालियाँ बकती तारा उसे शीघ्र ही दिख गयी थी ।
पागलों को समझाना आसान है । पर दुनियाँ के पागलों को समझाना बहुत कठिन है । उस छोटे से शहर में ये खबर जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी । तारा के घर के सामने दिन भर मेला सा लगा रहा । तमाम स्थानीय बङे और प्रतिष्ठित लोग उत्सुकता से भागते चले आये । पर उस आलीशान गाङी और उसके उससे भी आलीशान लोगों को देखकर उन्हें अधिक कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ ।
- मैं मंजरी की बुआ का लङका हूँ । फ़िर भी वह उनकी शंका दूर करने हेतु भावहीन मगर प्रभावशाली स्वर में बोला ।
- और मैं इनकी धर्मपत्नी । मौके का  फ़ायदा उठाकर लिली उससे जबरन चिपकती हुयी बोली ।
तारा और मंजरी । दोनों को बस एक झटका सा लगा था । जैसे अचानक डरावना ख्वाव देखकर । महीनों बाद । अभी अभी नींद से जागी हों । जैसे अचानक बेहोशी टूटी हो । जैसे अचानक स्मृति लौटी हो । जैसे अचानक खोया हुआ घर मिल गया हो । दोनों के ऊपर से छाया हट गयी थी । और वे कुछ कुछ सामान्य थी । मगर गहरी उदासी में थी । तब उसने आज की रात यहीं रुकने का निश्चय किया । और गहरी सांस लेते हुये आसमान को देखने लगा ।
सच ही कहा है किसी ने । बिना घराणी के सूना घर भूत का डेरा ही होता है । पिछले दस महीनों से प्रेत अभिशप्त इस घर के आँगन में आज की शाम रात का काला अँधेरा लेकर नहीं । बल्कि उम्मीदों का दीप जलाती हुयी उतरी थी । लिली इस मामले में समझदार साबित हुयी थी । उसने अभी भी सदमे की सी हालत में डांवाडोल मंजरी को न सिर्फ़ चतुराई से संभाल लिया था । वरन उसी के सहयोग से घर को झाङ पोंछकर चमका दिया था । सब कुछ सामान्य सा महसूस हो । इसलिये प्रसून ने खाने पीने का आवश्यक सामान सुविधायें बाजार से पूरी की । और इसके परिणाम स्वरूप महीनों बाद आज इस घर में चूल्हा जल रहा था ।
पर अभी भी बहुत कुछ बाकी था । रोग बहुत कट गया था । पर अभी भी बहुत रह गया था । उसने रोग निवारण हेतु औषधि भी खिला दी थी । रोग प्रतिरोधक औषधि की खुराक भी दे दी थी । रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु फ़िर से संकृमण न करें । इस हेतु घर में दवा भी छिङक दी थी । पर असल मामला तो ज्यों का त्यों मौजूद था । असल रोग । पिशाच । ये पिशाच कहाँ था ?
अब उसके सामने सबसे बङी समस्या थी । पिशाच की । इस आवेश हेतु वह तारा या मंजरी को दुबारा माध्यम नहीं बनाना चाहता था । वह पहले ही अधमरी थी । और लिली को माध्यम बनाये कैसे । दूसरे वह किसी भी हालत में अपने योगत्व को जाहिर करने से बचना चाहता था । कम से कम लिली जैसी प्रेत दीवानी को तो वह कतई नहीं चाहता था कि वह इस बारे में कुछ जाने । और इस तरह यह समस्या जटिल हो रही थी । इस तरह तो आज की रात बेकार चली जानी थी ।
तारा उसी के पास जमीन पर बैठी थी । और वह उसके घाव कुरेद रहा था । सहला रहा था । मरहम भी लगा रहा था । सही ही था । उस घर में जैसे गुजरा वक्त फ़िर से चल रहा था ।
और तब अचानक वह चौंका । उसकी निगाह एक औरत जैसी गुङिया पर गयी । जो एक काँच की छोटी बोतल के

आधार पर बनायी गयी थी । तारा की अतीत कथा अब उसे सुनाई देना बन्द हो गयी । उसने गुङिया को उठा लिया । और उलट पलट कर देखने लगा ।
- मंजरी ने बनाई हैं । वह भावुक होकर बोली - बङी होशियार है मेरी बहू ।
पर उसका ध्यान कहीं और ही था ।
- माध्यम । उसके मुँह से निकला । उसने तारा को देखा । और बोला  - माँ जी ! आज मृत्यु दीप नहीं जलाओगी । कोई बात नहीं । ऐसा करिये । आज यहीं घर के बाहर जला दीजिये । अपने दरवाजे पर ।
उसकी बात समझकर जैसे ही तारा मुङी । उसने किसी जेबकतरे की भांति सफ़ाई से उसका एक बाल तोङ लिया ।  उसे भनक तक न हुयी । फ़िर वह रहस्यमय ढंग से मुस्कराते हुये बाल को गुङिया औरत के बालों में पिरोने लगा । किसी बच्चे की तरह ही वह गुङिया से खेलता हुआ शीशे के सामने आया । और उपलब्ध सामान से उसका श्रंगार करने लगा । काजल । बिन्दी । सिन्दूर । तेल । फ़ुलेल । सब उसने प्रतीकात्मक किया ।
और फ़िर रात के ग्यारह बजे । जब मंजरी और लिली सो रही थी । तब वह कुछ निश्चिंत हुआ । कम से कम आज की रात उसके लिये चैन से सोने की रात थी । वह मोटे तकिये से टेक लगाये सिगरेट पी रहा था । और तारा की इन खास दिनों की जिन्दगी के ताने बाने को बुनने की कोशिश कर रहा था ।
तभी अचानक रहस्यमय अन्दाज में तारा उसके पास आकर खङी हो गयी । उसने संकेत से उसे पीछे आने का इशारा किया । वे दोनों घर से बाहर गली में आ गये ।
- मेरे बेटे का नाम केशव गोस्वामी है । वह गम्भीरता से बोली - वह इस समय यहाँ से दूर एक अस्पताल में कोमा जैसी हालत में जिन्दगी मौत के बीच झूल रहा है । तुम भी मेरे लिये बेटे जैसे ही हो । पर मैंने यह सब कहने के लिये तुम्हें यहाँ नहीं बुलाया । मेरी बहू और तुम्हारी पत्नी सो रही हैं । लेकिन फ़िर भी अक्समात भी उन्हें हमारी बात पता न लगे । इसलिये मैंने आपको यहाँ बुलाया । मेरे मन में बङी बैचेनी सी हो रही है । मैं कुछ जानना चाहती हूँ । लेकिन पहले मेरी कसम खाओ । आप सच बताओगे ।
उसने एक गहरी सांस ली । ज्ञान का पँथ कृपाण की धारा ।
- कसम तो । वह भावहीन स्वर में बोला - खाई ही झूठ बोलने के लिये जाती है । कसम उठाने का साफ़ अर्थ है । धोखा देना । ऐसा ही मेरा अनुभव है । इसलिये आप बेफ़िक्र होकर पूछिये । मैं सच ही बताऊँगा । बिना किसी गाड प्रामिस के ।
वह थोङा सा कसमसाई । उसने अँधेरे में भी उसकी तरफ़ देखा । और अजीब से ठण्डे स्वर में बोली - मृत्यु दीप बुझ गया ।..और जानते हो । इसका क्या मतलब है । अगले 24 घण्टे में दिनकर जोगी की मृत्यु । मैं पगली इस बात को झूठ मानती थी । मगर मेरे प्रतिशोध को इसके अलावा और कोई उम्मीद भी न थी । कोई सहारा न था । इसलिये मैं बङे भाव से उसकी मौत की कामना करती हुयी दीपक जलाती थी । और रोज ही निराश होती थी । कभी कभी झूठ भी मालूम होता था । पर इस झूठ का ही सहारा सा था । इसलिये नियम से जलाती थी । पर आज तक न बुझा था ।
कहते कहते वह रुकी । उसने गहरी सांस ली । और फ़िर से बोली - लेकिन..लेकिन..आज दीपक ने ठीक से लौ भी न पकङ पायी थी । अभी ठीक से प्रज्वलित भी न हो सका था कि फ़कफ़काता हुआ बुझ गया । मेरा यकीन करो बेटे । उस फ़कफ़काती हुयी लौ में मैंने स्पष्ट दिनकर जोगी को देखा । मरते हुये । एक बार को मुझे लगा । मेरी आँखों को धोखा हो रहा है । शायद..शायद पुराने दिनों का लौटना मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ । और मैं बाबली हो गयी हूँ । इसलिये मैंने दीपक दुबारा जलाया । बारबार जलाया । पर दीपक न जला । जबकि जबकि उसमें तेल बाती एकदम दुरुस्त थे ।
- कमाल है । वह हैरत से आश्चर्य में डूबा हुआ सा बोला - ये तो कमाल ही हो गया । माँ जी ये उपाय आपको जिन महात्मा ने बताया होगा । वह निश्चय ही बङी पहुँच वाले होंगे । मुझे भी उनके दर्शन कराना । हे प्रभु ! फ़िर वह आसमान की ओर हाथ उठाकर बोला - आपने इन दुखी माताजी पर कृपा दृष्टि की । आपको बारबार प्रणाम है ।
तारा गहरी उलझन में पङ गयी । उसने बेबसी से उसकी ओर देखा । और बोली - बेटा ! अभी अभी तुमने सच बोलने का वादा किया है । तुम्हे अपने उसी वचन का वास्ता । मुझे सच सच बताओ । असल में आप कौन हो ? अचानक..अचानक  सब कुछ ठीक सा कैसे हो गया । घर से मरघट बना । ये घर । किस चमत्कार से फ़िर से घर बन गया ।
- माँ जी । वह गम्भीरता से बोला - सच तो यही है कि मैं एक इंसान हूँ । सिर्फ़ एक इंसान । एक सीधा सच्चा । भगवान को मानने वाला इंसान । न मैं हिन्दू । न मैं मुस्लिम । न सिख । न ईसाई । न यहूदी । न पारसी । बस इंसान । हाङ माँस का बना इस । उसने धरती से मिट्टी उठाई - इस माटी से बना पुतला । अन्त पन्त जिसको इसी माटी में मिल जाना है । बस इसके सिवा और कुछ नहीं । और आप..मेरा यकीन करो । ये मैं सच कह रहा हूँ । दिल से कह रहा हूँ । आत्मा से कह रहा हूँ ।
तारा ने एक सूनी सी उदास दृष्टि से उसे देखा । और बिना कहे घर की ओर चली गयी । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और हौले हौले सीटी बजाने लगा । मृत्यु दीप । महान तांत्रिक दिनकर जोगी । भला किसी का कर न सको । तो बुरा किसी का मत करना । बुरे काम का बुरा फ़ल । आज नहीं तो निश्चय कल । अन्त बुरे का बुरा । दाता ! तेरा अन्त न जाणया कोय ।

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