शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 1

प्रसून द ग्रेट । बेहद हैरत से उस शख्स को देख रहा था । और आज बडे अच्छे मूड में था । हैरत से इसलिये कि उसके तांत्रिक मांत्रिक होने की जिस बात को स्वयं उसके परिवार वाले कभी नहीं जान पाये । उस बात को दूरदराज रहने वाले लोग कैसे जान लेते थे ? न सिर्फ़ जान लेते थे । बल्कि कोई प्वाइंट निकालकर अपनी प्रेतबाधा आदि समस्या दूर करवाने में सफ़ल भी हो जाते थे । तमाम अन्य लोगों की तरह उसके घरवाले भी उसे एक कीट बिग्यान के शोधार्थी के तौर पर ही जानते थे ।
अब तक अविवाहित रहने के बहाने बनाता हुआ । और जीवन में विवाह और स्त्री से सदा दूर रहने का वृत ले चुके प्रसून को स्वयं अपने आप ही अपना अस्तित्व । अपने लिये ही रहस्यमय लगता था । उसने अपनी समस्त जिंदगी साधना के लिये अर्पण कर दी थी । अब इसमें आगे क्या और कैसा होना था । ये उसके गुरु और भगवान पर निर्भर था ? द्वैत का ये निपुण साधक कितनी विध्याओं का ग्याता था । ये स्वयं उसको भी पता नहीं था । कोई कार्य पडने पर ही उसे समझ आता कि ये मेरी रेंज में है या नहीं ?
..अभी शाम के चार बज चुके थे । जब उसने अपनी व्यक्तिगत कोठी के सामने सडक पर खडी स्कोडा का डोर खोला ही था कि उसके कानों में आवाज आई - माई बाप..।
प्रसून ने मुडकर देखा । और लगभग देहाती से दिखने वाले उस इंसान से बोला - हू..मी..? तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ । उसने तुरन्त फ़िर हिन्दी में कहा..कौन..मैं..मुझे..? उसने अपनी ही उंगली से अपने सीने को ठोका ।
हां । माई बाप..। वह आदमी हाथ जोडकर बोला ।
प्रसून ने हैरत के भाव लाकर अपने आसपास देखा । और बोला । बाप तो समझ आया । माई कहां है ?
देहाती ही ही करके हंसा । और हाथ जोडकर खडा हो गया ।

उसका मतलब समझकर प्रसून वापस कोठी की तरफ़ मुडा । और उसे पीछे आने का इशारा किया । आगे के संभावित मैटर को पहले ही भांपकर वह कोठी के उस स्पेशल रूम में गया । जो उसकी साधना से रिलेटिव था । एक बेहद बडी गोल मेज के चारों तरफ़ बिछी कुर्सियों पर दोनों बैठ गये । इस कमरे में हमेशा बेहद हल्की रोशनी रहती थी । और लगभग अंधेरे से उस विशाल कक्ष में बेहद कम रोशनी वाले गहरे गुलाबी और बेंगनी रंग के बल्ब एक अजीब सा रहस्यमय माहौल पैदा करते थे । प्रसून ने एक सिगरेट सुलगायी और बेहद मीठे स्वर में बोला । कहिये..?
वह आदमी चालीस किमी दूर एक शहर के पास बसे एक कस्बे से आया था । और उसका नाम टीकम सिंह था । टीकम सिंह की पत्नी पिछले तीन सालों से लगातार बीमार थी । और खाट पर ही पडी रहती थी । टीकम सिंह ने अपनी हैसियत के अनुसार काफ़ी पैसा उसके इलाज पर खर्च कर दिया । पर कोई लाभ नहीं हुआ । बीच बीच में लोगों ने भूतवाधा या ग्रह नक्षत्र विपरीत होने की सलाह दी । तब टीकम सिंह ने उसका भी इलाज कराया । पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा । लेकिन अब टीकम सिंह को ये पक्का विश्वास हो गया कि उसकी पत्नी प्रेतवाधा से ही प्रभावित है ।
और इसकी दो वजह भी थी । दरअसल उसके मकान के दोनों साइड जो पडोसी थे । वे वास्तव में भूत ही थे । उसकी मकान के एक साइड में एक वर्षों पुराना हवेलीनुमा खन्डहर मकान था । जिसमें पिछले अस्सी वर्षो से कोई रह ही नहीं रहा था । और उसके वारिसान का भी कोई पता ठिकाना नहीं था । टीकम सिंह इस मकान का इस्तेमाल अपने लिये भेंस बांधने और उपले थापने के लिये करता था । जबकि उसके मकान के दूसरे साइड में एक बेहद पुराना कब्रिस्तान था । जिसमें अब मुरदों को दफ़न नहीं किया जाता था । इन दोनों वीरान पङोसियों के साथ ये दिलदार इंसान वर्षों से अकेला रह रहा था । और उसने कभी कोई दिक महसूस न की थी ।
लेकिन पिछले तीन साल से जो उसकी पत्नी बीमार पङी । तो फ़िर उठ ही न सकी ।
- और इस बात से । प्रसून बोला - आप कूदकर इस नतीजे पर पहुँच गये कि आपकी पत्नी किसी भूतप्रेत के चंगुल में है ।.. अगर कोई बीमारी ठीक ना हो । तो इसका मतलब उसको भूत लग चुके हैं ।
स्वाभाविक ही किसी आम देहाती इंसान की तरह टीकम सिंह प्रसून की पर्सनालिटी उसके घर वैभव आदि से इस कदर झेंप रहा था कि अपनी बात कहने के लिये उचित शब्दों का चुनाव भी नहीं कर पा रहा था ।
- ना माई बाप ! टीकम सिंह हिम्मत करके बोला - ऐसा होता । तो उस मकान में । जिसमें रहने की कोई हिम्मत नहीं कर पाता । मैं वर्षों से कैसे रहता ।..सही बात तो ये है कि मुझे पहले ही पता था कि मेरे दोनों तरफ़ भूतवासा है । मैंने उसे महसूस भी किया था । पर मैंने सोचा । कि भूत भी कभी इंसान थे । जब हमें उनसे कोई मतलब नहीं । तो उन्हें भी कोई मतलब नहीं होगा । शायद हम भी मरकर भूत ही बनें । फ़िर भूतों से डरना कैसा ?
प्रसून के मुँह से उसकी भोली बातों पर ठहाका निकल गया । और वह बोला - कितने दार्शनिक और धार्मिक विचार हैं आपके । अगर ऐसे ही विचार सभी के हो जायें । तो भूत और इंसान भी भाई भाई हो जायँ ।
...टीकम सिंह और उसकी पत्नी जब खन्डहर वाले मकान में भेंस आदि के कार्य से जाते थे । तो वहाँ उन्हें कई तरह की संगीतमयी बारीक ध्वनियाँ सी सुनाई देती थी । ये ध्वनियाँ होती तो छिद्रों आदि में रहने वाले कीटों की ही थी । पर उनका प्रेषण सामान्य न होकर मधुर संगीतमय होता था । और ध्वनियों में भी विभिन्नता थी ।
इसके अतिरिक्त पायल की रुमझुम आबाज का संगीत और किसी के दबे पाँव चलने का अहसास उसे और उसकी पत्नी को कई बार हुआ था । दूसरे पङोसी यानी कब्रिस्तान का मामला अलग था । वहाँ रात के समय भागदौङ और किसी के आपस में झगङने जैसा अहसास उसे कई बार हुआ था । इसको इंसानी मामला जानकर । कोई चोर आदि का भृम होने से कई बार लालटेन लेकर जब वह छत पर देखने पहुँचा । तो वहाँ कोई नहीं था । अब इसके लिये टीकम सिंह एकदम क्लीयर नहीं था । कि ये सच था । या उसका वहम था । पर उसे लगता यही था कि यह सच था ।
उसके बारबार पहुँचने से एक पुरुष आवाज ने उसे कहा भी था - टीकम सिंह तुम अपने घर जाओ । हमारे बीच दखल न दो । पहली बार टीकम सिंह के भय से रोंगटे खङे हो गये । वह उल्टे पाँव लौट आया । उसे पूरी रात नींद नहीं आयी । अब उसे भेंस वाले खन्डहर मकान में भी भय लगने लगा था । पर गरीब आदमी होने के कारण वह अपना निजी मकान छोङकर कहाँ जाता । और कैसे जाता ।
तुम्हारे बच्चे..प्रसून के मुँह से निकला ही था कि उसका मतलब समझकर टीकम सिंह जल्दी से बोला । मालिक ने दिये ही नहीं । हम दो लोग ही रहते हैं वहाँ ।
ओह..आई सी । प्रसून एक नयी सिगरेट सुलगाता हुआ बोला । उसने सिगरेट केस टीकम सिंह की तरफ़ बङाया । तो बेहद झिझक से उसने एक सिगरेट निकाल ली । प्रसून ने उसके मुँह से लगाते ही फ़क्क से लाइटर से सिगरेट जला दी । इससे वह और झेंप सा गया ।
कितने जिगर वाले हैं । दोनों मियाँ बीबी ? प्रसून ने सोचा । जिस मकान में दिन में जाते हुये इंसान की रूह कांप जाय । उसमें आराम से रहते हैं । लेकिन फ़िर उसे अपना ही विचार गलत लगा । ये एक तरह का समझौता भी था । मजबूरी भी थी ।
तभी नौकरानी चाय बिस्किट आदि रखकर चली गयी । प्रसून ने टीकम सिंह से इशारा करते हुये कहा । चाय पियो भाई..और बताओ कि तुम्हारी खन्डहर वाली चुङैल हीरोइन कौन कौन से गाने सुनाती है..?
टीकम सिंह ने झिझकते हुये ही कप उठाया । और सुङक सुङक करता हुआ बीच बीच में बताने लगा ।
कृमशः..।

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 2

- टीकम सिंह जी । प्रसून उसकी बात पूरी होने पर बोला - आपने गजनी फ़िल्म देखी है । जिस तरह आमिर खान को थोङी थोङी देर में भूल जाने की बीमारी थी । वैसी ही बीमारी मुझे भी है । इसलिये आपके घर चलने से पहले  उसका एक नक्शा बना लेते हैं । ताकि वापसी में मैं अपने घर का रास्ता ही न भूल जाऊँ ।
कहते हुये प्रसून ने एक सामान्य सी दिखने वाली प्लेन कापर मैटल शीट टेबल पर बिछा दी । जो वास्तव में दूरस्थ प्रेतवाधा उपचार हेतु एक शक्तिशाली यंत्र का काम करती थी ।
दरअसल वह टीकम सिंह को एक जादुई खेल दिखाने का इच्छुक था । जिसके दो खास कारण थे । एक तो आज वह खुश मूड में था । दूसरे टीकम सिंह गरीब आदमी था । और सबसे  बङी बात ये थी कि जिस तरह का यह मामला था । उसमें कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं थी । ये किसी तरह के आवेशित प्रेत नहीं थे । जिनको वहाँ से निकालना पङता । प्रेतवायु के उपचार के बाद भी सभी को वहीं रहना था । वास्तव में दीर्घकालिक प्रेत पङोसियों में किसी बात पर जरा सा विरोधाभास हो सकता था । जरा सा मनमुटाव हो सकता था । या कोई अन्य अलग सामान्य बात हो सकती थी ।
आगे की बात शुरू करने से पहले उसने आवाज दी - अल्ला बेबी ।
कुछ ही क्षणों में 12 साल की एक लङकी बे आवाज दरबाजा खोलकर अन्दर आकर निशब्द एक चेयर पर बैठ गयी ।
- माम को भी । प्रसून मधुर मुस्कान के साथ बोला । लङकी फ़िर से उठी । और अन्दर जाकर जब दुबारा वापस आयी । तो उसके साथ 28 वर्ष की एक महिला भी थी । दोनों निशब्द अलग अलग चेयर पर बैठ गये । टीकम सिंह बेहद हैरत से ये सब देख रहा था । कंजी आँखो वाली रहस्यमय गुङिया सी अल्ला बेबी पर उसकी निगाह बारबार जाती थी । पर अल्ला एकदम भावशून्य होकर बैठी थी ।
- जेनी । प्रसून एक सिगरेट सुलगाकर बोला - तुमको चुङैल देखना मांगता । एक गाना गाने वाली चुङैल ।
जेनी हल्के से मुस्कराकर रह गयी । उसने ईसाईयों के अन्दाज में सीने पर बाय़ें दांये मस्तक और फ़िर हार्ट के पास उंगली रखकर क्रास बनाया । और शान्त बैठ गयी ।
जेनी ईसाई थी । और अल्ला उसकी डाटर । जेनी प्रसून के यहाँ सर्वेंट के रूप में कार्य करती थी । और घर की पूरी देखभाल का जिम्मा उसी पर था ।  इस बात को कोई नहीं जानता था कि 800 वर्ग गज में बनी यह खूबसूरत कोठी प्रसून की खुद की थी । और व्यक्तिगत रूप से थी । इस बेहद रहस्यमय इंसान के घरवाले तक यह बात नहीं जानते थे । और इसकी वजह थी । प्रसून द्वारा इसके बेहद पुख्ता गोपनीय इंतजाम । और ज्यादातर उसका यहाँ वहाँ रहना ।
कुछ खास परेशानी वाले लोगों को यदाकदा फ़ोन नम्बर मिल जाने पर उसने अपने दो चार ठिकानों पर बुला लिया था । जिससे कुछ लोग इन स्थानों के बारे में जान गये थे । और भटकते हुये आ ही जाते थे । ये सभी स्थान उसके पेरेंट हाउस से बेहद बेहद दूरी पर थे । इसलिये प्रसून के मां बाप इस रहस्य को अब तक नहीं जान पाये थे । उसके माता पिता के बारे में नीलेश उसकी गर्लफ़्रेंड मानसी और उसके गुरु तथा कालेज के टाइम के कुछ साथी ही जानते थे । नीलेश मानसी और गुरु के अलावा उसके खास रहस्यों को कोई भी नहीं जानता था । मानसी भी उसकी पर्सनल बातों को कम ही जानती थी ।
प्रसून के लिये उसका कहना था । वेरी बोरिंग एन्ड वेरी इंट्रेस्टिंग मेन..साला ..ऐसा भी आदमी किस काम का..जिसको बुलबुलों में रस न आता हो ?
अल्ला टेबल पर रखा प्रसून का सेलफ़ोन उठाकर गेम खेलने लगी । प्रसून ने एक गहरा कश लगाया । और सिगरेट एश ट्रे में डाल दी । इसके बाद उसने सुनहले रंग का मोटा मार्कर उठाया । और मैटल शीट पर तीन आयत बनाता हुआ बोला - टीकम सिंह जी ! ये बीच वाला आपका घर । ये इधर गाने वाली चुङैल का खन्डहर मकान । और ये इधर कब्रिस्तान ..ये आपके घर के दरबाजे से मेन रोड का रास्ता । और ये मेन रोड । ये मेन रोड से इस शहर..? का रोड । और इस रोड से ये मेरे घर की सङक । और..फ़िर से वह एक आयत बनाता हुआ बोला ।..ये रहा मेरा घर । जिसमें हम लोग इस समय बैठे हैं ।
कहते हुये उसने खूबसूरत बंगले की शेप वाला एक नाइट लेम्प अपने घर के आयत चिहन पर रख दिया । और अल्ला को गेम बन्द करने को कहकर उसने दूसरा मोबाइल निकाला । और उसे अभिमंत्रित सा करते हुये नाइट लेम्प के अन्दर रख दिया । और बोला । बेबी । अभी चुङैल का फ़ोन रिसीव करने का है ।
अल्ला हौले से मुस्कराई । मानों प्रसून ने सामान्य सी बात कही हो । मगर टीकम सिंह एकदम ही सतर्क होकर बैठ गया ।
..कुछ ही क्षणों में पायल की मधुर रुनझुन रुनझुन सुनाई देने लगी । इस बेहद परिचित ध्वनि को सुनकर टीकम सिंह भौंचक्का सा सतर्क होकर बैठ गया । अल्ला की कंजी आँखे स्थिर हो गयी । और वे चमकती हुयी सी बंगले के माडल पर स्थिर हो गयी ।
मैं आ गयी । अल्ला बदली हुयी आवाज में बेहद महीन झंकृत स्वर में बोली । आग्या दें । किसलिये याद किया ?
योर वेलकम कामिनी जी । प्रसून शालीनता से बोला । आपको आने में कोई परेशानी तो नहीं हुयी ? ये आपके पङोसी टीकम सिंह जी यहाँ बैठे हुये हैं । इन्होंने बताया कि आप गाना बहुत अच्छा गाती हैं । मैं आपकी एक म्यूजिकल नाइट आर्गनाइज कराना चाहता हूँ ।
नहीं । अल्ला फ़िर से बोली । मुझे कोई परेशानी नहीं हुयी । योगीराज आप हँसी मजाक अच्छा कर लेते हैं ।
ओह नो..आय’म सीरियस । प्रसून बोला । दरअसल कामिनी जी..जेनी को किसी चुङैल..इस शब्द के प्रयोग के लिये सारी..प्लीज डोन्ट माइंड..तो कामिनी जी इसे आपके जैसे लोगों के गाने सुनने की ख्वाहिश थी । और ये बात मैं सीरियसली कह रहा हूँ ।
जी..जो आग्या । कहने के बाद कामिनी @ अल्ला सीरियस हो गयी ।
और पायल की पुनः रुनझुन के साथ एक मधुर संगीतमय ध्वनि उस रहस्यमय कमरे में मन्द मन्द गूंजने लगी । जेनी तो मानों मदहोश सी होने लगी । टीकम सिंह भौंचक्का सा इस नजारे को देख रहा था । वास्तव में वह तो इस वक्त यह भी भूल गया था कि वह यहाँ किसलिये आया है ? और उसकी अकेली पत्नी किस हाल में है ?
कृमशः ..।

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 3

कुछ देर तक कमरे में मदहोश करने वाली मधुर ध्वनिलहरी गूंजती रही । प्रसून ने सिगरेट सुलगायी । और अकारण ही मेज पर गोल गोल उंगली घुमाते हुये मानों वृत सा बनाने लगा । अब तक के इस कार्यक्रम का उद्देश्य दरअसल अल्ला को सशक्त माध्यम के तौर पर तैयार करना था । हालांकि जेनी ऐसी बातों की पूर्व अभ्यस्त थी । पर वह फ़िर भी माहौल को हल्का ही रहने देना चाहता था । जब एक चुङैल की मौजूदगी के बाद भी माहौल कतई असामान्य नहीं हुआ । तब उसने मेज के नीचे फ़िक्स एक इलेक्ट्रिक हीट प्लेट पर मौजूद बर्तन में लोबान मिक्स कुछ सुगन्धित पदार्थ डाल दिये । और स्विच आन कर दिया । कुछ ही क्षणों में कमरे में अजीब गन्ध वाला धुँआ फ़ैलने लगा ।
ओके । फ़िर वह अल्ला से मु्खातिब होकर बोला - कामिनी जी..अब बताईये । मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ । आप वहाँ कबसे हैं ? क्यों है आदि आदि ?
जो आग्या योगीराज । कामिनी बोली - ये 82 साल पहले की बात है । उस समय मेरी आयु 31 साल की थी । और मैं अपने पाँच बच्चों और पति के साथ इसी हवेलीनुमा मकान में सुख से रहती थी । काफ़ी बङे इस मकान में मेरे तीन देवर । उनकी पत्नियाँ । बच्चे । और मेरे सास ससुर आदि भी रहते थे । हमारी जिंदगी मजे से कट रही थी ।
मेरे एक देवर का नाम रोशनलाल था । रोशनलाल अक्सर हफ़्ते पन्द्रह दिन बाद सोने चांदी के जेवरात लाता था । और मुझे चुपचाप रखने के लिये दे देता था । ये बात न उसकी पत्नी को मालूम थी । न मेरे पति को । न अन्य किसी को । और इसकी वजह यह थी कि रोशनलाल की पत्नी सु्खदेवी मुँहफ़ट थी । अगर रोशन जेवर उसे देता । तो वह अवश्य पङोस आदि में इसका जिक्र कर देती । एक दो सेर सोने के जेवर उस समय के खाते पीते घर में होना कोई बङी बात नहीं थी । अक्सर कई लोगों के घर होते ही थे ।
पर रोशनलाल का मामला और ही था । वह एक महीने में ही आधा सेर सोना चाँदी जेवरात के रूप में ले आता था । और मेरे पूछने पर कहता कि वह जेवरात गाहने ( गिरवी )  रखने का काम करता है ।
मेरे कमरे में आलमारी के नीचे एक गुप्त स्थान था । जिसमें एक बक्सा फ़िट करके रखा हुआ था । मैं जेवरों को उसी बक्से में डाल देती थी ।
कहते हैं । किसी की हाय कभी न कभी असर दिखा ही जाती है । एक रात हम सब लोग सोये हुये थे । कि अचानक शोरगुल की आवाज पर मैं चौंककर उठ बैठी । हमारे घर में डाकू घुस आये थे । और डयौङी में सास ससुर के पास खङे थे । वे कह रहे थे । तुम्हें पता है । रोशनलाल को हमने मार डाला है । शायद तुम लोग न जानते हो । रोशन एक डाकू था । और हमारा साथी था ।
अभी कुछ दिनों पहले हमने एक शादी वाले घर में डाका डाला था । जिसकी खबर रोशन के मुखबिर से ही मिली थी । लेकिन जब हम डाका डाल रहे थे । तभी एक बुढिया ने सरदार के पैर पकङ लिये । और बोली । अगर हम लोगों ने उसे लूट लिया । तो उसकी इकलौती नातिनी की शादी कभी नहीं हो पायेगी । जिसका कन्यादान मरने से पहले लेने की उसकी बेहद इच्छा है ।
जब यह सब चल ही रहा था । तो अन्दर से चीखने की जोरदार आवाज आई । अन्दर  डकैती डालने गये रोशनलाल ने लङकी के छोटे भाई के गले पर कटार रखते हुये जब सब जेवर निकलवाकर कब्जे में कर लिये । तो उसका छोटा भाई यह कहते हुये.. मैं अपनी जीजी के गहने तुझे नहीं ले जाने दूँगा ..उससे लिपट गया । और वह गलती से रोशनलाल के द्वारा मारा गया । रोशनलाल तेजी से छत पर जाकर नीचे उतरकर घोङे से भाग गया । उसे लङकी की दादी और सरदार के बीच हुयी बात का कुछ पता नहीं था ।
..जेनी बङी दिलचस्पी से यह स्टोरी सुन रही थी । टीकम सिंह तो हैरत के मारे भौचक्का ही हो रहा था । कमरे के वातावरण में कभी कभी प्रसून की गहरी सांस लेने की आवाज ही सुनायी देती थी ।
दाता । वह भावुक होकर बोला । रंग न्यारे । तेरे खेल न्यारे ।
मुखबिर की सूचना गलत थी । अल्ला फ़िर से बोली - बङी मुश्किल से सीता ( विवाह वाली कन्या ) का दहेज जमा हुआ था । और वह परिवार इस इकलौती कन्या के विवाह के चक्कर में कर्जदार हो चुका था ।
सरदार जैसा कट्टरदिल डाकू बुढिया की कहानी सुनकर पसीज गया । लेकिन तब तक होनी अपना खेल दिखा चुकी थी । सीता का भाई गला कट जाने से मर गया था ।
बुङिया को जैसे ही ये पता चला । तो उसने हाय हाय करते हुये - इस नासमिटे का सत्यानाश हो जाय । कहते हुये वहीं दम तोङ दिया । सरदार हतप्रभ रह गया । अच्छा खासा खुशी बधाईयों वाला घर मातम में बदल गया ।
सरदार तेजी से कुछ सोचता हुआ अन्य डाकुओं के साथ घोङों पर नहर के उस स्थान पर पहुँचा । जहाँ रोशनलाल से उसे मिलना था । उसे रोशनलाल पर बेहद गुस्सा था । डाकुओं के कानून के अनुसार औरतों बूढों बच्चों को मारना सरासर गलत था । रोशनलाल मिला तो । पर बेहद घबराया हुआ था । उसके अनुसार वह सोच रहा था कि वे लोग ( उसके दल के ) पीछे से आ रहे होंगे । पर पीछे कोई नहीं था ।
तब उस पर दूसरे गिरोह ने हमला करके उसका सारा माल छीन लिया । उसने किसी तरह भागकर जान बचाई ।
इस दूसरी नयी बात से तो सरदार का खून ही खौल उठा । उसे यह भी लगा कि रोशन शायद झूठ बोल रहा हो । वहीं दोनों में तकरार बङ गयी । और सरदार ने रोशन को काटकर नहर में डाल दिया । इसके बाद तीसरे दिन रात को जब सरदार चुपके से दूसरे जेवर लेकर सीता के घर पहुँचा । तो उसने पेङ से लटककर फ़ाँसी लगा ली थी । दुखी मन से सरदार लौट आया ।
तबसे सरदार बहुत दुखी रहने लगा । वह इस पाप और बुङिया का शाप अपनी आत्मा पर बोझ की तरह महसूस करने लगा था । तब किसी साधु आत्मा ने उसे परामर्श दिया कि जो होना था । वह तो हो गया । अब अगर वह दस गरीब कन्याओं का विवाह धूमधाम से करवा दे । तो इस पाप का असर ना के बराबर रह जायेगा ।
क्रमशः ।

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 4

कहते हैं । इंसान को एक पल की खवर नहीं होती कि
अगले ही पल क्या हो जाय । शायद बुढिया का शाप फ़लीभूत होने जा रहा था । इसीलिये मेरे देवर दीनदयाल जो छत पर सोये हुये थे । वे ये सोचकर कि घर में डाकू घुस आये हैं । चुपचाप बंदूक निकाल लाये । और एक सुरक्षित स्थान से उन्होंने डाकू को निशाना बना दिया । बस यही गङबङ हो गयी । गोली चलते ही घर में एकदम भगदङ सी मच गयी ।  डाकुओं ने भी मोर्चा ले लिया । और आनन फ़ानन दीनदयाल मारा गया । उसे बचाने के चक्कर में उसकी पत्नी भी मर गयी ।  दो हत्या करने के बाद डाकू घर से निकलकर भाग गये ।
एकदम घर में हुयी तीन मौतों का सदमा मेरे बूढे सास ससुर सह न सके । और उन्होंने दूसरे ही दिन दम तोङ दिया । पटवारी के नाम से प्रसिद्ध मेरे एक देवर जो उस दिन घर से निकलकर भाग गये थे । उन्हें भी कुछ दिनों बाद रास्ते में अग्यात कारणों  से मरा पाया गया । मेरी दोनों देवरानियाँ अपने बच्चों के साथ अपने मायके चली गयीं ।
हर वक्त बच्चों से चहचहाती पर अब वीरान सी रहती उस हवेली में मैं अपने पांच बच्चों और पति के साथ सोने चाँदी से भरे बक्से के साथ अकेली ही रह गयी थी । कभी कभी मुझे इस घटना पर दुख होता था । पर कभी मैं अजीब से लालच में आकर यह बात सोचती कि इस घटना ने ही तो आज मुझे किसी महारानी के समान धनवान बेहद धनवान दिया था । और ये बात मेरे पति भी नहीं जानते थे ।
अब मुझे एक डर यह भी हो गया था कि अगर मैंने अपने पति को यह बात सही सही बता दी । तो वो पता नहीं इसका क्या मतलब निकालें । अतः मैं बात छुपाये ही रही । मैंने सोचा । किसी दिन किसी बहाने से बक्से का खुलासा कर दूँगी । कि यहाँ शायद जमीन में कुछ दबा हुआ है । लेकिन इसकी जरूरत ही नहीं आयी । बूढी का शाप अपना काम कर रहा था ।..क्योंकि उधर हमारे पूरे परिवार के खत्म हो जाने से मेरे पहले से ही धार्मिक पति और भी धार्मिक हो गये थे । और एक दिन मृतक अनुष्ठान की किसी क्रिया के लिये वे मेरे बङे पुत्र गिरीश के साथ गंगास्नान हेतु गये । जहाँ नहाते समय गिरीश भंवर में फ़ँसकर डूबने लगा । और उसे बचाने के चक्कर में मेरे पति भी डूब गये । बेहद चढी हुयी उफ़नती गंगा में कोई भी उन्हें बचाने का साहस भी न कर सका ।
और इस तरह उनकी लाश भी नहीं लौटी । खोजबीन करते करते किसी जानकार द्वारा खबर ही आ गयी । यही बहुत बङी बात थी । तीन महीने में ही हँसता खेलता परिवार इस तरह मौत की भेंट चढ गया था । मानों यहाँ पहले कोई रहता ही न था । मेरी माँग का सिन्दूर पुँछ चुका था । वीरान हवेली काटने को दौङती थी ।
पर ना जाने क्यों बक्से में भरे जेवरात का आकर्षण अभी भी मेरे लिये उतना ही था । पति के क्रियाकर्म कराने के बाद मायके वालों की सलाह पर मैं हवेली को ताला लगाकर अपने चार बच्चों के साथ मायके आ गयी । धन सम्पदा से भरा बक्सा अब भी हवेली में ही मौजूद था । जिसका राज सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे सीने में दफ़न था ।
..मायके आकर आठ महीने तो मैंने बेहद संयम से काटे । पर शीघ्र ही शरीर की भूख मुझे तङपाने लगी थी । और इसका एक ठोस कारण भी था । शादी से पहले जब मैं जंगल में पशु चराने जाती थी । तो गाँव का ही एक लङका बांकेलाल जो मुझसे प्रेम करता था । अक्सर ही मुझे बाँहों में लेकर मेरे स्तन सहलाता था । वह पुआल के ढेर पर मुझे गिराकर खेलने का बहाना करते हुये मेरी छातियों को भींच देता था । अपने पुष्ट नितम्बों से सटे हुये उसके अंग उठान से मैं इतना विचलित हो जाती कि समर्पण करने को दिल करता था । और आखिरकार एक दिन हमारी भावनाओं का बाँध टूट ही गया । उस दिन बांके ने मेरा कौमार्य भंग कर दिया । जवानी के इस खेल में हमें ऐसा आनन्द आया कि हम रोज रोज ही अंजाम की परवाह किये बिना संभोग करने लगे । और परिणाम स्वरूप मुझे एक महीने का गर्भ ठहर गया ।
अभी मैं ठीक से इस बारे में जान ही पायी थी कि खुशकिस्मती से अगले ही महीने मेरी शादी हो गयी । और मैं ससुराल आ गयी । मेरे पेट में एक माह का गर्भ था । ठीक आठ महीने दस दिन बाद मैंने बांके के बच्चे को जन्म दिया । जिसका नाम गिरीश रखा गया । पर अब वह मेरे पति का बच्चा था । और असली सच सिर्फ़ मुझे ही पता था ।
खैर विधवा होने के बाद जब मैं फ़िर से मायके रहने लगी । तो आते जाते बांके से मेरी नजरें चार हो ही जाती थी । और मैंने महसूस किया । बांके अब भी लालायित होकर मेरी तरफ़ देखता है । पर हिम्मत नहीं कर पाता । मेरे दिल में  दबी हुयी पुरानी चिंगारी भङक उठी । और मैं उसकी तरफ़ देखकर मुस्करा दी । इसके बाद स्पष्ट इशारा करने हेतु उसे कुंए से बाल्टी भरते समय मैंने कुंए में झांकने का बहाना करते हुये अपने स्तन उसकी पीठ से सटा दिये । यह इशारा काफ़ी था ।
दूसरे दिन दोपहर में जब मैं पेङ के सहारे खङी थी । बांके ने पीछे से आकर ब्लाउज के ऊपर से मेरे स्तन पर हाथ रख दिये ।..और हम दोनों अरहर के खेत में चले गये । वासना के अन्धों को कुछ दिखाई नहीं देता । यही बात हमारे ऊपर लागू हुयी ।
लेकिन दूसरे हमें देख रहे हो सकते हैं । मोती नाम का एक गाँव का लङका हमें देख रहा था ।
..अभी हम वासना के झूले में झूल ही रहे थे कि हमें आसपास लोगों का कोलाहल सुनाई दिया । और देखते ही देखते कई लोग अरहर के खेत में घुस आये । उन्होंने बांके के बाल पकङकर उसे खींच लिया । और जूते मारते हुये गाँव की तरफ़ ले जाने लगे । इत्तफ़ाकन उन लोगों में मेरा भाई भी था । वह मुझे लगभग घसीटता हुआ गाँव की तरफ़ ले जाने लगा । गाँव के लोगों को  इस अनाचार पर इतना क्रोध था । मानों वे हम दोनों को मार ही डालेंगे ।
खैर..प्रसून जी । इंसान की गलती कितनी ही बङी क्यों न हो । उसे एकदम कोई नहीं मार देता । शाम को बङे बूङों ने सोचविचार कर पंचायत रखने का फ़ैसला किया । ये पंचायत दस दिन बाद की रखी गयी थी ।
यदि बांके कुँवारा होता । तो मैं जानती थी कि पंचायत के फ़ैसले से उसे मुझ विधवा के साथ शादी करनी पङती । पर वह न सिर्फ़ शादीशुदा था । उसके चार बच्चे भी थे । तब पंचायत क्या फ़ैसला करेगी ? ये सोचकर मेरा दिल काँप जाता था ।..मैंने घर से निकलना बन्द कर दिया था । अतः मुझे बांके के बारे में कोई खबर नहीं थी ।
पंचायत का दिन करीब आ रहा था । उससे ठीक एक दिन पहले बांके ने गाँव के बगीचे में पेङ से फ़ाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली । यह खबर जैसे ही मेरे पास आयी । मेरा दिल काँप कर रह गया । अब मैं इस मामले में अकेली थी । पंचायत क्या फ़ैसला करेगी ? हो सकता है । मुझे चरित्रहीनता के आधार पर गाँव से निकाल दिया जाय । उस हालत में अब मैं कहाँ जाऊँगी ? हालाँकि मैं अच्छी खासी सेठानी थी । पर एक नितान्त अकेली औरत सिर्फ़ धन के सहारे जीवन नहीं बिता सकती । इसलिये मेरे दिल में भी बारबार यही विचार आ रहा था कि मुझे भी फ़ाँसी लगाकर आत्महत्या कर लेनी चाहिये । पर जेवरातों से भरा बक्सा मुझे कोई भी ऐसा कदम उठाने से रोक रहा था ।..
कहते कहते अचानक अल्ला रुक गयी । और झूलती हुयी सी बेहोश होकर चेयर पर लुङक गयी । टीकम सिंह घबरा गया । जेनी ने कुछ उलझन के साथ प्रसून की तरफ़ देखा । उसके मुँह से निकला - सारी ! आरेंज जूस ।
कृमशः ।

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 5

टीकम सिंह के लिये अगले दस मिनट  बेहद संशय में गुजरे । अचानक उस सुन्दर गुङिया सी लङकी को क्या हो गया था । ये सोचकर वह बेहद दुखी था । पर जेनी निर्विकार भाव से बैठी थी ।
प्रसून ने अल्ला के ऊपर से कामिनी का आवेश हटा दिया था । और फ़िर उसके सर पर हाथ फ़िराता हुआ । प्यार से उसके गाल थपथपा कर वह बोला - ओ के डियर !
अल्ला ने मिचमिचाकर आँखे खोल दीं । जेनी ने मशीनी अन्दाज में जूस का गिलास उसको थमा दिया ।
माई बाप ! टीकम सिंह दुखी सा उत्सुकता से बोला - इन्हें अचानक क्या हो गया था ?
वैसे प्रसून किसी और परिस्थिति में इस सवाल का जबाब न देता । पर उसे मालूम था कि जेनी के मन में भी यही उत्सुकता थी ।
अतः वह बेहद सामान्य स्वर में बोला - खुश्की । प्रेत आवेश के दौरान होने वाली खुश्की ।
अब प्रसून कुछ अलग ही सोच रहा था । क्या बाकी आवेश भी अल्ला के माध्यम से ही कराये । अभी खेल शुरू ही हुआ था । और अल्ला मात्र एक बच्ची थी । अतः शरीर क्षमता के अनुसार वह कितना प्रभावित हो सकती है । इसका क्या पता ? लेकिन अगर वह अल्ला को माध्यम नहीं बनाता । तो वहाँ सिर्फ़ जेनी ही बचती थी । तो फ़िर बीच बीच में अन्य सहयोग के लिये वहाँ कौन होगा । अल्ला माध्यम तो बन सकती थी । पर अन्य सहयोग शायद न कर सके । टीकम सिंह किसी मतलब का न था । उसको यदि बेहद तिकङम से माध्यम बना भी दिया जाय । तो फ़िर संभावित प्रेतवार्ता समझौता आदि के लिये मुद्दई कौन होगा । दूसरे जब वह यह सब प्रत्यक्ष रूप से देखेगा । इसमें शामिल रहेगा । तभी मामला बनेगा । अतः कुल मिलाकर अल्ला ही बचती थी ।
एक और बङी वजह भी थी । प्रसून अल्ला को इस खेल का कुशल खिलाङी बनाने का इच्छुक था । जो कि जेनी की भी इच्छा थी । अतः उसने फ़िर से अल्ला को ही माध्यम बनाने का फ़ैसला किया । और जेनी से बोला - ग्लुकोन C ।
जेनी ने तुरन्त आदेश का पालन किया । और अल्ला फ़िर से दो गिलास भरपूर ग्लूकोन C  पीकर एक नयी ऊर्जा के साथ तैयार हो गयी ।
अल्ला की सुन्दर कंजी आँखे फ़िर से उसी टेबल लेम्प पर स्थिर हो गयी । और वह बोली - लेकिन पंचायत होने की बात ही खत्म हो गयी । गाँव के बुजुर्ग औरत आदमियों सज्जन लोगों ने तय किया । अब गलती हुयी सो हुयी । कामिनी के भी छोटे बच्चे हैं । कल को वह भी कुछ उल्टा सुल्टा कर ले । इससे क्या लाभ ? अतः वह बात वहीं के वहीं खत्म करके मुझे समझा दिया गया । अगले कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया । और मैं फ़िर से पशु चराने जाने लगी । इस घटना के बाद कामवासना का भूत मेरे सर से एकदम ही गायब हो गया ।
लेकिन मेरी और सभी गाँव वालों की यह बङी भारी भूल थी कि सब कुछ सामान्य हो चुका है । बूङी का शाप फ़िजा में अब भी तैर रहा था ।
एक दिन जून की तपती दोपहरी में जब मैं नहर के किनारे पेङ की ठन्डी छाँव में खङी पशु चरा रही थी । मुझे अपने पीछे से कुछ लोगों के भागने की आवाज सुनाई दी । मैंने पीछे मुङकर देखा । और मेरे होश उङ गये । अपने पशुओं का ख्याल छोङकर मैं तेजी से गाँव की तरफ़ भागी । पर मैं गाँव से 4 किमी दूर थी । और ये भी जानती थी कि मेरे भागने की कोशिश व्यर्थ है । पर मौत को सामने देखकर आदमी हर सूरत में खुद को बचाने की कोशिश करता है ।
बचाओ..अरे कोई बचाओ । चिल्लाती हुयी जब मैं कुछ ही दूर भाग पायी थी । हवा में सनसनाता हुआ एक अद्धा ( आधी ईंट ) जोरदार तरीके से मेरी पीठ में लगा । और मैं लहराती हुयी गर्म जमीन पर गिर पङी ।
दरअसल..बांके के मरने के बाद उसकी पत्नी लीला अर्धविक्षिप्त हो गयी थी । और नहाने धोने आदि का त्याग कर देने के कारण वह जिन्दा चुङैल लगती थी । उसके मिट्टी भरे रूखे उलझे बाल उसे और भी खतरनाक बना देते थे । अपनी बरबादी का कारण वह मुझे ही समझती थी । उसका पुत्र जग्गीलाल जो जगिया के नाम से प्रसिद्ध था । वह भी मुझे ही दोषी मानता था । ये दोनों अक्सर मुझे धमकाते भी रहते थे । पर उनकी धमकी सुनने के अलावा मेरे पास और चारा भी क्या था । लेकिन ये कोई नहीं जानता था कि वे मेरी हत्या भी कर सकते हैं ।
मेरे जमीन पर गिरते ही लीला ने मुझे दबोच लिया । और मेरी छाती पर सबार होकर बैठ गयी ।
मार इस कुतिया को । मार अम्मा ..। मुझे जगिया की आवाज सुनाई दे रही थी ।
लीला ने मेरा ब्लाउज फ़ाङ डाला । और सीने पर प्रहार करने लगी । गर्म जमीन । ईंट की चोट । और सीने पर बैठी बजनीली औरत । मेरी चेतना डूबने लगी । और मैं बेहोश हो गयी ।
लीला ने मेरे साथ आगे क्या क्या किया ? मुझे नहीं मालूम ।
दोबारा कितने समय बाद । कितने दिन बाद । या कितने महीने बाद । मैं जागृत हुयी । मुझे नहीं पता । इस बीच के समय में मैं कहाँ रही । मुझे नहीं पता ।
खैर..दोबारा जागृत होने पर मुझे पता चला कि मैं गन्दे बदबूदार एक कीचयुक्त गढ्ढे में लेटी हुयी थी । एकदम चौंककर मैं असमंजस से उठ बैठी । मैं एकदम नंगी थी । मैंने कुछ बोलना चाहा । पर मेरी आवाज ही नहीं निकली ।
..धीरे धीरे मुझे सब कुछ याद आने लगा । लीला । मेरे पशु । मेरा गाँव । मेरे ईंट मारना । और मैं एकदम चिल्लाने को हुयी । अबकी बार आवाज तो निकली । पर जैसे कोई मच्छर भिनभिना रहा हो । मुझे ये सब कुछ बङा अजीव सा लगने लगा । मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर मेरे साथ हुआ क्या है ?
प्रसून के कमरे में गजब का सन्नाटा छाया हुआ था । उसने घङी पर निगाह डाली । शाम के सात बज चुके थे ।
उसने जेनी की ओर देखा । तो उसे बस ऐसा लगा । मानों वह कोई दिलचस्प हारर मूवी देख रही हो । कमाल की जिगरावाली है । प्रसून ने सोचा । लेकिन टीकम सिंह की हालत खराब थी । वह महीनों से खाट तोङती अपनी पत्नी को भूल ही चुका था । और उल्लुओं की तरह आँखे झपकाता हुआ । हर नई परिस्थिति को देख रहा था ।
बेङा गर्क..भूतो तुम्हारा । प्रसून फ़ीके स्वर में बोला - आज का डिनर ही चौपट कर दिया ।
फ़िर उसने मोबाइल निकाला । और डायलिंग के बाद बोला - यस ! चार लोगों के लिये पिज्जा । बट  डिलीवरी टाइम नाइन पी एम ।
ओ तो ठीक है.. सर जी ! दूसरी तरफ़ से आवाज आई । पर डिलीवरी कौन से शमसान या कब्रिस्तान पर होनी है । आज भूतों को पार्टी दी है क्या ?
 कोई और समय होता । तो नीलेश के इस मुँह लगे दोस्त को प्रसून एक ही बात कहता - ओह शटअप । लेकिन आज उसका मूड खुश था । इसलिये बोला -  आज भूत घर पर ही आ गये ।
सर जी ! दूसरी तरफ़ वाला घिघियाया - मैंनू बी किसी सुन्दर भूतनी सूतनी से मिलवाओ ना । सुना है ..।
शटअप ! कहकर उसने फ़ोन काट दिया ।
कृमशः ।

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 6

शाम गहराने लगी थी । जेनी ने उठकर उस रहस्यमय कमरे की खिङकियाँ खोल दीं । प्रसून ने एक नयी सिगरेट सुलगायी । और अल्ला की ओर देखकर सधे स्वर में बोला - आगे क्या हुआ । कामिनी जी ?
मैं ..। अल्ला भावहीन स्वर में बोली - गढ्ढे से बाहर आ गयी । और गाँव की तरफ़ चलते हुये अपने घर की तरफ़ जाने लगी । तब मैंने गौर से देखा कि वह मेरा गाँव नही था । बल्कि कोई और ही जगह थी । अब मैं कहाँ जाऊँ ? मैंने सोचा । दूसरे मुझे अपने नंगे होने पर शर्म आ रही थी । लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का था कि इस हालत में भी दो चार लोग जो आसपास से गुजर रहे थे । वे मुझे देखकर कुछ नहीं कह रहे थे । अभी मैं और कुछ सोच पाती कि हवा के तीन चार झोंके से सरसराते हुये मेरे पास आकर रुक गये । और मुझे भिनभिन जैसी दो आवाज सुनाई दीं । ये चुङैल यहाँ आ गयी ।..अब कहाँ जा रही है । कुतिया.. ( गाली )
अब तू औरत नहीं चुङैल है ।..इसके बाद..?
नो..अचानक प्रसून ने टोका - नो.. इसके बाद । अब सीधा तुम अपनी ससुराल वाली हवेली पर आ जाओ ।
वह जानता था । एक नयी प्रेतनी के साथ क्या क्या होता है ? कैसे उसकी रैगिंग होती है ? कैसे उसे नियम कायदे प्रेत जीवन आदि बताया जाता है ।
अल्ला मोहक अन्दाज में मुस्करायी । प्रेतों के स्वछन्द जीवन में इंसान के सामाजिक नियमों बन्दिशों का क्या काम ।
जी..। बह फ़िर बोली । प्रेतों से मुक्त होने के बाद.. । मुझे फ़िर से जेवरात के बक्से की याद आने लगी । मुझे खूब पता था कि अब वह मेरे किसी काम का नहीं है । पर एक औरत का गहनों के प्रति मोह । और किसी सुरक्षित घर का लालच मुझे फ़िर से हवेली ले गया । मैं अपना मायका बच्चे सब भूल चुकी थी । और अब मुझे अभिशप्त प्रेतभाव में रहना था । वो भी पता नहीं कब तक । कहकर वह चुप हो गयी ।
जेनी के मुँह से गहरी साँस निकली । उसने अपने सीने पर क्रास बनाया । प्रसून अल्ला के बोलने का इंतजार करता रहा । जब वह आगे बोली ही नहीं । तो प्रसून के मुँह से निकला - उसके बाद ?
जी ! अल्ला मानों उलझकर बोली , " उसके बाद । उसके बाद क्या ? तबसे मैं इसी हालत में प्रेत जीवन जीती हुयी अपनी हवेली में रह रही हूँ ।
रब्बा ! प्रसून ने गहरी सांस ली , " ये क्या बोल रही है ? मूवी का दी एन्ड हो गया । और सीता जी लंका में ही रह गयीं ।
अरे भाई ! वह बोला , " मेरा मतलब है । ये टीकम सिंह जी की वाइफ़ को क्यों परेशान कर रही हो । इसने तुम्हारा क्या बिगाङा है ?
क्या..? अल्ला के मुँह से कामिनी अजीब स्वर में बोली , " मैं भला उसे क्यों परेशान करूँगी । इन लोगों की वजह से तो मुझे अच्छा ही लगता है । उस खाली वीरान हवेली में इनको आते जाते देखते हुये मेरा समय भी कट जाता है । दूसरे ये लोग शाम को { भेंस की वजह से } हवेली में दिया बाती भी करते रहते हैं । मैं तो जितना मुझसे बनता है । इनकी सहायता ही करती हूँ ।
प्रसून के हाथों से मानों तोते उङ गये । इतने प्रेत आवेश का बस ये मतलब निकला था कि उसे हवेली की कहानी मालूम पङ गयी थी ।
उसने एक मिनट कुछ सोचा । फ़िर बोला - तो..ये ही बता दो । टीकम सिंह की पत्नी को कौन तंग कर रहा है ?
प्रसून की बात सुनकर अल्ला कुछ क्षण के लिये मौन हो गयी । फ़िर उसकी सांस तेज तेज चलने लगी । चेहरे की मांसपेशिया तनने लगी । और चेहरा फ़ूलने लगा । करीब दो मिनट उसकी यह स्थिति रही । फ़िर वह कुछ शांत होकर पहले की अपेक्षा भारी स्वर में बोली - मैंने पता किया है ..कोई भी नहीं ।
व्हाट ! बेहद आश्चर्य से प्रसून के मुँह से निकला ।
इससे पहले कि बह और आश्चर्य के सागर में गोते लगाता । अल्ला बोली - योगी जी आप समझते ही हो । मुझे अब जाना है । आपको यदि आवश्यकता हो । तो फ़िर से बुला लेना ।
बेहद हैरानी में डूबा प्रसून तुरन्त हाँ ना के बारे में कोई फ़ैसला न कर सका । और स्वतः ही उसके मुँह से निकल गया - ओ के..।
अल्ला फ़िर से इस तरह कुर्सी पर फ़ैल गयी । मानों गहरी नींद में हो । प्रसून ने जेनी को इशारा किया । जेनी ने उसे उठाकर विस्तर पर लिटा दिया ।
ओ माय गाड ! थका हुआ सा प्रसून बोला ।
उसने टीकम सिंह के चेहरे की तरफ़ देखा । उसके चेहरे पर भी उलझन के भाव मौजूद थे । जेनी अन्दर जा चुकी थी । प्रसून उठकर छत पर आ गया । और टहलने लगा । टीकम सिंह उसके साथ ही था ।
फ़िर कुछ देर बाद वह नीचे उतर आया । और ड्राइंग रूम में टीवी देखती हुयी जेनी के पास बैठ गया । टीकम सिंह भी झिझकता हुआ बैठ गया । अचानक प्रसून जेनी से इस तरह बोलने लगा । मानों चाइनीज भाषा में बात कर रहा हो चिंगा पो..इन्नी पां.हूचे जा ।
टीकम सिंह अकबकाया सा हैरानी से उसका मुँह देखने लगा । अपनी बात पूरी करने के बाद प्रसून वापस अपने विशेष कक्ष में आ गया । टीकम सिंह उसके पीछे पीछे आने को हुआ कि तभी जेनी ने उसे रोक दिया - आप यहीं रहिये । वह बेचारा मोम के पुतले की तरह फ़िर से बैठ गया । ये गङबङझाला उसके समझ के बाहर थी । अब उसे घर में बीमार पङी अकेली असहाय पत्नी की याद हो आयी । जिसे पानी देने वाला भी कोई नहीं था ।
रात का अंधेरा फ़ैल चुका था । साढे आठ के लगभग टाइम होने जा रहा था । उसकी समस्या तो हल हुयी नहीं । उल्टे यहाँ आकर वह फ़ँस और गया था । भगवान जाने उसकी पत्नी उस भूतिया जगह में किस हालत में होगी ?
बङा नाम सुना था । इस प्रसून का । पर ये तो एकदम बेकार ही निकला । उस बेचारी गुङिया सी सुन्दर लङकी को खामखाँ परेशान करता हुआ मोबायल ओबायल पर नोटंकी करता रहा । न भूत पकङ पाया । न कुछ । खामखाँ मैं इसके चक्कर में आ गया । शक्ल से भी तो बाबा नहीं लगता । कल का लङका ..ये जाने भूत बलाय क्या चीज होती है ? अच्छे अच्छों की टट्टी निकल जाती हैं । फ़िर भी भूत काबू में नहीं आते । मुझे नहीं लगता कि ये कुछ कर पायेगा ।
ऐसी ही तमाम बातें सोचता हुआ टीकम सिंह मन ही मन फ़ैसला कर रहा था कि आगे उसे क्या करना चाहिये । और उसने फ़ैसला कर भी लिया कि प्रसू्न के बाहर आते ही उससे विदा होकर वह सीधा अपने घर जायेगा । और कल सल किसी अच्छे बाबा की तलाश करेगा । पर न जाने कितनी देर में बाहर आयेगा । ये कमबख्त । जब तेरे वश का कुछ नहीं है । तो मुझे जाने दे भाई ।
कृमशः 

गुरुवार, अप्रैल 21, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 7

जब प्रसून वापस दोबारा अपने कक्ष में पहुँचा । तो उस वक्त तक कमरे से लोबान आदि बूटियों की कसैली गंध खत्म हो चुकी थी । और कमरा किसी इलेक्ट्रिक क्वाइल से भीनी भीनी खुशबू से महक रहा था । वह कमरे के बीचोंबीच पदमासन में बैठ गया । और उसके मुँह से निकलने लगा - अलख बाबा अलख..अलख बाबा अलख..अलख बाबा अलख..।
करीब आठ मिनट बाद उसके कानों में गैव आवाज सुनायी दी ।..तेरा कल्याण हो ।
प्रणाम गुरुदेव..! वह बोला ।
आयुष्मान भव । कीर्तिमान भव । बाबाजी की आवाज सुनाई दी ।..बताओ वत्स...?
इसके बाद प्रसून करीब 15 मिनट बाबाजी से बात करता रहा । और फ़िर अन्त में प्रणाम करके कमरे से बाहर आ गया । टीकम सिंह मानों बेकरारी से उसका ही इंतजार कर रहा था । वह एक ही बात सोच रहा था । बस पता नहीं कितने देर में मिलेगी ?
प्रसून ने फ़िर रहस्यमय अन्दाज में जेनी से कुछ बात की । और टीकम सिंह के साथ बाहर खङी स्कोडा के पास आ गया । उसे टीकम सिंह के मन के भाव पता लग चुके थे ।
अतः बोला - भूत बहुत बङा वाला है । मेरे से वश में नहीं हो रहा ।..लेकिन चलिये । आपको आपके शहर तक छोङ दूँ । बिकाज मुझे भी उसी रास्ते आगे जाना है ।
टीकम सिंह बहुत खुश हुआ । उसका बस का किराया जो बचने वाला था । वह पहली बार ऐसी शानदार गाङी में बैठने वाला था । जरूर दो लाख से कम नहीं आयी होगी ? उसने मन में सोचा ।
प्रसून जैसे ही गाङी का डोर बन्द करने वाला था । उसे डिलीवरी ब्वाय की आवाज सुनायी दी - सर जी हाट पिज्जा ।
अपने ख्यालों में उलझा प्रसून चौंका । फ़िर उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । और बोला - नौ बजकर तीन मिनट । यानी तीन मिनट लेट । यही है तुम्हारी सर्विस ।
डिलीबरी ब्वाय ही ही करके हँसा ।
- हँसता क्यूँ है ?
- सर जी आप बङे क्यूट हो । शादी क्यों नहीं कर लेते ।
- बाइक अन्दर खङी कर । और मेरे साथ चल । आज तेरी शादी कराता हूँ । क्या नाम है तेरा ?
अगले पन्द्रह मिनट में वह तीनों गाङी में बैठे टीकम सिंह के घर जा रहे थे । भानु नाम के उस डिलीवरी ब्वाय को प्रसून ने उसके मालिक को फ़ोन करके अपने साथ ले जाने को कह दिया था ।  वहाँ की किसी आवश्यकता और वापसी में वह प्रसून के साथ रहने वाला था । भानु वैसे प्रसून से झेंपता था । लेकिन नीलेश के मजाकिया स्वभाव से सभी उससे हँस बोल लेते थे ।
शहर के ट्रेफ़िक से उलझने में आधा घन्टा लग गया । और इसके बाद अगले आधे घन्टे से भी कम समय में प्रसून भानु के साथ टीकम सिंह के घर में मौजूद था । टीकम सिंह को तो यूँ लग रहा था । मानों वह अविश्वसनीय तरीके से हवा में उङकर आया हो ।
दरअसल बाबाजी से हुयी बातचीत में उसे इस कहानी का अजीब रहस्य पता लगा था । सीता ने ही मरने के बाद अपनी शेष आयु के चलते टीकम सिंह की पत्नी के रूप में जन्म लिया था । और वह अपनी शादी की ख्वाहिशों के चलते ही मरी थी । इसलिये टीकम सिंह की ही पत्नी बनी । लेकिन टीकम सिंह उसकी ख्वाहिश पूरी करने दोबारा मनुष्य कैसे बन गया ? इस बात की प्रसून को हैरानी थी ।
तब बाबाजी ने बताया । टीकम सिंह भी सीता के मरने के कुछ ही दिनों बाद हैजे से अकाल मौत मर गया । वास्तव में अभी उसके कर्म संस्कार और सृष्टाजोङी इसी समय के लिये सीता से ही बँधे { लिखे } थे । अतः मरने के बाद । कुछ समय तक इधर उधर भटकने के बाद । दोनों ने फ़िर से जन्म लिया । और समय आने पर पति पत्नी बन गये ।
सीता की एक इच्छा तो पूरी हो गयी । पर उसे अपने लुटे हुये गहनों की बात दिल से नहीं निकली । जिनसे सज संवरकर वह दुल्हन बनी डोली में बैठने की इच्छुक थी । उसी कर्म संस्कार के चलते वह उसी हवेली के पास आ गयी । जहाँ उसके गहने मौजूद थे । उस गहनों से जुङी हुयी माया की वजह से ही वह बीमार थी । और ठीक नहीं हो रही थी । जब भी वह भेंस के काम से हवेली जाती । तो उसे ऐसा क्यों लगता । यहाँ इस हवेली से उसका कोई नाता है । वह टीकम सिंह के बाहर जाने  के बाद घन्टों हवेली में घूमती रहती ।  यह बात खुद टीकम सिंह को भी पता नहीं थी ।
अब टीकम सिंह की पत्नी के ठीक होने का एक ही रास्ता था । वे गहने जिसमें उसकी चेतना उलझी हुयी है । उसे मिल जाते । दूसरे इसमें उसकी बूङी दादी की उसे अपने पैत्रक गहने पहनाकर डोली में विदा करने की इच्छा भी आग में घी डाल रही थी ।
अतः प्रसून उँगली में फ़ँसे हुये छल्ले को घुमाता हुआ भानु और टीकम सिंह के साथ उसी भुतहा हवेली में घुस गया ।
कृमशः

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 8

आफ़्टर 10 मन्थ । यानी दस महीने बाद ।
नीलेश का शानदार आशियाना । मानसी विला ।
 सुबह के आठ बजे थे । इत्तफ़ाकन इस वक्त मानसी विला में प्रसून नीलेश और मानसी तीनों ही मौजूद थे ।
प्रसून बाथरूम में था । और नीलेश वाचिंग टीवी । मानसी इन द होम ।
कुछ ही क्षणों में मानसी उबासियाँ सी लेती हुयी उसी कक्ष में आयी । उसने पेट पर हाथ फ़िराया । और एक लम्बी नकली डकार मारी - आ.आ.आ.ड ।
ये क्या है ? नीलेश झुँझलाकर बोला ।
ये क्या नहीं हैं । वह लट को पीछे फ़ेंककर बोली - बल्कि इसको " राग डकार " बोलते हैं । तुम साले मर्द अपनी महबूबा को इतना केला खिलाते हो । डकार नहीं मारेगी । तो बेचारी क्या करेगी ?
मुझे ! वह बुरा सा मुँह बनाकर बोला - " राग पाद " बजाना बहुत अच्छी तरह आता है । तुझे सुनाऊँ क्या ?
..ओ.भाई..भाई..भाई..प्रसून को टावल से बाल रगङते हुये आता देखकर दोनों एक दूसरे को मुँह पर उँगली रखकर चुप रहने का इशारा करने लगे ।
तभी फ़ोन की घन्टी बजी । नीलेश ने फ़ोन रिसीव किया । और फ़िर प्रसून की तरफ़ बङाता हुआ बोला - भाई जेनी का फ़ोन । प्रसून हूँ हाँ..यस ..या.. करता हुआ फ़ोन सुनता रहा ।
दूसरी तरफ़ फ़ोन पर आगे की बात टीकम सिंह ने की थी ।
वह प्रसून की कोठी पर आया हुआ था ।
प्रसून ने उसी रात.. उसकी सभी समस्याओं का हल कर दिया था । कामिनी से..फ़िर से बात करके ..उसने कुछ दिनों बाद वो जेवरातों का बकसा निकलवा दिया था । अपने सोर्स का इस्तेमाल करते हुये । उसने सीता के पैत्रक गहने छोङकर..वाकी सभी गहनों को मनी में कनवर्ट करवा दिया था ।
उसकी सलाह के अनुसार टीकम सिंह ने अपना घर और वो पुरानी हवेली { कामिनी की रजामन्दी से } तुङवाकर दोनों की जगह एक कामिनी पब्लिक स्कूल बनवा दिया था । उस स्कूल से दस कदम दूर उसने एक छोटा सा घर खरीद लिया था ।  टीकम सिंह की पत्नी अब पूरी तरह से स्वस्थ थी । उनके कोई सन्तान हो सके । इसके लिये भी प्रसून ने उन्हें कुछ साधुओं के बारे में बताते हुये सुझाव दिये थे ।
कामिनी पब्लिक स्कूल की तिमंजिला छत पर एक बङा हालनुमा कमरा बना हुआ था । जिसमें अब कामिनी रहती थी । उसमें एक सजे बेड से लेकर खास जरूरत की हर चीज मौजूद थी ।
बन्द हो चुके कब्रिस्तान की तरफ़ एक बङी दीवाल बना दी गयी थी । इसके अलावा उस इलाके में टीकम सिंह ने कुछ छायादार वृक्ष और इंडिया मार्का नल भी लगवाये थे ।
और कहने की आवश्यकता नहीं । ये सब लगभग अनपढ टीकम सिंह भलीभांति वन एन्ड ओनली प्रसून के सहयोग से ही कर सका था । आज ये सब कार्य पूरा हो चुका था । और स्कूल का उदघाटन था । जिसके लिये ही टीकम सिंह प्रसून के घर उसको बुलाने आया था ।
फ़ोन रखने के बाद प्रसून ने संक्षिप्त में नीलेश और मानसी को सब बात बतायी । और फ़ौरन दोनों को तैयार होने को कहा ।
हुर्रे..मानसी खुशी से उछलकर बोली । नीलेश ने प्रसून की निगाह बचाते हुये उसकी कमर में चुटकी भरी ।
आउच..वह चिहुँकी ।
शी..भाई..भाई..भाई..। कहते हुये दोनों ने एक दूसरे के होठों पर उँगली रखी ।
समाप्त ।
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