मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 1

हरेक इंसान की जिन्दगी इतनी खुशनसीब नहीं होती कि वह एक अच्छे संपन्न घर कुल खानदान में पैदा हो । पढाई लिखाई करके प्रतिष्ठित इंसान बने । प्यारी सी बीबी और दुलारे से बच्चे हों । और जिन्दगी को हँसी खुशी भोगता हुआ परलोक रवाना हो जाय ।
पर क्यों नहीं होती ऐसी जिन्दगी ? क्यों हैं जीवन के अलग अलग विभिन्न रंग । कोई सुखी । कोई दुखी । कोई हताश । कोई निराश क्यों है ? यह प्रश्न ठीक गौतम बुद्ध स्टायल में नीलेश के मन में उठा ।
पर इसका कोई जबाब उसके पास दूर दूर तक नहीं था । नीलेश की तुलना मैंने गौतम बुद्ध से इसलिये की । क्योंकि चाँदी की थाली और सोने की चम्मच में पहला निवाला खाने वाला नीलेश एक बेहद सम्पन्न घराने का स्वस्थ सुन्दर होनहार युवा था । जीवन के दुखों कष्टों से उसका दूर दूर तक वास्ता न था । जिस चीज पर बालापन से ही उसकी नजर उत्सुकतावश भी गयी । वो चीज तुरन्त उसको हाजिर की जाती थी । आज की तारीख में ढाई तीन लाख रुपया महज जिसका पाकेट मनी ही था । महँगी महँगी गाङिया वह सिर्फ़ ट्रायल बतौर खरीदता था । और बहुतों को रिजेक्ट भी कर देता था ।


वह नीलेश ! नीलेश द ग्रेट ! जब अपने जीवन में इस प्रश्न से परेशान हुआ । तो महज 10 वीं क्लास में था ।
और राजकुमार सरीखा ये बच्चा अनगिनत दोस्तों से सिर्फ़ इसीलिये घिरा रहता था कि उसकी छोटी सी जेव से रुपया कागज की तरह उङता था । लङकियाँ तो उसकी हर अदा की दीवानी थी ।
पर ढेरों दोस्तों से घिरे नीलेश को उस कालेज में दो ही लोग आकर्षित करते थे । दादा प्रसून और मानसी ।
उससे दो क्लास आगे प्रसून नाम का वो लङका । अक्सर उसे किसी पेङ की ऊँची टहनी पर बैठा हुआ नजर आता । 


और मानसी जो शायद अमीरों के इस कालेज में सबसे कम हैसियत वाली थी । और किसी भी तरह से ले देकर इस प्रतिष्ठित कालेज में पढ पा रही थी । इसी बात को लेकर झेंपी झेंपी सी रहती थी ।
तब नीलेश का खिंचाव इन दोनों से स्वाभाविक ही हुआ । क्योंकि कालेज के इस एकमात्र हीरो की तरफ़ इन दोनों की कोई तबज्जो ही नहीं थी ।
मानसी की बात अभी छोङते हैं । नीलेश ने डरते डरते गम्भीर और शान्त प्रसून से बमुश्किल अपना परिचय बङाया । और तब उसे बेहद हैरत हुयी कि उसके एक मुख्य प्रश्न के ही नहीं बल्कि बहुत से उन प्रश्नों के जबाब भी प्रसून के पास मौजूद थे । जो सवाल दरअसल उसके जीवन में अभी पैदा भी नहीं हुये थे ।
- दादा ! यू आर ग्रेट ! वह बेहद भावुकता से ख्यालों में बोला - आपका मुझे मिलना । मेरे जीवन की सबसे बङी उपलब्धि थी ।

तभी अचानक उसके मोबायल की घन्टी बजी । उसने रिसीव करते हुये कहा - यस ।
- सर ! दूसरी तरफ़ से आवाज आयी - हम लोग लाडू धर्मशाला के पास आ गये हैं । अब प्लीज आगे की लोकेशन बतायें ।
उसने बताया । और अपनी कीमती रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । फ़िर वह बुदबुदाया - लाडू धर्मशाला .. इसका मतलब गड्डी से भी आधा घन्टा लगना था । और शाम के चार बजने जा रहे थे ।
वह लगभग टहलता हुआ सा मन्दिर की खिङकी के पास आ गया । और नीचे दूर दूर तक फ़ैले खेत और उसके बाद घाटी और पहाङी को निहारने लगा । इस वक्त वह किशोरीपुर के वनखन्ड स्थित शिवालय में मौजूद था । और पिछले दो दिन से यहाँ था । वनखन्डी बाबा के नाम से प्रसिद्ध ये मन्दिर किशोरीपुर से बारह किमी दूर एकदम सुनसान स्थान पर था । और कुछ प्रमुख पर्वों पर ही लोग यहाँ पूजा आदि करने आते थे । जिन लोगों की मन्नत मान्यतायें इस मन्दिर से जुङी थी । वे भी गाहे बगाहे आ जाते थे ।


इस मन्दिर का पुजारी बदरी बाबा नाम का 62 साल का बाबा था । जो पिछले 20 सालों से इसी मन्दिर में रह रहा था । इसके अतिरिक्त चरस गांजे के शौकीन चरसी गंजेङी बाबा भी इस मन्दिर पर डेरा डाले रहते थे । और कभी कोई । कभी कोई के आवागमन के कृम में नागा । वैष्णव । नाथ । गिरी । अघोरी आदि विभिन्न मत के 15 -20 साधु हमेशा डेरा डाले ही रहते थे । विभिन्न वेशभू्षाओं में सजे इन खतरनाक बाबाओं को शाम के अंधेरे में चिलम पीता देखकर मजबूत जिगरवाला भी भय से कांप सकता था ।
पर बदरी बाबा एक मामले में बङा सख्त था । किसी भी मत का बाबा क्यों न आ जाय । वह मन्दिर के अन्दर बाहर शराब पीने और गोश्त खाने की इजाजत नहीं देता था । हाँ गाँजे की चिलम और अफ़ीम का नशा करने की खुली छूट थी । खुद बदरी बाबा भी इन नशों का शौकीन था ।
इस समय भी मन्दिर पर बदरी और नीलेश के अलावा ग्यारह अन्य साधु मौजूद थे । जिनमें एक अघोरी और दो नागा भी आये हुये थे । नीलेश इन सबसे अलग मन्दिर के रिहायशी हिस्से की तिमंजिला छत पर मौजूद था । यह स्थान भी उसके गुप्त साधना स्थलों में से एक था । बदरी प्रसून का तो भगवान के समान आदर करता था ।
- कहाँ होगा इसका अंत ? नीलेश फ़िर से सोचने लगा - बङी विचित्र है । ये द्वैत की साधना । एक चीज में से हजार 


चीज निकलती है । जब भाई और बाबाजी ही निरंतर खोज में हैं । तो वह तो अभी बच्चा ही है । पुरुष और प्रकृति । और जीव और भगवान..द्वैत को लोगों ने अपनी अपनी तरह से बयान किया है । फ़िर भी इसका रहस्य ज्यों का त्यों सा लगता है । दरअसल इसकी जङ कहाँ है ?
ऐसे ही विचारों के बीच उसने सिगरेट सुलगायी । और टहलता हुआ सा मंदिर वाले हिस्से की तरफ़ आया । बदरी बाबा चूल्हे पर चाय चङा रहा था ।
तभी उसे दूर मंदिर की टेङी मेङी पगडंडी नुमा सङक पर एक बुलेरो आती दिखायी दी । नीचे बाबा लोग गोरख मत की किसी बात को लेकर झगङा करने के अन्दाज में बहस कर रहे थे ।
कुछ ही मिनटों में बुलेरो मंदिर के प्रांगण में आकर रुक गयी । और उससे चार लोग बाहर निकले । जिनमें दो अधेङ । एक वृद्ध और एक युवा था । वे बदरी बाबा से कुछ पूछने लगे ।
तब बदरी बाबा ने मंदिर की सीङियों की तरफ़ इशारा किया ।

डायन THE WITCH 2

- ये बङी विचित्र कहानी है । गिलास से चाय का घूँट भरता हुआ पीताम्बर बोला - समझ में नहीं आ रहा । कहाँ से शुरू करूँ ?
नीलेश कुछ नहीं बोला । और साधारण भाव से उन्हें देखता रहा ।
आगंतुको में लगभग 50 साल के दोनों आदमियों का नाम पीताम्बर सेठ और रामजी था । युवा लङके का नाम हरीश था । और साथ में आये वृद्ध - जो एक गारुङी ( ओझा ) था का नाम सुखवासी था । उन चारों में से कोई भी नीलेश का पूर्व परिचित नहीं था । और न ही इससे पहले उन्होंने नीलेश को देखा था ।
सुखवासी बाबा तो उसे बेहद उपहास की नजर से देख रहा था । बाकी तीनों के चेहरों का खत्म होता विश्वास भी बता रहा था कि किसी ने उन्हें यहाँ भेजकर भारी गलती की है । ये बच्चा भला क्या करेगा ?
पर जब आये हैं । तो औपचारिकता भी निभानी है । और शायद..? भेजने वाले का कहा सच ही हो । दूसरी बात - 


जब अपना ऊँट खो जाता है । तो घङे में भी खोजा जाता है । ऐसे ही मिले जुले भाव रह रहकर उन चारों के चेहरे पर आ जा रहे थे ।
लेकिन गारुङी सुखबासी बाबा की पूरी पूरी दिलचस्पी नीचे आंगन में बैठे बाबाओं में अवश्य थी । और उसे लग रहा था कि उनमें से कोई दिव्य पुरुष पीताम्बर की समस्या दूर कर सकता है । कुछ कुछ ऐसे ही भाव शेष तीनों के भी थे कि नीचे वालों से बात करते । तो ज्यादा उचित था ।
नीचे बैठे बाबाओं ने भी उन्हें मुर्गा बकरा समझते हुये घेरने की कोशिश की । पर उनकी हकीकत से परिचित बदरी ने उन्हें सख्ती से रोकते हुये आगंतुको को ऊपर भेज दिया । और वे चारों अब उसके सामने बैठे थे । बदरी बाबा सबके लिये चाय रख गया था । जिसे पीते हुये बातचीत शुरू हो गयी थी ।
- ये पूरा मायाजाल । पीताम्बर आगे बोला - दरअसल एक रहस्यमय बुढिया औरत को लेकर है । जो हमारी ही कालोनी में मगर सभी मकानों से काफ़ी दूर हटकर एक पुराने किलानुमा बेहद बङे मकान में रहती है ।
यह सुनते ही नीलेश को न चाहते हुये भी हँसी आ ही गयी


- मैं । पीताम्बर थोङा सकपका कर बोला - आपके हँसने का मतलब समझ गया । मगर कभी कभी वास्तविकता बङी अटपटी होती है । दरअसल हमारी कालोनी जिस स्थान पर है । उससे 2 फ़र्लांग की दूरी पर ( 5 फ़र्लांग = 1 किमी ) किसी जमाने में किसी छोटे मोटे राजा का किला था । करीब 200 साल पुराना वह किला और किले के आसपास उसी समय के बहुत से जर्जर भवन अभी भी गुजरे वक्त की कहानी कह रहे हैं । बहुत से प्रापर्टी डीलरों ने इस भूमि को लेकर इसका नवीनीकरण करने की कोशिश की । पर विवादों में घिरी वह सभी भूमि जस की तस पुरानी स्थिति में ही है ।


दूसरे वह टूटी फ़ूटी हालत के भवन झाङ पोंछ देख रेख के उद्देश्य से किराये पर उठा दिये थे । जिसकी वजह से बहुत से किरायेदारों ने लगभग उस पर कब्जा ही कर रखा है । ऐसी हालत में वह एक किमी के क्षेत्रफ़ल में फ़ैला किला और राजभवन से जुङे अन्य भवन सभी खस्ता हालत में निम्न वर्ग के लोगों की बस्ती बन गये हैं । और जैसा कि मैंने कहा कि - हमारी निम्न मध्यवर्गीय कालोनी सिर्फ़ उससे 2 फ़र्लांग की दूरी पर ही है ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी । और बेहद शिष्टता से सिगरेट केस उन लोगों की तरफ़ बङाया । हरीश को छोङकर उन तीनों ने भी एक एक सिगरेट सुलगा ली ।
- अब मैं वापस उस रहस्यमय बुढिया की बात पर आता हूँ । पीताम्बर एक गहरा कश लगाता हुआ बोला - ये आज से कोई बीस बाइस साल पहले की बात है । जब बुढिया के बारे में लोगों को पता चला कि..??
अचानक नीलेश बुरी तरह चौंका । और तिमंजिला कमरे की खिङकी की तरफ़ देखने लगा ।


- ड डायन डायन डायन डायन...! एकदम उसके बोलने से पहले ही नीलेश के मष्तिष्क में एक शब्द ईको साउंड की तरह गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
उसके खुद के रोंगटे खङे हो गये । बङी मुश्किल से उसने खुद को खङा होने से रोका । और संभलकर आगंतुको को देखने लगा । हँसती हुयी छायारूप एक खौफ़नाक बुढिया खिङकी पर बैठी थी ।
- मृत्युकन्या ! इस शब्द को उसने बहुत मुश्किल से मुँह से निकलने से रोका - साक्षात मृत्युकन्या की गण बहुरूपा यमलोक की डायन खिङकी पर विराजमान थी । और निश्चित भाव से हँस रही थी । इतनी जबरदस्त शक्ति कि प्रेतवायु के जिक्र पर ( यानी अपने बारे में बात होने पर ही ) ही जान जाती थी । किसी आवेश की आवश्यकता नहीं । किसी मन्त्र संधान की आवश्यकता नहीं । उफ़ ! वह कालोनी फ़िर भी सलामत थी । यह कोई चमत्कार ही था ।


- कोई चमत्कार नहीं योगी ! डायन उससे सूक्ष्म सम्पर्की होकर बोली - मेरा मतलब बस खास लोगों से ही होता है । जिनसे मैंने बदला लेना है । और जिनको यमलोक जाना है ? बाकी से मेरा क्या वास्ता ।
- ओ माय गाड ! नीलेश माथा रगङता हुआ मन ही मन बोला - सच ही कह रही थी वह । पर ऐसी डायन से उसका आज तक वास्ता न पङा था । ये यहाँ से डायन होकर जाने वाली डायन नहीं थी । बल्कि वहाँ से डयूटी पर आयी डायन थी । एक सिद्ध डायन । एक अधिकार सम्पन्न डायन । एक नियम अनुसार आयी डायन ।
- किस सोच में डूब गये भाई ! पीताम्बर उसको गौर से देखता हुआ बोला - मैं आगे बात करूँ ?
नीलेश का दिल हुआ । इन अग्यानियों से कहे । क्या बात करोगे । जब बात खुद ही मौजूद है । पर वह हाँ भी नहीं कर सकता था । ना भी नहीं कर सकता था । सच तो ये था कि उसकी खुद की समझ में नहीं आ रहा था कि वो डायन को डील करे । या पीताम्बर कंपनी को ।


- हाँ तो मैं कह रहा था । पीताम्बर घङी पर निगाह डालता हुआ बोला - कि बीस बाइस साल पहले जब उस बुढिया ने अपने ही नाती को मार डाला । और उसका खून पी गयी । तभी हमें पता चला कि...!
- ड डायन डायन डायन डायन...!  पुनः नीलेश के दिमाग में गूंजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन... ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
उसकी निगाह फ़िर से स्वतः खिङकी पर गयी । डायन पहली की तरह ही खौफ़नाक मधुर मुस्कान में हँस रही थी ।
दरअसल नीलेश चाह रहा था कि किसी तरह पीताम्बर कंपनी को समझ आ जाता कि डायन बाकायदा मौजूद ही है । तो वह कुछ मन्त्र सन्त्र चलाता भी । पर पीताम्बर और उसके साथी न सिर्फ़ अपनी धुन में थे । बल्कि उन्हें अब ये भी लग रहा था कि नीलेश कुछ घबरा सा रहा है ।
उधर नीलेश ये सोच रहा था कि ये उसके लिये एकदम नया मामला था । और वह ये भी नहीं चाहता था कि नीचे बदरी बाबा और अन्य बाबाओं को खबर लगे कि मंदिर में डायन मौजूद है ।
- दाता ! उसके मुँह से निकल ही गया ।

खिङकी पर बैठी सुन्दरी ने उसे उपहासी भाव से अँगूठा दिखाया । और न चाहते हुये भी फ़िर से वह ध्वनि नीलेश के दिमाग में गूँजने लगी -ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...!   ड डायन डायन डायन डायन...!
पीताम्बर बारबार घङी देख रहा था । वह सोच रहा था कि नीलेश कुछ हाँ ना करे । तो वह समय रहते घर वापस पहुँच जाये । पर उसे ऐसे लग रहा था कि इस " लङके " की हवा खुद ही खराब हो रही है । ये भला क्या हाँ ना करेगा । छोटे मोटे भूत सूत उतार लेता होगा । छोटे मोटे टोने टोटके वाला बाबा ।
दरअसल भेजने वाले ने उन्हें किन्ही प्रसून जी का नाम बताया था । पर पिछले एक साल से प्रसून से मिलने के लिये उन्होंने जितनी जद्दोजहद की । उतने में तो शायद लादेन भी मिल जाता । पर प्रसून जी नहीं मिले । हाँ ये नया लिंक मिल गया कि - आप इनसे बात करिये ।
ये सोचते ही पीताम्बर के दिमाग में तुरन्त एक बात आयी । और वह बोला - माफ़ करिये । नीलेश जी ! ये प्रसून जी इस समय कहाँ हैं ?
नीलेश ने एकदम चौंककर उसकी तरफ़ देखा । और उसका दिल हुआ । जबरदस्त ठहाका लगाये । उसने सोचा - कह दे । शरीर किसी काटेज में । गुफ़ा में । और बन्दा । दो आसमान बाद किसी अग्यात लोक में । जाओ ..मिल आओ ।
पर वह शिष्टाचार के नाते संयमित स्वर में बोला - बहुत दिनों से उनसे मिला नहीं । शायद अपनी कीट बिग्यानी रिसर्च के चलते कहीं विदेश में हैं ।
फ़िर उनके अन्दरूनी भाव और सभी स्थितियों पर तेजी से विचार करता हुआ वह निर्णय युक्त स्वर में बोला - हाँ अब बताईये ?
पीताम्बर मानों चौंककर पूर्व स्थिति में आया । और बोला - बुढिया का बेटा उन दिनों पढाई कर रहा था । उसकी शादी हो चुकी थी । बहू के दो साल से छोटा एक बच्चा था । जिसे बुढिया ने कुँए के पत्थर पर पटक पटककर मार डाला । यह घटना शाम आठ बजे की है । तब मंदिर की तरफ़ जाते कुछ लोगों ने उसे बच्चे का खून पीते भी देखा । और तब पहली बार लोगों को पता चला कि..?
ड डायन डायन डायन डायन...! नीलेश के दिमाग में फ़िर से गूँजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...!ड डायन डायन डायन डायन...!  ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...! 

डायन THE WITCH 3

- एक मिनट ! नीलेश खिङकी पर बैठी बुढिया को एक निगाह देखता हुआ बोला - आप संक्षेप में एक तरफ़ से बात शुरू करें । ताकि बात कुछ समझ में आये । रहस्यमय बुङिया की पूरी कहानी बतायें ।
पीताम्बर संभला । और बोला - बुढिया का पूरा इतिहास तो मुझे पता नहीं हैं । पर बुजुर्ग लोग बताते हैं । उसका आदमी उसी राजभवन की किसी खानदानी परम्परा से ताल्लुक रखता था । और इसलिये वह मकान और आसपास की और भी जगह का पुराना मालिक था । इस रहस्यमय औरत से कैसे उसकी शादी हुयी ? कहाँ की थी ? आदि शायद कोई नहीं जानता । बुढिया का पति और बुढिया का श्वसुर इन्ही दोनों के बारे में लोगों को जानकारी है । बुढिया का पति शादी के दस साल बाद रहस्यमय हालातों में मर गया । इसके दो साल बाद उसका ससुर भी चल बसा । तब बुढिया अपने एकलौते तीन साल के बेटे के साथ इस असार संसार में अकेली रह गयी । वह अपने बेटे को बहुत 


प्यार करती थी । यहाँ तक कि उसके बेटे को कोई एक चाँटा झूठमूठ भी मार दे । तो बुढिया उसकी जान लेने पर उतारू हो जाती थी । तब लोगों को पता चला कि ये औरत अबला नहीं बल्कि बला है । और बहुत ताकतवर है ।
- ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...! !
- एक्सक्यूज मी ! नीलेश ने टोका - बुढिया का लङका अब कहाँ है ?
- वो इस समय डी एम है । डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ।
नीलेश उछलते उछलते बचा ।
- आपको इस बात पर हैरानी हो रही होगी । पर वह और उसकी नयी बहू अब बुङिया से कोई सम्बन्ध नहीं रखते । और किसी पहाङी जगह पर रहते हैं । सामंत साहब की वाइफ़ भी प्रशासनिक सेवा में है ।
- ओह गाड ! हठात नीलेश के मुँह से निकला - और उसकी पहली बहू को भी बुढिया ने मार डाला ।
- नहीं । पीताम्बर बोला - दरअसल धीरज सामंत साहब की पहली शादी बुढिया ने छोटी उमर में ही कर दी थी । उस समय धीरज बाबू पढ रहे थे । उसी समय उनको एक पुत्र भी हुआ था । जिसे कि जैसा कि मैंने बताया । बुढिया ने कुँए के पत्थर पर पटक पटककर मार डाला । इस  घटना के बाद वह बहू पागल सी हो गयी । और यूँ ही इधर उधर घूमती रहती थी । वह बेहद गंदी हालत में रहती थी । इसके बाद एक दिन वह शहर छोङकर कहीं चली गयी । उसके बाद उसका कोई पता न लगा ।


बाद में धीरज साहब पढाई के लिये बाहर चले गये । और उसी दौरान उन्होंने नौकरी लगते ही दूसरी शादी कर ली थी । वह उनकी लव मैरिज हुयी थी । इसके बाद धीरज साहब एक दो बार ही शहर में आये । और फ़िर कभी नहीं आये । इस तरह वह बुढिया काफ़ी समय से उस विशाल मकान में अकेली रहती है ।
नीलेश ने एक निगाह पूर्ववत ही खिङकी पर बैठी बुढिया पर डाली । और जानबूझ कर मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया - फ़िर बुडिया का खाना वाना कौन बनाता है । और उसका खर्चा वर्चा ?
- आप भी कमाल करते हो नीलेश जी ! पीताम्बर हैरत से बोला - शेर की गुफ़ा में जाकर कोई बकरा उसके हालचाल जानेगा कि वह ब्रेकफ़ास्ट कर रहा है । या डिनर खा रहा है ? कौन मरने जायेगा भाई जी ।
- जब बुढिया ने । नीलेश बोला - अपने अबोध नाती को मारा । तब आप लोगों ने पुलिस को इंफ़ार्म किया । या सोसायटी के लोगों ने कोई एक्शन लिया ?
अब पीताम्बर और उन तीनों को साफ़ साफ़ समझ में आ गया कि यहाँ आकर उनसे भारी गलती हुयी । इस बन्दे के वश का कुछ भी नहीं है । और फ़ालतू में किसी टीवी अखवार वाले की तरह इंटरव्यू कर रहा है ।
फ़िर भी एकदम अशिष्टता वे कैसे प्रदर्शित कर सकते थे ।


इसलिये वह बोला - नीलेश जी ! पुलिस वालों के बाल बच्चे नहीं होते क्या ? जो वह अपनी और अपने घर वालों की जान जोखिम में डालेंगे । ये किसी क्रिमिनल का मामला नहीं बल्कि..!
- ड डायन डायन डायन डायन...! एकदम उसके बोलने से पहले ही नीलेश के मष्तिष्क में एक शब्द ईको साउंड की तरह गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
- बल्कि..! नीलेश को उसकी फ़िर से आवाज सुनाई दी - एक डायन का मामला है । कोई उस क्षेत्र में फ़टकने भी नहीं जाता । वह डायन और डायनी महल पूरे शहर में प्रसिद्ध है ।
इस बार डायन मधुर स्वर में हँसी । उसके घुँघरू बजने जैसी ध्वनि सिर्फ़ नीलेश को सुनाई दी । लेकिन उसने खिङकी की तरफ़ देखने की कोई कोशिश नहीं की ।
- खैर..! नीलेश फ़िर से एक सिगरेट सुलगाता हुआ बोला - उस बुङिया से आपको क्या कष्ट है ? वह तो आपसे दो फ़र्लांग दूर रहती है । और फ़िर आपने कहा कि उसकी बस्ती में बहुत से अन्य लोग भी रहते हैं । पीताम्बर का मन हुआ अपने बाल नोच ले । भेजने वाले ने क्या सोचकर इसके पास भेजा ।
- आप कष्ट पूछ रहे हो । पीताम्बर बोला - ये पूछिये । क्या कष्ट नहीं हैं ? हम सब लोग बेहद सतर्कता से ब्लैक आउट स्थिति में रहते हैं । डायन ने कितने ही घर वीरान कर दिये । कितने ही लोगों को खा गयी । यानी मार डाला । वो बहुत दूर से खङी भी किसी को देखे । तो बदन में जलन होने लगती है । कभी किसी के घर के आगे रोटी का टुकङा फ़ेंक जाती है । किसी के घर के आगे हड्डियाँ फ़ेंक जाती है । किसी के दरबाजे पर खङी होकर रोटी प्याज भी माँगती है ।


- ओह..आई सी ! नीलेश गोल गोल होठ करते हुये सीरियस होकर बोला - फ़िर तो यह वही मालूम होती है । जिसकी प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी काफ़ी चर्चा हुयी थी । वह आपके शहर में रहती है । खैर..जब वह आपके यहाँ से रोटी प्याज माँगती है । तब आप उसको देते हो ।
- हमारा बाप भी देगा । पीताम्बर झुंझलाकर बोला - देना पङता है साहब । अपने घर को किसी आपत्ति से बचाने के लिये । किसी बिन बुलायी मुसीबत से बचाने के लिये ।
- अंधेरा... कायम रहेगा !  डायन उसे अँगूठा दिखाती हुयी बोली - प्फ़ावर !
- ड डायन डायन डायन डायन...! एकदम उसके बोलने के साथ ही नीलेश के मष्तिष्क में  गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
दरअसल नीलेश आज से पहले ऐसी विचित्र स्थिति में कभी न फ़ँसा था । इसलिये न तो वह कोई बात का तारतम्य ही बना पा रहा था । न ठीक से बात समझ पा रहा था । और न ही उनको समझा पा रहा था । कोई सामान्य स्थिति होती । तो बात के मेन मेन प्वाइंट वो हूँ हाँ के अन्दाज में सुनकर स्थिति की गम्भीरता समझ जाता । और फ़िर आगे उन्हें भी कुछ बताता ।
अब बात एकदम उल्टी थी । पीताम्बर एन्ड कंपनी उसे कहानी सुना रही थी । और उस कहानी सुनाने के रिजल्ट जानना चाहती थी । पर नीलेश कैसे उन्हें बताता कि कहानी खुद ही खिङकी पर बैठी है ।
- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।

- किलविश की अम्मा ! झुँझलाहट में नीलेश के मुँह से निकल ही गया ।
- क्या ? वे सब एकदम चौंककर बोले - इसका क्या मतलब हुआ ?
- अभी आपको क्या मतलब बोलूँ ? वह परेशान होकर बोला - मुझे अपना ही कोई मतलब समझ में नहीं आ रहा ।
- ओके..सारी बाय ! अचानक पीताम्बर निर्णयात्मक स्वर में बोला - हम चलते हैं । हमें वापस लौटना भी है ।
उनके चेहरे पर अब तक आने से बचे रहे उपहास के भाव अब साफ़ नजर आने लगे । और वे एक झटके से उठ खङे हुये । पीताम्बर ने जल्दी से उससे हाथ मिलाया । वे सीङियों की तरफ़ लपके । और तेजी से उतरते चले गये ।
- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
ऐसा लग रहा था । मानों नीलेश के दिमाग ने काम करना ही बन्द कर दिया हो । लोग पता नहीं क्या क्या सोचते हैं । वह उन्हें सही स्थिति कैसे समझा सकता था । जो कहानी वह सुना रहे थे । उस कहानी की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । जिसे वह फ़रार मुजरिम समझ रहे थे । वह छुपी हालत में अदालत में ही मौजूद था । और मुद्दई की नादानी पर हँस रहा था । बल्कि वह तो वादी क्या मानों स्वयँ जज की हँसी उङा रहा था ।
उसने एक सिगरेट सुलगायी । और अपसेट से हो गये दिमाग को दुरुस्त करते हुये मुँह से ढेर सारा धुँआ छोङते हुये खिङकी की तरफ़ देखा । डायन पूर्ववत मौजूद थी । और बेहद उत्सुकता से उसी को देख रही थी ।
उसने नीलेश को डन का अंगूँठा दिखाया । और बोली - नहीं जा सकते । मुझे उनमें से आज रात एक को ठिकाने लगाना है । उसको तङपा तङपा कर मारना है । बूङा मरे या जवान । मुझे हत्या से काम ।
नीलेश कुछ न बोला । जिस तरह समुद्री तूफ़ान में फ़ँसे आदमी को समझ में नहीं आता । वह क्या करे । और क्या न करे । वह डायन से बात भी करना चाहता था । पर समझ नहीं पा रहा था । क्या करे । और कैसे करे ।
- ऐ ! फ़िर अचानक वह खिसियाया हुआ सा बोला - क्या बिगाङा है ? इन मासूम लोगों ने तेरा । क्यों नहीं इन्हें चैन से जीने देती । इन हत्याओं से तुझे क्या मिलता है ।


- सावधान योगी ! डायन यकायक गम्भीर स्वर में बोली - मैं कोई ऐ..बे..तू..दुष्ट..श्रेणी की छिछोरी महत्वहीन प्रेतात्मा नहीं हूँ । मैं गण श्रेणी में आने वाली नियुक्त डायन हूँ । और मृत्युकन्या के अधीन कार्य करती हूँ ।
यह सब पहले से जानते हुये भी नीलेश को उसके बोलने पर ऐसा लगा । मानों उसके पास बम फ़टा हो । वह अपनी जगह जङवत होकर रह गया । उसके कानों में अग्यात अदृश्य शून्य 0 की सांय सांय गूँजने लगी ।
मृत्युकन्या ! मृत्युकन्या कोई मामूली बात नहीं थी । इसका मतलब साफ़ था । वह डयूटी पर आयी थी । और उसे उसका कार्य करने से कोई भी नहीं रोक सकता था । शायद इसीलिये ये अच्छा ही हुआ था कि पीताम्बर और दूसरों से ने उसे खुद ही नाकाबिल समझ लिया था । वरना ये भयावह स्थिति वह उन्हें एक जन्म में भी नहीं समझा पाता । और अगर समझाने में कामयाब भी हो जाता । तो वह उन्हें कोई दवा देने के स्थान पर उनका दर्द और भी बङाने वाला था । इससे तो वे और भी भयभीत ही हो जाते ।
- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।

डायन THE WITCH 4

नीलेश बाहर आकर नीचे मंदिर के प्रांगण में झांककर देखने लगा । पीताम्बर एण्ड कंपनी क्या कर रही है ? उसकी आशा के मुताबिक ही वे नीचे अन्य साधुओं से बात कर रहे थे ।
वह फ़िर से कमरे में आ गया ।
- आप फ़्रिक मत करिये ! उसे डायन का मधुर स्वर सुनाई दिया - उन्हें आज मंदिर में ही रुकना होगा । और उनमें से एक को । उसने आसमान की तरफ़ उँगली उठायी - आज रवाना होना पङेगा । क्या खेल है ना । मृत्यु की गोद में बैठे इंसान को भी पता नहीं होता कि - बस वह कुछ ही घंटों का मेहमान और है । यही नियम है । यही दस्तूर है ।
वह जो भी बोलती थी । उससे आगे बोलने के लिये नीलेश के पास शब्द ही नहीं होते थे । फ़िर वह क्या बोलता । क्या करता । वह खुद को एकदम असहाय महसूस कर रहा था । उसे बाबाजी की जरूरत महसूस हो रही थी । उसे प्रसून भाई की जरूरत महसूस हो रही थी । पर क्या पता । वे कहाँ थे ?
फ़िर भी वह बोला - लेकिन इसका क्या प्रमाण । जो आप कह रही हो । वह सच है ? मतलब आप मृत्युकन्या द्वारा नियुक्त हो ।


- प्रत्यक्षम किं प्रमाणम । वह किसी देवी की ही तरह बोली - हे द्वैत योगी ! आज रात का खेल जब आप देखोगे । तब यह प्रश्न खुद ही समाप्त हो जायेगा । मेरे द्वारा शरीर मुक्त की गयी आत्मा को लेने जव यमदूत आयेंगे । वे मुझे प्रणाम करेंगे । और त्रिनेत्रा योगी के लिये ये दृश्य देखना कोई बङी बात नहीं है । वो आप हो ।
नीलेश का सर मानों धङ से अलग होकर अनन्त आकाश में तेजी से घूमने लगा । और वह सिर रहित धङ ही रह गया ।
- फ़िर ! अचानक उसे आशा की एक किरण दिखायी दी । और यह ध्यान आते ही उसके चेहरे पर खुशी की चमक लौटने लगी । वह उत्साहित होकर बोला - फ़िर शरणागत का मतलब क्या हुआ ? फ़िर निमित्त का क्या मतलब हुआ ? फ़िर उनके यहाँ आने का क्या मतलब हुआ ?
डायन के चेहरे के रंग यकायक फ़ीके पङ गये । उसने बैचेनी से पहलू बदला । और वह जाने के लिये हुयी ।
- ठहरो ! अचानक नीलेश गम्भीर स्वर में बोला - अभी आपने ही सत्ता के नियमों की बात कही । इसलिये मेरे प्रश्न का उत्तर देना । आपके लिये अनिवार्य है ।
- अगर ! वह मानों विवशता से बोली - बता दूँ । तो भी कोई लाभ नहीं होगा ।
- मैं भविष्य के लिये जान जाऊँगा । यही लाभ बहुत है । नीलेश के स्वर में खोया हुआ विश्वास लौटने लगा ।
- तो सुनो ! वह फ़िर से खिङकी पर सही होकर बैठ गयी - मैं अभी यह तो नहीं बता सकती कि इनमें से किसकी । मगर जिसकी भी मृत्यु उसे यहाँ खींचकर लायी है । उसके टलने के उपाय अवश्य होते हैं । बस उसका यह पूर्व तय मृत्यु स्थान बदल जाय । और मृत्यु के समय किसी भी तरह । वो बालबाल ही सही बच जाय । क्योंकि यह अलफ़ घात ( अकाल मृत्यु ) ही है । बच भी सकती है ।
- कैसे ? नीलेश ने एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया । इतना मूर्खतापूर्ण प्रश्न कि उसे खुद ही अपने प्रश्न पर हँसी सी आयी ।


- क्षमा करें । वह बोली - इस सम्बन्ध में मैं ज्यादा नहीं जानती । बस ये जानती हूँ कि ये भी सम्भव है । और इतना और जानती हूँ कि अद्वैत का साधु इसे बिना स्थान परिवर्तन के भी रोक सकता है । क्योंकि अकाल मृत्यु का उन पूज्य सन्तों के आसपास फ़टकना भी वर्जित होता है । इसलिये....
कहते कहते अचानक उसे घबराहट सी होने लगी ।
नीलेश भी एकदम शून्यवत 0 होने लगा । उसके शरीर के चारों तरफ़ सिर से पैर तक एक अदृश्य किरण घेरा स्वतः बनने लगा । फ़िर उसके दिमाग से किसी का सम्पर्क जुङने लगा । और फ़िर उसके समूचे शरीर में खुशी की लहरें दौङ गयीं ।
- प्रणाम भाई ! वह बेहद श्रद्धा से बोला ।
मगर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी । इसके कुछ क्षण बाद ही शून्यवत 0 होने की क्रिया फ़िर घटित हुयी । और फ़िर वह पहले जुङे सम्पर्क से चेन बनाता हुआ एक नये सम्पर्क से जुङा । और इस बार लगभग उछल ही पङा ।
- प्रणाम गुरुदेव ! वह अपार श्रद्धा से बोला - चरण स्पर्श स्वीकार करें ।


- देव देव ! उसे गम्भीर घन गर्जन के समान मगर बेहद मद्धिम स्वर सुनायी दिया - सफ़ल होओ । नीलेश.. वत्स ! हम तुम्हें सिर्फ़ इतना बताने आयें हैं कि एक सच्चे गुरु का शिष्य कभी अकेला नहीं होता । मगर एक शिष्य की तरफ़ से यह अटूट भावना उसके द्वारा विभिन्न प्रायोगिक स्थितियों से गुजरकर ही बनती हैं । दरअसल ये प्रयोग सत्ता द्वारा इसीलिये निर्धारित किये जाते हैं । बिना प्रयोगों के.. अनुभूति स्थितियों के एक अच्छे योगी का निर्माण संभव नहीं है ।
नीलेश अच्छी तरह जानता था । इस अदृश्य वाणी से बातचीत का सिलसिला कभी भी टूट सकता था । और वह अपनी तरफ़ से किसी हालत में सम्पर्क नहीं कर सकता था ।
अतः जल्दी से बोला - क्षमा गुरुदेव ! इस समय दादा कहाँ है ?
- सर्वत्र ! गम्भीर स्वर सुनायी दिया । और सब कुछ शान्त हो गया ।


सर्वत्र ! यह क्या अजीब बात थी । सर्वत्र का मतलब तो ये हुआ कि यहाँ भी । वहाँ भी । कहीं भी ।
अपने अब तक के साधक जीवन से वह ऐसी अजीबोगरीब परिस्थियों से कुछ हद तक तो परिचित था ही । लेकिन किसी भी योगी के लिये हर घङी एक कठिन घङी होती है । जब तक वह एक अध्याय सीखता है । समझता है । दूसरा शुरू हो जाता है । अभी भी ऐसा ही तो हो रहा था ।
- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
- ड डायन डायन डायन डायन...!  उसके बोलते ही नीलेश के मष्तिष्क में गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
- सुनो ! अचानक नीलेश को मानों कुछ याद आया । और वह डायन की ओर मुङता हुआ बोला ।
मगर डायन उसके सुनो को ना सुनो करती हुयी हवा के एक झोंके के समान उसी छत पर ऊपर पहुँच गयी । जिस छत के नीचे कमरे में वह मौजूद था ।

उसने डायन की तरफ़ से ध्यान हटा लिया । और कमरे से बाहर आकर  खुली छत पर पङी कुर्सी पर बैठकर नीचे आंगन में देखने लगा । हल्का हल्का अंधेरा घिरने लगा था । शाम के सात बजने वाले थे । अचानक उसकी निगाह मंदिर के आंगन में ही खङे पीपल के विशाल वृक्ष पर गयी । जिस पर बैठी पैर झुलाती हुयी डायन नीचे बैठे लोगों को ही देख रही थी ।
- सान्ता मारिया ! वह सीने पर क्रास बनाकर बोला - किसका सफ़ाया करने वाली है यह ? कौन जानता था ।
उसके दिमाग में कुछ देर पूर्व ही हुआ सारा वाकया किसी रील की तरह घूमने लगा । खासतौर पर बाबाजी का ये कहना " सर्वत्र..सर्वत्र..सर्वत्र..इसका तो मतलब यही हुआ ना कि प्रसून भाई उसके साथ ही है । लेकिन कहाँ ? इस बात का कोई उत्तर उसके पास नहीं था ।


पीताम्बर और उसके साथी वाकई रुक गये मालूम होते थे । पर वे क्यों कर रुके थे । ये अभी उसको पता नहीं था । बदरी बाबा और दो अन्य साधु मिलकर भोजन बनाने की तैयारी कर रहे थे । जो होगा । देखा जायेगा । सोचकर उसने एक सिगरेट सुलगायी । और गहरा कश लेते हुये पीपल पर झूलती हुयी सी डायन को देखने लगा ।
अचानक उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी । और उसने समूची एकाग्रता डायन पर ही केन्द्रित कर दी । आज रात में डायन उन चार आगंतुकों में से किसी एक को यमलोक पहुँचाने वाली थी । इसलिये बहुत संभव था । डायन का पूरा ध्यान उसी लक्ष्य व्यक्ति पर केन्द्रित रहेगा । और तब इसकी सबसे बङी पहचान ये होगी कि उन चारों में से मौत की गोद में बैठ चुके व्यक्ति के मस्तक आदि पर मृत्यु के लक्षण जैसे जाला सा बनना । उसके दोनों सुरों का एक साथ चलना । उसकी चाल ढाल व्यवहार में एक सम्मोहन सा होना अवश्य होंगे । इससे बहुत आसानी से पता लग सकता था कि - आज कौन हलाल होने वाला है । और तब शायद कुछ किया भी जा सकता है । मगर शायद ही । शायद !
पर इस परीक्षण में भी बेहद कठिनाई थी । एक तो अंधेरा हो चुका था । इसलिये शरीर पर उभरे चिन्ह देखना आसान नहीं था । वे चारों अथवा नीचे वाले मिलाकर कई लोग हमेशा साथ ही रहने थे । अतः सम्मोहित को भी आसानी से तलाशना मामूली बात नहीं थी । दूसरे अगर डायन रात के दो बजे तक भी टारगेट को निशाना बनाने वाली थी । तो अब से लेकर सिर्फ़ सात घण्टे ही बचे थे । सिर्फ़ सात घन्टे ।


और इन सात घन्टों में ऐसा समय कोई भी नहीं आने वाला था । जब वह कुछ कर सकता था । कुछ । मगर क्या ? कुछ भी । जो अभी उसे ही नहीं पता था ।
फ़िर उसने वही अंधेरे में तीर चलाने का नुस्खा ही आजमाने की सोची । और डायन की दृष्टि का अनुसरण करने की कोशिश करने लगा । मगर नीचे पीताम्बर कंपनी को मिलाकर एक दर्जन से ऊपर लोग लगभग एक साथ ही बैठे हुये थे । और ऐसे में वह डायन किसको स्पेशली ध्यान में ले रही है । पता करना बेहद कठिन ही था । इम्पासिबल ।
- प्फ़ावर ! अचानक डायन वहीं बैठी बैठी उससे खुद ही सम्पर्की होकर बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा । आप मेरी गतिविधियों को अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं । चलो मैं खुद ही बता देती हूँ । मेरा लक्ष्य हरीश है । सबसे छोटा हरीश ।
नीलेश के दिमाग पर मानों घन प्रहार हुआ हो । स्वतः ही उसने नीचे देखना बन्द कर दिया । और कुर्सी की पीठ पर टेक लगाता हुआ अधलेटा सा होकर अब निश्चिंत भाव से डायन की तरफ़ देखने लगा । हरीश । मौत की खिलखिलाती गोद में जा चुका हरीश ।
- मगर क्यों ? वह बेहद खोखले स्वर और डूबी सी आवाज में बोला - मगर क्यों ? कोई वजह ।
सिर्फ़ उसे ही डायन की मधुर जलतरंग जैसी हँसी सुनाई दी । फ़िर वह बोली - क्यों एक ऐसा शब्द है । जिसका आज तक उत्तर ही नहीं बना । एक क्यों का उत्तर ग्यात होते ही उसमें से हजार क्यों और पैदा हो जाते है ।


- सच कह रही हो..सुन्दरी ! नीलेश प्रभावित स्वर में बोला ।
- मैं सुन्दरी नहीं हूँ । वह बिना किसी भाव के बोली - मेरा नाम चंडूलिका साक्षी है । और यमलोक मेरा निवास है । क्या तुम मेरा मेहमान बनना पसन्द करोगे ?
- कमीनी ! न चाहते हुये भी स्वभाववश नीलेश के मन में भाव आ ही गया - तेरा मेहमान बनना तो शायद मूर्ख से मूर्ख भी ना पसन्द करे ।
- ऐसा नहीं है । अबकी बार डायन बिना किसी उत्तेजना के शान्त स्वर में बोली - योगी आप डायन या ऐसी अन्य गण आत्माओं के बारे में जानते नहीं हैं । इसलिये ।
- मैं जानना भी नहीं चाहता । इस बार नीलेश के मुँह से निकल ही गया - मेरे दिमाग में इस समय एक ही बात है । हरीश की मौत होगी । मगर क्यों ? क्यों चंडूलिका साक्षी क्यों ? आखिर क्यों ? जबकि तुम इसे अलफ़ बता रही हो ।
- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । वह डाली पर ठीक से बैठती हुयी बोली - तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि । क्योंकि हे योगी !  जिसने जन्म लिया है । उसका मरना निश्चित ही है । और उसके बाद मरने वाले का जन्म भी तय है । जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता । कुछ भी नहीं किया जा सकता । फ़िर ऐसा जानकर उसके बारे में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।
मगर ना जाने क्यों । ना जाने कौन सी अग्यात प्रेरणा से नीलेश अब उस डायन से प्रभावित नहीं हो रहा था । और अपने स्वभाव में लौट आया था । अब वह नीलेश था । वास्तविक नीलेश ।
अतः एकदम लापरवाह होकर बोला - तेरी माँ का..साकीनाका ।
तभी उसे पीताम्बर ऊपर आता दिखायी दिया ।

डायन THE WITCH 5

- हम लोग आज रुक गये । वह बेहद गर्मजोशी से बोला - क्या आप एक सिगरेट और पिला सकते हैं ।.. दरअसल भगवान की कृपा से हमारा काम बन गया । नीचे बाबाओं में जो गजानन बाबा हैं । उन्होंने कहा है । डायन क्या उसकी माताजी भी हमारी बस्ती छोङ देगी । उन्होंने बहुत टेङी टेङी डायनों चुङैलों को ठीक किया है । वे आपके बारे में कह रहे थे । आप अभी नौसिखिया हैं । ..नीलेश जी माइंड मत करना । ये डायन चुङैल वास्तव में बच्चों के काम नहीं हैं । फ़िर अभी आप तंत्र विध्या सीख ही तो रहे हो । उमर ही क्या हुयी होगी अभी आपकी । अभी तो शायद शादी भी नहीं हुयी होगी । वैसे आप शादी तो करेंगे ना । बुरा मत मानना । मैंने सुना है । साधु लोग अक्सर शादी नहीं करते ना । देखो हम गृहस्थ लोगों का तो शादी बिना एक रात भी गुजारा नहीं हो सकता । सच कह रहा हूँ ना ।


- कमाल है । नीलेश मन ही मन हैरान सा रह गया - इसमें अचानक राखी सावंत की आत्मा कैसे घुस गयी । तब उसे ख्याल आया । ये गांजा भरी चिलम पीने का कमाल था । जो उसने थोङी देर पहले नीचे साधुओं के साथ पी थी । और उसे पीने से काफ़ी हद तक उसके मन से डायन का खौफ़ जाता रहा था ।
मगर मौत का बिगुल बज चुका था । मौत और मरने वाला आमने सामने आ चुके थे । और उस मौत से अनजान ये इंसान कितना खुश था । सिर्फ़ कुछ घन्टे बाद होने वाली मौत से ।
नीलेश उससे हरीश के बारे में पूछना चाहता था । पर उसमें एक बेहद दिक्कत वाली बात यह थी कि हरीश वाकई मर जाता । या अन्य कोई बङा हादसा होता । तो उसके तार खामखाह उससे जुङ जाने वाले थे । क्या पता । हरीश के साथ क्या और कैसे होने वाला था ? और इस तरह पूछकर एक होने वाली बात से जानबूझ कर सम्बन्ध बनाता हुआ वह एक और नयी मुसीबत को जन्म नहीं देना चाहता था ।
लेकिन तभी डायन की आवाज उसे सुनायी दी - चिंता न करो । और मौत का नंगा नाच देखो । जो आप जानना चाहते हो । यह खुद बतायेगा । बिना पूछे ही बतायेगा ।


- अब देखो ना । पीताम्बर सिगरेट का गहरा कश लेता हुआ बोला - मेरे लङके हरीश को ही देखो । अभी क्या उमर है उसकी । पर मैंने उसकी शादी तय कर दी है । देखिये नीलेश जी ! बुरा न मानिये । आज इंडिया में विदेशों की तर्ज पर फ़्री सेक्स का चलन होता जा रहा है । ऐसे में कुछ उल्टा सुल्टा हो जाये । तो कुल खानदान पर दाग ही लग जाता है । इसलिये मैं उसकी जल्द से जल्द शादी कर देना चाहता हूँ ।
- मगर मौत से । चंडूलिका सर्द स्वर में बोली - वो भी कुछ ही देर में । अर्थी रूपी घोङे पर बैठा हुआ । रक्त से सरोबार सजा हुआ । तुम्हारे रुदन की मातम रूपी शहनाईयाँ  सुनता हुआ । वह शमशान को अपनी बारात ले जायेगा । और मौत की देवी का आलिंगन करेगा । जो बेकरारी से उसका इंतजार कर रही हैं । मौत की देवी । सिर्फ़ मौत ।


उस बेहद सर्द स्वर को सुनकर नीलेश जैसे इंसान के भय से रोंगटे खङे हो गये । यह कहते समय चंडूलिका साक्षी के रूप में मानों स्वयँ मौत की देवी उपस्थिति हुयी हो । पर वह असहाय ही था । पीताम्बर जाने क्या क्या बोल रहा था । पर अब उसे कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था । उसने रेडियम डायल वाली कलाई घङी पर निगाह डाली । रात के नौ बजने ही वाले थे । बदरी बाबा उसका खाना लेकर आया था । पर नीलेश की भूख तो गायब ही हो चुकी थी । उसने बेमन से कुछ कुछ खाया ।
मंदिर में मौजूद सभी लोग विश्राम के लिये मंदिर के बरामदे में जाकर लेट गये । पर नीलेश की आंखों में नींद नहीं थी । वह हरीश के बारे में सोचता हुआ चंडूलिका को ही देख रहा था । उसका एक एक पल युग समान गुजर रहा था । ठीक दो घन्टे बाद ।
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ठीक दो घन्टे बाद

जैसे ही घङी ने रात के ग्यारह बजाये । हरीश को कुछ बैचेनी सी महसूस हुयी । ये बैचेनी क्यों थी । इसका उसे कुछ पता नहीं था । उसे लघुशंका की भी आवश्यकता महसूस हो रही थी । उसने अपने पास सोये लोगों पर निगाह डाली । वह तखत से उठ खङा हुआ । और लघुशंका हेतु मंदिर के पिछवाङे पहुँचा । तभी उसे मंदिर से कुछ ही फ़ासले पर स्थिति छोटी पहाङियों के नजदीक जुगनू की तरह चमकती मगर उससे अधिक प्रकाश वाली चार आँखे सी चमकती नजर आयीं । जो किन्ही जंगली जीवों जैसी प्रतीत होती थी । हरीश ने इससे पहले ऐसी अदभुत चीज कभी नहीं देखी थी । वह बेख्याली में सम्मोहित सा उधर जाने लगा । जैसे किसी अदृश्य डोर में बंधा हुआ हो । यह मौत का बुलावा था । अंतिम आमंत्रण ।
उसे नहीं पता था कि गजानन बाबा चुपचाप उसके पीछे दूरी बनाकर चल रहा था ।
बाहर हल्की हल्की सर्दी सी थी । यूँ भी खुले में गर्मियों में भी ठंड सी मालूम होती है । नीलेश ने अपने बदन पर जैकेट डाल ली । और उसकी जेवों में हाथ डाले हुये वह पहाङियों की तरफ़ जाने लगा । डायन कहाँ हैं ? क्या कर रही है ? अब इससे उसे कोई मतलब नहीं था ।

दरअसल उसने आज रात जागते ही गुजारने का तय कर लिया था । और वह इन आगंतुकों पर बराबर नजर रखे हुये था । उसे अच्छी तरह मालूम था कि डायन का कहा मिथ्या नहीं हो सकता था । और वह इस मौत का लाइव टेलीकास्ट देखना चाहता था । जो बकौल चंडूलिका साक्षी अलफ़ थी । और टल भी सकती थी । हालांकि डायन ने अपने सभी पत्ते नहीं खोले थे । पर वह बेचारी भी नहीं जानती थी कि नीलेश महान योगियों के शक्तिपुंज से एक चेन द्वारा जुङा हुआ है । और वह बहुत कुछ जान गया है ?
जैसे ही हरीश उन जानवरों के समीप पहुँचा । उनका कुछ कुछ आकार उसे समझ आने लगा था । वे चीते के बच्चे समान कोई जानवर थे । और आपस में लङते हुये से मालूम हो रहे थे ।  उससे कुछ ही अलग चलते हुये गजानन बाबा ने किसी अदृश्य प्रेरणा से हाथ में पत्थर का टुकङा उठा लिया था । और उन जंगली जानवरों को लक्ष्य कर मारने वाला था । उसका इरादा हरीश को बचाने का था ।
चंडूलिका साक्षी इस डैथ ग्राउंड से कुछ ही अलग शान्त खङी थी । पर उसकी आँखों में एक प्यासी खूनी चमक तैर रही थी । चार भयंकर यमदूत पहाङियों पर आ चुके थे । और वे अंतिम क्षणों के लिये तैयार थे । जिसमें अब कुछ ही देर थी ।


गजानन बाबा के हाथ से फ़ेंका गया पत्थर सनसनाता हुआ एक बिल्लोरी जानवर की ओर लपका । बस इसी का डायन को इंतजार था । पत्थर लगते ही जानवर मानों अपमान से तिलमिलाया हो । उसने बैचेनी से अपने शरीर को इधर उधर घुमाया । ठीक उसी क्षण चंडूलिका ने अपनी उंगली जानवर की ओर सीधी कर दी । वह पारदर्शी आकृति वाला जानवर सशरीर हरीश के जिस्म में समाकर एकाकार हो गया । हरीश मानों एकदम से लङखङाया हो । और फ़िर झटके से सीधा हुआ । अब उसकी आँखों में वही बिल्लोरी जानवर जैसी तेज चमक नजर आ रही थी ।
गजानन बाबा के छक्के छूट गये । वह वापस बचाओ बचाओ चिल्लाता हुआ मंदिर की तरफ़ भागा ।
- अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व  । चंडूलिका साक्षी की गम्भीर महीन आवाज गूँजी -  यह देह तो मरणशील है । लेकिन इस शरीर में बैठने वाला आत्मा अमर है । इस आत्मा का न तो अन्त है । और न ही इसका दूसरा कोई मेल है । इसलिये मौत से मत भाग गजानन । और उससे युद्ध कर । मौत से भागकर तू कहाँ जायेगा । मौत तेरे सिर पर नाच रही है । तेरा अन्त आ गया ।

तभी दूसरा बिल्लोरी जानवर उछलकर लपका । और दूसरे ही क्षण वह गजानन बाबा के शरीर में समा गया । बाबा ने भागना बन्द कर दिया । और सधे सख्त कदमों से पलटकर हरीश की ओर बङा ।
- भाग..हरीश.. भाग ! अचानक सचेत होकर नीलेश चिल्लाया - भाग हरीश । जितना तेज भाग सके । यहाँ से दूर भाग ।
मगर हरीश ने मानों सुना तक नहीं । और वह किसी मल्ल योद्धा की भांति गजानन बाबा से भिङ गया । और दोनों एक दूसरे का गला दबाने लगे । यहाँ तक कि दोनों की जीभें बाहर निकल आयीं । मगर गले पर उनकी पकङ कम नहीं हुयी ।
- प्फ़ावर ! नीलेश को डायन की आवाज सुनाई दी - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
नीलेश एक क्षण में ही मौत के कानून की इस धारा को समझ गया । अब वह पीताम्बर एण्ड कंपनी के यहाँ तक आने और गजानन बाबा से जुङने तक की कहानी के एक एक पहलू को समझ गया ।
उसे याद आया । हिमालयी क्षेत्र में स्वर्ग सीङी के नजदीक भी ऐसा ही स्थान है । जहाँ पूर्वजन्म के संस्कारों से एकत्र हुये लोग स्वतः प्रेरित होकर एक दूसरे का गला दबाने लगते हैं । वास्तव में मौत के इस ओटोमैटिक सिस्टम के चलते वे दोनों शिकार खुद ही एक जगह पर आ गये । और मौत का खेल शुरू हो गया  
- हे योगी ! चंडूलिका बोली - अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः । जिनके लिये शोक नहीं करना चाहिये । उनके लिये तुम शोक कर रहे हो । और बोल तुम बुद्धिमानों की तरह रहे हो । ज्ञानी लोग न उनके लिये शोक करते है । जो चले गये । और न ही उनके लिये जो हैं ।
और अब अंतिम खेल शुरू हो चुका था ।
डायन ने उसे डन का अंगूठा दिखाया ।


मगर उसकी तरफ़ से एकदम बेपरवाह नीलेश ने खुद को एकाग्र किया । और बुदबुदाया - ..लख अलख . लख ..अलख..।
इसके साथ ही बह अपनी मध्य उंगली को अंगूठे से इस तरह से बारबार छिटकने लगा । मानों उसमें कोई गन्दी चीज लगी हो ।
तुरन्त ही वह बिल्लोरी जानवर इस शक्तिशाली प्रयोग से भयभीत हुआ हरीश के शरीर से निकलकर डायन में समा गया । डायन गुस्से में भयंकर रूप से दहाङी ।
- भाग हरीश ! अबकी बार नीलेश गला फ़ाङकर चिल्लाया - मौत से बचना चाहता है । तो भाग । जितना तेज भाग सकता है । उतना तेज भाग । और मंदिर भी मत जाना । यहाँ से दूर भाग जा । सुबह ही मंदिर लौटना । तब मैं देखूँगा ।
हरीश पर यकायक मानों नशा सा उतरा हो । उसने बिलकुल बिलम्ब नहीं किया । और तेजी से भागने लगा । नीलेश के शब्द उसका पीछा कर रहे थे - भाग हरीश । जल्दी भाग । और जल्दी । मौत तेरे पीछे है ।
गजानन बाबा जमीन पर गिर पङा था । और निचेष्ट सा हो गया था । चारों यमदूत उसके करीब आ गये थे । और उसके प्राणों को समेटकर बाहर ला रहे थे । प्राणीनामा संयुक्त होते ही बाबा का शरीर दो बार हल्के से हिला । और दम निकलते ही वह बेदम हो गया ।
यमदूतों ने चंडूलिका साक्षी को प्रणाम किया । और बाबा के जीव को लेकर हवा में 200 फ़ुट ऊँचा उठे । इसके बाद एक उज्जवल चमक सी कुछ क्षणों के लिये नजर आयी । और फ़िर वे उत्तर दिशा में यमपुरी हेतु रवाना हो गये ।
कसमसाती हुयी चंडूलिका साक्षी ने नीलेश को गुस्से से घूरा । और फ़िर डन का अंगूठा दिखाती हुयी बोली - छोङूँगी नहीं ..- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
इसके बाद वह अदृश्य हो गयी ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी । और टहलता हुआ सा मंदिर की तरफ़ जाने लगा ।

डायन THE WITCH 6

दूसरे दिन सुबह नीलेश उन लोगों के उठने से पहले ही गायब था । दरअसल वह वनखण्डी मंदिर को रात में ही नहीं गया था । अचानक कुछ ध्यान में आते ही वह उस दिशा में बङने लगा था । जिधर हरीश भागा था । वह बेहद सावधानी से उसे तलाशता हुआ जा रहा था । पर उसे हरीश कहीं नजर नहीं आया । तब वह उसकी तलाश छोङकर वनखण्डी मंदिर से पाँच किमी दूर एक अन्य मंदिर में जा पहुँचा । उस समय रात के चार बजने में कुछ ही मिनट कम थे ।
मंदिर का पुजारी और एक बाई गहरी नींद में सोये हुये थे । नीलेश की आहट से बूढा पुजारी स्वयँ ही उठ गया । वह नीलेश को एक अच्छे योगी और उच्च खानदान के सपूत के तौर पर बखूबी जानता था । उसे नीलेश को इस समय अचानक देखकर कुछ आश्चर्य सा हुआ ।
नीलेश ने उसे बता दिया । वह सुबह टहलते हुये इस तरफ़ चला आया । और पुजारी द्वारा खाली किये दीवान पर 


लेटते हुये उसने आँखे मूँद ली । मौत का यूँ साक्षात खेल उसके जीवन में पहली बार घटा था ।
कोई एक घन्टा बाद जब पुजारी ने हाथ में चाय लिये उसे झकझोरते हुये जगाया । तब वह गहरी नींद के आगोश में जा चुका था । तुलसी के पत्तों और तेज अदरक की साधुई चाय ने उसके सुस्त बदन में एक नयी स्फ़ूर्ति पैदा की । और वह फ़िर से चैतन्य होने लगा ।
कोई सवा पाँच बजे तक नीलेश वहीं मौजूद रहा । इसके बाद मंदिर में खङी एक युवा महन्त की बाइक उठाकर वह पीछे के रास्ते वनखण्डी पहुँचा । इसके बाद सबकी निगाह बचाता हुआ वह एक पेङ के सहारे दो मंजिल पर पहुँचा । और वहाँ से आसानी से तिमंजिला स्थिति अपने कमरे में आ गया ।
अब उसे नीचे का जायजा लेना था । उसने खिङकी से उस डैथ ग्राउंड का भी जायजा लिया । जहाँ गजानन बाबा देह मुक्त हुआ था । पर अभी वहाँ कोई हलचल नहीं थी । उस तरफ़ लोगों का आना जाना नौ दस बजे के लगभग ही शुरू होता था ।

तभी बदरी बाबा चाय लेकर उसके कमरे में आया । नीलेश उससे यूँ ही हालचाल लेने के अन्दाज में बात पूछने लगा ।
बदरी बाबा ने बताया । वे चारों लोग पीताम्बर एण्ड कंपनी अपनी गाङी से जा चुके हैं । और सब ठीक ही है । उसे समझ में नहीं आया कि अचानक नीलेश इस तरह क्यों पूछ रहा है ।
- नहीं । नीलेश ने बात संभाली - गजानन बाबा डायन बाधा उपचार के लिये उनके साथ जाने वाले थे । ऐसा पीताम्बर बोल रहा था । वे साथ गये या नहीं ?
बदरी बाबा बेहद उपहासी अंदाज में हँसा - गजानन बाबा चरसी चिलम के नशे में क्या बोल जाये । खुद उसे पता नहीं । वो भला क्या उपचार करेगा । सुबह मैंने उन लोगों को सब समझा दिया । दूसरे गजानन मुँह अंधेरे से ही खुद गायब है । कहीं दिशा मैदान ( शौच ) को लम्बा निकल गया ।
दूसरे वो पीताम्बर का छोरा हरीश जाने को व्याकुल था । इसलिये वो लोग फ़िर चले गये । वे तुमसे भी मिलने आये थे । पर तुम भी यहाँ नहीं थे । मैंने कह दिया । सुबह हमारी तरह ( साधु ) के लोग अक्सर इधर उधर शौच दातुन आदि को निकल जाते हैं । साधुओं की किसी बात का कोई ठिकाना नहीं होता । कब कहाँ हों ।
- और दूसरे साधु ? नीलेश ने प्रश्न किया ।

बदरी को एक बार फ़िर आश्चर्य हुआ । पर वह नीलेश का बेहद सम्मान करता था । अतः बोला - वे अभी उठे भी नहीं हैं । लगता है । चिलम ज्यादा चङा ली । क्या पता । उठने ही वाले होंगे ।
- बाबाजी ! अचानक नीलेश ने अजीव सा प्रश्न किया - आप कभी जेल गये हो ?
- नहीं तो ! बदरी उछलकर बोला - क्या ..क्या ?
- अगर ! नीलेश बेहद गम्भीरता से बोला - आगे भी नहीं जाना चाहते । तो तुरन्त बिना सवाल किये मेरे साथ चलो ।
ठीक दस मिनट बाद -
उसी बाइक पर नीलेश गजानन बाबा और बदरी बैठे हुये तेजी से जंगल की तरफ़ जा रहे थे । नीलेश का लक्ष्य वहाँ से सात किमी दूर बहने वाली विशाल नहर थी ।
वास्तव में नीलेश का बदरी को यूँ खामखाह परेशान करने का कोई इरादा नहीं था । पर इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी उसे नजर नहीं आ रहा था । अगर नहर तक का ये रास्ता कार का रास्ता होता । तो वह बदरी को इस दिल दहलाऊ कांड की खबर तक नहीं होने देता । पर यहाँ बाइक ही मुश्किल से जा सकती थी । अतः बदरी को साथ लेना । इस घटना का राजदार बनाना उसकी मजबूरी थी ।


बदरी का काम सिर्फ़ बीच में किसी असहाय मरीज की भांति बैठी गजानन की लाश को भली भांति पकङे रहना था । और इतने ही काम में वह जूङी के मरीज की तरह कांप रहा था । गजानन की लाश को किसी सवारी की भांति तरीके से बैठाने में नीलेश को पूरा जोर लगाना पङा । उसकी बाहर को लटक आयी जीभ को बमुश्किल उसने मुँह में ही जबरन घुसेङ दिया । और इसके बाद भी उसके सर पर एक अंगोछा इस तरह डाला । जैसा लोग अक्सर डाल लेते हैं ।
कोई आधा घन्टे के बोझिल सशंकित और डरावने सफ़र के बाद वे नहर के एक वीरान किनारे पर खङे थे । गजानन बाबा के पार्थिव शरीर को धङधङाती हुयी नहर में जल समाधि दे दी गयी थी । भगवान का शुक्र था । इस बीच उनके एकदम नजदीक से कोई नहीं गुजरा था । बहुत दूर से यदि किसी ने उन्हें देखा भी होगा । तो तीनों को राहगीर ही समझा होगा । नहर जिस अंदाज में धङधङाते हुये बह रही थी । उससे तो वह लाश कुछ ही घन्टों में मीलों दूर पहुँच जानी थी । लिहाजा अब बदरी बाबा काफ़ी हद तक सेफ़ था ।
गजानन बाबा वर्षों से विरक्त साधु था । अतः क्यों मर गया । कैसे मर गया । ये पूछने वाला भी कोई नहीं था । अगर उसकी लाश नहर से बरामद भी होती । तो दूर से यही लगता कि किसी साधु को जल समाधि दी गयी हो । इस तरह एक प्रतिष्ठित वनखण्डी मन्दिर हत्या के कलंक से बच गया था । और मन्दिर के पीछे लाश मिलने की सनसनीखेज खबर से उठने वाले तमाम बबाल से भी बालबाल बचा था । पुलिसिया जंजाल से भी बालबाल बचा था ।

यह बदरी बाबा अच्छी तरह से जान गया था । अतः उसकी बूढी नम आँखों में आँसुओं के साथ साथ नीलेश के प्रति कृतग्यता के भाव थे । पर अचानक यह सब क्या और कैसे हुआ था । उसको अभी भी पता नहीं था । गजानन के यकायक मर जाने से भी उसको गहरा दुख हुआ था ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी । और बाइक स्टार्ट करता हुआ बदरी को सब समझाने लगा । अब वे दोनों वनखण्डी मन्दिर जा रहे थे । रास्ते में नीलेश ने बदरी को सब कुछ समझा दिया था । मगर गोलमोल अंदाज में । सिर्फ़ तसल्ली हेतु । डायन की बात वह गोल कर गया ।
इस तरह पूरा मामला अब तक शान्ति से निपट गया था ।
वे मन्दिर पहुँचे । वहाँ पूरी तरह से शान्ति थी । किसी ने कैसा भी कोई सवाल नहीं किया ।

डायन THE WITCH 7

नीलेश पीताम्बर के शहर पहुँचा ।
आज वह तीसरे दिन आया था । दूसरा दिन भी उसने मन्दिर पर ही गुजारा था । बदरी बाबा के जीवन में उससे जुङी हुयी यह पहली हत्या थी । इसलिये अन्दर ही अन्दर वह बेहद डरा हुआ था । हालांकि नीलेश को एक परसेंट ही किसी बबाल की उम्मीद थी । फ़िर भी वह बदरी का डर समझते हुये रुक गया था ।
गजानन का थैला आदि अन्य सामान उसने दूसरे साधुओं के नोटिस में आने से पहले ही छिपा देने को कह दिया था । इस तरह अपनी समझ से उसने पूरा इंतजाम ही कर दिया था । इसके बाद भी कोई बात होती । तो बदरी के पास उसका नम्बर था । जिससे वह सीधी बात करा सकता था । तब जाकर बदरी को थोङा तसल्ली मिली । नीलेश की ऊँची पहुँच भी उसे काफ़ी हिम्मत बँधा रही थी ।
अब वह सीधा डायन के विशाल निवास में मौजूद था । एक बार को मुम्बई में अमिताभ बच्चन का निवास तलाशने में दिक्कत आ सकती थी । पर डायन का निवास तलाश करने में उसे कोई दिक्कत नहीं आयी । उसने डायन के बारे में सीधा सीधा न पूछकर पीताम्बर द्वारा बताये ब्योरे के आधार पर घुमा फ़िराकर पूछा । और आसानी से यहाँ तक बिना किसी रोक टोक के पहुँच गया । उसने पीताम्बर या हरीश से सम्पर्क करने की कोई कोशिश नहीं की
उसके साथ जलवा के नाम से प्रसिद्ध 19 साल का बातूनी बोलने की आदत से मजबूर लङका था । जिसे वह इस पूरे खेल की अहमियत समझते हुये वक्त बेवक्त जरूरत की सोचकर ले आया था । जलवा को भुतहा बातों का बङा शौक था ।

भुतहा स्थानों को देखने का बङा शौक था । भूतों का देखने का बङा शौक था । पर आज तक उसकी भूत देखने की हसरत पूरी नहीं हुयी थी । वह नीलेश की इस योगी रूप वास्तविकता से भी परिचित नहीं था । लेकिन नीलेश से कुछ कुछ अवश्य परिचित था । और उसके धनाङय होने का रौब खाता था । नीलेश ने उसे बताया । रामसे ब्रदर्स और रामगोपाल वर्मा कोई डरावनी फ़िल्म बनाना चाहते हैं । जिसके लिये उन्हें एक हटकर और रियल टायप लोकेशन की तलाश है । उसी को देखने वह जा रहा था । ये जानकर रामू जी नीलेश के दोस्त है । जलवा दंग रह गया । नीलेश के प्रति उसके मन में अतिरिक्त सम्मान बङ गया ।
लेकिन हकीकत और ख्यालात में जमीन आसमान का अन्तर होता है । यह जलवा को आज ही पता चला था ।

डायनी महल में कदम रखते ही वह जहाँ का तहाँ ठिठक कर खङा हो गया । अपने जीवन में इससे अधिक भयानक जगह उसने सपने में भी नहीं देखी थी । सपने में भी नहीं सोची थी । उस पूरे विशाल टूटे फ़ूटे मकान में बेहद गन्दगी और दुर्गन्ध का साम्राज्य कायम था । जगह जगह मरे हुये पक्षियों के सूखे पिंजर और बेतरतीब पंख बिखरे हुये थे । विभिन्न जीवों के मल और बीट की भरमार थी । सैकङों उल्लूओं के घोंसले टूटी दीवालों के मोखों में मौजूद थे । अन्य तरह की चिङियाओं । गिरगिट । छिपकली । चमगादङ । काकरोच । मेंढक । गिलहरियों आदि की भी भरमार थी । उस निवास की सफ़ाई झाङू आदि भी बहुत वर्षों से नहीं हुयी थी । नीलेश वहाँ स्वतः उग आये पेङों की लम्बी घनी पत्तेदार टहनियाँ तोङकर इकठ्ठी करने लगा । एक समान टहनियों को उसने लकङी की छाल उतारकर उसी के रेशों से बाँधकर झाङू का आकार दे दिया । जलवा हैरत से उसकी तरफ़ देख रहा था । पर समझ कुछ भी नहीं पा रहा था ।

- दादा ! वह बङे अजीव स्वर में बोला - रामू जी यहाँ शूटिंग करेंगे ?
- अरे जलवा भाई ! नीलेश उसका हाथ थामता हुआ बोला - यह फ़िल्लम वाले भी खिसके दिमाग के होते हैं । कहाँ शूटिंग करें । क्या पता । बङी जबरदस्त शूटिंग होने वाली है यहाँ । आओ चलते हैं ।
कहकर उसका हाथ थामे वह मकान में प्रवेश कर गया । और यूँ गौर से मकान का एक एक कोना देखने लगा । जैसे गम्भीरता से मकान खरीदने की सोच रहा हो । मकान की दीवालों पर जगह जगह छोटे जीवों और पक्षियों के खून से विचित्र आकृतियाँ बनी हुयी थी । तभी एक कमरे में पहुँचकर दोनों स्वतः ही ठिठक गये । इस कमरे में एक अधखायी नोची हुयी सी सङी हालत में बकरिया पङी हुयी थी । जिससे भयंकर सङांध उठ रही थी

। जलवा को पलटी ( उबकायी ) होते होते बची । इसी कमरे में एक तरफ़ पुआल आदि का लत्ते पत्ते बिछाकर बिस्तर बना हुआ था । खाये हुये पक्षियों की हड्डियाँ चारों ओर फ़ैली हुयी थी ।
- शानदार ! नीलेश बहुत हल्के से ताली बजाकर बोला - रामू जी ग्लैड ग्लैड ही हो जायेंगे । मेरी इस शानदार खोज पर ।
- दादा ! जलवा अपने आपको रोक न सका - सच बताओ । यहाँ वाकई शूटिंग होगी ?
- देख नहीं रहा ! नीलेश एक सिगरेट सुलगाकर बोला - कितनी शूटिंग तो पहले ही हो चुकी है । और अभी आगे होने वाली है ।
ग्राउंड फ़्लोर का सम्पूर्ण मुआयना करने के बाद उसने अपना रुख छत की ओर किया । और तेजी से कमजोर हालत में पहुँच चुकी डाट बेस पर बनी सीङियाँ चङता चला गया । मकान के कुछ हिस्सों में छत पर डाट की छत

थी । और कुछ कमरे लकङी के पटान वाले थे । पुरानी पकी मजबूत लकङी अभी भी पुख्ता हालत में थी । हाँ लकङी से पटी छत बीच बीच में कुछ स्थानों से गिर चुकी थी । और उनमें छोटी छोटी खिङकियाँ सी खुल गयीं थी । दूसरी मंजिल के ऊपर तिमंजिले पर सिर्फ़ चार पाँच कमरे ही थे । परन्तु नीलेश ने उन्हें देखने की कोई कोशिश तक नहीं की ।
सेकेंड फ़्लोर ग्राउंड फ़्लोर की अपेक्षा अच्छी हालत में था । संभवत डायन ऊपर कभी आती तक नहीं थी । यहाँ हवा का बहाव सही होने से दुर्गन्ध भी उतनी नहीं थी । नीलेश ने रिस्टवाच पर दृष्टि डाली । दोपहर के दो बजने वाले थे । उसने एक ऐसे ठीक हाल कमरे का चयन किया । जिससे डायन का कमरा साफ़ नजर आता था । फ़िर उसने टहनियों वाली झाङू जलवा को थमायी ।
और बोला - झाङू लगाना जानते हो ?

जलवा को फ़िर से बेहद आश्चर्य हुआ । पर वह नीलेश का मतलब समझकर कुछ न बोलता हुआ कमरे को तेजी से साफ़ करने लगा । एक घन्टे में ही कमरा रहने लायक हो चुका था ।
- तुम्हें भूख लगने लगी होगी ! अचानक फ़िर से टाइम देखता हुआ नीलेश बोला - चलो खाना खाने चलते हैं ।
- दादा ! बाहर आकर नीलेश बोला - शूटिंग लोकेशन की तो बात समझ आयी । पर वहाँ रहेगा कौन ? मेरा मतलब । वो साफ़ सफ़ाई ?
- हम लोग ! नीलेश गम्भीरता से बोला ।
जलवा का दिमाग मानों भक से उङ गया । यकायक उसे कोई प्रश्न ही नहीं सूझा ।
- मगर क्यों ? फ़िर वह बोला ।
- अरे जलवा ! नीलेश उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला - अभी लोकेशन ही तो सैट हो पायी है । अभी कोई भूत 


प्रेत जिन्न विन्न टायप हीरो भी चाहिये । कोई चुङैल वुङैल डायन वायन प्रेतनी व्रेतनी टायप हीरोइन भी तो चाहिये । फ़िर कोई पिशाच विशाच टायप खतरनाक विलेन भी चाहिये । फ़िर कोई ओझा मोजा अघोरी गारुङी टायप सिद्ध तांत्रिक बाबा भी चाहिये ।  छोटे मोटे गण भूत प्रेत कृत्या टायप छोटे कलाकार भी चाहिये । तभी तो खोज पूरी होगी । तुम्हें मालूम नहीं । रामू जी रियल मैटर पर ही फ़िल्म बनाते हैं । और फ़िर भी उनकी खौफ़नाक फ़िल्लम से नहीं डरने वाले बहादुर पर बङा इनाम भी रखते हैं । अब रियल स्टोरी में करेक्टर भी रियल होने चाहिये ना । इसलिये रियल एक्टर की भी खोज अभी होगी । तभी तो फ़िल्म जोरदार होगी ।
वैसे जलवा इस मजाकिया टायप बात को कुछ कुछ समझ तो गया । पर नीलेश का असल उद्देश्य अब भी उसकी समझ से बाहर था । वह वास्तव में यही समझ रहा था कि यहाँ वाकई शूटिंग ही होगी । लोकेशन भी फ़िल्मी ही थी । दूसरे नीलेश कोई मामूली हस्ती नहीं था । जो खामखाह ऐसी फ़ालतू जगहों पर समय बरबाद करता फ़िरे । फ़िर भी असल बात अभी तक उसके समझ में नही आयी थी । वह तो बस इसी में अपने आपको धन्य समझ रहा था कि नीलेश दादा उसे अपने साथ लाया था ।

खाना वाना से निपटते निपटते शाम के पाँच बज गये । नीलेश को अभी दो घन्टे और गुजारने थे । पर इस शहर में ऐसा कौन था । जहाँ वह टाइम पास करता । दूसरे उसे निरा टाइम भी पास नहीं करना था । उसे डायन के बारे में समाचार भी एकत्र करने थे । लोगों का अलग अलग नजरिया भी जानना था । और क्योंकि इस मिशन के हालात समझते हुये वह अपनी कार बाइक आदि नहीं लाया था । इसलिये ऐसा कोई इंतजाम भी करना चाहता था । दूसरे वह जलवा पर वह इम्प्रेस भी कायम करना चाहता था कि जलवा बिना चूँ मूँ किये उसकी हर बात आँख मूँदकर माने । क्योंकि जलवा उसे जानता तो था । मगर बहुत हद एक परसेंट ।
सो उसने सामने से आती हुयी टेक्सी को हाथ देकर रोका । टेक्सी वाले ने उसकी हस्ती से प्रभावित से होकर तुरन्त गेट खोला । और बोला - कहाँ चलूँ सर ?
- जहाँ तक घटा चले । नीलेश बैठता हुआ बोला - चाँद तारे आसमान स्वर्ग नरक जहाँ तक जा सकते हो । चलो ।
- समझ गया साहब ! टेक्सी वाला खुश होकर बोला - आपको घूमना है । मैं अच्छे से आपको घुमाता हूँ ।
टेक्सी  ड्राइवर समझ गया । मोटा मुर्गा हाथ लगा है । एक ही सवारी से अच्छी झाङी बनने वाली थी ।
पर उसकी ये खुशी अधिक देर तक न रही ।
एक आलीशान होटल पर निगाह पङते ही अचानक नीलेश बोला - जरा रुकना भाई । और यहीं वेट करना ।
फ़िर वह उतरकर सीधा औपचारिकतायें पूरी करता हुआ मैंनेजर के रूम में पहुँचा । उसने मैंनेजर से होटल के

मालिक के बारे में इस तरह पूछा । मानों खङे खङे ही होटल खरीदना चाहता हो । मगर बेहद विनमृता से । इत्तफ़ाकन मैंनेजर मैंनेजर होने के साथ साथ होटल मालिक का रिश्तेदार ही था । और इस तरह उसकी हैसियत दूसरे मालिक जैसी थी ।
तब नीलेश उसे एक शहर का नाम बताता हुआ बोला - राजनगर में किस किसको बहुत अच्छी तरह जानते हो ?
मैंनेजर ने दो तीन धनाङय उच्च वर्ग लोगों के नाम बताये । नीलेश ने सेलफ़ोन पर उसके बताये नामों में से सबसे प्रभावशाली व्यक्ति चाँदना का चुनाव करके उसका नम्बर मिलाया । जलवा और मैंनेजर दोनों ही हैरत से उसके क्रियाकलाप देख रहे थे । वे दोनों आराम से बातचीत सुन सकें । नीलेश ने इतना वाल्यूम कर दिया ।
तुरन्त दूसरी तरफ़ से फ़ोन उठा - नीलू बाबा । बङे दिनों में याद किया.. इस गरीब को । कहाँ हो आप ।
नीलेश ने बताया । और फ़िर बोला - यह मैंनेजर साहब कह रहे हैं । ये आपको जानते हैं । मगर मुझे नहीं जानते । है ना कमाल । कहकर उसने फ़ोन मैंनेजर को थमा दिया ।
मैंनेजर हक्का बक्का रह गया । दूसरी तरफ़ की बात पूरी होते होते उसके चेहरे के भाव इतनी तेजी से बदलने लगे । मानों नीलेश नीलेश न होकर अमिताभ बच्चन हो । जिसको अचानक सामने प्रकट पाकर उसका जीवन धन्य हो गया हो । उसने बात के बीच में ही वैल बजा दी । और कुछ ही क्षणों में उन दोनों के स्वागत हेतु ड्रिंक आदि आ गये ।
ये सब रामलीला नीलेश ने महज इसलिये की । क्योंकि उसे जरूरत पङने पर गाङी बाइक असलाह आदि किसी भी अप्रत्याशित चीज की आवश्यकता होने पर तुरन्त मुहैया हो जाये । और एन टाइम पर परेशानी न हो । तथा वह जलवा द्वारा भी उन्हें आसानी से मंगा सके । चाँदना साहब उसका मतलब समझ गये थे । और जब वह समझ गये

। तो फ़िर मैंनेजर को तो समझ ही जाना था ।
एक घन्टे बाद नीलेश बाहर आया । और अबकी बार उसने ड्राइवर को स्थान बताते हुये टेक्सी चलाने का आदेश दिया ।
डायनी महल से आधा किमी पहले ही उसने टेक्सी छोङ दी । ताकि ड्राइवर को उलझन न हो । और कोई बात न बने । और फ़िर वे दोनों आराम से टहलते हुये डायन के निवास की और जाने लगे ।
इतने आराम से कि डायन निवास पहुँचते पहुँचते उन्हें हल्का सा अंधेरा हो गया । जलवा को अंधेरे में उस खौफ़नाक घर में जाते समय बेहद डर लग रहा था । बाहर की अपेक्षा घर में अधिक अंधेरा था । नीलेश सीधा डायन के कमरे में पहुँचा ।
और सामने लेटी एक बेहद घिनौनी बुङिया को देखकर बोला - ताई राम राम ।
- अ..आsss ! जलवा के मुँह से डरावनी चीख निकल गयी । इस अनोखी रूपाकृति को देखकर वह इतना घबराया कि उसकी पेशाब निकलते निकलते बची ।
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