सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 1

रात का अँधेरा चारों और फ़ैल चुका था । रजनी के काले आँचल में चमकते चाँदी के मोतियों से झिलमिलाते सितारे एक लुभावना दृश्य पैदा कर रहे थे । इस पहाङी की सुरम्य गोद में बहती ठण्डी शीतल हवा तन मन को बेहद सुकून सा पहुँचा रही थी । काली गहरी रात का ये रंगीन मौसम हर प्रेमी जोङे को एक दूसरे की बाँहों में समा जाने के लिये प्रेरित कर रहा था । पर प्रसून इस खुशनुमा माहौल में बैचैनी से करवटें बदल रहा था । उसका सारा बदन किसी दहकती भट्टी के समान तप रहा था ।
- माँ ! उसके मुँह से कराह सी निकली - तू कहाँ है । आज मुझे तेरी बहुत याद आ रही है । आज मुझे तेरी बहुत जरूरत महसूस हो रही है । मेरे पास आ ना माँ । मुझे अपने ममता के आँचल में सुला ले ।
वह चारपाई से उठकर बैठ गया । उसकी उदास सूनी सूनी आँखों में से आँसू मोती बनकर गालों पर आ रहे थे । वह पिछले तीन दिनों से तेज बुखार में जल रहा था । और खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहा था । आज उसे अपना बचपन याद आ रहा था । माँ की ममतामयी गोद याद आ रही थी । वह सोच रहा था । किसी जादू की तरह माँ उसके करीब होती । और वह उसके आँचल में छुपकर किसी मासूम बच्चे की भांति सो जाता । उसने सोचा । सच है माँ ..माँ ही होती है । उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता ।
वह जी भर के किसी बच्चे की भांति फ़ूट फ़ूट कर रोना चाहता था । माँ के सीने से लग जाना चाहता था । पर माँ नहीं थी । दूर दूर तक नहीं थी । उसने उँगलियों से खुद ही अपने बहते हुये आँसुओं को पोंछा । और रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । रात के 9 बजने ही वाले थे ।
इस समय वह कामाक्षा मन्दिर की सबसे ऊपरी छत पर था । और एकदम अकेला था । कामाक्षा मन्दिर में किसी कामरूपा देवी की स्थापना थी । जो वहाँ के पुजारी चाऊँ बाबा के अनुसार कामहीनता से गृसित स्त्री पुरुषों की उनकी पूजा के आधार पर मनोकामना पूर्ण करती थी । कोई पुरुष पौरुषहीनता का शिकार हो । किसी स्त्री में कामेच्छा उत्पन्न न होती हो । सम्भोग में तृप्ति न होती हो । स्त्रियों के अंग विकसित न होते हो । आदि ऐसी इच्छाओं को कामरूपा से मन्नत माँगने पर वे अक्सर पूरी हो जाती थी ।
कामाक्षा मन्दिर अजीव स्टायल में बना था । एक बेहद ऊँची पहाङी के ठीक पीछे उसकी तलहटी में बना ये मन्दिर हर दृष्टि से अजीव था । मन्दिर की सबसे ऊपरी तिमंजिला छत और पहाङी की चोटी लगभग बराबर थी । वह पहाङी घूमकर मन्दिर से इस तरह सटी हुयी थी कि मन्दिर की इस छत से सीधा पहाङी पर जा सकते थे । पहाङी के बाद लगभग एक किमी तक छोटी बङी अन्य पहाङियों का सिलसिला था । और उनके बीच में कई तरह के जंगली वृक्ष झाङियाँ आदि किसी छोटे जंगल के समान उगे हुये थे । इस छोटे से पहाङी जंगल के बाद बायपास रोड था । जिस पर 24 आवर वाहनों का आना जाना लगा रहता था । मन्दिर के बैक साइड में कुछ ही दूर चलकर यमुना नदी थी । यहाँ यमुना का पाट लगभग 300 मीटर चौङा हो गया था । और गहराई बहुत ज्यादा ही थी । यमुना पार करके कुछ दूर तक खेतों का सिलसिला था । फ़िर एक बङा मैदान और लम्बी चौङी ऊसर जमीन थी । इसी ऊसर जमीन पर बहुत पुराना शमशान था । और इसके बाद शालिमपुर नाम का गाँव था ।
फ़िर वह उठकर टहलने लगा । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और हल्का सा कश लिया । मगर तेज बुखार में वह सिगरेट उसे एकदम बेकार बेमजा सी लगी । उसने सिगरेट को पहाङी की तरफ़ उछाल दिया । और यमुना के पार दृष्टि दौङाई । दूर शालिमपुर गाँव में जगह जगह जलते बल्ब किसी जुगनू की भांति टिमटिमा रहे थे । शमशान में किसी की चिता जल रही थी । चिता..इंसान को सभी चिन्ताओं से मुक्त कर देने वाली चिता । एक दिन उसकी भी चिता जल जाने वाली थी । और तब वह जीता जागता चलता फ़िरता माटी का पुतला फ़िर से माटी में मिल जाने वाला था । क्या इस जीवन की कहानी बस इतनी ही है ?
किसी फ़िल्मी परदे पर चलती फ़िल्म । शो शुरू । फ़िल्म शुरू । शो खत्म । फ़िल्म खत्म ।
वह पिछले आठ दिनों से कामाक्षा में रुका हुआ था । और शायद बेमकसद ही यहाँ आया था । अब तो उसे लगने लगा था । उसकी जिन्दगी ही बेमकसद थी । क्या मकसद है ? इस जिन्दगी का ?
ओमियो तारा की कैद में बिताये जीवन के 6 महीनों ने उसकी सोच ही बदल दी थी । उसे लगा । सब कुछ बेकार है । सब कुछ । सत्य शायद कुछ भी नहीं है । और कहीं भी नहीं है । वह 3 आसमान तक पहुँच रखने वाला योगी था । हजारों लोकों में स्वेच्छा से आता जाता था । पर इससे क्या हासिल हुआ था ? कुछ भी तो नहीं ।
ये ठीक ऐसा ही था । जैसे प्रथ्वी के धन कुबेर अपने निजी जेट विमानों से कुछ ही देर में प्रथ्वी के किसी भी स्थान

पर पहुँच जाते थे । लेकिन उससे क्या था । प्रथ्वी वही थी । सब कुछ वही था । फ़िर सत्य कहाँ था । सत्य कहाँ है ?
वह तमाम लोकों में गया । सब जगह । सब कुछ यही तो था । वही सूक्ष्म स्त्री पुरुष । वही कामवासना । वैसा ही जीवन । सब कुछ वैसा ही । क्या फ़र्क पङना था । अपनी कुछ योग उपलब्धियों के बाद वह इनमें से किसी लोक का वासी हो जाता । और लम्बे समय के लिये हो जाता । मगर अभी तलाश पूरी कहाँ हुयी । वह तलाश जिसके लिये उसने अपना जीवन ही दाव पर लगाया था । सत्यकीखोज । आखिर सत्य क्या है ?
यह रहस्यमय अजूबी सृष्टि आखिर किसने बनाई । कैसे बनी । किस नियम से चलती है । इसका नियन्त्रण आखिर कहाँ है । यह सब कुछ जानना तो दूर । उसे एक भी प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिला था ।
ओमियो तारा जैसा योगी अपनी योग शक्तियों से भगवान बैठता है । स्वयँभू भगवान । और अन्ततः अपने ही जाल में फ़ँस जाता है । न सिर्फ़ खुद फ़ँसता है । बल्कि अपने 4D पिंजरे के जाल में कई निर्दोष आत्माओं को फ़ँसा देता है ।
ओमियो तारा की याद आते ही प्रसून के शरीर में अनजाने भय की झुरझुरी सी दौङ गयी । वह खुद बङी मुश्किल से 4D Matter होते होते बचा था । अगर वह 4D Matter हो जाता । फ़िर उसका क्या होता ? क्या उसके गुरु उसे बचाते । वह कितने समय तक उस स्थिति में रहता । ऐसे तमाम सवालों का कोई जबाब उसके पास नहीं था ।
बेचारा नीलेश उसे जाने क्या क्या समझ बैठा था । और छोटी मोटी तन्त्र मन्त्र उपलब्धियों को पाकर समझता था कि वह जीवन के अन्तिम सत्य को एक दिन उसकी सहायता से समझ ही जायेगा । अब वह उसे कैसे समझाये । वह अन्तिम सत्य के करीव अभी दूर दूर तक भी नहीं फ़टका था । और शायद उसके गुरु भी । क्या.. शायद द्वैत में अन्तिम सत्य है ही नहीं । अब उसका यही विचार पक्का होने लगा था ।
यही सब सोचते हुये वह फ़िर से चारपाई पर बैठ गया । चारपाई पर मच्छरों से बचने के लिये मच्छरदानी लगी हुयी थी । और मच्छरदानी की छत पर एक मोटा कपङा ओस से बचने के लिये तना हुआ था । फ़िर भी मच्छरों के झुँड आसपास मँडरा रहे थे । उसने दो क्वाइल इकठ्ठी जलाकर चारपाई के नीचे लगा दी । तभी उसे सीङियों पर किसी के आने की आहट हुयी ।
कुछ ही क्षणों में चाऊँ बाबा किसी अनजाने आदमी के साथ ऊपर आया । उसके हाथ में चाय से भरे दो गिलास थे । वे दोनों बहीं पङी बेंच पर बैठ गये । चाऊँ ने उसका हाथ थामकर बुखार देखा । और आश्चर्य से चीखते चीखते बचा । प्रसून का बदन किसी तपती भट्टी के समान दहक रहा था । उसने प्रसून के चेहरे की तरफ़ गौर से देखा । पर वह एकदम शान्त था । बस पिछले कुछ दिनों से उदासी स्थायी रूप से उसके चेहरे पर छाई हुयी थी ।
- आप कुछ औषधि क्यों नहीं लेते ? चाऊँ बेहद सहानुभूति से बोला ।
प्रसून ने कोई उत्तर नहीं दिया । उसका चेहरा एकदम भावशून्य था । वह यमुना पार के शमशान में जलती हुयी चिता को देखने लगा । चाऊँ ने साथ आये आदमी का उससे परिचय कराया । और रात के खाने के लिये उससे पूछा । जिसके लिये उसने साफ़ मना कर दिया । तब चाऊँ नीचे चला गया ।
प्रसून धीरे धीरे चाय सिप करने लगा । बाबा लोगों की इस खास तीखी चाय ने उसे राहत सी दी ।
दूसरे आदमी का नाम महावीर था । और वह इस जलती चिता के पार बसे शालिमपुर गाँव का ही रहने वाला था । चाऊँ से यह जानकर प्रसून एक पहुँचा हुआ योगी है । उच्च स्तर का तान्त्रिक मान्त्रिक है । उसे प्रसून से मिलने की जबरदस्त इच्छा हुयी । और वह ऊपर चला आया । पर प्रसून को देखकर उसे बङी हैरत हुयी । वह किसी बङी दाढी लम्बे केश और महात्मा जैसी साधुई वेशभूषा की कल्पना करता हुआ ऊपर आया था । और चाऊँ के मुँह से उसकी बढाई सुनकर श्रद्धा से उसके पैरों में लौट जाने की इच्छा रखता था ।
पर सामने जींस और ढीली ढाली शर्ट पहने इस फ़िल्मी हीरो को देखकर उसकी सारी श्रद्धा कपूर के धुँये की भांति उङ गयी । और जैसे तैसे वह मुश्किल से नमस्कार ही कर सका ।
महावीर धीरे धीरे चाय के घूँट भरता हुआ प्रसून को देख रहा था । और प्रसून रह रहकर उस जलती चिता को देख रहा था । क्या गति हुयी होगी ? इस मरने वाले की । जीवन की परीक्षा में यह पास हुआ होगा । या फ़ेल । यमदूतों से पिट रहा होगा । या बाइज्जत गया होगा । या सीधा 84 में फ़ेंक दिया गया होगा ।
- वह सुरेश था । अचानक महावीर की आवाज सुनकर उसकी तन्द्रा भंग हुयी । महावीर ने उसकी निगाह का लक्ष्य समझ लिया था । अतः उसके पीछे पीछे उसने भी जलती चिता को देखा । और बोला - मेरा खास परिचय वाला था । पर किसी विशेष कारणवश मैं इस । उसने चिता की तरफ़ उँगली की - इस अंतिम संस्कार में नहीं गया । कल तक अच्छा खासा था । जवान था । पठ्ठा था । चलता था । तो धरती हिलाता था । बङा अच्छा इंसान था । आज खत्म हो गया । कहते हैं ना । मौत और ग्राहक के आने का कोई समय नहीं होता । अपने पीछे दो बच्चों और जवान बीबी को छोङ गया है ।
- कैसे मरे ? प्रसून भावहीन स्वर में निगाह हटाये बिना ही बोला ।
- अब कहें तो । बङा ताज्जुब सा ही है । बस दोपहर को बैठे बैठे अचानक सीने में दर्द उठा । घबराहट सी महसूस हुयी । एक छोटी सी उल्टी भी हुयी । जिसमें थोङा सा खून भी आया । लोग तेजी से डाक्टर के पास शहर ले जाने को हुये । मगर तब तक पंछी पिजरा खाली करके उङ गया । पता तो तभी लग गया था । अब इसमें कुछ नहीं रहा । मगर फ़िर भी गाङी में डालकर डाक्टर के पास ले गये । डाक्टर ने छूते ही बता दिया । मर गया है । ले जाओ ।
वापस घर ले आये । घर से वहाँ ले आये । कहते कहते महावीर ने चिता की तरफ़ उँगली उठाई - वहाँ । जहाँ से अब कहीं नहीं ले जाना । देखिये ना । कितने आश्चर्य की बात है । आज सुबह तक ऐसा कुछ भी किसी को नहीं मालूम था । सुबह मैं इसको चलते हुये देख रहा था । और अब जलते हुये देख रहा हूँ । इसी को कहते हैं ना । खबर नहीं पल की । तू बात करे कल की ।
प्रसून ने एक गहरी साँस भरी । उसने गिलास नीचे रख दिया । अब उसे कुछ फ़ुर्ती सी महसूस हुयी । सिगरेट पीने की इच्छा भी हुयी । उसने फ़िर से एक सिगरेट सुलगा ली ।
- प्रसून जी ! कुछ देर बाद महावीर बोला - पिछले कुछ महीनों से मैं एक बङी अजीव सी स्थिति का सामना कर रहा हूँ । सोच रहा हूँ । आपको कहूँ । या न कहूँ । चाऊँ महाराज आपकी बङी तारीफ़ कर रहे थे । वैसे मैं इसी सामने के गाँव में रहता हूँ । ग्रामीण भी हूँ । पर मेरे विचार एकदम आधुनिक ही हैं । साफ़ साफ़ शब्दों में कहूँ । तो मेरा ख्याल है कि भूत प्रेत जैसा कुछ नहीं होता । यह सब आदमी के दिमाग की उपज है । निरा भृम है । और किवदन्तियों से बन गयी महज एक कल्पना ही है । आपका क्या ख्याल है ? इस बारे में ।
बरबस ही प्रसून की निगाह शमशान क्षेत्र के आसपास घूमते हुये रात्रिचर प्रेतों पर चली गयी । जहाँ कुछ छोटे गणों का झुँड घूम रहा था । चिता का जलना अब समाप्ति पर आ पहुँचा था ।
उसने कलाई घङी पर निगाह डाली । दस बजने वाले थे ।
- सही हैं । फ़िर वह बोला - आपके विचार एकदम सही हैं । भूत प्रेत जैसा कुछ नहीं होता । यह आदमी की आदमी द्वारा रोमांच पैदा करने को की गयी कल्पना भर ही है । अगर भूत होते ।.. वह फ़िर से प्रेतों को देखता हुआ बोला - तो कभी न कभी । किसी न किसी को । दिखाई तो देते । उनका कोई सबूत होता । कोई फ़ोटो होता । अन्य कैसा भी कुछ तो होता । जाहिर है । यह समाज में फ़ैला निरा अँधविश्वास ही है ।
महावीर किसी विजेता की तरह मुस्कराया । उसने प्रसून से बिना पूछे ही उसके सिगरेट केस से सिगरेट निकाली । और सुलगाता हुआ बोला - ये हुयी ना । पढे लिखों वाली बात । वरना भारत के लोगों का बस चले । तो हर आदमी को भूत बता दें । और हर औरत को चुङैल । आपकी बात ने तो मानों मेरे सीने से बोझ ही उतार दिया । मेरा सारा डर ही खत्म कर दिया । सारा डर ही । मैं खामखाह कुछ अजीव से ख्यालों से डर रहा था ।
- कैसे ख्याल । प्रसून उत्सुकता से बोला - मैं कुछ समझा नहीं ।
- अ अरे व वो कुछ नहीं । महावीर लापरवाही से बोला - जैसे आपने किसी को मरते मारते देख लिया हो । और आपको ख्याल आने लगे कि कहीं ये बन्दा भूत सूत बनकर तो नहीं सतायेगा । ऐसे ही फ़ालतू के ख्यालात । एकदम फ़ालतू बातें । दिमाग में अक्सर आ ही जाती हैं ।
प्रसून चुप ही रहा । उसने बची हुयी सिगरेट फ़ेंक दी । और उँगलियों को चटकाने लगा ।
- लेकिन ! महावीर फ़िर से बोला - लेकिन ! आपकी बात से यह तो सिद्ध हुआ कि भूत प्रेत नहीं होते । लेकिन फ़िर आजकल पिछले कुछ समय से जो मेरे साथ हो रहा है । वह क्या है ? वह कौन है ? प्रसून जी ! आप जानना चाहोगे ?
प्रसून ने आसमान में चमकते तारों को देखा । उसने अपने बालों में उँगलिया घुमाई । और फ़िर महावीर की तरफ़ देखने लगा ।

प्रसून का इंसाफ़ 2

यही कोई रात के 11 बजे का समय होने जा रहा था । पर महावीर की आँखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था । वह अपने गाँव शालिमपुर से 6 किमी दूर अपने टयूबबैल पर लेटा हुआ था । अक्सर ही वह इस टयूबबैल पर लेटता था । कभी कभी उसके चार भाईयों में से भी कोई लेट जाता था । पर अभी कुछ दिनों से उसके भाईयों को यहाँ लेटने में एक अजीव सा भय  महसूस होने लगा था ।
वे कहते थे कि उनकी आम महुआ की बगीची की तरफ़ से कोई औरत सफ़ेद साङी पहने हुये अक्सर टयूब बैल की तरफ़ आती दिखाई देती थी । और तब अक्सर रात के एक दो बजे का समय होता था । हैरानी की बात ये थी कि जब वह दिखना शुरू होती थी । तब वे गहरी नींद में होते थे । उसी नींद में वह उसी तरह महुआ बगीची की तरफ़ से चलकर आती थी । और उन्हें जागते हुये की तरह ही दिखाई देती थी । उसके दिखते ही किसी चमत्कार की तरह उनकी नींद खुल जाती थी । और वे उठकर बैठ जाते थे ।
लेकिन बस उनके आँखे बन्द और खुले होने का फ़र्क हो जाता था । बाकी वह रहस्यमय औरत ठीक उसी स्थान पर होती थी । जहाँ तक वह आँखे बन्द होने की अवस्था में होती थी । उसको देखते ही उनके शरीर के सभी रोगंटे खङे हो जाते थे । उन्हें एकाएक ऐसा भी लगता था कि उन्हें तेज पेशाब सी लग रही है । मगर वह वहीं के वहीं मन्त्रमुग्ध से बैठे रह जाते थे ।
फ़िर वह औरत एक उँगली मोङकर उन्हें पास बुलाने का  इशारा करती थी । कामुक इशारे भी करती थी । पर वे भयवश उसके पास नहीं जाते थे । तब वह खीजकर एक उँगली को चाकू की तरह गरदन पर फ़ेरकर इशारा करती थी कि वह उन्हें काट डालेगी । फ़िर वह इधर उधर चक्कर लगाकर वापस बगिया के पीछे जाकर कहीं खो जाती थी ।
ऐसा अनुभव होते ही उसके भाईयों ने टयूबबैल पर लेटना बन्द कर दिया था । उसका भाई घनश्याम तो रात के उसी टाइम टयूबबैल छोङकर घर भाग आया था । और दोबारा नहीं लेटा । दूसरा पटवारी तीन चार दिन हिम्मत करके लेटा । फ़िर उसकी भी हिम्मत जबाब दे गयी । वह अचानक बीमार भी हो गया । और छोटा तो भूतों के नाम से ही काँपता था । सो अब यह जिम्मेवारी महावीर पर ही आ गयी थी ।
उन सबके देखे महावीर दिलेर था । वह भूत प्रेतों को नहीं मानता था । दूसरे कभी कभी वह एक गिरोह के साथ डकैती डालने में भी बतौर डकैत शामिल रहता था । अतः रात बिरात ऐसे बीहङों पर रहने का उसे खासा तर्जुबा था । उसने भूत छोङो । आज तक भूत का चुहिया जैसा बच्चा भी कहीं नहीं देखा था ।
अतः अपने भाईयों के डरपोक होने की हँसी उङाता हुआ वह टयूबबैल पर खुद लेटने लगा । और आज उसे दस दिन हो गये थे । इन दस दिनों में उसे एक काली सी छाया सिर्फ़ सपने में दिखाई दी । वह एक भयंकर काले रंग की पूर्ण नग्न औरत थी । जो हाथ में एक बङा सा हड्डा पकङे रहती थी । उसको देखते ही वह हङबङाकर जाग गया था । और जब वह उठा । तब वह पसीने से तरबतर था । उसकी साँस धौंकनी के समान चल रही थी । पर जागने पर कहीं कुछ न था । जैसा कि उसके भाई कहते थे । फ़िर ऐसा तीन चार बार हुआ था । बस एक बार ये अन्तर हुआ कि जब वह काली औरत दिखी । तो उसके स्तन  और कमर के आसपास काफ़ी बङे बङे बाल थे । मानों वह बालों से बना कोई वस्त्र पहने हो । बस इतना ही दृश्य उसे दिखा था ।


महावीर अपना लायसेंसी रिवाल्वर हमेशा साथ रखता था । अतः यहाँ भी सोते समय वह उसे पूर्ण ऐहतियात के साथ रखने लगा । पर आज तो उसे नींद ही नहीं आ रही थी । वह एक अजीव सी बैचेनी महसूस कर रहा था । अतः वह चारपाई पर उठकर बैठ गया । और बीङी सुलगाकर उसका कश लेते हुये दिमाग को संयत करने की कोशिश करने लगा । फ़िर उसने थोङी दूर स्थिति महुआ बगीची को देखा । बगीची के आसपास एकदम शान्ति छाई हुयी थी । रात के काले अँधेरे में सभी पेङ रहस्यमय प्रेत के समान शान्त खङे थे ।
वह उठकर टहलने लगा । रिवाल्वर उसने कमर में लगा ली । और बीङी का धुँआ छोङते हुये इधर उधर देखने लगा ।
तभी उसकी निगाह यमुना पारी शमशान की तरफ़ गयी । और वह बुरी तरह चौक गया । नीम शीशम के दो पेङो के बीच एक मँझले कद की औरत दो छोटे बच्चों के साथ घूम रही थी । अभी लगभग बारह बजने वाले थे । और यह औरत अकेली यहाँ इन छोटे छोटे बच्चों के साथ क्या कर रही थी । जहाँ इस वक्त कोई आदमी भी अकेले में आता हुआ घबराता है । यह ठीक वैसा ही था । जैसे कोई औरत अपने खेलते हुये बच्चों की निगरानी कर रही हो ।
वह इसका पता लगाने के लिये वहाँ जाना चाहता था । पर उसकी हिम्मत न हुयी । वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा । फ़िर वे लोग अंधेरे में गायब हो गये । दो बच्चों के साथ इस रहस्यमय औरत ने उसे और भी भयानक सस्पेंस में डाल दिया था । क्या माजरा था । क्या रहस्य था । उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ।
अब उसे भी टयूब बैल पर लेटते हुये भय लगने लगा था । पर वह यह बात भला किससे और कैसे कहता । अतः उसे मजबूरी में लेटना पङता था । पर वह बिलकुल नहीं सो पाता था । वह काली नग्न औरत और वह दो बच्चों वाली रहस्यमय औरत उसे अक्सर दिखायी देते थे । जाने किस अज्ञात भावना से अब तक वह यह बात किसी को बता भी नहीं पाया ।
इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा । पर उसे उसके चेहरे पर कोई खास भाव नजर नहीं आया । जबकि वह कुछ जानने की आशा कर रहा था । तब उसने अपनी तरफ़ से ही पूछा ।
- कुछ खास नहीं । प्रसून लापरवाही से बोला - कभी कभी ऐसे भृम हो ही जाते हैं । अब जैसे तेज धूप में रेगिस्तान में पानी नजर आता है । पर होता नहीं है । जिन्दगी एक सपना ही तो है । और सपने में कुछ भी दिखाई दे सकता है । कुछ भी ।
महावीर उसके उत्तर से संतुष्ट तो नहीं हुआ । मगर आगे कुछ नहीं बोला । दरअसल उसे ये अहसास भी हो गया था कि प्रसून अपने तेज बुखार के चलते अशान्त था । और बात करने में परेशानी अनुभव कर रहा था । बस शिष्टाचार के चलते उसे मना नहीं कर पा रहा था ।
अतः उसने भी इस समय उसे तंग करना उचित नहीं समझा । और फ़िर किसी समय आने की सोचकर चला गया ।
वास्तव में यही सच था । प्रसून पर एक आंतरिक चिङचिङाहट सी छायी हुयी थी । पर ऊपर से वह एकदम शान्त लग रहा था । महावीर के जाने के बाद उसने चारपायी पर लेटकर आँखें बन्द कर लीं ।

प्रसून का इंसाफ़ 3

प्रसून चुपचाप लेटा हुआ था । उसकी आँखों में नींद नहीं थी । जबकि वह गहरी नींद सो जाना चाहता था । बल्कि वह तो अब हमेशा के लिये ही सो जाना चाहता था । जाने क्यों जिन्दगी से यकायक ही उसका मोहभंग हो गया था । वह इस जीवन से ऊब चुका था ।
उसने मोबायल निकालकर उसमें टाइम देखा । रात का एक बजने वाला था । रात काफ़ी गहरा चुकी थी । चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था । सब नींद के आगोश में जा चुके थे । उसने एक सिगरेट सुलगायी । और बैचेनी से फ़िर से उठकर बैठ गया । उसका मुँह यमुना पारी शमशान की तरफ़ था । शमशान में भी पूर्ण शान्ति सन्नाटे का माहौल था । तमाम प्रेत इधर उधर अपनी रात्रिचर्या हेतु चले गये थे । बस राख बना सुरेश ही वहाँ अकेला पङा था ।
रात का ये माहौल कभी उसे बेहद पसन्द था । कितनी रहस्यमय होती है । ये रात भी । जो इंसान के लिये रात होती है । वह सिद्धों योगियों सन्तों के लिये दिन होता है । और जो इंसान के लिये दिन होता है । वह योगियों की रात होती है । कोई मामूली चीज नहीं होती है रात । रात में अधिकांश इंसानों की उनके सो जाने से संसार में फ़ैली वासनायें सिमट जाती हैं । और तब दो ही लोग जागते है । भोगी और योगी । काम इच्छा के भोगी रात के शान्त शीतल माहौल में मदन उत्सव मनाते हैं । और योगी अपनी शक्तियों को जगाते हैं । बस इंसानों के स्तर पर रात इन्हीं दो बातों के लिये ही होती है । लेकिन इसके अतिरिक्त रात के रहस्यमय आवरण में क्या क्या छुपा होता है । क्या क्या और होता है । ये बिरला ही जान पाते हैं ।
अतः रात उसके लिये कभी प्रेमिका के समान थी । एक शान्त प्रेमिका । जो प्रेमी का भाव समझकर उसकी इच्छानुसार समर्पण के लिये उसके सामने बिछी रहती है ।
बुखार बिलकुल भी कम नहीं हुआ था । बल्कि शायद और अधिक तेज हो गया था । पर वह एकदम शान्त था । वह चाहता तो बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसी पहाङी से कुछ दूर झाङियों में वह औषधीय पौधे उसने देखे थे । जिनका सिर्फ़ एक बार काङा पीने से बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसके अलावा भी वह आराम से किसी डाक्टर से दबा ले सकता था । पर ये दोनों ही काम वह नहीं कर सकता था ।
इनको करने का मतलब था । फ़ेल होना । योग की परीक्षा में फ़ेल हो जाना । अतः वह शान्त था । और शरीर की प्रयोगशाला में शरीर द्वारा ही शरीर को विकार रहित करने का सफ़ल प्रयोग देख रहा था । वह उन घटकों को स्वयँ शीघ्र भी क्रियाशील कर सकता था । जो उसे जल्द स्वस्थ कर सकते थे । पर ये भी गलत था । एक शान्त योगी के साथ प्रकृति कैसे अपना कार्य करती है । वह इस परीक्षण से गुजर रहा था ।
उसकी निगाह फ़िर से शमशान की तरफ़ गयी । और अबकी बार वह चौंक गया ।
उसके सामने एक अजीव दृश्य था । कपालिनी कामारिका और कंकालिनी नाम से पुकारी जाने वाली तीन गणें शमशान वाले रास्ते पर जा रही थीं । पर उसके लिये ये चौंकने जैसी कोई बात नहीं थी । चौंकने वाली बात ये थी कि वे रास्ते से कुछ हटकर खङी एक मँझले कद की औरत को धमका सा रही थी । औरत के पास ही दो छोटे बच्चे 


खङे थे । वह औरत उनके हाथ जोङ रही थी । कामारिका आगे खङी थी । और उस औरत के गाल और स्तनों में थप्पङ मार रही थी । फ़िर उसने औरत के बाल पकङ लिये । और तेजी से उसे घुमा दिया । फ़िर कपालिनी और कंकालिनी उसको लातों से मारने लगी ।
प्रसून की आँखों में खून उतर आया । उसका दहकता बदन और भी दुगने ताप से तपने लगा । शान्त योगी एकदम खूँखार सा हो उठा । फ़िर उसने अपने आपको संयत किया । और ध्यान वहीं केन्द्रित कर दिया । अब उसे वहाँ की आवाज सुनाई देने लगी ।
- नहीं नहीं ! वह औरत हाथ जोङते हुये चिल्ला रही थी - मुझ पर रहम करो । मेरे बच्चों पर रहम करो ।
पर खतरनाक पिशाचिनी सी कामारिका कोई रहम दिखाने को तैयार ही न थी । उसने दाँत चमकाते हुये जबङे भींचे । और जोरदार थप्पङ उस औरत के गाल पर फ़िर से मारा । इस पैशाचिक थप्पङ के पङते ही वह औरत फ़िरकनी के समान ही अपने स्थान पर घूम गयी । उसकी चीखें निकलने लगी । उसके बच्चे भी माँ माँ करते हुये रो रहे थे । पर डायनों के दिल में कोई रहम नहीं आ रहा था ।
- भगवान..हे भगवान..मुझे बचा ! वह औरत आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर रोते हुये बोली - मुझे बचा । कम से कम मेरे बच्चों पर रहम कर मालिक ।
- मूर्ख जीवात्मा ! कामारिका दाँत पीसकर बोली - कहीं कोई भगवान नहीं है । भगवान सिर्फ़ एक कल्पना है । चारों तरफ़ प्रेतों का राज चलता है । तू कब तक यूँ भटकेगी ।
- ये ऐसे नहीं मानेगी ! कपालिनी आपस में अपने हाथ की मुठ्ठियाँ बजाते हुये बोली ।
फ़िर उसने उसके दोनों बच्चे उठा लिये । और गेंद की तरह हवा में उछालने लगी । बच्चे अरब देशों में होने वाली ऊँट दौङ पर बैठे बच्चों के समान चिंघाङते हुये जोर जोर से रोने  लगे । उधर कंकालिनी ने वापिस उसे लात घूँसों पर रख लिया ।
प्रसून को अब सिर्फ़ उस औरत के मुँह से भगवान और मेरे बच्चे तथा दोनों माँ बच्चों के चीखने चिल्लाने की ही आवाज सुनाई दे रही थी । तीनों डायनें मुक्त भाव से अट्टाहास कर रही थी ।
प्रसून की आँखे लाल अंगारा हो गयी । उसका जलता बदन थरथर कांपने लगा । यहाँ तक कि उसे समझ में नहीं आया । क्या करे । उसके पास कोई यन्त्र न था । कोई तैयारी न थी । वे सब वहुत दूर थे । और जब तक वह यमुना पार करके वहाँ पहुँचता । तब तक तो वो डायनें शायद उसका भुर्ता ही बना देने वाली थीं
उसने आँखे बन्द कर ली । और उसके मुँह से लययुक्त महीन ध्वनि निकलने लगी - अलख .. बाबा .. अलख .. बाबा .. अलख ।
एक मिनट बाद ही उसने आँखें खोल दी । उसके चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था । उसने हाथ की मुठ्ठी बाँधी । और घङी वाले स्थान तक हाथ के रूप में औरत की कल्पना की । फ़िर उसने सामने देखा । कामारिका कमर पर हाथ टिकाये दोनों डायनों द्वारा औरत और बच्चों को ताङित होते हुये देख रही थी । उसने उसी को लक्ष्य किया ।
फ़िर उसने मुठ्ठी से उँगली का पोरुआ निकाला । और नारी स्तन के रूप में कल्पना की । फ़िर उसने वह पोरुआ बेदर्दी से दाँतों से चबा लिया ।
- हा..आईऽऽऽ ! कामारिका जोर से चिल्लाई । उसने अपने स्तन पर हाथ रखा । और चौंककर इधर उधर देखने लगी । वह पीङा का अनुभव करते हुये अपना स्तन सहला रही थी । कपालिनी कंकालिनी भी सहमकर उसे देखने लगी ।
प्रसून ने उसके दूसरे स्तन का भाव किया । और अबकी दुगनी निर्ममता दिखाई । कामारिका अबकी भयंकर पीङा से चीख उठी । उसने दोनों स्तन पर हाथ रख लिया ।  और लङखङाकर गिरने को हुयी । दोनों डायनें भौंचक्का रह गयी ।
फ़िर कपालिनी संभली । और दाँत पीसकर बोली - हरामजादे ! कौन है तू ? सामने क्यों नहीं आता । जिगरवाला है । तो सामने आ.. नामर्द ।
तभी कपालिनी को अपने गाल पर जोरदार थप्पङ का अहसास हुआ । थप्पङ की तीवृता इतनी भयंकर थी कि वह झूमती हुयी सी उसी औरत के कदमों में जा गिरी । जिसका अभी अभी वह कचूमर निकालने पर तुली थी ।
- बताते क्यों नहीं ! कामारिका फ़िर से संभलकर सहमकर बोली..त त तुम..आप..आप कौन हो ?
- इधर देख ! प्रसून के मुँह से मानसिक आदेश युक्त बहुत ही धीमा स्वर निकला ।
तीनों ने चौंककर उसकी दिशा में ठीक उसकी तरफ़ देखा । फ़िर - योगी है..कहकर वे बेशर्म स्ट्रिप डांसरों  के समान उसकी तरफ़ अश्लील भाव से स्तन हिलाती हुयी भाग गयीं ।
वह औरत बङी हैरानी से यह दिलचस्प नजारा देख रही थी । उसने अपने दोनों बच्चों को गोद में उठा लिया था । और आश्चर्यचकित सी थी । उसने एक एक बात सुनी थी । फ़िर वह वहीं टीले पर बैठ गयी ।
प्रसून ने एक निगाह नीचे कामाक्षा के आँगन में सोये लोगों पर डाली । और फ़िर जीने से उतरने के बजाय सीधा पहाङी पर कूद गया । वह यमुना पाट की तरफ़ जाने को हुआ । लेकिन फ़िर कुछ सोचकर वापस मन्दिर की तरफ़ आया । और उसने चढावे का बहुत सा प्रसाद आदि एक थैली में बाँध लिया ।
फ़िर तेजी से इधर उधर कूदता फ़ाँदता हुआ वह रास्ता पार करके यमुना के पाट पर आया । एक मिनट के भीतर ही उसने सभी कपङे उतार दिये । और बिलकुल नंगा हो गया । यमुना के ठण्डे पानी और अपने बुखार की कल्पना करके एक बार को वह काँप गया । फ़िर उसके चेहरे पर दृण भाव आये । और कपङों की पोटली हाथ में थामे ऊँचा किये हुये वह यमुना के पानी में उतर गया । कुछ ही देर में तैरता हुआ वह दूसरी तरफ़ पहुँच गया । उसने तेजी से कपङे वापस पहने । और फ़िर तेज तेज कदमों से शमशान की तरफ़ जाने लगा ।

प्रसून का इंसाफ़ 4

लम्बे लम्बे डग भरता हुआ वह तेजी से उसी तरफ़ चला जा रहा था । जहाँ अभी अभी उसने वह रहस्यमय नजारा देखा था । हालांकि अब वह बहुत ज्यादा उसके लिये रहस्यमय भी नहीं था । वह बहुत कुछ समझ भी चुका था । पर रात के गहन अँधेरे में सन्नाटे में एक प्रेतनियों के आगे लाचार गिङगिङाती औरत और उसके छोटे  बच्चों ने उसकी खासी दिलचस्पी जगायी थी । आखिर पूरा मामला क्या था ? कौन थी वह ? और वहाँ क्यों थी । जो जिन्दगी का आखिरी पढाव होता है ।
यही सब विचार उसके दिमाग में तेजी से चक्कर काट रहे थे । कैसा रहस्यमय है ये पूरा जीवन भी । हमसे चार कदम दूर ही जिन्दगी क्या क्या खेल खेल रही है । क्या खेल खेलने वाली है ? शायद कोई नहीं जान पाता । खुद उसने ही थोङी ही देर पहले नहीं सोचा था कि वह यहाँ अकारण ही यहाँ आयेगा । उसे जलती लाश के बारे में मालूमात होगा । पर हुआ था । सब कुछ थोङी देर पहले ही हुआ था ।
चलते चलते वह ठीक उसी जगह आ गया । जहाँ टीले पर वह औरत शान्त बैठी हुयी थी । उसके बच्चे वहीं पास में खेल रहे थे । प्रसून उनकी नजर बचाता हुआ उन्हें छुपकर देखने लगा । कुछ देर शान्ति से उसने पूरी स्थिति का जायजा लिया ।
टीला मुर्दा जलाने के स्थान से महज सौ मीटर ही दूर था । औरत और बच्चों को देखकर जाने किस भावना से उसके आँसू बहने लगे । फ़िर उसने अपने आपको नियन्त्रित किया । और अचानक ही किसी प्रेत के समान उस औरत के सामने जा प्रकट हुआ । वह तुरन्त सहमकर खङी हो गयी । और बच्चों का हाथ थामकर चलने को हुयी ।
- कौन थीं ये ? उसने खुद ही जानबूझ कर मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया - अभी अभी जो..।
वह एकदम से चौंकी । उसने गौर से प्रसून को देखा । पर वह कुछ न बोली । उसने बात को अनसुना कर दिया । और तेजी से वहाँ से जाने को हुयी ।
प्रसून ने असहाय भाव से हथेलियाँ आपस में रगङी । उसकी बेहद दुखी अवस्था देखकर वह यकायक कुछ सोच नहीं पा रहा था । फ़िर वह सावधानी से मधुर आवाज में बोला - ठहरो बहन । कृपया । मैं उनके जैसा नहीं हूँ ।
वह ठिठककर खङी हो गयी । उसके चेहरे पर गहन आश्चर्य था । वह बङे गौर से प्रसून को देख रही थी । और बारबार देख रही थी । और फ़िर अपने को भी देख रही थी । फ़िर वह कंपकंपाती आवाज में बोली - अ अ आप भगवान जी हो क्या ? मनुष्य रूप में ।
प्रसून के चेहरे पर घोर उदासी छा गयी । वह उसी टीले पर बैठ गया । उसने एक निगाह उन मासूम बच्चों पर डाली । फ़िर भावहीन स्वर में बोला - नहीं ।

औरत ने बच्चों को फ़िर से छोङ दिया था । वह असमंजस की अवस्था में इधर उधर देख रही थी । प्रसून उसके दिल की हालत बखूबी समझ रहा था । और इसीलिये वह बात को कैसे कहाँ से शुरू करे । तय नहीं कर पा रहा था । यकायक उस औरत के चेहरे पर विश्वास सा जगा ।
और वह कुछ चकित सा होकर बोली - आप मुझे देख सकते हो । और इन । उसने बच्चों की तरफ़ उँगली उठाई - दो बच्चों को भी ।
प्रसून ने स्नेह भाव से सहमति में सिर हिलाया । पर उस औरत के चेहरे पर अभी भी हैरत थी ।
फ़िर वह बोली - तब और सब क्यों नहीं देख पाते ?
- शायद इसलिये । वह जल चुकी चिता पर निगाह फ़ेंकता हुआ बुझे स्वर में बोला - क्योंकि इंसान सत्य नहीं । सपना देखना अधिक पसन्द करता है । वह जीवन भर सपने में जीता है । सपने में ही मर जाता है ।
- मेरा नाम रत्ना है । उसके मुर्दानी चेहरे पर बुझी राख में इक्का दुक्का चमकते कणों के समान चमक पैदा हुयी । फ़िर वह वहीं उसके सामने जमीन पर ही बैठ गयी ।
प्रसून ने एक सिगरेट सुलगाई । और गहरा कश लिया । जाने क्यों दोनों के बीच एक अजीब सा संकोच हावी हो रहा था । बहुत दिनों बाद रत्ना को कोई उसके हाल पूछने वाला हमदर्द मिला था । वह सब कुछ बताना चाहती थी । पर बता नहीं पा रही थी । कई महीनों बाद उसे कोई इंसान मिला था । कई महीनों क्या ? शायद इस जीवन में ही पहली बार । हैवानों से तो उसका रोज का ही वास्ता था ।
- आपने ही । वह अचानक भय से झुरझुरी लेती हुयी बोली - शायद मुझे उनसे अभी अभी बचाया था ?
प्रसून ने इंकार में सिर हिलाया । उसने दूर विचरते प्रेतों को देखा । और आसमान की ओर उँगली उठा दी - उसने । बहन उसने बचाया है तुझे । सबको बचाने वाला वही है ।
यकायक रत्ना का चेहरा दुख से बिगङ गया । उसके आँसू नहीं आ सकते थे । फ़िर भी प्रसून को लगा । मानों उसका चेहरा आँसुओं में डूबा हो । फ़िर वह भर्राये हुये मासूम स्वर में बोली - और मारने वाला ?
प्रसून को एक झटका सा लगा । कितना बङा सत्य कह रही थी वो । वो सत्य जो उसे जिन्दगी ने दिखाया था । यकायक उसे कोई जबाब न सूझा । शायद जबाब था भी नहीं उसके पास ।
- कितना समय हो गया ? फ़िर वह भावहीन स्वर में बोला ।
- पाँच महीने..से कुछ ज्यादा ।
- और तुम्हारे पति ? वो फ़िर से चिता को देखता हुआ बोला - वो कहाँ हैं ?
अबकी वह फ़फ़क फ़फ़क कर आँसू रहित रोने लगी । प्रसून ने उसे रोने दिया । उसका खाली  हो जाना जरूरी था । वह बहुत देर तक रोती रही । बच्चे उसे रोता हुआ देखकर उसके ही पास आ गये थे । और प्रसून को ही सहमे सहमे से देख रहे थे । प्रसून की समझ में नहीं आ रहा था । वह क्या करे ।
कुछ देर बाद वह चुप हो गयी । प्रसून को इसी का इंतजार था ।  उसने रत्ना से - सुनो बहन कहा । रत्ना ने उसकी तरफ़ देखा । प्रसून ने अपनी झील सी गहरी शान्त आँखें उसकी आँखों में डाल दी । रत्ना 0 शून्य होती चली गयी । शून्य । सिर्फ़ शून्य । शून्य ही शून्य ।

अब उसकी जिन्दगी का पूरा ब्यौरा प्रसून के दिमाग में कापी हो चुका था । वह दुखी जीवात्मा कुछ भी बताने में असमर्थ थी । और प्रसून को उस तरह उससे जानने की जिज्ञासा भी नहीं थी । वह कुछ ही देर में सामान्य हो गयी । उसे एकाएक ऐसा लगा था । मानों गहरी नींद में सो गयी थी । शायद इस नयी अदभुत जिन्दगी में । शायद इस जिन्दगी से पहले भी । उसे ऐसी भरपूर नींद कभी नहीं आयी थी । वह अपने आपको तरोताजा महसूस कर रही थी ।
- कहाँ रहती हो आप । वह स्नेह से बोला - और खाना ?
अब वह लगभग सामान्य थी । प्रसून के कहाँ रहती हो । कहते ही उसकी निगाह खोह नुमा एक ढाय पर गयी । और खाना कहते ही उसने स्वतः ही चिता की तरफ़ देखा । प्रसून उसके दोनों ही मतलब समझ गया । और यहाँ रहने का कारण भी समझ गया ।
- लेकिन । वह फ़िर से बोला - बच्चे । बच्चे क्या खाते हैं ?
उसके चेहरे पर अथाह दुख सा लहराया । स्वतः ही उसकी निगाह त्याज्य मानव मल पर गयी । प्रसून बेबसी से उँगलिया चटकाने लगा । उसके चेहरे पर गहरी पीङा सी जागृत हुयी । सीधा सा मतलब था । उन्होंने बहुत दिनों से अच्छा कुछ भी नहीं खाया था ।
उसने आसपास निगाह डाली । और फ़िर चलता हुआ एक आम के पेङ से पहुँच गया । उसे किसी सूख चुकी आम डाली की तलाश थी । वैसे जमीन पर सूखी लकङियाँ काफ़ी थी । पर वह सिर्फ़ आम की लकङी चाहता था । अन्य लकङियाँ भोजन में कङवाहट मिक्स कर सकती थी । उसने सबसे नीची डाली का चयन किया । और उछलकर उस डाली पर झूल गया । इसके बाद किसी जिमनास्ट चैम्पियन सा वह पेङ की इस डाली से उस डाली पर जाता रहा । और मोबायल टार्च से अन्त में वह सूखी लकङी तोङने में कामयाव हो गया ।
लकङी के सहारे से जलता हुआ मन्दिर का चङावा और उसमें मिक्स शुद्ध घी के खुशबूदार मधुर धुँये से उन तीनों को बेहद तृप्ति महसूस हुयी । शायद मुद्दत के बाद । तब प्रसून के दिल में कुछ शान्ति हुयी ।
उन तीनों को वहीं छोङकर वह उस खोह के पास पहुँचा । उसने एक लकङी से एक अभिमन्त्रित बङा घेरा खोह के आसपास खींचकर उस जगह को बाँध दिया । अब उसमें रत्ना और उसके दो बच्चे ही अन्दर जा सकते थे । अन्य रूहें उस स्थान को पार नहीं कर सकती थी । अतः काफ़ी हद तक रत्ना सुरक्षित और निश्चिन्त रह सकती थी
वह वापस उनके पास आया । उसने रत्ना को कुछ अन्य जरूरी बातें बतायीं । और बँध के बाहर डायनों प्रेतों के द्वारा परेशान करने पर उसे कैसे उससे सम्पर्क जोङना है । कौन सा मन्त्र बोलना है । ये सब बताया । उसने रत्ना को भरपूर दिलासा दी । बङे से बङे प्रेत अब उसके या उसके बच्चों के पास फ़टक भी नहीं पायेंगे ।
रत्ना हैरत से यह सब सुनते देखते रही । जाने क्यों उसे लग रहा था । ये इंसान नहीं है । स्वयँ भगवान ही है । पर अपने आपको प्रकट नहीं करना चाहते । जो हो रहा था । उस पर उसे पूरा विश्वास भी हो रहा था । और नहीं भी हो रहा था कि अचानक ये चमत्कार सा कैसे हो गया ।
प्रसून ने उसे बताया नहीं । लेकिन अब वह अपने स्तर पर पूरा निश्चित था । वह प्रेतों के प्रेत भाव से हमेशा के लिये बच्चों सहित बच चुकी थी । अब बस प्रसून के सामने एक ही काम शेष था । वह उन्हें किसी सही जगह पुनर्जन्म दिलवाने में मदद कर सके । लेकिन ये तो सिर्फ़ रत्ना से जुङा काम था ।
वैसे तो उसे बहुत काम था । बहुत काम । जिसकी अभी शुरूआत भी नहीं हुयी थी । यह ख्याल आते ही उसके चेहरे पर अजीव सी सख्ती नजर आने लगी । और वह - चलता हूँ बहन । कहकर उठ खङा हुआ । रत्ना एकदम हङबङा गयी । उसके चेहरे पर प्रसून के जाने का दुख स्पष्ट नजर आने लगा । वह उसके चरण स्पर्श करने को झुकी । प्रसून तेजी से खुद को बचाता हुआ पीछे हट गया ।
- अब । वह रुँआसी होकर बोली - कब आओगे भैया ?
- जल्द ही । वह भावहीन होकर सख्ती से बोला - तुम्हें । उसने खोह की तरफ़ देखा । त्यागे गये मानव मलों की तरफ़ देखा - किसी सही घर में पहुँचाने के लिये ।
फ़िर वह उनकी तरफ़ देखे बिना तेजी से मु्ङकर एक तरफ़ चल दिया । उसकी आँखें भीग सी रही थी ।

प्रसून का इंसाफ़ 5

जिन्दगी क्या है ? इसका रहस्य क्या है ? इसका तरीका क्या है ? इसका सही गणित क्या है ? ये कुछ ऐसे सवाल थे । जिनका आज भी प्रसून के पास कोई जबाब नहीं था । क्या जिन्दगी एक किताब की तरह है । जिसके हर पन्ने पर एक नयी कहानी लिखी है । एक नया अध्याय लिखा है । वह अध्याय । वह कहानी । जो उस दिन का पन्ना खुद ब खुद खुलने पर ही पढी जा सकती थी । अगर इंसान कुछ जान सकता है । तो वो बस अपनी जिन्दगी के पिछले पन्ने । पिछले पन्ने ।
रत्ना की जिन्दगी के पिछले पन्ने । जो उसकी दिमाग की मेमोरी में दर्ज हो चुके थे । क्या हुआ था इस दुखी औरत और उसके बच्चों के साथ ? उसने दूसरे के दिमाग को अपने दिमाग से चित्त द्वारा देखना शुरू किया ।
वह निरुद्देश्य सा चलता जा रहा था । और उसके आगे आगे सिनेमा के पर्दे की तरह एक अदृश्य परदे पर गुजरा हुआ समय जीवन्त हो रहा था । वह समय जब रत्ना शालिमपुर में रहती थी ।
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सुबह के दस बज चुके थे । रत्ना घर के काम से फ़ारिग हो चुकी थी । नरसी कुछ ही देर में खेत से आने वाला था । बच्चे बाहर दरवाजे पर खेल रहे थे । अब वह जल्दी से नहाकर बस अपने पति के साथ भोजन करने वाली थी । गुसलखाने में जाने से पहले उसने दरवाजे की कुण्डी लगाने का विचार किया । फ़िर उसने ये विचार त्याग दिया । नरसी किसी भी क्षण लौट सकता है । और तब उसे कुण्डी खोलने में दिक्कत आने वाली थी ।
नहाते समय वह बारबार यही सोच रही थी । कितनी खुशनुमा जिन्दगी उन्हें भगवान ने दी है । उसे प्यार करने वाला हट्टा कट्टा पति मिला था । उसके दो प्यारे बच्चे हैं । उसके पास जीवन यापन हेतु पर्याप्त खेती है । उसकी जिन्दगी की बगिया खुशी के फ़ूलों से हर वक्त महकी हुयी थी ।
बस उसे यही कमी खलती थी कि काश नरसी का परिवार कुछ और भी बङा होता । पर ऐसा नहीं था । नरसी अपने माँ बाप का अकेला था । उसके सिर्फ़ एक ही बहन थी । जिसकी दूर देश शादी हो चुकी थी । माँ बाप उसके बहुत पहले ही गुजर गये थे । पर वे नरसी के लिये बीस बीघा जमीन छोङ गये थे । जिस पर खेती से पर्याप्त कमाता हुआ नरसी उर्फ़ नरेश अपने छोटे से परिवार को सुख से चला रहा था । और उन दोनों पति पत्नी को उससे अधिक चाह भी नही थी । वे अपनी जिन्दगी से हर हाल में खुश थे । खुश रहना चाहते थे । जिन्दगी । जिसका एक एक पन्ना रहस्य की स्याही और रोमांच की कलम से लिखा जाता है ।
ब्लाउज के हुक बन्द करते करते उसकी निगाह अपने स्तनों पर गयी । और वह खुद ही शर्मा गयी । पुरुष के सानिध्य से स्त्री कैसे एक फ़ूल की तरह खिल उठती है । महक उठती है । उसका अंग अंग पुरुष के प्यार को दर्शाता है ।
कुँआरेपन से ही उसने इस बारे में क्या क्या अरमान संजोये थे । और अपने आपको वासना के भूखे भेङियों से हर जतन से बचाये रखा था । उसका कौमार्य और जवानी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पति पर निछावर करने के लिये थे । और वह वैसा करने में सफ़ल भी रही थी ।
यही सब सोचते हुये उसने साङी का पल्लू कमर में खोंसा । और बाहर निकलने को हुयी । तभी नरसी ने घर के अन्दर कदम रखा । उसकी हालत देखकर वह घवरा गयी । ऐसा लग रहा था । शायद उसका किसी झगङा हुआ था । उसके चेहरे पर भी बैचेनी सी छायी हुयी थी ।

उसने सारा दिन नरसी से बारबार बात पूछने की कोशिश की । पर वह शून्य में देखता हुआ बात को टालता ही रहा । फ़िर रात को उसका धैर्य जबाब दे गया । वह उसके सीने से लग गयी । और बेहद अपनत्व से बोली - सुनो जी ! क्या तुम मुझे परायी समझते हो ।
- रत्ना ! कहीं शून्य में खोया खोया सा उदास नरेश बोला - बाई चांस मुझे कुछ हो जाय । तो तुम खुद को संभालना । इन बच्चों को ठीक से पालना । क्योंकि मेरा कोई भाई नहीं है । और भी कोई नहीं है । फ़िर इन बच्चों का तुम्ही सहारा होगी । वरना ये मासूम बच्चे दर दर को भटक जायेंगे ।
- क्या । वह भौंचक्का होकर बोली - ऐसा क्यों कह रहे हो जी ?
वह बारबार कसम खिलाती रही । पर नरेश जाने क्यों उसे कोई बात बताना नहीं चाहता था ।  रत्ना को सारी रात नींद नहीं आयी । ये अचानक जिन्दगी ने आज कैसा रंग बदलना शुरू किया था ।
चलते चलते प्रसून ने सामने निगाह डाली । महावीर का टयूब बैल नजर आने लगा था । पर वह उसका लक्ष्य नहीं था । उसका लक्ष्य उसके एक दिशा में सामने दूर बनी महुआ आम की बगीची थी । जहाँ प्रेतवासा था । वह तेज कदमों से उसी तरफ़ बढ रहा था ।
तब रत्ना की जिन्दगी का अगला अध्याय शुरू हो गया ।
रात के दस बज चुके थे । नरसी शायद सोया हुआ था । या आँखें बन्द किये हुआ था । पर रत्ना बैचेनी से करवटें बदल रही थी । क्या हो गया था । नरसी को । कुछ दिनों से खोया खोया सा रहता था । उसने चुप चुप उसे रोते हुये भी देखा था । बहुत पूछने पर यही बोला था - रत्ना ! काश हमारे घर भी दो चार भाई या परिवार वाले होते ।
तब वह चुप कर गयी थी । इतना तो वह समझ गयी थी कि नरसी उसे वह बात बताकर और दुखी नहीं करना चाहता । शायद बात ही ऐसी हो । जिसका उसके पास कोई हल ही न हो । चैन इक पल नहीं । और कोई हल नहीं ।
तभी अचानक धप्प से आँगन में कोई कूदा । और वह काँपकर रह गयी । लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती । वह साया ठीक नरसी के पास आ खङा हुआ । उसने रिवाल्वर उसके ऊपर टिका दी ।
और बोला - उठ जा भाई ! मौत ये नहीं देखती कि कोई सो रहा है । या जाग रहा है ।
नरसी चुपचाप उठ खङा हुआ । जैसे ये बात पहले ही से जानता हो । तभी वह साया रत्ना को लक्ष्य करता हुआ बोला - भाभी ! तू भी उठ । अपने साजन को विदा नहीं करेगी क्या ?
वह उन दोनों को बाहर खङी सूमो तक ले आया । और जबरदस्ती अन्दर धकेल दिया । रत्ना ने सहमकर चारों तरफ़ देखा । पर गली में सन्नाटा था । वह फ़रियाद सी करती हुयी बोली - पर मेरे बच्चे ।
- उनको । वह ठण्डे स्वर में बोला - आराम से सोने दे । क्यों डिस्टर्ब करेगी । बस कुछ ही देर में तू वापस आने वाली है ।


सूमो उन्हें लेकर एक फ़ार्म हाउस पहुँची । वहाँ एक गन्दे से कमरे में बल्ब जल रहा था ।  उस कमरे में सुरेश और महावीर बैठे हुये शराब पी रहे थे । रत्ना उनको देखकर एकदम चौंककर रह गयी । उसको लाने वाले आदमी ने भी नकाब उतार दिया था । वह भी गाँव का ही रहने वाला इतवारी था ।
नरसी को सुरेश के इशारे पर जंगले से बाँध दिया गया था । उसकी आँखों में तीनों के लिये नफ़रत के भाव थे । मौत को तो मानों वह साक्षात खङी ही देख रहा था । रत्ना को हसरत उदासी गम विदाई के मिले जुले भावों से देख रहा था । फ़िर इसके अलावा भी वह भावहीन शून्य सा खङा था । रत्ना को समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस कदर खामोश क्यों है । उसके कानों में कभी कहे नरसी के शब्द गूँजे - रत्ना ! वैसे मैं एक चींटी को भी कभी नहीं मारता । पर ये भी सच है कि मैं तीन चार को अकेला ही धूल चटा सकता हूँ ।
अभी यह सब देखती हुयी वह कुछ समझने की कोशिश कर ही रही थी । तभी उसे सुरेश की आवाज सुनाई दी । वह उठ खङा हुआ । और बोला - भाभी ! तू बङी सस्पेंस में लगती है । चल तेरा सभी सस्पेंस अब खत्म कर ही देते हैं ।
- ये जो जमीन होती है ना । उसने नीचे जमीन की तरफ़ उँगली की - बहुत जमाने से झगङे मौत की तीन खास वजहों में से एक है । वे तीन वजहें ज्ञानियों ने जर जोरू और जमीन ही बतायी हैं । जर यानी जायदाद हमारे पास बहुत है । जोरू भी है । और कम पङती है । तो बाहरवाली मिल जाती है । और वैसे जमीन भी है । पर भाभी जी ये जमीन की भूख ऐसी है । जो कभी कम नहीं होती । अब देखो ना । दुर्योधन के पास कितना बङा राज्य था । पर वह बोला - नहीं ! हरगिज नहीं । मैं पाण्डवों को सुई बराबर जमीन भी नहीं दूँगा । तब सोच भाभी । अगर मैं जो करने जा रहा हूँ । उसमें कुछ गलत हो । तो तेरा जूता मेरा सर । क्यों भाईयो ।
उन दोनों ने सहमति में सिर हिलाया । रत्ना अभी भी कुछ न समझती हुयी असमंजस में उसे ही देखे जा रही थी ।
- मैं फ़िर से बात पर आता हूँ । वह गम्भीरता से बोला - तू जानती ही है । मैं इसके नरसी के सगे चाचा का लङका हूँ । इसका छोटा भाई । यानी तेरा खानदानी देवर । मैंने इसे कई बार समझाया । तू ये बीस बीघा जमीन मुझे दे दे । क्योंकि हो सकता है । फ़िर कहीं ये जमीन ही तेरी जान की दुश्मन बन जाय । और ऐसा भी नहीं हम कोई अन्याय कर रहे हों । ना ना अन्याय तो हम कर ही नहीं सकते । मैंने कहा । तू ये जमीन पाँच हजार रुपया बीघा के हिसाब से दे । और अपने नगद पैसे ले । नगद । उधार का कोई लफ़ङा नहीं । क्यों भाईयों इसमें कोई गलत बात थी । हो तो बोलो । फ़िर भाभी की जूती मेरा सर ।
दोनों ने फ़िर बङी संजीदगी से सिर हिलाया । और बोले - नहीं । कोई गलत बात नहीं । एकदम न्याय वाली बात थी ।
- देखा भाभी ! वह फ़िर से बोला - ये साले कुत्ते की नस्ल वाले भी इसको सही बता रहे हैं । पर तेरे आदमी को ये एकदम गलत ही लगी । टोटली रांग । इसने मुझे जमीन देने से साफ़ इंकार कर दिया । वोला किसी कीमत पर नहीं । चाहे जान क्यों न चली जाय । और दूसरी बात ये है । वह गौर से रत्ना के ब्लाउज पर देखता हुआ बोला - हम इसे बदले में और जमीन भी दिलवा रहे थे । वहाँ जो जंगल क्षेत्र में जमीन पङी है । बस थोङी सी कम उपजाऊ है । और मौके की नही है । बस इतनी ही तो बात थी ।
फ़िर भाभी जी ! कहावत है ना । एवरीथिंग इज फ़ेयर लव एण्ड वार । और संसार में जंगल राज कायम है । और ये आज का नहीं है । बहुत पुराने जमाने का है । रावन को ले लो । कंस को ले लो । दुर्योधन को ले लो । पूरा इतिहास भरा पङा है । अगर आप गौर करो । तो सबसे ज्यादा लङाईयाँ जमीन के लिये हुयी । सबसे ज्यादा जानें जमीन के लिये गयी । बस हमने भी इससे लङाई की । पर गजब रे गजब । इसने हम तीनों को अकेले मारा । बहुत मारा भाभी जी । कसम से याद आ जाता है । तो अभी भी दर्द होने लगता है । तब हमने साम दाम दण्ड भेद । यानी चारों हथकण्डे अपनाओ । पर बस अपना काम बनाओ । वाली बात अपनायी । क्योंकि हम अच्छी तरह जानते थे । हम इससे लङकर नहीं जीत सकते । हम कट्टा तमंचा चला सकते हैं । तो ये भी चलाना जानता है । हम इसको गोली मार सकते हैं । तो ये भी मार सकता है । भाभी तुम्हारा बलमा कोई गीदङ नहीं । पूरा शेर है । बब्बर शेर । पर शेर भी पिंजङे में आ ही जाता है । बस ट्रिक होनी चाहिये । क्यों भाईयों ?
अबकी दोनों ने बिना कुछ बोले ही समर्थन में सिर हिलाया । लेकिन तभी महावीर बोला - सुरेश ! तू जल्दी कहानी खत्म कर । हम यहाँ बैठे नहीं रहेंगे ।
सुरेश ने मुङकर रिवाल्वर उस पर तान दी । और दाँत पीसकर बोला - शटअप ! महावीर । क्या तू जानता नहीं । मैं कितना न्याय पसन्द इंसान हूँ । अन्याय करना । और होते देखना । मुझे कतई पसन्द नहीं । अगर ये ऐसे ही मर गया । तो भाभी जीवन भर यही सोचती रहेगी । आखिर बात क्या थी । इसीलिये इसको बुलाया भी है । वरना इसे खामखाह परेशान करने की भला क्या आवश्यकता थी ।
तो भाभी जी ! फ़िर हुआ यूँ कि हमने इसको साम दाम दण्ड भेद से समझाया । देख सुरेश । तेरे छोटे छोटे दो बच्चे हैं । क्या तू चाहता है कि किसी दिन बेचारे अल्पायु ही कहीं कटे मरे पङे मिलें । तेरी जवान बीबी है । क्या तू चाहता है । अचानक किसी दिन कुछ हरामजादे उससे बलात्कार कर जायें । और फ़िर वो तुझे या अन्य किसी को मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहे । और फ़ाँसी लगाकर । जलकर । नहर में कूदकर । जहर खाकर । मरने के बहुत से आयडिये होते हैं । किसी आयडिये से मर जायें । इसलिये वो लोग मरें । इससे अच्छा तू अकेला ही मर जाये । क्यों तीन हत्याओं का पाप अपने सिर लेगा । फ़िर हम उन तीनों को कुछ नहीं बोलेंगे । क्यों भाईयो कुछ गलत बोला मैं ?
- व्हाट अ आयडिया सर जी ! महावीर बोला - आप हमेशा सही बोलते हैं ।
- खामोश ! वह नफ़रत से बोला - किसी की जान पर पङी है । और तुझे आयडिया सूझ रहा है । तो भाभी जी ...।
- न न नही..नहीं.. भैया नहीं । अचानक रत्ना मानों सब कुछ समझ गयी । वह फ़ूट फ़ूटकर रो पङी । उसे पिछले दिनों के सुरेश के रहस्यमय अजीब से व्यवहार के सभी कारण एकदम पता चल गये - आप जमीन ले लो । सब ले लो । पर इन्हें कुछ न कहो । इन्हें छोङ दो । हम लोग इस गाँव से दूर चले जायेंगें । भीख माँगकर गुजारा कर लेंगे । पर मेरे बच्चों को अनाथ न करो । मैं आपसे हाथ जोङकर दया की भीख माँगती हूँ । मुझ पर रहम करो । मेरे छोटे छोटे बच्चों पर दया करो सुरेश । मैं तुम्हारे पाँव पङती हूँ ।
- अरे रे रे ..यह क्या कर रही हो भाभी ! वह घवराकर बोला - मुझे क्यों पाप में डाल रही हो । आप मेरी भाभी हो । और भाभी माँ समान होती है । पर..। वह फ़िर से सुरेश की छाती पर उँगली से ठकठकाता हुआ बोला - पर मैं क्या करूँ भाभी । मैंने इस बात पर भी बहुत सोचा । क्योंकि मैं बहुत भावुक हूँ ना । दया और प्रेम तो मेरे अन्दर कूट कूटकर भरा हुआ है । अन्याय मुझसे कतई सहन नहीं होता । क्यों भाईयो । ठीक कह रहा हूँ ना । गलत बोलूँ । तो भाभी की चप्पल और मेरा सर ।
- आप बहुत ही दयालु हो । इतवारी बेहद संजीदगी से बोला - आप जैसे दयालु कभी कभी ही पैदा हो पाते हैं । आप गजनी धर्मात्मा हो ।
- ओये खङूस ! सुरेश उसकी तरफ़ रिवाल्वर तानता हुआ बोला - तुझसे किसी ने कहा था । बीच में बोलने को । मैं अपनी प्यारी भाभी जी से बात कर रहा हूँ । हाँ तो भाभी जी । मैंने इस बात पर भी बहुत सोचा कि तुम सबको जीता जी छोङ दूँ । मुझे बस जमीन ही तो चाहिये । जमीन ले लूँ । और तुम सबको कहीं भी जाने दूँ । पर भाभी जी पर..इतिहास..इतिहास गवाह है । जिसने भी ऐसा किया । कुत्ते की मौत मारा गया । दुर्योधन को ले लो । पाँडवों को छोङने का परिणाम क्या हुआ । रावण को ले लो । विभीषण को छोङने का परिणाम क्या हुआ । इसलिये हर समझदार इंसान को इतिहास से सबक लेना चाहिये । क्योंकि इतिहास अपने आपको दुहराता है । इसलिये भाभी जी मैं मरना नहीं चाहता । मैं मरना नहीं चाहता । मुझे मरने से बङा डर लगता है । मारने से बिलकुल नहीं लगता । पर मरने से बहुत लगता है । अगर मैंने इसको छोङ दिया । तो वक्त कोई भी करवट बदल सकता है । आज मैं इसे मारने वाला हूँ । कल ये भी मुझे मार सकता है । समय का क्या भरोसा । ये बहुत जल्द पलटा खाता है । राजा रंक हो जाता है । और रंक राजा । इसलिये समझदार इंसान को समस्या को जङ से ही खत्म कर देना चाहिये ।
कहते कहते उसका चेहरा सर्द हो उठा । उसने रिवाल्वर वापस फ़ेंटे में खोंस लिया । और लम्बे फ़ल वाला चमचमाता हुआ चाकू निकाल लिया । चाकू की नोक से उसने अपना अँगूठा चीरा । और वहाँ से बहते हुये रक्त से नरसी के माथे पर तिलक किया । फ़िर वह नरसी के गले मिलकर रोने लगा । और भर्राये स्वर में बोला - मुझे माफ़ कर देना भाई । बङे भैया । मुझे माफ़ कर देना । मैं तुझे बचाना तो चाहता था । पर बचा न सका । बलिदान की परम्परा से ही वीरों का इतिहास लिखा है । ठीक है भाभी..। वह मुङकर उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला ।
रत्ना अचानक आगे का दृश्य तुरन्त समझ गयी । वह दौङकर सुरेश के पैरों से लिपट गयी । वह बारबार नरसी के पैरों से भी - स्वामी आप कुछ करते क्यों नहीं ..कहते क्यों नहीं..कहती हुयी लिपटने लगी । सुरेश भी उसके साथ फ़ूट फ़ूटकर रो रहा था । फ़िर अचानक वह दाँत भींचकर बोला - ऐ हरामजादो ! संभालते क्यों नहीं इसको । मौत का मुहूर्त निकला जा रहा है ।
दोनों तुरन्त रत्ना की तरफ़ लपके । उसी पल सुरेश ने चाकू नरसी के पेट में घोंप दिया । वह कुछ पल सुरेश की आँखों में झाँकता रहा । फ़िर उसने चाकू को क्लाक वाइज घुमाया । उसे बङी हैरानी थी । सुरेश मामूली सा भी नहीं चीखा । बस उसके चेहरे पर घनी पीङा के भाव जागृत हो गये थे । असहनीय दर्द से उसका चेहरा विकृत हो रहा था । वह बारबार अपने को संभालने की कोशिश कर रहा था । पर असफ़ल हो रहा था । आखिर वह बङी कठिनाई से बोल पाया - र र रत रत्ना इधर आ ।
वह तुरन्त उठकर उसके सामने खङी हो गयी ।
- मेरे बच्चों को । वह अटकती आवाज में बोला - संभालना..उन..क ।
और बात पूरी होने से पहली ही उसकी गरदन एक तरफ़ लुङक गयी ।

प्रसून का इंसाफ़ 6

मौत सिर्फ़ एक है । एक बार ही आती है । अंजाम भी एक ही होता है । वो शरीर जो अब तक चल फ़िर रहा था । उसका निष्क्रिय हो जाना । मिट्टी के पुतले मानुष का वापस मिट्टी में ही मिल जाना । सारे रिश्ते नातों को एक झटके से बेदर्दी से तोङ देती है मौत ।
पर ये एक बार की मौत भी कई अजीव रंग लेकर आती है । कभी खामोशी से । कभी गा बजा के । कभी हाहाकार फ़ैलाती हुयी । कभी सिसकियों के साथ । दुश्मनी भाव में कभी खुशी के भी साथ । अनेक रंग है इसके । अनेक रूप है इसके । इसके रहस्य जानना बङा ही कठिन है ।
ऐसा ही मौत का अजीव रंग नरसी की मौत पर भी छाया था । वो इंसान पता नहीं । कब से जीवित ही मौत को देख रहा था । और एक स्वस्थ हाल आदमी किसी बीमार जर्जर आदमी की मौत मरने पर विवश हुआ था ।
बीस मिनट हो चुके थे । नरसी की लाश जमीन पर पङी थी । अब वह हमेशा के लिये न उठने को गिर चुका था । रत्ना को जोर से रोने भी न दिया था । वह अपनी जगह पर ही तङफ़ङा कर रह गयी थी । और फ़टी फ़टी आँखों से बस नरसी की लाश को देखे जा रही थी ।
अचानक उसका चेहरा सख्त हो गया । भावहीन सी उसकी आँखे शून्य हो गयी । तीनों अभी भी बैठे शराब पी रहे थे । उसने नरसी की लाश पर निगाह डाली । और दौङकर उससे लिपट गयी । अब तक जबरन रोकी गयी उसकी रुलाई फ़ूट पङी ।
- हेऽऽ ईश्वरऽऽऽऽ । वह गला फ़ाङकर चिल्लाई - अबऽऽऽ विश्वास नहीं होता कि तू हैऽऽऽऽ । नहीं विश्वास होता । इस दुनियाँ में कोई ईश्वर । कोई भगवान है । इस देवता आदमी ने क्या गुनाह किया था । अपने जान में इसने कभी चींटी नहीं मरने दी । हर परायी औरत को माँ बहन समझा । दूसरे की भलाई के लिये कभी इसने रात दिन नहीं देखा । तेरे हर छोटे बङे द्वार पर इसने सर झुकाया ।
- और परिणामऽऽऽ । उसने छाती पर हाथ मारा । और दहाङती हुयी बोली - मुझे जबाब देऽऽऽ भगवान । मुझे जबाब चाहिये । मुझे जबाब चाहियेऽऽ । वह अपना सर जमीन पर पटकने लगी - मुझे जबाब देऽऽ भगवन । आज एक दुखियारी औरत । एक बेबा औरत । एक अवला नारी । दो मासूम बच्चों की माँ । सिर्फ़ तुझसे जबाब चाहती है । क्या यही है तेरा न्याय ? क्या ऐसाऽऽ ही भगवान है तूऽऽ । तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ? तूने क्यूँ मेरी हरी भरी बगिया उजाङ दी । मुझे जबाब देऽऽ भगवान । वह फ़िर से भयंकर होकर दहाङी - मैं सिर्फ़ऽऽ जबाब चाहती हूँऽऽऽ । मैं तुझसे दया की भीख नहींऽऽ माँग रही । सिर्फ़ जबाब देऽऽ । तुझे जबाब देनाऽऽ ही होगा । मुझे एक बार जबाब दे भगवान ।
मगर कहीं से कोई जबाब नहीं मिला । फ़िर वह उठकर खङी हो गयी । उसके चेहरे पर भयंकर कठोरता छायी हुयी थी । उसने बेहद घृणा और नफ़रत से तीनों की तरफ़ देखा ।
और जहर भरे स्वर में बोली - कान खोलकर सुन हरामजादे । नाजायज । रण्डी से पैदा सुअर की औलाद । अगर तूने कुतिया का दूध नहीं पिया । तो मार डाल मुझे भी इसी वक्त । और मार डाल । उन दो नन्हें बच्चों को भी ।
- भाभी..भाभी.. भाभी माँ । सुरेश रोता हुआ बोला - ऐसा मत बोलो । मैं बहुत कमजोर दिल इंसान हूँ ।
- थू..थू.. थू है तुझ पर । वह घृणा से थूक कर बोली - आखिरी बात । गौर से सुन हरामजादे । ये एक अवला औरत । एक पतिवृता नारी । और एक देवता इंसान की.. पत्नी का शाप हैऽऽ तुझेऽऽ । कहते कहते उसने पेट पर नाभि के पास गोल गोल हाथ घुमाया । और ऊपर देखती हुयी बोली - अगर मैंने जीवन भर एक सच्ची औरत के सभी धर्म निभाये हैं । तो यही जमीनऽऽऽ । जिसके लिये.. तूने मेरा घर.. बरबाद कर दिया । बहुत जल्द तुझे मिट्टी में मिला देगी ।
कहकर वह बिना मुङे झटके से बाहर निकल गयी । सुरेश ने इतवारी को उसे छोङने हेतु भेजा भी । पर वह अँधेरे में पैदल ही भागती चली गयी । वह बहुत तेजी से अपने घर की तरफ़ भाग रही थी ।
चलते चलते प्रसून रुक गया । उसकी गहरी आँखों में आँसुओं का सैलाव सा उमङ रहा था । और चेहरे पर अजीव सी सख्ती छायी हुयी थी । क्रोध से योगी की सभी नसें नाङियाँ फ़ूल उठी थी । वह वहीं खङे पेङ के तने पर बेबसी से मुठ्ठी बारबार मारने लगा । काफ़ी देर बाद वह शान्त हुआ । फ़िर योगस्थ होकर उसने गहरी गहरी साँसे खींची । और वहीं पेङ के नीचे बैठकर ध्यान करने लगा । सुबह के तीन बजने वाले थे । प्रेत अपने स्थानों पर वापस जाने लगे होंगे । अतः उसने महुआ बगीची की ओर जाने का ख्याल छोङ दिया । वैसे भी वह निरुद्देश्य वहाँ जा रहा था । उसका पूर्व निर्धारित लक्ष्य अभी कुछ नहीं था । शायद कुछ हो । बस यही सोच थी ।
पर अभी भी उसके सामने सवाल थे । आगे आखिर क्या हुआ था ? क्या रत्ना ने दोनों बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली थी । नरसी की मौत के बाद उसका क्या हुआ था । जाने क्यों वह इस कहानी को देखना नहीं चाहता था । पर देखने को मजबूर ही था । उसने एक निगाह दूर पीछे छूट गये शालिमपुर के शमशान की तरफ़ डाली । और रत्ना की जिन्दगी का अगला अध्याय खोला ।


नरसी की मौत के बाद रत्ना ने शालिमपुर छोङ दिया था । वह अपने दोनों बच्चों के साथ खेत पर रखवाली के उद्देश्य से बनी झोंपङी का ही विस्तार कर उसमें रहने लगी थी । अब उसमें जीने की कोई चाह नहीं रही थी । वह बस लाश की तरह अपने बच्चों के लिये जी रही थी । वह अकेली ही दिन रात खेत में जी तोङ मेहनत कर अपने को थका लेती थी । और शाम को सब कुछ भूलकर बेहोशी जैसी नींद में चली जाती थी । बस यही उसकी जिन्दगी रह गयी थी । उसने एक बार दोनों बच्चों के साथ जान देने के बारे में भी सोचा । मगर नरसी के अन्तिम शब्द और उसका लिया हुआ वादा याद आते ही वह काँपकर रह गयी । फ़िर उसने अपनी जिन्दगी की बेलगाम कश्ती को वक्त के निर्मम थपेङों के साथ उसके हालात पर छोङ दिया । उसके चेहरे पर एक स्थायी शून्यता छा गयी थी । उसकी सूनी सी स्याह आँखों में जिन्दगी का कोई रंग नहीं बचा था ।
नरसी की लाश एक नहर के पास से बरामद हुयी थी । जिस पर सभी गाँव वालों ने रोते पी्टते हाय हाय करते हुये किसी अज्ञात हत्यारे द्वारा अज्ञात कारणों से हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी । फ़ूट फ़ूटकर रोता हुआ सुरेश अपने तयेरे भाई के साथ ही मानों मर जाने को ही तैयार था । बङी मुश्किल से लोगों ने उसे रोका । वह भाभी भाभी माँ कहते हुये रत्ना के पैरों से भी लिपटता था । और बारबार छाती पीटते हुये यही अफ़सोस करता था कि - काश ! मौत के समय वह भी नरसी भैया के पास होता । तो अपनी जान देकर भी वह उन्हें बचाता ।
रत्ना भावहीन चेहरे से ये सब अन्तिम नाटक देखती रही । और फ़िर वह गाँव का घर छोङकर खेतों पर आ गयी ।
तब रात के बारह बजे थे । पूरे शालिमपुर में सन्नाटा छाया हुआ था । गाँव के सभी लोग नींद के आगोश में जा चुके थे । शालिमपुर के शमशान में प्रेतों की चहल पहल जारी थी । रत्ना गहरी नींद में सोयी पङी थी कि अचानक हङबङा कर उठ बैठी ।
कोई उसके सीने पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फ़ेर रहा था । आँखे खुलते ही उसे वे तीन शैतान नजर आये । महावीर और इतवारी एक तरफ़ खङा था । सुरेश जमीन पर आराम से पालथी लगाये उसके स्तनों को सहला रहा था ।
- तू जाग गयी । सुरेश मीठे स्वर में बोला - मैंने सोचा । तुझे डिस्टर्ब न करूँ ।
रत्ना ने भावहीन चेहरे से पास सोये अपने दोनों बच्चों को देखा । बेबसी से उसके आँसू निकलने को हुये । जिसे उसने सख्ती से निकलने से पहले ही रोक दिया । उसने अपना आँचल ठीक करने की कोशिश की । जिसे सुरेश ने फ़िर से झटक दिया । उसे मन ही मन अपनी प्रतिज्ञा याद आयी कि - जीवन में कितना भी जुल्म उस पर हो । वह कोई विरोध नहीं करेगी । बल्कि वह देखेगी कि इस दुनियाँ में भगवान का न्याय क्या है ? भगवान है भी । या नहीं । या यहाँ सिर्फ़ शैतान का राज है । सिर्फ़ शैतान का राज । शैतान ।
और शैतान उसके सामने थे ।
सुरेश उसका ब्लाउज हटाने लगा । वह लाश की तरह हो गयी । और उसने सख्ती से अपनी आँखे बन्द कर ली ।
- आँखे खोल भाभी ! सुरेश उसका गाल थपथपाकर बोला - यूँ मुर्दा मत हो । क्यूँ मेरा दिल तोङती है तू । अपने देवर का स्वागत नहीं करेगी क्या । कैसी भाभी है तू । देवर क्या होता है । नहीं जानती । देवर का मतलब होता है । दूसरा वर । जब पहला वर न हो । तब वर की जगह पूरी करने वाला दूसरा वर । देवर .. ही होता है ।
उसके शरीर से उतरते कपङों के साथ साथ उसके आज तक के पहने विश्वास के आवरण भी उतरते जा रहे थे । ईश्वर भी उसकी भावनाओं से उतर गया । भगवान भी उतर गया । खुदाई मददगार भी उतर गये । रिश्ते उतर गये । नाते उतर गये । गाँव उतर गया । शहर उतर गये । और वह अन्दर बाहर से पूर्ण नग्न हो गयी । एकदम नग्न । एक मन्दिर में लगी बेजान पत्थर सी नग्न मूर्ति ।
शैतान उसके मुर्दा शरीर को मनचाहा घुमा रहे थे । और खुद के विचार उसके मन को घुमा रहे थे । ये इंसान किस कदर अकेला है । किस कदर असुरक्षित है । चारों तरफ़ हैवानियत का नंगा नाच हो रहा है । बच्चे कहीं जाग न जायें । इसलिये उसने अपने मुँह से निकलने वाली हर आवाज को रोक दिया था ।
तीनों के चेहरे पर तृप्ति के भाव थे । पर वह किसी भावहीन वैश्या की तरह अपने कपङे ठीक कर रही थी । उसकी सभी भावनायें अभी अभी रौंदी जा चुकी थी । मानसिक हलचल के तिनकों को दरिन्दों की वासना का तूफ़ान उङा ले गया था । उसकी आखिरी अमानत । आखिरी पूँजी । उसका सतीत्व भी लुट गया था । अब कुछ नहीं बचा था । जिसको बचाने का जतन करना था ।
- हे प्रभु ! वह भावुक होकर मन ही मन बोली - आपको बारम्बार प्रणाम है । प्रणाम है । आपकी लीला अपरम्पार है । पार है । आप दयालु से भी दयालु हो । दयालु हो । सबकी रक्षा करने वाले हो । करने वाले हो । कोई द्रौपदी नंगी होती है । नंगी होती है ।  तब आप दौङे दौङे आते हो । दौङे दौङे आते हो ।  हे दाता प्रभु ! आप किसी असहाय पर जुल्म होता नहीं देख सकते । नहीं देख सकते । आपकी इस महिमा को भला आपके सिवा दूसरा कौन समझ सकता है । कौन समझ सकता है । मेरा बारम्बार प्रणाम स्वीकार करें प्रभु । स्वीकार करें प्रभु ।
तभी वह फ़िर से चौंकी । ख्यालों में खोयी उसे सुरेश की आवाज फ़िर से सुनाई दी । वह मधुर स्वर में बोला - भाभी..भाभी जी..भाभी तू कितनी अच्छी है । देख । वैसे तो हम ये सोचकर आये थे कि नरसी मर गया है । किसी राक्षस हत्यारे ने उसे मार डाला । कुछ तेरा हालचाल पूछ आयें । कुछ तेरी भूख प्यास का इंतजाम करें ।
लेकिन भाभी ! आजकल इतना भी टाइम नहीं किसी के पास कि सिर्फ़ एक काम के लिये किसी के पास भागा भागा पहुँच जाये । आज आदमी एक बार के जाने में दो काम निकालता है । तीन भी निकाल लेता है । चार भी । और पाँच भी ।
सो देख । तेरा पहला काम तो हमने निकाल दिया । अब इसे तेरा काम समझ ले । या मेरा समझ ले । ये तेरी मर्जी । हमने तो तुझ पर दया ही की । हमेशा दया । भाभी । वह भीगे स्वर में बोला - मैं बचपन से ही बङा भावुक हूँ । किसी का दुख मुझसे देखा नहीं जाता । यहाँ ..उसने दिल पर हाथ रखा - यहाँ से रोना आता है । क्यों भाइयों कुछ गलत बोला मैं । गलत हो तो । भाभी का जूता । और मेरा सिर ।
- कुछ गलत नहीं । महावीर संजीदगी से बोला - आप सच्चे धर्मात्मा हो । गजनी धर्मात्मा ।
- कमीनों ! वह नफ़रत से बोला - डफ़र ! आज शायद पहली बार तुम सही बोले हो । खैर..तुम भाङ में जाओ । मैं अपनी प्यारी भाभी से बात करता हूँ । भाभी ! उसके हाथ में एक शीशी प्रकट हुयी - इसको पायजन बोलते हैं । हिन्दी में जहर । बङे काम की चीज बनायी है । भगवान ने ये । कोई दवा.. दुख दर्द दूर न कर पाये । ये सभी दुख दर्द मिटा देती है । वो भी हाथ के हाथ । इधर दवा अन्दर । उधर दुख बाहर । फ़िर भला मैं कैसे तुझे दुखी देख सकता हूँ । लेकिन ये..। उसके हाथ में कागज और एक पैड प्रकट हुआ -  ये भी देख भाभी । इससे अँगूठा की ठप्पा निशानी लगाते हैं । और ये ठप्पा इन कागजों पर लगाना है । इस ठप्पे का मतलब ये है कि हालतों से मजबूर तूने ये जमीन हमें बेच दी । बाकी कोर्ट कचहरी के कुछ झंझट होते हैं । जो सब ले देकर निबट जाते हैं । जैसे दारोगा निबट गया । थाना निबट गया । बीस हजार जमा करो । और थाने में बोलकर मर्डर करने जाओ । अब उनके भी बाल बच्चें होते हैं भाभी । बाल बच्चे..। कहते कहते उसने एक सर्द निगाह सोये हुये मासूम बच्चों पर डाली - बाल बच्चे । जैसे ये हैं । और मैं चाहता हूँ । दो तीन साल के छोटे छोटे ये बाल जैसे फ़ूल से बच्चे भी क्यूँ इस बेदर्द जालिम दुनियाँ में कष्ट भोगें ।
रत्ना के चेहरे पर कोई भाव नहीं था । उसने एक निगाह अपने बच्चों पर डाली । और.. एक मिनट..सुरेश कहती हुयी झोंपङी से बाहर आ गयी । उसने एक निगाह दूर तक फ़ैली अपनी जमीन पर डाली । जिसके जर्रे जर्रे से नरसी की महक आ रही थी । वह झुकी । उसने मिट्टी उठाकर हाथ में ले ली । और उसे अपने बदन पर लगाने लगी । वे तीनों हैरत से उसे देख रहे थे । उसने मिट्टी से मुँह पोत लिया । छाती पर लगाया । और हर जगह लगाया । फ़िर उस विधवा ने उसी मिट्टी का सिन्दूर अपनी माँग में भर लिया । उसने शून्य 0 आँखों से अन्तिम बार फ़िर से खेतों को देखा । और पति के चरणों का भाव करते हुये उसे झुककर प्रणाम किया । उसने मुङकर शालिमपुर को देखा । जहाँ कभी उसके अरमानों की डोली आयी थी । उसने हाथ जोङकर अपनी ससुराल का भाव करते हुये उसे भी प्रणाम किया ।
वह फ़िर से भीतर आयी । और एक निगाह उसने फ़िर से बच्चों पर डाली । किसी भी चिन्ता से बेफ़िक्र वे मासूम मीठी नींद सो रहे थे । उसने एक झटके से सुरेश से कागज ले लिये । और बताये गये स्थान पर अँगूठा लगाती गयी । फ़िर उसने सुरेश के हाथों से जहर की शीशी ले ली । और अपने बच्चों के पास बैठ गयी । न चाहते हुये भी उसके दोनों आँखों से एक एक बूँद गालों पर लुङक ही गयी । उसने अपने बच्चों के गाल पर प्यार से हाथ फ़ेरा । उनके माथे पर चुम्बन किया । और फ़िर दृणता से ढक्कन खोल लिया । सोते हुये बच्चों का मुँह खोलकर उसने बारी बारी से उनके मुँह में जहर उङेल दिया । फ़िर उसने संतुष्टि भाव से शीशी में बचे जहर को देखा । और - हे प्रभु ! कहते हुयी बचा हुआ जहर गटागट पी गयी ।

प्रसून का इंसाफ़ 7

रात के पूरे बारह बज चुके थे । रात किसी यौवन से उफ़नती मचलती नायिका की तरह पूर्ण जवान हो चुकी थी । और पूरी मदहोशी से अँधेरे के आलिंगन में समायी हुयी कसमसा रही थी । अँधेरा उससे और.. और.. और एकाकार होता जा रहा था ।
प्रसून ने चलते चलते एक सिगरेट सुलगाई । और सामने देखा । वह फ़िर से लगभग उसी स्थान पर आ पहुँचा था । कल जहाँ से आगे जाने का इरादा उसने छोङ दिया था । फ़र्क बस इतना था कि कल सुबह के चार बजने वाले थे । भोर का उजाला फ़ैलने लगा था । और आज अभी आधी रात थी । दूर टयूब बैल के एक दिशा में महुआ बगीची दूर से ही नजर आ रही थी ।
कल वह बहुत देर तक यहीं बैठा रहा था । चार बज गये । पाँच बज गये । फ़िर छह भी बज गये । पर उससे उठा नहीं गया । वह गन्दी जमीन पर पैर फ़ैलाये कभी ऐसा कभी वैसा ऐसे ही बैठा सिगरेट पर सिगरेट फ़ूँकता रहा । जैसे घर के कालीन पर बैठा हो । यहाँ तक कि सभी सिगरेट भी खत्म हो गये । पर उसके दिमाग में उठता तूफ़ान खत्म नहीं हुआ । वह यही सोचता रहा । कितनी अजीव है ये जिन्दगी भी । कुछ ही दिनों में रत्ना की हँसती खेलती महकती बगिया उजङ गयी थी । न सिर्फ़ उजङ गयी थी । बल्कि वह उस गयी गुजरी जिन्दगी से भी बदतर हालत में अपने दो मासूम बच्चों के साथ भटक रही थी ।
जलते मुर्दों से उङने वाली घी आदि की खुशबू उसका आहार थी । उसके बच्चे मानव मल भी खाते थे । सुअर भी रहने से मना कर दे । ऐसी ढाय में रहती थी । और इस सबके बाबजूद भी वहाँ चैन से नहीं थी । प्रेत अपनी बिरादरी में उसे शामिल करना चाहते थे । और वह इस और भी नयी खौफ़नाक दुनियाँ से एकदम घबरायी हुयी थी । यहाँ तो वह फ़िर से मर भी नहीं सकती थी । देश गाँव छोङकर जा भी नहीं सकती थी । कहाँ जाती ? अकाल मरने के बाद जहाँ भी गयी । प्रेतों का राज नजर आया । यहाँ उसे खाने की कुछ सुविधा थी । और दूसरे प्रेत किसी राउन्ड की तरह ही कुछ घण्टे को आते थे । तब वह उनसे बचती हुयी छुपने की कोशिश करके अपने को बचाती थी । अपनी शेष आयु का पुनर्जन्म कैसे ले । ये शायद ही वह खुद जान पाती । कोई दयालु प्रेत ही रहम खाकर उसे ये तरीका बता सकता था । लेकिन इसमें भी सबसे बङी समस्या थी । उसके दो बच्चे । वह एक ममतामयी माँ थी । और अपने बच्चों को यहाँ अकेला छोङकर जन्म नहीं ले सकती थी । तब फ़िर दो बच्चों और एक औरत का पुनः जन्म हेतु गर्भ स्थापन किसी योगी के बगैर बङी टेङी खीर ही थी । प्रेत शायद ही एक साथ ये व्यवस्था करवा सकते थे । क्योंकि तीन खाली गर्भों की तलाश मुश्किल ही थी । और अकेले वह किसी भी कीमत पर नहीं जा सकती थी । दूसरे गर्भ स्थापन गर्भ खाली होने पर संस्कार मैच होने पर ही हो सकता था । फ़िर उसे कौन कैसे समझायेगा कि तेरे बच्चे पुनर्जन्म हेतु गर्भवास में चले गये । कोई सफ़ल योगी ही यह सबूत दिखा सकता था । तब ही शायद वह मान पाती । शायद बहुत समझाने पर ही अगले जन्म वाली बात उसकी समझ में आनी थी । शायद न भी आती । ये सभी बातें प्रसून के दिमाग में अँधङ की तरह आ रही थी ।
उसके सामने दो खास सवाल और भी थे । नरसी का क्या हुआ था ? और वह तीन हरामजादे किस हाल में थे ? उनका क्या होना था ? उन तीनों में एक शक्ल तो उसकी परिचित ही थी । दो को वह नहीं जानता था ।
प्रेतों के छोटे छोटे झुण्ड उसके पास से गुजर रहे थे । पर न उसे उनसे कोई लेना था । और न प्रेतों का उससे कोई देना था । वह प्रेतवासा बस इसी उम्मीद से आया था कि वह कौन सी गण थी । प्रेत थी । जो महावीर और उसके भाईयों को काट डालने का इशारा करती थी । डराती थी । धमकाती थी । और दूसरे शायद किसी भलमानस प्रेत से उसे यहाँ का मामला समझने सुलझाने में कोई मदद मिले । क्योंकि यह प्रेतों का मामला था । और इसमें प्रेतों की मदद से बहुत कुछ हो सकता था ।


यही सोचकर वह किसी प्रेत प्रेतनी से हल्लो बोलने ही वाला था कि अचानक उसके कानों में किसी मोबायल फ़ोन के स्पीकर से आती डिस्टर्बिंग साउण्ड की तरह झिन झिन मिश्रित आवाज के साथ स्त्री प्रेत की आवाज सुनाई दी - हे प्रसून ! तुम । निश्चय ही यह एक सरप्राइज हुआ मेरे लिये डियर ।
प्रसून को एक आश्चर्यमिश्रित सी खुशी हुयी । वह सिल्विया थी । मरने से पूर्व प्रसून की उससे कोई जान पहचान न थी । पर मरने के बाद हुयी थी । मरने से पूर्व वह मनोविज्ञान की शोध छात्रा थी । और " प्रेत अँधविश्वास या सच " सबजेक्ट पर रिसर्च कर रही थी । इस हेतु वह उपलब्ध जानकारी के सहारे प्रेतवासों में रातों में घूमती रही । और धीरे धीरे प्रेतभाव से गृसित होती गयी । लेकिन अपनी आधुनिक सोच के चलते वह इसे विभिन्न मनोभ्रांतियों के प्रभाव जानती हुयी नकारती रही । और इंगलिश मेडीसन के सहारे अपने दिमाग को दुरुस्त रीचार्ज करती रही ।
पर वह बेचारी नहीं जानती थी कि अज्ञात प्रेत आवेशों से उसका जीवन रस तेजी से सूख रहा था । और उसके अन्दर प्रेतत्व मैटर बढता जा रहा है । प्रेतों की तलाश उसको खुद को प्रेत बना रही थी । और फ़िर उसे शायद बहुत लम्बे समय तक अपने ही खोये अस्तित्व को तलाश करना था । शायद कुछ हजार साल तक ।
जब प्रसून को वह मिली थी । तब उसमें सुधार की कोई गुंजाइश न बची थी । वह 34 की होकर मरी थी । और अनजाने में उसने अपनी आयु घटाकर शून्य 0 कर ली थी । तब वह उसको समझाकर दूसरा जन्म या रीबोर्न हेतु भी कोई हेल्प नहीं कर सकता था । उसे भारी हैरत हुयी कि सिल्विया प्रेत बनने के बाद भी खुद को रोमांचित सा महसूस कर रही थी । और इस नये परिवेश में काफ़ी उत्साहित थी ।
प्रसून से उसकी मुलाकात चैन्नई के एक स्थान पर हुयी थी । और यह तो उसके लिये और भी दिलचस्प था कि कुछ खास स्पेशिलिटी रखने वाले इंसान प्रेतों से सीधा कनेक्ट हो सकते हैं । इसको वह और भी बङा रोमांच मानती थी । दूसरे एक योगी के रूप में प्रसून जैसी दिलचस्प इंटरनेशनल हस्ती को पाकर वह बेहद खुश हुयी थी । और घण्टों बात करती थी । शायद एक ऐसा अकेला इंसान । जिससे वह इंसानी जीवन की भांति बात कर सकती थी । कोई हेल्प भी ले सकती थी ।
- तुम ! वह भी लगभग हैरत से बोला - मगर यहाँ ?
- एराउण्ड द वर्ल्ड ! वह उत्साहित सी बोली । फ़िर उसने तारों की तरफ़ इशारा किया - कभी कभी वहाँ भी जाती हूँ । वो भी बिना प्लेन के । बिना ट्रेन के । यार क्या अनोखी लाइफ़ है । प्रेतों की ।
- यहाँ कब से हो ? वह महुआ बगीची की ओर दृष्टि घुमाता हुआ बोला ।
उसने बताया । वह पिछले 6 महीने से यहाँ थी । प्रसून को एकदम आशा सी बँध गयी । अब उसे फ़ालतू के प्रेतों से माथा पच्ची नहीं करनी थी । अतः वह बोला - अभी पिछले 6 महीनों में यहाँ कोई खास घटना भी हुयी है ।
- मैं समझी नहीं । वह उलझकर बोली - खास घटना से तुम्हारा क्या मतलब है । यहाँ तो सभी घटनायें खास ही होती हैं । और फ़िर सभी आम भी ।
प्रसून ने उसकी सहमति में सिर हिलाया । उसका जबाब ही बता रहा था कि वह एक परिपक्व प्रेतनी हो चुकी है । प्रेतजगत से उसका अच्छा परिचय हो चुका था । उसके चेहरे पर चमक आ गयी । उसने घूमकर शालिमपुर की तरफ़ उँगली उठायी । और मधुर स्वर में बोला - मेरा मतलब । उस विलेज से जुङी ।
-  ओ या ! वह साधारण स्वर में बोली - परसों ही कुलच्छनी ने वहाँ से.. एक को वहाँ । उसने ऊपर उँगली उठाई - वहाँ रवाना किया है । बङा पहुँचा हुआ हरामी था साला । मैं होती ना.. उसको घसीट घसीटकर मारती । इसकी बङी चर्चा हुयी थी ।
- कुलच्छनी ! वह कुछ सोचता हुआ सा बोला - मतलब ? ये वर्ड तो शायद लूज करेक्टर लेडी के लिये इस्तेमाल करते हैं । या फ़िर किसी अन्य बुरी आदतों वाली ।
- वो सब मुझे नहीं पता । लेकिन यहाँ कुलच्छनी एक पिशाच श्रेणी की गण होती है । वह ऐसी गण कैसे बनती है । ये भी मैं नहीं जानती । पर उसका काम ऐसे लोगों को अटैक कर मारना होता है । जो अपनी दुष्ट आदतों के चलते । अत्यन्त क्रूरता पापमय जीवन के चलते आयु से बहुत पहले ही अपनी आयु समाप्त कर लेते हैं । तब उनको मारने कुलच्छणी ही जाती है । जिसको अभी मारा । साला सुअर पैदायशी हरामी था । दूसरों की जमीन कब्जाना । दुर्बल गरीब औरतों से रेप कर देना । निर्दोष लोगों की हत्या करना । मानों उसके लिये खेल था । अभी अभी कुछ टाइम पहले कमीने ने हँसते खेलते परिवार का नाश कर दिया । कोई बेचारा बहुत सीधा किसान था । उसके दो छोटे बच्चे भी थे । उनको भी मार डाला ।
प्रसून लगभग उछल ही पङा - क्या ! उसके मुँह से निकला - वह मर गया ।
- वही तो मैं बोल रही हूँ डियर ! साला बहुत आसान मौत मर गया । लकी अनलकी था साला हरामी ।
उसके लकी अनलकी शब्द से प्रसून ने असमंजस से उसकी तरफ़ देखा । तब वह बोली - मेरे भोले राजा ! लकी इसलिये था कि उसे मरने में कोई तकलीफ़ नहीं हुयी । कुलच्छणी एक ब्लू मिक्स ब्लैक कलर बाडी वाली भयंकर गण होती है । वह फ़ुल न्यूड होती है । उसकी हाइट लगभग 4 फ़ुट होती है । और शरीर किसी गठीले आदमी जैसा । अगर उसके अवाउट 28 साइज ब्रेस्ट न हों । तो वह मैन जैसा ही फ़ील देती है । उसके हाथ में हड्डी का बना एक वैपन टायप होता है । उसको लेकर वह सुरेश के घर के पास लगभग थाउजेंड मीटर अप साइड आसमान में गयी होगी । उसने सुरेश को लक्ष्य कर वैपन चलाया होगा । उसकी एक चोट से ही सुरेश को हार्ट पेन और तेज चक्कर सा आया होगा । वह वही जमीन etc पर गिर गया होगा । और इसके बाद डैड । यानी महज 5 मिनटस का खेल । तो ये लकी डैथ ही हुयी ना ।
और अनलकी इसलिये । क्योंकि इसका सिनी मैटर इतना अधिक बना है कि इसको अवाउट 10 lac year hell  में जाना होगा । जिसको महा रौरव नरक बोलते हैं । मीन इसकी मर्सी अपील की कोई गुंजाइश नहीं । इसके बाद भी इसको सजा ए काला पानी टायप नीच और गन्दे अँधेरे लोकों में बारबार फ़ेंका जायेगा । तब लाखों वर्ष में इसके पाप धुलेंगे । तब कहीं ये 84 के बाद इंसान होगा ।
प्रसून को मानों गहरी तसल्ली हुयी । उसे एक असीम शान्ति सुख सकून का अनुभव सा हुआ । उसने एक गहरी सांस भरी । मानों उसके सीने से बहुत बङा बोझ उतर गया हो । फ़िर उसने बेहद प्रसंशा से सिल्विया की ओर देखा ।
ओर बोला - कमाल है डियर ! आपने बहुत अच्छा रिसर्च किया है ।
- ओ नो प्रसून ! वह वहाँ से गुजरते दो प्रेतों को हाइ का हाथ हिलाते हुये बोली - इनफ़ेक्ट ये आदमी अपने को छटुर समझटा हय । बट होटा हय साला छूटिया । छटुर छूटिया ।
पिछले चार दिन से उदास और अभी भी बुखार में तपते प्रसून ने उसके इंगलिश टोन में कही बात को समझ लिया । और उसके मुँह से जबरदस्त ठहाका निकला । सिल्विया भी उसके साथ मुक्त भाव से हँसी । प्रसून उसकी तरफ़ हा हा हा के साथ उँगली करता हुआ बोला - यू मीन चतुर चूतिया ना । प्लीज इसको एक्सप्लेन भी कर । चतुर चूतिया । हा हा हा । ओ माय गाड । व्हाट अ स्पेशल वर्ड चतुर चूतिया ।

प्रसून का इंसाफ़ 8

उसके कहने के अन्दाज और अपनी जिन्दगी में पहली बार सुने इस अदभुत मिश्रित शब्द से प्रसून बहुत देर तक हँसता रहा । उसकी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी । सिल्विया बार बार.. ओ प्रसून तुम भी ना डियर .. कहती हुयी उसको हाथ से बारबार चपत सा लगा देती थी । तब बहुत देर में दोनों की हँसी रुकी ।
- चतुर चूतिया का मतलब है । वह फ़िर से बोली - ऐसा इंसान जो खुद ही अपने आपको समझता तो बहुत चतुर है । पर होता एकदम चूतिया है । इस तरह वह मिलकर चतुर चूतिया हो जाता है । जैसे ये साला हरामी सुरेश था । क्या मिला इसे ? जो इसका खुद का लक से मिला था । उससे भी हाथ धो बैठा । और लाखों साल के नरक में गया ।
दूसरे प्रसून इंसान की ये कितनी अजीब सोच है कि प्रेत या देवता etc कुछ अलग चीज होते हैं । जिस प्रकार इन लाइफ़ एक इंसान अपना स्टेंडर्ड बनाकर आफ़्टर बेड टाइम पूअर टू रिच हो जाता है । दैन ये भी आफ़्टर लाइफ़ रिजल्ट कर्मा गति होती है । बट आदमी का स्वभाव नेचर etc वही रहता है । बस जिस प्रकार पूअर से रिच बने आदमी में थोङा ठाठवाठ से रहने एण्ड अदर लाइफ़ स्टायल में चैंज हो जाता है । वही आफ़्टर लाइफ़ भी होता है । एक गरीब आदमी झोंपङे के बजाय महल में रहने लगा । साइकिल के बजाय प्लेन से चलने लगा । ये देवता हुआ । एण्ड प्रेत रिजल्ट में । वह लाइफ़ का गेम हार गया । और दर दर भटकने को मजबूर हो गया । और...
- ओ के..ओ के. सिल्वी ! प्रसून उसे जल्दी से रोकता हुआ बोला - मैं यहाँ एक खास काम से आया हूँ । ये बहुत अच्छा हुआ । तुम मुझे मिल गयी । क्या तुम्हें पता है । यहाँ की कुछ प्रेत वहाँ । उसने महावीर के टयूब बैल की तरफ़ उँगली उठायी - वहाँ के एक आदमी को मारने या डराने धमकाने जाती हैं । मैं उनके बारे में जानना चाहता हूँ । उनसे मिलना चाहता हूँ । उनकी हेल्प भी चाहता हूँ ।
- ठीक है प्रसून ! वह उठते हुये बोली - आओ मेरे साथ ।
प्रसून उठकर खङा हो गया । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और मार्निंग वाक से अन्दाज में उसके साथ चलने लगा । अब वह खुद को बेहद हलका महसूस कर रहा था । वह सिल्विया के साथ चलता हुआ महुआ बगीची पहुँचा । वहाँ काफ़ी संख्या में प्रेत घूम रहे थे । कपालिनी कामारिका और कंकालिनी भी वहाँ एक साथ ही किसी प्रेत से मस्ती कर रही थी । पर सिल्विया उसे महुआ बगीची से होकर निकालती हुयी आगे लेकर चलती गयी । और फ़िर एक लम्बा बंजर इलाका पार करके वे एक घने पेङों के झुरमुट से पहुँचे । जहाँ शक्तिशाली प्रेतों का स्थायी वास था । या कहिये हेड आफ़िस था । यह एकदम निर्जन क्षेत्र था । और आमतौर पर आदमी से अछूता था । इसके प्रेत एरिया होने की खबर भी स्थानीय लोगों को पता थी । अतः वे उधर जाने से बचते थे । प्रसून का वहाँ भव्य स्वागत हुआ ।
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अगले दिन । दोपहर के बारह बजे थे । प्रसून कामाक्षा के ऊपरी कमरे में लेटा हुआ था । और गहरी नींद में सोया हुआ था । कल सुबह भी पाँच बजे ही वह प्रेतवासा से लौटा था । सिल्विया ने उसकी मुलाकात मरुदण्डिका नामक बेहद खतरनाक प्रेतनी से कराई थी । मरुदण्डिका उसका कार्य प्रकार या पद था । वैसे उसका नाम रूपिका था । रूपिका सुलझे स्वाभाव की प्रेतनी थी । और अन्य प्रेतनियों की अपेक्षा उसमें काम भोग वासना बहुत ही कम थी । प्रेतों के आम स्वभाव से भी उसका स्वभाव अलग और हटकर था ।
मरुदण्डिका प्रेतनियाँ दरअसल वे स्त्रियाँ बनती हैं । जो अपने जीवन में सख्त मिजाज वाली होती हैं । अपने पति बच्चों और घर को अपने ही कङे अनुशासन में चलाती हैं । ये अनुशासन इतना अधिक सख्त होता है कि वे पति को अपने साथ सेक्स भी लिमिट और तरीके से करने देती हैं । जिसको सिर्फ़ औपचारिक सेक्स कह सकते हैं । ये न सिर्फ़ घर में वरन अपने स्वभाव के चलते सोसायटी में भी अपनी उपस्थिति में अनुशासन का माहौल बना देती हैं ।
इनकी धारणा होती है कि इंसान को सलीके और कायदे से इंसानियत के आधार पर जिन्दगी को जिन्दगी के नियमों से गुजारना चाहिये । फ़िर बहुत से कारणों में से किसी कारणवश ये अपनी कर्म त्रुटि से या अकाल मृत्यु से मृत्यु उपरान्त मरुदण्डिका प्रेत स्थिति में रूपान्तरण हो जाती हैं । और जैसा कि इंसानी जीवन में होता है । व्यक्ति को उसके गुण और योग्यता के आधार पर ही काम और पद सौंपा जाता है । यहाँ भी वही बात घटित होती है ।

रूपिका से प्रसून की काफ़ी देर बात होती रही । महावीर को डराने वही जाती थी । और उसे जल्द से जल्द अंजाम मौत देना ही उसका मकसद था । लेकिन समस्या ये थी कि महावीर प्रेतभाव में नहीं आ पा रहा था । उसके अन्दर रात की परिस्थितियों में घूमते रहने से भय का लगभग अभाव ही था । और किसी भी प्रेत भाव को आरोपित करने हेतु इंसान का डरपोक या भय भाव में होना आवश्यक ही होता है । रूपिका उसके घर वालों और अन्य बहुतों को भी तिगनी का नाच नचाने वाली थी । पर वहाँ भी वही प्राब्लम थी । किन्हीं नियमों के चलते वह शालिमपुर के उस आवादी क्षेत्र में तब तक ऐसा तांडव नहीं मचा सकती थी । जब तक वह स्थान एक खास भाव से दूषित न हो जाय । और दूसरे पहले के कुछ अन्य कारणों से बहाँ तांत्रिक इंतजाम थे । इसलिये बह विवशता से कसमसा रही थी ।
प्रसून ने उसकी इच्छानुसार ये सभी बाधायें खत्म करने का वादा किया । तब उसके चेहरे पर अनोखी चमक पैदा हुयी । लक्ष्य को प्राप्त करने की चमक ।
शाम के ठीक 5 बजे मोबायल के अलार्म से प्रसून की आँख खुली । वह अपने कमरे से उठकर नीचे कामाक्षा में पहुँचा । उसने चाय पी । और वहीं से कार लेकर बाजार चला गया ।
शाम आठ बजे वह वापस कामाक्षा लौटा । और सीधा अपने कमरे में चला गया । फ़िर वहाँ से निबटकर वह सीधा शालिमपुर के शमशान पहुँचा । और किसी चिता की राख को पैकेट में भरने लगा । उसने एक निगाह खोह की तरफ़ डाली । पर रत्ना उसे दिखाई न दी । और स्वयँ अभी उसकी कोई तवज्जो भी उसकी तरफ़ नहीं थी ।
इस वक्त उसने अपना हुलिया बदल सा रखा था । और आमतौर पर एक पढा लिखा मगर देहाती सा नजर आ रहा था । फ़िर सारी तैयारी के बाद वह अपने आपको बचाता हुआ शालिमपुर गाँव में जाकर ऐसे घूमने लगा । मानों किसी खास आदमी से मिलने जा रहा हो । और उसका घर आदि जानता हो । हलका अँधेरा होने से यह कोई नहीं देख पा रहा था कि उसके हाथ में थमे पैकेट से बहुत थोङी थोङी चिता की राख उसके चलने के साथ साथ जमीन पर गिरती जा रही थी । और दूसरे हाथ के टिन के डब्बे से एक महीन छेद से शराब और सुअर का खून आदि मिश्रित दृव की पतली लकीर भी गिर रही थी । जो उसने बाजार से हासिल किये थे । इस तरह उसने कुछ ही मिनटों में पूरे गाँव का चक्कर लगाया । कुछ स्थानों पर जहाँ जहाँ उसे तांत्रिक इंतजामात नजर आये । उसने जेब से एक मोटी कील निकालकर जमीन में दबा दी । और वापस निकाल ली ।
अब मरुदण्डिका और उसकी प्रेत फ़ौज आराम से निर्विघ्न गाँव पर धावा बोल सकती थी । बस उसे इसके लिये एक बार आहवान बस और करना था । ये उसका सौभाग्य ही था कि इस बीच किसी ने भी उसकी तरफ़ कोई खास ध्यान नहीं दिया था । टोका नहीं था । और उसे गाँव में ही आया कोई व्यक्ति या गाँव का ही कोई व्यक्ति समझा था ।
अब उसे आहवान के लिये किसी उचित स्थान की तलाश थी । पहले उसने सोचा कि इसके लिये गाँव से दूर हटकर किसी पेङ का चुनाव करे । मगर वैसी हालत में वह जो देखना चाहता था । उससे वंचित रह सकता था । अतः सावधानी बरतता हुआ वह महावीर के घर से थोङा हटकर अँधेरे में खङे ऊँचे और विशाल पेङ पर ऊँचा ही चढता चला गया । और बैठने योग्य घनी मजबूत डालियों का चुनाव कर उस पर बैठ गया । बस अब कामलीला शुरू होने में थोङी ही देर थी ।
यह सर्वाधिक रहस्यमय इंसान और विलक्षण योगी उस पुराने पेङ की डालियों पर किसी आसन की भांति बैठा बीज मन्त्रों के साथ शक्तिशाली प्रेत मन्त्रों का बहुत धीमे स्वर में उच्चारण करने लगा । कुछ ही क्षणों में उसे मरुदण्डिका की किलकारियाँ मारती हुयी हर्षित सेना कपालिनी कामारिका जैसे गणों के साथ ध्यान में नजर आने लगी । वे शालिमपुर पर टूट पङने को बेताब हो रहे थे । और उधर ही सरपट भागे आ रहे थे । प्रसून के होठों पर मन्द मुस्कान तैर उठी । और फ़िर कुछ ही क्षणों में शालिमपुर में ऐसे भगदङ मच गयी । जैसे अचानक आतंकवादी हमला हुआ हो । घर की औरते बच्चे आदमी बदहवास से गलियों में भागते नजर आये । भागती हुयी औरतें अपने वस्त्र उतारकर निर्वस्त्र होती जा रही थी । और पुरुषों को गन्दी गन्दी गालियाँ देती हुयी उनके पीछे भाग रही थी । अचानक इन घर की औरतों को क्या हो गया । सोचकर पुरुषों की हालत खराब थी । और वे मानों जान बचाकर भाग रहे थे । औरतें उन्हें ईंट पत्थर लात घूँसों से मार देने पर ही तुल गयी थी ।
प्रसून खुलकर किसी राक्षस की भांति अट्टाहास करना चाहता था । फ़िर बङी मुश्किल से उसने इस इच्छा को नियन्त्रित किया । और अचानक वह बदले भाव में रो पङा । उसके आँसू निकल आये । फ़िर वह भर्राये स्वर में बोला - रत्ना बहन ! मैंने तेरे ऊपर हुये जुल्म के बदले का बिगुल बजा दिया है । बस अपने इस  भाई को थोङी मोहलत और दे दे ।

प्रसून का इंसाफ़ 9

अगले दिन दोपहर के बारह बजे थे । लेकिन दिन का समय किसी भी अच्छे योगी के लिये रात के समान ही होता है । सो वह गहरी नींद में सोया हुआ था । और घोङे बेचकर सोया हुआ था । पिछले कुछ दिनों से जबसे वह रत्ना के जीवन से रूबरू हुआ था । उसकी आत्मा पर एक बोझ सा लदा हुआ था । कभी कभी कितने अजीब क्षण जीवन में आते हैं । क्यों ये हवसी इंसान ऐसा जुल्म करता है । जिसकी कोई इंतिहा नहीं । जिसकी शायद कोई सुनवाई नहीं ।
कितनी सही बात कही थी किसी ने - कुछ न कहने से भी छिन जाता है  राजाजी सुखन । जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है । हन्ते को हनिये । इसमें दोष न जनिये । उसका दिल यही कर रहा था । उसके हाथ में सेमी ओटोमैटिक रायफ़ल होती । और वह रत्ना के अक्यूज्ड को सरेआम भून देता । पर इसमें तमाम कानूनी झमेले थे । शरीफ़ इंसान को डराने दहशत में रखने वाले कानूनी झमेले । और गुनहगारों की मदद करने वाले कानूनी झमेले ।
शालिमपुर में कोई एक घण्टा प्रेत सेना उत्पात मचाती रही । फ़िर वापस चली गयी । तब तक वह बराबर पेङ पर ही शान्त बैठा रहा । पर उसकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया । और जाने का सवाल भी नहीं था ।
एक बजे के करीब उसकी मोबायल के अलार्म से आँख खुली । और वह आँखे मलता हुआ उठकर बैठ गया । चाँऊ बाबा उसके लिये गरम चाय ले आया था । तब उसे पीते हुये उसने अपना मेल चेक  किया । और एक दिलचस्प मेल पर अटक कर रह गया । मेल भेजने वाली उसके लिये अज्ञात थी ।
लिखा था - हेल्लो प्रसून जी ! मै आपको बेहतर से जानती हूँ । कैसे ? उसको छोडिये । मैं आपसे अपने दिल की ये बात इसलिये कह बैठी । क्यूँ कि पिछ्ले हफ़्ते सपने में मैंने 1 अजनबी से सेक्स किया था । मैंने आपको देखा तो नहीं है । लेकिन मैं आपके बारे में अक्सर सोचती रहती हूँ । सपने में बबलू घर पर नहीं था । मेरा छोटा बच्चा सोया हुआ था । और मैं अपने बेडरूम में किसी अजनबी से सेक्स कर रही थी । सेक्स के दौरान मेरे मुँह से ये निकल रहा था - प्रसून जी ! जरा आराम से प्लीज ! उस दृश्य में कोई बहुत सुन्दर आदमी था । जिसे मैं प्रसून जी कहकर बुला रही थी । सपने में वो व्यक्ति बेड पर बिलकुल निर्वस्त्र लेटा हुआ था । मैं उसकी तरफ़ मुँह करके उसकी गोद में थी । उसका पौरुषत्व मेरे इन था । उसके हाथ मेरे नितम्बों पर थे । मैं अपने हाथों से उसके बाल सहला रही थी । मेरा एक उरोज उसके... । वो मेरे...को... कर.... पी रहा था ।
प्रसून जी ! जो मुझे सपना पिछ्ले हफ़्ते आया । मैंने ज्यूँ का त्यूँ बता दिया । ये सपना क्यूँ आया ? क्या ये सिर्फ़ 1 इत्तफ़ाक था । या सिर्फ़ 1 कल्पना । ये मुझे पता नहीं । मैंने आपको तो कभी देखा नहीं । लेकिन जिसे मैं सपने में प्रसून जी कहकर बुला रही थी । वो आदमी बहुत ही जवान और सुन्दर था । अब आप इस रहस्य से पर्दा उठाईये ।
मेल पढकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आयी । और फ़िर वह..आय लव यू प्रसून..हाय डियर..हाय डार्लिंग..जैसे तमाम मेल्स को बिना ओपन किये ही सिलेक्ट करता गया । और फ़िर डिलीट कर दिया । उसे हैरत थी । वह कई बार अपनी मेल आई डी और फ़ोन नम्बर बदल चुका था । फ़िर भी लोगों को पता चल ही जाता था । इसका कारण भी बह जानता था । आप मुझे बता दीजिये । कसम से किसी से नहीं कहूँगा । जैसा प्रोमिस करने वाले भी एक दूसरे को और दूसरा तीसरे को..इस तरह सैकङों लोग जान जाते थे ।
उसने 7 इंच स्क्रीन की वह पी सी नोटबुक बैग में डाल दी ।
और सिगरेट सुलगाता हुआ खिङकी के पास आकर बाहर शालिमपुर की तरफ़ देखने लगा । कल की ही रात शालिमपुर वालों की नींद हराम नहीं हुयी होगी । बल्कि बहुत समय के लिये हो गयी थी । वह देर तक ऐसे ही विचारों में खोया रहा । और शाम होने का इंतजार कर रहा था ।
उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । दोपहर के तीन बजने वाले थे । तभी उसे सीङियों पर किसी के आने की आहट हुयी । और अगले कुछ ही मिनटों में बदहवास सा महावीर दो अन्य आदमियों के साथ आया । उसके चेहरे पर हवाईयाँ उङ रही थी । वह बिना किसी भूमिका के - प्रसून जी जल्दी से मेरे साथ चलिये । की टेर लगाने लगा ।
बङी मुश्किल से प्रसून ने उसे शान्त किया । और सब बात बताने को कहा । उसके जल्दी चलिये जल्दी चलिये पर उसने तर्क दिया । बिना बात समझे । बिना तैयारी के नहीं जाया जा सकता । तब वे तीनों वहीं तख्त पर बैठ गये । और महावीर प्रसून को कल की घटना बताने लगा । उसकी आँखों के सामने कल का दृश्य जीवन्त हो उठा ।
*********
इससे एक दिन पहले की बात थी । रात के 9 बजने ही वाले थे । शालिमपुर के ज्यादातर घरों में रात्रि भोजन हो रहा था । शहर के नजदीक होने से इस गाँव में लाइट की अच्छी व्यवस्था थी । केबल टीवी इंटरनेट की भी घर घर में पहुँच थी । सो ज्यादातर स्त्री पुरुष बच्चे आन टीवी के सामने ही भोजन आदि से निबट रहे थे । महावीर भी भोजन कर चुका था । और कमरे में तकिये से टेक लगाये टीवी पर नेतागीरी की खबरें देख रहा था । उसकी औरत भी खाना आदि से फ़ारिग होकर उसके पास ही बैठी थी । उसका नाम फ़ूलमती थी  । जिसे ग्रामीण संस्कृति के अनुसार फ़ूला फ़ूला कहने लगे ।

ग्रामीण आवोहवा और शुद्ध भोजन की उपलब्धता में पली बढी फ़ूला किसी तन्दुरस्त पंजाबन के से लूक वाली थी । पर उसमें हिन्दू संस्कार के चलते काम भावना सीमित ही थी । या जो थी भी । उसको वह व्यक्त नहीं कर पाती थी । कुछ भी हो वह महावीर का घर कुशलता से चला रही थी ।
तब टीवी देखते हुये अधलेटे से महावीर की निगाह अचानक फ़ूला पर गयी । वह मादक अन्दाज में अंगङाईंया ले रही थी । उसने अपने बालों का जूङा खोल दिया था । और उन्हें बार बार झटक रही थी । उसका मुँह थोङा सा तिरछा था । अतः महावीर उसके चेहरे के हाव भाव नहीं देख सकता था । अचानक महावीर को उसका बदन ऐंठता सा लगा । और उसकी साँसे यूँ तेज तेज चलने लगी । मानों नागिन फ़ुफ़कार रही हो । वह एकदम चौंक गया । ये नार्मल साँस लेने की आवाज नहीं थी । ऐसा लगता था । जैसे उसके पेट में कोई प्राब्लम हुयी हो । और वह फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽऽऽ करती हुयी पेट की वायु को निकालने की कोशिश कर रही हो । बङी अजीव सी स्थिति में महावीर ने उसका हाथ पकङकर अपनी तरफ़ घुमाया । और उसके छक्के छूट गये । उसका चेहरा बुरी तरह अकङ गया था । और उसकी एकदम गोल गोल हो चुकी आँखों से मानों चिंगारियाँ निकल रही थी । उसका चेहरा बदलकर वीभत्स हो चुका था । और किसी चिता की राख से पुता सा मालूम होता था । उसकी नाक के नथुने एकदम फ़ूलकर रह गये थे । और मुँह से जहरीली नागिन की तरह फ़ुसकार निकल रही थी ।
उसने फ़ूला फ़ूला क्या हुआ फ़ूला करते हुये उसे हिलाने की कोशिश की । तो उसने पलटकर इतना झन्नाटेदार थप्पङ उसके गाल पर मारा कि वह चारों खाने चित्त जमीन पर जा गिरा । एक ही थप्पङ में महावीर की आँखों के सामने सितारे घूमने लगे । एक औरत का थप्पङ किसी पहलवान की लात जैसा शक्तिशाली हो सकता है । ये उसने कभी सोचा भी न था । और सोच भी नहीं सकता था ।
महावीर का इससे पहले ऐसी स्थिति से कोई वास्ता न पङा था । उसकी समझ में न आया कि वह क्या करे । एकदम उसके दिमाग में भूत प्रेत जैसी बात जैसे शब्द आये अवश्य । पर वह तो उनको मानता ही नहीं था । उनके बारे में कुछ जानता ही न था । पर कभी कहीं देखे दृश्य के अनुसार उसके दिमाग में आया कि प्रेत गृस्त औरत के बाल पकङ कर उसका परिचय प्रश्न आदि पूछने से वह वश में हो जाती है । और साथ में हनुमान चालीसा पढते जाओ । या बजरंग वली का नाम लेते जाओ ।
सो उसने तात्कालिक बनी बुद्धि के अनुसार ऐसा ही किया । और भूत पिशाच निकट नहीं आवे । महावीर जब नाम सुनावे । बारबार कहते हुये उसने फ़ूला के लम्बे लहराते बाल पकङ लिये । और हिम्मत करके बोला - ऐ कौन है तू ?
ये कहना ही मानों गजब हो गया । फ़ूला का फ़ौलादी मुक्का सनसनाता हुआ उसके पेट में लगा । महावीर को लगा । मानों उसकी अंतङिया बाहर ही आ गयी हों । पेट पकङकर वह दोहरा हो गया । फ़ूला उसके गिरते ही उसकी छाती पर सवार हो गयी । और उसकी नाक में जोरदार दुहत्थङ मारा । और तब महावीर को उसकी शक्ल स्पष्ट दिखाई दी । टयूबबैल पर सपने में आने वाली आज उसके घर में उसकी छाती पर साक्षात बैठी थी ।  फ़ूला दूर दूर तक कहीं न थी । उसका साफ़ साफ़ चेहरा उसे दिख रहा था ।
बस आगे की बात समझते उसे देर नहीं लगी । और वह उठकर किसी तरह उससे जान बचाकर बाहर भागा । फ़ूला उसके पीछे पीछे साले हरामी कहते हुये भागी । उसके मुँह से भयंकर फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽ की सीटी सी बज रही थी । मगर बाहर निकलकर तो उसकी हालत और भी खराब हो गयी । गाँव की ज्यादातर औरतें बच्चे मानों पागल हो गये थे । और एक दूसरे पर विभिन्न तरीकों से आकृमण कर रहे थे । तब वह किससे क्या कहता । किससे मदद की गुहार करता । बस उसने एक बात जरूर नोट की थी कि ये पागलपन सिर्फ़ औरतों पर ही सवार हुआ था । मर्द सिर्फ़ पिट रहे थे । और भाग रहे थे । छोटे बच्चे भी उनको ईंटों से मार रहे थे । सारे गाँव में आतंकवादी हमले जैसी भगदङ थी । जिसे जहाँ जगह मिल रही थी । जान बचाकर भाग रहा था । और बस भाग ही  रहा था । अभी वह क्या करे । और कैसे करे । ये न कोई बताने वाला था । और न ही कोई पूछने की स्थिति में था ।
इस तरह ये तांडव लगभग एक घण्टे चला । और अपने आप ही शान्त हो गया । फ़िर भी सभी मर्द सशंकित से रात के बारह बजे डरते डरते ही घर लौटे । इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा ।
महावीर तो अपनी बात बताते समय अपनी धुन में मग्न था । अतः वह कोई खास प्रसून के हाव भाव नहीं जान सका । पर वे दोनों आदमी बङी गौर से प्रसून को ही देख रहे थे । घटना को गौर से सुनते हुये वह मानों थरथर काँप उठता था । उसके चेहरे पर हवाईंयाँ सी उङ रही थी । और ऐसा लग रहा था । किसी भी क्षण डर के मारे उसका पेशाब ही निकल जायेगा । और निकल भी गया हो । तो कोई आश्चर्य नहीं । ऐसा वे दोनों आदमी सोच रहे थे ।
वे यह भी सोच रहे थे । महावीर क्या सोचकर इस लौंडे के पास अपनी करुण कथा सुनाकर समय को बरबाद कर रहा है । पर अब आ ही गये हैं । तो आगे आगे देखें होता है क्या । सोचकर वह चुप बैठे थे । हालांकि कल की घटना में वह खास पीङितों में से नहीं थे । पर क्या पता अगली कल में वह भी हो जायें । यही सोचकर आगे के लिये सतर्क सावधान हो जाना उनकी उत्तम सोच थी । मौत से किसकी रिश्तेदारी है । आज मेरी तो कल तेरी बारी है । यह उनका पक्का जीवन दर्शन था ।
- हाँ तो बताईये प्रसून जी ! महावीर के बोलने से अचानक उन दोनों की सोच भंग हुयी । गौर से सुनता हुआ प्रसून भी जैसे एकदम चौंका - ये सब क्या था । क्या है ?
प्रसून हाथों की उँगलियों को आपस में उलझाकर ऐसे चटकाने लगा । मानों उसे कोई उपाय सूझ न रहा हो । उसके चेहरे पर गहन निराशा और अफ़सोस के भाव थे । उनके लिये दुख और बेबसी उसके चेहरे से मानों मूसलाधार बरसात की तरह बरस रही थी । और वह डर के मारे पीला पङा हुआ था । महावीर को कुछ कुछ हैरत सी हो रही थी । पर फ़िलहाल वही डूबते को तिनके का सहारा था ।
फ़िर उसने सिगरेट सुलगायी । और मानों गहरे सोच में डूब गया । उसकी आँखें शून्य 0 में स्थिर थी ।
कुछ देर बाद वह बोला - सारी ! मुझे बङा अफ़सोस है । पर मुझे नहीं लगता कि ये मेरे बस की बात है । अपनी जिन्दगी में मैंने आज तक ऐसा प्रेतक हमला न देखा । न सुना । जिसमें पूरा गाँव ही प्रभावित हुआ हो । बताईये । जब प्रेत किसी टेरिरिस्ट की तरह अटैक कर रहे हों । तब कहाँ गद्दी लगेगी । मन्त्र कहाँ पढा जायेगा । कौन हेल्परी करेगा । और सवाल ये है । आवेशित गद्दी पर कैसे बैठेगा । अब कोई तांत्रिक भूतों के पीछे भागता हुआ तो तांत्रिकी करने से रहा । अब मैं क्या बताऊँ । महावीर जी मेरी समझ में खुद नहीं आ रहा । आपने किन्ही और तांत्रिकों से बात नहीं की ।
महावीर के चेहरे पर गहन निराशा के बादल मंडराने लगे । वह गहरी सोच में डूब गया ।
प्रसून का दिल कर रहा था । वह खुलकर राक्षसों की भांति अट्टाहास करे । और हँसता ही चला जाये । हँसता ही चला जाये । इस स्टोरी को सुनते हुये वह दिल ही दिल में मरुदण्डिका को हजारों बार थेंक्स बोल चुका था । उसे बहुत अफ़सोस इस बात का था कि वह हरामी सुरेश पहले ही मर गया था । बङी आसान मौत मर गया था । उसे कुछ दिन और जिन्दा रहना चाहिये था । और वह शायद रहता भी । जो उसकी मरुदण्डिका से पहले मुलाकात हो जाती । पर अब क्या हो सकता था । तीर कमान से निकल चुका था ।
- और तांत्रिको से.. । महावीर कुछ सोचता हुआ सा बोला - कई तांत्रिकों के पास सुबह से गाङी लेकर घूम रहा हूँ । पर सबने यही कहा । यह प्रेतक नहीं । दैवीय प्रकोप है । और अगर प्रेतक प्रकोप है भी । तो कम से कम उनके बस की बात नहीं । तब मुझे आपका ध्यान आया । चाँऊ महाराज ने आपकी बहुत तारीफ़ की थी । मैंने सोचा । आपके पास इसका कोई हल शायद हो । शायद । शायद ।
- शायद ! प्रसून उसका ही शब्द दोहराता हुआ बोला - शायद इसका हल है तो । मगर बह मेरे पास नहीं है । वैसे..। अचानक उसे कुछ याद आया । और वह बोला - हाँ ये बताओ । इस हमले से गाँव के सभी बच्चे औरतें पीङित हुये । या सिर्फ़ कुछ ही घरों के लोग ? मेरा मतलब बाद में मामला शान्त होने पर जानकारी तो हुयी होगी ।
- हाँ ! महावीर कुछ याद करता हुआ भय से काँपकर बोला - खास तीन घर ही अधिक प्रभावित हुये थे । मेरा । इतवारी का । और जो कुछ दिन पहले बेचारा जवान लङका मरा सुरेश । ये ज्यादा प्रभावित हुये थे । पर थोङा थोङा प्रभाव सभी घरों पर हुआ था । बस कुछ गिनती के घर ही बचे थे । जो बहुत सीधे साधे घरों के लोग थे । और उन्हें तो ठीक से उस समय जानकारी भी नहीं हो पायी कि गाँव में हंगामा बरपा हुआ है । उनमें से बहुत से जल्दी सो गये थे । वे आराम से सोते रहे । उन्हें दूसरे दिन ही पता चला । बहुत छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी प्रभावित नहीं हुये । सुरेश के घर की जवान लङकियाँ तो खुद नंगा होकर गलियों में नाची ।
- ओह ओह..। प्रत्यक्ष में गहरी सहानुभूति दिखाता हुआ प्रसून मन ही मन घृणा से बोला - उल्लू के पठ्ठे ।  साले । हरामी । फ़िर भी तुझे समझ में नहीं आया । अपने पाप याद नहीं आये । और पाप का प्रायश्चित करने के बजाय । खुद के इलाज को भागा भागा फ़िर रहा है । अगर तुझे जरा भी अक्ल होती । तो तुझे तो तुरन्त भगवान के आगे कनफ़ेस करना चाहिये था । सर फ़ोङ देना चाहिये था अपना । उसके न्याय में देर है । अँधेर नहीं । उसकी लाठी बे आवाज होती है साले कुत्ते ।
सोचते सोचते उसके आँसू फ़िर से निकलने को हुये । जिसे उसने जबरन ही रोका । और अपनी आवाज को भर्राये जाने से बचाता हुआ बोला - देखिये । अगर इंसान खुद को सुधारना चाहे । तो...। अपनी बात का रियेक्शन उसने गौर से महावीर के चेहरे पर देखा । और बोला - मेरा मतलब कोई स्थिति बिगङ गयी है । तो इलाज तो हो ही जाता है । पर जिन्दगी की हर बात में शायद अवश्य जुङी होती है । और शायद का मतलब है । अनिश्चितिता । शायद ऐसा हो जाय । और शायद ऐसा न भी हो । शायद । है ना ।
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