रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अँधेरा 1

पंजाब का एक शहर गुरदासपुर । प्रकृति की अदभुत सुन्दरता और पंजाब की मिट्टी से उठती सोंधी सोंधी खुशबू को देखकर निश्चित ही कोई भी कह सकता था कि प्रकृति की देवी प्रथ्वी के इस हिस्से पर खास मेहरवान ही है ।
हरे भरे खेतों में लहराती युवा अल्हङ मदमस्त जवानी सी फ़सलें बुझे दिलों की भी उमंगे जवान करने वाली थी । इस इलाके की आबादी औसत यानी न बहुत कम और न बहुत ज्यादा थी । अधिकतर जनता खेती बाङी करती थी । और किसी न किसी रूप में खेती से जुङी थी । झूठी 21 सेंचुरी की आधुनिक कल्पना के मुँह पर करारा तमाचा सा मारते हुये  यहाँ अधिकतर घरों में अभी भी गाय भैंसे आराम से देखी जा सकती थी ।
गुरुदासपुर की औरतें पूरे पंजाब में सबसे खूबसुरत होती हैं । शुद्ध हवा पानी और स्वस्थ जीवन का मूलमन्त्र असली शुद्ध घी दूध दही छाछ लस्सी का प्रचुर मात्रा में सहज उपलब्ध होना । उन्हें भरपूर औरत में बदल देता था । और इसीलिये पंजाब की हर छोरी एकदम तेजी से जवानी की ओर बढती थी । मानों पतंग की तरह बङती ही चली जा रही हो ।
सुन्दर चेहरे भरे हुये शरीर और लम्बे कद की औरतें इस क्षेत्र की पहचान थी ।  उनके गोल तीखे नोकीले उन्नत उरोज किसी के भी दिल को डांवाडोल कर सकते थे । चलते समय थिरकते उनके विशाल नितम्ब नारी सौंदर्य के मनमोहिनी रूप को रेखांकित करते थे ।
पंजाब के ज्यादातर लोग 1947 के बाद पाकिस्तान बनने के बाद यहाँ भारत आकर बसे थे । इसलिये इन लोगों यानि इनकी नस्ल पर पाकिस्तानी प्रभाव स्पष्ट नजर आता है ।
इसी गुरुदास पुर के एक इलाके में वह एक खूबसूरत सुबह थी । बदन को हौले हौले सहलाती हुयी सी ठण्डी हवा धीरे धीरे बह रही थी । कालेज जाने वाले लङके लङकियों के समूह सङक पर नजर आ रहे थे । तभी एक कार में फ़ुल वाल्यूम पर बजता स्टीरियो में मीका का गाना इस मदमस्त फ़िजा को मानों और भी रोमांटिक कर गया । और लहराती हुयी वह कार सङक पर जाती दो युवा लङकियों को मानों चूमती हुयी सी गुजरी - सावण में लग गयी आग । दिल मेरा फ़ाग..सुण ओ हसीणा पागल दिवाणी.. आज न सोया सारी रात दिल मेरा फ़ाग..।
- आऊऽऽच ..ओये सालिया..भैण के..। जस्सी एकदम बौखलाकर बोली - ऊपर ही चढाये दे रहा है । हरामी साला ।
जस्सी यानि जसमीत कौर । जसमीत कौर बराड उर्फ़ जस्सी 1 बेहद सुन्दर और जवान लडकी थी । और अभी सिर्फ़ 20 साल की थी । उसका कद 5 फ़ीट 8 इंच था । और शरीर  36-29-36 के नाप में दिलकश अन्दाज में ढला  हुआ था । वह इतनी सुन्दर थी कि अगर फ़िल्मों में होती । तो शायद सभी हीरोइनों की छु्ट्टी ही कर देती ।
जस्सी लडकियों के कालेज में पढती थी । उसका चेहरा भरा हुआ और गोल था । उसके नैन नक्श बहुत तीखे थे । उसकी आँखे एकदम हरी और खूब बङी बङी थी । जस्सी के उभरे और विशाल नितम्ब चलते वक्त कम्पन सा करते थे । उसकी त्वचा बहुत ही चिकनी थी । और इस तरह वह 1 तरह से शुद्ध नेचुरल ब्यूटी ही थी । उसके काले घने लम्बे बाल थे । जिनका वह महिलाओं की तरह पीछे की तरफ़ जूङा लगाती थी । वह कालेज जाते वक्त ऊँची ऐडी के सैंडल पहनती थी । कालेज आदि जाने हेतु जस्सी को उसके बाप ने नया स्कूटर लाकर दिया था । उसकी गोरी गोरी टांगे और पिण्डलियाँ बेहद तन्दुरस्त थी । उसकी कमर मजबूत थी । उसका पेट एकदम सपाट और उसकी पीठ भरी हुई और मांसल थी  । उसकी बाहें लम्बी और मुलायम थी । उसके हाथ बहुत सुन्दर थे । उसकी गरदन लम्बी चिकनी और सुराहीदार थी । उसके स्तन बिलकुल गोल और तीखे थे । वह अक्सर ही कसे हुए पंजाबी सूट पहनती थी । कभी कभार बेहद टाइट जीन्स भी पहनती थी । वह एक अच्छे खाते पीते जमींदार परिवार की 1 ही बेटी थी । उसका कोई बहन भाई नहीं था । इसलिये उसके माँ बाप उसे जरुरत से ज्यादा प्यार करते थे । घर में गाय भैंसे होने से और बचपन से ही जस्सी को घर का दूध । मक्खन । दही । लस्सी । मलाई मिलने से उसका शरीर बहुत विकसित हो गया था । उसके शरीर में 1 नेचरल निखार आ गया था । उसकी खूबसूरती में 1 नेचरल आकर्षण था ।
- क्या हुआ ? उसके साथ चल रही गगन एकदम से चौंककर बोली - कौन था ?
जस्सी के साथ चल रही लङकी का नाम गगन कौर था । उसके बाप का मुर्गे बेचने का बिजनेस था । उसके बाप की दुकान का नाम " न्यू चिकन कार्नर " था । जिसके चलते लोग मजाक में उसे " न्यू चिकन वाली " कहकर बुलाते थे ।
गगन कौर उर्फ़ न्यू चिकन कार्नर वाली की फ़िगर का नाप 34-28-34 था । और कद 5 फ़ीट 6 इंच था ।
उसके बाप का नाम गुरमीत सिंह था । उसकी माँ मर चुकी थी । इसलिये वह एकदम आवारा सी हो गयी थी । उसका 1 भाई था । जिसका नाम चरनदीप सिंह था ।
- ओये गगन ! क्या पूरी बेबकूफ़ ही है तू । जस्सी झुँझलाकर बोली - तू कौन से ख्यालों में खोयी रहती है । ऐसे तो कोई मुण्डिया किसी दिन तेरी पप्पिया झप्पियाँ कर देगा । और तू यही बोलेगी । क्या हुआ । ओये होश कर कुडिये होश ।
- हाये ! गगन ने चलते चलते उसके पीछे हाथ मारा - तेरे मुँह में गुलाब जामुन । कब लेगा वो मेरी । पप्पियाँ झप्पियाँ ।
उसके बेतुके सेक्सी जबाब पर जस्सी खिलखिला उठी । गगन बङी मस्त जवानी थी । उसके ख्वावों ख्यालों सोते जागते खाते पीते में हर वक्त एक ही तस्वीर बनती थी । लङके और रोमांस । ओनली LOL
पढाई में भी उसका खास दिल नहीं लगता था । टीचर जब ब्लैक बोर्ड पर कुछ समझा रहा होता था । वह बगल


वाली लङकी से दबे स्वर में सेक्सी जोक सुन रही होती थी । जोक सुनकर उसे उत्तेजना होती थी । और तब वह जस्सी के नितम्ब पर चिकोटी काटती  थी । और जगह जगह उसको कामुक स्पर्श करती थी । पढाई में दिल लगाती जस्सी कसमसा कर रह जाती थी ।
पर वह यहीं पर बस नहीं करती थी । वही जोक वह जस्सी को रास्ते में सुनाती थी । और उसकी काम भावनायें भङका देती  थी ।
- गगन ! अचानक जस्सी कुछ सोचती हुयी बोली - तू ऐसा क्यों नहीं करती । तेरे पापा को बोल । तेरी जल्दी शादी करा दें । क्यूँ तरसती रहती है ।
- ओ माय जस्सी । जस्सी डार्लिंग ! वह एकदम मचलकर बोली - तू मेरा ये काम कर दे । तू ही मेरे पापा को बोल । लेकिन ऐसा न हो । ऐसा न हो कि कुछ और बात कर दो । नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगी । उदास हो जाऊँगी । निराश हो जाऊँगी । मैं रो पङूँगी । गुस्से में आकर उसका... काट दूँगी । टुईं.. टुईं । आई लव यू दूल्हे राजा ।
तभी सहसा ही जस्सी को हल्का हल्का सा चक्कर आने लगा । पूरा बाजार उसे गोल गोल घूमता सा प्रतीत हुआ । सङक पर चलते लोग । वाहन । दुकानें । सभी कुछ उसे घूमता हुआ सा नजर आने लगा । फ़िर उसे लगा । एक तेज आँधी सी चलने लगी । और सब कुछ उङने लगा । घर । मकान । दुकान । लोग । वह । गगन । सभी तेजी से उङ रहे हैं । और बस उङते ही चले जा रहे हैं ।
उसके साथ साथ चलती हुयी गगन उसकी बदली हालत से अनभिज्ञ थी । और अभी भी अपनी रौ में कुछ न कुछ बके जा रही थी । उसके नितम्बों पर हाथ मार देती थी । पर जस्सी को मानों कोई होश ही नहीं था । वह किसी रोबोट की भांति चले ही जा रही थी ।
और फ़िर यकायक जस्सी की आँखों के सामने दृश्य बदल गया । वह तेज तूफ़ान उन्हें उङाता हुआ एक भयानक जंगल में छोङ गया । फ़िर एक गगनभेदी धमाका हुआ । और आसमान में जोरों से बिजली कङकी । इसके बाद तेज मूसलाधार बारिश होने लगी । वे दोनों जंगल में भागने लगी । पर क्यों और कहाँ भाग रही हैं । ये उनको भी मालूम न था । बिजली बारबार जोरों से कङकङाती थी । और आसमान में गोले से दागती थी । हर बार पानी दुगना तेज हो जाता था ।
फ़िर वे दोनों बिछङ गयीं । और जस्सी एक दरिया में फ़ँसकर उतराती हुयी बहने लगी । तभी उसे उस भयंकर तूफ़ान में बहुत दूर एक साहसी नाविक मछुआरा दिखायी दिया । जस्सी उसकी ओर जोर जोर से बचाओ कहती हुयी चिल्लाई । और फ़िर  गहरे पानी में डूबने लगी ।
सङक पर चल रही जस्सी का सिर तब बहुत जोर से चकराया । और वह बचाओ बचाओ चीखती हुयी लहराकर गिर गयी । अपनी धुन में मगन गगन कौर के मानों होश ही उङ गये । उसे अचानक कुछ नहीं सूझ रहा था । वह तो बस बेजुबान सी जस्सी के पास इकठ्ठी हुयी पब्लिक को देखे जा रही थी । लोग उससे क्या पूछ रहे हैं । और वह उसका क्या जबाब दे  रही है । उसको ये भी होश नही था ।

अंधेरा 2

अंधेरा । बङा ही अजीव और रहस्यमय होता है ये अंधेरा । बहुत सारे रहस्यों को अपने काले आवरण में समेटे जब अंधेरे का साम्राज्य कायम होता है । तो अच्छे से अच्छा इंसान भी अपने आप में सिमट कर ही रह जाता है । और जहाँ का तहाँ रुक जाता है । मानों समय का पहिया ही रुक गया हो ।
संध्या ढल चुकी थी । रजनी जवान हो रही थी । निशा के लगभग बारह बजने वाले थे । पर राजवीर कौर की आँखों से नींद उङ सी चुकी थी । वह बारबार बिस्तर पर करवट बदल रही थी । बाहर कोई कुत्ता दुखी आवाज में हूऊऊ..ऊऽऽऽ करता हुआ बारबार रो रहा था । उसकी ये रहस्यमय आवाज राजवीर के दिल को चाक सी कर देती थी । उसने किसी से सुना था । कुत्ते को प्रेत या यमदूत दिखाई देते हैं । तब वह अजीव सी दुखी आवाज में रोता है । और आज कोई कुत्ता बारबार रो रहा था ।
ये भी हो सकता था । उसने सोचा । मैंने आज ही सुना हो । ये अक्सर ही रोता हो । पर आज उसका ध्यान जा रहा हो । कुत्ता जैसे ही हूऊऊ करना बन्द करता । वह सोचती । अभी फ़िर रोयेगा । और वास्तव में कुत्ता कुछ देर बाद ही फ़िर रोने लगता था ।
उसने एक निगाह बगल में सोयी जस्सी पर डाली । और बैचेनी से उठ गयी । उसने फ़्रिज से एक ठण्डी बोतल निकाली । और गटागट पी गयी । तब उसे कुछ राहत सी महसूस हुयी ।
राजबीर कौर जस्सी का माँ थी । उसकी उमर अभी 40 साल थी । और उसके सेक्सी बदन का साइज 37-33-39 था । उसका कद 5 फ़ीट 7 इंच था । वह लम्बी चौडी बहुत ही खूबसूरत औरत थी । और बहुत बन सवर कर रहती थी । वह हमेशा महंगे फ़ैशनेबल सूट पहनती थी । जो उसके बेमिसाल सौन्दर्य में चार चाँद लगाते थे ।
राजबीर की नयी जवानी में 18 साल की उमर में ही शादी हो जाने के कारण वो अभी भी जवान ही लगती थी । अभी 40 साल की राजवीर 30 से ज्यादा नहीं लगती थी । और अब तो बेटी भी जवान हो चुकी थी । लेकिन अक्सर पराये मर्दों को समझ में नही आता कि माँ या बेटी में किसको देखे । हरामी किस्म के लोग माँ और बेटी को देख देखकर मन ही मन आँहे भरते थे ।
जब भी दोनों माँ बेटी किसी शादी । पार्टी ।  बाजार । किसी के घर । या  सडक पर निकलती थी । तो उन्हें देखने वाले मन ही मन आँहें भर कर रह जाते थे । लेकिन जस्सी के बाप के डर के कारण उन्हें कोई अश्लील टिप्पणी नहीं कर पाते थे । पर जो अनजान थे । वो जस्सी और राजवीर के बेहद सुन्दर चेहरों और उठते गिरते नितम्बों की

मदमस्त चाल को देखकर टिप्पणी करने से बाज नहीं आते । जिसे अक्सर वे दोनों ऐसे नजर अन्दाज कर देती थी । जैसे कुछ हुआ ही न हो । पर मन ही मन अपनी सुन्दरता और जवानी पर नाज करती हुयी इठलाती थीं ।
राजवीर चलते हुये उस कमरे में आयी । जहाँ बेड पर पसरा हुआ उसका पति मनदीप सिंह सो रहा था । कैसा अजीव आदमी था । बेटी की हालत से बेफ़िक्र मस्ती में सो रहा था । या कहिये । रोज पीने वाली दारू के नशे में था । उसका तगङा महाकाय शरीर बिस्तर पर फ़ैल सा गया था ।
राजवीर धीरे से उसके पास बैठ गयी ।  और उसे थपथपा कर जगाने की कोशिश करने लगी । हूँ ऊँ हूँ..करता हुआ मनदीप पहले तो मानों जागने को तैयार ही नहीं था । फ़िर वह जाग गया । शायद वह कल की बात भूल सा चुका था । इसलिये उसने राजवीर को अभिसार आमन्त्रण हेतु आयी नायिका ही समझा । उसने राजवीर को अपने सीने पर गिरा लिया । और उसके स्तनों को सहलाने लगा । राजवीर हैरान रह गयी । उसे यकायक कोई बात नहीं सूझी । वह जस्सी के बारे में बात करने आयी थी । पर पति का यह रुख देखकर हैरान रह गयी ।
वास्तव में मनदीप अभी भी नशे की खुमारी में था । नियमित पीने वाले को पीने का बहाना चाहिये । खुशी हो गम । वे दोनों हालत में ही पीते हैं । सो मनदीप ने उस शाम को भी पी थी । उसने राजवीर को बोलने का कोई मौका ही नहीं दिया । और नाइटी सरकाकर उसके उरोंजो को खोल लिया । ब्रा रहित उसके दूधिया गोरे उरोज मनदीप को बहकाने लगे ।
किसी भी टेंशन में कामवासना भी शराब के नशे की तरह गम दूर करने वाली ही होती है । सो कोई आश्चर्य नहीं था । पति के मजबूत हाथ का अपने स्तनों पर दबाब महसूस करती हुयी राजवीर भी जस्सी के बारे में उस समय लगभग भूल ही गयी । और उत्तेजित होने लगी । मनदीप के बहकते हाथ उसके विशाल नितम्बों पर गये । और फ़िर उसने राजवीर को अपने ऊपर खींच लिया ।
तब उसने अपनी नाईटी उतार दी । और मनदीप को पूरी तरह सहयोग करने लगी । बङी प्रभावी होती है ये कामवासना भी । सामना मुर्दा रखा होने पर भी जाग सकती है । स्त्री और पुरुष का एकान्तमय सामीप्य इसको तुरन्त भङकाने वाला सावित होता है । सो राजवीर तुरन्त बिस्तर पर झुक गयी । और मनदीप उसके पीछे से सट गया । अपने अन्दर वह मनदीप का प्रवेश महसूस करने लगी । वह अभी भी दम खम वाला इंसान था । सो राजवीर के मुँह से आह निकल गयी । फ़िर वह मानों झूले में झूलती हुयी ऊपर नीचे होने लगी । सारे पंजावी मर्द ही अप्राकृतिकता के शौकीन थे । गुदा मैथुन के दीवाने थे । और उनके इसी विपरीत मार्गी शौक के चलते सभी औरतों की भी वैसी ही आदत बन गयी थी ।
उसके मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी । और शरीर में गर्म दृव्य सा महसूस हुआ । फ़िर वह आनन्द से कराहने लगी । मनदीप भी निढाल हुआ सा उसके पास ही लुढक गया ।
राजवीर ने कपङे पहनने की कोई कोशिश नहीं की । और मनदीप के सहज होने का इंतजार करने लगी ।
- मुझे बङी फ़िक्र हो रही है । वह गौर से मनदीप के चेहरे को देखते हुये बोली - पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ । लङकी जवान है ।
मनदीप को तुरन्त कोई बात न सूझी । जस्सी यकायक बाजार में चक्कर खाकर गिर गयी थी । और जैसे तैसे लोगों ने उसे घर तक पहुँचाया था । घर तक आते आते  उसकी हालत में थोङा सुधार सा नजर आने लगा था । पर वह इससे ज्यादा कुछ न बता सकी कि अचानक ही उसे चक्कर सा आ गया था । और वह गिर गयी । डाक्टर ने उसका चेकअप किया । और फ़ौरी तौर पर किसी गम्भीर परेशानी से इंकार किया । उसके कुछ मेडिकल टेस्ट भी कराये गये । जिनकी रिपोर्ट अभी मिलनी थी ।
करीब शाम होते होते जस्सी की हालत काफ़ी सुधर गयी । पर वह कमजोरी सी महसूस कर रही थी । जैसे उसके शरीर का रस सा निचोङ लिया गया हो ।
- पर मुझे तो । मनदीप बोला - फ़िक्र जैसी कोई बात नहीं लगती । शरीर है । इसमें कभी कभी ऐसी परेशानियाँ हो जाना आम बात है ।
दरअसल राजवीर जो कहना चाहती थी । वो कह नहीं पा रही थी । उसे लग रहा था । मनदीप पता नहीं क्या सोचने लगे ।
मनदीप सिंह जस्सी का बाप था । सब उसे बराङ साहब बोलते थे । उसकी उमर 45 साल थी । और उसका कद  5 फ़ीट 11 इंच और शरीर बहुत मजबूत था । वह हमेशा कुर्ता पजामा पहनता था ।
मनदीप सिंह बेहद अहंकारी आदमी था । उसे अपने अमीर होने का बहुत अहम था । जिसके चलते वो दूसरों को हमेशा नीचा ही समझता था । वह पगडी बाँधता था । और उसके चेहरे पर बङी बङी दाङी मूँछे  थी । मनदीप रोज ही शराब पीता था । और मुर्गा चिकन खाने का बहुत शौकीन था ।
वैसे जस्सी और उसके माँ बाप कभी कभी गुरुद्वारा जाते थे । लेकिन फ़िर भी मनदीप नास्तिक ही था  । इसके विपरीत राजवीर काम चलाऊ धार्मिक थी । जस्सी न आस्तिक थी । और न ही नास्तिक । वो बस अपनी मदमस्त जवानी में मस्त थी ।
 - सुनो जी । अचानक राजवीर अजीव से स्वर में बोली - ऐसा तो नहीं । कहीं ये भूत प्रेत का चक्कर हो ?
मनदीप ने उसकी तरफ़ ऐसे देखा । जैसे वह पागल हो गयी हो । दुनियाँ 21 वीं सदी में आ गयी । पर इन औरतों और जाहिल लोगों के दिमाग से सदियों पुराने भूत प्रेत के झूठे ख्याल नहीं गये ।
वह उठकर तकिये के सहारे बैठ गया । और उसने राजवीर को अपनी गोद में गिरा लिया । फ़िर उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला - कैसे होते हैं भूत प्रेत ? तूने आज तक देखे हैं । तुझे पता है । सिख लोग भूत प्रेत को बिलकुल नहीं मानते । ये सब जाहिल गंवारों की बातें हैं । भूत प्रेत । आज तक किसी ने देखा है । भूत प्रेत को ।
फ़िर उसने मानों मूड सा खराब होने का अनुभव करते हुये राजवीर के स्तनों को सहला दिया । मानों उसका ध्यान इस फ़ालतू की बकबास से हटाने की कोशिश कर रहा हो । लेकिन राजवीर के दिलोदिमाग में कुछ अलग ही उधेङबुन चल रही थी । जिसे वह मनदीप को बता नहीं पा रही थी । फ़िर उसने सोचा । अभी मनदीप से बात करना बेकार है । शायद वह सीरियस नहीं है । इसलिये फ़िर कभी दूसरे मूड में बात करेगी । यही सोचते हुये उसने मनदीप का हाथ अपने स्तनों से हटाया । और कपङे ठीक करके बाहर निकल गयी ।
जस्सी दीन दुनियाँ से बेखबर सो रही थी । पर राजवीर की आँखों में नींद नहीं थी । वह रह रहकर करबटें बदल रही थी ।

अंधेरा 3

कोई चार दिन बाद । दोपहर के समय करम कौर राजवीर के घर पहुँची ।  राजवीर ने उसे खास फ़ोन करके बुलाया था । उसकी गोद में एक छोटा सा दूध पीता बच्चा था । वह एक हसीन और जवानी से भरपूर लदी हुयी मादक बनाबट वाली औरत थी । भरपूर औरत ।
करम कौर गरेवाल जबर जंग सिंह की विधवा थी । और राजवीर की खास सहेली थी । उसका फ़िगर 37-33-40 था । और उसका कद 5 फ़ीट 9 इंच था । वह गुदा मैथुन की बहुत शौकीन थी । और ऐसे कामोत्तेजक क्षणों में वह स्वर्गिक आनन्द महसूस करती थी । उसके विशाल और अति उत्तेजक नितम्बों की बनावट अच्छे अच्छों की नीयत खराब कर देती थी । और तब वे हर संभव उसे पाने का प्रयत्न करते थे ।
करम कौर की पहली शादी से जो बेटा था । वो अभी 15 साल का था । उसका नाम " गुर निहाल सिंह " था । करम कौर का पहला पति । जो मर चुका था । उसका नाम " जबर जंग सिंह " था । और अभी दूसरे पति का नाम " शमशेर सिंह " था । करम कौर  के पहले शादी से 2 बच्चे थे । जिनमें 1 बेटा और दूसरा बेटी थी । उसकी बेटी का नाम " गुरलीन कौर " था । दूसरी शादी से जो बच्चा पैदा हुआ । उसका नाम " हरकीरत सिंह "  था ।
- ओये राजवीर ! वह उसके सामने बैठती हुयी बोली - तू बङी फ़िक्रमन्द सी मालूम हुयी फ़ोन पर । क्या बात हुयी ।
राजवीर ने रिमोट उठाकर टीवी का वाल्यूम बेहद हल्का कर दिया । और करम कौर की तरफ़ देखा । उसके और करम कौर के बीच कुछ छुपा हुआ नहीं था । वे एक दूसरे की पूरी तरह से राजदार थी । और अक्सर फ़ुरसत के क्षणों में अपने सेक्स अनुभवों को बाँटती हुयी काल्पनिक सुख महसूस करती थीं । करम कौर का बच्चा शायद भूख से मचलने लगा था । उसको शान्त कराने के उद्देश्य से वह स्तनपान कराने लगी ।
- समझ नहीं आ रहा । फ़िर राजवीर उसकी तरफ़ देखती हुयी बोली - क्या कहूँ । और कैसे कहूँ । और कहाँ से कहूँ ।
करम कौर ने इसे हमेशा की तरह सेक्सी मजाक ही समझा । अतः बोली - कहीं से भी बोल । आगे से पीछे से । ऊपर से नीचे से । आखिर तो साँप जायेगा । बिल के अन्दर ही ।
- वो बात नहीं । राजवीर बोली - मैं वाकई सीरियस हूँ । और जस्सी को लेकर सीरियस हूँ । पिछले कुछ दिनों से मैं कुछ अजीव सा देख रही हूँ । अनुभव कर रही हूँ ।
करम कौर बात की नजाकत को समझते हुये तुरन्त सीरियस हो गयी । और प्रश्नात्मक निगाहों से राजवीर की तरफ़ देखने लगी ।
- मैं ! राजवीर बोली - पिछले कुछ दिनों से । या लगभग बीस दिनों से । जस्सी के पास ही सो रही हूँ । मैंने सोचा । अगर वो वजह पूछेगी भी । तो मैं कुछ भी बहाना बोल दूँगी । पर उसने ऐसा कुछ भी नहीं पूछा । तुझे मालूम ही है । मैं अक्सर ग्यारह के बाद ही सोती हूँ । जबकि जस्सी दस बजे से कुछ पहले ही सो जाती है । मनदीप का नशा ग्यारह के लगभग ही कुछ हल्का होता है । और तब वह रोमान्टिक मूड में होता है । मुझे उन पलों का ही इंतजार रहता है । उस समय वह भूखे शेर के समान होता है । लिहाजा उसका ये रुटीन पता लगते ही मेरी बहुत सालों से ऐसी आदत सी बन गयी है ।
ऐसे ही एक दिन । लगभग बीस दिन पहले । जब मैं सोने से पहले टायलेट जा रही थी । मैंने जस्सी को कमरे में टहलते हुये देखा । ऐसा लग रहा था । जैसे वह बहुत धीरे धीरे किसी से मोबायल फ़ोन पर बात कर रही हो । मैंने सोचा । लङकी जवान हो चुकी है । शायद किसी ब्वाय फ़्रेंड से चुपके से बात कर रही हो । उस वक्त उसके कमरे की लाइट बन्द थी । और बाहर का बहुत ही मामूली प्रकाश कमरे में जा रहा था । फ़िर उसे गौर से देखते हुये मुझे इसे बात का ताज्जुब हुआ कि उसके हाथ में कोई मोबायल था ही नहीं । और करमा तू यकीन कर । वह उसके गोल स्तन पर एक दृष्टि डालकर बोली - वह निश्चय ही किसी से बात कर रही थी । और ये मेरा भृम नहीं था । और ये एकाध मिनट की भी बात नहीं थी । मैं उसको लगभग बीस मिनट से देख रही थी । और सुन भी रही थी । पर उसकी बातचीत में मुझे बहुत ही हल्का हल्का हाँ । हूँ । ठीक है । ओ माय डार्लिंग .. जैसे शब्द ही मुश्किल से सुनाई दे रहे थे ।
करम कौर के चेहरे पर गहन आश्चर्य के भाव आये । उसकी आँखे गोल गोल हो गयीं । तभी राजवीर का नौकर सतीश वहाँ आया । उसने एक चोर निगाह करम कौर के खुले स्तन पर डाली । और राजवीर से बोला - मैं बाजार जा रहा हूँ । कुछ आना तो नहीं है ?
राजवीर ने ना ना में सिर हिलाया ।
सतीश यूपी का रहने वाला पढा लिखा नौजवान था । और एक प्रायवेट नौकरी के चक्कर में पंजाब आया था । बाद में न सिर्फ़ वह पंजाब में ही रम गया । बल्कि अपनी कंपनी टायप नौकरी छोङकर वह बराङ साहब के घर नौकर के रूप में काम करने लगा । ये नौकरी न सिर्फ़ उसके लिये आरामदायक सावित हुयी थी । बल्कि कई तरह से उसके लिये पाँचों उँगलियाँ घी में कहावत को भी पूरा कर रही थी ।
वास्तव में U.P वाला भईया के नाम से मशहूर सतीश करम कौर गरेवाल का बेहद आशिक था । और चोरी चोरी उसको देखता हुआ नयन सुख लेता था ।
सतीश ने करम कौर के लङके गुरु निहाल से नकली दोस्ती की हुई थी । और उसे बातों ही बातों में फ़ुसलाकर वह उससे उसकी मम्मी की दिन भर की गतिविधियाँ पूछता रहता था । उसकी नीयत से अनजान गुरु निहाल उसे

सब कुछ बताता रहता था । उसकी माँ रोज कितने बजे उठती है । कितने बजे नहाती है । कैसा खाना खाती है । क्या पीती है । किस समय अपने दूसरी शादी के बच्चे को स्तनपान कराती है । ये सब बातें पूछकर सतीश एकान्त में सोने से पहले करम कौर के साथ मानसिक संभोग की कल्पना करता हुआ हस्तमैथुन करता था । और वास्तविक रूप में उसको पाने का बेहद इच्छुक था । करम कौर भी इस बात को खूब समझती थी । और मौके बे मौके शायद वो कभी काम आये । इस हेतु अपने स्तनों की भरपूर झलक दिखाने से नहीं चूकती थी । उसको मरदों को ऐसे तङपाने में भी खास सुख मिलता था । दूसरे एक हिन्दू युवा पठ्ठा और और डिफ़रेंट टेस्ट की छुपी चाहत भी उसको सतीश के प्रति आकर्षित करती थी । और वह भी उसके साथ हमबिस्तर पर होने की अभिसारी कल्पना करती थी । पर अभी दोनों में से किसी की तरफ़ से कोई पहल नहीं हुयी थी ।
- अब करमा ! मुझे और भी । सतीश के जाने के बाद राजवीर फ़िर से बोली - और भी ताज्जुब इस बात का हुआ कि बात करते करते अचानक वह मेरी तरफ़ घूम गयी । हम दोनों की निगाहें मिली । मैं चौंक गयी । पर उसने मानों मुझे देखा ही नहीं । मुझसे कुछ बोली भी नहीं । और उसी तरह बात करती रही । तब मैं उसको टोकना चाहती थी । उससे कुछ पूछना चाहती थी । पर न जाने क्यों मेरी हिम्मत नहीं पङी । फ़िर चलते चलते वह अचानक वापिस बेड पर बैठ गयी । और अचानक इस तरह लुङकी । मानों नशे में गिरी हो । या नींद में लुङक गयी हो । ये पहले दिन की बात थी ।
करम कौर के चेहरे पर घबराहट के भाव फ़ैले हुये थे । वह हैरत से राजवीर को देखने लगी ।
- अब तू समझ सकती है । राजवीर फ़िर से बोली - ये देखने के बाद मेरे दिल का चैन और रातों की नींद उङ गयी । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । जस्सी को अचानक क्या हुआ था ? मेरी फ़ूल सी बच्ची किस तिलिस्मी चंगुल में थी ?
- वन मिनिट । करम कौर ने टोका - तिलिस्मी चंगुल । तिलिस्मी चंगुल से क्या मतलब है तेरा । तू ये कैसे कह सकती है । जसमीत किसी तिलिस्मी चंगुल में थी ?
- थी के बजाय है कहा जाये । राजवीर बजते हुये मोबायल के नम्बर पर निगाह डालते हुये उसे साइलेंट करती हुयी बोली - है कहा जाये । तो ज्यादा उचित होगा । मैंने बोला ना । ये बीस दिन पहले की बात है । पहले मैंने यही सोचा था कि उससे सुबह नार्मली प्यार से सब पूछूँगी । ये सब क्या है ? वो लङका कौन है ? पर फ़िर मुझे ख्याल आया कि मैं उससे क्या पूछूँगी ? उसके पास मोबायल तो था ही नहीं । और जब मोबायल नहीं था । तब कैसे कहा जाये । वो किसी ब्वाय फ़्रेंड से बात कर रही थी । और ब्वाय फ़्रेंड से बात भी कर रही थी । तो ये कोई पूछने वाली बात ही नहीं थी । ऐसी ही तमाम बातें सोचते हुये मैंने कुछ दिन और इस रहस्य का पता लगाने की कोशिश की । और इसीलिये मैंने बराङ साहब को भी कुछ नहीं बोला ।
और लगातार बीच बीच में जागकर उसकी छुपी निगरानी की । तब कुछ और उसका रहस्यमय व्यवहार देखा । फ़िर मेरे को एक आयडिया आया । यदि मैं बहाने से उसके पास सोने लगूँ । तब शायद वह कुछ विरोध करे । पर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया । एक बार भी नहीं किया । बल्कि उसके व्यवहार से ऐसा कभी लगता ही नहीं था कि वह मेरे लेटने के प्रति कोई नोटिस भी लेती है । वह पहले जैसी ही रही ।
- राजवीर ! अचानक करम कौर ने फ़िर से टोका - अभी अभी तूने कहा कि तूने और भी उसका रहस्यमय व्यवहार नोट किया । वो क्या था ?
- हाँ ! वो ये कि वो अक्सर रात को कभी कभी उठ जाती थी । और कभी भी उठ जाती थी । फ़िर खिङकी के पास खङे होकर उसके पार ऐसे देखती थी । मानों किसी दूसरी दुनियाँ को देख रही हो । खिङकी के एकदम पार कोई दूसरा लोक कोई दूसरी धरती उसे नजर आ रही हो । उसके चेहरे के भाव भी ऐसे बदलते थे । जैसे लगातार कुछ दिलचस्प सा देख रही हो । इसके भी अलावा मैंने उसे खङे खङे दीवाल पर या यूँ ही खाली जगह में किसी काल्पनिक बेस पर कुछ लिखते सा भी देखा । अब इससे भी ज्यादा चौंकने वाली बात तुझे बताती हूँ । एक दिन जब ये सब देखना मेरी बरदाश्त के बाहर हो गया । तो मैंने अपना जागना शो करते हुये आहट की । पर उस पर कोई असर नहीं हुआ । मैं भौंचक्का रह गयी । तब डायरेक्ट मैंने उसको आवाज ही दी । करमा ताज्जुब उस पर फ़िर भी कोई असर नहीं हुआ । अब तो मैं चीख पङना चाहती थी । पर फ़िर भी मैंने खुद को कंट्रोल करते हुये उसे जस्सी जस्सी मेरी बेटी कहते हुये झंझोङ ही दिया ।
और करम । उस पर फ़िर भी कोई असर नहीं हुआ । बल्कि उसका रियेक्शन ऐसा था । जैसे किसी पुतले को हिलाया गया हो । और तब मेरे छक्के ही छूट गये । फ़िर करमा जैसे ही मैंने उसे छोङा । वह फ़िर से लुङक गयी ।
- ओ माय गाड ! करम कौर के माथे पर पसीना छलछला आया - ओ माय गाड ।  यकीन नहीं होता । लगता नहीं । ये सच है । तूने बराङ साहब को नहीं बोला । ये सब ।
राजवीर के चेहरे पर वितृष्णा के भाव आये । उसने सूखी भावहीन आँखों से करम कौर को देखा । तब वह जैसे सब कुछ समझ गयी के अंदाज में सिर हिलाने लगी ।
खैर ! राजवीर आगे बोली - रहस्य अभी भी खत्म नहीं हुआ । अब मुझे और भी अजीव सा इसलिये लग रहा था । क्योंकि दिन में उसका व्यवहार एकदम नार्मल था । लगता था । जैसे कोई बात ही न हो । वह चंचल तितली की तरह इधर उधर उङती रहती थी । अपनी पढाई वगैरह कायदे से करती थी । ये मेरे लिये और भी रहस्य था । क्योंकि उसके रात के व्यवहार का दिन पर कोई असर नजर नहीं आता था ।
देख करमा ! वह भावुक स्वर में बोली - तू मेरी सबसे खास सहेली है । तुझसे मेरी कोई बात छिपी नहीं । इतना क्लियरली ये सब मैंने सबसे पहले तुझे और अभी अभी ही बताया है । ये जवान लङकी का मामला है । बराङ साहब को मैं इस मामले में बेबकूफ़ ही समझती हूँ । एक तो वह नास्तिक है । ऐसी बातों का बिना सोचे समझे मजाक उङाता है । पहले बोल देता है । बाद में सोचता है । अरे ये उसने क्या बोल दिया । दूसरे वह दारू के नशे में किसी को क्या बोल दे । इसलिये मैं पहले सभी बात पर खुद विचार करना चाहती थी । फ़िर जब मुझे लगा कि ये मामला सोचना समझना मेरी समझ से बाहर है । तब मैंने तुझे बुलाया । बोल बहन । मैंने कुछ गलत किया क्या ?
करम कौर ने भारी सहानुभूति के साथ पूर्ण हमदर्दी से उसके समर्थन में सिर हिलाया । राजवीर आशा भरी नजरों से उसे देखने लगी । शायद वह रास्ता दिखाने वाली कोई बात बोले । पर उल्टे वह भी गहरे सोच में डूब गयी लगती थी । मानों उसकी समझ में ये चक्कर घनचक्कर क्या है । कुछ भी न आ रहा हो । यहाँ तक कि उसका बच्चा दूध पीते पीते कब का सो गया था । उसका स्तन ज्यों का त्यों खुला था । और राजवीर की बात सुनते सुनते वह किसी अदृश्य लोक में जा पहुँची हो ।
तभी किसी के आने की आहट हुयी । जस्सी कालेज से लौटी थी । जिस समय करम कौर अपना स्तन अन्दर कर रही थी । जस्सी वहाँ आयी । उसने मुस्कराकर करम कौर को देखा । और अपने कमरे में चली गयी ।

अंधेरा 4

सम्पूर्ण सृष्टि का आधार ही है काम वासना । अगर ये काम वासना न होती । स्त्री पुरुष के दैहिक आकर्षण और लैंगिक मिलन की एक अजीव सी और सदा अतृप्त रहने वाली प्यास सभी के अन्दर प्रबल न होती । तो कभी समाज का निर्माण संभव ही नही था । और वास्तव में आदि सृष्टि के समय जब ज्ञान और आत्मभाव की प्रबलता थी । उस समय की आत्मायें काम से बिलकुल मोहित नहीं थी । और हद के पार उदासीन थीं । देवी तुल्य नारियों से भी पुरुष कामभावना के धरातल पर कतई आकर्षित नहीं होते थे । उनके उन्नत गोल स्तन और  थिरकते नितम्बों की मादक लय पुरुषों में एक चिनगी पैदा नहीं कर पाती थी ।
जबकि नारी की बात कुछ अलग थी । उसका निर्माण ही प्रकृति रूपा हुआ था । वह पुरुष के अर्धांग से विचार रूप उत्पन्न हुयी थी । और बारबार उसको आत्मसात करती हुयी आलिंगित भाव से उसमें ही समाये रहना चाहती थी । बस उसकी सिर्फ़ यही मात्र एक ख्वाहिश थी । पर आदि संतति प्रबल थी । और इस प्रकृति भाव के अधीन नहीं थी । अतः वे तप को प्रमुखता देते थे । उस माहौल के प्रभाव से देवी नारी भी तब पुरुष के सामीप्य की एक अजीव सी चाहत लिये तप में ही तल्लीन हो जाती थी । पर इस तप का सर्वागीण उद्देश्य यही था । पूर्ण चेतन पुरुष को प्राप्त होना ।
कालपुरुष और दुर्लभ सौन्दर्यता की स्वामिनी अष्टांगी कन्या जीवों के इस काम विरोधी रवैये से बङे हैरान थे । सृष्टि का मूल काम उन्हें कतई आकर्षित नहीं कर रहा था । तब उन्होंने एक निर्णय लेते हुये विष के समान इस काम विषय वासना को अति आकर्षण की मीठी चाशनी में लपेट दिया । ये हथियार कारगर साबित हुआ । और जीव काम मोहित होने लगे । पुरुष को स्त्री हर रूप में आकर्षित करने लगी । उसके हर  अंग में एक प्रबल सम्मोहन और जादुई प्रभाव उत्पन्न हो गया । उसकी काली घटाओं सी लहराती जुल्फ़ें । गुलावी लालिमा से दमकते कोमल गाल । रस से भरे हुये अधर । और विभिन्न आकारों से सुशोभित गोल गोल दो स्तन मानों पुरुष के लिये खजाने से भरपूर कलश हो गये । उसकी हरे पेङ की डाली सी लचकती । किसी मदमस्त नागिन की तरह बलखाती कमर पुरुषों के दिल को हिलाने लगी । उसकी कटावदार नाभि में एक उन्मादी सौन्दर्य झलकने लगा । उसकी गोरी गोरी चिकनी जंघायें तपस्वियों के दिल में तूफ़ान उठाने लगी । उसके नितम्बों की चाल से संयमी पुरुषों के दिल भी बेकाबू होने लगे ।
महामाया ने बङा विचित्र खेल खेला । उसने नारी की वाणी में सुरीली कोयल की कूक सी पैदा कर दी । और उसकी वाणी तक में काम को लपेट दिया । उसकी हर क्रिया को उसने काम पूर्ण कर दिया । और इस तरह ये पुरुष जीव भाव में नारी के वशीभूत होता गया । और आज तक हो रहा है ।
और तब ये ठीक उल्टा हो गया । नारी जो वास्तव में पुरुष से उत्पन्न हुयी थी । पुरुष अपने को उसी नारी से उत्पन्न मानने लगा । और उसे ही प्रमुख आदि शक्ति मानता हुआ माया के पूर्ण अधीन हो गया ।  महामाया । अच्छे अच्छे देव पुरुषों । योग पुरुषों को अपने इशारों पर सदा नचाने वाली महामाया । तब करम कौर में भी उसका ही अंश था ।
रात के नौ बज चुके थे । करमकौर आज राजवीर के घर रुकी हुयी थी । मनदीप जस्सी और राजवीर किसी सिद्ध मठ पर जस्सी की कुशलता हेतु मन्नत माँगने बाहर गये हुये थे । राजवीर ने उन दोनों को स्पष्ट कुछ नहीं बताया था । बस इतना कहा कि बाबा के दरबार में जाने से ऐसी कोई अज्ञात बाधा कष्ट दूर हो जाता है । करमकौर भी ये उपाय ठीक ही लगा । तब मनदीप को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आयी । और वे तीनों करमकौर को अपने घर रोककर दर्शन हेतु चले गये थे ।
स्थिति कोई भी मानुष देही में कामकीङा सदा रेंगता ही रहता है । और अवसर मिलते ही इसके कीटाणु सक्रिय हो उठते हैं । करम कौर को भी आज ये कीङा बार बार काटता हुआ उसके अंगों में प्यास उत्पन्न कर रहा था । एक हिन्दू पुरुष की प्यास । जो सभी सरदार औरतों की विशेष चाहत थी । दिल का हमेशा का अरमान था । और वह पुरुष एक आसान विकल्प के रूप में उसके पास था । बेहद पास । वह अपने मामूली से प्रयास से इस रात को यादगार बना सकती थी । बनाना चाहती थी । और उसने हर हालत में बनाने की ठान ली थी ।
वह दोपहर ग्यारह बजे ही राजवीर के घर आ गयी थी । और उसी समय वे लोग गाङी से निकल गये थे । बस तभी से उसके अंगों में बैचेनी सी समायी हुयी थी । जवानी के पहाङ की तरह खङा सतीश उसे भावना मात्र से दृवित कर रहा था । पर पराये शहर और परायी जाति का बोध उस पर हावी था । नौकर होने की हीन भावना भी उसे मर्यादा में रहने को विवश कर रही थी । और इस तरह करम कौर का बेशकीमती वक्त फ़िजूल जा सकता था । जा रहा था । इसलिये उसने बखूबी समझ लिया था कि पहल उसे ही अपनी तरफ़ से करनी होगी ।
इसलिये उसने किसी न किसी बहाने से सतीश को अपने पास ही रखा । और किसी अभिसार इच्छुक प्रेमिका की भांति उसे अपने स्तनों की बार बार झलक दिखाते हुये अपने कटाक्षों और वाणी से भरपूर उत्तेजित करती रही । और यही सोचती रही कि अब वह उसे बाहों में भरने ही वाला है । पर सतीश जैसे किसी सीमा रेखा में कैद था । और उसे ललचायी नजरों से देखने के बाद भी कुछ कर नहीं पा रहा था ।
सुबह राजवीर का फ़ोन जाते ही उसने यह सब हसरत पूरी करने को तय कर लिया था । और इसीलिये वह अपने घर से बिना वाथ के ही चली आयी थी । बारह बजे वह बाथरूम में थी । और सभी कपङे उतार चुकी थी । उसने अभी वाथ लेना शुरू भी नहीं किया था कि तभी उसका बच्चा अचानक रोने लगा । जिसे संभालने ले लिये तुरन्त सतीश आ गया । पर वह चुप नहीं हो रहा था ।
करमकौर ने तुरन्त एक बङा टावल लपेटा । और बाहर आ गयी । सतीश उसको देखकर हैरान ही रह गया । सिर्फ़ एक टावल में भरपूर जवानी ।  वह तेजी से पलटकर बाहर जाने को हुआ । पर करमकौर ने उसे अभी रुक कहते हुये रोक दिया । वह चोर निगाहों से उसे देखने लगा । उसकी मोटी मोटी चिकनी जाँघे आधे से अधिक खुल रही थी


।  उसने टावल को ही उठाकर अपना गोल स्तन बाहर निकाल लिया था । और बच्चे को दूध पिला रही थी ।
- बेबी भूखा था । वह उसे देखती हुयी बोली - दूध पी लेगा । फ़िर तंग नहीं करेगा । और सुन । तेरी मालकिन राजवीर है । मैं करम कौर नहीं । तू मुझे भाभी बोल सकता है । आखिर परदेस में तुझे भी कोई अपना लगने वाला होना चाहिये ना । वैसे तेरी शादी हुयी या नहीं ।
सतीश ने झेंपते हुये ना में सिर हिलाया । कितनी अजीब बात थी । अपने एकान्त क्षणों में वह हमेशा जिस औरत के निर्वस्त्र बदन की कल्पना करता था । वह साक्षात ही लगभग निर्वस्त्र बैठी थी । पर वह एकदम नर्वस हो रहा था ।
- फ़िर तू किसकी लेता है । वह शरारात से बोली - पप्पी झप्पी । कोई कुङी फ़िट की हुयी है । कोई प्रेमिका । कोई मेरे जैसी भाभी भाभी वगैरह ।
उसने फ़िर से इंकार में सिर हिलाया । करम कौर उत्तेजित हो रही थी । उसने बच्चे को दूसरे स्तन से लगाने के बहाने से टावल को खुल जाने दिया । सतीश का दिल तेजी से धक धक करने लगा । एक लगभग आवरण रहित सम्पूर्ण नायिका उसके सामने थी ।
करमकौर छुपी निगाह से उसके बैचेन उठान को महसूस कर रही थी । उसने बच्चे को दूध पिला दिया था । फ़िर उसने टावल को ठीक कर लिया ।
- अरे लल्लू ! वह प्यार से उसका हाथ पकङकर बोली - अब मैं तेरी भाभी हुयी । फ़िर मुझसे क्या शर्म करता है । चल कोई बात नहीं । पर तूने सच बताना । कभी अपनी किसी भाभी को नहाते हुये चुपचाप देखा है । कोई तांक झांक टायप । कभी कुछ ।
सतीश कुछ बोल न सका । बस हल्के से मुस्कराकर रह गया । करम कौर को अजीव सी झुँझलाहट हुयी । पर आज मानों उसने भी सभी दीवार गिरा देने की ही ठान ली थी । उसने उसके पास जाकर उसके गाल पर एक पप्पी ली ।
और बहाने से उसके पेन्ट से हाथ फ़िराते हुये बोली - यकीन कर मैं तेरी भाभी हूँ । गाड प्रामिस । किसी को कुछ नहीं बोलूँगी । अब बता । तू मेरी एक इच्छा पूरी कर देगा । सिर्फ़ एक । देख ना नहीं करना । वरना इस करमा का दिल ही तोङ दे ।
अब सतीश में हिम्मत जागृत हुयी । उसके होठ सूखने से लगे । फ़िर वह बोला - हाँ । बोलो । आप बोलो ।
करम कौर ने उसे मसाज आयल की बाटल थमा दी । और दीवान पर पेट के बल लेटती हुयी बोली - मैंने आज तक सिर्फ़ पुरुष मसाज के बारे में सुना भर है । कभी कराने का चांस नहीं बना । इसलिये उसकी फ़ीलिंग नहीं जानती । तू मुझे वो मसाज एक्स्पीरियेंस करा । और तुझे फ़ुल्ली छूट है । चाहे मुझे भाभी समझ । वाइफ़ समझ । लवर समझ । या सिर्फ़ औरत समझ । सिर्फ़ औरत । कुछ भी क्यों न समझ । लेकिन बस ये मसाज फ़ीलिंग । आनन्दयुक्त और यादगार हो । तू यहाँ से चला भी जाय । तो मुझे तेरी बारबार याद आये ।
सतीश के बदन में गरमाहट की तरंगे सी फ़ैलने लगी । करम कौर दीवान पर लेटी थी । उसने नाम मात्र को तौलिया पीठ पर डाला हुआ था । वह बस एक पल झिझका । आज उसकी सबसे बङी चाहत पूरी होने वाली थी । उसकी हथेलियाँ तेल से भीग चुकी थी । फ़िर वह दीवान पर बैठ गया । और टावल सरका दिया । करम कौर के विशाल दूधिया नितम्ब उसके सामने थे । उसकी वलयाकार पीठ उसके सामने थी ।
- यादगार मसाज । वह आह सी भरती हुयी बोली - और इसके लिये तू ये शर्ट वगैरह उतार दे । जो कि आराम से हाथ पैर चला सके । आराम से । धीरे धीरे । संगीतमय । कोई जल्दी नहीं । बङे हौले हौले करना ।
सतीश ने वैसा ही किया । फ़िर उसके कठोर हाथों का स्पर्श करम कौर को अपने कन्धों से कमर तक होने लगा । तब उसने और आगे हाथ ले जाने का आदेश दिया । सतीश के हाथ उसके चिकने नितम्बों पर घूमते हुये फ़िसलने लगे । फ़िर वह आनन्द से कराहने लगी । अब वह अगले क्षणों की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी । और तब उसे अपने बदन में किसी उँगली समान प्रवेश की अनुभूति हुयी । लोहा गर्म हो चुका था । वह तुरन्त उठकर बैठ गयी । और सीधा उसके अंग को सहलाने लगी ।
सतीश ने उसके स्तनों को सहलाया । वह उसका अनाङीपना समझ गयी थी । उसने उसे दीवान पर गिरा दिया । और अपनी कलायें दिखाने लगी । तब उसके अन्दर का पुरुष जागा ।
उसने करमकौर को झुका लिया । और उससे सट गया । वाकई वह मर्द था । अनाङी था । हिन्दू था । और करमकौर का इच्छित अलग टेस्ट था । इधर वह भरपूर पंजाबन औरत थी । वह आनन्द के अतिरेक में कराहती हुयी नितम्ब उछालने लगी । और  ढेर होती चली गयी । एक बलिष्ठ पुरुष के समक्ष । एक समर्पित नायिका की भांति । जो उसके अब तक अनुभव से एकदम अलग ही साबित हुआ था । इसलिये यह वाकई एक यादगार अनुभव था । पर अभी तो बहुत समय बाकी थी । बहुत समय । समय ही समय ।

अंधेरा 5

समय । समय की इस किताब में सदियों से जाने क्या क्या लिखा जाता रहा है । क्या लिखने वाला है । और आगे क्या लिखा जायेगा । ये शायद कोई नहीं जानता है । करमकौर को ही सुबह तक ये नहीं मालूम था । आज उसकी जिन्दगी में एक यादगार पुरुष आने वाला है । न सिर्फ़ यादगार पुरुष । बल्कि यादगार एक एक लम्हा भी । जिसको बारबार संजोने का दिल करे ।
क्या अजीव बात थी । उसे घर की देखभाल के लिये छोङ गयी राजवीर के बारे में सोचना चाहिये था । उसकी बेटी जस्सी के बारे में सोचना चाहिये था । उसे एक पराये पुरुष से अनैतिक पाप संबन्ध के पाप के बारे में सोचना चाहिये था । पर ये सभी सोच गायब हो चुकी थी । उसके अन्दर की करम कौर मर चुकी थी । और मुक्त भोग की अभिलाषी स्त्री जाग उठी थी । वासना से भरी हुयी स्त्री । जिसे सम्बन्ध नहीं । पुरुष नजर आता है । और ये पुरुष आज किस्मत की देवी ने मेहरबान होकर उसे उपलब्ध कराया था । अगर ये बेशकीमती पल वह पाप पुण्य को सोचने में गुजार देती । तो ना जाने ये पल फ़िर कब उसकी जिन्दगी में आते । आते भी या ना आते । इसलिये वह किसी भी हालत में इसको गंवाना नहीं चाहती थी ।
सतीश अनाङी था । औरत से उसका पहले वास्ता नहीं था । पर वह हेविच्युल थी । मेच्योर्ड थी । एक अनाङी था । एक खिलाङिन थी । और ये संयोग बङा अनोखा और दिलचस्प अनुभव वाला था । अभी अभी बीते क्षणों को सोचकर ही उसका बदन रोमांचित होता था । अब उसे कुछ लज्जा सी आ रही थी । और कुछ वह त्रिया चरित्र करना चाहती थी । इस तन्हाई के एक एक पल को सजाने के लिये ।
वह कपङे पहनने लगी । तब सतीश चौंककर बोला - नहाओगी नहीं..भ भाभी ?
- यू नाटी.. ब्वाय ! वह उसका कान पकङकर बोली - दर्द बेदर्द हो रही हूँ मैं । हिम्मत नहीं हो रही । पर नहाना भी चाहती हूँ ।
सतीश के मुँह से चाहत के आवेग में भरी भावना निकल गयी । मैं नहला देता हूँ । वह मसाज से ज्यादा आसान है । वह भौंचक्का रह गयी । स्त्री पुरुष का सामीप्य अनोखी स्थितियों को जन्म देता है । किसी खिलती कली के समान तमाम अनजान कलायें पंखुरियों के समान खुलने लगती है । उसने कोई ना नुकुर नहीं की । वे दोनों बाथरूम में आ गये । सतीश की उत्तेजना वह जान रही थी । ये कभी न समाप्त होने वाली भूख थी । अगले ही क्षणों में फ़िर से बह आनन्दित होकर सिसकियाँ भर रही थी ।
और अब रात के नौ बज चुके थे । वह टीवी के सामने बैठी हुयी फ़िल्मी सांग देख रही थी । कितनी अदभुत बात थी । पर्दे पर रोमांटिक भंगिमायें करते हर नायक नायिका में उसे अपनी और सतीश की ही छवि नजर आ रही थी । आज रात को भी वह भरपूर जीना चाहती थी । शायद ऐसी गोल्डन नाइट जिन्दगी में फ़िर से नसीब न हो । अतः उसने अपने पुष्ट बदन पर सिर्फ़ एक गाउन पहना हुआ था । और उसका भी एक बन्द ही लगाया हुआ था । एक बन्द ।
- ये स्त्री भी अजीब पागल ही होती है । उसने सोचा - सदियों से इसने व्यर्थ ही खुद को अनेक बन्दिशों की बन्द में कैद किया हुआ है ।  ये एक बन्द काफ़ी है । जब दिल अन्दर । जब दिल बाहर ।
सतीश अभी काम में लगा हुआ था । तब उसे एक कल्पना हुयी । काश वह राजवीर की जगह होती । और सतीश

उसका सर्वेंट होता । तो वह उसका भरपूर यूज करती । जवानी का एक एक क्षण । एक एक एनर्जी बिट । वह स्त्री पुरुष के अभिसारी रंग से रंग देती । शायद आगे भी ऐसा मौका मिले । पर आगे की बात आगे थी । आज की रात तो निश्चय उसके हाथ में थी । और यकीनन गोल्डन थी ।
अभिसार युक्त स्नान के बाद दोनों ने लंच किया था । और फ़िर दोपहर तीन बजे थककर चूर होकर सो गये थे । करमकौर रात में भी जागने और जगाने की ख्वाहिशमन्द थी । अतः उसने भरपूर नींद ली थी । और शाम छह बजे उठी थी । वैसे भी मुक्त और सन्तुष्टिदायक यौनाचार के बाद तृप्ति की नींद आना स्वाभाविक ही थी ।
सो जागने के बाद वह खुद को एकदम तरोताजा महसूस कर रही थी । महज तीन घण्टे पूर्व के वासनात्मक क्षण उसे गुजरे जमाने के पल लगने लगे थे । और वह फ़िर से अभिसार के लिये मानसिक रूप से तैयार थी ।
- कमाल की होती है । औरत के अन्दर छिपी औरत । उसने सोचा - वाकई यह अलग होती है । बाहर की औरत नकली और दिखाबटी होती है । सामाजिक रूढियों परम्पराओं के झूठे आभूषणों से लदी हुयी । बोगस दायरों में कैद । बेबसी की सिसकियाँ लेती हुयी । मुक्ति और मुक्त औरत के अहसास ही जुदा होते हैं । और वे अहसास फ़िर से जागने लगे थे ।
यही सब सोचते सोचते उसे दस बज गये । सतीश फ़ारिग होकर उसी कमरे में आ गया । पर वह उससे अपरिचित सी टीवी ही देखती रही । उसका बच्चा सो चुका था । सतीश सोफ़े पर बैठा हुआ था । वह उसकी तरफ़ से किसी पहल का इन्तजार कर रही थी । पर उसे उदासीन समझकर जब वह भी टीवी देखने में मशगूल हो गया । तब वह खुद ही उसके पास जाकर गाउन समेटकर उसकी गोद में बैठ गयी । ऐसी ही किसी पूर्व कल्पना से आभासी सतीश सिर्फ़ लुंगी में था ।
सो उसका कठोर स्पर्श महसूस करती हुयी वह आनन्द के झूले में झूलने लगी । एक कसमसाहट के बीच दोनों ने खुद को एडजस्ट किया । और फ़िर वे आन्तरिक रूप से बेपर्दा अंगो के स्पर्श को महसूस करने लगे । सतीश ने उसके गाउन में हाथ डाल दिया । और गोलाईयों को सहलाने लगा ।
पर अब उसकी इच्छा प्राकृतिकता से विपरीत अप्राकृतिक हो चली थी । जो पंजाबी पुरुषों का खास शौक था । और पंजाबन औरतों की एक अजीव लत । जिसकी वे पागल हद तक दीवानी थी । अतः इस खेल के अनाङी सतीश को वह भटकाती हुयी वासना की भूलभुलैया युक्त अंधेरी सुरंगों में ले गयी ।
और तब रात के बारह बज चुके थे । अभी अभी सोई करम कौर की अचानक किसी वजह से नींद खुल गयी थी । उसे टायलेट जाने की आवश्यकता महसूस हो रही थी । सतीश अपने कमरे में जा चुका था । उसने एक नजर अपने बच्चे पर डाली । और बाहर निकल गयी । सब कुछ सामान्य था । रात भरपूर जवान नायिका की भांति अंगङाईयाँ लेती हुयी मुक्त भाव से विचर रही थी । और खुद अनावृत सी होकर उसने अपना आवरण  चारों और फ़ैला दिया था । एक जादू से सब सम्मोहित हुये से नींद के आगोश में थे । और निशा अंधेरे से आलिंगन सुख प्राप्त कर रही थी ।
अंधेरा । राजवीर के घर में भी अंधेरा फ़ैला हुआ था । वह टायलेट से फ़ारिग हो चुकी थी । और अचानक ही बिना किसी भावना के खिङकी के पास आकर खङी हो गयी ।  तब अक्समात ही उसे हल्का हल्का सा चक्कर आने लगा । पूरा घर उसे गोल गोल सा घूमता हुआ प्रतीत हुआ । कमरा । बेड । टीवी । सोफ़ा । उसका बच्चा । स्वयँ वह सभी कुछ उसे घूमता हुआ सा नजर आने लगा । सव कुछ मानों एक तूफ़ानी चक्रवात में घिर चुका हो । और अपने ही दायरे में गोल गोल घूम रहा हो । फ़िर उसे लगा । एक तेज तूफ़ान भांय भांय सांय सांय करता हुआ आ रहा है । और फ़िर सब कुछ उङने लगा । घर । मकान । दुकान । शहर । धरती । आसमान । लोग । वह । राजवीर । सभी तेजी से उङ रहे हैं । और बस उङते ही चले जा रहे हैं ।
और फ़िर यकायक उसकी आँखों के सामने दृश्य बदल गया । वह भयंकर तेज तूफ़ान उसे उङाता हुआ एक भयानक जंगल में छोङ गया । फ़िर एक गगनभेदी धमाका हुआ । और आसमान में जोरों से बिजली कङकी । इसके बाद तेज मूसलाधार बारिश होने लगी । घबराकर वह जंगल में भागने लगी । पर क्यों और कहाँ भाग रही हैं । ये उसको मालूम न था । बिजली बारबार जोरों से कङकती थी । और आसमान में गोले से दागती थी । हर बार पानी दुगना तेज हो जाता था । भयानक मूसलाधार बारिश हो रही थी ।
और फ़िर वह एक दरिया में फ़ँसकर उतराती हुयी बहने लगी । तभी उसे उस भयंकर तूफ़ान में बहुत दूर एक साहसी नाविक मछुआरा दिखायी दिया । वह उसकी ओर जोर जोर से बचाओ कहती हुयी चिल्लाई । और फ़िर  गहरे पानी में डूबने लगी । फ़िर उसका सिर बहुत जोर से चकराया । और वह बचाओ बचाओ चीखती हुयी लहराकर गिर गयी ।

अंधेरा 6

- क्या ! राजवीर उछलकर बोली - क्या कह रही है तू ? क्या सच में ऐसा हुआ था ?
- मेरा यकीन कर । राजवीर तू मेरा यकीन कर । करमकौर घबराई हुयी सी बोली - मुझे तो तेरे इसी घर में कोई भूत प्रेत का चक्कर मालूम होता है । समझ ले । मरते मरते बची हूँ मैं । तेरे जाने के बाद सारा दिन मैं तेरे लिये दुआयें ही करती रही । पूजा पाठ के अलावा किसी बात में मन ही नहीं लगा । रात बारह बजे तक मुझे चैन नसीब नहीं हुआ । जिन्दगी में इतना दर्द एक साथ मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया । पर नींद ऐसी होती है । सूली पर लटके इंसान को भी आ ही जाती है । सो दिन भर की सूली चढी हुयी मैं बेचारी करमकौर अभी ठीक से नींद की झप्पी ले भी नहीं पायी थी कि अचानक मेरी आँख खुल गयी । और मुझे टायलेट जाना हुआ । बस उसके बाद मैं यहाँ खिङकी से आयी ..तू यकीन कर राजवीर । तब यहाँ खिङकी के बाहर तेरा । उसने उँगली दिखाई - ये घर नहीं था । कोई दूसरी ही दुनियाँ थी । भयानक जंगल था । एक ऐसा जादुई जंगल । जिसमें जाते ही मैं नंगी हो गयी । और किसी अज्ञात भय से भाग रही थी ।
पर राजवीर को अब उसकी बात सुनाई नहीं दे रही थी । वह उठकर खिङकी के पास पहुँची । और बाहर देखने लगी । जहाँ लान में लगे पेङ पौधे नजर आ रहे थे । वहाँ कुछ भी असामान्य नहीं था ।
राजवीर जैसे ही वापिस लौटी । उस समय तो वह घर चली गयी थी । फ़िर उसने पहली फ़ुरसत में ही दोपहर को आकर उसे सव बात बताई । जस्सी अभी घर नहीं थी ।
- सच्ची ! मैं एकदम सच बोल रही हूँ । वह फ़िर  से बोली - मुझे एकदम ठीक ठीक याद है । टायलेट जाते समय मैंने घङी देखी थी । उस समय बारह बजे थे । फ़िर मैं चकराकर यहाँ । उसने जमीन की तरफ़ उँगली से इशारा किया - यहाँ गिर पङी थी । और जब मुझे होश आया । मैं संभली । मैंने फ़िर घङी देखी थी । तब तीन बज चुके थे । पूरे तीन घण्टा मैं बेहोश सी पङी रही ।
- ठहर । ठहर । राजवीर ने उसे टोका - जब तू बेहोश सी हो गयी । उस टाइम क्या हुआ ?
- अरी पागल है क्या । करम कौर झुँझलाकर बोली - बेहोश मतलब बेहोश । उस टाइम का भी कुछ पता रहता है क्या ? क्या हुआ । क्या नहीं हुआ । वैसे हुआ हो । तो मुझे पता नहीं । मैं तो मानों आपरेशन से पहले वाले नींद के इंजेक्शन के समान नशे में थी । और पूरे तीन घण्टे रही ।
- नहीं नहीं ! राजवीर बोली - मेरा मतलब था । वो नाविक मछुआरा..कहीं उसने तेरी बेहोशी का..कोई फ़ायदा तो नहीं उठाया । ऐसा कुछ तुझे फ़ील हुआ हो । जैसे भूत बूत । वह भय से जस्सी की कल्पना करती हुयी बोली - अक्सर जवान औरत का फ़ायदा उठा लेते हैं । नहीं मैंने ऐसा पढा है । फ़िल्मों में भी देखा है ।
- अरे नहीं । वो सालिआ ऐसा कुछ करता । करमकौर अपने स्तन पर हाथ रखकर बोली - फ़िर मैं तीन घण्टे नहीं । तीन दिन बेहोश रहने वाली थी । एकदम टार्जन लुक ।..पर अपनी किस्मत में तो ये दाढी वाले सरदार ही लिखे हुये हैं । हिन्दू आदमी की बात ही अलग होती है ।
अजीव होती है  ये औरत भी । शायद इसको समझना बहुत मुश्किल ही है । वह भयभीत थी । आशंकित थी । पर रोमांचित थी । वह सब क्या था । जस्सी के साथ क्या हुआ था ? क्या वही टार्जन लुक नौजवान उसका प्रेमी था । बकौल राजवीर जिससे वह बात करती रहती थी । वह उस दृश्य में पहुँचकर नंगी कैसे हो गयी थी । तब जस्सी के साथ क्या होता था । क्या वह उसके साथ काम सुख प्राप्त कर चुकी थी । भय की इन परिस्थितियों में भी ये विचार एक साथ दोनों के दिमाग में आ रहे थे । और भारी हलचल मचाये हुये थे ।
दूसरे राजवीर इस मामले की खेली खायी औरत थी । उसे साफ़ साफ़ लग रहा था । आज करमकौर उससे कुछ छुपा रही है । उसके चेहरे पर भय के वे रंग ही नहीं थे । जो होने चाहिये थे । बस एक क्षण को जब वह रहस्यमय चक्रवात की बात करती थी । तब वाकई लगता था कि वह सच बोल रही है । बाकी और बात करते समय तो यही लगता था कि वह लण्डन की सैर करके आयी हो । भरपूर रंगरेलियाँ मनायी हों । पर बात इण्डियन कल्चर की कर रही हो । जाने क्यों राजवीर को दाल में कुछ काला सा नजर आया । बल्कि उसे पूरी दाल ही काली नजर आ रही थी । दाल दाल तो सिर्फ़ उतनी ही थी । जब वह खिङकी के पार टार्जन लुक मछुआरे की बात करती थी । दाता ! क्या माजरा था । क्या बलाय घुस गयी थी घर में । उसकी खासमखास भी झूठ बोल रही थी । उसके मन में ये भी आया । काश ! वह जस्सी या करम कौर की जगह होती । तो ये अनुभव उसके साथ भी होता । तब उसने मन ही मन तय किया । रात बारह बजे वह खुद भी खिङकी के पास आकर जादू देखेगी कि आखिर सच क्या है ?
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- ओये बेबे ! सच मैं साफ़ साफ़ देख रहा हूँ । गुरुदेव सिंह दोनों के स्तनों का दृष्टिक रसपान करता हुआ बोला - तेरे घर में बङी तगङी बलाय घुसी हुयी है । चार बङे बङे जिन्नात तो मेरे कू साफ़ साफ़ दिख रहे हैं । बस थामने की देर है । फ़िर देखना । इस बाबे दा हुनर ।
गुरुदेव सिंह चौहान एक हरामी बाबा था । साधुओं के नाम पर कलंक था । दाग था । और अपनी हरामगीरी के चलते ही साधु बना था । वास्तव में उसने बाबाओं की संगति में दो चार जन्तर मन्तर सीख लिये थे । जिन्हें पढकर वो किसी के लिये ताबीज बना देता था । किसी को गण्डा बँधवा देता था । साधुओं की संगति में ही वह

वास्तविकता रहित नकली पूजा पाठ करना सीख गया था । और तांत्रिक गद्दी लगाने के थोथे आडम्बर सीख गया था । जिनसे न किसी को फ़ायदा होना था । और न ही कोई नुकसान । यह कुछ कुछ मनोबैज्ञानिक रूप से उन भृमित लोगों के लिये डिस्टल वाटर के डाक्टरी इंजेक्शन जैसा था । जिसे डाक्टर कोई भी बीमारी न होने पर सिर्फ़ इसलिये लगाते हैं कि उस मरीज को सीरियसली लगता है कि वो बीमार है । और पानी के इसी रंगीन इंजेक्शन के वह खासे पैसे वसूल करता है । और मरीज मनोबैज्ञानिक प्रभाव से ठीक होने लगता है ।
यही हाल बाबा गुरुदेव सिंह का था । उसका सिर्फ़ दिखावे का भेस था । जो अक्सर ही ज्यादातर पंजाब के नकली बाबाओं की खासियत थी । वो कोई प्रेत बाधा ठीक करना नहीं जानता था । और न ही उसे इन बातों की कोई समझ थी । पर इस बाबागीरी में उसे हर तरफ़ मौज मलाई मिली थी । सो चैन की छानता हुआ वह इसी में रम गया था । कोई न कोई अक्ल का अंधा अंधी उससे टकरा ही जाता था । और फ़िर उसकी बल्ले बल्ले ही हो जाती थी ।
विधवा हो जाने के बाद कुछ दिनों तक इधर उधर टाइम पास करती करम कौर को किसी औरत के माध्यम से गुरुदेव सिंह का पता चला था । और तब वह उससे मिली थी । अपनी विधवा स्थितियों में वह मानसिक टेंशन में आ गयी थी । और शान्ति के लिये । अपने आगे के अच्छे दिनों की जानकारी के लिये वह बाबाओं के पास घूमती फ़िरी थी । तब से वह गुरुदेव सिंह से परिचित थी ।
गुरुदेव सिंह ने उसकी झाङ फ़ूँक शान्ति के नाम पर पूरा ऊपर से नीचे तक टटोल लिया था । यहाँ तक कि वह बहकने लगी थी । और खुद उसका दिल होने लगा कि बाबा को स्वयँ बोल दे । मन्तर बाद में चलाना । पहले उसकी बचैनी दूर कर दे । और अभी कल से सतीश से जिस्मानी परिचय होने के बाद उसकी भावनायें अलग ही हो गयी थीं । जिन्दगी का जितना मजा लूट सकते हो लूटो । कल का कोई भरोसा नहीं । और स्वर्ग नरक किसने देखा है ।
- क्या ? वे दोनों सचमुच उछलकर बोली - क्या बाबाजी । चार चार जिन्नात । हाय रब्ब । ये क्या मुसीबत है । बाबाजी आप कुछ करो ना । हमें इस मुसीबत से निकालने के लिये ।
गुरुदेव सिंह की बिल्लौरी आँखों में एक भूखी चमक उभरी । पर इस मामले में वह खासा समझदार था । उसने राजवीर को कमरे से बाहर जाने को कहा । और करम कौर को अन्दर ही रोक लिया । फ़िर उसने एक भभूति जैसी राख और कुछ मोरपंखी झाङन जैसा थैले से निकाला ।
कोई बीस मिनट बाद उसने राजवीर को अन्दर बुलाया । और करमकौर को बाहर जाने को कहा । अन्दर आते समय राजवीर ने देखा । करमकौर के चेहरे पर अजीव से रोमांच के भाव थे । क्या हुआ था । इसके साथ । उसने धङकते दिल से सोचा । और डरते डरते अन्दर आ गयी । गुरुदेव सिंह ने उसे दरबाजा बन्द करने का आदेश दिया ।
कमरे में अजीव सी कसैली और मिश्रित दारू की सी गन्ध आ रही थी । जब वह गुरुदेव सिंह के पास आयी । तो उसे वैसी ही गन्ध उसके मुँह से महसूस हुयी । कमरे में सिगरेट का धुँआ अलग से भरा हुआ था । उस पर कमरा बन्द और होने से दमघोंटू वातावरण था । यह फ़र्जी साधुओं का औरतों को चक्कर में डालकर घनचक्कर बनाने का पुराना साधुई नुस्खा था । जिसे वह बेचारी नहीं जानती थी ।
- देख बेबे ! वह चेतावनी सी देता हुआ कठोर स्वर में बोला - तूने इलाज कराना हो । तो वैसा सोचना । ये जिन्नात का मामला बहुत बुरा होता है । ये औरत को सिर्फ़ औरत के तौर पर देखते हैं । तू समझ गयी ना । अगर तेरी सेवा के बदले राजी होकर तेरी छोरी को छोङ दे । तो उसके देखे । ये ज्यादा बुरा नहीं है । इसलिये तू पहले सोच ले । फ़िर तू सोचे । इसमें मेरा कोई दोष है । मुझे तो दूसरे का दुख दूर करना ही ठीक लगता है । बाकी हम बाबाओं को दुनियाँदारी से क्या लेना ।
कुछ कुछ समझती हुयी । कुछ कुछ ना भी समझती हुयी राजवीर ने सहमकर उसके समर्थन में सिर हिलाया । जिन्नात का नाम सुनकर ही उसकी हवा खराब हो उठी थी । वो भी उसकी बेटी पर । वो भी उसके घर में । वह पूरा सहयोग करने को तैयार हो गयी ।
तब गुरुदेव सिंह ने उसे कमरे के बीचोबीच खङा कर दिया । और अगरबत्तियाँ सुलगा दी । फ़िर वह राजवीर के पास आया । और कोई तीखी गन्ध वाली जङी सी उसे सुंघाई । राजवीर हल्के हल्के नशे का सा अनुभव करने लगी । पर वह पूरे होश में थी ।
उसने सिन्दूर मिली भभूत उसके माथे पर लगा दी । फ़िर उसके ठीक पीछे आकर खङा हो गया । वह भभूत की बिन्दियाँ सी उसके गाल पर लगा रहा था । वह राजवीर से एकदम सटकर खङा था । और उसके विशाल नितम्बों से लगा हुआ था ।
उसकी तरफ़ से कोई विरोधी प्रतिक्रिया न पाकर गुरुदेव सिंह ने उसकी कुर्ती में हाथ डाल दिया । और भभूत उसके स्तनों पर मलने लगा । राजवीर उत्तेजित होने लगी । पर क्या हो सकता था । चुप रहना उसकी मजबूरी थी । बाबा उसके पूरे बदन पर हाथ फ़िरा रहा था । और फ़िर वह उसको बहकाता हुआ सा कमर के पास ले आया ।  पैरों के बीच उसका हाथ जाते ही राजवीर कसमसाने लगी । बाबा ने उसका बन्द खोल दिया ।
- चिन्ता न कर । वह फ़ुसफ़ुसाया - वह खुश हो जायेगा । फ़िर नुकसान नहीं करेगा । ठीक है ।
राजवीर ने समर्थन में सिर हिला दिया । बाबा ने उसको झुका दिया । और उसके नितम्बों के करीब हुआ । राजवीर ने भय से आँखे बन्द कर ली । फ़िर उसे अपने अन्दर कुछ सरकने का सा आभास हुआ । एक गरमाहट सी उसके अन्दर भरती जा रही थी । रोकते रोकते भी उसके मुँह से आह निकल गयी । फ़िर उसके विशाल अस्तित्व पर चोटों की बौछार सी होने लगी । और वह बेदम सी होती चली गयी ।
क्या अजीब बात थी । वह भूल गयी थी । किसलिये आयी है । क्या परेशानी है । और उस नयी स्थिति को अनुभव करती हुयी पूर्णतया आत्मसात करने लगी । एक ऊँची हाँफ़ती सी चढाई चढती हुयी । वह गहरी गहरी सांसे लेने लगी । तब बाबा उसके ऊपर ढेर हो गया । राजवीर के अन्दर गर्म लावा सा बहने लगा ।
खिङकी की झिरी से आँख लगाये खङी करम कौर अलग हट गयी । उसके चेहरे पर अजीव सी मुस्कराहट थी । राजवीर ने कोई विरोध नहीं किया । इस बात की उसे बङी हैरत हुयी । उसे लगने लगा । उसकी तरह शायद राजवीर भी बहुभोग की अभ्यस्त थी । या  फ़िर औरत होती ही ऐसी है कि जल्दी समर्पण कर देती है । कुछ भी हो । इस बात के लिये वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची ।

अंधेरा 7

आखिर इस जिन्दगी का ही क्या निष्कर्ष है ? शायद कोई नहीं जानता । एक विशाल तूफ़ानी सैलाव की तरह जिन्दगी सबको बहाये ले जा रही है । कल जो अच्छा बुरा हुआ था । उस पर हमारा कोई वश नहीं था । आगे भी जो होगा । उस पर भी कोई वश नहीं होगा । बच्चों की टाय ट्रेन की सीट पर बैठे किसी नादान बच्चे के समान ही इंसान जिन्दगी की इस रेल में गोल गोल घूम रहा है ।
रोज दिन होता है । रोज फ़िर वही रात होती है । रोज वही निश्चित दिनचर्या । कोई मरता है । कोई जीता है । कोई सुखी है । कोई दुखी है । कोई अरमानों की सेज पर मिलन के फ़ूल चुन रहा है । कोई विरहा के कांटों से घायल दिन गिन रहा है । पर जिन्दगी मौत को इस सबसे कोई मतलब नहीं । उसका काम निरन्तर जारी ही रहता है ।
जस्सी की समस्या का भी कोई हल अभी समझ में नहीं आया था । बल्कि अभी समस्या ही समझ में नहीं आयी थी । बल्कि कभी कभी ये भी लगता था कि उसे दरअसल कोई समस्या ही नहीं थी । उसकी सभी मेडिकल रिपोर्ट नार्मल आयी थी । उनमें वीकनेस जैसा कुछ शो करने वाला भी कोई प्वाइंट नहीं था । तब डाक्टरों ने वैसे ही उसे टानिक टायप सजेस्ट कर दिया था ।
और वह पहले की तरह आराम से कालेज जाती थी । हाँ बस इतना अवश्य हुआ था कि राजवीर ने अब मनदीप से छुपाना उचित नहीं समझा था । और उसे सब कुछ न सिर्फ़ बता दिया था । बल्कि मौके पर दिखा भी दिया था । तब बराङ पहली बार चिंतित सा नजर आया । और गम्भीरता से इस पर सोचने लगा । पर वह बेचारा क्या सोचता । ये तो उसके पल्ले से बाहर की बात थी । वह सिर्फ़ महंगे से महंगा इलाज करा सकता था । किसी की ठीकठाक राय पर अमल कर सकता था । या फ़िर शायद वह कुछ भी नहीं कर सकता था । और कुदरत का तमाशा देखने को विवश था । और तमाशा शुरू हो चुका था ।
सुबह के नौ बज चुके थे । जस्सी स्कूटर से कालेज जा रही थी । हमेशा की तरह उसके पीछे चिकन वाली उर्फ़ गगन कौर बैठी हुयी थी । और वह रह रहकर जस्सी के नितम्बों पर हाथ फ़िराती  थी ।
जस्सी को उसकी ऐसी हरकतों की आदत सी पङ चुकी थी । बल्कि अब ये सब उसे अच्छा भी लगता था । गगन इस मामले में बहुत बोल्ड थी । जब क्लासरूम में टीचर ब्लेक बोर्ड पर स्टूडेंट की तरफ़ पीठ किये कुछ समझा रहा होता था । वह जस्सी को शलवार के ऊपर से ही सहलाती रहती थी । और जब तब उसके स्तन को पकङ लेती थी । उत्तेजित होकर मसल देती थी ।
- जस्सी । ख्यालों में डूबी गगन बोली - काश यार क्लासरूम की सीट पर कोई ब्वाय हमारे बीच में बैठा होता । तो मैं उसका हैंडिल ही घुमाती रहती । और वह बेचारा चूँ भी नहीं कर पाता ।
- क्यों ! जस्सी मजा लेती हुयी बोली - वो क्यों चूँ नहीं कर पाता । क्या वो टीचर को नहीं बोल सकता । तू उसका पाइप उखाङने पर ही तुली हुयी है ।
- अरे नहीं यार । वह बुरा सा मुँह बनाकर बोली - ये लङके बङे शर्मीले होते हैं । वो बेचारा कैसे बोलता । मैं उसके साथ क्या कर रही हूँ । देख तू कल्पना कर । तू किसी भीङभाङ वाले शाप काउंटर पर झुकी हुयी खङी है । अबाउट 45 डिगरी । फ़िर पीछे से तुझे कोई फ़िंगर यूज करे । अपना हैंडिल टच करे । बोल तेरा क्या रियेक्ट होगा ।
- मैं चिल्लाऊँगी । शोर मचाऊँगी । उसको सैंडिल से मारूँगी ।
- ओह शिट यार । ये सब फ़ालतू के ख्यालात है । कोई भी ऐसा नहीं कर पाता । देख मैं बताती हूँ । क्या होगा । तू यकायक चौंकेगी । सोचेगी । ये क्या हुआ । और फ़िर तेरा माउथ आटोमैटिक लाक्ड हो जायेगा । तू सरप्राइज्ड फ़ील करेगी । एक्साइटिड फ़ील करेगी । अब 1% को मान ले । तू चिल्लायेगी । उसको सैंडिल से मारेगी । मगर जमा पब्लिक को क्या बोलेगी । उसने तुझे सेक्सुअली टच किया । कहाँ किया । कैसे किया । बता सकेगी । साली इण्डियन लेडी । भारतीय नारी । घटिया सोच ।
जस्सी भौंचक्का रह गयी । वह चिकन वाली को बे अक्ल समझती थी । पर वह तो गुरुओं की भी गुरु थी । पहुँची हुयी थी । नम्बर एक कमीनी थी । टाप की नालायक थी ।
- एम आई राइट ! गगन फ़िर से बोली - वो मुण्डा कुछ नहीं कह सकता । मानती हैं ना । और फ़िर वो सालिआ क्यों कहने लगा । स्टडी और रोमेंस एक साथ । एक टाइम । किसी नसीब वाले को ही नसीब हो सकते हैं ।
जस्सी को लगा । वह एकदम सही कह रही है । हकीकत और कल्पना में जमीन आसमान का अन्तर होता है । एक बार उसको भी एक आदमी ने उसके नितम्ब पर चुटकी काटी थी । पर तब वह सिटपिटा कर भागने के अलावा कुछ नहीं कर पायी थी ।
- जस्सी । गगन फ़िर बोली - तुझे मालूम है । मेरी वर्जिनिटी ब्रेक हो चुकी है । मैंने बहुत बार एंजाय किया है ।
जस्सी लगभग उछलते उछलते बची ।
- हाँ यार । वो साला मेरा एक ब्वाय फ़्रेंड था । मेरे पीछे ही पङ गया सालिआ । एक दिन वो मेरे को अपने दोस्त के खाली के मकान में ले गया । और मेरे लेप डाउन में अपना पेन ड्राइव इनसर्ट कर दिया । सालिआ अपना पूरा डाटा ही डाउनलोड करके उसने मुझे छोङा । अभी मोटी अक्ल की भैंस । ये मत बोलने लगना कि - ये लेप डाउन क्या

होता है ? लेप टाप साले गंवार बोलते हैं । अभी तू बोल । लेपी कम्प्यूटर गोद में नीचे रखते हैं । या ऊपर ? जब गोद ही नीची हुयी । तो लेपी टाप कैसे हुआ । तब डाउन ही बोलो ना उसको ।
जस्सी के मुँह से जोरदार ठहाका निकला । क्या फ़िलासफ़ी थी साली की । एकदम सेक्सी बिच । इसको हर जगह हर समय एक ही बात नजर आती थी । हर डण्डे में अपनी झण्डी फ़ँसाना । क्या कुङी थी ये चिकन वाली भी ।
उसका अच्छा खासा सुबह सुबह का पढाई का मूड कमोत्तेजना में परिवर्तित हो गया था । एक तो वैसे ही सुन्दर और सेक्सी लङकी हर विपरीत लिंगी नजर के बर्ताव से सेक्सी फ़ीलिंग महसूस करती है । उस पर गगन जैसी सहेली हो । फ़िर तो क्या बात थी । उसके बदन में चीटियाँ सी रेंगने लगी । एक भीगापन सा उसे साफ़ साफ़ महसूस हो रहा था । उसका दिल करने लगा था । गगन उससे किसी ब्वाय फ़्रेंड सा बर्ताव करे । और उसके जजबातों को दरिया खुलकर बहे । फ़िर उसने अपने आपको कंट्रोल किया ।
लेकिन अब नियन्त्रण करना मुश्किल सा हो रहा था । इस उत्तेजना को चरम पर पहुँचाये बिना रोका नहीं जा सकता था । इच्छाओं का बाँध पूरे वेग से टूटने वाला था । सो उसने स्कूटर को कालेज की बजाय एक कच्चे रास्ते पर उतार दिया । जहाँ झूमती हुयी हरी भरी लहराती फ़सलों के खेतों का सिलसिला सा था । गगन एक पल को चौंकी । पर कुछ बोली नहीं । वे दोनों खेत में घुस गयी । और एक दूसरे से खेलती हुयी सुख देने लगी ।
और तब जब जस्सी निढाल सी थकी हुयी सी सुस्त पङी थी । उसका दिमाग शून्य होने लगा । उसे तेज चक्कर से आने लगे । उसकी आँखे बन्द थी । पर उसे सब कुछ दिख रहा था । पूरा खेत मैदान उसे गोल गोल घूमता सा प्रतीत हुआ । खेतों में खङी फ़सल । आसपास उगे पेङ । उसका कालेज । सभी कुछ उसे घूमता हुआ सा नजर आने लगा । फ़िर उसे लगा । एक भयानक तेज आँधी सी आ रही है । और सब कुछ उङने लगा । घर । मकान । दुकान । लोग । वह । गगन । सभी तेजी से उङ रहे हैं । और बस उङते ही चले जा रहे हैं ।
और फ़िर यकायक जस्सी की आँखों के सामने दृश्य बदल गया । वह तेज तूफ़ान उन्हें उङाता हुआ एक भयानक जंगल में छोङ गया । फ़िर एक गगनभेदी धमाका हुआ । और आसमान में जोरों से बिजली कङकी । इसके बाद तेज मूसलाधार बारिश होने लगी । वे दोनों जंगल में भागने लगी । पर क्यों और कहाँ भाग रही हैं । ये उनको भी मालूम न था । बिजली बारबार जोरों से कङकङाती थी । और आसमान में गोले से दागती थी । हर बार पानी दुगना तेज हो जाता था ।
फ़िर वे दोनों बिछङ गयीं । और जस्सी एक दरिया में फ़ँसकर उतराती हुयी बहने लगी । तभी उसे उस भयंकर तूफ़ान में बहुत दूर एक साहसी नाविक मछुआरा दिखायी दिया । जस्सी उसकी ओर जोर जोर से बचाओ कहती हुयी चिल्लाई । और फ़िर  गहरे पानी में डूबने लगी ।
और तब जस्सी का सिर बहुत जोर से चकराया । और वह बचाओ बचाओ चीखती हुयी बेहोश हो गयी । अपनी धुन में मगन गगन कौर के मानों होश ही उङ गये । उसकी हालत खराब हो गयी । अचानक उसे कुछ नहीं सूझ रहा था । कुछ भी तो नहीं ।

अंधेरा 8

पंजाब का खूबसूरत दिलकश वातावरण । हरे भरे खेतों से गुजरती हुयी ठण्डी मस्त हवा । बढिया मौसम । साफ़ और निर्मल पानी इस क्षेत्र की पहचान थी । कम आबादी के बीच सुन्दर तन्दुरुस्त औरतों का नजारा यहाँ आम था । ये पंजाब की हरियाली में रंग बिरंगे फ़ूलों की तरह खिली मालूम होती थी । और अपने यौवनांगों से किसी फ़लदार वृक्ष की भांति लदी मालूम होती थी । अलग अलग साइज के मनमोहक विशाल नितम्बों और खूबसूरत गोल नोकीले स्तनों वाली लङकियाँ दिलोदिमाग में आदिम प्यार की लहर सी उठाती थी । पंजाब का खाना पीना भी बहुत बढिया था । मक्की । ईख । गुङ । दूध से बनी बहुत सी चीजों लस्सी । मक्खन । दही । देसी शुद्ध घी । मलाई आदि आराम से शुद्ध रूप में उपलब्ध थी । तमाम पंजाबी लोग सरसों का साग । पालक । गोभी । गाजर । मूली । शलजम । आलू मटर । चने भटूरे । राजमाह । सोयाबीन । पनीर आदि खाने के बहुत शौकीन थे । खायो पियो । मौज उङाओ । जिन्दगी का पूरा पूरा मजा लो । यहाँ का प्रमुख सिद्धांत था । पंजाब की औरतें पनीर की तरह गोरी नरम गरम और तन्दुरुस्त अहसास देने वाली थी । मर्द शराब पीने के बहुत शौकीन थे । चाहे अंग्रेजी हो । या देशी । वे शराब रोज पीते थे । पंजाब की लडकियाँ कम उमर में ही कमसिन और जवान लगने लगती थी ।
ये शायद कुछ अजीव सी ही बात थी कि देश विदेश पूरी दुनियाँ घूम चुका प्रसून पंजाब पहली ही बार आया था । और आधुनिकता और पुरातनता के इस अनोखे खूबसूरत संगम से काफ़ी हद प्रभावित हुआ था । खास जब अधिकांश स्थानों की फ़िजा प्रदूषित हो चुकी थी । पंजाब अभी भी बहुत शुद्ध था । और जीवन की उमंगों से भरपूर था ।
वह पिछले तीन दिनों से यहाँ था । और अजीव सी उलझन में था । मनुष्य की सीधी साधी जिन्दगी में कितनी घटनायें हो सकती हैं । और उनके कितने प्रकार हो सकते हैं ? इसका वह अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाया था । और ये पहला दिलचस्प केस था । जिसमें व्यक्तिगत तौर पर उसकी खुद की दिलचस्पी जागी थी । और उसे हैरानी थी कि पिछले तीन दिनों में वह किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँचा था । निर्णय पर पहुँचता तो तब । जब सामने कोई बात नजर आती । जस्सी एकदम सामान्य थी । और पिछले तीन दिनों से न सिर्फ़ आराम से सोयी थी । बल्कि उसने सभी रुटीन भी पूरे किये थे ।
तब यदि उसके बाधा क्षणों के शूट किये गये वीडियो क्लिप यदि राजवीर ने न बनाये होते । तो उसे यही लगता कि ये लोग किसी भूत प्रेत के भृम का शिकार हो गये हैं । और तब पहले तो वो यहाँ आता ही नहीं । और यदि आता भी तो उन्हें समझा बुझाकर तुरन्त लौट जाता । वीडियो क्लिप वाली जस्सी और इस बेहद खूबसूरत जस्सी की कहानी एकदम अलग अलग ही थी ।
उसने एक सिगरेट सुलगायी और जस्सी की तरफ़ गौर से देखा । शाम का समय था । और अब तक कुछ भी समझ में न आने से वह घूमने के उद्देश्य से जस्सी के साथ उसके खेतों की तरफ़ निकल आया था । करीना कपूर जैसे लुक वाली गगन कौर उसके साथ थी । क्या कमाल की कुङी थी जस्सी भी । लगता है । ये किसी औरत से पैदा न होकर सीधा आसमान से उतरी हो ।
किसी हाई क्वालिटी अंग्रेज गोरी के लुक वाली इस अनिद्ध सुन्दरी की बिल्लौरी आँखे एकदम गहरे हरे रंग की थी । जो संभवतः उसके बाप मनदीप की गहरी भूरी आँखों पर गयी थी । जबकि राजवीर की आँखें काली ही थी । अत्यन्त तीखे नयन नक्श वाली दूध सी गोरी लम्बी तन्दुरुस्त जस्सी किसी एंगल से पंजाबी नहीं लगती थी । उसके लम्बे नागिन से लहराते बाल उसके घुटनों को छूते थे ।
गगन और जस्सी उससे दूर खङी थी । और शायद आपस में उसी के बारे में बातें कर रही थी । पर उसका पूरा ध्यान जस्सी और उसकी अदभुत समस्या पर ही केन्द्रित था । और अभी तक उसने सिर्फ़ इतना ही महसूस किया था कि उनकी कोठी पर किसी प्रकार की प्रेत छाया नहीं थी । जैसा कि राजवीर और करम कौर का ख्याल था । और जैसा कि अब इस दुनियाँ को रहस्यमय तरीके से अलविदा कह चुके ढोंगी बाबा  गुरुदेव सिंह ने उन्हें जिन्न बाधा बताया था । जस्सी के कमरे में या उसकी खिङकी के पार भी कहीं कुछ नहीं था । जैसा कि उसे विवरण में बताया गया था । सबसे बङी बात जस्सी के दिमाग में कुछ नहीं था । जो कि उसने खुद देखा था । मगर उन वीडियो क्लिप में बहुत कुछ था । जो एन बाधा के वक्त किसी अज्ञात प्रेरणा से शूट हो गये थे । और प्रसून को एक नये खेल की चुनौती दे रहे थे ।
वह बखूबी जानता था । यदि इन क्लिप को किसी ऊँचे डाक्टर को दिखाया जाता । तो वो बिना किसी चेकअप के तुरन्त एक बीमारी की घोषणा कर देता - नींद में चलना । खुद उसका भी ख्याल कुछ कुछ ऐसा बनते बनते रह जाता था । पर उन क्लिप में जो वह देख रहा था । वो कोई डाक्टर शायद कभी न देख पाता ।  और वही तो अदभुत था । बेहद अदभुत ।
उसने आधी हो चुकी सिगरेट का अंतिम कश लिया । और सिगरेट को दूर उछाल दिया । फ़िर जब कोई बात उसे समझ में नहीं आयी । तो वह जवान लङकियों की दिलचस्प बातों में शामिल होने की जिज्ञासा लिये उनके पास आ गया । ये शायद पंजाव की फ़िजा का रोमांटिक प्रभाव था ।
- प्रसून जी ! जस्सी उसकी तरफ़ आकर्षित होकर मधुर स्वर में बोली - वैसे तो आप इंटरनेशनल पर्सन हो । पर पंजाब में । खास हमारे घर में । और हमारे ही सामने आपको मौजूद देखकर हम कितना ग्रेट फ़ील कर रहे हैं । शायद आप सोच भी नहीं सकते । ये चिकन वाली बोल रही है । प्लीज प्रसून जी से राजीव जी के बारे में कुछ पूछ ।
प्रसून यहाँ आने से कुछ ही पहले विदेश से लौटा था । उसके बाल कन्धों तक बङे हुये थे । किसी बर्फ़ीले स्थान में रहने के बाद उसकी गोरी रंगत किसी अंग्रेज के समान ही नजर आने लगी थी । और उसका लुक एकदम माइकल जेक्सन जैसा लग रहा था । जो लगभग उसी जैसे लुक वाली जस्सी को खासा आकर्षित कर रहा था । और चिकन वाली को सेक्सुअली एक्साइटिड कर रहा था । दोनों लङकियों ने उसे इम्प्रेस करने के लिये खासा सेक्सी परिधान पहना था । वे एक लूजर के साथ जींस पहने थी । उनके शर्ट से झलकते अधखुले उरोज मानों छलछलाकर बाहर निकलना चाहते थे ।
पर जब प्रसून ने इसका कोई नोटिस ही नहीं लिया । तो चिकन वाली खास तौर पर झुँझला गयी । और आदतानुसार चिढकर जस्सी से बोली - देख जस्सी । ये सालिआ मेरी बहुत इनसल्ट कर रहा है । ऐसा न हो कि ये कुछ और बात कर दे । नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगी । उदास हो जाऊँगी । निराश हो जाऊँगी । मैं रो पङूँगी । गुस्से में आकर इसका... काट दूँगी । टुईं.. टुईं । आई लव यू प्रसून बाबा ।
तब जस्सी ने बङी मुश्किल से उसका मूड चेंज किया । और फ़िर जब प्रसून उनकी तरफ़ मुङा । तो दोनों के दिल में मीठी मीठी अनुभूति सी हुयी । गगन की दरार तो रोमांच से भर उठी ।
- मैं..मैं इंटरनेशनल पर्सन ! वह उलझता हुआ सा बोला - ये क्या बोल रही हो आप ? और ये मिस्टर राजीव जी कौन हैं ?
- क्या ? दोनों लगभग उछल ही पङी । उनके छक्के छूट गये - आप राजीव जी को नहीं जानते । एक मिनट । गगन कुछ सोचते हुये बोली - और मानसी और नीलेश को ?
प्रसून कुछ देर सोचता सा रहा । मानों कुछ याद कर रहा हो । फ़िर वह बोला - नो । इनको भी नहीं । मैंने यह नाम शायद पहली बार सुने हैं ।
अबकी बार तो वे दोनों हङबङा ही गयीं । तब अचानक गगन कौर को बहुत ही अक्ल की बात सूझी । और वह जस्सी को लेकर थोङी दूर हो गयी । और फ़ुसफ़ुसाकर बोली - ये सालिआ 100% नकली है । ढोंगी है । फ़्राड है । राजीव जी की वजह से प्रसून को पूरा पंजाब जानता है । दुनियाँ जानती है । और ये बोल रहा है कि राजीव जी को नहीं जानता ।
हालांकि जस्सी को उसकी बात में दम लगा । पर वह इस हैंडसम से बहुत आकर्षित थी । एक तरह से दिल ही दिल मर मिटी थी । सो उसे गगन की ये बात उस टाइम बिलकुल अच्छी नहीं लगी ।
और वह भी फ़ु्सफ़ुसाकर बोली - गगन । गगन तू अक्ल से काम ले । तूने कौन सा राजीव जी को देखा है । अभी तू खुद उनसे जाकर बोले - आप प्रसून जी को जानते हैं । और बह बोलें । कौन प्रसून जी ? हो सकता है । यह बात भी हो । वह बोलें । कौन राजीव जी ? डार्लिंग हमें इस घनचक्कर से क्या लेना है । जो सामने हैं । उसको पकङ ना । या उसका पकङ ना ।
ये बात गगन के दिल पर सीधा टकरायी । कोई भी हो सालिआ । इससे क्या लेना । बस उसका स्टेयरिंग घुमाना है । और फ़िर वो जवान भी है । हैण्डसम भी है । भाङ में जाये ये सी आई डी । कौन राजीव जी एण्ड कौन प्रसून जी ।
- अच्छा छोङिये । जस्सी अपनी सुरीली आवाज में बोली - आप यू पी से बिलांग करते हैं ।

- नो ! वह भावहीन स्वर में बोला - कर्नाटक बैंगलौर से । ऐड्रेस बोलूँ क्या ? और मैं कीट बैज्ञानिक हूँ । पर उसके बजाय मनोबिज्ञान में मेरी खास दिलचस्पी है । मैंने अपनी गर्ल फ़्रेंड मार्था के साथ प्रेतों पर भी काफ़ी टाइम रिसर्च किया । और इस निष्कर्ष पर पहुँचा । भूत प्रेत महज अंधविश्वास है । प्रेत के नाम पर मैंने आज तक एक चुहिया भी नहीं देखी । आप लोगों को अभी तक कोई ऐसा एक्सपीरियेंस हुआ है । हुआ हो । तो प्लीज प्लीज मुझे बताईये । प्लीज प्लीज..याद करने की कोशिश करो । यदि कुछ भी..प्रेत के नाम पर एक मच्छर भी साबित हो जाय । तो मेरा रिसर्च से जुङा बहुत बङा काम हो जायेगा । फ़िर मार्था मुझे कम से कम दो नाइट के लिये एंजाय करायेगी । और मैं ऐसा चाहता भी हूँ ।
दोनों हसीनाओं के पास मानों शब्द ही शेष नहीं थे । जो वे कुछ कह पाती । उन्हें ऐसा लग रहा था । मानों उनका मूड ही खराब हो गया हो । उन्हें प्रसून के शब्द सुनाई दे रहे थे । प्लीज..प्लीज..प्लीज ।
जस्सी की निगाह दूर टिमटिमाते बल्ब पर गयी । अंधेरा घिर चुका था । और वे तीनों साये से नजर आने लगे थे । खेतों के आसपास के वातावरण में रात्रिचर कीटों की विभिन्न विचित्र आवाजें गूँजने लगी थी ।
उसकी एकटक निगाह उस जलते बल्ब के लाल बिन्दु पर टिकी सी रह गयी थी । उसकी आँखें किसी प्रेत के समान ही स्थिर हो गयी थी । गगन उसकी हालत से एकदम अनभिज्ञ थी । जस्सी शून्य 0 में घूम रही थी । और उसे रिकार्ड पर अटकी सुई की भांति प्रसून का यही शब्द सुनाई दे रहा था - प्लीज .प्लीज प्लीज..।
तब विलक्षण योगी रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । उसका प्रयोग एकदम सफ़ल रहा था । जो घटना जो क्रिया उसके आने से उसके प्रभाव से समाप्त हो गयी थी । उसे वह वापिस ले आया था । और खास इसीलिये वह दोनों लङकियों के साथ यहाँ एकान्त में आया था । और अंधेरा होने का ही इंतजार कर रहा था । जस्सी कहाँ हैं । और क्या देख रही है ? ये सब उसके लिये अब खुली किताब पढने जैसा ही था ।
किसी शराबी की तरह झूमकर गिरती जस्सी को उसने गिरने से पहले ही बाँहों में थाम लिया । और किसी प्रेमिका की तरह अपनी बाँहों में भींच लिया । उसका ढीला ढाला लूजर उसके कन्धों से खिसक गया था । और उसके कठोर स्तन बाहर निकलकर प्रसून के सीने से दबे हुये थे । पर उस तरफ़ उसका कोई ध्यान न था । और वह किसी दीवाने के समान जस्सी के गालों से मुँह सटाये था । जस्सी की सांस बेतरह तेज चल रही थी । और उसके मुँह से हूँ हूँ हूँ की बहुत हल्की आवाज निकल रही थी । तब उसने जस्सी के होठों को अपने होठों में दबा लिया । और एक हाथ से उसके गोल गोल स्तनों को सहलाने लगा ।
गगन तो मानों भौचक्का ही रह गयी । उसके सारे बदन में चीटियाँ रेंगने लगी । उसका हाथ स्वयँ उसकी टाँगों के बीच जा पहुँचा । और स्वाभाविक ही वह अगले पल जस्सी और अपने साथ प्रसून के अभिसार की कल्पना करने लगी । पर वह बेहद हैरान थी । बीस मिनट से ऊपर होने जा रहे थे । और प्रसून उसी तरह जस्सी के होठों का रस पी रहा था । उसके स्तन मसल रहा था । नितम्बों को सहला रहा था । जस्सी तङप तङप कर उससे एकाकार होने को बेताब हो रही थी । पर ये उसे भी दिखाई नहीं दे रहा था कि वास्तव में वह अपने होश में ही नहीं थी ।
और उस समय तो उसे बेहद ताज्जुब हुआ । जब प्रसून ने जस्सी को उठाकर कार की सीट पर लिटाया । और उससे  गगन जी बैठिये प्लीज बोला । तब उसने यही सोचा था कि वह कार की सीट पर सेक्स करने वाला है । पर उसके बैठते ही प्रसून ने गाङी स्टार्ट कर आगे बङा दी । जस्सी पीछे बेहोश पङी थी । और गगन जानबूझकर आगे उसके पास बैठी थी कि शायद प्रसून उसके साथ भी वैसा ही कुछ करने वाला है । पर उसने एक सिगरेट सुलगा ली थी । और आराम से सामने देखता हुआ ड्राइव कर रहा था । यहाँ तक झुँझलाकर गगन ने अपने स्तन लगभग बाहर कर लिये । और प्रसून से सटने लगी । पर वह जैसे वहाँ था ही नहीं । उसने कुछ झिझकते हुये से उसकी पेंट पर हाथ रख दिया । और वासना से भरी हुयी उसे टटोलने लगी । लेकिन उसे फ़िर भी कोई प्रतिक्रिया नजर नहीं आयी । तब उसने सोचा । वह साइलेंट गेम का ख्वाहिशमन्द हो रहा है । उसने अपनी शर्ट कन्धों से खिसका दी । और प्रसून की जिप खोल दी ।
वास्तविकता ये थी कि प्रसून अपनी पर्सनालिटी और योग मजबूरियों के चलते कई बार ऐसी स्थितियों में फ़ँस चुका था । इस लङकी को कोपरेट करना उसके लिये आवश्यक था । तब वह जस्सी पर फ़ुल एक्सपेरीमेंट कर सकता था । इस लङकी का जस्सी के साथ होना उसे तमाम शकों से दूर रखता था । दूसरे ये जस्सी के बारे में वह सब बता सकती थी । जो शायद उसके माँ बाप या दूसरा कोई और नहीं बता सकता था ।
इसके साथ ही जस्सी को जिस अटकाव बिन्दु से पार कराने के लिये उसने अभी अभी लोंग किस आदि किया था । उससे वह हल्की उत्तेजना भी महसूस कर रहा था । आखिर वह भी योगी से पहले एक इंसान था । उसके द्वारा कोई विरोध न करने पर चिकन वाली ने इसे उसकी मौन स्वीकृति समझा था । और वह पूरी बेतकल्लुफ़ी से उसकी टांगों के मध्य हाथ चला रही थी । उसने उसकी पेंट ऊपर से भी खोल दी  । और जांघिये में हाथ ले गयी । उसकी सहूलियत के लिये प्रसून समकोण से अधिक कोण हो गया था । और उसने पैरों को फ़ैला लिया था ।
गगन को जैसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ये क्षण उसके साथ ही घट रहे हैं । पर उसे  हैरत भी हो रही थी । बीस मिनट से अधिक हो गये थे । प्रसून धीमी स्पीड में ड्राइव कर रहा था । पर न तो उसका घर ही आया था । और न ही प्रसून में कोई उत्तेजना पैदा हो रही थी । पर उसे नहीं पता था । गाङी विपरीत दिशा में जा रही  थी । और प्रसून समता भाव का प्रयोग दुहराता हुआ योग में स्थित था । गगन की हालत खराब होने लगी । और वह सिसकती हुयी प्लीज प्रसून जी प्लीज सून करने लगी ।
तब उसने गाङी रोक दी । और गगन को सीट पर झुका दिया । उसके कठोर स्पर्श का अहसास होते ही उसकी आँखें बन्द हो गयी । एक पीङा भरी गर्माहट उसके अन्दर समाती जा रही थी । और फ़िर वह मीठे दर्द का अहसास करने लगी । वह दर्द जिसे पाने के लिये हर औरत तङपती है । वह अहसास जिसका रोमांच हर औरत के रोम रोम में समाया होता है ।

अंधेरा 9

- क्या ? जस्सी उछलकर बोली - क्या सच में उसने मेरे साथ ऐसा किया था ।
उसके दरबाजे के समीप आ चुकी करम कौर के एकदम से कान खङे हो गये । शाम के चार बजे थे । वह राजवीर से मिलने आयी थी । पर सतीश से पता चला कि राजवीर बराङ साहब के साथ बाजार गयी हुयी थी । तब वह जस्सी के पास बैठने उसके कमरे की तरफ़ चली आयी थी । लेकिन कमरे में घुसने से पहले ही उसके कानों में गगन की आवाज पङी । और वह वहीं छुपकर सुनने लगी ।
- हाँ यार । गगन मगन सी होती हुयी बोली - पर तू भी साली ना । एकदम बेबकूफ़ ही है । एंजाय के टाइम सो जाती है । पता नहीं बेहोश हो जाती है । पता नहीं क्या हो जाता है तुझे । पूरा थर्टी मिनट उसने तुझे बिना ब्रेक किस किया । इधर का तो । उसने उसके स्तनों से इशारा किया -  पूरा रस ही निचोङ दिया सालिआ ने । ओह गाड ! काश मुझे उस वक्त वह सब शूट करने की अक्ल आ गयी होती । क्या यादगार लम्हे थे ।
- फ़िर । जस्सी अपनी बङी बङी ग्रीन आँखें आश्चर्य से गोल गोल घुमाती हुयी बोली - फ़िर । फ़िर क्या किया ।
उन क्षणों को याद कर रोमांचित सी हुयी गगन नमक मिर्च लगाकर उसे सब बताती चली गयी । खासतौर से उसकी पौरुष क्षमता विशालता का उसने आदतानुसार अतिश्योक्ति वर्णन किया । जस्सी के सुन्दर चेहरे पर लज्जा और शर्म की लाली सी फ़ैलती चली गयी । अपने मधुर ख्यालों में वह अपने प्रेमी प्रियतम प्रसून के साथ किसी सुन्दर परी की तरह नीले अनन्त आकाश में उङती ही चली गयी ।
पर करम कौर पर इस आँखों देखे हाल सुनने का अलग ही असर हुआ । एक लस्टी पूर्ण पुरुष । और वह कामनाओं की भूखी एक औरत । स्वाभाविक ही उसने सोचा । क्या प्रसून उसकी तरफ़ आकर्षित हो सकता है । जरूर हो सकता है । वर्णन के अनुसार वह वाकई अनुभवी था । और ऐसे आदमी को तृप्त करना इन अनाङी लङकियों का वश नहीं था । जो इस खेल की सही ए बी सी डी भी नहीं जानती थी । उसको तृप्ति के चरम पर पहुँचाने के लिये करम कौर ही दम खम वाली थी । सेक्सी थी । अनुभवी थी । और हर तरह से पूरी औरत थी ।
वह दबे पाँव हाल में पहुँची । जहाँ सोफ़े पर अधलेटा सा प्रसून टीवी देख रहा था । उस पर निगाह पङते ही करमकौर अन्दर से दृवित सी होने लगी । क्या पर्सनालिटी थी लङके की । जैसे माइकल जैक्सन हेल्दी हो गया हो । करमकौर की आहट मिलते ही प्रसून उसकी तरफ़ आकर्षित होकर औपचारिक भाव से मुस्कराया । और बङी मधुरता से शालीनता से संक्षिप्त में बैठिये बोला ।
करमकौर को लगा । इसके सामने बैठने मात्र से ही वह नियन्त्रण खो देगी । लङकियों से लाइव कमेंटरी सुनकर पहले ही उसका बुरा हाल था । फ़िर प्रसून की मोहिनी मुस्कराहट और सम्मोहिनी दृष्टि से वह भावित होकर पानी पानी होने लगी । उसके अन्दर की पूर्ण औरत की मानों एक दृष्टि में ही धज्जियाँ उङ गयी । अब वह क्या चरित्र करे । अब तो वह सीधा सीधा कहना चाहती थी । प्लीज एक बार मुझे भी जिन्दगी में यह यादगार सुख दे दो । जन्म जन्म को तुम्हारी गुलाम हो जाऊँगी । तुम्हारे तलवे चाटूँगी ।
प्रसून किसी इंगलिश चैनल पर एक अजीव सी बोरिंग जैविक सरंचना पर डाक्यूमेंटरी देख रहा था । और उसने करमकौर पर दोबारा दृष्टि तक नहीं डाली थी । इससे करमकौर मन ही मन कसमसा रही थी । उसने बङे गौर से टीवी में चल रहे दृश्य को समझने मन लगाने की कोशिश की । पर उसको डाक्यूमेंटरी समझना तो दूर । वह क्या और किसका दृश्य है । यह तक समझ में नहीं आ रहा था । स्क्रीन पर एक मिनट देखना मुश्किल हो रहा था । और वह बेबकूफ़ इस तन्मयता से देख रहा था । मानों कैटरीना कैफ़ सेक्सी डांस कर रही हो ।
वह समझ गयी । यदि वह एक घण्टा भी वहाँ बैठी रहती । तो भी प्रसून उसकी तरफ़ ध्यान देने वाला नहीं था । सो यदि उसे मौके का फ़ायदा उठाना था । तो उसे ही कुछ करना था । उसने बैचेनी से पहलू बदला
और बोली - एक्सक्यूज मी । प्रसून जी ! मैं आपको डिस्टर्ब तो नहीं कर रही । ऐसा हो तो मैं फ़िर चली जाऊँ । एक्चुअली मुझे जस्सी के बारे में बङी फ़िक्र है । उसकी कुछ जिज्ञासा सी थी । प्लीज डोंट माइण्ड ।
वह मानों सोते से जागा । और तुरन्त उसकी तरफ़ आकर्षित सा हुआ । वास्तव में यह उसकी असभ्यता थी । एक महिला उसके पास बैठी थी । और वह उसे उपेक्षित कर रहा था ।
- नो नो । वह अफ़सोस सा करता हुआ बोला - इनफ़ेक्ट गलती मेरी ही थी । असल में जो मैं देख रहा था । वह बीच में था । इसलिये मैं आपको कंपनी नहीं दे पा रहा था । पर चलो । अब वह कम्पलीट हो गया । हाँ आप बोलिये ना ।
करमकौर की बाँछे खिल गयी । इसी पल का तो उसे इन्तजार था । और समय उसके पास बिलकुल नहीं था । कभी भी राजवीर आ सकती थी । जस्सी गगन आ सकती थी । कोई और भी आ सकता था । समय कभी रुकता नहीं । किसी का इन्तजार नहीं करता । और तब समय का लाभ न उठाने वाले बेबकूफ़ ही होते हैं । और वह बेबकूफ़ नहीं होना चाहती थी । कभी नहीं ।
उसने अन्दर ही अन्दर चुपके से अपने गोद के बच्चे को चुटकी भरी । जिससे पीङित हुआ सा वह रोने लगा । तब वह उसे चुप कराने लगी । और फ़िर उसने वही किया । जिसके लिये उसने यह किया ।
प्रसून को अनदेखा सा करते हुये उसने अपना विशाल स्तन खोला । और बच्चे को हिलाते डुलाते हुये वह अपने नग्न गोल स्तन की झलक देर तक उसे दिखाती रही । और फ़िर बच्चे को स्तनपान कराने लगी ।
संभवत हर स्त्री को ऐसा ही लगता है कि उसकी कामुक भाव भंगिमा उस पुरुष के सामने पहली ही बार घटित हो रही है । जिसकी वह अभिसारी नायिका बनने हेतु बेताब है । और वह अपनी ऐसी काम अदा से उसे घायल करके ही छोङेगी । तब पुरुष को उसका प्रणय प्रस्ताव मजबूरन स्वीकार करना ही होगा ।
उसकी ऐसी चेष्टा ने प्रसून को उन तमाम योग स्त्रियों की याद दिला दी । जो पहले कभी उसके अनुभव में आयी थीं

। वह अच्छी तरह जानता था । यदि उसने देखा नहीं । उसे अनदेखा करता रहा । तो वह बराबर प्रयास करती रहेगी । और व्यर्थ का समय खराब करेगी । औरत की नस नस से वाकिफ़ उस सबल योगी ने आश्चर्य और प्रशंसा के मिश्रित भावों से तब तक उसके स्तन से निगाह नहीं हटाई । जब तक उसने प्रसून को निगाह मिलाकर ऐसा करते देख नहीं लिया । तब उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आये । और नारीत्व सौन्दर्य का गरिमा बोध भी ।
- काफ़ी सुन्दर हैं आप । वह मधुर स्वर में उसे और भी संतुष्ट करता हुआ बोला - ईश्वर ने आपको फ़ुरसत से बनाया है । और सब कुछ भरपूर रूप से दिया है ।
- थैंक्स । वह शर्माकर बोली - पर हीरे की परख सिर्फ़ जौहरी ही जानता है । वही उसकी सही कीमत भी समझता है । आई थिंक । औरत को हरेक कोई नहीं समझ सकता । वह काँच के समान नाजुक होती है । यू नो ।
वास्तव में करम कौर का अपने आप से नियन्त्रण हट गया । उसे अपने भीतर अजीव सी चिपचिपाहट महसूस हुयी । वह पिघलती हुयी सी बहने लगी । क्या पुरुष था । अनोखा और कल्पना से परे । अभी उसने उँगली से भी नहीं छुआ था । और वह भावित होकर पहाङी दरार से फ़ूटते वेगवान झरने की तरह बह गयी थी । ओह गाड ! कोई योग पुरुष ऐसा भी हो सकता है । यदि कोई उसे मुँहजवानी बताता । तो उसे कभी विश्वास ही नहीं होता । पर स्वयँ के अनुभव को भला वह कैसे नकार सकती थी । अब उसे यह बहाना भी नहीं सूझ रहा था कि वह प्रसून से क्या और कैसे बात करे ।
- मैंने वो । तब अनुभवी योगी स्वयँ ही उसकी मनोदशा जानकर बोला - वो ..राजवीर जी द्वारा शूट किये जस्सी जी के वीडियो क्लिप देखे । बट मुझे ताज्जुब इस बात का है कि अकार्डिंग टू राजबीर जी सेम ऐसा ही अनुभव आपको भी हुआ । ये बङी ही अजीव बात है । और वह यानी जस्सी जी इसको आधा अधूरा ही बता पाती है । जबकि आप पूरा और ज्यों का त्यों बताती हैं । वैसे वह सब मैं सुन चुका हूँ । पर प्लीज आप कुछ और न समझें । तो मुझे फ़िर से एक बार बतायें ।
करम कौर के मानों सब अरमानों पर पानी फ़िर गया । वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अभी वही सब चाहती थी । जो गगन बता रही थी । पर एकदम ऐसा वह कह भी कैसे सकती थी । तब उसने भी गगन की तरह नमक मिर्च लगाकर उस मैटर का पूरा पूरा फ़ायदा उठाने का निश्चय किया ।
उसने एक निगाह आसपास डाली । अभी कोई नहीं था । वासना वैसे भी मनुष्य को अंधा ही कर देती है । तब यदि कोई होता भी है । तो भी नजर नहीं आता । उसे ख्याल आया । उस चक्रवात में वह एकदम नंगी भाग रही थी । और मूसलाधार पानी बरस रहा था । यहाँ वह स्वयँ खुल जाना चाहती थी । उसके प्यार की बारिश में नहाना चाहती थी । और खुद को वैसा ही आजाद महसूस करना चाहती थी ।  एक पूर्ण पुरुष को पाने के लिये औरत का भावनात्मक और देहात्मक पूर्ण नग्न होना आवश्यक ही है । तभी वह रीझता है । उसने अपने बच्चे को घुमाया । और दूसरा स्तन भी खोल लिया । अब उसके दोनों उरोज उसके सामने  थे । और वह ऐसा प्रदर्शित कर रही थी । जैसे इस तरफ़ उसका ध्यान ही नहीं है । उसे नहीं पता था । गगन और जस्सी भी उसी तरह उसको छिपकर देख रहीं है । जैसे वह उनको सुन रही थी । पर प्रसून एकदम शान्त था । और उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
- अरे प्रसून जी ! वह आँखें चौङी करके बोली - अभी क्या बोलूँ । एक तो मेरे को शर्म सी आती है । आप भी सोचोगे कि ये लेडी कैसे बोल रही है । पर डाक्टर से कुछ भी छुपाना नहीं चाहिये । जिस तरह एक अच्छी सफ़ल समर्पित प्रेमिका को प्रेमी के सामने शर्म छोङकर नंगा होना ही पङता है । उसी तरह रोग ठीक कराना हो । तो डाक्टर के सामने भी नंगा होना ही पङता है । आप समझ रहे हो ना । मैं क्या कह रही हूँ । सो प्लीज । मैं आपको कोई बात संकेत में ना बताकर ज्यों की त्यों बताती हूँ ।
फ़िर वह सचमुच ही ज्यों का त्यों उस चक्रवाती तूफ़ान का वर्णन । और उसमें खुद के भागने की बात । उस टार्जन लुक युवा लङके को देखने की बात । और दरिया में अपने डूबने तक बताती चली गयी । बस उसने अपनी नग्नता की स्थिति में खामखाह का मिर्च मसाला जोङा था । जो प्रसून को स्पष्ट ही बनाबटी लगा । और एकदम झूठा लगा । पर करमकौर को इसकी कोई परवाह नहीं थी । उसे झूठा सच्चा कुछ भी लगे । उसे अपनी तरफ़ आकर्षित करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य था ।
- सोचिये प्रसून जी सोचिये । वह होठ दबाकर रोमांचित हुयी सी बोली - मैं बेचारी यह सोच सोचकर मरी जा रही हूँ । यदि बह नाविक मछुआरा मेरी पुकार सुन लेता । और मेरे पास आता । तब वह मेरे साथ क्या बिहेव करता । ध्यान रहे । मैं बिना कपङों में थी ।
- बही । प्रसून उसकी भावनाओं को मनो सन्तुष्टि देने के ख्याल से बोला - वही करता । जो ऐसी स्थिति में एक पुरुष एक खूबसूरत भरपूर जवान स्त्री के साथ करता है । वैसे मैं उसकी नहीं जानता । पर मैं तो निश्चय ही यही करता ।
तब करमकौर के गाल शर्म से लाल हो उठे । उसे पहली बार लज्जा सी आ गयी । उसे पहली बार मानों ख्याल आया । वह अभी भी नग्न सी ही है । और तब उसने नकली हङबङाहट के साथ अपने स्तनों को कुर्ती के अन्दर कर लिया । प्रसून ने चेहरे पर आती रहस्यमय मुस्कराहट को फ़ौरन रोका । और बहुत हल्का सा सामान्य मुस्कराया ।

अंधेरा 10

आसान नहीं होता । ऐसी परिस्थितियों में ठीक से काम करना । सबको सब कुछ समझा पाना भी आसान नहीं है । किसी विदेशी फ़्री सेक्स धरती की तरह पंजाब में भी काम भावना की लहरें सी बह रही थीं । और सबसे बङी बात थी कि वह इस केस में एकदम से कोई प्रभाव भी नहीं छोङ सकता था । कोई झूठे तन्त्र मन्त्र का दिखावा करने से तो उसे वैसे ही नफ़रत थी । फ़िर वह दामाद की तरह इस घर में कब तक ठहरा रह सकता था । जबकि निजी तौर पर उसकी भारी दिलचस्पी इस केस में थी ।
जस्सी उसे खुद को आकर्षित करती थी । गगन कौर बस उसके साथ सेक्स करने के ख्वाव देखती रहती थी । करम कौर तो बस मौका मिलते ही उस पर टूट पङना चाहती थी । हाँ राजवीर बेकरारी से उस पल के इन्तजार में थी । जब प्रसून इस रहस्य पर से कोई परदा उठायेगा । या कहेगा । तुम्हारी लाङली अब ठीक हो गयी । और जाने किस अज्ञात भावना से उसको ऐसी ही उम्मीद भी थी ।
सिर्फ़ बराङ साहब के लिये उसे लगा था कि वह कोई फ़ालतू का बखेङा खङा कर सकते है । और उसके काम में विघ्न पैदा कर सकते है । उन्होंने एक जवान बेटी का पिता होने के नाते प्रसून को संदेह की नजर से देखा भी था । पर यह क्षणिक भावना ही साबित हुयी थी । प्रसून की किसी को भी सम्मोहित कर देने वाली जादुई पर्सनालिटी से अगले दो मिनट में ही वह खुद को उसके आगे बौना महसूस करने लगा । उसकी अमीरी का रौब पल भर में चूर चूर हो गया । जब उसे इस लङके की हस्ती पता लगी ।
वैसे भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके बताने से नहीं स्वयँ उसकी आभा से झलकता है । जब उसे पता लगा । प्रसून कीट बैज्ञानिक है । और उसका एक पाँव रूस में तो दूसरा योरोप में अक्सर रहता है । जब उसने औपचारिकता वश ही अपने शेयर बिजनेस और रिसर्च वर्क के बारे में बहुत संक्षिप्त सा परिचय दिया । तो बराङ साहब को हिसाब लगाना मुश्किल हो गया । इसकी आमदनी कितनी हो सकती है ।
उसने उसकी आलीशन कोठी और वैभव पर एक मामूली सी निगाह डालना भी उचित नहीं समझा था । उसने उसकी आलीशान बेटी को भरपूर देखना तो दूर अभी देखने की ही कोई कोशिश नहीं की । जबकि वह दस बार उसके सामने आ चुकी थी । यह सब अनुभव किसी इंसान के प्रति होना बराङ की जिन्दगी में पहला वाकया था ।
बह कुछ ही देर पहले आया था । और औपचारिक रूप से भावहीन हल्लो बोलकर अपने पास से एक मैगजीन निकालकर उसे पढने लगा था । क्योंकि अभी बातचीत शुरू नहीं हुयी थी । और राजवीर उसके स्वागत में नाश्ता आदि इन्तजाम में लगी हुयी थी । और ये सब घोर अहंकारी बराङ साहब के जीवन में पहली बार हो रहा था । जब वह अपने ही घर में अपने तमाम रौब दाब के बाबजूद भी उस लङके के आगे खुद को बेहद छोटा महसूस कर रहा था । और उससे कोई बातचीत कर पाने में उसकी खुद की जबान ही अटक जाती थी । शब्द बाहर नहीं आते थे । मगर प्रसून को जैसे उसकी उपस्थिति का अहसास तक नहीं था ।
और फ़िर वही हुआ । अहंकारी बराङ तब तक उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया । जब तक चाय नाश्ता आ जाने पर प्रसून सबके बैठ जाने पर स्वयँ ही उनकी और आकर्षित नहीं हुआ । और बातचीत शुरू हुयी । उसकी शिष्टता शालीनता और मामूली से मामूली गतिविधि से स्वाभाविक ही झलकता राजसी अन्दाज देखकर दोनों पति पत्नी मानों आकाश में उङने लगे । और मानवीय स्वभाव वश सुन्दर जस्सी के साथ उसकी सुन्दर जोङी की कल्पना करने लगे ।
यहाँ तक तो सामान्य बात थी । दोनों को बेहद खुशी इस बात की हुयी थी कि जबसे तीन चार दिन से वह उनके घर रुका था । जस्सी एकदम नार्मल हो गयी थी । उसे रात या दिन में कोई अज्ञात बाधा नहीं हुयी थी । उनकी फ़ूल सी बच्ची बिलकुल ठीक सी हो गयी लगती थी । जबकि उसका इलाज करने आये उस जादूगर ने किसी पूजा रचा के नाम पर एक अगरबत्ती भी नहीं सुलगाई थी । मुँह से ॐ टायप या किसी गुरु या भगवान या ग्रन्थ का ना नाम लिया था । ना कोई पन्ना खोला था । जिसकी वे आम कल्पना कर रहे थे । उससे भी बङी हैरत उन्हें इस बात की थी कि वे उसके सामान में किसी तान्त्रिकी मान्त्रिकी हड्डियाँ माला गुटके आदि की अपेक्षा कर रहे थे । जबकि उसके पास एक उच्च शिक्षित और उच्च पदाधिकारी वाला ही सामान था । कुछ भी हो । उसने उनकी बेटी को बिना किसी तामझाम के जादुई तरीके से ठीक किया था । यही उनके लिये बहुत बङी राहत थी ।
और जो उनके लिये सबसे बङी राहत थी । दरअसल वही प्रसून के लिये सबसे बङी आफ़त थी । वह चाह रहा था कि बाधा हो । और फ़ुल्ली अटैक हो । जो वह उसका कोई सिरा सूत्र पकङ सके । अगर वह वीडियो क्लिप ना होते । तो खुद वह मानने को तैयार नहीं होता । जस्सी किसी गम्भीर भाव से पीङित है । यह बाधा उसके आने से क्यों नहीं हो रही थी । यह वह भली प्रकार जानता था । दरअसल उसके ध्यानी शरीर से निकलने वाली योग तरंगे ऐसे किसी बाह्य तरंग को पहुँचने से पहले ही नष्ट कर देती थी ।
अब तक बस वह इतने ही निर्णय पर पहुँचा था । ये किसी तरह की सामान्य प्रेत बाधा नहीं थी । नींद में चलने का रोग भी नहीं था । उसके दिमाग में किसी तरह की कोई ऐसी मेमोरी भी उसे नहीं मिली थी । जो ऐसे अटैक का कारण हो सकती थी । और तब बहुत बार सोचने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि जस्सी के कारण शरीर में कोई ऐसा संस्कार जमा है । जो उसके पूर्व जन्म से संबन्धित है । और जब वह किसी विशेष बिन्दु पर पहुँचकर उस संस्कार से जुङती है । तब उसके साथ वो चक्रवाती घटना घटित होती है । और वो विशेष बिन्दु कुछ भी हो सकता है । उसी तरह का कोई दृश्य । कोई सोच । कोई चीज । कोई भावना । कोई इंसान आदि कुछ भी । ये पेशेंट की तरफ़ का एक पक्ष था । और इसमें कोई चिन्ता जैसी बात कम से कम उसके लिये नहीं थी । वह थोङे प्रयास से योग द्वारा जस्सी को उस कारण संस्कार से जोङकर उस कारण को ही जला देता । और जस्सी हमेशा के लिये मुक्त होकर ठीक हो जाती ।
और तब उसे इसके दूसरे पक्ष दूसरी संभावना का ख्याल आया । और उसके बारे में सोचते ही वह काँप गया । अगर वह बात थी । तो सिर्फ़ खतरनाक ही नहीं । बेहद खतरनाक थी । कम से कम इतनी खतरनाक कि उसे भी एक युद्ध सा लङना पङता । और उस युद्ध का अंजाम कुछ भी हो सकता है । स्वयँ उसकी मौत । या फ़िर जस्सी की भी ।
उसने ड्राइव करते हुये बगल में बैठी उस अप्सरा को देखा । जो ऐसी किसी भी सोच से बेपरवाह सी अधमुँदी आँखों से कहीं खोयी हुयी थी । और तब ही प्रसून को पहली बार अहसास हुआ कि उसने किसी प्रेमिका की भांति अपना सिर उसके कन्धे से टिका रखा था । वह उससे एकदम सटकर बैठी थी । और उसका मरमरी गोरा हाथ उसकी गोद में रखा हुआ था । कमाल था । वह अपनी भावनाओं में इस कदर खो गया था कि उसे एक जवानी की गरमाहट भी महसूस नहीं हुयी थी ।
सङक पर काफ़ी अंधेरा फ़ैल गया था । वह बिना किसी उद्देश्य के जस्सी के साथ ड्राइव पर था । बराङ दम्पत्ति ने उसके जेंटलमेनी नेचर और उससे जस्सी की शादी की कल्पना करके उसे खुली छूट दे रखी थी । और स्वयं जस्सी भी किसी प्रेमिका की भांति अधिकतर उसके आसपास ही रहती थी । बस दोनों की सोच में भिन्नता थी । प्रसून उस अज्ञात रहस्य की खोज में उसके नजदीक था । जबकि जस्सी और बराङ दम्पत्ति उसे लङका लङकी का प्रेम आकर्षण समझते हुये मुग्ध हो रहे थे ।
उसका ध्यान फ़िर से दूसरे पक्ष पर गया । और वो दूसरा पक्ष ये था कि किसी अज्ञात भूमि से यह संस्कार आ रहा हो । जिसमें कनेक्टविटी उल्टी यानी उधर से होती हो । और ऐसा सम्पर्क होते ही जस्सी के साथ वह चक्रवाती घटना होती हो । और शायद इसीलिये उसके पास इसका कोई रिकार्ड नहीं था । तब ये दिमाग की मेमोरी का मामला नहीं था । यह किसी ऊँचे नीचे लोक से जुङा मामला था । जो करोंङों इंसानी ग्रन्थियों में से किसी एक से जुङता हो । तब ये बहुत कठिन बात थी । और यही वो बात थी कि प्रसून की पूरी पूरी दिलचस्पी इस केस में थी । जब किसी जीवित इंसान को कहीं अज्ञात भूमि में बैठा हुआ कोई शख्स प्रभावित कर रहा हो । वह क्यों प्रभावित कर रहा है । क्या चाहता है ? उसके इरादे क्या हैं ? ऐसे अनेक प्रश्न उसके दिमाग में तैर रहे थे । और इसके लिये उसे फ़िर से एक बार सूदूर अंतरिक्ष के किसी अज्ञात से लोक में जाना पङ सकता था । पर कहाँ । ये अभी उसे खुद भी पता नहीं था ।
रहस्यमय अस्तित्व का मालिक अंधेरा पूरे यौवन पर था ।  प्रथ्वी के इस हिस्से पर उसका साम्राज्य कायम हो चुका था । इस अंधेरे शान्त शीतल माहौल में जस्सी के दिल में प्रेम भावनाओं का संचार हो रहा था । वह रह रहकर कंपित सी होती प्रसून के शरीर पर हाथ फ़िरा रही थी । और प्रसून की कोहनी से अपने स्तन को दबा रही थी । ये अंधेरा उसे फ़िर से सब कुछ वही बा होश पाने को उकसा रहा था । जो चिकन वाली के अनुसार प्रसून ने उसके साथ बेहोश किया था ।
जबकि प्रसून के दिलोदिमाग में इस अंधेरे को लेकर बार बार एक ही बात आ रही थी । जस्सी को ज्यादातर अटैक रात यानी अंधेरे में ही होते थे । और स्वयँ उसके सामने वाला अटैक भी अंधेरे में ही हुआ था । या कहना चाहिये । उसकी बहुतेरी कोशिश से किसी तुक्के के समान तीर निशाने पर जा लगा था । बस उसी तुक्के की उसे दोबारा तलाश थी । बो प्वाइंट जिससे जस्सी अज्ञात भूमि से जुङती थी । वो सूत्र । वो सिरा । जो कहीं न कहीं उसे शायद उसके गुजरे अतीत से जोङ देता था । वो क्या था ?
और तब उसे उस टार्जन लुक नाविक मछुआरे का ध्यान आया । जिसे जस्सी दरिया में डूबने से पहले पुकारती थी । क्या वह उसका पूर्व जन्म का प्रेमी था । क्या मन में सेक्स भावना उठने पर उसे वह अटैक होता था । या प्रेमी की अचेतन में दवी याद की वजह से । प्रेमी । एक तरह से अभी वह भी उसका प्रेमी था ।
उसने गाङी साइड में लेकर रोक दी । और कार के स्टीरियो में कार से ही लेकर शकीरा की सीडी प्ले कर दी । बहुत हल्की आवाज में गूँजती शकीरा की मादक सेक्सी आवाज जस्सी के दिल में चाहत की हिलोरें सी पैदा करने लगी । प्रसून उसकी तरफ़ सरक आया । और उसने सिगरेट सुलगा ली । ऐसा लग रहा था । वह कुछ टाइम शान्ति से सुस्ताने के मूड में हो । उसने गाङी की सीट को भी पीछे सरका दिया था । और फ़ैला दिया था । जस्सी को मानों ये भगवान ने वरदान दिया हो । वह उसकी गोद में लेट गयी । और उसके हाथ अपने सीने पर रख लिये । प्रसून हौले

हौले उसके स्तनों को सहलाने लगा । वह अन्दर ब्रा नहीं पहने थी । उसके रेशमी वस्त्र के ऊपर से फ़िसलन भरा सा हाथ जस्सी के बदन में काम तरंगे तेजी से फ़ैला रहा था । एक समझदार प्रेमिका की भांति इसी बीच उसने अपनी शर्ट के दो बटन खोल दिये । तब उसका अभिप्राय समझकर प्रसून ने उसकी शर्ट के अन्दर हाथ डाल दिया ।
- आपको ! वह मादकता से भरपूर लरजते स्वर में बोली - मेरे ये अच्छे लगते हैं ।
- अगर ना कहूँ । वह उसका स्तन मसलता हुआ बोला - तो यह एकदम झूठ होगा । ये एक दूध पीते बच्चे से लेकर शक्तिशाली देवताओं को भी आकर्षित करते हैं । और सर्वाधिक प्रिय होते हैं । ये एक सम्पूर्ण नारी का सौन्दर्य आधार है । खुद नारी इनको मनोहर रूप में पाकर स्वयँ को गौरवान्वित महसूस करती है । ये किसी नारी की खूबसूरती के सबसे महत्वपूर्ण बिन्दुओं में से एक हैं ।
- आप जादूगर हो प्रसून जी ! वह उसकी छाती पर हाथ फ़िराती हुयी बोली - आपकी बातों में जादू है । व्यक्तित्व में जादू है । आपकी निगाहों में जादू है । आप एक पूर्ण पुरुष हो । कोई भी लङकी आपको देखने के बाद सिर्फ़ आपको ही पाने की तमन्ना करेगी । वह अपने आपको आप पर कुरवान कर देगी । प्लीज आपने मुझे इनके बारे में बताया । ये सबकी पसन्द होते हैं । पर वो ?
प्रसून ने फ़ौरन अपनी मुस्कराहट को निकलने से रोका । एक लङका । एक लङकी । एक पुरुष । एक स्त्री । एक आदमी । एक औरत । जब अपनी तमाम सामाजिक बेङियों मर्यादाओं को हटाकर जवां तन्हाई के एकान्तमय सामीप्य में होते हैं । तब वे सिर्फ़ प्रेमी होते हैं । इसके अलावा कुछ नहीं होते । उसके पूछते ही प्रसून को किसी विदेशी लेखक की यह महत्वपूर्ण सूक्ति याद हो आयी - यह कोई ऐसी चीज नहीं । जिसको यूज न करने से इस पर सोने की फ़सल उगने लगेगी ।
पर वह अपनी शिष्टता के चलते इस पर कोई कमेंट नहीं कर पाया । जस्सी की बङी बङी आँखों में चाहत भरे मौन आमन्त्रण के साथ हल्की सी शरारत चंचलता झलक रही थी । जैसे ही प्रसून का हाथ सामान्य होकर उसके शरीर से अलग ठहर जाता । वह फ़िर से उसे थामकर अपने सीने से लगा लेती ।
- मुझे ये वो का तो पता नहीं । वह उसके रेशमी बालों में उँगलिया घुमाता हुआ बोला - पर ये सच है । मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो । सच तुम हो भी बहुत अच्छी । एक पूर्ण प्रेमिका ।
जस्सी फ़ौरन उठकर बैठ गयी । उसके अधरों मे तेज कंपकंपाहट हो रही थी । उसका सारा शरीर कंपित हो रहा था । तेज भावावेश में उसने अपने होंठ प्रसून के होठों से चिपका दिये । बस यही तो वह योगी चाहता था । उसका अब तक का सारा प्रयास इसी के लिये था । उसकी तरफ़ से काम गति का बहना । यही बात यही पहल । वो अपनी तरफ़ से भी कर सकता था । पर वो काम गति की विपरीत धारा होती । तब वह सिर्फ़ समर्पण की मुद्रा में हो जाती । बहाव उसकी तरफ़ से ही होना जरूरी था । क्रिया एक ही थी । खेल एक ही था । पात्र भी एक ही थे । पर घटना में बहुत अन्तर था । उसके परिणामों में बहुत अन्तर था । अब वह किसी उन्मुक्त नदी की तरह बाँध तोङती हुयी बहने लगी थी ।
योगी के सधे संतुलित संगीतमय हाथ उसके बदन पर घूमने लगे । उसका योग शरीरी काम व्यवहार जस्सी को मानों अनन्त आकाश में उङाकर बादलों के बीच ले गया । वह खुली सङक की परवाह किये बिना जोर से कराह रही थी । सीत्कारें भर रही थी । प्रसून उसके स्तनों को बेतरह मसल रहा था । उसके मोटे होठों में दबे उसके सुर्ख रसीले अधर उत्तेजना से फ़ङफ़ङा रहे थे । वह काँटे में फ़ँसी मछली की तरह तङफ़ रही थी । पर उसकी मजबूत पकङ से छूट नहीं पा रही थी । और वह छूटना भी नहीं चाहती थी । उसकी संकरीली संकुचित दरार यौवन रस से पूर्णतः नहा गयी थी । उसमें किसी प्यासी झील के समान तूफ़ान सा मचल रहा था । इस तूफ़ान को परास्त कर देने वाले किसी साहसी नाविक की उसे तीवृ जरूरत हो रही थी । वह मानों आधी रोती हुयी सी सिर्फ़ प्रसून ..ओ प्रसून..क्विक..किल मी.. डियर ही मुश्किल से कह पा रही थी ।
पर योगी ने अभी वीणा के तार सिर्फ़ छेङे भर थे । उसके संगीत का सा रे गा मा अभी शुरू ही हुआ था । उसका शरीर ही किसी यन्त्र की तरह क्रियाशील हो रहा था । पर आंतरिक रूप से वह एकदम शान्त था । और अपने केन्द्र में निर्विकार भाव से स्थित था ।
जिन्दगी का क्या पता । जस्सी उसे आगे कभी मिले ना मिले । इसलिये जब उसने खेल शुरू कर ही दिया था । तो उसे इन लम्हों को जस्सी की जिन्दगी के लिये यादगार तोहफ़ा बना देना था । एक ऐसा तोहफ़ा । जो सिर्फ़ कोई सशक्त योगी ही दे सकता था । कोई बलिष्ठ इंसान भी कभी नहीं ।
- मैं मर.. जाऊँगी । वह अस्फ़ुट स्वर में बोली - मैं मर रही हूँ । प्लीज..बचा लो मुझे । मैं बहुत ..प्यासी हूँ ।
क्या चाहती है । एक लङकी ऐसे क्षणों में । क्या चाहती है । सदियों से भटकती । प्यासी औरत ऐसे क्षणों में । वह अच्छी तरह से जानता था । और तब उसके यन्त्र शरीर से कोमल भावनाओं वाला प्रेमी उतर गया । और एक पूर्ण खिलाङी पुरुष आवरित हुआ । उसने जस्सी को किसी खिलौने की भांति हाथों में उठाकर सीट पर सही स्थिति में बलपूर्वक झुकाया । और झटके से उसकी जींस नीचे कर दी । एक कठोरता । एक निर्दयता । एक वहशीपना । उसके स्वभाव में भर गया । उसने जस्सी की गुलाबी चड्ढी इस अन्दाज में उतार फ़ेंकी । मानों कोई बच्चा डौल पर गुस्सा कर रहा हो । और तब आसमानी झूले की भांति हवा में ऊपर नीचे होती जस्सी ने उसका कठोर स्पर्श अपने विशाल नितम्बों पर महसूस किया । वह आनन्द से कराह उठी । एक तप्त लोहा सा उसके अन्दर समा गया । वह किसी क्रोधित हुये बालक के समान उसे खिलौना गुङिया की तरह तोङे डाल रहा था । बार बार उसके अंग तोङ रहा था । और फ़िर फ़िर जोङ रहा था । एक दहकती मोटी सलाख सा अहसास उसके नारीत्व को तपा रहा था । उस तपन से सहमी सी भयभीत सी वह बार बार बरखा सी बरस रही थी । सब मर्यादायें तोङकर बह रही थी । पर वह किसी क्रोधित नाग की तरह फ़ुफ़कारते हुये दंश पर दंश दिये जा रहा था । और कोई रहम करने को तैयार नहीं  था । एक बार । दो बार । तीन बार ।..पांच बार ।
तव वह वास्तविक रो पङी । हाथ जोङ गयी । अब नहीं । और नहीं । बस । मुझ पर रहम करो । मैं तुम्हारी दासी हूँ । प्लीज नार्मल हो जाईये ।
वास्तव में वह पूर्णतया शान्त था । सामान्य था । निर्लेप था । निर्लिप्त था । योगस्थ था । जिसे वह मानवी भला कैसे समझ सकती थी । योग पुरुष का अंगीकार । एक साधारण लङकी कैसे कर सकती थी । उसकी क्षमता बहुत सीमित थी । ये अप्सराओं योग स्त्रियों का मामला था । वे ही इसको आत्मसात कर सकती थी । वह जान बूझकर अपनी मर्दानगी उस कोमल बाला पर नहीं दिखा रहा था । ये उसके योग शरीर की सहज सामान्य क्रिया थी । जिसे वह दो मिनट के साबुन के झाग से बने बुलबुले के समान वासना क्षमता रखने वाली वह मानुष देही जस्सी भला कैसे बरदाश्त कर पाती । तब उसने प्रयत्न करके खुद को सामान्य किया । और तब जस्सी को उसके प्यार में भीगने की अनुभूति होने लगी । भीषण गर्मी के तेज से दहकती जमीन पर जब वह झूमते बादलों के समान बरसा । तब उसका अंग अंग तृप्ति से भर उठा । वह भयभीत बालक के समान उससे चिपक गयी । उसकी आंतरिक मांसपेशियों ने इस अलौकिक प्रेमी के पुरुषत्व को पूरी भावना से एकाकार होकर जकङ लिया । भींच लिया । मानों किसी कीमत पर । और कभी भी जुदा नहीं होना चाहती थी ।
यह जस्सी के लिये एक यादगार मिलन था । पर प्रसून के लिये एक सामान्य शरीरी आचरण । यह मिलन जस्सी के दिलोदिमाग पर अमिट होकर लिख गया था । पर उसके लिये ये एक सिगरेट पीने जैसा भर था ।
उसने एक सिगरेट सुलगाई । उसका ये प्रयास एकदम बेकार रहा था । कोई एक घण्टे तक निढाल जस्सी उसकी गोद में निर्वस्त्र पङी रही । पर कहीं कोई बाधा नहीं हुयी । कोई क्रिया नहीं हुयी । उसके तुक्के का तीर कहीं अंधेरे में व्यर्थ जा गिरा था ।
अंधेरा और गहरा उठा था । उसने रिस्टवाच में समय देखा । और गाङी स्टार्ट कर घर की तरफ़ मोङ दी । ये प्रयोग बेकार भी था । और कारगर भी था । अब वह 99% स्योर था । जस्सी की बाधा का कामभावना से कोई सम्बन्ध न था । वह बात कुछ और ही थी । फ़िर वह और बात आखिर क्या थी ? आखिर क्यों थी ?
क्या पता क्यों थी ।
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