रविवार, दिसंबर 18, 2011

लक्ष्मण रेखा 1

हरेक लङकी बङे अरमानों से अपनी जिन्दगी के हसीन सपने संजोती है । उसके सपनों में वह होती है । उसका प्रेमी होता है । और फ़िर वही पति होता है । एक सजा धजा सुन्दर सा घर होता है । उसके हँसते खिलखिलाते खूबसूरत गोल मटौल बच्चे होते हैं । और ऐसे ही भोग ऐश्वर्य की खुशियों के बगीचे में फ़ूलों की तरह मुस्कराती एक लम्बी जिन्दगी की इच्छा ही उसकी सबसे बङी इच्छा होती है । बिलकुल यही सब मंजरी सोचती थी । और उसे पूर्ण विश्वास था । ऐसा ही उसकी जिन्दगी में होगा ।
पर शायद ऐसा कभी नहीं होता । जीवन के रंग अजीव हैं । इसके रास्ते सीधे सपाट न होकर भूल भुलैया में भटकाने वाले हैं । कदम कदम पर जिन्दगी हर इंसान को एक ऐसे मोङ पर लाकर खङा कर देती हैं । जब उसकी समझ में नहीं आता । अब क्या करना चाहिये । और किधर जाना चाहिये । और इसका सही उत्तर देने वाला भी कोई नहीं होता ।
इंसानी जिन्दगी की इस रामलीला में उसकी चाहतों की कामलीला ऐसे विचित्र चित्र बनाती हैं कि हरेक कोई भौंचक्क सा रह जाता है । रामलीला । उसे भी रामलीला बहुत अच्छी लगती थी । जीवन के प्रत्येक उतार चङाव का उत्तर भगवान राम की जीवन कथा रामलीला में ही तो छुपा हुआ था ।
वह सीधी होकर लेट गयी । उसने आँखें मूँद ली । ये जिन्दगी भी एक तरह की रामलीला ही है । वह समय के पंखों पर सवार अतीत में उङने लगी ।
- सीते‍ऽऽऽ ! काले पहाङ सा विशाल दैत्य रावण बोला - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये सदा पछताना होगा ।
उस आन लगी रेखा से बाहर आते ही साधु से राक्षस में परिवर्तित हुआ रावण का ये प्रचण्ड रूप देखकर सीता घबरा गयी । और सूखे पत्ते की तरह थर थर कांपने लगी ।
मंजरी का कलेजा धक से रह गया । उसके सीने में छुपा दिल धाङ धाङ कर बजने लगा । उसने पालिका ग्राउण्ड की चहारदीवारी पर बैठे पुष्कर की तरफ़ देखा । वह न जाने कब से उसे ही देख रहा था । जैसे ही उसकी नजरें उससे मिलीं । उसने एक गुप्त इशारा किया ।
वह सिटपिटाकर फ़िर से सामने देखने लगी । स्टेज पर लटके दर्जनों बल्बों पर तमाम पतंगे मंडरा रहे थे । और इस आधुनिक शमा पर किसी प्राचीन परवाने की तरह से गर्म बल्ब से झुलसकर तत्काल मृत्यु को प्राप्त होते थे । 


इस निश्चित अंजाम को प्राप्त होते उन्हें नये परवाने देखते थे । फ़िर भी भयानक मौत की परवाह न करते हुये वे रोशनी के दीवाने एक एक कर सूली पर चढते जाते थे ।
मंजरी के दिलोदिमाग में ऐसे ही अशान्त कर देने वाले विचारों का तूफ़ानी कोलाहल सा उठ रहा था । फ़िर रावण के संवाद ने तो मानों उसकी आत्मा को ही हिला दिया । उसे लगा । जैसे ये बात रावण ने सीता से न कहकर खुद उससे कही हो । कहीं वह भी तो नहीं पतिवृता की लक्ष्मण रेखा लांघने जा रही थी ।
उसने अपनी नाजुक कलाई में बँधी बहुत छोटे आकार की डिजायनर घङी पर निगाह डाली । बारह बजने में बीस मिनट बाकी थे ।
चारों तरफ़ घुप्प अँधेरा फ़ैला हुआ था । बस नगर पालिका के इस ग्राउण्ड में जो रामलीला मंचन के समय रात को आवाद रहता था । बल्बों का प्रकाश फ़ैला हुआ था । यह प्रकाश भी बेहतर मंचन प्रदर्शन हेतु सिर्फ़ स्टेज पर ही अधिक था । बाकी दर्शकों वाला स्थान लगभग अँधेरे में था । और वहाँ बहुत मामूली प्रकाश ही था । सभी दर्शक हजारों साल पहले घटित राम कथा का नाटय मंचन कई बार देखा होने के बाबजूद भी उसी उत्सुकता से देख रहे थे । मंजरी भी देख रही थी । और कुछ देर पहले तक उसके मन में कोई बात नहीं थी ।
पर अचानक ही उसके दिल में कोलाहल सा उठने लगा था । कितनी समानता थी । गर्म बल्ब से झुलसकर मरते इन पतंगों में । और रावण में । रावण भी देवी सीता की सुन्दरता का दीवाना था । और जान की कीमत पर उसे पाना चाहता था । जान की कीमत पर भी । जानकी जान की प्यासी है ।
लेकिन फ़िर भी उल्टा सीता को समझा रहा था । रामलीला का दृश्य आगे बढ चुका था । पर मंजरी के दिमाग में वही दृश्य अटका हुआ था ।
- सीते‍ऽऽऽ ! काले पहाङ सा विशाल दैत्य रावण उसके दिमाग में बोला - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये बहुत पछताना होगा ।
मंजरी का दिल एकदम जोरों से उछला । उसका समूचा अस्तित्व निकलकर स्टेज की सीता में समा गया । अब उसके सामने ही रावण खङा था ।
- मंजरीऽऽऽ ! उसके दिमाग में रावण की आवाज गूँजी - तूने इस लक्ष्मण रेखा के बाहर आकर बहुत बङी गलती की । अब तुझे इसके लिये बहुत पछताना होगा ।
वह अचानक ही बिना बात के हङबङा गयी । उसकी निगाह फ़िर से चहारदीवारी पर गयी । 6 फ़ुट ऊँची चहारदीवारी की लेफ़्ट साईड पर तमाम पुरुष लाइन से बैठे हुये थे । फ़िर चहारदीवारी के बाद ठीक गली के पार बनी मस्जिद की 11 फ़ुट ऊँची दीवाल पर भी जमा भीङ बेहद शान्ति से हरण कर ले जायी जाती सीता का विलाप देख रहे थे । पूरा रामलीला मैदान स्त्री पुरुषों की भीङ से भरा था ।

वह सोच में पङ गयी । सीता की सिर्फ़ एक गलती ने कितने बङे खेल को जन्म दिया । या रावण की सिर्फ़ एक काम चाहत ने लंका के हाहाकारी विनाश की नींव डाली । या काम पिपासु शूर्पनखा की कामवासना के चलते ये सब हुआ । या फ़िर कैकयी । या फ़िर दासी मन्थरा । आखिर कहाँ था । इसका सिरा सूत्र ।
जसराम पुर । पश्चिमी यू पी का एक छोटा सा शहर था । और लगभग 20 किमी दायरे में बसा था । आधुनिकता की तेज हवा के झोंके इस शहर में भी आने लगे थे । और कुछ ही साल पहले किसी विकसित गाँव जैसे लगने वाले इस शहर का तेजी से आधुनिकीकरण हो रहा था । फ़ैशनेवल कपङों में सुसज्जित हाथ में महँगा मोबायल थामे बाइक स्कूटी पर लहराकर निकलते हुये युवा लङके लङकियों के दृश्य दिखायी देना आम बात हो गयी थी । पर जसराम पुर अभी भी ग्रामीण सभ्यता के बेहद नजदीक था । और आसपास के 30 गाँवों के लगातार सम्पर्क में था । इसलिये यहाँ पर सब्जी दूध घी अनाज आदि जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण चीजों पर उतनी महँगाई नहीं थी । और सबसे बङी बात वे बहुत हद शुद्ध रूप में उपलब्ध थी । ये शहर किसी निरन्तर वाहनों की भागमभाग वाली रोड से भी नहीं जुङा था । सो यहाँ की हवा भी एक अनोखी ताजगी और दिल को सुकून सा पहुँचाती थी । बस महामारी फ़ैलाने वाली बीमारी की तरह फ़ैल गये केबल टी्वी और इंटरनेट ने तमाम स्थानों की तरह यहाँ भी मानसिक वैचारिक प्रदूषण फ़ैलाया था । और तमाम युवा लङके लङकियाँ उन्मुक्त सेक्स की लहरों में बहने लगे थे ।
उन्मुक्त कामवासना । वास्तव में वह भी तो रामलीला का सिर्फ़ बहाना करके शरीर में भङकती इस कामलीला की पूर्ति के लिये आयी थी । और 1 घण्टा पहले से ही रामलीला मैदान के बाद मस्जिद के पीछे  स्थित खेतों में पहुँच जाना चाहती थी । लेकिन उसे क्या पता था कि आज की रामलीला उसके दिलोदिमाग को झिंझोङकर रख देगी । वह बारबार उठना चाहती थी । पर जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसके पाँवों को जकङ दिया था ।
फ़िर उसने फ़ैसला किया । पुष्कर से सख्ती से मना करके सीधा घर चली जाती हूँ । जब मैं यहाँ होऊँगी ही नहीं । तो उसकी समीपता के अहसास से अन्दर उठने वाली कामवासना स्वतः शान्त हो जायेगी । न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी । ये सोचते ही उसके चेहरे पर अनोखी दृणता आ गयी । उसने फ़िर से दीवाल पर बैठे पुष्कर की तरफ़ देखा । पर अब वह दूसरी तरफ़ देख रहा था । लेकिन इसकी परवाह किये बिना वह उठी । और स्टेज के पीछे जहाँ महिलायें लघुशंका के लिये जाती थी । उधर तेजी से जाने लगी । स्टेज पर हरण होती सीता आन लगी लक्ष्मण रेखा लाँघने पर पश्चाताप करती हुयी करुण विलाप कर रही थी । और कामी राक्षस रावण मुक्त अट्टाहास कर रहा था - देखूँ अब तुझे रावण से कौन बचाता है । अब तू स्त्री की आन लक्ष्मण रेखा से बाहर आ गयी है सीता ।
कुछ ही देर में बारबार उसकी तरफ़ देखते पुष्कर का ध्यान अचानक उसकी तरफ़ गया । और उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौङ गयी । उसने दीवाल पर उल्टी तरफ़ पाँव घुमाये । और धप्प से नीचे कूद गया । फ़िर वह तेजी से मस्जिद के पीछे की तरफ़ बढा ।
मस्जिद के पीछे की तरफ़ बढती मंजरी का दिल जोरों से उछला । और हलक में अटक गया । काला घुप्प अँधेरा सांय सांय कर रहा था । सिर्फ़ सौ मीटर की दूरी पर लोगों की भीङ की भीङ जमा थी । पर यहाँ डरावना वीरान सन्नाटा पसरा हुआ था ।
वह दिन में कई बार इस स्थान पर आ चुकी थी । पर आज जैसी भयानकता उसे कभी महसूस नहीं हुयी थी । नगरपालिका की लेफ़्ट साइड चहारदीवारी के ठीक पीछे एक सङक थी । जो महज रामलीला स्टेज तक आकर खत्म हो गयी थी । गली के बाद बाँये हाथ पर मस्जिद थी । लेकिन उसकी भी पिछली दीवाल रामलीला ग्राउण्ड से भी सौ फ़ुट पहले ही खत्म हो जाती थी । मस्जिद के ठीक पीछे दो बङे खेत थे । फ़िर उनके बाद बाँये हाथ पर ही नदी आ जाती थी । नदी के बाद दूर दूर तक खेतों का अन्तहीन सिलसिला था ।
वह मस्जिद की दीवाल के ठीक पीछे पहुँच गयी । और तब अचानक उसे ख्याल आया । उसने यहाँ आकर भी गलती की । उसे सीधा घर जाना चाहिये था । और कल सल पुष्कर को बताना चाहिये था कि अब वह उससे कोई सम्बन्ध नहीं रख सकती । क्योंकि अब वह उसकी प्रेमिका नहीं । बल्कि किसी की विवाहिता है ।
अपनी यही सोच उसे उचित लगी । और वह घर जाने के लिये हुयी ।
तभी पीछे से किसी ने उसे बाँहों में भर लिया । और कस कर भींचने लगा । वह एकदम से हङबङा गयी । उसकी जबान मानों सिल ही गयी । पुष्कर में काम प्रवाह अनियन्त्रित होकर बह रहा था । वह मंजरी के स्तनों को सहलाने लगा । और बेहद उतावले पन का परिचय दे रहा था । एक अजीव सी मुर्दानी बदबू भी उसे अपने इर्द गिर्द महसूस हो रही थी । पर सब कुछ अचानक सा था ।
स्थिति एकदम उसकी सोच के विपरीत हो गयी । वह सोच रही थी । पुष्कर से बात करते हुये रूखा बरताव करके उसके अरमानों पर तुषारपात कर देगी । पर उस दीवाने ने तो उसे कोई मौका ही नहीं दिया । और कुछ ही क्षणों में उसका ब्लाउज खोल दिया । नैतिक बोध जागते ही वह थोङा कसमासाई भी । और बोली -  छोङो मुझे । क्या कर रहे हो ये सब ।
- चुप रहो । वह अजीब से ठण्डे स्वर में बोला - मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।
वह कमजोर पङ गयी । वह सच ही तो कह रहा था । फ़िर भी वह तर्क देना चाहती थी । पर प्रेमी उसे मौका ही नहीं दे रहा था । और बे सबरा सा उसके अंग प्रत्यंग को सहलाये जा रहा था । नैतिक बोध उसे रोक रहा था । और शरीर की भङकती भूख तङपते प्रेमी के आगे समर्पित सहयोग करती चली जा रही थी । इन दोनों के मध्य उसका अंतर्मन आगे पीछे जाते झूले की भांति झूल रहा था । इसलिये दोनों के मध्य दबंग पुरुष के समक्ष बेबस औरत का सा व्यवहार जारी था ।
काले अँधेरे में काली कामनायें ही खेल रही थी । वे एक दूसरे को देख नहीं पा रहे थे । बस महसूस ही कर रहे थे । और तब उसने पुष्कर को उसके उन्मादी लक्ष्य पर महसूस किया । उसे तेज गरमाहट सी स्पर्श करने लगी । और उसका विरोध क्षीण होने लगा । पुष्कर का चेहरा उसके पुष्ट उरोजों से सटा हुआ था । लेकिन उसकी हङबङाहट उसे बारबार असफ़ल कर रही थी ।
तब उसमें एक साथ कई मिश्रित भावनाओं का संचार हुआ । उसका प्रेमी । उसका मिलन का वादा । कभी साथ गुजारे उनके प्रेम के मधुर क्षण । और इन सबसे अधिक शक्तिशाली । दो तपते जवान जिस्मों का संगम । एक दूसरे में समा जाने को तत्पर ।
उसके सुन्दर चेहरे पर उस घोर अँधेरे में भी उसके अन्दर की प्रेमिका मुस्कराई । और सहयोग करते हुये उसने उस अनाङी घुङसवार की लगाम थामकर सही रास्ता दिखा दिया । समर्पित औरत के प्रेम का लरजता स्पर्श । उसके नाजुक हाथ का साथ पाते ही उसमें अदम्य ऊर्जा भरती गयी । और वह कामना की गहराईयों में उतरता चला गया ।
उसका समस्त नैतिक अपराध बोध वासना की आँधी उङा ले गयी । और सब कुछ भूलकर वह अपने प्रेमी के साथ उस अरमानों की सुरंग में दौङने लगी । वह उछलकर उमंगो के घोङे पर सवार हो चुकी थी । और घोङा बेलगाम दौङ रहा था । उन्मुक्त । उन्मादी । पागल । आवारा ।
वह हाँफ़ने लगी । और कसकर पुष्कर के साथ चिपक गयी । उसने तेजी से उसे जकङ लिया । और उस घुङसवार की मजबूत टाप महसूस करने लगी । लेकिन हर दौङ की कोई न कोई मंजिल होती है । अश्वारोही ऊर्जाहीन हो चुका था । उसका संगठित हुआ काम अस्तित्व पिघलने लगा था । तब वह लावे के समान फ़ैलने लगा । अनोखी तृप्ति के अहसास से मंजरी की आँखें बन्द हो गयीं ।

लक्ष्मण रेखा 2

अगली रात । नौ बज चुके थे । वह बिस्तर पर लेटी हुयी थी । कमरे में अंधेरा फ़ैला हुआ था । आँखे बन्द होने के बाबजूद भी कल का दृश्य रह रहकर उसकी आँखों के सामने आ रहा था । एक औरत । दो मर्द । एक उसका प्रेमी । एक उसका पति । और शायद दोनों की एक ही ख्वाहिश । उसकी जवान देह को भोगना । जब तक वह जवान रहती । क्या उन दोनों में से कोई उसे वास्तविक प्रेम करता है । वास्तविक प्रेम । शायद नहीं ।
- देख मंजरी । उसके कानों में अपनी सहेली सोनी की आवाज सुनाई दी - मोस्टली ये दो हरेक की जिन्दगी में कभी न कभी आते ही हैं । एक प्रेमी । एक पति । कभी पति पहले आता है । तो कभी प्रेमी । पर आते निश्चित हैं । और ये दोनों कभी एक ही इंसान में नहीं होते । हो ही नहीं सकते ।
- लेकिन सोनी । वह हैरानी से बोली - मैं तो प्रेम का अनुभव करना चाहती हूँ । कोई ऐसा । जो मेरे दिल के तार तार छेङ दे । मेरे तन मन को उमंगो से भर दे । मुझे आगोश में लेकर आसमां में उङ जाये । चाँद तारे तोङकर मेरा आँचल सजा दे ।
- धत तेरे की । सोनी ने माथे पर हाथ मारा - साली गधी । अरे कोई तुझे बाग बगीचे में घुमाने वाला भी मिल जाये । कोई तुझे सेव अंगूर खिलाने वाला ही मिल जाये । उसको ही तू बहुत समझ । आसमान में जायेगी । पागल नहीं तो । मैं कहीं कवि न बन जाऊँ । तेरे इश्क में ऐ कविता ।
विचार प्रवाह से उकताकर उसने करवट बदली । और सोने की कोशिश करने लगी ।
19 को पार कर रही मंजरी गोस्वामी खूबसूरत देहयष्टि की मालकिन थी । और सोसायटी में डीजे गर्ल के नाम से मशहूर थी । वह एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी । और बङे परिवार के साथ साथ आर्थिक स्थिति से कमजोर थी । तब 15 वर्ष की आयु से ही वह आर्केस्ट्रा पार्टी से जुङकर नाचने गाने लगी । पर शायद पहले उसे अपनी ही खूबियों का पता न था । उसकी आवाज में वीणा की झंकार थी । तो देह में हिरनी सी लचक । 


उसके नृत्य में मोरनी की थिरक थी । तो अदाओं में बिजली की चमक । किसी को वह स्टेज पर उङती मैंना सी नजर आती थी । तो किसी को पंख फ़ङफ़ङाती हुयी बुलबुल ।
इन सब खूबियों के चलते उसका भाव बढने लगा । और जल्द ही वह सबसे महंगी आर्केस्ट्रा कलाकार बन गयी । धनाढय व्यक्ति किसी भी कीमत पर उसे अंकशायिनी बनाने के ख्वाव सजाने लगे । अप्रत्यक्ष उसके पास ऊँची कीमत के प्रस्ताव आने लगे । पर मंजरी भी खास स्वभाव वाली थी । देह को बेचने से उसे सख्त नफ़रत थी । उसकी सीमा सिर्फ़ गायन नृत्य प्रदर्शन तक ही तय थी । और इससे पहले कि ये सीमा टूटती । उसकी शादी मध्य प्रदेश में हो गयी । और सब कुछ पीछे छोङकर वह ढेरों अरमान लिये पिया के घर आ गयी ।
विचारों में खोयी हुयी मंजरी अचानक हङबङा गयी । उसने सीने पर तेज कम्पन महसूस किया । वह एकदम व्यर्थ ही डर सी गयी थी । उसने वायब्रेट करते हुये ब्रा में दबे स्लिम सेलफ़ोन को निकालकर काल रिसीव की ।
- क्याऽऽऽ ? वह चौंककर बोली - फ़िर..फ़िर..। ये क्या कह रहे हो तुम ?
दूसरी तरफ़ से पुष्कर की बात सुनकर उसके होश उङ गये । वह काफ़ी हताश निराश दुखी सा था । और अपनी बात कहे चले जा रहा था । पर अब उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । कुछ भी । वह तो मानों अज्ञात रहस्यमय भंवर में डूबती जा रही थी ।
वह कह रहा था । रात में जब वह हङबङी में मस्जिद के कोने से मुङा ही था । तभी उसे जमीन में गङे पत्थर की जबरदस्त ठोकर लगी । और वह मुँह के बल गिरा । उसका माथा फ़ट गया । वह काफ़ी देर अचेत सा पङा रहा । बहुत खून बह गया । किसी तरह वह घर पहुँचा । और अभी थोङा सुधार होते ही सीधा उसी को फ़ोन कर रहा है ।
बङी अजीव बात थी । उसे संवेदना प्रकट करनी चाहिये थी । पर उसके मुँह से बोल तक न निकल रहा था । उसके दिमाग में डरावनी सांय सांय गूँज रही थी । हे भगवान । वह अचानक उछल ही पङी । उस समय की सम्मोहक कामवासना में उसका ध्यान ही नहीं गया । अब तक की दिमागी उथल पुथल ने उसे सोचने का मौका ही नहीं दिया । और तब उसके समस्त शरीर में एक भयानक झुरझुरी सी दौङ गयी । वह मुर्दा जैसी बदबू । उसके स्पर्श का लीचङ अहसास । उसके स्पर्श का अजनबी पन । और..और उसका स्वर भी । सब कुछ अलग था । वह सब पुष्कर का हरगिज नहीं था । उस समय भी उसे झटका सा लगा था । पर वह किसी जादू से मोहित सी हो रही थी । और कामवासना में बही जा रही थी ।

वह बिस्तर पर उठकर बैठ गयी । और तेज तेज सांसे लेने लगी । वह पुष्कर नहीं था । फ़िर वह कौन था ?
एक अबूझ पहेली की तरह यह रहस्य उसके जीवन की किताब में लिख गया था । वह पुष्कर नहीं था । फ़िर वह कौन था ? पर इसका उत्तर दूर दूर तक उसके पास न था ।
लेकिन समय की इस किताब में यदि प्रश्न लिखे होते हैं । तो अगले पन्नों पर इनके उत्तर भी लिखे होते हैं । कभी ये उत्तर प्रश्न को सुलझा देते हैं । और कभी ये उत्तर किसी जिन्दगी को भयानक जंजाल में उलझा देते हैं ।
- तारा देवी । एक दिन काली मन्दिर का वह साधु उसकी सास से बोला - ये तेरी बहू है ना ।
अपना जिक्र आते ही उसके कान चौकन्ने हो गये । वह अपनी सास के साथ मन्दिर आयी थी । उसकी सास मन्दिर में बंगाली साधु के पास बैठी थी । जो बंगाली बाबा के नाम से प्रसिद्ध था । और वह ओट में बरामदे के पास पीपल के नीचे खङी थी ।
- हाँ स्वामी जी । उसे सास की आवाज सुनाई दी - ये मेरी बहू है । मंजरी । अभी साल भर पहले विवाह हुआ है । पहली बार इसे यहाँ लायी हूँ । बङे अच्छे और पवित्र भावों वाली हैं ।
वह तेजी से ऐसे स्थान पर गयी । जहाँ से वह दोनों को छिपकर देख भी सके । और सुन भी सके ।
साधु जैसे किसी गहरी सोच में डूब गया । उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें गहरा गयी । तारा हैरान थी । महात्मा उसकी नयी नवेली बहू को लेकर किस चिन्ता में डूबा हुआ था । वह आश्चर्यचकित सी उसके बोलने का इंतजार कर रही थी । पर वह जैसे शून्य 0 में चला गया था ।
- आखिर । तारा जब अपनी उत्सुकता न रोक सकी । तो व्यग्रता से बोली - बात क्या है महाराज ?  कुछ तो बतायें ।
- या देवी सर्व भूते । बंगाली साधु धीरे से बुदबुदाया - इसके परिवार की रक्षा कर ।
ये सुनते ही दोनों सास बहू के होश उङ गये ।
- क्या । तारा बौखलाकर बोली - ये क्या कह रहें आप ।
- सुनो देवी । साधु जैसे अपने में वापिस लौटा - अपने पुत्र और बहू को समझा देना कि अभी पति पत्नी व्यवहार न करें । तब मैं देवी की सहायता से इस बाधा का उपचार सोचता हूँ । तुम्हारी बहू पर पिशाच की छाया है ।
मंजरी को एकदम तेज चक्कर सा आया । और संभालते संभालते भी वह जमीन पर ढेर हो गयी ।
उत्तर मिल चुका था । मगर ये उत्तर बेहद भयानक साबित हुआ था । उसकी समस्त जिन्दगी में जहर घोल देने वाला उत्तर ।
वो मुर्दा जिस्म सी बदबू । मुर्दा स्पर्श का अहसास । और मुर्दे जैसा ही स्वर  - चुप रहो । उसे जैसे फ़िर से सुनाई दिया - मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।..चुप रहो । मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।..चुप रहो । मुझे रोको मत । ऐसे मौके बार बार नहीं आते ।
उसके साथ सम्भोग करने वाला पिशाच था । नदी में बहायी गयी ताजा ताजा लाश का उपयोग करके उसने उसके साथ मनमानी की । और ये ख्याल आते ही उसे अब अपने समूचे अस्तित्व से घिन आने लगती थी । उसके साथ एक मुर्दा देह द्वारा कामवासना की पूर्ति । उसकी जिन्दगी नरक हो गयी । उन्मुक्त मचलती पति मिलन की मांग पर प्रतिबन्ध लग गया ।
बंगाली बाबा उसका यथाशक्ति उपचार करने लगा । और जल्द ही हार मान गया । उसके चेहरे पर गहरी निराशा छायी हुयी थी ।
- मुझे दुख है देवी । वह एक महीना बाद दोपहर को उसके घर आकर बोला - मामला साधारण नहीं है । और मेरी पहुँच के बाहर है । पिशाच पोषित है । उसे महा दुष्ट दिनकर जोगी से पोषण मिलता है ।.. अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ । वह महान तान्त्रिक है । पर तामसिक वृति का है । उसने जंगल में अपना साम्राज्य कायम कर रखा है । हजारों ताकतवर हवायें उसके अधीन हैं । केवल भक्ति प्रसाद के चलते मैं जीवित रह सका हूँ । वरना उससे भिङने की मेरी सामर्थ्य नहीं थी । न है ।
तारा का मुँह खुला का खुला रह गया । दरबाजे के पीछे खङी मंजरी थरथर कांप रही थी ।
- पर बाबा । देवी माँ तो.. । अचानक बौखलायी सी तारा संभलकर बोली - कोई तान्त्रिक देवी से बढा हो गया ।
- माँ पर शंका मत करो । वह अफ़सोस भरे स्वर में बोला - पर उपचार के लिये कोई माध्यम चाहिये । कोई सशक्त योगी । जो जोगी के हर तन्त्र के तोङ को जानता हो । बल्कि मुँह तोङ जानता हो । उसके राज्य में उसी की पेश जायेगी । जोगी के पास उसकी अर्जित तन्त्र शक्तियाँ हैं । इसलिये लोहा ही लोहे को काटेगा ।
तारा में तो मानों कुछ सोचने समझने की शक्ति ही नहीं रही । वह एकदम दिमागी रूप से शून्यवत हो गयी ।
- बाबा । कुछ देर बाद अचानक वह होश में आते हुये बोली - वह जोगी महात्मा कहाँ रहते हैं । मैं उनके पास जाकर अपना आंचल फ़ैला दूँगी । दया की भीख माँगूगी । उनके चरणों में सिर रख दूँगी । अपनी बहू के जीवन का सुख माँगूगी । आप मुझे उनका पता दीजिये । वे मुझ अभागन पर अवश्य रहम करेंगे ।
बंगाली साधु के चेहरे पर घनी पीङा के भाव उभरे । वह इस घरेलू मामूली ज्ञान वाली औरत को क्या और कैसे समझाता । घोङा घास से कभी यारी नहीं कर सकता । अगर वह तामसिक स्वभाव का न होता । तो ऐसी वायु को पोषण ही क्यों देता । बूढा मरे या जवान । मुझे हत्या से काम ही जिसका सिद्धांत होता है । उस निर्दयी से क्या दया की उम्मीद रखी जाय । फ़िर भी तारा की जिद देखकर उसने जोगी का स्थान उसको बता दिया । शायद उसका सोचना सही ही हो । शायद जोगी को दया आ ही जाय । शायद ।

लक्ष्मण रेखा 3

पर शायद शब्द ही बङा अजीव है । इसमें हाँ और ना दोनों ही छिपी हैं ।
- हुँऽऽ । डरावना दिनकर जोगी एक उपेक्षित सी निगाह दोनों सास बहू पर डालता हुआ बोला - पर इस बात से मेरा क्या सम्बन्ध है देवी । भूत प्रेत पिशाच डायन चुङैल ये सब मेरे लिये काम करते हैं । मेरी प्रजा हैं । मेरे बालक हैं । तब मैं इनको पोषण देता हूँ । तो इसमें क्या गलत है । उन्हें पालना । उनकी सुरक्षा करना मेरा फ़र्ज है । तेरी बहू मेरे किसी पिशाच का शिकार हो गयी । तो उससे भी मेरा क्या सम्बन्ध है ।
ये...कहते कहते वह रुका । उसने मंजरी पर फ़िर से निगाह डाली - जरूर किसी दूषित स्थान पर असमय गयी होगी । तब यह प्रेत आवेश के नियम में आ गयी । तेरी सीता से गलती हुयी । जो वह लक्ष्मण रेखा से बाहर आ गयी । उसने इसको शिकार बना लिया । सृष्टि के नियमानुसार देह रहित जीव वृतियाँ ऐसे ही पोषण पाती हैं । उनकी भूख ऐसे ही तृप्त होती है ।..हाँ मेरा कोई गण नियम के विरुद्ध तेरे घर में गया होता । तेरी बहू पर छाया देता । तो उस नीच को अभी तेरे सामने ही जला देता । पर अभी तू बता । मैं क्या करूँ । क्या करूँ मैं ।
मंजरी सहमी सहमी सी छिपी निगाहों से उसे ही देख रही थी । काले तांबई रंग सा चमकता वह विशालकाय पहाङ जैसा था । और गोगा कपूर जैसी मुखाकृति का था । उस वीरान जंगल में उसकी उपस्थित आदमखोर शेर के समान थी । उसको देखकर अजीव सा भय होने लगता था ।
- महाराज । भयभीत हुयी तारा ने अपना आंचल फ़ैलाकर उसके पैरों में डाल दिया - मेरी बहू के मुख पर एक करुणा दृष्टि डालिये । इसके जीवन की अभी शुरूआत हुयी है । यह बहुत अच्छे स्वभाव की है । इससे जो भी गलती हुयी । उसके लिये मैं इसकी तरफ़ से क्षमा मांगती हूँ ।..पिशाच जो भी भोग मांगेगा । वह मैं उसको दूँगी । बाबा आज एक अभागन माँ । अपने पुत्र और पुत्र वधू के जीवन की आपसे भीख मांगती है । हाथ जोङकर मांगती हैं ।
जोगी विचलित सा हो गया । उसके खुरदरे सख्त चेहरे पर आङी तिरछी रेखायें बनने लगी । वह गहरी सोच में पङ गया । पिशाच को रोकने का आदेश देने से गणों में असन्तोष व्याप्त हो सकता था । वे उस पर जो विश्वास करते 


हुये सन्तुष्ट रहते हैं । उनमें अन्दर ही अन्दर बगाबत फ़ैल सकती है । दूसरे उसके एकक्षत्र कामयाब राज्य का जो दबदबा कायम है । उसमें असफ़लता की एक कहानी जुङ जाने वाली थी । फ़िर तो प्रेतबाधा से पीङित हर कोई दीन दुखी रोता हुआ इधर ही आने वाला था - महाराज उसे बचाया । तो मुझे भी बचाओ ।
- बाबाजी । तारा उसके विचार भंवर से उबरने से पहले ही बोली - साधु का जीवन ही दीन दुखियों पर उपकार के लिये होता है । अगर कोई गलती हुयी भी है । तो वो हम जैसे अज्ञानियों से होना स्वाभाविक है । और उसको क्षमा करना । आपका बङप्पन ।
जोगी भी आखिर तान्त्रिक से पहले एक इंसान ही था । सामने दया याचना लिये खङी नवविवाहिता लङकी । और उसके लिये दया की भीख मांगती वो अबला । उसको अन्दर तक झिंझोङ गयी । उसने गम्भीरता से भारी स्वर में " हुँ " कहते हुये सिर हिलाया ।
और बोला - ठीक है । अपनी बहू को लेकर जाओ देवी । अब पिशाच इसको छाया नहीं देगा ।
दोनों के चेहरे पर अप्रत्याशित खुशी की लहर दौङ गयी । तारा ने मंजरी को तेजी से संकेत किया । और वे दोनों उसके चरणों में झुक गयी - आशीर्वाद दें स्वामी जी ।
- अरे नहीं नहीं । कहता हुआ जोगी तेजी से पीछे हटा - ये क्या कर रही है तू । ठीक है । ठीक है ।
इंसान का जीवन भी एक अजब पहेली है । इसका एक प्रश्न हल होता है । तो दूसरा पैदा हो जाता है । दूसरा हल होता है । तो तीसरा उत्पन्न हो जाता है । फ़िर कभी कभी एक साथ ही कई प्रश्न पैदा हो जाते है । और कभी कभी तो ऐसा होता है कि पैदा हुये प्रश्नों का कोई हल ही नहीं होता ।
अपने एकमात्र पुत्र का मुँह देखकर जीती हुयी विधवा तारा की जिन्दगी भी ऐसे ही कठिन और अनसुलझे प्रश्नों से भरी हुयी थी । एक अबला औरत । और काले नाग से फ़ुंफ़कारते जहरीले प्रश्न । पागल कर देने वाले प्रश्न । क्या करे वह । कहाँ जाये । किसका सहारा तके ।
और फ़िर एक दिन...।
- अरे हत्यारे साधु । वह तेजी से जंगल में भागती हुयी चली गयी - ले अब मुझे भी मार डाल । तेरी छाती ठण्डी हो जाये । तूने मेरा घरौंदा तो उजाङ दिया । हाय ..अब मैं जीकर क्या करूँगी । निर्दयी मार डाल मुझे भी । छोङ दे ।

अपनी प्रेतों की सेना मुझ पर । अरे पिशाचों खून पी लो मेरा । अब मैं भी जीवित न रहूँगी ।
भयानक काली अंधेरी रात । समूचा जंगल सांय सांय कर रहा था । जिसमें घुसते हुये कोई जिगरवाला भी कांप जाये । तारा बेखौफ़ दौङी जा रही थी । वह प्रेतवासा में आ पहुँची थी । और उच्च स्वर में रोती चीखती जा रही थी ।
जोगी जलते अलाव के पास बैठा कच्ची मदिरा का सेवन कर रहा था । नशे की खुमारी उस पर चढने लगी थी । उसकी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थी । किसी शहंशाह की भांति बैठा हुआ वह कुछ दूर विचरते प्रेतों को देख रहा था कि अचानक दूर से आता नारी विलाप सुनकर चौंका । और झटके से खङा होता हुआ उसी तरफ़ आने लगा । लालटेन उसके हाथ में थी । फ़िर वह उसके पास आकर रुक गया । तारा अर्द्धविक्षिप्त सी छाती पीट पीटकर विलाप कर रही थी । वह हैरानी से उसे देखता रहा । पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया ।
- क्या हुआ । वह भौंचक्का सा बोला - क्या हुआ । तू इस तरह क्यों रो रही है ?
- अरे हत्यारे ! ये पूछ । वह दहाङ कर बोली - क्या नहीं हुआ । मैं बरबाद हो गयी । मेरा घर उजङ गया । मेरा इकलौता बेटा...। मेरा बेटा..बहू..। सब ..सब तेरे उस पिशाच की...। वो अब..। और ये सब..तेरी वजह से हुआ ।
जोगी हक्का बक्का रह गया । वह क्या बोले जा रही थी । उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । वह पागल सी हो गयी थी । और कुछ भी सुनने समझने की स्थिति में नहीं थी । वह किसी भारी सदमे का शिकार हुयी थी । क्या पिशाच ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया था । अभी वह कुछ समझ भी नहीं पाया था कि उसने खूँखार निगाहों से उसे देखा ।
- जोगी । अचानक वह सख्त होकर निर्णायक स्वर में बोली - याद रख भगवान भी कुछ है । वह दूर आसमान पर बैठा हुआ भी । चींटी तक की फ़रियाद सुनता है । उसके न्याय में देर है । पर अंधेर नहीं । तूने साधुता का अपमान किया है । इसलिये अब भी संभल जा । फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत ।
हे ऊपर वाले । वह आसमान की ओर हाथ उठाकर बोली - हे सच्चे शहंशाह । मेरी फ़रियाद कबूल कर । इस बाबा की वजह से मेरा घर उजङ गया । तू इसको जिन्दगी से उजाङ दे । अगर तू सच्चा है । निर्बलों का बल है । तो फ़िर आसमान पर मत बैठा रह । मुझ दुखियारी के लिये नीचे आ । तुझे आना ही होगा ।
जोगी अन्दर तक हिल गया । उसने गहरे असंजस में आसमान की ओर सिर उठाकर देखा ।

लक्ष्मण रेखा 4

आसमान में तेज गङगङाहट होने लगी । और कुछ ही पलों में ऊँचाई पर एक हैलीकाप्टर हवा में आकर ठहर गया । हैलीकाप्टर से एक रस्सा नीचे फ़ेंका गया । और फ़िर दो साये उस रस्से पर झूलते हुये से नीचे आने लगे । कुछ ही मिनटों में वे जमीन पर उतर गये । हैलीकाप्टर वापस मुङा । और दूर जाता हुआ आसमान के अँधेरे में खो गया ।
उतरने वालों में एक जवान युवक और युवती थे । उन्होंने अपने कन्धे से बैग उतार कर फ़ेंक दिये । और लगभग अँधेरे से घिरे उस स्थान पर मौजूद टार्च की सहायता से इधर उधर देखा ।
- वाह । युवती खुशी से उछलकर अंग्रेजी में बोली - कितनी सुन्दर जगह है ।
युवक ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और गम्भीरता से कश लगाने लगा । तभी दूर से आती हुयी वाहनों की हैडलाइट उन्हें नजर आयी ।
मध्य प्रदेश का घना जंगल - अमरकन्टक । ये जंगल बहुत घना है । और निर्जन भी । इसमें कई किस्म के पेङों की बहुतायत है । यहाँ बाँस बहुत हैं । बहुत ही घने बाँस के झुण्ड आम हैं । जंगल के अन्दर कही न कहीं जंगली बाघ भी है । अन्य वनों की तरह छोटे मोटे जानवर नहीं हैं । शेर अधिक हैं ।  इस विशाल जंगल के बहुत से अन्दरूनी रास्तों पर गाङी आदि नहीं जा सकती । अजीब से रास्तों के कारण पैदल ही चलना पडता है । अमरकन्टक में मौसम प्रायः हल्का बारिश टायप रहता है । अक्सर थोडी बहुत बूँदा-बाँदी होती रहती है । जंगल में दलदली क्षेत्र भी बहुत है । जहाँ बहुत गीली मिट्टी होती है । अगर कोई उसमें गिर जाये । तो बाहर नहीं निकल पाता । और अन्दर ही अन्दर  धँसता जाता है ।
इसी जंगल के पास से नर्मदा नदी गुजरती है । नर्मदा बहुत बङी नदी है । ये मध्य प्रदेश की सबसे बडी नदी है । इसके प्रारम्भ से लेकर अन्त तक । इसके रास्ते में बहुत से छोटे बडे जिले आते है ।
इसको सुन्दर जगह बता रही है । उसने सोचा । कितना भयानक वातावरण है । तमाम रात्रिचर जीवों कीट पतंगो की सयुंक्त डरावनी आवाजें गूँज रही हैं । हाथी जैसे प्रतीत होने वाले डांस मच्छर भनभनाते हुये आक्रमण कर रहे हैं 


। दूर दूर तक इंसान नजर नहीं आ रहा । आसपास खङे वृक्ष भी डरावने प्रेत से मालूम होते थे । और इस लङकी को ये सब इतना सुन्दर रोमांचक लग रहा था कि वह प्रफ़ुल्लित हो रही थी ।
अँधेरे को चीरती हुयी सी वाहनों की लाइट बिलकुल पास आती जा रही थी । और फ़िर वह दोनों गाङियाँ  उनके पास आकर रुक गयी । वह एक बङी । महंगी । और आलीशान कार थी । और दूसरी सूमो थी ।
- ईवनिंग सर ! दोनों को अभिवादन करने के बाद कार से निकले ड्राइवर ने सेलफ़ोन पर कोई नम्बर मिलाया । उसने कुछ सेकेण्ड तक बात की । फ़िर फ़ोन युवक की तरफ़ बढा दिया । संक्षिप्त में यस..ओके करते हुये उसने फ़ोन सुना । और वापिस कर दिया । फ़िर वे दोनों आदमी सूमो से वापिस हो गये ।
- प्रसून जी ! दोनों के कार में आने के बाद युवती बोली - इसी को कहते हैं ना । जंगल में मंगल । कल्पना करो । हम हनीमून कपल होते । तो सब कुछ कितना रोमांचक था ।
उसका दिल हुआ । जोरदार ठहाका लगाये । गाङी में रखी इमरजेंसी लाइट जलने से आसपास का अँधेरा दूर हो गया था । बैंगलौर से यहाँ तक का हेलीकाप्टर से सफ़र भी थकान युक्त और बोझिल था । लेकिन लङकी मनवांछित की प्राप्ति से ऊर्जा से भरपूर थी । और किसी उल्लसित बच्चे की भांति कोई थकान महसूस नहीं कर रही थी ।
 - लिली ! वह अपने मनोभाव प्रकट किये बिना ही बोला - तुम्हें अब जल्द शादी कर लेनी चाहिये । उससे पहले कि कोई प्रेत तुम पर आशिक हो जाये ।
लिली एक हालीवुड एक्ट्रेस की दूसरी शादी से उत्पन्न सबसे बङी पुत्री थी । और लास एंजिल्स की रहने वाली थी । वह 23 आयु को पार कर रही थी । पर न तो उसने अभी तक शादी की थी । और न ही उसका कोई ब्वाय फ़्रेंड था । उसकी माँ का वास्तविक नाम मारग्रेट था । और वह हालीवुड की सफ़लतम अभिनेत्रियों में से एक थी । उसका असली पिता भी हालीवुड फ़िल्म इण्डस्ट्री से जुङा था ।
अमेरिकन आवोहवा में पली होने के बाबजूद भी लिली विचित्र स्वभाव वाली थी । और आदमियों से सख्त नफ़रत करती थी । अक्खङ स्वभाव की लिली को आज तक कोई पुरुष स्पर्श तक न कर पाया था । जिसके पीछे सिर्फ़ एक खास वजह थी । एक चिढ थी । एक मनोग्रन्थि सी बन गयी थी ।
और वह थी । किसी भी लङके से हाय होते ही उसका दूसरा स्टेप लङकी के टाप में हाथ डालने का होता था । और थर्ड स्टेप सेक्स का । पागल साले कुत्ते । वह झुँझलाती । इससे पहले लङकी को समझने की कोशिश तक नहीं करते ।
लेकिन प्रसून के सम्पर्क में आकर पुरुषों के प्रति उसकी पूरी धारणा ही बदल गयी । प्रसून से उसकी सीधी सीधी कोई पहचान नहीं थी । बल्कि उससे उसकी मुलाकात मार्था के घर हुयी थी । प्रसून से मार्था का परिचय एक 


साइंटिस्ट के तौर पर था । और मार्था लिली की सबसे खास सहेली थी ।
- मार्था ! एक दिन लिली हैरत से बोली - ये तेरे घर में जो गेस्ट है । ये वाकई में इंसान ही है । या कोई एलियन है । या फ़िर रोबोट है ? ये आखिर चीज क्या है ?
- मुर्दा ! मार्था बालों को पीछे फ़ेंकते हुये बोली - चलता फ़िरता मुर्दा । या प्रकट रूप प्रेत ।
प्रेत शब्द सुनते ही लिली के दिल में घण्टियाँ सी बजने लगी । अब उसने गौर से उस हैंडसम को देखा । कन्धों तक फ़ैले लम्बे बाल । गजब की अंग्रेजों सी गोरी रंगत । उफ़ ! वह भी कितनी पागल थी । जो इसे अभी तक गौर से देखा नहीं था । बिलकुल हेल्दी माइकल जेक्सन सा वह कुछ दूर एक तरफ़ लेपटाप से फ़ालतू में उलझा हुआ था । तब । जब दो हसीन जवान लङकियाँ उस कक्ष में मौजूद थी ।
तब मार्था को गोली मारती हुयी वह उसकी तरफ़ गयी । और हाय किया । उसने शालीनता से मुस्कराते हुये प्रत्युत्तर दिया । और वापिस स्क्रीन देखते हुये माउस एडजस्ट करने लगा ।
अपनी अब तक की जिन्दगी में लिली की इससे अधिक बेइज्जती कभी न हुयी थी । उसने लिली को एक भरपूर निगाह देखना भी उचित नहीं समझा था । मार्था मन ही मन अट्टाहास करती हुयी जबरदस्ती होंठ भींचे सिगरेट सुलगाने लगी । आज आ ही गया ऊँट पहाङ के नीचे । उसने सोचा ।
वापस उसके पास आ गयी लिली के चेहरे पर भारी खिसियाहट के भाव मौजूद थे । मार्था अच्छी तरह से न सिर्फ़ उसके मनोभाव समझ रही थी । बल्कि उसे खूब मजा भी आ रहा था । आखिर वह सात साल से प्रसून के सम्पर्क में थी । और उसके स्वभाव को भलीभांति पहचानती थी ।
- सही हो तुम । लिली झेंपती सी बोली - वाकई मुर्दा । मार्था ! फ़िर वह फ़ुसफ़ुसाकर बोली - तूने इसे अन्दर से देखा है कभी ।  ये बाउंड्री के बाहर वाला सिक्सर तो नहीं है । बट यार ! वो पर्सन तो स्त्री पुरुष से भी अधिक रोमांटिक होते हो । उफ़ ! लगता है । पागल हुयी मैं ।
और तब न चाहते हुये भी मार्था का ठहाका निकल ही गया ।
- प्रसून जी ! तब वह अपेक्षाकृत कुछ ऊँची आवाज में लिली के माता पिता का स्क्रीन नाम बताती हुयी उस परिचय से बोली - ये मेरी सहेली लिली है ।
- ओह ! वह फ़िर से उनकी तरफ़ मुढा - नाइस टु मीट यू डियर । और वापिस की दबाने लगा ।
- लगता तो नहीं । वह झुँझलाकर बहुत धीरे बोली - खुश हुआ । भाङ में जा साले । ठीक बोली तू । मुर्दा ।
मार्था अच्छी तरह जानती थी । उसका सात साल का अनुभव था । जब भी वह उसके पास होता था । उसने कई बार संकेत किये थे । पर प्रसून ने उसे किस तक नहीं किया था । और सबसे बङी बात वह बेहद रहस्यमय था । वह उसके बारे में कुछ भी तो नहीं जान पायी थी । सिवाय एक भले इंसान । और कुशल बैज्ञानिक के ।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था । लिली जब उसे व्यर्थ ही हजारों हजार गालियाँ मन ही मन देती हुयी दूसरी बातों की तरफ़ ध्यान लगाने की कोशिश कर रही थी । तब यकायक प्रसून का ध्यान खुद ही उनकी तरफ़ आकर्षित हुआ । वे दोनों उच्च स्वर में बात कर रही थी । मानों झगङा सा कर रही हों ।
- लिली । मार्था उत्तेजित सी कह रही थी - तू शर्त लगा ले मुझसे । भूत प्रेत जैसी कोई चीज नहीं होती । यार दुनियाँ चाँद तारों पर पहुँच गयी । और तू प्रेतों की तलाश में लगी है । हद होती है किसी बात की ।
लेकिन लिली पर कोई असर न हुआ । इस मुद्दे पर वह एकदम शान्त थी । और जैसे पूर्ण निश्चिंत थी । यही वो पल था । जब दोनों की जानकारी के बिना प्रसून काम रोक कर उनकी तरफ़ देखने लगा था ।
- मार्था ! आज तू मेरी बात को नोट कर ले । लिली पूरी गम्भीरता से दृण स्वर में बोली - मैं तुझे भूत प्रेतों के होने का सबूत भी दूँगी । बल्कि संभव हो सका । तो दिखाऊँगी भी । क्योंकि मैंने उन्हें खुद देखा है । और कई बार महसूस किया है ।
इसी बात से प्रसून के कान खङे हो गये । उसने लङकी के स्वर में छुपी दृणता साफ़ महसूस की । और ये बात बहुत खतरनाक थी । एक और हँसता खेलता जीवन । अनजाने ही प्रेतत्व की ओर बढ रहा था । वन वे । जिस पर वापिसी का कोई आप्शन ही नहीं होता । और क्या पता । कितना बढ गया हो । तब योगी का नैतिक कर्तव्य जागृत हो उठा । और उसने सामान्य जिज्ञासा सी प्रदर्शित करते हुये उससे बातचीत शुरू कर दी । अब मार्था हैरान हो रही थी । एक तो पहले से ही पागल थी । और दूसरे के पागल होने की शुरूआत हो गयी ।
उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । नौ बजने वाले थे । लिली कार से बाहर निकल गयी थी । और उसी हल्के उजाले में इधर उधर चहलकदमी सी कर रही थी । प्रसून भी बाहर निकल आया । और निरुद्देश्य सा ही टहलने लगा । वह पहली बार ही यहाँ आया था । इस स्थान के बारे में लिली के किसी परिचित ने ही सुझाया था । प्रसून अभी बंगलौर में ही था । जब लिली उसे सूचना देकर आ पहुँची । फ़िर आनन फ़ानन प्रोग्राम तय हुआ । और दोनों यहाँ आ गये । यहाँ तक पहुँचने की सब व्यवस्था और गाङी आदि का इंतजाम भी उसी परिचित द्वारा कराया गया था ।
उसका खुद का यहाँ आने में कोई इंट्रेस्ट नहीं था । पर वह जानता था । लिली जिद्दी थी । और किसी भयानक मुसीबत में फ़ँस सकती थी । उसके मना करने की सूरत में वह किसी और साथी को चुन लेती । और दोनों प्रेत खोजी अभियान पर निकल जाते । प्रेत । क्या यहाँ वाकई प्रेत हो सकते हैं । प्रेतवासा जैसा कोई अनुभव अभी तक तो उसे नहीं हुआ था । और ये अच्छा ही था । वह लिली को दो तीन दिन घुमाता । और उसके दिमाग का फ़ितूर शान्त करके वापिस अमेरिका भेज देता ।
- लिली । फ़िर वह कुछ सोचता हुआ बोला - तुम वाकई खुशकिस्मत हो । जो तुमने न सिर्फ़ प्रेत को महसूस किया । बल्कि उसे देखा भी । इनफ़ेक्ट कभी मैं भी इस खोज के प्रति बहुत उत्सुक था । पर अफ़सोस । अभी तक प्रेत के नाम पर मैंने हाथी का बच्चा तो दूर । चींटी का बेबी भी नहीं देखा । कैसा था वो प्रेत । जो तुमने देखा ।
- तुम्हारे जैसा । वह सपाट स्वर में बोली - सच कहती हूँ । बिलकुल तुम्हारे जैसा । साला एकदम मुर्दा । मानवीय भावनाओं से रहित । और सुनिये मिस्टर प्रसून । मैं कतई खुशकिस्मत नहीं हूँ । बल्कि बहुत ही अनलकी हूँ । वो भी ओनली एण्ड अगेन ओनली तुम्हारी वजह से । न न चौंकों मत श्रीमान । अब तक अपनी जिन्दगी में आये प्रवेश के इच्छुक हजारों पुरुषों को मैंने देखना भी उचित नहीं समझा । अमेरिकन और हालीवुड संस्कृति में शायद मैं ऐसी एकमात्र लङकी हूँ । जिसे इस आयु तक एक स्वीट किस का भी अनुभव नहीं । फ़िर कौमार्यता की बात तो जाने ही दो ।
दरअसल खुद मुझे भी । मेरे लिये अज्ञात वजह से । मैं पुरुषों से घोर नफ़रत करती हूँ । हमेशा मेरा दिल करता है कि उन्हें एक क्यू में खङा करके गोलियों से भून दूँ । तुम विश्वास नहीं करोगे । इसी इच्छा पूर्ति के लिये मैंने चाइनीज जेलों में नौकरी हेतु एप्लाई किया था । बिकाज वहाँ मृत्यु दण्ड प्राप्त अपराधियों को गन से शूट किया जाता है ।
- ओ भगवन ! प्रसून जैसे थरथरा गया - शायद इसी को कहते हैं - खतरनाक सुन्दरी । वैसे प्लीज । मुझे सच बताओ । अभी यहाँ तुम कोई गन वन तो नहीं लायीं ।
- फ़िक्र न करो । वह लापरवाही से बोली - वैपन हमेशा मेरे पास होता है । पर आपको कभी नहीं मार सकती मैं । बिकाज तुम मेरे सबसे बङे दुश्मन हो । और दुश्मन के मर जाने से जिन्दगी का रोमांच ही खत्म हो जाता है । मैं तुम्हें परास्त करके रहूँगी । ये मेरी जिन्दगी का एक मुख्य उद्देश्य है । हाँ मैं तुम्हें मार के ही मानूँगी । पर किसी बुलेट के इस्तेमाल से नहीं । बल्कि अँखियों की गोली से । यौवन से । अदाओं से । और.. और अगर मैं हार गयी । तो ये पूरी स्त्री जाति की हार होगी । अपने तीन साल के तुम्हारे साथ सम्पर्क में । मैंने ऐसा अदभुत इंसान जिन्दगी में नहीं देखा । जिसकी मुझमें कोई जरा भी दिलचस्पी नहीं जागी । आखिर तुम अपने आपको समझते क्या हो । यू..यू..यू..डफ़र रास्कल ?
वह एकदम आश्चर्यचकित रह गया । क्या छुपा था । इस लङकी के दिल में । उसके प्रति । वो भी बिना वजह । शायद इसी को कहते हैं - आ वैल मुझे मार । ओह गाड । अपनी किसी मनोग्रन्थि के चलते ये साइलेंट मर्डर भी कर सकती थी । वह सच में उत्तेजित थी । तमतमा रही थी । और निसंदेह सामान्य हालत में नहीं थी । अच्छा हुआ । उसने अपने उदगार जता दिये थे । अब वह सचेत रह सकेगा ।
- ओ रिलेक्स लिली । वह प्रत्यक्ष शान्त स्वर में बोला - ऐसा कुछ भी नहीं हैं । तुम भी जाने क्या क्या सोच बैठी । मुझे तुम सुन्दर गुङिया सी लगती हो । आकर्षक लगती हो । पर मैं खुद हीनता से गृस्त हूँ । अपनी कुरूपता अहसास का बोध मुझ पर हमेशा हावी रहता है । इसके ही चलते मैं सुन्दर लङकियों को देखकर हमेशा नर्वस हो जाता हूँ । इसके ही चलते मैं तीस से ऊपर होने पर भी शादी न कर सका । दरअसल मेरी कुरूपता का बोध । किसी स्त्री की समीपता होते ही । मुझ पर बुरी तरह हावी हो जाता है । और तब मेरा शरीर । मेरी भावनायें । सब मुर्दा हो जाती हैं । तब मैं अपनी अभी तक तो न हुयी पत्नी के लिये भी बेकार ही हूँ । जबकि एक सफ़ल पति छोङो । पति वाली भी योग्यता मेरे पास नहीं । प्लीज तुम मेरी फ़ीलिंग्स कमजोरी समझने की कोशिश करो । बिना हथियार के युद्ध नहीं लङा जा सकता । युद्ध । तुम समझ रही हो ना ।
लिली के जबरदस्त अट्टाहास उस वीराने में गूँजने लगे । उसकी हँसी रोके ना रुकी । वह हँसती ही चली गयी । हँसती ही चली गयी । प्रसून बगलोल सा मुँह बनाये उसे हैरानी से देखने लगा ।
- वाकई । वह हँसी के बाद भी हँसते हुये ही बोली - वाकई अदभुत हो तुम । मार्था ने तुम्हारे बारे में सब कुछ सही ही बताया था । अरे बांगङू । तू कभी आइना नहीं देखता क्या । तुझे देखकर माइकल जैक्सन भी जिन्दगी भर के लिये अपने प्रति हीनता का शिकार हो जाता । तुम अगर रेड कारपेट पर एक बार पहुँच जाओ । तो ये हालीवुड के चिकने हीनता का शिकार हो जायें । तमाम हीरोइनें तुम्हारी एक झलक के बाद तुम्हें भूल नहीं सकती । कोई भी स्त्री तुम्हें देखते ही पिघलने लगती है । वह अपने अस्तित्व को भूल जाती है । और सिर्फ़ तुम्हारे लिये दिलोजान से मिट जाना चाहती है । साले ऐसा ही है तू । बिना बोले । बिना देखे । भङकाने वाला । आय.आय किल ..यू साले ।
उसने बेबसी से हथेलियाँ रगङी । अब उसे बेहद अफ़सोस हो रहा था । जो वह अपनी क्षणिक भावुकता के बहाव में उसके साथ आने का निर्णय कर बैठा । और अब जा भी नहीं सकता था । वह उससे बहुत कुछ कहना चाहता था । समझाना चाहता था ।
पर उस वक्त इतना ही कह सका - शायद इसी को अतिश्योक्ति वर्णन कहते हैं । प्रभावित इंसान की अति और अँधी भावना । पर वास्तव में यह तुम्हारी बहुत बङी गलतफ़हमी ही है । मैं सच कह रहा हूँ लिली ।
- ओके ओके । वह लापरवाही से बोली - अभी बहस बन्द करो । अब मैं सोने जा रही हूँ । और तुम मेरे सोने का कोई नाजायज फ़ायदा उठाने की कोशिश मत करना । क्योंकि जब भी मारूँगी । मैं ही तुम्हें मारूँगी । तुम नहीं । और याद रखना । लिली इतनी भी सिली नहीं । जो तेरी झूठी बातों पर यकीन कर ले ।
- नो नो नेवर । वह सहम कर बोला - मेरी इतनी हिम्मत नहीं । जो मैं ऐसी कोई जुर्रत करूँ ।
रात का यौवन खिलता जा रहा था । वह अँगङाई लेती हुयी निरन्तर जवान हो रही थी । लिली गाङी में जाकर शायद सो गयी थी । और वह पागलों के समान उस खुले वीराने में टहल रहा था । सब कुछ उसकी सोच के विपरीत था । चौंका देने वाला था । जिसे वह साधारण भूत पर्यटन समझ कर यूँ ही आया था । वह गम्भीर था । लङकी मानसिक रूप से एक प्रकार की विक्षिप्त थी । और कुछ भी कर सकती थी । कुछ भी ।
क्या कुछ भी ? पता नहीं । कैसे पता लगे ? इसका भी पता नहीं । इसका इरादा क्या था ? नहीं पता ।

लक्ष्मण रेखा 5

धीरे धीरे चाँद आसमान पर ऊपर उठता जा रहा था । चन्द्रमुखी कार में आराम से सोयी हुयी थी । पर प्रसून की आँखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था । एक लङकी की साधारण सी चाहत ने उसे गहरी उलझन में डाल दिया था । सर्प के मुँह में छछूँदर । न उगलते बने । न ही निगलते । लङकी मामूली हैसियत वाली नहीं थी । उसे कुछ भी हो जाने का मतलब था । पूरे शासन प्रशासन का हरकत में आ जाना । दोनों देशों में । बल्कि दुनियाँ में तहलका मच जाना । तमाम मीडिया की महीनों की चीख चिल्लाहट । तमाम पुलिस विभाग की हाहाकारी खोजबीन । और इस सबका पूरा ठीकरा उसी के सर फ़ूटना था । वह सबकी पूरी जानकारी में । एक साइंटिस्ट के तौर पर । न सिर्फ़ उसकी मेहमान थी । बल्कि उसके साथ थी ।
पर वह यह सब क्यों सोच रहा था ? उसने अपने आपसे ही प्रश्न किया । ऐसा क्या हो सकता था ?
कुछ भी । उसने स्वयं ही जबाब दिया । अब उसका अनुभव कह रहा था । लिली अर्द्ध विक्षिप्त थी । एक विशेष प्रकार की पागल । जिसे उसके आसपास के लोग कभी नहीं समझ पायेंगे कि वह खास पागल है । दरअसल इस लङकी का भीङ में बने रहना । व्यस्त रहना ही इसका कुदरती इलाज था । या फ़िर । अगर रोग प्रकट होने लगे । तो कोई मनोबैज्ञानिक इलाज । किसी भी पुरुष की एकान्तमय निकटता में उसका रोग प्रकट होना ही होना था । तब जबकि वह पुरुषों से घोर नफ़रत करती थी ।
उसे चक्कर सा आने लगा । बल्कि घनचक्कर आने लगा । ऐसी मुसीबत में वह कभी नहीं फ़ँसा था । उसके किसी भी कदम का जिम्मेवार वह होगा । ये कितनी अजीब बात थी । क्योंकि वह पुरुष था । वह उसकी मेहमान थी । पराये देश में थी ।
उसने व्यर्थ ही दूर तक निगाह डाली । अपनी उधेङबुन में फ़ँसा वह गाङी के इधर उधर दोनों दिशाओं में काफ़ी दूर तक हो आया था । गाङी के पीछे पूरब दिशा में कुछ ही फ़र्लांग दूर एक बङी नदी बह रही थी । जबकि गाङी के आगे पश्चिम में दूर दूर तक जंगली इलाका था । पर उस हिसाब से घने पेङों की अधिकता नहीं थी । और गाङी किसी ऊबङ खाबङ से मैदान में खङी मालूम होती थी ।
अब इस जाल से यकायक बचने का भी कोई उपाय नहीं था । उसने फ़िर से खुद ही सोचा । लिली को यकायक भी बीच पर्यटन में नहीं छोङा जा सकता था । तब वह और मनमानी करने वाली थी । और साथ रहने पर क्या कर बैठे

। इसका कोई भरोसा नहीं था । तब जबकि प्रसून के प्रति उसके ऐसे ख्यालात थे ।
उसके ऐसे विचारों के पीछे ठोस वजह थी । ये संयोग ही था कि प्रसून से उसकी नितांत अकेले में मुलाकात यहीं और पहली बार हुयी थी । और एकाएक उसके सानिंध्य से जब उसकी भावनायें जागृत होकर प्रकट होने लगी । तब उसे एकदम झटका सा लगा । और जब वह हजार डिग्री सेंटीग्रेड पर खौलते लावे के समान । पुरुषों के प्रति अपने मधुर इजहार बयान कर रही थी । तब वह वाकई अन्दर ही अन्दर कांप रहा था । उसने अपनी कलाकारी दिखायी थी । और उसके दिमाग से कनेक्ट था । और यह 440 के झटके दिमाग से ही निकले थे । न कि उसकी उपरली बातों से ।
- इस साले हीरो ने कोई हीरोगीरी दिखाई । तो फ़ौरन से पहले इसे शूट कर दूँगी । इसने मेरा आमन्त्रण स्वीकार नहीं किया । तो सोते समय इसको मार डालूँगी । इसने मुझे किस किया । तो इसे जान से मार दूँगी । इसने मुझे किस नहीं किया । तो सोते में इसका गला दबा दूँगी । इसने यस की तो भी मार दूँगी । नो की तो भी शूट कर दूँगी ।
ये दो विपरीत भाव पर एक ही एक्शन उसके दिमाग में था । बस उसी क्षण से प्रसून का दिमाग हवा हवाई उङ रहा था । वह प्रेतों की तलाश में आयी थी । जबकि प्रेत भी इतने भयंकर नहीं होते । और तब वह समझा । क्यों इसे प्रेत दिखे । क्यों इसने प्रेतों को महसूस किया । वह पागलपन की हद तक जुनूनी एकाकी औरत जिस भी स्थिति में होती थी । पूरी तीवृता में होती थी । फ़ुल फ़ार्म में होती थी ।
और अपनी दमित कुण्ठित असहज मानसिकता के चलते भयंकर रोग की चपेट में थी । आंतरिक रूप से वह आदमखोर शेरनी बन चुकी थी । और निश्चित ही वह डर से मिमियाता बकरा । इसका एक ही इलाज था । भरपूर रूप से पुरुष का प्यार । भरपूर ही शरीर सम्बन्ध । और उसकी हर इच्छा को स्वस्थ होने तक मानना । और ये सब भी उसे बेङियों में जकङ कर किया जाय । क्योंकि उसकी अजीब सी नफ़रत । करने और न करने । दोनों को लेकर थी । किया तो क्यों किया । नहीं किया । तो क्यों नहीं किया । ऐसी बढी  हुयी विकृत मनोग्रन्थि के बहुत कम केस होते हैं । और निश्चित ही इसका एक ही कारण था । पुरुष सुख से अब तक वंचित रहना ।
- हे भगवान ! वह आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर बोला - इसकी डाक्टरी के लिये । मैं ही आपको निमित्त जंचा । कुछ तो रहम किया होता मालिक ।
पर आसमान के शून्य 0 से कोई उत्तर नहीं आया । उसने घङी पर निगाह डाली । बारह बजने जा रहे थे ।
उसने एक नम्बर डायल किया । और ईयर फ़ोन कानों में लगा लिया ।
- ओह थैंक गाड ! उधर से मार्था बोली - आपको मेरी याद तो आई ।
- मुझे एक मुसीबत से निकालो । वह अजीब से स्वर में बोला - पहली उङान से इण्डिया आओ । ये मुसीबत

तुम्हारी वजह से मिली है । तुम आ जाओगी । तो शायद मैं जीता रहूँ ।
उधर से जल तरंग के समान मार्था के खिलखिलाने की आवाज देर तक आती रही । वह समझी । गहरा मजाक कर रहा है । पर वह सीरियस था । फ़िर मार्था भी चौंकी । उसे पता नहीं था कि लिली उसके पास है । वह अपने किसी प्रोजेक्ट में व्यस्त थी । किसी भी हालत में बीस दिन से पहले फ़्री नहीं थी । और मजे की बात । प्रसून लिली को लेकर टेंशन में था । इस बात से तो उसको बहुत ही हैरत थी । लिली का साथ होना तो मजे की बात थी । लेकिन अब उसकी टेंशन डबल हो गयी थी । वह मार्था को कुछ भी नहीं बता सकता था । और बताता नहीं । तो फ़िर पूछता क्या ? उसने तो यही सोचा था । उसके आने से बीमारी ही न रहेगी ।
- प्रसून जी ! फ़ुल एंजाय करिये । मार्था मादक स्वर में बोली - आप बहुत लकी हो । आप यकीन नहीं करोगे । हालीवुड स्टार्स को घास नहीं डालती । मुझे पक्का पता है । आज तक उसकी जिन्दगी में कोई मर्द नहीं आया ।...अच्छा उसका सामान्य व्यवहार । बङा ही अच्छा और नेक है । गरीबों बच्चों वृद्धों के प्रति बहुत ही दयालु । सबके प्रति बहुत ही सहयोगात्मक ।..उसकी शादी सेक्स आदि । ये अपनी अपनी सोच है । उसे शायद कोई अच्छा नहीं लगा । उसकी पर्सनल अन्य बातें भी हो सकती हैं । ओके डियर डाण्ट वरी । शीज गुड गर्ल । वेरी गुड गर्ल ।
उसने फ़ोन काट दिया । कुछ ज्यादा ही गुड गर्ल थी । तभी तो आराम से सो रही थी । और वह उल्लूओं की तरह घूम रहा था । मार्था से बात करके भी कोई बात नहीं बनी थी । कोई बात बननी भी नहीं थी । सिर्फ़ उसके आ जाने से वो बच जाना था । मार्था ठीक ही कह रही थी । उसमें कोई असामान्य वाली बात नहीं थी । दरअसल सामाजिक दायरे के मध्य ऐसे पागल बिलकुल सही नजर आते हैं । बल्कि आम लोगों की अपेक्षा वे अधिक मधुर मीठा व्यवहार करते हैं । जब तक उनके लक्षण पूर्ण वेग से न उभरें । इसलिये अब कोई पागल नहीं था । मार्था भी नहीं । लिली भी नहीं । उससे जुङे तमाम लोग भी नहीं । सिर्फ़ वह पागल था । एकदम बौङम था । जो अनजाने ही इस लफ़ङे में फ़ँस चुका था ।
थकान उस पर हावी होने लगी थी । उसका रात्रि योग का समय भी गुजरता जा रहा था । उसे अपने तमाम योग स्थल याद आ रहे थे । जहाँ पर समाधि में डूबा वह इस समय शान्त अनन्त असीम अंतरिक्ष में बाज की तरह उङते हुये तैर रहा होता । कहाँ वह अदभुत समाधि आनन्द । और कहाँ ये फ़ालतू की लमझेङ ।
वह धीरे धीरे टहलता हुआ गाङी के समीप आया । लिली आराम से सीट पर पसरी हुयी सो रही थी । और वाकई अपूर्व सुन्दरी लग रही थी । अभी तक सुरक्षित कौमार्य की आभा उसके चेहरे पर चमक रही थी । और हैरानी की बात थी । वह सब प्रकार की कामभावना से रहित सो रही थी । किसी छोटी सुन्दर मासूम लङकी की भांति । प्रसून के शरीर में अनजाने भय की झुरझुरी सी दौङ गयी । इस मासूमियत के पीछे क्या राज था । कौन जानता था । तूफ़ान आने से पहले की शान्ति । उसने कार के अन्दर जाने का इरादा त्याग दिया । और कार से एक शीट निकाल कर वहीं पास में जमीन पर बिछा कर लेट गया । उसकी आँखें बन्द होने लगी ।
योग और उस संक्रामक रोग के मिश्रित विचार स्वाभाविक ही उसके मन में आने लगे । तब योग रोग से जुङकर समाधान देने की क्रिया करने लगा । उसने अपने आपको हालात के सहारे छोङ दिया । उसे तांत्रिक लोक के उन सिद्धों की याद आ रही थी । जहाँ इसका उपाय शायद मौजूद था ।
स्मृति के शुरू होते ही चेतना क्रियाशील हो उठी । उसका आंतरिक शरीर प्राण समूह के साथ एकत्र होने लगा । और फ़िर वह अपने स्थूल शरीर से निकल कर सूक्ष्म शरीर से गतिशील हो उठा । कुण्डलिनी योग की एक विशेष क्रिया द्वारा वह उसी लेटी हालत में ही उस क्षेत्र में हैलीकाप्टर के पंखे के समान घूमता हुआ उठता चला गया । उसने खुद पर कोई नियन्त्रण करने की कोशिश नहीं की । और समग्र चेतना से जुङ गया । वह देर तक 25 किमी के क्षेत्र में गोल गोल इस तरह घूमता रहा । जैसे हैलीकाप्टर के पंखे के स्थान पर उसका शरीर हो । और बिना हैलीकाप्टर के सिर्फ़ पंखा ही आसमान में उङ रहा हो ।
और तब उसके दिमाग में स्वतः एक शब्द गूँजा - विश्वबन्धु । विश्वबन्धु एक उच्च स्तर का सह्रदय तांत्रिक था । और अब शरीर छोङ कर तान्त्रिक लोक में स्थान पा चुका था । उसने कुछ सोचा नहीं । कोई प्रयत्न नहीं किया । बल्कि योग की स्व स्फ़ूर्त क्रिया से सब होने लगा । और तब उसका शरीर किसी उङन तश्तरी के समान सीधा ऊपर उठता चला गया । और तांत्रिक लोक की सीमा में पहुँचकर खुद ही सीधा हो गया । फ़िर वह बर्फ़ पर फ़िसलने के समान तेजी से उस क्षेत्र में सरकता गया । जहाँ विश्वबन्धु का आलीशान निवास था ।
- खुश आमदीद बन्धु ! विश्वबन्धु बाँहें फ़ैला कर गले लगता हुआ बोला - आज तुम्हें देख कर कितनी ठण्डक सी महसूस कर रहा हूँ । बयान नहीं कर सकता । शायद नहीं । बल्कि निश्चित ही तुम अकेले आत्मा हो । जिसकी समीपता से मैं आनन्द महसूस करता हूँ । तुम इस विध्या के गौरव हो मेरे दोस्त । मुझे यकीन है । तुम जरूर अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त होओगे । अफ़सोस जो मैं न हो सका । अन्य नहीं हो पाते ।
एकदम साइलेंट जोन सी स्थिति को प्राप्त यह स्थान कई मायनों में अदभुत था । प्रसून कई बार यहाँ आ चुका था । यहाँ के तमाम तान्त्रिकों से उसका परिचय था ।  विधाता की अजीव लीला में ये तान्त्रिक लोक भी प्रथ्वी की तरह खास निर्मित था । यहाँ एकदम आलीशान बंगले भी आवंटित हुये थे । वहीं टूटे फ़ूटे खण्डहरों में भी छोटे तान्त्रिक निवास करते थे । अजीवोगरीब रहस्यमय भवन भी थे । और किसी बेहद प्राचीन सभ्यता के समान गली मकान भी । जगह जगह होते तान्त्रिक प्रयोग । नयी जीवात्माओं को स्थित करना । और तन्त्र क्रियाओं से उठता कसैला धुँआ । यहाँ आम दृश्य थे ।
- आओ मेरे साथ । विश्वबन्धु उसकी बात सुनकर बोला - मुझे नहीं लगता । इसमें चिन्ता वाली कोई बात है । योग के विलक्षण रहस्यों में ऐसे प्रयोगों से गुजरना ही होता है । पर ये प्रारम्भ है । बात कुछ और भी है ।
वह अपने भवन के एक हिस्से में बने चौङे हाल में उसके साथ आ गया । जहाँ दीवाल पर काफ़ी लम्बा चौङा तेल कालिख मिलाकर पोता गया दर्पण लगा था । उसके तन्त्र शुरू करते ही दर्पण पर दृश्य उभरने लगा । उस वैन का दृश्य । जिसमें लिली सो रही थी । विश्वबन्धु ने एक लम्बी मुठिया सी उठा ली । और दर्पण पर वैन के आगे सरकाता हुआ जंगल की तरफ़ ले जाने लगा । आगे का दृश्य देखते ही प्रसून के छक्के छूट गये । वह हाहाकार करने लगा । लङकी सिर्फ़ मोहरा थी । वाकई विश्वबन्धु ठीक कह रहा था - बात कुछ और भी है । बात कुछ और ही थी ।

लक्ष्मण रेखा 6

- कोई बात नहीं है । लिली खिलखिलाती हुयी बोली - और कोई बात ही नहीं है । बस बात इतनी ही है कि तुम एकदम नपुंसक हो । नामर्द साले ।..एक कुंवारी कली । एक महकती कली । तुम्हें सहज मिली थी । और तुम फ़्यूज बने रहे ।..ओह..ओ गाड । तुमसे बङा फ़ूल इस अर्थ पर नहीं होगा । निश्चय ही नहीं । साले तुम मेरी बातों में आ गये । डर गये । अरे औरत की ना का मतलब हाँ होता है । मैंने कहा । कुछ मत करना । इसका मतलब था । कोई कसर मत रखना । पूरी पूरी मनमानी करना ।
वह सिर्फ़ मुस्कराकर रह गया । अजीब ही है ये दुनियादारी । उसके मन में कुछ और था । और उसके मन में कुछ और ही था । पर वह हैरान था । विश्वबन्धु ने जो उसे दिखाया था । उसमें ऐसा क्या था । जो उसे पता नहीं लगना था । या जो उसकी ताकत के बाहर था । वह अगर लिली में न उलझा होता । तो जो बात उसे सबसे पहले पता लगनी थी । वो यही होती । तब इसमें रहस्य का एक ही बिन्दु बचता है । जो विश्वबन्धु की भूमिका को बता सकता है । वो यही कि समस्या से अलग हटकर प्रकृति में उसकी हलचल देखना । आखिर इस समस्या की वजह क्या है । और इसका स्व निदान क्या है । और प्रकृति जब उसे विश्वबन्धु के पास ले जाकर छोङ देती है । तब इसका साफ़ साफ़ मतलब है । उसका भी इस खेल में रोल बनता है । बन चुका था । विश्वबन्धु की बाहरी सपोर्ट । उसकी खातिर । लेकिन इससे उसकी समस्या खत्म नहीं हुयी थी । बल्कि उसे बङी और असली समस्या पता चली थी ।
- लिली । वह सोचता हुआ सा बोला - तुम अपना भूतिया पर्यटन कर लो । पर मेरे ख्याल से ये सिर्फ़ समय की बरबादी होगी । मेरे ख्याल से इससे बेहतर हम लोग हिमालय चलते है । वहाँ मैं तुम्हें कुछ सिद्धों से मिलाता हूँ । जो तुम्हें कुछ ठोस बतायेंगे । या फ़िर दिखायें..शायद ।
धीरे धीरे सुबह हो रही थी । अभी ठीक से सूरज नहीं निकला था । पर वह अपने सौन्दर्य की गुलावी आभा से दमक रही थी । उसमें कोई भी अजीब सा लक्षण नहीं था । वह बेहद गौर से पश्चिम के जंगली इलाके की तरफ़ देख रही थी । उसकी आँखें शून्य 0 में स्थिर थी । और वह गम्भीर हो रही थी ।
- प्रसून जी । अचानक वह बोली - हमें वैन उधर ले जाना चाहिये । उधर प्रेत हो सकते हैं ।

अगर वह कल विश्वबन्धु से न मिला होता । तो निश्चय ही इस बात पर हकबका जाता । पर अब ऐसी कोई बात नहीं थी । उसने अन्दर से चौंकते हुये भी इसे एक सामान्य बात की तरह लिया । और सहमति में सिर हिलाया ।
- मुझे । वह मधुर स्वर में बोला - बङी हैरानी है कि तुमने भूतों को देखा । कभी मुझे भी भूतों में बहुत दिलचस्पी थी । पर जहाँ तक मेरी जानकारी है । भूतों के बारे में साइंटिफ़िक बेस पर कोई प्रमाणिक विवरण अभी तक उपलब्ध नहीं । इसलिये बहुत माथापच्ची के बाद इसे मिथक मानते हुये मैंने छोङ दिया । इसलिये मुझे वाकई हैरानी है । जो तुमने देखा । भूत । वह कैसा था । डरावनी हँसी हँसने वाला नर कंकाल । या जैसा फ़िल्मों में भयानक सा चेहरा दिखाते हैं ।
- नहीं । वह दृणता से बोली - वह सब बकबास है । ऐसा कुछ भी नहीं था । कोई भी भूत  बिलकुल हमारे जैसा ही होता है । बस हम में और भूत में मुझे एक ही अन्तर नजर आया । मैंने खास जिस भूतनी को देखा था । उसे मैंने जीवित भी देखा था । और आफ़्टर डैथ भी । वह एक अधेङ गोरी अंग्रेज महिला थी । लेकिन जब मैंने उसे मृत्यु के बाद देखा । तब वह गहरे सांवले रंग की थी । उसकी आँखों में मुर्दनी छाई थी । और वह स्थिर थीं । वह अपलक घूरने के समान देखती थी । उसका  शरीर जल में प्रतिबिम्ब के समान नजर आता था । मतलब भासित छाया । जैसे कभी धुँधला । कभी उससे स्पष्ट । कभी एकदम स्पष्ट । ठीक उसी तरह । जैसे जल में बनती छाया वाले जल को हिला देने पर । उसके शान्त होने तक जितनी स्थितियाँ बने ।
उसने कहना चाहा । वह उसका दृष्टि भृम भी हो सकता है । पर उसके स्वर में छिपी दृणता ने उसे चुप रहने पर मजबूर कर दिया । लङकी ने उसे एकदम असहाय सा बना दिया  था ।
- मगर । फ़िर वह उत्सुकता प्रकट करता हुआ बोला - कोई बोलचाल । कोई बातचीत वगैरह ।
- हाँ । वह जैसे समय में वापिस लौट गयी - बातचीत । वह भी थी । जब मैं उसको देखते हुये उससे एक हो जाती थी । वह मेरे दिमाग में बोलती थी । और आगे जब मैं उसके प्रभाव में आ जाती । एक सम्मोहन सा हो जाता । तब उसकी आवाज बाहर भी स्पष्ट सुनाई देती ।
प्रसून आहिस्ता से कुछ सोचते हुये सिर हिलाने लगा । पर एक तरह से उसका दिमाग ही काम नहीं कर रहा था ।
- चलो माना । वह बोला - सब माना । मगर भूत होते है । और तुमने देखे भी हैं । पर उनसे तुम्हारा क्या वास्ता । वह इस दुनियाँ के सम्बन्ध से दूर हो गये । आखिर उनसे क्या चाहती हो अब ।
लिली ने इस तरह माथे पर हाथ मारा । जैसे उसके सामने दुनियाँ का सबसे बङा मूर्ख बैठा हो ।
- मेरा मतलब ? वह झुँझलाकर बोली - ये तुम क्या बोल रहे हो । इसका तो कोई मतलब ही नहीं हुआ । तुम एक साइंटिस्ट हो । और अगर किसी प्रयोग को सिद्ध कर लेते हो । फ़िर उसका क्या मतलब होता है ।
क्या अजीब बात थी । वह उसका आंकलन एक पागल दिमागी बीमार के तौर पर कर रहा था । और वह होशियारी में उसी के कान काटने पर तुली थी । तब उसने संक्षिप्त में ओके ही कहा ।
वह सुबह पाँच बजे ही उठ गया था । और अब सात बजने वाले थे । लिली ने रात भर भरपूर नींद ली थी । और एकदम फ़्रेश अनुभव कर रही थी । वह कब उठी थी । उसे पता नहीं था । जब वह रुटीन के बाद नदी से लौटा था । वह उसे बहीं टहलती मिली थी । अब पूरी कङियाँ एक दूसरे में उलझ गयी थी । और उसे तीन काम एक साथ करने थे । लिली की रिसर्च पूरी कराना । यानी उसके सिर से भूत का भूत उतारना । उसकी विचित्र मनोग्रन्थि को ठीक करना । और जंगल का रहस्य । जो शायद सबसे बङा काम था ।
उसने लिली की तरफ़ देखा । वह नदी पर पहुँच गयी थी । और शायद नहाने को उतर गयी थी । वह धीरे धीरे कदम बढाता हुआ वहीं पहुँच गया । लिली का फ़्राक किनारे पर पङा था । वह अंतःवस्त्र में मुक्त भाव से नदी की तेज लहरों में तैर रही थी ।
- फ़िर क्या प्रोग्राम है । वह वहीं बैठता हुआ बोला - आज किधर जाओगी ।
- फ़िलहाल तो । उसने उँगली से मादक इशारा किया - तुम पानी में आओ । देखो मुझे छूकर कैसी गरमाहट इसमें समा गयी है ।
इसकी बात मानने पर खतरा । न मानने पर भी खतरा । लेकिन जब ओखली में सिर डाल ही दिया । तो मूसलों से

क्या डरना । वह वस्त्र उतार कर नदी में कूद गया । तब वह वास्तव में उसे खतरनाक व्हेल के समान निगलने को तत्पर हो उठी । वह संयम और सतर्कता से उससे बचता ही रहा ।
अजीब थी लिली भी । वह कहीं नहीं गयी । और दोपहर दो बजे तक कार में ही रही । वह उससे ढेरों बातें करती रही । अपने बारे में । उसके बारे में । भूत प्रेतों के बारे में । पारलौकिकता के बारे में । और ये बहुत अच्छा था । बातचीत से उसकी विकृत मनोग्रन्थि खुलने लगी थी । उसके अंतर में अब तक वर्जित पुरुष घुलने लगा था ।
- प्रसून जी । वह एक लम्बी पतली सी सिगरेट सुलगाती हुयी बोली - मेरी एक अजीब सी सोच है । और ये सोच भारतीय धर्म ग्रन्थों से ही पैदा हुयी है । कहते हैं । जीसस अभी स्वर्ग में हैं । और जो भी जीसस से प्रेम करता है । वह स्वर्ग में जाता है । बट आफ़्टर डैथ । पर भारतीय धर्म ग्रन्थ कुछ अलग कहते हैं । इंसान जीते जी स्वर्ग में आ जा सकता है । अन्य दुनियाँओं में आ जा सकता है । वह भूतकाल में भी जा सकता है । और फ़्यूचर में भी । ये अदभुत है ना । भविष्य । जो अभी आया ही नहीं । उसकी यात्रा ।
तब मैं उसी योग पुरुष की तलाश में हूँ । जो जीते जी मुझे इन चाँद तारों में ले जाये । दूर गगन में उङाता फ़िरे । हम वायु के पंखों पर बैठकर मुक्त भाव से तैरते हुये रोमांस करें । और जाने क्यों । मुझे लगता है । वह तुम हो । एकमात्र तुम । मैं इस सृष्टि में सिर्फ़ एक पुरुष की दीवानी हूँ । जिसकी लगभग सभी दीवानी हैं । और वह है । भगवान कृष्ण । फ़िर क्यों ऐसा लगता है कि मेरी वो तलाश तुम पर आकर पूरी होती है । हे तुम्हें देखकर क्यूँ होती है । मुझे अजीव सी उत्तेजना । अबे स्साले..तू कुछ बोलता क्यों नहीं । मैं पागल क्यूँ हुयी जाती हूँ । क्यूँ लगता है । तुम यहाँ के नहीं हो । वहाँ के हो । हे ..क्यूँ भङकता है मेरा रोम रोम । कुछ तो बोल । दुष्ट मनुष्य । क्यों तेरे पास ही बेकाबू हो जाती हूँ मैं ।
वह हाँफ़ने सी लगी । उसने अपना टाप निकाल कर दूर उछाल दिया । और तेज तेज सांसे लेने लगी । उसका सीना तेजी से ऊपर नीचे हो रहा था । फ़िर वह प्रसून पर झपट पङी । और पागलों की तरह नोचने लगी । किसी खूंखार शेरनी के खतरनाक पंजो में दबे मेमने के समान वह इधर उधर होता रहा । और तब वह उसके दोनों गालों पर एक लय में थप्पङ मारने लगी ।
योगी योगस्थ हो गया । सात्विक हो गया । सत ऊर्जा उसके शरीर से बहने लगी । दिव्य किरणें उसके शरीर से फ़ूटने लगी थी । आज उल्टा हो गया । शमा परवाने पर गिरती हुयी जलने लगी । जैसे बरसों से दबा रहा ज्वालामुखी फ़टा हो । उसने कोई काम व्यवहार कोई काम चेष्टा नहीं की थी । बस दीवानी सी उसे झिंझोङती रही थी ।
फ़िर वह सुबकती हुयी सी उसके सीने से दुबक गयी । वह किसी शिकारी के तीर से घायल हो चुकी नन्हीं चिङिया की भांति सहमी हुयी सी उससे चिपक गयी थी ।
- प्रसून जी । वह बच्चों जैसी सरल भोली आवाज में बोली - आदमी बहुत खराब होता है । ये औरत को खिलौना समझता है । कभी भी उसका दिल तोङ देता है । मेली मम्मी ..को ना । वह रेप करता है । सिगरेट से जलाता है । मैं..वह चीखी - मार डालूँगी..साले को । उन सबको मार डालूँगी । नफ़रत है । उनसे मुझे ।.. स्साले ..मैं तुझे भी मार डालूँगी । प्रसून के बच्चे ।.. यू यू बास्टर्ड । तू मुझे यहाँ फ़ँसाकर लाया । पर मैं कमजोर नहीं हूँ ।
प्रसून जी । सच में ना । आप बहुत अच्छे हो । आप सबसे अलग हो । भगवान हो । कृष्ण भगवान । मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ । तुम मुझे मुरली सुनाओगे ना । तुम..तुम मुझे खूब..खूब प्यार करना । और कभी..कभी जरा भी दुख न देना ।
- ओह गाड । निश्चय ही तेरे खेल निराले हैं । उसने सोचा । और सिगरेट का कश लगाया । चार बजने जा रहे थे । लिली सामान्य हो गयी थी । और जिन पीकर सो चुकी थी । वह कार से बाहर आकर टहलने लगा ।
अगले पल । अगले दिन । अगले महीने क्या होगा । शायद कोई नहीं जान सकता । जो हुआ । सो क्यों हुआ । शायद ये भी नहीं । क्या सोचकर वह आया था । और क्या हो रहा था । आगे क्या होगा । ये भी पता नहीं था । अचानक वह पागलों की भांति जोर जोर से हँसने लगा । क्या अजीव गङबङ झाला थी । और वह कैसे लेना एक न देना दो होते हुये भी खामखाह ही फ़ँसा हुआ था । खामखाह । शायद नहीं । शायद हाँ । वह अभी लिली को उसके हाल पर छोङ दे । पता नहीं वह क्या हंगामा करे । उसके बारे में क्या बोले । तब जबकि वह रिकार्ड में बाकायदा उसकी मेहमान थी । उसके हर एक्शन का री एक्शन उससे जुङा हुआ था ।
और एक्शन । री एक्शन का ठीक वक्त आ चुका था । वह सो रही थी । और निश्चय ही दिमागी तौर पर शून्यवत 0 थी । उसने एक निगाह इधर उधर डाली । कुछ ही दूर पर शाल्मली का वृक्ष था ।
वह एकाग्र होकर उसके नीचे बैठ गया । और केन्द्रित होने लगा । सबसे पहले उसने कार के आसपास दो सौ फ़ुट की मर्यादा बाँध दी । फ़िर उसने लिली को तन्त्र से जोङकर प्रेतवायु से सुरक्षित कर दिया । अगला कदम उठाने से पहले वह कुछ ठिठका । और एक रहस्यमय निगाह पश्चिम के जंगल पर डाली । वह कुछ सोचता रहा । फ़िर उसने आँखें मूँद ली ।
- विश्वबन्धु । वह होठों ही होठों में बोला - क्या ये नियम के विपरीत न होगा ।
- नहीं । विश्वबन्धु बोला - वह तन्त्र ज्ञान का दुरुपयोग कर रहा है । तुम उसे अच्छा सबक सिखाओ ।
उसने सहमति में सिर हिलाया । और घूमकर जंगल की तरफ़ देखने लगा ।

लक्ष्मण रेखा 7

धीरे धीरे शाम गहराती जा रही थी । लिली सोकर उठ चुकी थी । और काफ़ी शान्त नजर आ रही थी । वह उस जगह को एक ऊब तिरस्कार और घृणा से देख रही थी । और जैसे असमंजस में थी कि आखिर वह यहाँ आ कैसे गयी ।
- प्रसून जी । एकाएक वह बोली - वापिस चलिये । बेकार है सब । कुछ नहीं रखा यहाँ । मैं हैलीकाप्टर बुलाती हूँ ।
वह रहस्यमय ढंग से मुस्कराया । दवा असर करने लगी थी । पर प्रत्यक्ष उसकी सहमति में सिर हिलाने लगा । एक नारी के दो रूप । ये बङा ही अजीब सा मामला था । क्योंकि लिली उसके साथ थी । अगर वह उसके साथ न होती । तो उसके लिये फ़िर ये कोई मामला ही न था । अगर वह सामान्य होती । तो बस थोङा सा टेङा मामला था ।
कुछ भी हो । सूत्र उसकी पकङ में आने लगे थे । अब उसे उनको सुलझाना भर था । अभी वह आगे कोई बात सोचता । उसे कुछ दूर उत्तर दिशा में एक रोशनी चमकती हुयी दिखाई दी । और उसी के धुंधले से प्रकाश में एक साया नजर आया ।
- भगवान पर विश्वास रखो । वह पागल सी दिखने वाली औरत बोली - वह एक दिन हर रावण को मार देगा । तब प्रथ्वी पर सतयुग होगा ।
लिली हैरानी से उसे देख रही थी । वह एक समाधि जैसे चबूतरे के पास टिकी बैठी थी । और उसी ने तेल से भरा वह बङा सा दिया जलाया था । वह बीमार थकी सी निढाल चौरे से लगी हुयी थी । और पश्चिम के जंगल की तरफ़ देख रही थी ।
- उधर । उसने पश्चिम की ओर उंगली उठाई - उधर रहता है । वह रावण । जो मेरी बहू को हर ले गया है । वह बहुत ताकतवर है । उसके प्रेतों की सेना बहुत बङी है ।...तू यहाँ से भाग जा बेटी - वह लिली को देखते हुये बोली - वह तुझे भी मार डालेगा । उसके प्रेत बहुत क्रूर हैं ।
प्रत्यक्ष प्रेत शब्द सुनते ही लिली के दिल में फ़िर झंकार सी गूँजी । उसके चेहरे पर गहन दिलचस्पी के भाव पैदा होने लगे । ये प्रसून के लिये काफ़ी राहत की बात थी । शायद अब यकायक वह जाने की जिद न करे ।
अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि एकाएक वह औरत फ़िर बोली - अरे मैं तो बताना ही भूल गयी । मेरा नाम तारा

है । पर लोग मुझे पगली कहते हैं ।..ये दिया देख रहे हो । ये मौत का दिया है । दिनकर जोगी की मौत का दिया । जिस दिन ये दिया जलते जलते बीच में ही अचानक बुझ जायेगा । उस दिन जोगी की मौत निश्चित है । दरअसल इस तंत्र दिये में तेल नहीं । जोगी का जीवन जलता है । और मैं इसे पूरे जतन से जलाती हूँ ।
प्रसून का सिर स्वयं सहमति में हिला । एक शान्त और सशक्त तांत्रिक प्रयोग । किसी अच्छे जानकार द्वारा सुझाया गया होगा । पर वह खुद लिली के साथ रहते अजीब से हालात में फ़ँसा था । इस औरत से क्या पूछे । कैसे पूछे । उसका दिमागी संतुलन भी सही नहीं था ।
कैसे रहस्यमय मोङ पर ले आयी थी जिन्दगी । रात के नौ बजने वाले थे । इस वीराने में वह दूसरी रात थी । और शायद कुछ भी नहीं हुआ था । और शायद बहुत कुछ हुआ था । वह मिनी गैस पर काफ़ी बना रहा था । लिली कार के सहारे टिकी हुयी खङी थी । उसके सामने बस एक खास अङचन थी । लिली का साथ । उसके हर कदम में यही सबसे बङी बाधा थी । और वह एक सामान्य लङकी की भांति उसे समझा बुझा भी नहीं सकता था । बस आगे वह क्या करने वाली है । यही देख सकता था ।
- प्रसून जी । अचानक वह बोली - मैं सोचती हूँ कि...
और यकायक ही वह सतर्क हो गया । वह घङी आ पहुँची थी । जिसका उसे इंतजार था । चार बङे प्रेत उधर ही आ रहे थे । और किसी सतर्क पुलिस दल की भांति चौंकन्ने से थे । लिली अकस्मात ही कुछ बैचेनी सी महसूस करने लगी । वह गौर से उसे ही देख रहा था । और प्रेतों को अनदेखा कर रहा था । वह ठीक उसी स्थान पर देख रही थी । जहाँ प्रेत थे । और कसमसाती सी कुछ कहना चाह रही थी । पर कह नहीं पा रही थी । प्रेत दो सौ फ़ुट बंध के पास आकर रुक गये थे । और आपस में कानाफ़ूसी सी कर रहे थे ।
- हे ..प्रसून प्रसून जी । लिली उँगली उठाकर बोली - शायद..शायद उधर प्रेत हैं । मेरा यकीन करो ।
वह इस तरह देखने लगा । जैसे बहुत आश्चर्य हो रहा हो । उसने लिली को दिखाते हुये बारबार देखने का असफ़ल अभिनय किया ।
और फ़िर निराश स्वर में बोला - मुझे कुछ नहीं दिख रहा ।
लिली उत्साहित थी । उसकी खोज सफ़ल हो रही थी । ये अवश्य था । उसने उन्हें बहुत हल्के रूप में महसूस किया था ।
- वह पागल औरत सही कह रही थी । वह खुशी से चीखती हुयी सी बोली - वहाँ प्रेत हैं । तुमने देखा । वह पश्चिम की तरफ़ से आये थे । मैं वहाँ जाना चाहती हूँ ।
जाना तो वह भी चाहता था । पर सवाल यही था कि उसके साथ रहते जाये कैसे । प्रहरी गण वापिस हो गये थे । दिनकर जोगी के लिये खतरे का सायरन बज चुका था । एक लक्ष्मण रेखा के समान योगी की आन लगा हुआ सशक्त बँध उसकी नींद हराम कर देने वाला था । ये उसके अखण्ड साम्राज्य को खुली चुनौती थी । इसलिये शायद युद्ध का बिगुल बज गया था । अब उसका अगला कदम क्या होगा । उसने सोचा । खुद उसका अगला कदम क्या होगा । उसने सोचना चाहा । पर कामयाब नहीं हुआ ।
बहुत देर बाद उसने एक सिगरेट सुलगाई । और गम्भीरता से लिली को देखा । जो बारबार उधर ही अभी जाने को जिद कर रही थी । पर उसने किसी तरह समझा बुझाकर उसे दिन के लिये राजी कर लिया था । क्योंकि आगे का जंगली क्षेत्र उसके लिये अपरिचित था । पर वह जानता था । दिन अभी बहुत दूर है । और तांत्रिको का असली दिन रात होता है । महान तांत्रिक दिनकर जोगी ।
और महान लोगों के लिये इंतजाम भी महान होते हैं । तब क्या विश्वबन्धु भी इस महान खेल में शामिल होगा । अब जो वह सोच रहा था । उसमें एक बङी समस्या थी । बङी अजीब बात थी । यदि वह लिली को शून्यवत 0 कर देता । और सारे खेल से वह अनभिज्ञ रहती । सोती सी ही रहती । तो फ़िर ये उस पर जुल्म ही होता । उसके भूत खोजी अभियान का भूत न उतरता । और उसका मानसिक उपचार भी न हो पाता । इसलिये उसे बङी सावधानी से एक ही तीर से सभी लक्ष्यों पर निशाना साधना था । लेकिन सबसे बङी बात थी । सभी स्थित परिस्थितियाँ जैसे उसके नियन्त्रण से बाहर थी । और परत दर परत रहस्य की भांति स्वयं खुल रही थी ।
ऐसे ही विचारों में वह वहीं आसपास टहल रहा था कि अचानक सतर्क हो उठा । जोगी तेज कदमों से उधर ही आ रहा था । प्रसून रहस्यमय ढंग से मुस्कराया । वह उसकी बौखलाहट देख रहा था । वह कार के समीप आ पहुँचा था 


। और वहाँ किसी बँध को न पाकर भौंचक्का सा था । बँध जो अब प्रसून हटा चुका था ।
लिली ने उसे आते हुये पहले ही देख लिया था । और वह उत्सुकता से उसे अपनी तरफ़ ही आते हुये देख रही थी । फ़िर उसके पास आते ही वह उछल ही पङी । और खुशी से चीखती हुयी बोली - प्रणाम स्वामी जी । मेरा नमस्कार स्वीकार करें । आपने पहचाना मुझे ।
वे दोनों भौंचक्के रह गये । जोगी को इस बात की कल्पना भी नहीं थी । वह आँखें फ़ाङे हैरत से उसे देख रहा था । बल्कि उन दोनों को ही देख रहा था । एक जवान लङका लङकी । एक आलीशान कार के साथ इस भूतिया वीराने में क्यों हैं । किस मकसद से है । एकाएक उसकी समझ में नहीं आया ।
- ये लिली है । प्रसून शालीनता से उसका अभिवादन करने के बाद बोला - और मैं इनका ड्राइवर ।
- नहीं नहीं । लिली जल्दी से बात काटती हुयी बोली - ये झूठ बोल रहे हैं । ये मेरे हसबैंड हैं । देखो जी साधुओं से झूठ नहीं बोलते । ये बहुत पाप है ।
दिनकर अपनी हालिया उलझन भूल गया । वह लिली को पहचानने की कोशिश में भी असफ़ल रहा था । और उसकी नयी समस्या थी कि वे आखिर यहाँ किस उद्देश्य से आये हैं ?
- इसको । प्रसून उसकी मनस्थिति को भांपता हुआ बोला - प्रेतों की खोज में बहुत दिलचस्पी है । मैंने बहुत समझाया । भूत प्रेत जैसा दुनियाँ में कुछ नहीं होता । पर इसका दावा है । इसने प्रेतों को देखा है । इसी को सिद्ध करने हेतु यह पवित्र भारत भूमि में किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में आयी है । जो आपके दर्शन के बाद लगता है । पूरी हुयी । मैं भी आपके दर्शन से धन्य हुआ महाराज ।
- आप लोग । जोगी कुछ सशंकित सा बोला - कब से यहाँ हो । और किसी अन्य को भी देखा इधर ।
- एकोहम द्वितीयोनास्ति । वह भावहीन स्वर में प्रथम उंगली उठाकर बोला - न भूतो । न भविष्यति । एक वही है । दूसरा अन्य है ही नहीं । न भूतकाल में था । न भविष्य में कभी होगा । फ़िर अन्य हम किसको देखते महाराज । ऐसा मैंने अखबार के धर्म पेज में पढा था । वैसे अभी अभी तो मैंने यहाँ सिर्फ़ आपको ही देखा है ।
जोगी की आँखें गोल गोल हो उठी । जैसे अचानक वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहा हो ।
- हुँ । फ़िर वह गम्भीरता से बोला - कोई बात नहीं । तुम लोग चाहो । तो कल दिन में मठ पर आना । मेरा स्थान बहुत दूर है । और अभी रात भी बहुत है । शायद उधर तुम्हें भय लगे ।
दाता ! उसने सोचा । एक तू ही करतार । जिसको वह अजीब झमेला समझ रहा था । उसकी कङियाँ खुद ब खुद जुङती जा रही थी । लिली की प्रसन्नता की कोई सीमा न थी । जोगी के जाते ही वह दौङकर प्रसून से चिपक गयी । और आँखे बन्द करते हुये अपने होठों को उसके होठों के पास कर दिया । वह फ़िर से अजीव मुश्किल में फ़ँस गया । लिली ब्रा नहीं पहने थी । सिल्की टाप में कसमसाते उसके सुडौल मखमली स्तन प्रसून के सीने से दबने लगे । उसके ह्रदय की तेज धङकन उसे अपने दिल की धङकन सी महसूस होने लगी । इंकार इकरार इजहार में से क्या किया जाये । इस लङकी के बारे में सोचना मुश्किल था । पासा पलट सकता था । खेल बिगङ सकता था । उसने लिली को बाँहों में उठाकर कार में डाल दिया ।
औरत । इस सृष्टि की सबसे अदभुत और सबसे खूबसूरत रचना । स्वयं प्रकृति देवी का रूप ही है औरत । पुरुष के प्यार में अपने तन मन को सदैव भिगोने की आंकाक्षा रखने वाली औरत । तब लिली के अन्दर भी वही औरत ही थी ।
कितनी गलतफ़हमी थी उसकी । वह शादी नहीं करेगा । औरत से दूर रहेगा । जीवन का लक्ष्य । आत्मा का रहस्य जानने में ही जिन्दगी बिता देगा । पर क्या ऐसा हो सका । औरत हर कदम पर उसके साथ थी । उसकी जिन्दगी में थी । नये नये रूपों में थी । शायद उसका सोचना ही उल्टा था । उसने सोचा । अगर वह शादी कर लेता । तब शायद एक ही औरत होती । पर शादी रहित पुरुष के जीवन में औरत का खाली स्थान पूर्ण करने को बारबार नयी औरत मौजूद थी । दरअसल औरत आदमी तो अर्द्धांग होकर एक दूसरे में अलग अलग होते हुये भी समाये हैं । फ़िर औरत से दूरी त्याग का ख्याल ही बेबकूफ़ाना है । यहाँ भी यही तो था । उसके योग में । सत्ता के कार्य निमित्त होने में । एक चमत्कार की भांति औरत मौजूद थी ।
उसने लिली की तरफ़ देखा । वह अधखुले कामुक नेत्रों से उसी की ओर देख रही थी । पर अब वह लिली नहीं थी । सिर्फ़ औरत थी । एक मनवांछित । खोये । पूर्ण पुरुष को युगों युगों से तलाशती औरत । और यह पुरुष एकान्त के बगीचे में ही मिलता है । वह बगीचा । जिसमें वर्जित फ़ल लगा होता है । कामफ़ल ।
उसकी जिन्दगी में अनेक औरतें आयी थीं । योग स्त्रियाँ आयी थी । पर एक सघन उपचार की आवश्यकता की भांति कामफ़ल की असली जरूरत सिर्फ़ इसे ही थी । पुरुषों से घोर नफ़रत का इलाज भी पुरुष ही था । जहर ही जहर को मारता है ।
उसके अन्दर आते ही लिली उसकी गोद में लेट गयी । उसके कपङे अस्त व्यस्त हो गये थे । उसका टाप ऊपर को खिसक गया था । और उसके अधखुले दूधिया स्तन बाहर झांक रहे थे । क्या अजीब बात थी । आज कामवासना का प्रयोग वह मानसिक उपचार हेतु कर रहा था । और इसकी पूर्णता के लिये उसमें भी कामवासना होना जरूरी थी । मधुर कामरस की पूर्ण मात्रा ही लिली की औषधि थी ।
उसने लिली की नाभि से नीचे हाथ सरकाया । और मजबूती से जमा दिया । बँधन में फ़ँसी कोई अदृश्य मेंढकी सी उसकी हथेली से दबी उछल कूद करने लगी । उसने लिली का टाप खोल दिया । कामफ़ल । कामरस से लबालब भरे । दो सुन्दर कामफ़ल । जिनके रस का निचोङ पुरुष को अनोखी पुष्टता से भर देता है । अदभुत ऊर्जा से भर देता है । उसकी बेलाग हरकतों से वह बैचेन हो उठी । बङा निर्दयी भंवरा था । एक बार में ही सब रस पिये जा रहा था । वह छटपटाकर उठ बैठी । उसने तङपकर उसके गले में बाँहें डाल दी । उसके अधर सूखने लगे थे । उनमें उत्तेजना से भरी प्यास जाग चुकी थी । उसने प्रसून को कोई मौका न दिया । और स्वयं ही उसके होठों से जुङ गयी । उपचार शुरू हो चुका था । उल्टा खेल । जिसमें वह एक निरीह लाचार गुलाम पुरुष की तरह उसका मनमाना उपयोग कर सके । इसलिये वह बहुत सावधान था । उसने अपने वस्त्र कब खोल दिये । ये लिली को पता न चला । वह उन्मुक्त सी उसे चूमे जा रही थी । तभी खिलाङी के कुशल हाथों से उसकी स्कर्ट खुलकर सरक गयी । अपनी इन्हीं चेष्टाओं के बीच उसने सीट को फ़ैला दिया था । मनमोहक कलाबाजियों के बीच काम नृत्य चरम पर था । काम रानी का दरबार सज चुका था । उसे पुरुष से नफ़रत और मुहब्बत का जजबाती फ़ैसला करना था । उसके दिल की अदालत में यह पुरुष की पहली पेशी थी । वह पुरुष । जिसे वह भरपूर नफ़रत करती थी । और शायद उसी नफ़रत का सिला कहीं भरपूर मुहब्बत थी । तब वह मुख्य अभियुक्त को देखने का लोभ न रोक सकी । उसने आँखें खोली । और बँधनों से मुक्त उस काले आजाद बलिष्ठ पुरुष को देखते ही वह कांप गयी । एक भय की सिहरन सी उसके समूचे अस्तित्व में दौङ गयी । उसके अंतर में चींटिया रेंगने लगी । एक डर भरी चाहत उसके अन्दर उमङने लगी । यही डर तो कहीं उसके अंतर्मन में छुपा हुआ बैठा था ।
- नहीं । वह कंपकंपाती आवाज में बोली - जाओ यहाँ से । मुझे नफ़रत है ।..नहीं.. नहीं आओ ।
खिलाङी के सधे हाथ उसके स्तनों पर जाकर ठहर गये । फ़िर किसी कुशल घुङसवार की तरह उसने घोङे को एङ लगाई । और घोङा वासना की घाटी में दौङता चला गया । उसकी कदम दर कदम मजबूत टाप उसके अस्तित्व पर चोट कर रही थी । उसकी नफ़रत का जहर बाहर बहने लगा । वह किसी कसाई की भांति उसके नफ़रती अस्तित्व का कीमा कीमा काट रहा था । उसकी बोटी बोटी रोम रोम उछल रही थी । बारबार वह एक आनन्दमय मूर्छा में चली जाती । पर जादूगर हर बार उसकी मूर्छा तोङ देता । ये घुङसवार अदभुत था । सो घोङा घाटी की तलहटी में नृत्य सा कर रहा था । उसकी टापों की ठक ठक चोट उसे बेहाल कर रही थी । उससे सहन होना मुश्किल हो रहा था । फ़िर वह अपने आपको रोक न सकी । और घायल कराहती हुयी सी बेहोश हो गयी । आनन्दमय मूर्छा । मरने की इच्छा । अस्तित्व का मिट जाना । वह धीरे से उससे अलग हो गया । और खुद को व्यवस्थित कर बाहर निकल आया । पूर्ण तृप्ति के अहसास में डूबी निढाल सी वह कहाँ विचरण कर रही होगी । कौन जानता था ।

लक्ष्मण रेखा 8

सुखिया सब संसार है । खावे और सोवे । यह कितनी अजीब सी बात थी । अपने घर से हजारों मील दूर वह इस वीराने में भटक रहा था । रात के बारह बजने वाले थे । लिली अब भी कार में ही पङी हुयी थी । सिर्फ़ उसको लेकर ही उसकी सारी अङचन थी । वरना यह काम आधा निबट गया होता । वह अदृश्य बेङियों की भांति उसके पैरों से जकङी हुयी थी । और उसे अकेले छोङने में भी उसे अज्ञात भय सा महसूस होता था ।
तब पहली बार उसका ध्यान उस औरत पर गया । क्या था । उस औरत का राज । जोगी से उसका क्या सम्बन्ध था । और तभी उसका ध्यान लिली पर भी गया । क्या वह जोगी से परिचित थी । उसने यह भी सोचा । क्या दिनकर जोगी । एक महान तांत्रिक । निरा माटी का माधौ है । जो उन दोनों की बात ज्यों की त्यों मानकर चैन से सोया होगा । और कल का इंतजार करेगा । अगर नहीं करेगा । तो क्या करेगा ।
क्या उसकी आज की रात भी बेकार जाने वाली है । यदि नहीं । तो फ़िर उसे क्या करना चाहिये । और फ़िर उसे यही उचित लगा । आज की रात वह फ़िर से तांत्रिक लोक जाये । और विश्वबन्धु से सलाह मशविरा करे ।
यह सोचते ही वह सक्रिय हो उठा । उसने देखा । लिली उसी हालत में सो गयी थी । पर उसकी कोई परवाह न करते हुये उसने गाङी का गेट लाक किया । और जगह बनाते हुये लेट गया । तांत्रिक लोक अधिक दूरी पर नहीं था । बस एक दो घण्टे में वह लौट भी आना था । उसने आँखे मूँद ली । और केन्द्रित होने लगा ।
तभी उसके दिमाग में खतरे का सायरन गूँजने लगा । तांत्रिक हमला । तीन तंत्र कमल हवा में तैरते हुये से उनकी तरफ़ आ रहे थे । तीन । दो । उन दोनों की मौत के । या मृत्यु सम आघाती । और एक परिणाम के बाद का वाहक । मतलब साफ़ था । जोगी ने प्रेतों की सूचना को हल्के नहीं लिया था । और उन दोनों की बातों पर कोई गम्भीरता नहीं दिखाई थी । ये उसके सख्त नियम होने का पक्का सबूत था ।
पर ये अहम भी बहुत अच्छा नहीं था । जब वह उसके किसी योग से जुङे होने को भांप रहा था । तो दोस्ती का हाथ बढाता । समझौते का रास्ता खोजता । उसने तो सीधा मौत का ही इंतजाम कर दिया था । उसने  सोती हुयी लिली के मासूम चेहरे पर निगाह डाली । और सावधानी से उसके सिर से एक बाल तोङ लिया ।
तंत्र कमल कार के शीशे से आकर ठहर गये थे । लक्ष्य पर आघात करने की शक्ति उनमें नहीं थी । उसने बाल को कुछ सेकेण्ड तक देखा । और हाथ से छोङ दिया । बाल तीनों कमल पुष्प को डण्डी रहित करता हुआ डण्डी के साथ ही जंगल लौट गया । डण्डी के ऊपर के फ़ूल प्रसून के हाथ में आ गये । अदृश्य जगत के अदृश्य फ़ूल । उसने तीनों फ़ूल लिली के बालों से बाँध दिये । फ़िर वह रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया ।
दिनकर कितना ही अहमी तांत्रिक हो । इस शक्तिशाली वार के खाली अपमानित होकर वापिस आने पर कितना ही तिलमिलाये । पर अब बौखलाकर कोई कदम नहीं उठायेगा । बल्कि अब तो वह फ़ूँक फ़ूँक कर कदम रखेगा । आज की रात उसकी नींद हराम हो चुकी थी ।

इसलिये आज की रात के लिये वह निश्चिंत था । उसने लिली पर एक निगाह डाली । और कुछ ही क्षणों में उसका आंतरिक शरीर अंतरिक्ष में जाने लगा ।
- विश्वबन्धु । वह उसके साथ चलता हुआ बोला - ऐसा कोई भी अभियान मुझे हमेशा ही नैतिक अपराध के बोध से गृस्त करता है । दिनकर हमारी बिरादरी का ही है । स्वाभाविक ही तंत्र मन्त्र शिक्षा की सफ़लता से उसका अहम प्रबल हो उठा है । उसे उचित मार्गदर्शन नहीं हुआ । उसकी जगह मैं होता । आप होते । तब हम भी यही करते । फ़िर उसके खिलाफ़ ये सब कितना उचित है ।
- वाह । विश्वबन्धु के स्वर में आदर और प्रशंसा थी - इसीलिये मुझे तुम्हारी मित्रता पर अभिमान है मेरे मित्र । इंसान कुछ भी क्यों न हो जाये । अगर उसके अन्दर का इंसान जीवित बना रहता है । तो वह सबसे बङा पूज्य है । इंसान का इंसान ही बने रहना बहुत बङी शक्ति होती है ।
मैंने तिलिस्मी दर्पण पर वह देखा था । किस तरह तुमने उसके मारण तंत्र को एक स्त्री के बाल से नष्ट कर दिया । ऐसी योग प्रतिभा कभी कभी ही हो पाती है । और इस सबके बाद भी खुद पर कोई गर्व नहीं ।
प्रसून ने एक गहरी सांस ली । शायद हर बात का उत्तर होता ही नहीं है । वह कुछ और ही कह रहा था । और विश्वबन्धु प्रत्युत्तर में कुछ और ही कह रहा था ।
- सिद्ध पुरुष । वह फ़िर से बोला - मेरा तात्पर्य कुछ और है । दिनकर जोगी जैसी सिद्ध आत्मा वर्षों की कङी मेहनत लगन और तपस्या से उच्चता को प्राप्त होती है । वह महान है । हजारों वायु शरीरों का नियन्ता है । वह सत्ता के कार्य में ही सहयोगी है । आखिर उसकी क्या गलती है । जो वह घोर दुर्गति को प्राप्त हो । उसकी तमाम मेहनत निरर्थक हो जाये । और अब फ़िर से झूठी प्रशंसा में समय मत गंवाना ।
- एक ही गलती । विश्वबन्धु उसकी बात समझकर गम्भीरता से बोला - जो प्रायः हर जीवात्मा करता है । अज्ञानता जनित अभिमान वश करता है । स्वयंभू होना । भगवान होना । अरे माना । वह गलती अज्ञान के वशीभूत करता है । तो फ़िर वह भोजन के स्थान पर मल क्यों नहीं खा लेता । जल के स्थान पर मूत्रपान क्यों नहीं करता । इस बात का बोध उसे कैसे है कि ये गलत है । उससे अपने प्रति गलती क्यों नहीं होती ।
सत्ता से शक्तियाँ जीव के परमार्थ लाभ हेतु हासिल होती है । न कि उनकी जिन्दगी उजाङने के लिये । ऐसे तो रावण भी हमारा ही बन्धु था । आप बताओ । देवी सीता ने लक्ष्मण रेखा खुद लांघी । या उसने विवश किया । मेरे मित्र । हर जीवात्मा अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा की मर्यादा में रहता है । तब दिनकर जैसे अधर्मी लोग उन्हें बाहर आने को विवश कर देते हैं । फ़िर तारा उसका मृत्यु दीप जला रही है । उस तंत्र का क्या परिणाम होगा । उसकी उम्मीद का दीपक क्या यूँ ही बुझ जायेगा ।
प्रसून को कोई जबाब न सूझा । इसीलिये शायद हर बात का जबाब होता भी नहीं है ।
विलक्षण है ये कालचक्र भी । कोई जिये । कोई मरे । कोई हँसे । कोई रोये । इसे किसी से कोई मतलब नहीं । सबका साक्षी बना हुआ ये निरन्तर गतिमान रहता है । कभी कोई सत्य इसके अतीत खण्ड में छिपा होता है । और कभी कोई सत्य इसके भविष्य काल में । अनवरत घूमता ये चक्र सभी घटनाओं पर रहस्य का आवरण चढाता रहता है । और तब सत्य के खोजी आगे पीछे की यात्रा करते हैं । यात्रा ।
उसने स्टेयरिंग घुमाया । और सिगरेट सुलगाते हुये समय देखा । सुबह के चार बजने वाले थे । कोई आधा घण्टे पहले वह प्रथ्वी पर आ गया था । सब कुछ उसकी आशा के अनुरूप ठीक ही था । लिली अब भी सो रही थी । उसे एक गर्मागरम चाय काफ़ी की जबरदस्त तलब हो रही थी । लेकिन फ़िर कुछ सोचते हुये उसने ये इरादा त्याग दिया । और गाङी स्टार्ट करके शहर के रास्ते पर दौङाने लगा । अन्दाजे से उसी रास्ते पर । जिस पर गाङी आयी थी । सब कुछ उसके लिये अपरिचित ही था । कोई एक घण्टे में गाङी मुख्य सङक पर आ गयी । तब उसने चाय के खोखे पर गाङी रोक दी । और आराम से बाहर आ गया ।
- तारा पगली ...तो साहब । दुकानदार उन दोनों को चाय का गिलास थमाता हुआ बोला - यहाँ प्रसिद्ध ही है । वह अक्सर सङकों पर घूमती चिल्लाती हुयी मिल जाती है - एक दिन ये रावण भी मरेगा । बहुत बुरा हुआ साहब । वह औरत पहले पागल नहीं थी । और तब उसे कोई जानता भी नहीं था । पर जब से सास बहू दोनों पागल हो गयीं । उन्हें सब जान गये ।...कुछ ही देर बाद । उसने एक तरफ़ उँगली उठाई - वो जो वाटर वर्क्स की टंकी है । वहाँ उसकी बहू घूमते हुये मिल जायेगी ।
- तारा के बेटे का । वह टंकी की तरफ़ देखता हुआ बोला - क्या हुआ । क्या वह..?


- ठीक कुछ पता नहीं साहब । चाय वाला चोर निगाह से लिली को देखता हुआ बोला - पर सुना है । वह कोमा जैसी स्थिति में है । और किसी धर्मार्थ संस्था द्वारा चलाये जा रहे अस्पताल में है । वह किसी दूसरे शहर में है ।...उनका घर । वह बताने लगा ।
अणुपुर । मध्य प्रदेश का अणुपुर जिला न तो बहुत बङा है । और न ही बहुत छोटा । इस जिले के गाँवों में देशी कल्चर है । और शहरों में विदेशी कल्चर । कस्बों में देशी विदेशी मिश्रित संस्कृति है । अणुपुर में हरियाली बहुत है । इसी जिले का एक बहुत छोटा शहर । राजपुरा । राजपुरा की आबादी कम है । अधिकतर मध्य वर्गीय लोगो का शहर है ये । अमीर इस शहर में हैं । लेकिन कम हैं । इसी राजपुरा नाम के छोटे से शहर से थोडा दूर एक और एरिया है । जिसे बस्ती कहते है । ये पुरानी बस्ती शहर भी नही है । गाँव भी नही है । इस पुरानी बस्ती को कस्बा कहें । या न कहें । समझ में नहीं आता । अलग सा ही एरिया है यह । यहाँ गरीब लोग या निम्न मध्य वर्गीय लोग ही रहते हैं । जैसे ड्राइवर । कसाई । नाई । दर्जी । मैकेनिक । आटो वाले । रिकशे वाले । रेहडी वाले । बहुत ही छोटी किस्म के दुकानदार । चपरासी आदि । ये बस्ती इस तरह के लोगों के रहने की जगह है । ये लोग सिर्फ़ इस बस्ती में रहते हैं । लेकिन काम काज, नौकरी आदि आसपास या दूर नजदीक के शहरों में जाकर करते है ।
पुरानी बस्ती थोङी सुनसान जगह पर है । आसपास कांटेदार झाङियाँ । जंगली पेड पौधे आदि हैं । यहाँ देह व्यापार करने वाली सेक्स वर्कर भी हैं । जो गरीब हैं । वो बस्ती में ही धन्धा करती हैं । जो निम्न मध्य वर्गीय लडकियाँ हैं । वो बस्ती से बाहर आसपास के शहरों में काम करती हैं । कोई लडकी ब्यूटी पार्लर में काम करती है । कोई बुटीक में । और कोई छोटी मोटी प्राइवेट जाब । कुछ लडकिया इस तरह की जाब की आड में सेक्स वर्क करती हैं ।
इनके सुन्दर गोरे चेहरे । तीखे नैन नक्श । सेक्सी कामुक आवाज । लम्बा कद । दिलकश फ़िगर । आकर्षक स्तन । और उभरे हुए नितम्ब सहज ही आकर्षित करते हैं । इस बस्ती में घटिया जादू टोना करने वाले लोग भी हैं । भले ही कम है । इनको तंत्र विधा तन्त्र शास्त्र आदि का कोई सही ग्यान नहीं । ये किसी छोटे मोटे काले इल्म से लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं । या यूँ समझो । ये भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।
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