गुरुवार, जनवरी 12, 2012

मंझ महल से ले चला ऐसा परबल काल ।

आस पास जोधा खड़े । सबे बजाबे गाल । मंझ महल से ले चला । ऐसा परबल काल ।
चहुं दिसि पाका कोट था   । मन्दिर नगर मझार । खिरकी खिरकी पाहरू ।   गज बन्दा दरबार । 

चहुं दिस ठाढ़े सूरमा । हाथ लिये हथियार । सबही यह तन देखता  । काल ले गया मार । 
हम जाने थे खायेंगे । बहुत जिमि बहु माल । ज्यों का त्यों ही रह गया  । पकर ले गया काल । 
काची काया मन अथिर । थिर थिर कर्म करन्त । ज्यों ज्यों नर निधड़क फिरे । त्यों त्यों काल हसन्त । 
हाथी परबत फाड़ते । समुन्दर छूट भराय । ते मुनिवर धरती गले । का कोई गरब कराय ।
संसे काल शरीर में । विषम काल है दूर । जाको कोई जाने नहीं । जारि करे सब धूर ।
बालपना भोले गया । और जुवा महमंत । वृद्धपने आलस गयो  ।चला जरन्ते अन्त ।
बेटा जाये क्या हुआ ।  कहा बजावे थाल । आवन जावन होय रहा । ज्यों कीड़ी का नाल । 
ताजी छूटा शहर ते । कसबे पड़ी पुकार । दरवाजा जड़ा ही रहा । निकस गया असवार । 
खुलि खेलो संसार में । बांधि न सके कोय । घाट जगाती क्या करे । सिर पर पोट न होय ।
घाट जगाती धर्मराय । गुरुमुख ले पहिचान । छाप बिना गुरु नाम के । साकट रहा निदान । 
संसे काल शरीर में । जारि करे सब धूरि । काल से बांचे दास जन । जिन पे द्दाल हुजूर ।
ऐसे सांच न मानई  । तिलकी देखो जाय । जारि बारि कोयला करे ।  जमते देखा सोय । 
जारि बारि मिस्सी करे । मिस्सी करि है छार । कहे  कबीर कोइला करे । फिर दे  दे औतार ।
काल पाय जब ऊपजो ।  काल पाय सब जाय । काल पाय सबि बिनिश है   ।काल काल कह खाय ।
पात झरन्ता देखि के । हंसती कूपलिया । हम चाले तुम चालिहो ।  धीरी बाप लिया ।
फागुन आवत देखि के । मन झूरे बनराय । जिन डाली हम केलि । सो ही ब्योरे जाय ।
मूस्या डरपे काल सों । कठिन काल को जोर । स्वर्ग भूमि पाताल में । जहाँ जाव तहं गोर । 
सब जग डरपे काल सों । ब्रह्मा  विष्णु महेश । सुर नर मुनि ओ लोक सब । सात रसातल सेस ।

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