रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 14

- नितिन जी ! अनुराग ऊपर आकर उसके सामने बैठता हुआ बोला - आप शादी के बारे में अपने विचार बताईये । आय मीन । इंसान को शादी करनी चाहिये । या नहीं ? ..हो हो हो..है ना हँसने की बात । क्या पागलपन का प्रश्न है ।
- देखिये । वह सामान्य स्वर में बोला - मैं इस बारे में कोई सटीक राय कैसे दे सकता हूँ । जबकि मैं स्वयं ही अविवाहित हूँ । और मुझे ऐसा कोई अनुभव भी नहीं है । फ़िर भी मनुष्य के अब तक इतिहास में शादी करने वालों के उदाहरण अनगिनत है । जबकि शादी न करने वालों के बहुत कम । और मुझे नहीं लगता कि शादी न करने वालों ने कुछ ऐसे झण्डे गाढे हों । जो अभी तक शान से फ़हरा रहे हों । और जिससे दूसरे स्त्री पुरुष विवाह न करने को प्रेरित हों । लेकिन ये बात मैं सिर्फ़ कह सकता हूँ । आप स्वयं अनुभवी हो । इसलिये आप कुछ अधिक बेहतर बता सकते हो ।
वह बगलोल सा गोल गोल आँखों से उसे देखता हुआ इस बेबाक विचार को गम्भीरता से सुनता रहा । और कुछ कुछ हैरान सा हुआ । सही कहा जाये । तो लङके की स्पष्ट शैली ने उसे बेहद प्रभावित किया ।
- काफ़ी सुलझे हुये इंसान हो दोस्त । वह प्रशंसा करता हुआ बोला - बात क्या कहते हो । चाँटा सा मारते हो । हो हो हो..है ना हँसने की बात । पर मुझे ये चाँटा खाना अच्छा लगा । खैर..मैं अपनी ही बात बताता हूँ । मुझे देखो । वह अपने बढी हुयी मोटी तोंद पर हाथ फ़िराता हुआ बोला - कोई भी इंसान मुझे देखकर मेरे भाग्य से ईर्ष्या ही करेगा । सरकारी नौकरी । निजी मकान । हट्टा कट्टा प्रेम करने वाला भाई । और अप्सराओं को मात करने वाली अति सुन्दर पत्नी । और इससे ज्यादा क्या चाहिये । हो हो हो.. है ना हँसने की बात । बोलो । कुछ गलत कहा मैंने ?
नितिन ने उसके समर्थन में सिर हिलाया । जिससे वह काफ़ी खुश हुआ ।
- लेकिन । वह जैसे जोरदार शब्दों में बोला - ये सब ऊपर से नजर आता है । हम सबको ऐसे ही ऊपर से देखने पर दूसरों का जीवन सुखमय नजर आता है । जबकि ठोस हकीकत ऐसी नहीं होती । मुझे देखो । मेरी अति सुन्दर पत्नी है । पर उसकी सुन्दरता को रोज रोज चाटूँ क्या ? उसकी रोज रोज आरती उतारूँ क्या ? हो हो हो..है ना हँसने की बात । जबकि एक सुन्दर औरत यही चाहती है । अपने पति या प्रेमी से । और अन्य सभी से भी । पर उसे नहीं

मालूम । मेरी जिन्दगी । और एक धोबी के गधे की जिन्दगी । बिलकुल एक जैसी है ।  यू नो । डंकी आफ़ धोबी ..सारी शब्द भूल गया । याद आया । वाशरमेन..हो हो हो..।
धोबी गधे की पीठ पुठ्ठे कमर आदि बेल्ट से कस देता है । उस पर झोली डालता है । ईंटे लादता है । और गधा बेचारा चुपचाप बिना चूँ चाँ उसकी चाकरी करता है । फ़िर भी वो बिना बात उसके चूतङ में कोङा मारता है । गालियाँ देता है । हो हो हो.. है ना..हँसने की बात । फ़िर भी । फ़िर भी उस गधे से गधा कह दो । तो बहुत बुरा मान जायेगा । आप में उछल कर दुलत्ती मारेगा । हो हो हो.. है ना हँसने की बात ।
नितिन एकदम सब कुछ भूलकर ठहाका लगा उठा । क्या कहना चाहता था ये इंसान । और उसने अपनी ही ऐसी अजीव तुलना क्यों की ? उसे उसकी बातों में रस आने लगा ।
- देखो । वह बात को आगे बढाता हुआ बोला - मेरी नौकरी बीबी मकान इत्तफ़ाकन थोङा ही आगे पीछे सभी साथ साथ मिले । तीन जरूरी सुख । आसानी से मिले । इसके बाबजूद मैं गधा बन गया । नितिन जी इस संसार में नौकरी बिजनेस कोई अन्य रोजगार विषय हो । हर आदमी एक दूसरे की....मारने में लगा हुआ है । उस सबसे कैसे निबटना होता है । ये मैं ही जानता हूँ । उस पर दफ़्तर के काम का जरूरी जिम्मेदाराना बोझ । भुक्तभोगी के लिये ये गधे का बोझा ढोने के समान ही है । लेकिन मेरी सुन्दर बीबी को इस सबसे मतलब नहीं । वह हर आम बीबी की तरह शाम को पाउडर लिपिस्टिक लगाकर छल्ले मल्ले निकाल कर तैयार हो जाती है कि मैं अब उसकी नाइट डयूटी बजाने को तैयार हो जाऊँ । हो हो हो..है ना हँसने की बात । दिन में पेट के लिये डयूटी । रात में पेट से नीचे की डयूटी । और इस डयूटी पर खरा न उतरे । तो वह बिना बोले सिर्फ़ आँखों से व्यंग्य भावों से चूतङ में कोङा लगाती है । पति को नपुंसक नामर्द समझती है ।
इसलिये मेरे भाई । वह अपने मोटे पेट पर हाथ फ़िराता हुआ बोला - सुखी दिखाई देता जीवन ढोल की पोल है बस । ढोल में कैसी मधुर आवाज निकलती है । लगता है । इसके अन्दर जाने क्या स्पेशल चीज रखी है । लेकिन उसका पुरा उतार कर देखो । तो वहाँ एक शून्य 0 खाली सन्नाटा रिक्तता ही होती है । हो हो हो .. इसलिये कहा है ना

। असल में । जो दिखता है । वो होता नहीं है । और जो होता है । वो दिखता नहीं है ।
- हाँ नितिन । पदमा फ़िर से मौन स्वर ही उसके दिमाग में बोली - जो दिखता है । वो होता नहीं है । और जो होता है । वो दिखता नहीं है । यह जीवन का बहुत बङा सच है । ये जो तुम यहाँ मनुष्य शरीरों जैसे यन्त्र आकार देख रहे हो । ये इसी प्रथ्वी के स्त्री पुरुषों की कामेच्छा के साकार कल्पना चित्र है । अतृप्त दमित कामवासना के कल्पना चित्र । कामवासना का सम्भोग सिर्फ़ शरीरों का मिलन या लिंग योनि इन्द्रियों का संयोग भर नहीं है । इंसान कई तरह से सेक्स करता है । समझना । रास्ते निकलती हुयी सिर्फ़ किसी एक जवान लङकी या औरत से उसके घर पहुँचने तक पचासों लोग मानसिक सम्भोग कर चुके होते हैं । कोई उसके स्तनों के प्रति अपनी कल्पना करता है । कोई गालों के प्रति । कोई होठों के । कोई नितम्बों से । कोई योनि का रसिक होता है । सोचो । सिर्फ़ एक लङकी मामूली रास्ते से घर तक कितने लोगों द्वारा अप्रत्यक्ष बलात्कार की गयी । और ये सिर्फ़ एक लङकी की बात की मैंने । तब सोचो । संसार में प्रति क्षण कितना मानसिक बलात्कार होता होगा ?
नितिन वाकई हक्का बक्का रह गया । एक साधारण बात का जो रहस्य उसने बताया था । शायद ही बढे से बढा बुद्धिजीवी भी इसकी इस तरह कल्पना न कर सके । उसे तो ऐसा ही लगा । कम से कम उसने तो कभी इस कोण से न सोचा था । इस तरह से न सोचा था । ख्याल ही न होता था ।
- लेकिन । वह फ़िर बोली - यहाँ नजर आते यन्त्र ऐसे लोगों के नहीं है । वह सिर्फ़ क्षणिक वासना होती है । अतः उसका चित्र आकार रूप नहीं ले पाता । ये यन्त्र दरअसल उन लोगों के हैं । जो तनहाई में पङे अपने प्रेमी प्रेमिका आदि से काल्पनिक सम्भोग कर रहे होते हैं । कोई दूसरे की स्त्री या पढोसन से काल्पनिक सम्भोग कर रहा होता है । स्थूल शरीर मिलन संयोग सुलभ न हो पाने से कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के नीचे कल्पना में बिछी होती है । कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को ख्यालों में लौट पलट कर रहा होता है । लेकिन ये तो ऐसे लोगों के उदाहरण हुये । जो परस्पर एक दूसरे को जानते हैं । कई बार सम्भोग साथी एकतरफ़ा प्यार जैसा होता है । कोई किसी को चाहता है । जबकि उसकी चाहत दूसरे को दूर दूर तक पता नहीं । वह कोई भी स्त्री पुरुष अपने कल्पना साथी को काल्पनिक संभोग करता है । ये हुयी एकतरफ़ा चाहत की बात । और भी देखो । कोई चाहत भी नहीं । कोई प्रेमी प्रेमिका अपने साथी के साथ मधुर मिलन के क्षणों के बारे में किसी परिचित से बात कर रहा है । और तुम यकीन करो । सुनने वाला निश्चित ही तुरन्त लालायित होकर उससे दूरस्थ सम्भोग करने लगेगा । उसी क्षण । काम..सेक्स.. सेक्स..सिर्फ़ सेक्स.. । इस सृष्टि के कण कण में काम समाया हुआ है । ये यन्त्र ऐसे ही लोगों के हैं । जो अपनी कल्पना का काम चित्र गहन भाव से देर तक बनाते रहते हैं । और उसमें विभिन्न रंग भरते हैं । क्योंकि ऐसे सेक्स पर कोई रोक नहीं लगा सकता । जिसके साथ कोई दूसरा सेक्स कर रहा है । वह भी नहीं । चाहे वह उसे पसन्द करे । या न करे । इस तरह ये इंसान किसी न किसी के प्रति परस्पर काम भाव में हमेशा डूबा रहता है ।
अब तुम गहराई से समझना । तुम प्रयोग के लिये एक सुन्दर लङकी की कल्पना करो । जिसे स्वपन में हुयी काम वासना की भांति तुमने नग्न कर लिया है । और वह स्वपन के सेक्स साथी की ही भांति कोई ना नुकर नहीं कर रही । वहाँ कोई सामाजिक डर भय भी नहीं । तब तुम कैसे परिचित भाव में सेक्स करते हो । जबकि तुम उसे दूर

दूर तक नहीं जानते । और न ही वो तुम्हें । फ़िर बताओ । ऐसा कैसे हुआ ?
तो जो तन्हा बिस्तर पर लेटी प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ काल्पनिक अभिसार कर रही है । अब जरा बारीकी से समझना । उसका अंतर्मन में एक चित्र आकार बन रहा है । उस समय वह मुँह से स्थूल वाणी शब्द भी नहीं बोल रही । पर उसका मौन स्वर आऽऽह आऽऽई नहीं.. आदि कर रहा है । अब उसके अंगों में रोमांच है । शरीर में उत्तेजना है । स्तन भरने लगे । योनि की आंतरिक पेशियों में फ़ङकन है । उसके खुद के हाथ प्रेमी के हाथ बन जाते हैं । उसकी खुद की उँगली प्रेमी का अंग बन जाती है । वह आधी खुद आधी अपना प्रेमी स्वयं हो जाती है । और अंततः पूर्ण उत्तेजना को प्राप्त होकर स्खलित भी हो जाती है । अब गौर से सोचो । अगर उसको कोई उस दशा में देखे । तो यही सोचेगा कि एक युवा लङका या लङकी अकेली हस्तमैथुन कर रही है । लेकिन वह यह कभी नहीं देख पायेगा कि इसकी काम वासना चेतना युक्त होकर प्रेमी के साथ विभिन्न मुद्रायें चित्र आकार स्वर का भी निर्माण कर रही है ।

और भले ही यह यहाँ अकेली नजर आ रही है । पर वास्तव में किसी अज्ञात स्थल अज्ञात भूमि पर विचार आकारित पूर्ण संभोग कर रही है । बिलकुल असली स्थूल शरीर संभोग के जैसा । और क्योंकि वह भी वाणी रहित मौन होता है । ये सब भी मौन स्वर हैं । बस उसकी कल्पना का प्रेमी प्रेमिका । और स्वयं उसके साथ सम्भोग रत वह । तब जो वहाँ दृश्य रूप नजर नहीं आता । वह यहाँ दिखाई देता है । क्योंकि कोई तो वह स्थान होगा ही । जहाँ वह वैचारिक सम्भोग कर रही है । नितिन जी । ये यन्त्र उन्हीं लोगों के काल्पनिक चित्र आकार है । यह इसके लिये एक निश्चित भूमि है ।
उसके दिमाग का फ़्यूज मानों भक से उङ गया । कौन थी ये औरत ? कौन ? सोचना भी कठिन है ।
और अभी वह नीचे उतरने की सोच ही रहा था कि नहाकर ऊपर आती हुयी पदमा गीले बालों को झटकती हुयी छत पर आ गयी । वह इस अनोखी स्त्री की प्राकृतिक सुन्दरता देखकर एक बार फ़िर दंग रह गया ।
- कमाल के इंसान हो । वह साधारण स्वर में एक शालीन स्त्री की भांति बोली - रात से अभी तक छत पर क्या कर रहे हो ? क्या तुम स्नान आदि कुछ नहीं करते । मुँह भी नहीं धोया । चाय पानी कुछ भी नहीं । ऐसे तो भाई लगता है कि तुम कोई बङे रहस्यमय से

इंसान हो । किसी अजीब सी कहानी जैसे । ऐसी अजीव और उलझी कहानी कि यही समझ में न आये कि इस कहानी को पढा जाये । या रहने दिया जाये ।
इस औरत ने सदियों से स्थापित कहावत ही फ़ेल कर दी थी । उसने सोचा । पता नहीं किस बेबकूफ़ ने कहा था । खरबूजा छुरी पर गिरे । या छुरी खरबूजे पर । कटेगा खरबूजा ही । यहाँ तो खरबूजा छुरी को ही काटे दे रहा था । पदमा अपनी बङी बङी कजरारी आँखों से उसी की ओर देख रही थी । और जैसे वह सधः स्नाता उसे  चैलेंज सा करते हुये कह रही थी - क्या कमाल की कहानी लिखी । इस कहानी के लेखक ने । कहानी जो उसने शुरू की । उसे कोई और कैसे खत्म कर सकता है । इसीलिये..इसीलिये ये कहानी न तुमसे पढते बन रही है । न छोङते । ये बच्चों का खेल नहीं नितिन ।

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