रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 15

अपवाद की बात छोङ दी जाये । तो सामान्यतः जिन्दगी में कई चीजें एक ही बार होती है । जन्म । मृत्यु । शादी । प्रेम आदि  । फ़िर क्या हो सकता है । ज्यादा से ज्यादा उसकी मौत ही ना । मौत जो एक ही बार होनी है । और कोई तय नहीं कि किसकी कब और कैसे होगी ? लिखित रूप में ऐसी कोई गारंटी भी नहीं होती कि इंसान फ़ालतू के झमेलों में ना पङे । तो वह पूरे 100 वर्ष निर्विघ्न जीयेगा । और फ़िर उसे इस बात का भगवान से कोई पुरस्कार भी मिलेगा । एक आंतरिक गर्भ स्थिति में पहली सांस लिया बालक से लेकर किसी भी आयु का कोई भी इंसान कभी भी कहीं भी कैसे ही हालात में मर सकता है । अनुभवी लोग कहते हैं । जीवात्मा का जन्म होते ही मौत की छाया उसके पीछे पीछे चलने लगती है । मौत की छाया । क्यों सोच रहा है । वह ऐसे दार्शनिक विचार ? उसने खुद ही मन में सोचा ।
दरअसल कल की रात उस तलघर और उस अज्ञात कामवासना भूमि और उस रहस्यमय औरत का और भी विलक्षण रूप जानकर उसने दोपहर में अपने गुरु मनसा जोगी के पास इस रहस्य का भेद जानने हेतु जाने का निश्चय किया । शायद वह कोई मदद कर सकें । शायद ? फ़िर अपने ही इस विचार को उसने दिमाग से निकाल फ़ेंका । क्यों निकाल फ़ेंका ?
कल जो स्थितियाँ उसके साथ अचानक घटित हुयीं । उसमें वह एकदम वेवश था । तब वह चाहती । तो उसको मार भी सकती थी । पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया था । बल्कि वह तो कदम कदम पर ऐसा लगता था कि अपनी उसकी खुद की गुत्थी वह स्वयं उसके लिये सुलझा रही थी । लेकिन साथ ही साथ उसके लिये अज्ञात अपने किसी प्रेमी की कमाल की कहानी जैसा चैलेंज भी कर देती थी । अब खास यही कटाक्ष । यही चैलेंज । उसे इस झमेले की तह में जाने को प्रेरित कर रहा था । वो भी गुरु आदि किसी दूसरे की सहायता के बिना । यदि वह इसमें कोई भी बाहरी सहायता लेता । तो उस रहस्यमय औरत की नजर में यह उसकी हार थी । जिसे वह जैसे बिना कहे हुये ही कहती थी । और बारबार कहती थी ।
दोपहर के दो बजने में अभी कुछ समय बाकी था । वह अपने किराये के कमरे में लेटा हुआ विचार मग्न था । और मजे की बात थी कि आगे क्या करे ? इस पर कई पहलूओं से सोचने के बाद भी तय नहीं कर पा रहा था । फ़िर किसी सफ़ल जासूस की भांति उसने अपनी अब तक की उपलब्धियों पर पुनर्विचार किया । उन उपलब्धियों में वह बन्द गली बन्द घर ही खास जान सका था । जिसमें कि वह खुद मौजूद भी था । लेकिन जमीन के नीचे वह अंधेरा बन्द कमरा कहाँ था ? यह उसे अब भी पता नहीं था । जबकि वह उसमें हो आया था । और बहुत देर रहा था । और वास्तव में उसके चिंतन की कील यहीं अटकी हुयी थी । और सबसे बढा रहस्य खुद उसके लिये यही था कि

रात में बैंच से गिरने के बाद वह बेहोश हो गया था । और इसके बाद वह उन दो रहस्यमय स्थानों पर गया । देर तक रहा । लेकिन सुबह वह बाकायदा उसी बैंच पर लेटा था । वह कैसे और कब गया । यह उसे ठीक याद था । लेकिन उसी स्थान पर कैसे और क्यों लौटा । उसे  दूर दूर  तक न पता था । बहुत कोशिश करने के बाद भी वह उस काम वासना भूमि से आगे की बात याद न कर सका । रात बारह बजे से अगली सुबह के दस बजे तक के बीच में उसे बस इतना ही याद था । वह जब कोई निष्कर्ष न निकाल सका । तब उसकी पूरी सोच उसी तलघर पर अटक गयी । तलघर इसी घर में होना चाहिये । और वहाँ कुछ न कुछ रहस्य है । आखिर वह उसे तलघर में ही क्यों ले गयी ? लेकिन उसके लिये लगभग एकदम नये से इस घर में तलघर को तलाश करना आसान न था । और तलघर के बारे में सामान्य भाव से पूछना भी किसी दृष्टि से उचित न था ।
वह टहलता हुआ सा कमरे से बाहर आ गया । उस रहस्यमय घर में एकदम खामोशी छायी हुयी थी । दोपहर की कङी धूप खुले आंगन में फ़ैली हुयी थी । और शायद अकेली पदमा अपने कमरे में आराम कर रही थी । घर के दोनों आदमी शायद बाहर गये हुये थे । दोनों में से एक तो निश्चय ही गया था । उसका पति । वह सावधानी से टहलता हुआ घर के खुले स्थानों का किसी सफ़ल जासूस की भांति निरीक्षण करने लगा । पर उसे ऐसा कोई स्थान नजर न आया । जहाँ से तलघर का रास्ता जाता हो । या द्वार हो । फ़िर हो सकता है । वह रास्ता द्वार किसी कमरे के अन्दर से गया हो । जैसा कि अक्सर होता ही है । और इस अपरिचित मकान में वह दूसरे के कमरे की खोजबीन भला कैसे कर सकता है ।
ये काफ़ी बङा और पुराना सा घर था । जिसका आधा हिस्सा लगभग बन्द था । अनुपयोगी सा था । और इसकी एक ही वजह थी कि उस फ़ैमिली के गिने चुने सदस्यों के हिसाब से वह मकान काफ़ी बङा था । जो निश्चय ही अनुराग एण्ड फ़ैमिली ने बना बनाया खरीदा था । कब खरीदा था ? लगभग चार साल पहले । यकायक । यकायक उसके दिमाग में विस्फ़ोट हुआ । चार साल पहले ।
अभी वह आगे कुछ सोच पाता कि उसे खट से कमरे का दरवाजा खुलने की आवाज आयी । और फ़िर स्वतः ही

उसकी निगाह उस तरफ़ चली गयी । वह अलसायी सी नींद से उठी एक सुस्ती भरे अदभुत सौन्दर्य के साथ उसके सामने खङी थी । उसकी लटें बेतरतीब होकर उसके सुन्दर चेहरे पर आ गयी थी । साङी ब्लाउज आदि कुछ सिकुङे सिमटे से थे । और वह तुरन्त नींद से उठने के बाद की शिथिल सी अवस्था में खङी थी ।
क्या अदभुत सुन्दरी है यह । वह स्वतः ही दिल से उसकी तारीफ़ कर उठा । हर रंग में सुन्दर दिखती है । वो भी एक से एक नये दिलकश अन्दाज में । ये भीगी भी सुन्दर लगेगी । और सूखी भी सुन्दर लगेगी । ये स्वच्छ भी सुन्दर लगेगी । और गन्दी भी । ये पुराने बदरंग वस्त्र पहने तो भी सुन्दर लगेगी । और नये चमचमाते तो भी । ये सुन्दरता की मोहताज नहीं । सुन्दरता स्वयं इसकी मोहताज है । वाकई । वाकई वह नैसर्गिक सौन्दर्य युक्त सुन्दरता की देवी ही थी ।
- नितिन जी । वह वहीं से मधुर स्वर में पूर्ण शालीनता से बोली - अभी आई ।
उसने सम्मोहित सी अवस्था में पूरे आदर से समर्थन में सिर हिलाया । और आंगन में फ़ूलों की क्यारी के पास बिछी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया । उसके फ़िर से प्रकट होते ही वह जैसे समस्त सोच से रहित हो गया । फ़िर भी असफ़ल अन्दाज में जबरन कुछ सोचने की कोशिश करते हुये उसने सिगरेट सुलगायी । और गम्भीरता से कश लगाने लगा ।
- कोई भी सोच या इच्छा ही । वह चाय का गर्म कप उसे थमाती हुयी बोली - हमारी आगे की जिन्दगी का कारण होती है । जैसे ही इंसान की सभी इच्छायें मरी । वह तेजी से मरने लगता है । यदि वह शरीर से जीता भी रहे । तो भी वह चलते फ़िरते किसी कमजोर मुर्दे के समान ही होता है । फ़िर वह जीवन मुर्दा जीवन ही होता है । अतः वह जीवन है या मृत्यु ? इससे कोई खास अन्तर नहीं पङता । क्योंकि है तो वास्तव में वह मृत्यु ही । मृत्यु । जो एक दिन सभी की होती है ।
उसने गर्म चाय के कप से उठती धुंये की लकीर पर एक भरपूर मोहक निगाह डाली । और बङे ही मोहक अन्दाज में मुस्कराई । इतना कि उस सादगी युक्त सरल मुस्कान से भी वह विचलित होने लगा । और अन्दर तक हिल कर रह गया । ये औरत थी या जीती जागती कयामत ?
- सेक्स..सेक्स.. सिर्फ़ सेक्स । वह अपने पतले रसीले होठों से चाय सिप करती हुयी बोली - देखो । इस टी कप को । इसके अन्दर गर्म तरल भरा हुआ है । और तब इसके अन्दर ये धुंआ स्वयं उठ रहा है । सोचो । ठंडी चाय में धुंआ उठ सकता है क्या ? ठंडी चाय । ठंडी औरत ।..दरअसल मैं कहना चाहती हूँ । हमारी सभी क्रियायें स्वतः

स्वाभाविक और प्राकृतिक है । अगर अन्दर आग होगी । तो धुंआ उठेगा ही । और ध्यान रहे । ये आग खुद होती ही है । हरेक में नहीं होती । पैदा नहीं की जा सकती । और इसी उष्णता । इसी गर्माहट । इसी ऊर्जा में जीवन का असल संगीत गूँज रहा है । कसे तारों से ही । वह अपने ब्लाउज की निचली किनारी नीचे ही खींचती हुयी बोली - किसी साज में मधुर स्वर निकलते हैं । ढीले तारों से कभी कोई सरगम नहीं छेङी जा सकती । उससे कोई सुर ताल कभी बन ही नहीं सकता । कसे तार । उसने एक गर्वित निगाह अपने स्तनों पर स्वयं ही डाली । और उसी के साथ साथ नितिन की निगाह भी स्वाभाविक ही उधर गयी ।
वह फ़िर घबरा गया । उसका सम्मोहन फ़िर छाने लगा था । वह जैसे उसके अस्तित्व को ही वशीभूत कर लेना चाहती थी । अब तक यह तो वह निश्चित ही समझ गया था कि ये विलक्षण औरत सृष्टि की किसी भी चीज किसी 


भी क्रिया में निश्चित ही सिर्फ़ सेक्स को सिद्ध कर देगी । और फ़िर आगे सोचने का मौका ही न देगी ।
अतः बङी मुश्किल से खुद को संभालते हुये उसने बात का रुख दूसरी तरफ़ मोङा । और बोला - पदमा जी ! प्लीज आप गलत न समझें । तो मैं एक बात पूछना चाहता हूँ । मनोज शमशान में एक तेल से भरा बङा दीपक जलाने जाता है । मेरी मुलाकात उससे वहीं नदी के पास हुयी थी । मुझे नहीं पता । वह क्या है ? और उसका मतलब क्या होता है । पर मुझे थोङी स्वाभाविक जिज्ञासा अवश्य है कि किसी विशेष स्थान पर ऐसे दीपक को जलाने का मतलब क्या ? शायद आपको मालूम हो ।
- हाँ । वह साधारण स्वर में बोली - मालूम है । वह दीपक मेरे लिये ही जलाया जाता है । दरअसल इन लोगों को यानी मेरे पति और देवर को लगता है कि कभी कभी मैं अजीव सी स्थिति में हो जाती हूँ । तब मेरे जो लक्षण बनते हैं । वह किसी प्रेत आवेश जैसे होते हैं । हालांकि मेरे पति भूत प्रेत को मानते ही नहीं । वह इसे कोई दिमागी बीमारी मानते हैं । लेकिन एक बार जब मैं अपने पति के साथ मायके गयी हुयी थी । वहाँ भी ऐसा ही हो गया । तब मेरी माँ ने स्थानीय तांत्रिक वगैरह को दिखाया । और उसी ने ऐसा करने को बताया । लेकिन मेरे पति ने उसकी हँसी उङायी । तब मेरी माँ ने उन्हें कसम खिला दी कि भले ही तुम विश्वास करो । या न करो । पर ये दीपक कुछ खास दिनों में जलवाते रहना । बाकी उपचार हम अपने स्तर पर कर

लेंगे । लेकिन ये दीप तुम्हारे शहर में ही जलेगा । अब क्योंकि मेरे पति को उस दीपक में कोई दम ही नजर नहीं आता । तो वह जले । तो क्या । न जले तो क्या । बस वह अपनी सास की कसम की खातिर ऐसा करते हैं । इससे ज्यादा और कोई वजह नहीं । और बस इतना ही मैं भी जानती हूँ ।
बेहद रहस्यमय ? या एकदम सरल । या कोई पवित्र देवी । या फ़िर खुली किताब । वह दंग रह गया । जिस सामान्य अन्दाज में बिना लाग लपेट उसने वह बात बतायी । एक बार तो उसका मन हुआ कि इसके चरण स्पर्श ही कर ले ।
बताईये । उसने फ़िर सोचा । तंत्र दीप का रहस्य भी किसी फ़ुस्स पठाखे जैसा खत्म । बन्द गली । बन्द घर का भी खत्म । अब रह गया । जमीन के नीचे । अंधेरे बन्द कमरे का । शायद वही बढा रहस्य है ।  उसी में सारा खेल छुपा हो । पर वह उसके बारे में पूछे भी तो कैसे पूछे । कैसे ?
- नितिन जी ! अचानक ही उसी समय जब वह यह सोच ही रहा था । उस पठाखा औरत ने मानों धमाकेदार पटाखा फ़ोङा - वैसे आप भी कमाल स्वभाव के हो । कल रात बारह के करीब जब मैं घर के सभी गेट वगैरह बन्द कर रही

थी । मैंने देखा । आपका कमरा खुला है । पर आप कमरे में नहीं हो । तब मैं चकित होकर आपको देखने छत पर आयी । और कुछ देर बातें करती रही । अचानक ही आपको नींद का झोंका सा आया । और आप बैंच से नीचे गिर गये । मैंने आपको बहुत हिलाया डुलाया । पर आप पर कोई असर नहीं हुआ । तब मैंने आपको फ़िर से बैंच पर ही लिटा दिया । और नीचे से तकिया चादरा लाकर आपको लगा गयी । आप बङी गहरी नींद सोते हो ?
उसे फ़िर तेज झटका सा लगा । अब तक इस औरत के प्रति बनी उसकी श्रद्धा कपूर के धुँये की भांति उङ गयी । सौन्दर्य की देवी अब उसे जीभ लपलपाती डसने को तैयार नागिन नजर आने लगी । एक बार फ़िर उसके चुनौती देते शब्द बार बार उसके कानों में गूँजने लगे - वह कहता है । मैं माया हूँ । स्त्री माया है । उसका सौन्दर्य बस माया जाल है । और ये कहानी बस यही तो है । पर..पर मैं उसको साबित करना चाहती हूँ - मैं माया नहीं हूँ । मैं अभी यही तो साबित कर रही थी ।..कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने ।.. कहानी जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है ?
यकायक उसने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा । वह बङे रहस्यमय ढंग से मोहक अन्दाज में उसी की तरफ़ देखती हुयी मुस्करा रही थी । और जैसे मौन वाणी से कटाक्ष कर रही थी - नितिन ये बच्चों का खेल नहीं ।

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