रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 18

जैसे फ़िर एक नया चैलेंज । जैसे उसके दिमाग से उसका दिमाग ही जुङा हो । कहीं ये कर्ण पिशाचनी तो नहीं ? भूतकाल शब्द को जिस तरह उसने एकाएक जिस व्यंगात्मक अन्दाज में बोला था । और कई बार उसकी सोची बात को तुरन्त प्रकट किया था । उससे यही साबित होता था । तब फ़िर उसे क्या हासिल हो सकता था ? जब वह उसकी हर बात को पहले ही जान जाती थी । तब । तब तो वह उसके हाथों में उलट पलट होता एक सेक्स टाय जैसा भर ही था । सेक्स टाय । जिससे वह मनमाने तरीके से खेल रही थी ।
खुद को बेहद असहाय सा महसूस करते हुये उसने एक लम्बी गहरी सांस भरी । क्या इस अनोखी औरत को खोलने की कोई चाबी कहीं थी । या फ़िर चाबी बनाने वाला इसकी चाबी बनाना ही भूल गया था । या वो चाबी किन्हीं तिलिस्मी कहानियों जैसे अजीव से गुप्त स्थान पर छुपी रखी थी । चाबी ।
और तव घोर निराशा में आशा की किरण खोजते हुये उसे रामायण याद आयी । कामी रावण की काम चाहत के चलते सोने की लंका विनाश के कगार पर पहुँच गयी थी । तमाम महाबली योद्धा मौत के मुँह में जा चुके थे । मगर इस सबसे बेखबर कुम्भकरण गहरी निद्रा में सोया पङा था । अब उसको जगाना आवश्यक हो गया था । रावण ने स्वयं जाकर उसे जगाया ।
एक लम्बी स्वस्थ भरपूर नींद के बाद उसका तामसिक राक्षसी मन भी भोर जैसी सात्विकता से परिपूर्ण हो रहा था । ज्ञान जैसे उसमें स्वतः स्थिति ही था । और समस्त वासनायें अभी सांसारिक भूख से रहित ही थी । तब वह रावण की सहयोगी आशा के विपरीत उल्टा उसे ही सीख देने लगा । और पर स्त्री से काम वासना की चाहत रखने से होने वाले विनाश पर धर्म नीति बताने लगा । हर तरह से उसकी गलती दोष बताने लगा । सीता के रूप में जगदम्बा को वह साफ़ साफ़ पहचान रहा था ।
साम दाम दण्ड भेद का चतुर खिलाङी रावण तुरन्त उसकी स्थिति को समझ गया । और फ़िलहाल विषयान्तर

करते हुये उसने उसके लिये मांस मदिरा के साथ सुन्दर अप्सराओं के नृत्य जैसे भोग विलासों की भरपूर व्यवस्था की । और तब कुम्भकरण के मन पट पर वही कहानी लिखने लगी । जो रावण चाहता था ।
जो रावण चाहता था । जो नितिन चाहता था । सेक्स ..सेक्स..सिर्फ़ सेक्स..। पदमा की सुरीली आवाज जैसे फ़िर गूँजी । अगर उसकी ये जिद बन गयी थी कि वह इस रहस्य की तह में जाकर ही रहेगा । तो फ़िर उसे उसकी इच्छानुसार उसके रंग में रंगना ही होगा । और खास तब । जब वह असल उसी तरह प्रकट होगी ।
- ओ के । वह उसके ब्लाउज में हाथ डालता हुआ बोला - तुम ठीक कहती हो । भूतकाल को छोङो । जिन्दगी बहुत छोटी है । हमें इसे भरपूर जीना चाहिये ।
- ह हाँ हाँऽऽ । वह उसे अपने ऊपर खींचती हुयी बोली - यहाँ हर इंसान की जिन्दगी रेगिस्तान में भटके मुसाफ़िर के समान है । सुनसान वीरान रेतीला सूखा उजाङ रेगिस्तान । जिसमें पानी बहुत कम । प्यास बहुत ज्यादा है । इसीलिये तो हम सब प्यासे ही भटक रहे हैं । फ़िर यकायक आगे कहीं दूर पानी नजर आता है । झिलमिलाता स्वच्छ पारदर्शी कांच की लहरों के समान मनमोहक जल । आहऽऽ ..पानी । प्यासा तप्त इंसान उसकी तरफ़ तेजी से दौङता है । मगर पास जाकर अचानक हताश हो जाता है । क्योंकि वह जिसे शीतल मधुर मीठा जल समझ रहा था । वह सिर्फ़ मृग मरीचिका ही थी । मृग मरीचिका । झूठा जल । मायावी ।
नितिन ने अचानक उसके हमेशा रहने वाले विशेष स्वर के बजाय उसकी आवाज में एक भर्राया पन महसूस किया । लेकिन घुप अंधेरा होने से वह उसके भाव देखने में नाकाम रहा ।
- इसीलिये । जैसे अचानक वह संभल कर बोली - सदियों सदियों से भटकती हम सब प्यासी रूहें उसी मधुर 


शीतल जल की तलाश में बैचेन घूम रही हैं । जल । मीठा मधुर जल । जो रेगिस्तान में भी कभी कभी कहीं मिल जाता है । और तब उसको पीकर उस बेहद तप्त जलती सुलगती भूमि में कोई मामूली छायादार कंटीला छोटा वृक्ष भी अति सुखदाई मालूम होता है । जैसे जन्म जन्म से प्यासी रूह को अब कुछ चैन आया हो ।
- आऽऽह । वह एकदम मचलने  लगी - मैं प्यासी हूँ ।
वह समझ गया । वह जो खेल में किसी बाह्य सहयोगी की भांति बेमन से खेलता हुआ अपना काम निकालना चाहता था । उससे काम नहीं चलने वाला था । उसे फ़ुल फ़ार्म में आना ही होगा । और उसका वास्तविक कामना पुरुष बनना ही होगा । जैसा वह चाहती थी । वैसा ।
तब उसने उस रहस्य आदि झमेले को दिमाग से दूर निकाल फ़ेंका । और उसका ब्लाउज ऊपर खिसका दिया । उसके मजबूत पंजे में भिंचते उसके स्तन मानों दर्द से चीख उठे । तेज दर्द से वह एकदम बल खाकर ऊपर से नीचे तक लहरा गयी । उसने किसी हल्की रजाई की तरह उसे ऊपर खींचा । और उसके होठों को किसी लालची बच्चे की भांति लालीपाप सा चूसा । अनमना पन त्याग कर जब पुरुष अपनी पूर्ण भूमिका में आता है । तव वह होता है । एक कुशल कामयाव खिलाङी । चैंपियन ।
अब यदि वह कला थी । तो वह नट था । वह उमङती नदी थी । तो वह सफ़ल तैराक था । वह जहरीली नागिन थी । तो वह खिलाङी नेवला था । नेवला ।
वास्तव में वह बारबार नागिन सी बलखाती हुयी ही उसकी पकङ से फ़िसल रही थी । उसे उत्तेजित कर रही थी । जैसे मछली हाथ से फ़िसल रही हो । और वह भूखे बाज सा उस पर झपट रहा था ।
- आऽऽह । वह बुदबुदाकर बोली - मैं प्यासी हूँ ।
एक तरफ़ वह उसकी उत्तेजना को चरम पर पहुँचा रही थी । दूसरी ओर वह उसको हर कदम पीछे भी धकेल देती थी । फ़िर नयी उत्तेजना । फ़िर नया कदम । दो नंगे तार । उसके कानों में उसकी नशीली आवाज फ़िर से गूँजी - आपस में कभी नहीं मिलते । लेकिन जब कभी मिलते हैं । तो पैदा होती है । एक अदभुत चिंगारी । एक दिव्य चमक । और उसको कहते हैं । रियल सेक्स । सेक्स ..सेक्स..सिर्फ़ सेक्स ।
और तब मानों उसकी चाल को भांप कर उसके अन्दर स्वतः ही एक पूर्ण पुरुष जागृत हुआ । और उसने अपने मजबूत हाथों में किसी कपङे की हल्की सी गुङिया की भांति उसे हवा में उठा लिया । और सरकस के कुशल कलावाज की तरह ऊपर नीचे झुलाने लगा ।

और तब । जादूगरनी जैसे अपना सब जादू भूली । नटनी सारे करतब भूल गयी । फ़ुंकारती नागिन जैसे वश में होकर बीन के इशारे पर नाचने लगी । खूँखार शेरनी जैसे पिंजङे में फ़ँस गयी । लकङी के इशारे पर बन्दरिया नाचने लगी । घायल चुहिया बिलौटे के जबङे में आ गयी । उङते लहराते शक्तिशाली बाज के नुकीले पंजो में घायल चिङिया फ़ङफ़ङाई ।
उसकी बेतहाशा चीखें निकलने लगी । चीखें । जिनकी अब उस क्रूर शिकारी को कोई परवाह न थी । और अपने शिकार के लिये उसके मन में कोई दया भी न थी ।
- बस..बस..बस..। वह आकुल व्याकुल होकर दर्द से चिल्लाई - रुक जाओ । रुक जाओ । और नहीं । अब और नहीं ।.. मैं तुम्हारी गुलाम हुयी । जो बोलोगे । करूँगी । ये मेरा वादा है । हाँ साजन । ये मेरा वादा है ।
और तभी अचानक बिजली आ गयी । घुप अंधेरे में डूबी छत पर हल्का सा उजाला फ़ैल गया । वे दोनों उठ कर टहलने लगे । और टहलते टहलते छत के किनारे आ गये ।
- कोई भी स्त्री । फ़िर वह एक जगह रुक कर बोली - सदैव बहुत दयालु और कोमल स्वभाव की होती है । और नितिन जी ! वह जिसके प्रति दिल से भावना से समर्पित होती है । उसके लिये जान भी दे देती है । लेकिन नितिन ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई एक 1 भी आय रिपीट कोई एक 1 भी पुरुष ऐसा हो । जो स्त्री में ऐसी पूर्ण

समर्पण की भावना को जगा सके । स्वतः स्फ़ूर्त प्रेम भावना को जगा सके । ऐसा अभिन्न । दो 2 जिस्म । एक 1 रूह । प्रेम जगा सके । तब अधिकतर पति पत्नी प्रेमी प्रेमिका स्त्री पुरुषों नर मादा अण्डरस्टेंड आय रिपीट अगेन नर मादा का प्रेम प्रेम नहीं । स्वार्थी प्रेम की दैहिक वासना ही होती है । एक सौदा । व्यापार । जिन्दगी की जरूरतें पूरी करने भर का सौदा । फ़िर..फ़िर बोलो आप । इसमें प्यार कहाँ ? समर्पण कहाँ ।
- आह ऽऽ । उसके कलेजे में अचानक जैसे अनजान हूक सी उठी - मैं प्यासी हूँ ।
हाँ नितिन ! दरअसल रहस्य शब्द एक ही बात कहता है कि हम किसी चीज को अन्दर तक नहीं देखना चाहते । सिर्फ़ स्थूल सतही व्यवहार को बरतने की हमें आदत सी बन गयी है । इसीलिये हर साधारण बात भी रहस्यमय मालूम होती है । इसलिये नितिन जी स्त्री को सदा अपने अनुकूल रखने के लिये किसी झूठे वशीकरण की नहीं । शुद्ध पवित्र पावन निश्छल दिली आत्मिक प्रेम की आवश्यकता होती है । आत्मिक प्रेम ।

- आहऽऽ । अचानक आतुर सी वह दौङकर उससे लिपट गयी - मैं प्यासी हूँ ।
स्वतः ही नितिन ने उसे बाँहों में भर लिया । और अपने मजबूत आगोश में कसते हुये दीवाना सा चूमने लगा । जैसे सदियों से बिछुङे प्रेमी जन्म जन्म के बाद मिले हों । उनके होंठ आपस में चिपके हुये थे । और वे लगातार एक दूसरे को चुम्बन किये जा रहे थे । लगातार । लगातार । अनवरत । और फ़िर वे एक दूसरे में उतरने लगे । पदमा नितिन के शरीर में समा गयी । और वह पदमा के शरीर में समा गया ।
उसका शरीर बहुत ही हल्का हो रहा था । बल्कि शरीर अब था ही नहीं । वे शरीर रहित होकर खुद को अस्तित्व मात्र महसूस कर रहे थे । हवा । वायु । और फ़िर उसी अवस्था में उनके पैर जमीन से उखङे । और वे आकाश में उढते चले गये । अज्ञात । अनन्त । नीले आकाश में किसी छोटे पक्षी के समान ।

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