रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 19

- मितवाऽऽ.. भूल नऽऽ जानाऽऽ । निमाङ की हरी भरी वादियों में अचानक ये करुण पुकार दूर दूर तक गूँज गयी - मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ ।
छत पर खङी उदास रोमा के दिल में धक्क सी हुयी । आसमान जैसे वह शब्द उसके पास ले आया था  - मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । किसी सच्चे प्रेमी के दिल से उठती आसमान का भी कलेजा चीर देने वाली पुकार । उसके कलेजे में एक तेज हूक उठी । उसकी निगाह निमाङ की उन्हीं वादियों की तरफ़ ही थी । घबराकर उसने मुँडेर पर सिर टिका लिया । और बेतरह दोनों हाथों से कलेजा मसलने लगी । ये अजीब सा दर्द उसे चैन न लेने दे रहा था । वादियों में गूँजती उस सच्चे प्रेमी की विरह पुकार वादियों से आती हवायें उस तक निरन्तर पहुँचा रही थी - मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ ।
- ये तुम क्या करते हो.. विशाल । वह फ़फ़क फ़फ़क कर रो पङी - मैं कैसे.. भूल जाऊँगी तुम्हें । पर कुछ तो मेरा.. भी ख्याल करो । मैं कितनी.. मजबूर हूँ ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । वादियों से आते रोते पक्षी संदेश सुनाते हुये गुजर गये ।
- नहींऽऽ ।..नहींऽऽ भगवान नहीं । वह दिल ही दिल में चीख पङी - ऐसा मत करो । प्रभु हमारे साथ । ऐसा मत करो । वह मर जायेगा । प्रभु..उस पर कुछ तो दया करो ..प्रभु कुछ तो दया करो । कहती कहती वह जमीन पर गिरकर जोर जोर से रोने लगी ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । घाटियों से आते बादल तङप कर फ़िर बोले ।
- खुद कोऽऽ संभालो विशाल । वह सुबक कर बोली - हिम्मत से काम लो । हाँ साजन ! यदि तुम ही यूँ टूट गये ।

तो फ़िर मुझे हिम्मत कैसे बंधेगी । ..तुम्हारे बिना  फ़िर मैं भी न जी पाऊँगी ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । दसों दिशायें भीगे स्वर में एक साथ बोली ।
- नहीं..नहीं विशाल नहीं । वह पागल हो गयी - खुद को संभालो प्रियतम ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । वादियों से आते उदास पथिक बोले ।
- हे राम । हे राम । वह सीने पर मुक्के मारती हुयी बोली - विशाल क्या करूँ मैं । अब क्या करूँ मैं ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । वादियों से आते दुखी रास्ते वोले ।
और तब । उसके बरदाश्त के बाहर हो गया । वह गला फ़ाङकर चिल्लाई - विऽऽशालऽऽ । और गिर कर बेहोश हो गयी ।
- रोमा ।.. रोमा ।.. मेरी जान ।.. तू आ गयी ना.. रोमा । वह पागल दीवाना दौङकर उससे लिपट गया - रोमा ..मेरी जान । मुझे मालूम था । तू जरूर आयेगी ..हाँ ।
-  ह हाँ.. हाँ विशाल । वह कसकर उसके सीने से लिपटती हुयी बोली - मैं आ गयी । अब हमें कोई जुदा न कर पायेगा ।
वे दोनों कसकर लिपटे हुये थे । और एक दूसरे की तेजी से चलती धङकन को सुन रहे थे । ये दो अभिन्न प्रेमियों का मधुर मिलन था । पर फ़िजा किसी अज्ञात भय से सहमी हुयी थी । वादियाँ भी जैसे किसी बात से डरी हुयी थीं । पेङ पौधे उदास से शान्त खङे थे । पक्षी चहकना भूलकर गुमसुम से गरदन झुकाये बैठे थे । हवा मानों बहना भूलकर एक जगह ही ठहर गयी थी । आसमान में छाये बादल सशंकित से जैसे उनकी  रखवाली में लगे थे । पर वे दोनों प्रेमी इससे बेपरवाह एक दूसरे में खोये हुये थे । और लिपटे हुये एक दूसरे के दिल को अपने सीने में धङकता महसूस कर रहे थे । ये मधुर आलिंगन उन्हें अदभुत आनन्द दे रहा था ।
- व विशाल । अचानक सहमी सी रोमा कांपते स्वर में बोली - ये दुनियाँ हमारे प्यार की दुश्मन क्यों हो गयी ? हमने इनका क्या बिगाङा है ?
- पता नहीं रोमा । वह दीवाना सा उसको यहाँ वहाँ चूमता हुआ मासूमियत से बोला - मैं भला क्या जानूँ । मैंने तो बस तुम्हें प्यार ही किया है । और तो कुछ भी नहीं किया ।

- हाँ विशाल । वह उसके कन्धे पर सर रख कर बोली - शायद ..शायद ये दुनियाँ प्यार करने वालों से जलती है । ये दो प्रेमियों को प्यार करते नहीं देख सकती.. है ना ।
- नहीं जानता । वह उसकी सुन्दर आँखों में झांक कर बोला - पर मैं ये जानता हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगा । अगर ये लोग हमें मिलने नहीं देंगे । फ़िर हम यहाँ से दूर चले जायेंगे । दूर । बहुत दूर । बहुत दूर ।
- कितनी दूर ? अचानक वह उदास हँसी हँसती हुयी बोली - विशाल..कितनी दूर ?
- शायद । वह कहीं खोया खोया सा बोला - शायद..इस धरती के पार भी । किसी नयी दुनियाँ में । जहाँ दो प्रेमियों के मिलने पर कोई रोक न होती हो ।
- चल पागल । वह खिलखिला कर बोली - वहाँ कैसे जायेंगे भला । तुम सचमुच दीवाने हो ।
- मेरा यकीन कर प्यारी । वह उसका चेहरा हाथों में भर कर बोला - मैं सच कह रहा हूँ । एकदम सच ।
वह तो भौंचक्का ही रह गयी । लेकिन वह जैसे पूरे विश्वास से कह रहा था । भला ऐसी भी कोई जगह है ? उसने कुछ देर सोचा । पर उसे कुछ समझ में न आया । तब वह उसकी गोद में सर रख कर लेट गयी । विशाल उसके बालों में उँगलियाँ फ़िराने लगा ।
- रोमा । अचानक वह बोला - तू ठीक से जानती है । मेरे अन्दर ऐसी कोई इच्छा नहीं । पर कहते हैं । दो प्रेमी तब तक अधूरे हैं । जब तक उनके शरीरों का भी मिलन नहीं हो जाता । तब तू बार बार मुझे क्यों रोक देती है । क्या तुझे मुझसे प्यार नहीं है ?
वह उठकर बैठ गयी । उसके चेहरे पर गम्भीरता छायी हुयी थी । और वह जैसे दूर शून्य 0 में कहीं देख रही थी ।  फ़िर उसने उसका हाथ पकङा ।
और हथेली अपने गालों से सटा कर बोली - ऐसा नहीं है विशाल । मेरा ये तन मन अब तुम्हारा ही तो है । मैं अपना सर्वस्व तुम्हें सौंप चुकी हूँ । फ़िर मैं मना क्यों करूँगी । सच तो ये है कि खुद मेरा दिल ऐसा करता है । हम दोनों प्यार में डूबे रहें ।
पर हमेशा से मेरे दिल में एक अरमान था । जो शायद हर कुँवारी लङकी का ही होता है । उसकी सुहाग रात का ।

यादगार सुहाग रात । मैंने देवी माँ से मन्नत मानी थी कि मैं अपना कौमार्य सदैव बचा कर रखूँगी । और अपनी सुहाग रात को उसे अपने पति को ही भेंट करूँगी । हे देवी माँ ! मुझे मेरी इच्छा का ही पति देना । और माँ ने मेरी बात सुन ली । मेरी मुराद पूरन हो गयी । और तुम मुझे मिल गये । तब ये मन्नत तुम्हारे लिये ही तो है । बस हमारी शादी हो जाये ।
लेकिन..यदि तुम इस बात पर उदास हो । और मुझे पाना ही चाहते हो । तो फ़िर मुझे कोई ऐतराज भी नहीं । क्योंकि मैं तो तुम्हारी ही हूँ । आज । या कल । मुझे खुद को तुम्हें ही सौंपना है । और मैं मन से तुम्हारी हो ही चुकी हूँ । सिर्फ़ चार मन्त्रों की ही तो बात है ।..मेरे प्रियतम ! तुम अभी यहीं अपनी इच्छा पूरी कर सकते हो ।
वह जैसे बिलकुल ठीक कह रही थी । वह प्यार ही क्या । जो शरीर का भूखा हो । वासना का भूखा हो । जब उसने अपनी अनमोल अमानत उसी के लिये बचा कर रखी थी । तब उसे जल्दी क्यों हो । उसका ध्यान ही इस बात से हट गया ।
यकायक जैसे फ़िजा में अजीव सी बैचेनी घुलने लगी । भयभीत पक्षी सहमे अन्दाज में चहचहाये । विशाल बेखुद 


सा बैठा था । पर रोमा की छठी इन्द्रिय खतरा सा महसूस करते हुये सजग हो गयी । उसकी निगाह पहाङी से नीचे दूर वादी में गयी । और..
- विशाऽऽल । अचानक वह जोर से चीखी - भागो.. विशाल..भागो ।
शायद दोनों इस स्थिति के पूर्व अभ्यस्त थे । विशाल हङबङा कर उठा । और दोनों तेजी से अलग अलग भागने लगे । भागा भाग । भागा भाग । जितना तेज भाग सकते थे । रोमा तेजी से घाटी में उतर गयी । और एक झाङी की आङ में खङी होकर हाँफ़ने लगी । उसका सीना जोर जोर से धङक रहा था । फ़िर वह छुपती छुपाती दूसरी पहाङी पर सिर नीचा किये थोङा ऊपर चढी । और उधर ही देखने लगी ।
उन चारों ने उसके पीछे आने की कोई कोशिश नहीं की । उनका लक्ष्य सिर्फ़ विशाल था । वे चारों अलग अलग उसको घेरते हुये तेजी से उसी की तरफ़ बढ रहे थे । और काफ़ी करीब पहुँच गये थे । रोमा का कलेजा मुँह को आने लगा । वह एकदम घिर चुका था ।
जब वे उससे कुछ ही दूर रह गये । तब विशाल ने तेजी से घूम कर चारों तरफ़ देखा । पर भागने के लिये कोई जगह ही न बची थी । वह बहुत घबरा गया । और बिना सोचे समझे ही एक तरफ़ भागा ।
जोरावर के हाथ में दबी कुल्हाङी उसके मजबूत हाथों से निकल कर हवा में किसी चक्र की भांति तेजी से घूमती

चली गयी । और सनसनाती हुयी विशाल की पीठ से जाकर टकराई । रोमा की दिल दहलाती चीख से मानों आसमान भी थर्रा गया । विशाल दोहरा होकर वहीं गिर गया । भागना दूर । यकायक उठ सके । ऐसी भी हिम्मत उसमें नहीं बची थी । भयानक पीङा से उसकी आँखें उबली पङ रही थी ।
- मैं मना कियो तेरे कू । जोरावर जहर भरे स्वर में नफ़रत से बोला - ठाकुरन की इज्जत से कभी न खेलियो । पर तू नई मानियो ।
 रोमा ने घबरा कर उसे देखा । वह दर्द से बुरी तरह तङप रहा था । और कुछ भी नहीं बोल सकता था । पर उन हैवानों पर इस बात का कोई असर न था । वह अभी ज्यादा दूर न भागी थी । विशाल को यूँ घिरा देख कर उसके चेहरे पर एक अजीव सी दृढता आ गयी । और वह वापिस भाग कर वहीं जा पहुँची । वहाँ । जहाँ विशाल उन राक्षसों से घिरा हुआ था । उन चारों ने बेहद नफ़रत से एक निगाह उसे देखा । और फ़िर वापिस विशाल को देखने लगे ।
- जोरावर । अचानक उन तीनों में से एक ऊबता हुआ सा पंछी बोला - के सोच रहा अब । के करूँ हरामजादे का ?

- और के करेगा । जोरावर घृणा से बोला - खत्म कर साले को ।
पंछी ने कुल्हाङी उठा ली । और सधे कदमों से उसकी ओर बढा । रोमा को एकदम तेज चक्कर सा आया । वह गिरने को हुयी । फ़िर पूरी ताकत से उसने अपने आपको संभाला । और दौङकर जोरावर के पैरों से लिपट गयी ।
- पापा नहीं । वह गिङगिङा कर बोली - नहीं । मत मारो उसे । छोङ दो ।
- ऐ छोरी । जोरावर उसे लाल लाल आँखों से घूरता हुआ बोला - बन्द कर ये बेहयापन ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । हवा के झोंके उसे छूकर बोले ।
वह हङबङा कर उठ बैठी । तेज धूप की तपिश से उसको पसीना आ रहा था । आँसू उसकी आँखों के कोर से बह कर गालों पर आ रहे थे । वह फ़िर ऊँची मुँडेर के सहारे खङी हो गयी । और व्याकुल भाव से वादियों की ओर देखने लगी । यूँ ही । बेवजह । क्योंकि वहाँ से कुछ भी नजर न आ रहा था ।
तभी जीने का दरबाजा खुलने की आवाज आयी । और ऊपर आते कदमों की आहट आने लगी ।
- बीबी । उसकी भाभी बेहद दुख से उसे देखते हुये बोली - मेरी जान के बदले भी यदि तुम्हारा प्रेम मिल जाये । तो मैं अपनी जिन्दगी तुम्हें निछावर करती हूँ । तुम जैसा बोलो । मैं करूँगी । मुझसे तुम्हारा दुख नहीं देखा जाता ।
उसने बङी उदास नजरों से भाभी को देखा । वह उसके लिये खाना लेकर आयी थी । और सिर्फ़ यही वो समय था । जिसमें वह उससे बात कर सकती थी । उसका हाल चाल जान सकती थी । वह नजरबन्द थी । और जीने पर हमेशा भारी ताला लगा रहता था । उसकी जरूरत दिनचर्या का सभी सामान उसे ऊपर ही उपलब्ध होता था । छत पर ।
उसने घोर नफ़रत और उपेक्षा से खाने की थाली को देखा । खाना । उसकी आँखों से आँसू बह निकले । उसे मालूम था । वह खाना तो दूर । पानी भी नहीं पीता होगा । पानी भी । फ़िर वह खाना कैसे खा सकती है ?
- ये लो । भाभी एक कौर बना कर उसको स्वयं खिलाती हुयी बोली - बीबी ! तुम्हें मेरी कसम । मुझे मालूम है । तुम सारा खाना नीचे कूढे पर फ़ेंक देती हो ।..ऐसे तो तुम मर ही जाओगी । लेकिन इससे क्या फ़ायदा ?

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