रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 20

प्रेम और जिन्दगी । जिन्दगी और प्रेम । शायद दोनों एकदम अलग चीजें हैं । दोनों के नियम अलग हैं । दोनों की कहानी अलग है । दोनों के रास्ते अलग हैं । प्रेमियों को दुनियाँ कभी रास नहीं आती । और दुनियाँ को कभी प्रेमी रास नहीं आते । इनका सदियों पुराना वैर चला आ रहा है ।
रोमा की दुनियाँ भी जैसे उजङ चुकी थी । उसके जीवन में अब कुछ न बचा था । वह छत पर खङी खङी सूनी आँखों से वादियों की ओर ताकती थी । और अनायास ही उसके आँसू बहने लगते । प्रेमियों के आँसू । प्रेम के अनमोल मोती । जिनका दुनियाँ वालों की नजर में कोई मोल नहीं होता ।
- मैं वचन देती हूँ पापा । वह आँसुओं से भरा चेहरा उठाकर रोते हुये बोली - मैं आज के बाद इससे कभी न मिलूँगी । लेकिन भगवान के लिये इस पर दया करो । इसे छोङ दो ।..लेकिन । अचानक वह आँसू पोंछकर उसकी आँखों में आँखें डालकर दृढ स्वर में बोली - यदि इसे कुछ हो गया । तो फ़िर मैं खुद को भी गोली मार लूँगी ।
जोरावर के बेहद सख्त चेहरे पर क्रूरता के भाव आये । उसने पंछी को इशारा किया । वह जीत की मुस्कान लिये रुक गया । फ़िर जोरावर ने झटके से उसका हाथ थामा । और लगभग घसीटता हुआ वहाँ से ले जाने लगा । उसका चेहरा फ़िर आँसुओं से भर उठा । और उनके साथ घिसटती हुयी वह बारबार मुढ कर विशाल को देखने लगी । जो लगभग बेहोशी की हालत में पङा दर्द से कराह रहा था ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । आसमान में उङते हुये हरे हरे तोते उसको देख कर बोले ।
- कभी नहीं भूलूँगी । उसके आँसू सूख चुके थे । वह दृढता से बोली - हरगिज नहीं । मरते दम तक नहीं ।
- तू पागल हो गयी है छोरी । उसकी माँ भावहीनता से कठोर स्वर में बोली - तू मरवायेगी उस लङके को । ठाकुर उसे जीता न छोङेगा ।..मेरी बात समझ । ठाकुरों की लङकियाँ कभी प्रेम व्रेम नहीं करती । वे खूँटे से गाय की तरह बाँध दी जाती हैं । जिसके हाथ में उनकी रस्सी थमा दी जाती है । वही उसकी जिन्दगी का मालिक होता है । इसके अलावा किसी दूसरे के बारे में वे सोच भी नहीं सकती । फ़िर क्यों तू उस छोरे की जान की दुश्मन बनी है । भूल जा उसे । और नया जीवन शुरू कर ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । आसमान में चमकते तारे उसको देख कर बोले ।
- तुम सच ही कहते हो । वह उदासी से हँसकर बोली - नहीं भूलूँगी । नहीं भूल सकती । कभी नहीं ।
कितने बजे होंगे ? यकायक उसने सोचा । कितने भी बजे हों । उसे नींद ही कहाँ आती है । वह छत पर अकेली 


टहलती हुयी सुन्दर शान्त नीले आकाश में झिलमिलाते चमकते तारों को देखने लगी । जाने क्यों आज उसे आसमान पर चमकते तारों को देखना बहुत अच्छा लग रहा था । बहुत अच्छा ।
- नहीं जानता । अचानक तारों के बीच से झांकता हुआ विशाल बोला - पर मैं ये जानता हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगा । अगर ये लोग हमें मिलने नहीं देंगे ।  फ़िर हम यहाँ से दूर चले जायेंगे । दूर । बहुत दूर । बहुत दूर । बहुत दूर ।
- कितनी दूर ? वह उदास हँसी हँसती हुयी आसमान में उसकी ओर देख कर बोली - विशाल..कितनी दूर ?
- शायद । वह बेहद प्रेम से उसको देखता हुआ बोला - शायद..इस धरती के पार । किसी नयी दुनियाँ में ।  वहाँ । जहाँ दो प्रेमियों के मिलने पर कोई रोक न हो ।
- चल पागल । अचानक वह जोर से खिलखिलाई - वहाँ कैसे जायेंगे भला । तुम सचमुच दीवाने हो ।
यकायक वह जोर जोर से पागलों की भांति हँसने लगी । फ़िर वह लहरायी । और चक्कर खाती हुयी छत पर गिर गयी ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । चाँद जैसे उसको देख कर रो पङा ।
- हा..। अचानक वह चौंक कर उठ बैठी । उसके सीने पर हाथ रखकर किसी ने हिलाया था । उसके मुँह से चीख निकलने को हुयी । पर तभी उसने उसके मुँह पर हाथ रख दिया । रोमा का कलेजा जोरों से धक धक कर रहा था ।
रात को टहलते टहलते उसकी याद में रोते हँसते हुये वह अचानक चक्कर खाकर गिर गयी थी । और पता नहीं कितनी देर बेहोश रही थी । कई दिनों से उसने ठीक से खाना भी न खाया था । और बेहद कमजोर हो चुकी थी ।
- तुमऽऽ । वह हैरत से फ़ुसफ़ुसा कर बोली - तुम ऊपर कैसे आ गये ? भाग जाओ विशाल । वरना ये लोग तुम्हें मार डालेंगे ।
- परवाह नहीं । वह दीवाना सा उसको चूमता हुआ बोला - वैसे ही तेरे बिना कौन सा जीवित हूँ मैं । ऐसे जीने से हमारा मर जाना ही अच्छा है ।
वह बिलकुल ठीक कह रहा था । वह ही कहाँ इस तरह जीना चाहती है । उनका जीना एक दूसरे के लिये हो चुका था 


। उसके मुर्दा जिस्म में वह अचानक प्राण बन कर आया था । और खुशियाँ जैसे अचानक उस रात उसकी झोली में आ गिरी थी । जैसे भाग्य की देवी मेहरबान हुयी हो ।
- खाना । वह कमजोर स्वर में बोला - मुझसे खाना भी न खाया गया । मैं भूखा हूँ ।
उसके आँसू निकल आये । अब खाना कहाँ से लाये वो । खाना तो उसने शाम को ही फ़ेंक दिया था । और जीने में ताला लगा था । खाने का कोई उपाय ही न था । वेवशी में वह रोने को हो आयी । और अभी कुछ कहना ही चाहती थी ।
- चल । वह कुछ खोलता हुआ सा बोला - हम दोनों खाना खाते हैं । माँ ने हम दोनों के लिये पराठें बनाये हैं । बहुत सारे ।
दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम । वो भूखा उठाता अवश्य है । पर भूखा सुलाता नहीं । जलचर जीव बसे जल में । उनको जल में भोजन देता । नभचर जीव बसे नभ में । उनको नभ में भोजन देता । कहीं भी कैसी भी कठिन से कठिन स्थिति हो । वो भूखे को भोजन देता है । वो अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकता । भूखा नहीं रहने देता । फ़िर दो प्रेमियों को कैसे रहने देता ?
नीबू के अचार से वो माँ की ममता के स्वादिष्ट पराठें एक दूसरे को अपने हाथ से खिलाने लगे । वो खा रहे थे । और निशब्द रो रहे थे । आँसू जैसे उनके दिल का सारा गम ही धोने में लगे थे ।
- विशाल । वह  निराशा से बोली - हमारा क्या होगा ? हम कैसे मिल पायेंगे ।
- तू चिन्ता न कर । वह उसको थपथपा कर बोला - हम यहाँ से भाग जायेंगे । बहुत दूर । फ़िर हमें कोई जुदा न कर पायेगा ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात की रानी उसको अकेला देख कर बात करती हुयी बोली ।
- कभी नहीं । वह चंचल मुस्कान से उत्तर देते हुये बोली - कैसे भूल सकती हूँ ।
कहाँ और किस हाल में होगा वह ? उसने टहलते हुये सोचा । उस रात तब उसकी जान में जान आयी । जब दो घन्टे बाद वह सकुशल वापिस उतर कर चला गया । और कहीं कैसी भी गङबङ नहीं हुयी । पर अभी आगे का कुछ पता न था । क्या होगा ? कैसे होगा ? कोई उपाय भी न था । जिससे वह कुछ खोज खबर रख सकती थी ।
उसकी रात ऐसे ही टहलते हुये बीतती थी । उसकी माँ भाभी घर के और लोग उसकी हालत जानते थे । लेकिन शायद कोई कुछ न कर सकता था । सब जैसे अपने अपने दायरों में कैद थे । दायरे । सामाजिक दायरे । जैसे वह छत के दायरे में कैद थी ।
प्यार उसे आज कैसे मोढ पर ले आया था । प्यार से पैदा हुयी तनहाई । जुदाई से पैदा हुयी तङप । विरह से पैदा 


हुयी कसक । शायद आज उसे  वास्तविक प्यार से रूबरू करा रही थी । वास्तविक प्यार । जिसमें लङके को सुन्दर लङकी का खिंचाव नहीं होता । लङकी को उसके पौरुषेय गुणों के प्रति आकर्षण नहीं होता । यह सब तो वह देख ही नहीं पाते थे । सोच ही नहीं पाते थे । वह तो मिलते ही एक दूसरे की बाहों में समा जाते । और एक दूसरे की धङकन सुनते । बस इससे ज्यादा प्यार का मतलब ही उन्हें न पता था ।
दैहिक वासना ने जैसे उनके प्यार को छुआ भी न था । उस तरफ़ उनकी भावना तक न जाती थी । कभी कोई ख्याल तक न आता ।
उसने उसके वक्षों पर कभी वासना युक्त स्पर्श तक न किया था । उसने कभी वासना से उसके होंठ भी न चूमे थे । उसने कभी जी भर कर उसका चेहरा न देखा था । उसकी आँखों में आँखें न डाली थी । और खुद उसे कभी ऐसी चाहत न हुयी कि वह ऐसा करे । फ़िर उनके बीच किस प्रकार के आकर्षण का चुम्बकत्व था ? जो वे घन्टों एक दूसरे के पास बैठे एक अजीब सा सुख महसूस करते थे । बस एक दूसरे को देखते हुये । एक दूसरे की समीपता का अहसास ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात में जागने वाली टिटहरी उससे बोली ।
- हाँ री । वह प्यार से बोली - तू सच कहती है । नहीं भूलूँगी । कभी नहीं ।
क्या अजीब होता है ये प्यार भी । क्या कोई जान पाया । उसने टहलते हुये सोचा । शायद यही होता है प्यार । जो

आज उसने इस नजरबन्दी में महसूस किया । प्यार पे जब जब पहरा हुआ है । प्यार और भी गहरा गहरा हुआ है । ये दुनियावी जुल्म उसे प्यार से दूर करने के लिये किया गया था । पर क्या ये पागल दुनियाँ वाले नहीं जानते थे । इससे उसका प्यार और भी गहरा हुआ था । अब तो उसकी समस्त सोच ही सिर्फ़ विशाल पर ही जाकर ठहर गयी थी । सिर्फ़ विशाल पर ।
प्यार तो जैसे दो शरीरों का नहीं । दो रूहों का मिलन होता है । जन्म जन्म से एक दूसरे के लिये प्यासे दो इंसान । सदियों से एक दूसरी की तलाश में भटकते हुये । फ़िर कभी किसी जन्म में जब मिलते हैं । एक दूसरे को पहचान लेते हैं । और एक दूसरे की ओर खिंचने लगते हैं । और एक दूसरे के आकर्षण में जैसे किसी अदृश्य डोर से बँध जाते हैं ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात में फ़ैली खामोशी बोली ।
- हाँ । वह शून्य 0 में देखती हुयी बोली - प्यार नहीं भुलाया जा सकता ।
- बेटी । उसकी माँ बोली - आखिर तूने क्या सोचा । ऐसा कब तक चलेगा ।
- माँ  ! वह उस उदास रात में छत पर टहलती हुयी भावहीन सी कहीं खोयी खोयी उसको देखते हुये बोली - शायद  तुम प्यार को नहीं जानती । प्यार क्या अजीव शै है । इसे सिर्फ़ प्रेमी ही जान सकते हैं । प्यार की कीमत सिर्फ़ प्रेमी ही जान सकते हैं । जिसके दिल में प्यार ही नहीं । वो इसे कभी नहीं समझ सकते । हाँ माँ कभी नहीं समझ सकते ।
प्यार के लिये तो । वह मुँडेर पर हाथ रख कर बोली - अगर जान भी देनी पङे । तो भी प्रेमी खुशी खुशी सूली चढ जाते हैं । प्यार की ये शमा अपने परवाने के लिये जीवन भर जलती ही रहती है । पर..पर तुम दुखी न हो माँ । मुझे तुझसे और अपने बाबुल से कोई शिकायत नहीं । शायद विरहा की जलन में सुलगना हम प्रेमियों की किस्मत में ही लिखा होता है ।
मजबूर सी ठकुराइन यकायक रो पङी । उसने अपनी नाजों पली बेटी को कस कर सीने से लगा लिया । और फ़ूट फ़ूट कर रोने लगी । वह दीवानी सी इस पगली मोहब्बत को चूम रही थी । उसकी फ़ूल सी बेटी के साथ अचानक क्या हुआ था । उसकी किस्मत ने एकाएक कैसा पलटा खाया था ।
- हे प्रभु ! उसने दुआ के हाथ उठाये - मेरी बेटी पर दया करना । दया करना प्रभु । इसके जीवन की गाङी कैसे चलेगी ।

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