रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 21

छुक..छुक..छुक का मधुर संगीत गुनगुनाती रेल मानों प्यार की पटरी पर दौङते हुये मंजिल की ओर जाने लगी । किसी बुरे ख्वाव की तरह दुखद अतीत जैसे पीछे छूट रहा था । उसने खिङकी से बाहर झाँका ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । ट्रेन के साथ साथ तेजी से पीछे छूटते हुये पेङ बोले ।
- हाँ हाँ नहीं भूलूँगी । वह शोख निगाहों से बोली - कभी नहीं ।
जिन्दगी का सफ़र भी जैसे रेल की तरह उमृ की पटरी पर दौङ रहा है । गाङी दौङने लगी थी । किसी समाज समूह की तरह अलग अलग मंजिलों के मुसाफ़िर अपनी जगह पर बोगी में बैठ गये थे । रोमा के सामने ही एक युवा प्रेमी लङका खिङकी से बाहर झांकता हुआ अपने मोबायल पर बजते गीत भाव में बहता हुआ अपनी प्रेमिका की याद में खोया हुआ था - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । प्यार क्या शै है मियाँ.. प्यार की कीमत जानो । प्यार कर ले कोई उसे । तो गनीमत जानो । ये दुनियाँ प्यार के किस्से । ये दुनियाँ प्यार के किस्से । मुझे जब भी सुनाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- बेटी । उसकी माँ बोली - जिद्दी ठाकुर ने फ़ैसला किया है । तुझे शहर के मकान में रखेंगे । तू वहीं रह कर अपनी पढाई करेगी । आखिर तुझे कब तक यूँ कैद में रखें । मुझे दुख है । भगवान ने जाने क्या तेरी किस्मत में लिखा है ।
- माँ । वह भावहीन स्वर में बोली - हम प्रेमियों की किस्मत भगवान नहीं लिखते । प्रेमी स्वयं अपनी किस्मत लिखते हैं । प्रेमियों की जिन्दगी के प्रेम गृन्थ के हर पन्ने पर सिर्फ़ प्रेम लिखा होता है । एक दूसरे के लिये मर मिटने का प्रेम ।
वह ठाकुर की पत्नी थी । लेकिन उससे ज्यादा उसकी माँ थी । अपनी पगली दीवानी लङकी के लिये वह क्या करे ।

जिससे उसे सुख हो । शायद वह किसी तरह भी न सोच पा रही थी ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । खिङकी से नजर आते गाँव बोले ।
- तुम ठीक कहते हो । वह प्यार से बोली - नहीं भूलूँगी ।
न चाहते हुये भी उस विरहा गीत के मधुर बोल फ़िर उसे खींचने लगे । किस प्रेमी के दिल की तङप थी यह - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । कभी खुशबू भरे खत को सिरहाने रख कर सोती थी । कभी यादों में बिस्तर से लिपट कर खूब रोती थी । कभी आँचल भिगोती थी । कभी तकिया भिगोती थी । कभी तकिया भिगोती थी । ये उसकी सादगी है जो । ये उसकी सादगी है जो । हमें अब भी रुलाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
जुदाई में याद की तङप से और भी तङपाते मधुर गीत ने डिब्बे में एक सन्नाटा सा कर दिया था । हरेक को जैसे अपना प्रेमी याद आ रहा था । लङके के चेहरे पर प्रेम उदासी फ़ैली हुयी थी । ठीक सामने बैठी सुन्दर जवान लङकी रोमा तक में उसकी कोई दिलचस्पी न थी । उसने उसे एक निगाह तक न देखा था । और  अपनी प्रेमिका की विरह याद में खोया वह लगातार खिङकी से बाहर ही देख रहा था । पता नहीं इसकी प्रेमिका कहाँ थी ? उसने सोचा । और पता नहीं उसका प्रेमी कहाँ था ?
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । गीत के बोलों में प्रेमियों की रूह बोली ।
- नहीं भूलूँगी । वह गुनगुनाई - मैं नहीं भूल सकती ।
दीन दुनियाँ से बेखबर वह प्रेमी नम आँखों से जैसे रेल के सहारे दौङती अधीर प्रेमिका को ही देख रहा था । दोनों की एक ही बात थी । उसकी कल्पना में प्रेमी था । और उसकी कल्पना में उसकी प्रेमिका -  तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना 


तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । चली आती थी मिलने के लिये । मुझे वो बहाने से । गुजरती थी कयामत । दिल पर उसके लौट जाने से । मुझे बेहद सुकूं मिलता । हाँ उसके मुस्काराने से । उतर कर चाँदनी सी जब वह । छत पर मुस्कराती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । खिङकी से नजर आते बच्चे हाथ हिलाकर बोले ।
- ना ना । वह मुस्करा कर बोली - नहीं भाई । कैसे भूलूँगी ।
प्रेमियों को ये दुनियाँ शायद कभी नहीं समझ सकती । डिब्बे में आते जाते लोग अपनी अपनी धुन में खोये हुये थे । जैसे सबको अपनी मंजिल पर पहुँचने का इंतजार हो । शायद उनमें से बहुतों की मंजिल कुछ ही  आगे आनी वाली थी । लेकिन उसकी मंजिल तक पहुँचने के लिये गाङी कैसे  टेङे मेङे रास्तों पर और जायेगी । उसे पता न था । कुछ भी पता न था । वो अभी भी किसी कैदी की भांति एक जेल से दूसरी जेल में जा रही थी । लेकिन क्या सारे प्रेमियों की कहानी एक ही होती है ? फ़िर क्यों उन दोनों को ये प्रेम गीत अपना ही गीत लग रहा था । हाँ बिलकुल अपना - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना वो मेरा नाम । वो मेरा नाम । वो मेरा नाम गीतों के । बहाने गुनगुनाती थी । मैं रोता था तो वो भी आँसुओं में डूब जाती थी । मैं हँसता था तो मेरे साथ । वो भी मुस्कराती थी । वो भी मुस्कराती थी । अभी तक याद उसकी प्यार के मोती लुटाती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । गाङी में चढती हुयी छात्र लङकियाँ बोली ।
- ना भई ना । वह अदा से बोली - कैसे भूलूँगी भला ।
- समय । उसकी माँ बोली - ये क्रूर समय इंसान को बङी से बङी अच्छी बुरी बात भुला देता है । मुझे उम्मीद है बेटी । समय के साथ साथ तू अपना अच्छा बुरा खुद सोच पायेगी । देख बेटी । किसी भी इंसान को उसका मनचाहा हमेशा नहीं मिलता । जिन्दगी के रास्ते बङे टेङे मेङे हैं । उतार चढाव वाले हैं । तू अभी कमसिन है । नादान है । तुझे जिन्दगी की समझ नहीं । उसकी हकीकत से तेरा अभी कोई वास्ता नहीं ।
जिन्दगी की हकीकत । क्या है जिन्दगी की हकीकत ? वह नहीं जानती थी । बस उसे प्यार की हकीकत पता थी । इस प्यार के रोग की सिर्फ़ वह अकेली तो रोगी नहीं थी । ये लङका भी था । जिसे उसी की तरह दीन दुनियाँ से कोई मतलब न रहा था । मतलब था । तो ख्यालों में मचलती अपनी हसीन प्रेमिका से - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । जहाँ मिलते थे दोनों । वो ठिकाना याद आता है । वफ़ा का दिल का चाहत का । फ़साना याद आता है कि उसका ख्वाव में आकर । सताना याद आता है । सताना याद आता है । वो नाजुक नर्म अकेली अब भी । मुझको खुद बुलाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रास्ते में आये शहर बोले ।
- ओ हो.. नहीं नहीं । वह उस उदास प्रेमी को देखती हुयी बोली - हाँ नहीं भूलूँगी ।
- माँ । वह बोली - मैं कोशिश करूँगी कि सबका साथ निभा सकूँ । तेरा । बाबुल का । अपने राँझे का । देख ना माँ । अगर मैं बेवफ़ाई करूँगी । तो सच्चे प्रेमी बदनाम हो जायेंगे । प्रेमियों के अमर किस्से झूठे हो जायेंगे । फ़िर एक लङका लङकी आपस में प्रेम करना ही छोङ देंगे । सबका प्रेम से विश्वास जो उठ जायेगा । तुम बताओ माँ । क्या गलत कह रही हूँ मैं ? माँ इस दुनियाँ में प्रेम ही सत्य है । बाकी रिश्ते झूठे हैं ।


अगर ये सत्य न होता । उसके दिल ने कहा । तो फ़िर इस दुनियाँ में इतने प्रेम गीत भला क्यों गूँजते । सृष्टि के कण कण में गूँजते प्रेम गीत - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । वो कालिज का जमाना मुझे नश्तर चुभोता है । और उसकी याद का सावन । किताबों को भिगोता है ।  अकेले में अभी मुझको । यही महसूस होता है कि जैसे आज भी..कि जैसे आज भी । कालिज में पढने रोज जाती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । उदास खामोश सूना सूना घर उससे बोला ।
- अरे नहीं । वह प्रेमियों की मन पसन्द तनहाई में विचरती हुयी बोली - नहीं भूल पाऊँगी ।
विरहा की आग ने उस प्रेमिका को जलाते हुये उसकी मोहब्बत को दीवानगी में बदल दिया था । वह पगली हो गयी थी । दीवानी हो गयी थी । समस्त प्रेमियों की आत्मा जैसे उसमें समा गयी थी । अब वह रोमा न रही थी । लैला हो गयी । हीर हो गयी । शीरी । जुलियट हो गयी । ये जुदाई । ये तन्हाई । ये सूनापन उसका साथी था । बङा ही प्यारा साथी । क्योंकि यहाँ उसकी कल्पना में बेरोक टोक उसका प्रेमी उसके साथ था । शायद यही प्रेम है । शायद यही प्रेम है ।
उसने एक बार घूम फ़िर कर पहले से ही देखे हुये अपने उस बाप दादा के घर को देखा । और नल से मुँह धोने बङी ।

तभी मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुयी । आश्चर्य से उसने दरवाजा खोला । और फ़िर उसका मुँह खुला का खुला रह गया । दरवाजे पर विशाल खङा था । सूनी सूनी आँखों से उसे ताकता हुआ ।
- तुम । वह भौंचक्का होकर बोली ।
- जिन्दा रहने के लिये । वह बेहद कमजोर स्वर में बोला -  तेरी कसम । एक मुलाकात जरूरी है सनम । हाँ रोमा । मैं तेरे साथ ही आया हूँ । उसी ट्रेन से । पर तू अकेली नहीं थी । इसलिये तेरे पास नहीं आया । मुझे पता चल गया था । ठाकुर साहब तुझे शहर भेज रहे हैं । जहाँ तेरा पुश्तैनी मकान है । फ़िर मैं यहाँ आ गया ।
और फ़िर स्वाभाविक ही वे एक दूसरे से लिपट गये । उन्होंने अब तक जो नहीं किया था । वो खुद हुआ । उनके होंठ आपस में चिपक गये । और वे एक दूसरे को सहलाते हुये पागलों की भांति चूमने लगे ।
- ये घर । रोमा बिस्तर ठीक करती हुयी उसे आराम से बैठाकर बोली - हमारी पुरानी जायदाद है । जिसका इस्तेमाल अब हमारे कारोबार के सामान आदि रखने के लिये गोदाम के रूप में किया जाता है । इसकी बन्द घर जैसी बनाबट भी किसी गोदाम के समान ही है । और इसमें सबसे अच्छी बात है । वह कमरे में एक निगाह डालकर बोली - यह तलघर । इसमें तुम आराम से छुप कर रह सकते हो । भले ही हमारे घर के लोग कभी कभी आते जाते बने रहे ।
पर दीवानों को ये सब कहाँ सुनायी देता है । वह तो अपलक उसे ही देखा जा रहा था । अपनी माशूका को । जिसे आज बहुत दिनों बाद देखने का मौका मिला था । बहुत दिनों बाद छूने का मौका मिला था । रोमा को छोङने आये

लोग उनके ट्रांसपोर्ट कारोबार आफ़िस चले गये थे । और शायद ही आज लौटते । रात को कोई नौकर भले ही आ जाता ।
शाम के चार बज चुके थे । उसने पूरी तरह से सुहागिन का श्रंगार किया था । और दरवाजा ठीक से लाक करके आराम से उसके पास तलघर में बैठी थी । आज उसने एक फ़ैसला किया था । पूरी सुहागिन होने का । आज वह अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहती थी । जिसकी विशाल को कोई ख्वाहिश न थी । पर उसको थी । और जाने कब से थी । क्या पता कल क्या हो जाये ? फ़िर उसके पास उन दोनों के मधुर मिलन की यादें तो थी । उसके मांग में सजी सिन्दूर की मोटी रेखा । माथे पर दमकती बिन्दियाँ । होंठों पर चमकती लाली । और हाथों में खनकते कंगन । उस एकदम नयी नवेली दुलहिन के लिये जैसे विवाह गीत गा रहे थे । वह खामोश तलघर उनके मधुर मिलन के इन क्षणों को यादगार बनाने के लिये जैसे बैचेन हो रहा था ।

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