रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 22

उफ़ ! आज कितने मुद्दत के बाद यह समय आया था । जब वह अपने राँझे के सीने पर सर रख कर लेटी थी । और समय जैसे ठहर गया था । काफ़ी देर हो चुकी थी । और वह विशाल की तरफ़ से किसी पहल का इंतजार कर रही थी । पर वह उसकी पीठ सहलाता हुआ खामोश छत को देख रहा था । जैसे शून्य 0 में देख रहा हो । आखिरकार उसकी सांकेतिक चेष्टाओं से वह प्रभावित होने लगा । और उसने रोमा के ब्लाउज पर हाथ रखा ।
और तभी खट की आवाज से दोनों चौंक गये । उन्होंने घूमकर आवाज की दिशा में देखा । तलघर की सीङियों पर उसका बाप ठाकुर जोरावर सिंह एक आदमी के साथ खङा था । उसकी पत्थर सी सख्त आँखों में क्रूरता की पराकाष्ठा झलक रही थी । उसके हाथ में रिवाल्वर चमक रहा था । एक पल को रोमा के होश उङ गये । पर दूसरे ही पल उसके चेहरे पर दृढता चमक उठी ।
- तूने वचन भंग किया बेटी । वह भावहीन खुरदुरे स्वर में बोला - अब मैं मजबूर हुआ । अब दोष न दियो मुझे ।
वह बिस्तर से उठकर खङी हो गयी । और सूनी आँखों से उस प्यार के दुश्मन जल्लाद को देखने लगी । जिसके साथी के चेहरे पर हैरत नाच रही थी । यकायक उसे कुछ न सूझा । क्या करे । क्या न करे । रहम की भीख माँगे । या बेटी बाबुल से प्यार माँगे । कैसे और क्या माँगे । उस पत्थर दिल इंसान में कहीं कोई गुंजाइश ही नजर न आती थी ।
- पापा । फ़िर स्वतः ही उसके मुँह से निकला - वचन भंग हुआ । उसके लिये । मैं माफ़ी चाहती हूँ आपसे । पर ये मेरा प्यार है ।.. मैं क्या करूँ । हम दोनों एक दूजे के बिना नहीं रह सकते ।.. नहीं रह सकते बाबुल । अगर मारना ही है । तो उसको मारने से पहले मुझे मारना होगा । हम साथ जीयेंगे । साथ मरेंगे । और ये उस लङकी की आवाज है । जिसकी रगों में आपके ही खानदानी ठाकुर घराने का खून दौङ रहा है । हमारे जिस्म मर जायेंगे । पर हमारी मोहब्बत कभी नहीं मरेगी ।..पापा मैं तो आपकी बेटी ही हूँ । वह भर्रायी आवाज में बोली - आपने ही मुझे जन्म 


दिया बाबुल । आपकी ही गोद में खेलकर बङी हुयी हूँ । आप ही मार भी दोगे । तो क्या दुख । कैसा दुख ।
वाकई आज ये एक कमजोर लङकी की आवाज नहीं थी । ये मोहब्बत की बुलन्द आवाज थी । उसकी आवाज उस जालिम की आवाज को भी कमजोर कर रही थी । उसमें एक चट्टानी मजबूती थी । उसमें ठाकुरों के खून की गर्मी थी । जोरावर का रिवाल्वर वाला हाथ कांप कर रह गया ।
इतना सस्ता भी नहीं होता । दो इंसानों का जीवन । मारने का ख्याल करना अलग बात है । और मारना अलग बात । क्रोध में अँधा होकर क्या करने जा रहा था वह ? उसने सोचा । आखिर क्या गलती की उसकी मासूम बेटी ने ? जोरावर ये क्या अनर्थ करने जा रहा है तू । उसका कलेजा कांप कर रह गया । अन्दर ही अन्दर वह कमजोर पङने लगा ।
खुद ब खुद उसके दिमाग में उसके नन्हें बचपन की रील चलने लगी । जब वह अपनी फ़ूल सी बेटी को एक कंकङ चुभना भी बरदाश्त नहीं कर सकता था । वह अपनी ही गलती से गिर जाती थी । और वह आग बबूला होकर तमाम नौकरों को कोङे मारता था । आखिर मेरी बेटी गिरी तो गिरी क्यों । क्यों ? उसके मुँह से निकली बात आधी रात को भी पूरी की जाती । उसकी एक मुस्कान के लिये वह हीरे मोती लुटा डालता । कितने ख्वाव थे उसके । उसको अपने हाथों डोली में विदा करने के मधुर ख्यालों में वह कितनी बार रोया । और आज । आज क्या हो गया उसे ? अगर उसकी बेटी ने अपने सपनों का राजकुमार खुद चुना था । तो इसमें कौन सा आसमान टूट गया था । नहीं । वह ऐसा कभी नहीं कर सकता कि अपनी ही राजकुमारी को अपने ही हाथों से मार डाले ।
- हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । उसके दिमाग में ठाकुरों के सख्त चेहरे अट्टाहास कर उठे - तेरी बेटी ने खानदान की नाक कटवा दी । एक गङरिया ही मिला तुझे दामाद बनाने को । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । एक पाल लङका । हा ..हा..हा ठाकुरों ! तुम्हारी औरतें बाँझ हो गयी । अब ठाकुरों की बेटियाँ ऐसी जातियों में शादियाँ करेगी । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । तेरी गर्दन नीची कर दी । इस नीच वैश्या लङकी ने ।  हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।..अरे नहीं नहीं । ठाकुर जोरावर सिंह नहीं ।.. जोरावर गङरिया । जोरावर गङरिया ।. जोरावर पाल । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।. जोरावर पाल । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।
वह पागल हो उठा । और न सुन सका । एक क्रूरता फ़िर से उसके कठोर चेहरे पर छा गयी । उसने उन दोनों की

तरफ़ से नजर फ़ेर ली । और रिवाल्वर वाला हाथ सीधा किया ।
एक । दो । तीन । एक के बाद एक तीन गोलियाँ दनदनाती हुयी उसके रिवाल्वर से निकली । और विशाल के सामने तनकर खङी हो गयी रोमा के बदन में समा गयी । खामोश शान्त तलघर उन प्रेमियों की हाहाकारी चीखों से गूँज उठा ।
यकायक । यकायक । जैसे जोरावर होश में आया । ये तो रोमा की चीख थी । उसकी प्यारी बेटी की चीख । उसकी मासूम फ़ूल सी बच्ची की चीख । उसने चौंककर निगाह सीधी की । रोमा की आँखे पथरा सी गयी थी । विशाल उससे लिपट कर रो रहा था । उसने फ़िर से हाथ सीधा किया । और दीवानगी में घोङा दबाता चला गया । विशाल का सर किसी फ़टे तरबूज की भांति ऐसे बिखर गया । जैसे सिर कभी था ही नहीं । सिर्फ़ धङ ही था । उसने घोर नफ़रत से रिवाल्वर को फ़ेंका । और दोनों लाशों से लिपट कर फ़ूट फ़ूट कर रोने लगा ।
- मुझे माफ़ कर देना बेटी । वह जार जार रोता हुआ दीवाना सा उसे चूमता हुआ बोला -. मुझे माफ़ कर देना । तुझे तेरे बाबुल ने नहीं मारा ।.. तुझे ठाकुर ने मारा ।.. ठाकुर जोरावर सिंह ने । हत्यारे ठाकुर जोरावर सिंह ने ।..सब ठाकुरों ने मिलकर.. मेरी प्यारी बेटी को मार डाला ..उठ बेटी ..उठ..मैं तेरा बाबुल । एक बार ..बस एक बार..एक बार..अपने बाबुल को गले लग कर बोल - पापा मैंने तुम्हें माफ़ किया ।
मितवाऽऽ.. भूल नऽऽ जानाऽऽ । निमाङ की हरी भरी वादियों में उस सच्चे प्रेमी की आवाज जैसे अभी भी गूँज रही थी - नहीं जानता रोमा ।..पर मैं ये जानता हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगा । अगर ये लोग हमें मिलने नहीं देंगे । फ़िर हम यहाँ से दूर चले जायेंगे । दूर । बहुत दूर । बहुत दूर । बहुत दूर ।
- कितनी दूर ? वह उदास हँसी हँसती हुयी बोली - विशाल..कितनी दूर ?
- शायद । वह प्रेम से उसको देखता हुआ बोला - शायद..इस धरती के पार । किसी नयी दुनियाँ में ।  वहाँ । जहाँ दो प्रेमियों के मिलने पर कोई रोक न हो ।
- चल पागल । अचानक वह जोर से खिलखिलाई - वहाँ कैसे जायेंगे भला । तुम सचमुच दीवाने हो ।
- नितिन जी ! वह पहाङी पर चहलकदमी सी करती हुयी बोली - हम जहाँ खङे हैं । ये वही वादियाँ हैं । जहाँ कभी

हमारे प्यार के गीत गूँजे थे । विशाल ने एकदम सच ही कहा था । हम एक नयी दुनियाँ में । उस दुनियाँ से.. बहुत दूर आ गये थे । मुझे दो गोली छाती में । एक पेट में लगी थी । पर मेरे प्राण नहीं निकल रहे थे । वे तो जैसे विशाल का इंतजार कर रहे थे । वह मुझसे लिपट कर रो रहा था । तभी कुछ क्षणों बाद मुझे उसकी दर्दनाक चीख सुनायी दी । और इसके साथ ही मेरी रूह ने शरीर को छोङ दिया ।
मौत । क्या होती है मौत ? हमें पता ही न चला । क्योंकि हम तो मरे ही न थे । गोलियाँ हमारा कुछ न बिगाङ सकी थी । हम तो ज्यों के त्यों जीवित थे । और एकदम ठीक थे । मौत हुयी थी । पर हमारी नहीं । शरीर की । हम तो जैसे के तैसे जमीन से उठकर जैसे वापिस बिस्तर पर आ गये थे । मेरा बाप हम दोनों के शरीर से लिपट कर रो रहा था । बार बार हमारे पैर पकङ कर माफ़ी माँग रहा था । तुम्हें हैरानी होगी नितिन । मुझे उस पर सचमुच दया आ रही थी ।
क्योंकि वास्तव में उसने मुझे नहीं मारा था । एक बाबुल अपनी बेटी को कभी मार भी नहीं सकता । हमें कट्टर

ठाकुर जाति ने मारा था । एक झूठी शान की हिंसक खूनी परम्परा पर उसने अपनी नाजों पली बेटी की बलि चढा दी । फ़िर मुझे अपने बाप से क्या शिकायत होती । मुझे मारने वाला ठाकुर था । और अब फ़ूट फ़ूट कर रो रहा मेरा बाप था । तब मुझे भी रोना आ रहा था । मैं उसको तसल्ली देना चाहती थी । पर कैसे ? नितिन जी कैसे ? क्योंकि अब हम उस दुनियाँ में थे ही नहीं ।
- फ़िर आपने । अचानक नितिन बोला - पदमा जी के रूप में जन्म लिया । और विशाल जी ने ?
वह यकायक खिलखिला कर हँसने लगी । अतीत के उस दुखद उदास कथानक की धुँध जैसे नितिन के उस मासूम से सवाल पर उस दिलकश औरत की मधुर हँसी के साथ खील खील होकर बिखर गयी ।
- अरे कहाँ नितिन जी । वह शोख मुस्कान के साथ उसको देखती हुयी बोली - आप भी कैसी बातें करते हो । मैंने पदमा क्या । किसी भी रूप में कोई जन्म ही नहीं लिया । अभी तक नहीं लिया । पदमा अलग है । मैं अलग हूँ । आप भी कमाल के हो ।
उसके दिमाग में मानों भयंकर विस्फ़ोट हुआ । पदमा अलग है । मैं अलग हूँ । फ़िर ये कौन है ? उसने एकदम चौंक कर उसकी ओर देखा । उसे । जो बेहद शरारत से उसी को देखती हुयी हँस रही थी । और जैसे आँखों ही आँखों में मौन खुला चैलेंज कर रही थी - क्या कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । राजीव । .. कहानी जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है । ये कहानी है ।..
फ़िर अचानक वह सब कुछ भूल कर उससे लिपट गयी । और दीवानी सी उसके होंठ चूमने लगी । नितिन का बदन फ़िर फ़ूल सा हल्का होने लगा । और उन दोनों के पैर वादियों की सर जमीं से उखङ गये ।

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