रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 23

- नितिन जी ! प्यार शायद कुछ अलग ही होता है । पदमा छत पर किनारे की ओर बढती हुयी बोली - शायद प्यार को समझ पाना हरेक के बस की बात नहीं । दरअसल हम जिसे प्यार मान लेते हैं । वह हमारे अंतर में कहीं गहरे छुपी दैहिक वासना ही होती है । प्यार की सही अनुभूति के लिये इंसानी शरीर का होना बहुत आवश्यक है ।..और ये सत्य । जिसे मैं जीते जी न जान सकी । मरने के बाद बिना किसी प्रयास के मेरी समझ में आ गया । अनुभव में आ गया ।
कहते भी हैं । दो प्रेमियों को जब ये बेरहम दुनियाँ जीते जी नहीं मिलने देती । तब वे मर कर एक हो जाते हैं । कम से कम ये बात हमारे ऊपर तो सत्य हुयी थी । हम एक हो चुके थे । अब कोई कैसी भी रोक टोक नहीं थी । हम में एक दूसरे के लिये प्यार भी था । पर प्यार की वह तङप जाने क्यों खत्म हो गयी थी । जो मजा उस वक्त जुदाई में था । मिलन में न रहा ।  हमारे सीने में दिल तो था । पर उस दिल में प्रेम की सुलगती हूक न थी । वह अनजान जजबाती आग जैसे बुझ ही गयी ।
तब मैंने कई बार इस बात पर सोचा । और यही निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य शरीर में कोई खास बात ऐसी है । जो प्यार की अलग ही अनुभूति कराती है । पर अब क्या हो सकता था । हम बाजी हार चुके थे । कुछ भी हो । मैं सत्य कहती हूँ । जो प्यार की आग तब मैं जलती हुयी महसूस करती थी । वो बाद में न रही । विशाल की भी वो तङप वो बेकरारी खत्म सी हो गयी ।
हम इसी बन्द घर में रहने लगे । प्रेमी मिल गये । पर प्रेम खो गया । ठाकुर जोरावर सिंह को जैसे इस घर से

नफ़रत ही हो गयी । घर । जो उसकी बेटी का हत्यारा था । कब्रगाह था । उसने इस घर में ताला डाल दिया । पर शायद..शायद उसको भी मालूम न था कि उसकी बेटी अपने प्रेमी के साथ इसी घर में रहती है । और फ़िर धीरे धीरे समय गुजरने लगा ।
समय । जो एक छोटी बालिका को लङकी में बदल देता है । लङकी को जवान लङकी में । और जवान लङकी को जवान औरत में । और जवान औरत को परिपक्व औरत में । परिपक्व औरत । सेक्स की भूखी । और अभ्यस्त औरत । भूख । सेक्स..सेक्स..सिर्फ़ सेक्स ।
- आऽऽह । वह कराही - मैं प्यासी हूँ ।
- नितिन जी ! मौत के बाद 5 तत्वों का स्थूल शरीर छूट जाने पर इस अजीव शरीर में इंसानी शरीर जैसे बदलाव नहीं होते । वह वैसा का वैसा ही ठहर जाता है । जैसा मौत के समय था । बच्चा मरे तो बच्चा । बूढा मरे तो बूढा ही रहेगा । पर कामनायें जवान हो जाती हैं । तब एक बूढा अशरीरी भी वासना का ऐसा ही भूखा हो जायेगा । क्योंकि उसके इस शरीर में बुढापे की निर्बलता नहीं होती । और आप जानते ही हैं । इंसान हमेशा शरीर से बूढा होता है । दिल से जवान ही रहता है ।
रात धीरे धीरे अपने सफ़र को पूरा कर रही थी । वह बङे कृमबद्ध ढंग से बाकायदा कहानी को सुना रही थी । पर उसकी समझ में जैसे कुछ भी नहीं आ रहा था । क्या अजीब घनचक्कर कहानी थी । ये ही नहीं पता लग रहा था । शुरू हो रही है । खत्म हो रही है । या बीच में ही अटक गयी । या फ़िर कोई कहानी है भी या नहीं ? वह जितना आगे कहानी सुनाती जा रही थी । कहानी सुलझने के बजाय और उलझती ही जा रही थी । आखिर क्या एण्ड है इस कहानी का ? उसका दिमाग जैसे घूमकर रह गया ।
- आऽऽह । अचानक वह तङप उठी - मैं प्यासी हूँ ।
- तब नितिन जी ! वह झुक कर नीचे आँगन में झांकती हुयी बोली - मेरे अन्दर भी भयंकर काम वासना जाग उठी । मेरा समस्त चिन्तन सिर्फ़ दैहिक वासना को तृप्त करने पर केन्द्रित हो गया । योनि वासना । और इसीलिये फ़िर धीरे धीरे मुझे मनुष्यों से नफ़रत होने लगी । घोर नफ़रत । क्योंकि इसी मनुष्य के सामाजिक नियमों ने हमारा वह शरीर हमसे छीन लिया था । जो सही अर्थों में काम वासना को सन्तुष्ट कर सकता है । तृप्त कर सकता है । और मैंने जाना । मेरे अन्दर काम वासना की अग्नि प्रचण्ड रूप से दहक रही थी । प्रचण्ड काम वासना । सेक्स.. सेक्स.. सिर्फ़ सेक्स । और फ़िर मैं आसपास के लोगों को अपनी वासना का शिकार बनाने लगी ।
वह सिर्फ़ तंत्र मंत्र जानता था । कुछ हद तक ऐसी बातों की किताबी जानकारी भी उसे थी । पर प्रेतों से सीधा सम्पर्क और उनकी असल स्थिति से उसका वास्ता पहली बार ही पङा था । इसलिये जब वह कोई बात बताती थी 


। तब बीच बीच में उसके दिमाग में सवाल पैदा हो जाते थे । लेकिन रोका टोकी करने से उसके बहाव में बाधा आ सकती थी । उसका  रुख कहीं ओर भी मुढ सकता था । हो सकता था । वह आवेश ही खत्म हो जाये । और तब वह परिणाम होना । सिर्फ़ समय की बरबादी और खुद की गयी मूर्खता ही होती । इसलिये कसमसाता हुआ भी वह चुप ही रह जाता ।
वे दोनों जैसे खङे खङे थक गये थे । तब वह जाकर बैंच पर बैठ गयी ।
- एक बात बताईये नितिन जी । अचानक वह मधुर स्वर में अदा से बोली - कल्पना करिये । एक स्त्री पुरुष हैं । उनका कोई परिवार नहीं । कोई बच्चे आदि नहीं । जिन्दगी की कोई जिम्मेदारी । कोई तनाव नहीं । यहाँ तक कि कपङे भी न पहनें । और पूर्णतः नग्न रहें । आप इस तरह समझिये । दो नग्न स्त्री पुरुष जंगल में हैं । पेट की भूख के लिये फ़ल खा लेते हैं । और नींद आने पर पत्तों पर सो जाते हैं । तब बाकी समय उनके दिमाग में क्या घूमेगा ?
वह कुछ न बोला । और चुप ही रहा । क्योंकि उसे पता था कि आगे वह क्या कहने वाली हैं ।
- सेक्स ..सेक्स..सिर्फ़ सेक्स..आऽऽह । वह होंठ काटती हुयी बोली - मैं प्यासी हूँ ।
यकायक वह कुछ देर के लिये शान्त हो गयी । और दूर शून्य 0 में घूरती रही । फ़िर उसने एक गहरी सांस सी ली ? और बङी अजीव नजरों से उसे देखा ।
- फ़िर क्या हुआ ?  वह उत्सुकता से बोला ।
- फ़िर । उसने नजरें झुका कर उंगलियाँ चटकाते हुये कहा - फ़िर कहानी की हीरोइन को बहुत जोर से प्यास लगी । और वह कहानी ही भूल गयी । क्योंकि..प्यास .. बहुत जोर से ।..प्यास ।..प्यास लगी ।..फ़िर ।..फ़िर । बहुत जोर से प्यास लगी ।..प्यास ।
अगर वह उससे कुछ चाहता था । तो फ़िर वह भी उससे कुछ चाहती थी । जीवन शायद इसी सौदे का ही नाम है । अपनी अपनी चाहतों का मुनाफ़े युक्त सौदा । फ़िर कौन नहीं करता । पति पत्नी । बाप बेटा । माँ बेटा । भाई भाई । प्रेमी प्रेमिका । सभी रिश्ते । सम्बन्ध के अनुसार अपने अपने स्वार्थ से ही जुङे हैं । सभी जैसे कुछ देकर कुछ 


खरीदते हैं । कुछ लेकर कुछ बेचते हैं । तब वह अपनी कीमत चाहती थी । तो उसमें गलत क्या था ? कुछ भी नहीं । कुछ भी तो नहीं ।
वह किसी मोल चुकायी महारानी द्वारा खरीदे दास की तरह उसकी ओर बढा । और उसे अपनी गोद में उठा कर तखत पर डाल दिया । एक सधे मशीनी अन्दाज में उसने उसका ब्लाउज ऊपर कर दिया । और उसके मुलायम स्तनों को मसलने लगा । वह जल बिन मछली सी तङपने लगी ।
- आऽऽह । वह उसके बलिष्ठ चंगुल में फ़ङफ़ङाई - मैं प्यासी हूँ ।
नौकर । मोल लेकर सेवायें देने वाला सेवक । शायद किये जा रहे किसी भी कार्य में उसकी निजी अपनत्व भावना कभी नहीं होती । कम से कम अभी तो वह वही था । तब उसने उसके स्तनों पर वही कठोरता दिखाई । जैसी उसकी चाहत थी । अगर वह पूरी कीमत दे रही थी । तो फ़िर उसे भी सच्चा सौदा ही करना चाहिये था । भरपूर कीमत । तो खरा माल ।


उसने उसके दोनों स्तनों को जकङ लिया । पदमा उसकी बेहद सख्त पकङ से छूटने के लिये ऐसे छटपटाने लगी । जैसे उसके बदन में विधुत के झटके से लग रहे हों । सख्ती । इस मीठे दर्द से बेतरह तङपती भूखी औरत आखिर उस समय और चाहती भी क्या है । सख्ती । भरपूर सख्ती । जैसे उसे महीन महीन पीस डाला जाये । जैसे उसको कतरा कतरा काट दिया जाये । जैसे उसकी धज्जियाँ उङा दी जायें । जैसे उसको रुई सा धुन दिया जाये । और जैसे उसके बखिये से उधेङ दिये जायें ।
इसलिये उसे उसकी चाहत से भरपूर तङप से । दर्द से । चीखों से । जैसे कोई कैसी भी सहानुभूति नहीं थी । वह तो किसी पूर्णतया निर्दयी कसाई की भांति लम्बा पैना धारदार चमकता लपलपाता छुरा लेकर उसको सिर्फ़ हलाल करना चाहता था । उस घबरायी सहमी डरी बकरी की मिमियाहट उसमें उल्टा जोश भर रही थी । उसके बदन में जैसे जोश का लावा सा फ़ूट रहा था ।
- म.म..मैंऽऽ मोंऽऽ मंयऽऽ । वह तेजी से उलटी पलटी - छोङ मुझे.. निर्दयी.. मैंऽ मुंऽ आंऽ आंऽऽ आऽऽई मर गयी ।
उसने किसी माँस से लबालब भरी मोटी बकरी की तरह ही उसे पकङ कर खींचा । और उसको कमर से घुमाकर उलटा किया । खून पीने को आतुर गर्म छुरे को अन्दर महसूस करते ही वह गला फ़ाङकर चिल्लाई । उसके कण्ठ से निरन्तर दर्द की चीखें निकलने लगी । पर कसाई अपनी पूरी कारीगरी दिखाता हुआ उसे बङी शान्ति से हलाल कर रहा था । और फ़िर तङपते तङपते वह शान्त हो गयी ।

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