रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 24

कभी कभी जीवन की कोई रात बङी लम्बी बङी रहस्यमय सी हो जाती है । जैसे कयामत की ही रात हो । ये रात उसके लिये ऐसी ही थी । कयामत की रात । उसे लग रहा था । जैसे सैकङों वर्ष गुजर गये हों । और दूसरे ही ऐसा भी लग रहा था । जैसे वक्त ही ठहर गया हो । हाँ । शायद कभी कभी निरन्तर गतिमान समय ठहर भी तो जाता है । जैसे आज ठहर गया था ।
- पदमा जी । अचानक वह कुछ सोचता हुआ सा बोला ।
- अरे पागल हो क्या । वह किसी मनचली औरत की भांति तेजी से बात काटती हुयी बोली - कहा ना । मैं पदमा नहीं हूँ । पदमा अलग है । मैं अलग हूँ । नितिन जी आप भी पूरे लल्लू मालूम होते हो । एकदम बुद्धू ।
वह फ़िर चुप रह गया । अब कहता भी तो क्या कहता ? बस उसके बोलने का इंतजार ही करता रहा ।
- मुझे हँसी आती है । अचानक वह कुछ गम्भीर होकर बोली - संसार के मनुष्यों की प्रेतों को लेकर कैसी अजीव अजीव सी सोच हैं । जैसे प्रेत किसी मायावी राक्षस जैसे खतरनाक होते हैं । वह उनको मार डालेंगे । उनका बङा नुकसान कर देंगे । और नितिन जी । आश्चर्य इस बात का है । जबकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है । कोई भी मरा हुआ इंसान ही प्रेत बनता है । है ना कमाल की बात । जिन्दा इंसान मरे इंसान से डरता है । जिस जीव की वासना नियम अनुसार उन जटिल कर्म गुच्छों में उलझ जाती है । अटक जाती है । जिनसे प्रेतत्व का निर्माण होता है । तब सीधी सी बात है । वह मर कर प्रेत ही बनेगा ना ।..है ना । और इन वासनाओं में सबसे प्रमुख वासना होती है - कामवासना । सेक्स ..सेक्स..सिर्फ़ सेक्स ।
और मुझे हैरानी थी कि मुझ लैला मुझ हीर मुझ शीरीं मुझ जूलिय़ट जैसी प्रेमिका में । जिस वासना का उसके मनुष्य जीवन में नामोनिशान भी शायद नहीं था । वह मरने के बाद । किसी ज्वालामुखी सी फ़टी । नितिन जी यही है । शायद सदियों सदियों से प्यासी औरत । भूखी औरत ।
पर सबके साथ ही ऐसा होता हो । ऐसा भी शायद मैं निश्चय से नहीं कह सकती । क्योंकि मरने के बाद विशाल में ऐसी कोई उत्तेजना नहीं थी ।  वह ज्यादातर शान्त ठण्डे तलघर में पङा रहता । और रात होते ही वीरानों में निकल जाता । पर मैं कहीं नहीं जाती थी । मैं यहाँ आसपास की बस्ती की सोयी स्त्रियों में प्रवेश कर जाती । और उनके माध्यम से उनके पतियों का रस चूसती । काम रस । इससे  मुझे एक अजीव सी तृप्ति हासिल होती ।
फ़िर कई साल और गुजर गये । और अचानक इस मनहूस बन्द घर में जीवन की नयी चहल पहल शुरू हो गयी । 


उजाङ पङा ये घोंसला जैसे आवाद हो गया । इसमें प्रेम परिन्दे एक बार फ़िर से चहचहाने लगे । एक बार तो मैं आश्चर्य चकित ही रह गयी । ठाकुर जोरावर ने ये घर बेच दिया था । और एक पति पत्नी एक जवान लङके के साथ इस घर के नये मालिक बन कर आये थे ।
उस बेहद सुन्दर सरल अप्सरा सी औरत का नाम पदमा था । उसके  सीधे साधे पति का नाम अनुराग था । और पदमा के गठीले जवान देवर का नाम मनोज था ।
यकायक जैसे उस पर उदासी सी छा गयी । एक गहन अपराध बोध जैसे उसके भावों में घुलने लगा । एक प्रायश्चित की पीङा सी बार बार उसके चेहरे पर आने जाने लगी । कुछ कहने से पहले ही उसका कण्ठ भर्रा गया । फ़िर जैसे तैसे करके उसने अपने आपको संभाला ।
- नफ़रत । जलन । वह कुछ कुछ भर्राये स्वर में बोली - इंसान से गहरे पाप करा कर उसे पतन के अथाह गर्त में गिरा देती है । विशाल को इस परिवार के अचानक आ जाने से बहुत खुशी हुयी । वह इनकी खुशियाँ ही देख कर जैसे खुश हो जाता था । चिङिया सी चहकती । कोयल सी कूकती । तितली सी उङती । मोरनी सी चलती । हिरनी सी उछलती । फ़ूलों सी महकती पदमा ..पदमा जैसे कोई औरत न होकर जीती जागती बहार थी । बहार जो फ़िजा में रंग भर देती है । बहार जो हर दिल को मचलने पर मजबूर कर देती है ।
खुद मुझे भी उसे देखना बहुत अच्छा लगता था । उस स्त्री में जो सबसे खास बात थी । उसे किसी से भी कोई शिकायत ही न थी । वह तो जैसे हर रंग अपनी मस्ती में मस्त रहती थी ।
कई महीने गुजर गये । हम दोनों तो इन नये प्रेम पंछियों को देख कर मानों खुद को ही भूल गये । कभी कभी मैं सोचती थी । पदमा पर सवार हो जाऊँ । और उसके द्वारा अपनी हवस पूरी करूँ । पर उसके अस्तित्व में जो एक अजीव सा देवत्व था । उससे मुझे एक अनजाना सा भय होता है । वह इतनी प्यारी लगती थी कि उसके प्रति कोई बुरा सोचना भी नहीं अच्छा लगता था ।
और फ़िर मैंने पदमा का एक नया रूप देखा । उन्मुक्त यौवन की मुक्त बहारें लुटाने वाला रूप । उसकी नजर में संसार के सारे सम्बन्ध बनाबटी थे । बेमानी थे । सिर्फ़ जीवन व्यापार को सुचार रूप से चलाने के लिये तमाम सम्बन्ध गढे गये थे । वरना संसार में सिर्फ़ दो ही सम्बन्ध असली थे । स्त्री और पुरुष । जो एक दूसरे की इच्छाओं के पूरक थे ।
उसका मानना था कि वह अपने प्यासे देवर को यौन क्रिया सन्तुष्टि से सन्तुष्ट कर दे । इसमें कुछ भी गलत नहीं था । वह अपने देवर से खुद की यौन भावनाओं को सन्तुष्ट करे । इसमें भी कुछ गलत नहीं था । क्योंकि अगर

प्यास है । तो प्यासा कहीं न कहीं प्यास बुझायेगा ही । उसका देवर बाहर किसी कुँवारी व्याही औरत से यही तृप्ति पाता है । तब भी यही बात है । वह खुद के लिये बाहर उपाय तलाशती है । तब भी यही बात है । फ़िर इस तरह का स्त्री पुरुष परिचय । इस तरह का स्त्री पुरुष मिलन । घर में क्या गलत था । इसलिये देवर भाभी भी अपनी जगह । और स्त्री पुरुष भी अपनी जगह ।
हाँ लेकिन कुछ खास रक्त सम्बन्धों के प्रति उसका ऐसा नजरिया नहीं था । जैसे बाप बेटी । माँ बेटा । भाई बहन । क्योंकि उनकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी । लेकिन बाकी सभी सम्बन्ध उसकी नजर में स्त्री पुरुष सम्बन्ध ही थे ।
और नितिन जी । तब शायद मुझे पदमा ने प्रेम की एक नयी परिभाषा सिखाई । एक नया पाठ पढाया । वह खुले अधखुले अंगो से अक्सर मनोज के सामने भी आ जाती । और वे एक दूसरे से आकर्षित होकर मधुर काम क्रीङायें करने लगे । और मैं । मैं मन मसोस कर रह जाती । दूसरे स्त्री पुरुषों के पास जाने की मेरी इच्छा ही खत्म हो गयी । अब मैं सिर्फ़ पदमा को चाहती थी । पदमा होना चाहती थी । सिर्फ़ पदमा ।
मेरे अन्दर एक अतृप्त आग सी लगातार जलने लगी । मैं अपने ही दाह से जल जल कर कोयला राख होने लगी ।
उनके प्रेम में कुछ अलग सा था । कुछ अलग सा ? शायद उस अलग से की ही प्यास हर स्त्री पुरुष में है । उनकी वासना कामवासना भी थी । और पवित्र प्रेम भी । वे पति पत्नी का भोग भी करते थे । और बङे प्यासे भाव से एक दूसरे की तरफ़ खिंचते भी थे । जैसे जन्म जन्म के प्रेमी प्रेमिका हों । मैं पदमा का यह विशेष गुण देख कर अति हैरान थी । भोग के समय वह एक पूर्ण परिपक्व स्त्री होती थी । कामवासना के चरम पर पहुँचने और पहुँचाने वाली । और प्रेम किल्लोल करते हुये वह एक अनछुयी कुंवारी लङकी सी सहमी सकुचाती शरमाती नयी नयी प्रेमिका सी नजर आती । वह एक पूर्ण पत्नी भी थी । और एक आदर्श भाभी भी । वह एक कुशल गृहणी भी थी । और उन दोनों इंसानों के लिये ममतामयी माँ जैसी भी ।
हाँ नितिन ममतामयी माँ । अपने पति और देवर की माँ । इस औरत को पढना बहुत मुश्किल था । जानना असंभव था ।
तब मुझे उस सुखी औरत के अति सुखी जीवन से जलन होने लगी । बेहद जलन । इंसानों से मुझे वैसे भी नफ़रत हो चली थी । तब खास प्रेम में सफ़ल इसानों के प्रति वह और भी ज्यादा थी । और वह वही थी । प्रेम रस में नहायी हुयी । अंग अंग सराबोर प्रेम माधुरी पदमा । इसलिये अब हर हालत में मैं उसका वह सुख खुद प्राप्त करना चाहती थी ।
और फ़िर हर रोज शाम ढले इस घर में होने वाली दिया बाती एक दिन बन्द हो गयी । ये घर फ़िर मनहूस वीरान

शमशान सा प्रेतवासा हो गया । इसमें प्यार के पंछी चहकने बन्द हो गये ।
- रोमा ! फ़िर विशाल बेहद नफ़रत से मुझसे बोला - हत्यारिन । नीच । तूने ये क्या किया ? किसी की खुशियाँ तुझसे बरदाश्त नहीं हुयी । और कमीनी तूने उन सबको मार डाला ।
- ह हाँ । मैंने नफ़रत युक्त मगर अपराध बोध भाव से कहा - शायद इस संसार में ऐसा ही होता है । इसका यही नियम है । हम किसी दूसरे को खुश होता नहीं देख सकते । हमारे तन बदन में आग लग जाती हैं । तब हम हर संभव उपाय कर उसकी खुशियाँ छीन ही लेते हैं । सब यही तो करते हैं । फ़िर मैंने क्या गलत किया विशाल ?
- ये अपने दिल से पूछ हत्यारिन । वह बेहद घृणा से बोला - तूने क्या गलत किया । क्या सही किया । तेरा दिल

खुद तुझे इसकी सच्ची गवाही देगा ।..अरे तू कैसी प्रेमिका है ? तेरे अन्दर तो जहरीली नागिन बैठी हुयी है ।
नितिन भी एकदम हक्का बक्का सा रह गया । उसके दिल पर जैसे किसी ने जबरदस्त चोट मारी हो । लेकिन वह जो कह रही थी । उसे सुनकर तो उसका दिमाग न सिर्फ़ आसमान में उङ रहा था । बल्कि उसे भयंकर घूमा आ रहा था । क्योंकि जो कह रही थी । जो सामने बैठी थी । वह उसके हिसाब से पदमा ही थी । हंड्रेड परसेंट पदमा । अब क्या करे वह ? कैसे ये गुत्थी सुलझे ।  अगर बीच में रोका । तो कहानी बिना एण्ड के समाप्त हो सकती है ।
विशाल को मुझसे घोर नफ़रत हो गयी थी । वह आगे बोली । वह मुझे मेरे हाल पर छोङकर उसी समय कहीं चला गया । और मैंने भी उसके पीछे जाने की कोशिश नहीं की । क्योंकि अब मुझे उसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं थी ।
- लेकिन नितिन जी ! वह भर्राये स्वर में बोली - मेरे प्रेमी ने ठीक ही कहा था । मैंने उनके खुशहाल जीवन को जला डाला था । उसमें आग लगा दी थी । पर..पर क्या मैं ऐसा जीवन किसी का बना भी सकती थी ?
हाँ नितिन जी ! जब एक दिन वह परिवार छुट्टियों में कार से घूमने गया था । पता नहीं । मेरी जलन के चलते मुझे क्या सनक सवार हो गयी । मैंने उनकी गाङी का सन्तुलन बिगाङ दिया । और वह गहरी खाई में जा गिरी । वही तो वो दिन था । जब इस घर में सांझ का दीपक जलना बन्द हो गया । क्योंकि वो दीपक जलाने वाली तीनों जिन्दगियों के ही दीपक बुझ चुके थे ।

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