रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 25

इस रहस्यमय कहानी की तरह आज की रात भी बेहद रहस्यमय थी । और जैसे इसका रहस्य खुलने के इंतजार में ही रुकी हुयी थी । जिन्दगी ने उसे कैसे घनचक्कर में लाकर फ़ँसाया । उसने सोचा ।
- नितिन जी ! वह आगे बोली - यह बात एक मजेदार अटल सच की तरह है कि - जो होता है । वह दिखाई नहीं देता । और जो दिखाई देता है । वह होता नहीं है । यदि तुम इसी बात पर ध्यान देते । तो इस कहानी में कोई रहस्य था ही नहीं ।
इस कहानी के तलघर का दरवाजा इसी जीने के नीचे बने स्टोर के अन्दर से गया है । पर मुझे नहीं लगता कि उस तलघर में अब आपकी कोई दिलचस्पी होगी । उस शमशान में जो काली छाया औरत तुम्हें दिखाई देती थी । वह रोमा थी । एक शक्तिशाली प्रेतनी । मगर इस परिवार की हत्या के प्रायश्चित और घोर अपराध बोध से घिरी ।
रोमा ही तुम्हें यहाँ इस घर तक लायी थी । जब उसने तुम्हें अक्सर शमशान में बैठे देखा । वहाँ जो लङका मनोज दीपक जलाने जाता था । वह दरअसल कोई इंसान नहीं । प्रेत का भासित छाया रूप था । जो रोमा के कमाल से तुम्हें जीवन्त दीख रहा था । वैसे प्रेत असल स्थिति में उसी तरह दिखते हैं । जैसा तुमने उस काली छाया औरत को देखा ।
दरअसल नितिन तुमने गौर भी नहीं किया । और तुम तबसे लेकर अब तक मेरे एक खास प्रकार के प्रेतक

सम्मोहन में बँधे हुये हो । इसलिये तुम्हारा उधर ध्यान भी नहीं गया । जब मनोज तुम्हें यहाँ लाया था । तब वह घर के मुख्य द्वार से न लाकर पीछे के द्वार से लाया था । इस घर के मुख्य द्वार पर तो सालों से ताला लटक रहा है । क्योंकि ये घर खाली पङा रहता है । इसका पिछला द्वार खुला हुआ है ।
जब तुम गली से आगे चौराहे पर सिगरेट लेने गये । तब भी तुम अपनी उधेङ बुन में ठीक से यह न देख पाये कि वह गली एकदम सूनी और इंसानी जीवन से रहित है । इस घर के पिछवाङे जो गिने चुने मकान है । वह इसी की तरह बन्द रहते हैं । और बरसों से खाली पङे हैं । क्योंकि इस मकान में रहने वाली प्रेतनी की वजह से लोग धीरे धीरे अपना घर छोङ गये ।
जैसा कि मैंने कहा । तुम्हें शमशान से यहाँ तक लाने वाली । मैं एक शक्तिशाली प्रेतनी हूँ । इसलिये यहाँ आने से लेकर अब तक के समय में जो तुमने पदमा आदि के अतीत के रंगीन चित्र देखे । वह मेरी वजह से संभव हुये । मैंने तुम्हें इस घर में गुजरा अतीत वर्तमान की तरह दिखाया । जो कि तुमने खास सम्मोहित अवस्था में एक रंगीन सपने की तरह देखा । पर वास्तव में उसके पात्र सिर्फ़ छाया थे । जो तुम्हें असल जैसे महसूस हो रहे थे । जैसे अभी मैं हो रही हूँ ।
तुम्हें याद होगा । तुम्हारे परिचय पूछने पर मैंने दो बदन कहा था । पदमा और उसके घर वालों के मर जाने पर हमारी आपस में मित्रता हो गयी । हम सब यहीं एक साथ अब भी रहते हैं । जो सुन्दर शरीर तुम देखते थे । वह पदमा का था । जो मधुर मनचली लुभावनी हरकतें तुमने देखी । वह भी पदमा की थी । लेकिन जव वह विकृत रूप हो उठती थी । वह रोमा थी । और रोमा की अतृप्त काम वासना । इस तरह तुमने अक्सर मिली जुली पदमा रोमा को साथ साथ देखा ।
रोमा के सूक्ष्म शरीर में कुछ विशेष गुण थे । जो मेरे शरीर में नहीं हैं । इसलिये वह मेरी ताकत से असली जैसा

शरीर प्रकट कर लेती है । पर वह असली दिखता ही है । होता नहीं । हम दोनों अलग अलग भी रहते हैं । और कभी एक ही शरीर में भी हो जाते हैं । जैसे किसी इंसान में प्रेत आवेश होता है । तब उसके जिस्म में दो रूहें होती हैं कि नहीं । वास्तव में तो एक इंसानी शरीर में आठ रूहें हो जाना भी कोई बङी बात नहीं ।
अब वह सुनो । खास जिसके लिये मैंने यह सब किया । और तुम्हें यहाँ तक लायी । तुम्हारे गुरु से मेरी पहले ही बात हो चुकी है । दरअसल मैं पदमा और उसके परिवार को लेकर बहुत अपराध बोध महसूस करती हूँ । और प्रायश्चित करना चाहती हूँ । इस परिवार के लोगों का शायद ऐसा कोई नहीं है । जो इनका सही प्रेतक संस्कार कर सके । और जो हैं । उन्हें

सही बात मालूम नहीं होगी कि ये प्रेत बन चुके हैं । और इनका क्या संस्कार होना चाहिये ? क्योंकि तुम इस विधा के पण्डित हो । और प्रयोग भी करना चाहते थे । इसलिये मैंने तुम्हें चुना । जिसमें तुम्हारे गुरु की पूरी सहमति है । ये संस्कार पूरा होते ही कुछ समय बाद ये तीनों रूहें प्रेत योनि से मुक्त होकर फ़िर नया मनुष्य जीवन प्राप्त कर लेगीं । जबकि मैं ऐसा नहीं कर सकती । क्योंकि मैंने अपराध भी किया । और अपनी प्रचण्ड कामवासना के चलते मेरा प्रेतत्व और भी मजबूत और स्थायी हो गया । अब । अचानक वह उसके पैरों से लिपट कर विनती करती हुयी बोली - मेरी आपसे विनती है कि पदमा अनुराग और मनोज का संस्कार करा कर उसे प्रेत योनि से मुक्त कराने में मेरी सहायता करें । ताकि मेरे दिल से यह बोझ हमेशा के लिये उतर जाये ।
उसे एकाएक कोई बात नहीं सूझी । एक अजीव सा सन्नाटा उसके दिमाग में जैसे सांय सांय कर रहा था । और फ़िर जैसे धीरे धीरे वह होश में आने लगा । तब सामने बैठी पदमा के रंग धुंधले होने लगे ।
- पर । वह बेहद असमंजस से बोला - अब तो ये बता दो । अभी तुम पदमा हो । या रोमा ?

शायद अन्तिम बार उसने एक दिलकश शोख मुस्कराहट से उसे देखा । और बेहद शरारत से आँख मारती हुयी बोली - क्या कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । .. कहानी जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है । ये कहानी है ।..
अचानक उसकी भासित आकृति बहुत ही धुंधली हो गयी । और फ़िर वह उसकी निगाहों से अदृश्य हो गयी । अब वह नहीं रुका । भोर का हल्का हल्का सा धुंधलका फ़ैलने लगा था । वह तेजी से जीना उतर कर नीचे आया । जाने से पहले एक निगाह उसने घर में चारों तरफ़ डाली । वह मनहूस बन्द घर हर तरह के जीवन से शून्य 0 था । और बेहद खामोश था । उसमें चारों तरफ़ बस धूल उङ रही थी ।
उसने अपना स्कूटर बाहर निकाल कर स्टार्ट किया । और सिगरेट सुलगाते हुये एक बार बङे गौर से उस बन्द घर को देखा । फ़िर उसकी निगाह बन्द गली पर गयी । बन्द मकानों पर गयी । उसके होंठो पर अजीव सी मुस्कराहट तैर गयी । और फ़िर वह तेजी से अपने घर की तरफ़ जाने लगा । समाप्त ।

6 टिप्‍पणियां:

Rakesh kumar yadav ने कहा…

kya kamal ki kahani likhi hai rajeev ji apne par khatm maine ki padhkar.
supar kamvashana story. dhanyavad.

rahi ने कहा…

Ek naye tathya ke sath prastut Parlaukik jagat ki jankari ke sath ye apki kahani bahut kuchh rahasyon ko bataa gayi.Kuchh logon ko Manav Jeevan kosamajhane me sahayata milegi. Bahut-Bahut Dhanyvad.
Dr S K Keshari

बेनामी ने कहा…

क्या कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने। कहानी ने कहाँ से कहाँ तक का सफर तय किया किसी सपने की तरह ।और अंत में पर्दा गिरते ही सब दृश्य ओझल ।

बेनामी ने कहा…

क्या कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने। कहानी ने कहाँ से कहाँ तक का सफर तय किया किसी सपने की तरह ।और अंत में पर्दा गिरते ही सब दृश्य ओझल ।

बेनामी ने कहा…

बेहद रोमांचक ,रहसयम ,उत्तेजेक और कामरस से भरपूर कथा जोकि अंतिम समय तक पाठको को बांधे रखती है

बेनामी ने कहा…

बेहद रोमांचक ,रहसयम ,उत्तेजेक और कामरस से भरपूर कथा जोकि अंतिम समय तक पाठको को बांधे रखती है

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