रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 5

कहते हैं । सौन्दर्य और कुरूपता । नग्नता और वस्त्र आदि आवरण । देखने वाले की आँखों में होते हैं । दिमाग में होते हैं । न कि उस व्यक्ति में । जिसमें ये दिखाई दे रहा है । हम किसी को जब बेहद प्यार करते हैं । तो साधारण शक्ल सूरत वाला वह व्यक्ति भी हमें खास नजर आता है । बहुत सुन्दर नजर आता है । और लाखों में एक नजर आता है । क्योंकि हम अपने भावों की गहनता के आधार पर उसका चित्रण कर रहे होते हैं ।
- नितिन जी  ! वह फ़िर से बोला - ये ठीक है कि मेरी भाभी एक आम स्त्री के चलते वाकई सुन्दर थी । और सर्वांग सुन्दर थी । इतनी सुन्दर । इतनी मादक । इतनी नशीली कि खुद शराब की बोतल अपने अन्दर भरी सुरा से मदहोश होकर झूमने लगे ।
पर मेरे लिये वह एक साधारण स्त्री थी । एक मातृवत औरत । जो पूर्ण ममता से मेरे भोजन आदि का ख्याल रखती थी । वह हमारे छोटे से घर की शोभा थी । मैं उसकी  सुन्दरता पर गर्वित तो था । पर मोहित नहीं । उसकी सुन्दरता उस दृष्टिकोण से मेरे लिये आकर्षण हीन थी कि मैं उसे अपनी बाँहों में मचलने वाली रूप अप्सरा की ही कल्पनायें करने लगता । मुझे ठीक समझने की कोशिश करना भाई । मैं उसके स्तन नितम्ब आदि काम अंगों को कभी कभी खुद को सुख पहुँचाने वाले भाव से अवश्य देख लेता था । पर इससे आगे मेरा भाव कभी न बढा था । और ये भाव शायद मेरा नहीं । सबका होता है । एक सामान्य स्त्री पुरुष आकर्षण भाव । क्योंकि मैं ये भी अच्छी तरह जानता था कि वह मेरी भाभी है । और भाभी माँ समान भी होती है । होती है । क्या वो थी । मेरी माँ । भाभी माँ । बोलो कुछ गलत कहा मैंने ?
नितिन एक अजीव से मनोबैज्ञानिक झमेले में फ़ँस गया । उसका इंट्रेस्ट सिर्फ़ इस बात में था कि उसके घर में ऐसी क्या परेशानी है । जिसके चलते वह शमशान में तंत्र दीप जलाता है । ये काली औरत की अशरीरी छाया से इस लङके का क्या सम्बन्ध है ? और वो उसको मनुष्य के काम सम्बन्धों काम भावनाओं का मनोबिज्ञान पूरी दार्शनिकता से समझा रहा था । शायद । उसने सोचा । अपनी बात पूरी करते करते ये गलत को सही सिद्ध कर दे । और कर क्या दे । बराबर करे ही जा रहा था ।
- लेकिन । उसने उकता कर बात का रुख मोङने की कोशिश की ।
- हाँ लेकिन । वह फ़िर से जैसे दूर से आते स्वर में बोला - ठीक यही कहा था मैंने । लेकिन भाभी किसी और लङकी की जरूरत ही क्या है ? तुम मेरे लिये खाना बना देती हो । कपङे धो देती हो । फ़िर दूसरी और लङकी क्यों ?
पदमा वाकई पदमिनी नायिका थी । अंग अंग से छलकती मदिरा । बंधन तोङने को मचलता सा उन्मुक्त यौवन । नहाने के बाद उसने आरेंज कलर की ब्रा रहित मैक्सी पहनी थी । और लगभग पारदर्शी उस झिंगोले में आरेंज फ़्लेवर सी ही गमक रही थी । रूप की रानी । स्वर्ग से प्रथ्वी पर उतर आयी अप्सरा ।


उसने मैक्सी के बन्द ऊपर नीचे अजीव आङे टेङे अन्दाज में लगाये थे कि उसे चोरी चोरी देखने की इच्छा का सुख ही समाप्त हो गया । उसका अंग अंग खिङकी से झांकती सुन्दरी की तरह नजर आ रहा था । उसके सामने भाभी नहीं । सिर्फ़ एक कामिनी औरत ही थी ।
- मनोज ! उसने भेदती निगाहों से उसे देखा - अभी शायद तुम उतना न समझो । पर हर आदमी में दो आदमी होते हैं । और हर औरत में दो औरत । एक जो बाहर से नजर आता है । और एक जो अन्दर होता है । अन्दर..उसने एक निगाह उसके शरीर पर खास डाली -  इस अन्दर के आदमी की हर औरत दीवानी है ।                                                                                                                                                                                                                                                                          और क्योंकि अन्दर से तुम पूर्ण पुरुष हो । पूर्ण पुरुष । छोटे स्केल से दो इंच बङे । और बङे स्केल से चार इंच छोटे ।
नितिन हैरान रह गया । यकायक तो उसकी समझ में नहीं आया कि ये क्या कह रहा है । फ़िर वह ठहाका लगा उठा । नशे मे हुआ बेहद गम्भीर मनोज भी सब कुछ भूलकर उसके साथ ही हँसने लगा ।
- हाँ बङे भाई ! वह फ़िर से बोला - ठीक यही भाव मेरे मन में आया । जो सामान्यतः इस वक्त तुम्हारे मन में आया । पहले तो मैं समझा ही नहीं कि भाभी क्या बोल रही है । और कहाँ बोल रही है ? शब्द । इसलिये कमाल के होते है ना शब्द भी । पवित्र । अपवित्र । द्वेष । कामुक । अश्लील । राग । वैराग । सब शब्द ही तो हैं ।..सोचो मेरे भाई । कोई भी हमारे बारे में जाने क्या क्या सोच रहा है । क्या देख रहा है ? हम कभी जान सकते हैं क्या ? बोलो कभी जान सकते हैं क्या ?
- अरे पगले राजा ! पदमा फ़िर इठला कर बोली - इन सब बातों को इतना सीरियस भी मत ले । ये देवर भाभी की कहानी है । एक ऐसा रोमांस है । जिसको रोमांस नहीं कह सकते । फ़िर भी होता रोमांस जैसा ही है ।.देख मैं ही बताती हूँ । मेरी सोच क्या है ? मैं रूप कला । रूप की रानी । रूपसी । रूप स्वरूपा । फ़िर यदि लोग मुझे देख कर आहें ना भरें । तब इस रूप के रूप का क्या मतलब ? हर रूपवती चाहती है कि लोगों पर उसक्के रूप का यही असर हो । रूप का रूप जाल । और निसंदेह तब मैं भी ऐसा ही चाहती हूँ । क्योंकि मेरा रूप अच्छी अच्छों का रूप फ़ीका कर देता है ।
फ़िर एक बात और । अभी तुम आयु के जिस दौर से गुजर रहे हो । तुम्हें औरत को सिर्फ़ इसी रूप में देखना अच्छा लगेगा । न कोई माँ । न कोई बहन । न भाभी बुआ मौसी आदि । सिर्फ़ औरत । औरत । जो पहले कभी लङकी होती है । फ़िर औरत । औरत । तव हम दोनों की ये नयन सुख वासना पूर्ति घर में ही हो जायेगी । क्यों मुझे कोई और ताके । और क्यों तुम बाहर ललचाओ ।
- काफ़ी एक्सपर्ट लगती है आपकी भाभी । नितिन भी थोङा थोङा रस सा लेता हुआ बोला - मेरे ख्याल में ऐसी

गुणवान रूपवती  स्त्री का कोई विवरण न मैंने आज तक सुना । न कभी पढा ।
- एक बात बताओ । अचानक मनोज उसे गौर से देखता हुआ बोला - तुमने कभी किसी लङकी किसी औरत से प्यार किया है ?
उसने ना में सिर हिलाया । और बोला - इस तरफ़ कभी ध्यान ही नहीं गया । शायद मेरे स्वभाव में एक रूखापन है । और इससे उत्पन्न चेहरे की रिजर्वनेस से किसी लङकी की हिम्मत नहीं पङी होगी । मनोज जैसे सब कुछ समझ गया ।
- एक बात बताओ भाभी ! मनोज हैरानी से बोला - ऐसी जबरदस्त लङकी । मीन यू । मनचले लफ़ंगों से किस तरह बची रही । और खुद तुम कभी किसी से प्यार नहीं कर पायीं । ऐसा कैसे सम्भव हो सका ?
पदमिनी पदमा ने एक गहरी सांस ली । जैसे उसकी दुखती रग को किसी ने छेङ दिया हो ।
- अभी क्या बोलूँ मैं । वह माथे पर हाथ रख कर बोली - पहले बताया तो था । उसकी वजह से तो ये पूरा लफ़ङा ही बना है । वरना आज कहानी कुछ और ही होती । फ़िर उसे या मुझे रोज रोज नयी नयी कहानी क्यों लिखनी होती ? अजीव पागल था । मुझ साक्षात रूप की रानी में उसकी कोई दिलचस्पी ही न थी । अदृश्य के चक्करों में ही पङा रहता ।.. हाय राजीव ! तुमने ऐसा क्यों किया ? मेरा रूप जवानी एक बार तो देखा होता ।..अब मैं क्या करती । वो फ़िर साधु हो गया ।
- ले लेकिन । वह बोला - किसी एक के न होने से क्या होता है । बहुत से सुन्दर हेल्दी  छोरे आपके आगे पीछे घूमते ।
- मनोज ! एकाएक वह सामान्य स्वर में बोली - तुम किसी लङकी का दिल नहीं समझ सकते । कोई भी लङकी अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूल पाती । उसका तिरस्कार करने उपेक्षा करने वाले प्रेमी के लिये फ़िर उसकी एक जिद सी बन जाती है । तब मेरी भी ये जिद बन गयी कि मैं उसे अपना प्यार मानने पर मजबूर कर दूँगी । पर करती तो तब ना । जब वह सामान्य आदमी रहता । वह तो साधु ही बन गया । तब बताओ । मैं क्या करती । साधुओं के आगे पीछे घूमती क्या ? फ़िर भी वो मेरे दिल से आज तक नहीं निकला ।
कैसी अजीव उलझन थी । अगर वह इसको कोई केस मानता । कोई अशरीरी रूह प्रयोग मानता । तो फ़िर उसकी शुरूआत भी नहीं हुयी थी । देवर भाभी सम्बन्ध पर मनोबैज्ञानिक मामला मानता । तो भी बात ठीक ठीक समझ में नहीं आ रही थी । उसे अब तक यही लगा था कि एक भरपूर सुन्दर और जवान युवती देवर में अपने वांछित प्रेमी को खोज रही है । अब कोई आम देवर होता । तो उसने देवर दूसरा वर का सिद्धांत सत्य कर दिया होता । लेकिन मामला कुछ ऐसा था । भाभी डाल डाल तो देवर पात पात । पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है ।
एक बात और भी थी । ये भाभी देवर की लोलिता टायप सेक्स स्टोरी होती । तो भी वह उसे उसके हाल पर छोङकर 


कब का चला गया होता । पर उसका अजीवोगरीब व्यवहार । उसके पास रहती काली छाया । उसका एड्रेस बताने का अजीब स्टायल । वह इनमें आपस में कोई मिलान नहीं कर पा रहा था । और सबसे बङी प्राब्लम ये थी कि वह शायद किसी सहायता का इच्छुक ही न था । वह किसी प्रेत बाधा को लेकर परेशान था भी या नहीं । तय करना मुश्किल था । उससे सीधे सीधे कुछ पूछा नहीं जा सकता था । और जब वह बोलता था । तो भाभी पुराण शुरू कर देता । यहाँ तक कि नितिन की इच्छा अपने बाल नोचने की होने लगी । या तो ये लङका खुद पागल था । या उसे पागल करने वाला था । उसने एक नजर फ़िर उस काली छाया पर डाली । वो भी बङी शान्ति से किसी जासूस की तरह बस उनकी बातें ही सुन रही थी । अचानक ही उसे ख्याल आया । कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी चक्र व्यूह में फ़ँसा जा रहा हो । वह खुद को होशियार समझ रहा हो । जबकि ये दोनों उसे पागल बनाकर कोई मोहरा आदि बना रहे हों । वह तेजी से समूचे घटना कृम पर विचार करने लगा । तब एकाएक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी । और फ़िर ।
- देखिये मनोज जी ! वह सामान्य स्वर में वोला - एक बात होती है । जैसे  हर युवा होती लङकी को स्वयँ में ही खास सुन्दरता नजर आती है । उसे लगता है वह कुछ खास है । और सबकी निगाह बस उसी पर रहती है । पर ये

सच नहीं होता । लोगों को वह लङकी नहीं । उसमें पैदा हो चुका सेक्स आकर्षण प्रभावित करता है । एक तरह से इसको मानसिक सम्भोग भी कह सकते हैं । और सामान्यतयाः ये हरेक स्त्री पुरुष करता है । फ़िर वह विवाहित हो । या शादीशुदा । वृद्ध । अधेङ । जवान हो । या किशोर । काम भावना वह जन्म के साथ लेकर ही आता है । अटैच्ड ।
इसलिये मुझे नहीं लगता । आप जो भी बता रहे हैं । उसमें कुछ खास बताने जैसा है । ये बस एकान्त के वे अंतरंग क्षण हैं । जिनमें हम विपरीत लिंगी से अपनी कुछ खास भावनायें जाहिर करते हैं । आपकी भाभी सुन्दर थी । उन्हें खुद का सौन्दर्य बोध था । और इसलिये वह स्वाभाविक ही चाहती थी कि उनके रूप का जादू हरेक के सर चढकर बोले । अतः इसमें कुछ अजीव नहीं । कुछ खास नहीं ।
- हाँ ! वह कुछ ठहर कर उसका चेहरा पढता हुआ सा बोला - एक बात है । जो अलग हो सकती है । आपकी भाभी में काम भावना सामान्य से बेहद अधिक हो । और वह आपके भाई से पूर्ण सन्तुष्टि न पाती हों । या उन्हें अलग अलग पुरुषों को भोगना अच्छा लगता हो । और इस स्तर पर वह अपने आपको अतृप्त महसूस करती हो । यस अतृप्त । अतृप्प्त ।
मनोज के चेहरे पर जैसे भूचाल नजर आने लगा । वह एक झटके से उठकर खङा हो गया । उसने नितिन का गिरहबान पकङ लिया ।
और दांत पीसता हुआ बोला - हरामजादे । क्या बोला तू ? अतृप्त ।

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