रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 7

सुबह 6 बजे से कुछ पहले ही पदमा उठी । अनुराग अभी भी सोया पङा था । मनोज हमेशा की तरह खुली छत पर निकल गया था । और कच्छा पहने कसरत कर रहा था । नित्य निवृत होकर उसने अपने हर समय ही खिले खिले मुँह पर अंजुली से पानी के छींटे मारे । तो वे खूबसूरत गुलाव पर ओस की बूँदों से बने मोतियों के समान चमक उठे । वह अभी भी रात वाला झिंगोला ही पहने थी । जो स्तनों के पास से अधखुला था । उसने चाय तैयार की । और कमरे में अनुराग के पास आ गयी । पर उसकी सुबह अभी भी नहीं हुयी थी ।
उसकी सुबह शायद कभी होती ही न थी । एक भरपूर मीठी लम्बी नींद के बाद उत्पन्न स्वतः ऊर्जा और नव स्फ़ूर्ति का उसमें अभाव सा ही था । वह थका हुआ इंसान था । जो गधे घोङे की तरह जिन्दगी का बोझा ढो रहा था । वे दोनों एक ही बिस्तर पर पास पास लेटते थे । पर इस पास होने से शायद दूर होना बहुत अच्छा था । तब दिल को सबर तो हो सकता था ।
कल रात वह बेकल हो रही थी । घङी टिक टिक करती हुयी ग्यारह अंक को स्पर्श करने वाली थी । ग्यारह । यानी एक और एक । एक पदमा । एक अनुराग । पर क्या इसमें कोई अनुराग था ? वह एक उमगती स्त्री । और वह एक अलसाया बुझा बुझा पुरुष । वह हल्का हल्का सा नींद में था । घङी की छोटी सुई 54 बिन्दु पर थी । बङी सुई 45 बिन्दु पर थी । सेकेण्ड की सुई बैचेन सी चक्कर लगा रही थी ।
हर सेकेण्ड के साथ उसकी भी बैचेनी बढती जा रही थी । उसने अपनी ढीली ढाली मैक्सी को ऊपर से खोल लिया ।  और उससे सटती हुयी उसके सीने पर हाथ फ़ेरने लगी ।
- शऽऽ शीऽऽ ऐऽ..सुनो । वह फ़ुसफ़ुसाई । उसने हूँ हाँ करते हुये करवट बदला । और पलट कर सो गया - बहुत थका हूँ.. पद..मा । सोने.. दे ।
वह तङप कर रह गयी । उसने उदास नजर से घङी को देखा । छोटी सुई हल्का सा और सरक गयी थी । बङी सुई उसके ऊपर छाने लगी थी । फ़िर बङी सुई ने छोटी को कसकर दबा लिया । और छोटी सुई मिट सी गयी । सेकेण्ड की सुई खुशी से गोल गोल घूमने लगी । टिक टिक .. प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
कितना मधुरता आनन्द से भरा जीवन है । बारह घण्टे में बारह बार मधुर मिलन । टिक टिक .. प्यास .. प्यास .. त्रुप्त..त्रुप्त..अतृप्त ..अतृप्त
- अब उठो ना । वह उसे झिंझोङती हुयी पूर्ण मधुरता से बोली - जागो मोहन प्यारे । कब तुम्हारी सुबह होगी ? कब तुम जागोगे । देखो । चिङियाँ चहकने लगी हैं । कलियाँ खिलने लगी हैं ।
वह हङबङाकर उठ गया । उसकी आँखों के सामने सौन्दर्य की साक्षात देवी थी । उसकी बङी बङी काली आँखें अनोखी आभा से चमक रही थी । उसके अधखुले उरोज किन्हीं पक्षियों के समान घोसलों से झांक रहे थे । पतली पतली काली लटें उसके सुन्दर चेहरे को चूम रही थी । खन खन बजती उसकी चूङियाँ संगीत के सुर छेङ रही थी । उसके पतले पतले सुर्ख रसीले होठों में एक प्यास सी मचल रही थी ।
- इस तरह.. क्या देख रहे हो ?  वह फ़ुसफ़ुसा कर उसको चाय देती हुयी बोली - मैं पदमा हूँ ।.. तुम्हारी बीबी ।
वह जैसे मोहिनी सम्मोहन से बाहर आया । और उसके स्तनों पर हाथ फ़ेरता हुआ बोला - सारी यार ! बङा थक 


जाता हूँ । कभी कभी..मैं महसूस करता हूँ । तुम्हें समय नहीं दे पाता ।
- मैं.. जानती.. हूँ । वह घुंघरुओं की झंकार जैसे मधुर स्वर में बोली - लेकिन मुझे शिकायत नहीं । बाद में ..ऐसा हो ही जाता है ।..सभी पुरुष..ऐसा ही तो करते हैं ।..फ़िर उसको सोचना कैसा ? है ना ।
- बङे भाई ! मनोज उसको सपाट नजरों से देखता हुआ बोला - उस दिन मैंने हारा हुआ पुरुष देखा । मैं नीचे उतर आया था । मेरा भाई पराजित योद्धा । हारे हुये जुआरी के समान । लज्जित सा नजरें झुकाये । उसके सौन्दर्य की चमक से चकाचौंध हो रहा था । पत्नी की जगमग जगमग आभा के समक्ष । आभाहीन पति । जबकि वह बिना किसी शिकायत के । बिना किसी व्यंग्य के । पूर्ण प्रेम भाव से ही उसे देख रही थी । उसे । जो उसका पति था । स्वामी । पतिदेव ।
- बोलो । अचानक वह जोर से चिल्लाया - इसमें क्या माया थी ? फ़िर कोई राजीव । कोई साधु । कोई धर्म शास्त्र । इस देवी समान गुण युक्त स्त्री को माया क्यों कहते हैं ? बोलो । जबाब दो । या देवी सर्वभूते । नमस्तुभ्ये । नमस्तुभ्ये । नमस्तुभ्य ।
- फ़िर क्या हुआ ? अचानक हैरतअंगेज ढंग से नितिन के मुँह से स्वतः निकल गया । इतना कि अपनी उत्सुकता पर उसे स्वयं आश्चर्य हुआ ।
मनोज ने एक नजर आसमान पर चमकते तारों पर डाली । आसमान में भी जैसे उदासी सी फ़ैली हुयी थी ।
अनुराग आफ़िस चला गया था । पदमा रसोई का सारा काम निबटा चुकी थी । ग्यारह बजने वाले थे । लेकिन रोज की भांति आज वह बाथरूम में नहीं गयी थी । बल्कि उसने एक पुरानी सी झीनी मैक्सी पहन ली थी । और हाथ में डण्डा लगा बङा सा झाङू उठाये दीवालों परदों आदि को साफ़ कर रही थी ।
- नितिन जी ! मैंने एक अजीव सी कहानी सुनी है । वह फ़िर बोला - पता नहीं क्यों । मुझे तो वह बङा अजीव सी ही लगती है । एक आदमी ने एक शेर का बच्चा पाल लिया । लेकिन वह उसे कभी माँस नहीं खिलाता था । खून का नमकीन नमकीन स्वाद उसके मुँह को न लगा था । वह सादा रोटी दूध ही खाता था । फ़िर एक दिन शेर को अपने ही पैर में चोट लग गयी । और उसने घाव से बहते खून को चाटा । खून । नमकीन खून । उसका स्वाद । अदभुत स्वाद । उसके अन्दर का असली शेर जाग उठा । शेर के मुँह को खून लग गया । उसने एक शेर दहाङ मारी और...।
पदमा बङी तल्लीनता से धूल को झाङ रही थी । वह झाङू को रगङती । फ़ट फ़ट करती । और धूल उङने लगती । कितनी कुशल गृहणी थी वो । वह उस दिन का नमकीन स्वाद भूला न था । उसके सीने की  गर्माहट अभी भी

उसके शरीर में रह रह कर दौङ जाती थी । वह उन अनमोल रतनों को देखने के लिये फ़िर से प्यासा होने लगा था । पर वह उसकी तरफ़ पीठ किये थी । उसके लहराते लम्बे रेशमी बाल उसके विशाल नितम्बों को स्पर्श कर रहे थे ।
तुमने कभी सोचा मनोज ! पदमा की मधुर झंकार जैसी आवाज फ़िर से उसके कानों में गूँजी  - एक सुन्दर जवान औरत कितनी आकर्षक लगती है । रंग बिरंगे लचकते मचकते फ़ूलों की डाली जैसी । तुम ध्यान दो । तो औरत के हर अंग से रस टपकता है । वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस । जंघाओं में रस । नाभि में रस । नितम्बों में रस ।
कितना सच कहा था उसने । इस छ्लकते रस को उसने जाना ही न था । वह चित्रलिखित सा खङा रह गया । एक आवरण रहित सुन्दरता की मूर्ति । जैसे उस नाम मात्र मैक्सी के झीने पर्दे के पार थी । और तबसे बराबर उसकी उपेक्षा सी कर रही थी । उसे अनदेखा कर रही थी । वह चाह रहा था । वह फ़िर से स्नान करे । फ़िर से उसे अंगों की झलक दिखाये । फ़िर से उसकी आँखों में आँखे डाले । पर वह तो जैसे यह सब जानती ही न थी । बारबार पारदर्शी परदे की तरह हिलती ऊपर नीचे होती मैक्सी । और उसके पार खङी वो वीनस । सुन्दरता की मूरत ।
उससे ये उपेक्षा सहन नहीं हो रही थी । उसके कदम खुद ब खुद उसके पास बढते गये । वह धीरे धीरे उसके पास पहुँच गया । और लगभग सट कर खङा हो गया । उसके नथुनों से निकलती गर्म भाप पदमा की गर्दन को छूने लगी ।
- क्या हुआऽऽ । वह लगभग फ़ुसफ़ुसाई । और बिना मुङे ही रुक रुक कर बोली - क्या बात है । तुम बैचेन हो क्या । तुम्हारी कठोरता का स्पर्श.. मुझे पीछे हो रहा है । ..पूर्ण पुरुष । तुम स्त्री को आनन्दित करने वाले हो ।
- ह हाँ । उसका गला सा सूखने लगा - समझ नहीं आता । कैसा लग रहा है । शरीर में अज्ञात धारायें सी दौङ रही है । ये खुद आ तुमसे आलिंगित हुआ है..कामिनी ।
- भूल जाओ ।.. भूल जाओ ।.. अपने आपको । वह बेहद कामुक झंकृत स्वर में बोली - भूल जाओ कि तुम क्या हो । भूल जाओ कि मैं क्या हूँ । जो स्वयं होता है । होने दो । उसे रोकना मत ।
स्वयं । स्वयं उसके हाथ पदमा के इर्द गिर्द लिपट गये । वह अपने शरीर में एक तूफ़ान सा उठता हुआ महसूस कर रहा था । उसे कोई सुध बुध न रही थी । बस तेजी से चलती सांसे ही वह सुन समझ पा रहा था । उसके हाथ स्वयं पदमा की नाभि से नीचे फ़िसलने लगे । एक मखमली दूब के रेशमी मुलायम अहसास से झंकृत होता हुआ वह बारबार जैसे ढलान पर फ़िसलने लगा ।
- आऽऽह ..आऽऽ  ! उसकी खनकती आवाज में जैसे काम गीत बजा -  आऽऽई ..प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।..रुको.. मत..आऽऽ ।
- औरत के हर अंग से रस टपकता है । भूतकाल के शब्द फ़िर उसके दिमाग में गूँजे - वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस ।
उसके हाथ मैक्सी के बन्द पर गये । और मैक्सी कन्धों से नीचे सरक गयी । झीने परदे के पार खङी वीनस

साक्षात हो उठी । उसमें एक अजीव सी हिंसकता स्वतः जाग उठी । शेर के मुँह को खून लग गया । उसके हाथ उसके कम्पित स्तनों पर कस गये । एक ताकतवर बलिष्ट शेर । और उसके खूँखार पंजो में तङपती नाजुक बदन हिरनी । आऽऽ..मा.. प्यास .. प्यास .. त्रुप्त..त्रुप्त..अतृप्त । पदमा का वक्ष तेजी से ऊपर नीचे हो रहा था । वह प्यासी नागिन की भांति कसकर उससे  चिपक गयी ।
- क्यों पढ रहे हो ? ये घटिया वल्गर चीप अश्लील पोर्न सेक्सी कामुक सस्ती सी वाहियात कहानी । वह सीधे उसकी आँखों में भाव हीनता से देखता हुआ बोला - यही शब्द देते हो ना तुम । ऐसे वर्णन को । पाखण्डी पुरुष । तुम भी तो उसी समाज का हिस्सा हो । जहाँ इसे घटिया अनैतिक वर्जित प्रतिबंधित हेय मानते हैं । फ़िर क्या रस आ रहा है । तुम्हें इस कहानी में ।..गौर से सोचो । तुम उसी ईडियट सोसाइटी का अटूट हिस्सा हो । उसी मूर्ख दोगले समाज का अंग हो । जहाँ दिमाग में तो यही सब भरा है । हर छोटे बङे  सभी की चाहत यही है । पर बातें उच्च सिद्धांतों आदर्श और नैतिकता की है ।

बङे भाई ! किसी मेमोरी चिप की तरह यदि ब्रेन चिप को भी पढा जा सकता । तो हर पुरुष नंगा हो जाता । और हर स्त्री नंगी । हर स्त्री की चिप में नंगे पुरुषों की फ़ाइलें ओपन होती । और हर पुरु्ष की चिप में खुलती - बस नंगी औरत । प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
वह हैरान रह गया । उसकी इस मानसिकता को क्या शब्द दे । ब्रेन वाशिंग । या ब्रेन फ़ीडिंग । या कोई सम्मोहन । या उस कयामत स्त्री का जादू । या रूप का वशीकरण । या .या स्त्री पुरुष के रोम रोम में समायी स्त्री पुरुष की अतृप्त चाहत । या फ़िर एक महान सच । महान सच । अतृप्त ।
- म..नोज..कैसा लग ..रहा है । वह कांपती थरथराती आवाज में बोली - तुम्हे..आऽऽ..तुम मुझे मारे दे रहे हो । ऊऽऽई ओऽऽ आईऽऽ ये कैसा आनन्द है ।
- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः । उसके दिमाग में भूतकाल की पदमा आकृति उभरी । साङी का पल्लू कमर में खोंसे हुये वह नजाकत से खङी हो गयी । और बोली - इनको स्वर कहते हैं । vowel । हर बच्चे को शुरू से यही सिखाया जाता है । पढाई का पहला वास्ता इन्ही से है । पर तुम इनका असली रहस्य जानते हो ? स्वर । यानी 


आवाज । ध्वनि । काम ध्वनि । सीत्कार । अतृप्त शब्द । अतृप्त ।
नहीं समझे ।.. फ़िर से उसकी पतली पतली भौंह रेख किसी तीर का लक्ष्य साधते हुये कमान की तरह ऊपर नीचे हुयीं - एक सुन्दर इठलाती मदमदाती औरत के मुख से इन स्वर अक्षरों की संगीतमय अन्दाज में कल्पना करो । जैसे वह आनन्द में सिसकियाँ भर रही हो । अऽऽ । आऽऽ । इऽऽ । ईऽऽ । उऽऽ । ऊऽऽ । ओऽऽ । देखोऽ..वह महीन मधुर झनकार सी झन झन होती हुयी बोली - हर अक्षर को मीठे काम रस से सराबोर कर दिया गया है ना । सोचो । क्यों ?.. सेक्स । काम ।.. काम ही तो हमारे शरीर में बिजली सा दौङता रहता है । हाँ । जन्म से ही । पर हम समझ नहीं पाते । इन स्वर ध्वनियों में वही उमगता काम ही तो गूँज रहा है । काम । काम । सिर्फ़ काम । अतृप्त । अतृप्त ।
फ़िर इन्ही शब्दों के बेस पर व्यंजन रूप ध्वनि बनती है । क ख में अ और वासना वायु की गूंज है या नहीं । बस थोङा सा ध्यान से देखो । फ़िर इन काम स्वर और व्यंजन के मधुर मिलन से इस सुन्दर संसार की रचना होती है । गौर से देखो । तो ये पूरा रंगीन मोहक संसार इसी छोटी सी वर्णमाला में समाहित है ना ।
प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।

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