रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 8

- कमाल की हैं । मनोज जी आपकी भाभी भी । नितिन हँसते हँसते मानों पागल हुआ जा रहा था - आय थिंक । किसी भाषा शास्त्री किसी महा विद्वान ने भी स्वर रहस्य को इस कोण से कभी न जाना होगा । लेकिन अब मुझे उत्सुकता है । फ़िर क्या हुआ ?
आज रात ज्यादा हो गयी थी । आसमान बिलकुल साफ़ था । और रात का शीतल शान्त प्रकाश बङी सुखद अनुभूति का अहसास करा रहा था । काली छाया औरत बूढे पीपल के तने से टिक कर शान्त खङी थी । नितिन के स्त्री रहित बृह्मचर्य शरीर मन मष्तिष्क में स्त्री तेजी से घुलती सी जा रही थी । एक दिलचस्प रोचक आकर्षक किताब की तरह । किताब । जिसे बहुत कम लोग ही सही पढ पाते हैं । किताब । जिसे बहुत कम लोग ही सही पढना जानते हैं । बहुत कम ।
- लेकिन पढना । बहुत कठिन भी नहीं । पदमा अपना हाथ उसके शरीर पर घुमाती हुयी बोली - एक स्वस्थ दिमाग स्वस्थ अंगों वाली खूबसूरत औरत खुली किताब जैसी ही होती है । एक नाजुक और पन्ना पन्ना रंग बिरंगी अल्पना कल्पना से सजी सुन्दर सजीली किताब । जिसके हर पेज पर उसके  सौन्दर्य की कविता लिखी है । बस पढना होगा । फ़िर पढो ।
पर उसकी हालत बङी ही अजीव सी थी । वह इस  नैसर्गिक संगीत का सा रे गा मा भी न जानता था । उसे तो बस ऐसा लग रहा था । जैसे एकदम अनाङी इंसान को उङते घोङे पर सवार करा दिया हो । लगाम कब खींचनी है । कहाँ खींचनी है । घोङा कहाँ मोङना है । कहाँ सीधा करना है । कहाँ उतारना है । कैसे चढाना है । उसे कुछ भी तो न पता था । कुछ भी ।
अचानक वह मादकता से चलती हुयी बिस्तर पर चढ गयी । और आँखे बन्द कर ऐसी मुर्दा पङ गयी । जैसे थकन से बेदम हो गयी हो । वह हक्का बक्का सा इस तरह उसके पास खिंचता चला गया । जैसे घोङे की लगाम उसी के हाथ हो ।
- भूल जाओ ।.. भूल जाओ ।.. अपने आपको । वह जैसे बेहोशी में बुदबुदाई - भूल जाओ कि तुम क्या हो । भूल जाओ कि मैं क्या हूँ । जो स्वयं होता है । होने दो । उसे रोकना मत ।
स्वयं । वह हैरान था । वह कितनी ही देर से उसके सामने आवरण रहित थी । लेकिन फ़िर भी वह उसको ठीक से देख न सका था । वह उसके अधखुले स्तनों को स्पष्ट देखता था । तब उनकी एकदम साफ़ तस्वीर उसके दिमाग

में बनती थी । वह उसके लहराते बालों को स्पष्ट देखता था । तब उसे घिरती घटायें साफ़ दिखाई देती थी । वह उसके रसीले होठों को स्पष्ट देखता था । तब सन्तरे की खट्टी मीठी मिठास उसके अन्दर स्वतः महसूस होती थी । जब वह उसको टुकङा टुकङा देखता था । तब वह पूर्णता के साथ नजर आती थी । और जब वह किताब की तरह खुद ही खुल गयी थी । तब उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । कुछ भी तो न था ।
उसने फ़िर से भूतकाल के बिखरे शब्दों को जोङने की कोशिश की - तुम ध्यान दो । तो औरत के हर अंग से रस टपकता है । वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस । जंघाओं में रस । नाभि में रस । नितम्बों में रस ।
पर कहाँ था । कोई रस ।  जिनमें रस था । अब वो अंग ही न थे । कोई अंग ही न था । अंगहीन । बस हवा में फ़ङफ़ङाते खुले पन्नों की किताब । और बस वहाँ वासना की हवा ही अब बह रही थी । प्रकृति में समाई सुन्दर खिले नारी फ़ूल की मनमोहक खुशबू । जिसको वह मतवाले भंवरे के समान अपने अन्दर खींच रहा था ।
फ़िर कब वह उल्टी हुयी । कब वह सीधा हुआ । कब वह तिरछी हुयी । कब वह टेङा हुआ । कब वह उसको मसल देता । कब वह चीख उठती । कब वह उसको दबा डालता ।  कब वह कलाबाजियाँ सी पलटती । कब वह उसको काट लेता । कब वे खङे होते । कब लेट जाते । कब वह उसमें चला जाता । कब वह उसमें आ जाती । कब ? ये सब कब हुआ । कौन कह सकता है ? वहाँ इसको जानने वाला कोई था ही नहीं । थी तो बस वासना की गूँज । आऽऽह ..आऽऽ  !  आऽऽई ..प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।..रुको.. मत..आऽऽ ।
- बङे भाई ! वह सिगरेट का कश लेता हुआ बोला - मैं अब अन्दर कहीं सन्तुष्ट था । मैं उसके काम आया था । मैं अब सन्तुष्ट था । भाई की पराजय को भाई ने दूर कर दिया था । नैतिक अनैतिक का गणित मैं भूल चुका था । खुशी बस इस बात की थी । सवाल हल हो गया था । सवाल । उलझा हुआ सवाल ।
मैंने देखा । वह अधलेटी सी नग्न ही शून्य निगाहों से दीवाल पर चिपकी छिपकली को देखे जा रही थी । जो बङी साबधानी सतर्कता से पतंगे पर घात लगाये जहरीली जीभ को लपलपा रही थी । उसकी आँखों में खौफ़नाक चमक लहरा रही थी । और उसकी आँखे अपलक थी । एकदम स्थिर । मुर्दा ।
मैं उसके पास ही बैठ गया । और बेमन से उसका स्तन टटोलता हुआ बोला - अब प्यास तो नहीं । क्यों हो कोई अतृप्त । खत्म । कहानी खत्म ।
यकायक उसके मुँह से तेज फ़ुफ़कार सी निकली । उसकी आँखें दोगुनी हो गयी । उसका चेहरा काला बाल रूखे और उलझे हो गये । उसकी समस्त पेशियाँ खिंच उठी । और वह किसी बदसूरत घिनौनी चुङैल की तरह दांत पीसने लगी ।
- मूर्ख ! वह गुर्राकर बोली - औरत कभी तृप्त नहीं होती । फ़िर तू उसकी वासना को क्या तृप्त करेगा । तू क्या कहानी खत्म करेगा ।
- बङे भाई ! वह अजीव से स्वर में बोला - मैं हैरान रह गया । वह कह रही थी ।.. कमाल की कहानी लिखी है । इस

कहानी के लेखक ने । राजीव ।.. कहानी जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है । ये कहानी है । सौन्दर्य के तिरस्कार की । चाहत के अपमान की । प्यार के निरादर की । जजबातों पर कुठाराघात की । वह कहता है । मैं माया हूँ । स्त्री माया है । उसका सौन्दर्य मायाजाल है । और ये कहानी बस यही तो है । पर..पर मैं उसको साबित करना चाहती हूँ - मैं माया नहीं हूँ । मैं अभी यही तो साबित कर रही थी । तेरे द्वारा । पर तू फ़ेल हो गया । और तूने मुझे भी फ़ेल करवा दिया । राजीव फ़िर जीत गया । क्योंकि .. वह भयानक स्वर में बोली - क्योंकि तू..तू फ़ँस गया ना । मेरे मायाजाल में ।
अब गौर से याद कर कहानी । मैंने कहा था । मैं राजीव जी से प्यार करती थी । पर वह कहता था । स्त्री माया है । ये मैंने तुझे कहानी के शुरू में बताया । मध्य में बताया । इशारा किया । फ़िर मैंने तुझ पर जाल फ़ेंका । दाना डाला । और तुझसे अलग हट गयी । फ़िर भी तू खिंचा चला आया । और खुद जाल में फ़ँस गया । मेरा जाल । मायाजाल ।.. वह फ़ूट फ़ूट कर रो पङी - राजीव जी तुम फ़िर जीत गये । मैं फ़िर हार गयी । ये मूर्ख लङका मुझसे प्रभावित न हुआ होता । तो मैं जीत.. न गयी होती ।
नितिन हक्का बक्का रह गया । देवर भाभी की लव स्टोरी के इस द एण्ड की तो कोई कल्पना ही न हो सकती थी ।
- सोचो बङे भाई । वह उदास स्वर में बोला - मैं हार गया । इसका अफ़सोस नहीं । पर तुम भी हार गये । इसका है । मैंने कई बार कहा । क्यों पढ रहे हो । इस कामुक कथा को । फ़िर भी तुम पढते गये । पढते गये । उसने जो सबक मुझे पढाया था । वही तो मैंने तुम पर आजमाया । पर तुम हार गये । और ऐसे ही सब एक दिन हार जाते हैं । और जीवन की ये वासना कथा अति भयानकता के साथ खत्म हो जाती है ।
नितिन को तेज झटका सा लगा । वह जो कह रहा था । उसका गम्भीर दार्श भाव अब उसके सामने एकदम स्पष्ट हो गया था । वह उसे रोक सकता था । कहानी का रुख मोङ सकता था । और तब वह जीत जाता ।  और कम से कम तब मनोज उदास न होता । पर वह तो कहानी के बहाव में बह गया । ये कितना बङा सत्य था ।
मनोज की आँखों से आँसू बह रहे थे । अब जैसे उसे कुछ भी सुनाने का उत्साह न बचा था । नितिन असमंजस में उसे देखता रहा । उसने मोबायल में समय देखा । रात का एक बज चुका था । चाँद ऊपर आसमान से जैसे इन दोनों को ही देख रहा था । काली छाया भी जैसे उदास सी थी । और अब जमीन पर बैठ गयी थी ।
चलो हार जीत कुछ हुआ । इसका भाभी पुराण तो समाप्त हो गया । उसने सोचा । और बोला - ये शमशान में तंत्र दीप ..मेरा मतलब ।
- तुम्हें फ़िर गलतफ़हमी हो गयी । वह रहस्यमय आँखों से उसे देखता हुआ बीच में ही बोला - कहानी अभी खत्म नहीं हुयी । कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । कहानी जो उसने शुरू की । उसे कोई और कैसे खत्म कर सकता है ? जिसकी कहानी । वही इसे खत्म करेगा ।
लेकिन अबकी बार वह सतर्क था । एक बार जो किसी बात पर कोई पागल बन जाये । कोई बात नहीं । सबके साथ

ही हो जाता है । दोबारा फ़िर उसी बात पर पागल बन जाये । चलो जानते हुये भी ठोकर लग गयी । मजबूती आ गयी । यही जीवन है । लेकिन तीन बारा फ़िर उसी बात पर पागल बन जाये । उसे पागल ही कहा जायेगा । और अब वह पागल हरगिज नहीं बनना चाहता था ।
- मनसा जोगी । वह मन ही मन बोला - रक्षा करें ।
- इसीलिये मैंने कहा था ना । तुम्हें फ़िर गलतफ़हमी हो गयी । वह एक नयी सिगरेट सुलगाता हुआ बोला - कहानी अभी खत्म नहीं हुयी । बल्कि इसे यूँ कहो । कहानी अब शुरू हुयी । रात आधे से ज्यादा हो रही है । पूरा शहर सो रहा है  । और सिर्फ़ हम तीन जाग रहे हैं । तो क्या । किसी ब्लू फ़िल्म सी इस कामुक कथा का रस लेने के लिये ।
अभी वह हम तीन की बात पर चौंका ही था कि मनोज बोला - ये बूढा पीपल भी । ये पीपल भी तो हमारे साथ है ।
नितिन ने चैन की सांस ली । एक और संस्पेंस क्रियेट होते होते बचा था । लेकिन हम तीन सुनते ही उसकी निगाह सीधी उस काली छाया औरत पर गयी । जो अब भी वैसी ही शान्ति से बैठी थी । कौन थी । यह रहस्यमय अशरीरी रूह ? क्या इसका इस सबसे कोई सम्बन्ध था । या ये महज उनके यहाँ क्यों ? होने की उत्सुकता वश ही थी । कुछ 


भी हो । एक अशरीरी छाया को उसने पहली बार बहुत निकट से देर तक देखा था । और देखे जा रहा था ।
लेकिन कितना वेवश भी था वो । अगर मनोज वहाँ न होता । तो वह उससे बात करने की कोई कोशिश करता । एक वायु शरीर से पहली बार सम्पर्क का अनुभव करता । जो कि इस लङके और उसकी ऊँट पटांग कहानी के चलते न हो पा रहा था । एक मामूली जिज्ञासा से बढ गयी कहानी कितनी नाटकीय हो चली थी । समझना कठिन हो रहा था । और कभी कभी तो उसे लग रहा था कि वास्तव में कोई कहानी है ही नहीं । ये लङका मनोज सिर्फ़ चरस के नशे का आदी भर है ।
- नितिन जी ! अचानक वह सामान्य स्वर में बोला - अगर आप सोच रहे हैं कि मैं आपको उलझाना चाहता हूँ । और मुझे इसमें कोई मजा आता है । या मैं कोई नशा वशा करता हूँ । तो सारी । आप फ़िर गलत है । तब आपने मेरे शब्दों पर ध्यान नहीं दिया -  और उसी के लिये मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस तरह के शब्दों का प्रयोग करूँ । जो अपनी बात ठीक उसी तरह से कह सकूँ । जैसे वह होती है । पर मैं कह ही नहीं पाता । ..हाँ । यही सच है । अचानक ही सामान्य या खास शब्द अपने आप मेरे मुँह से निकलते हैं । यदि मैं इन्हें कहना चाहूँ । तो नहीं कह सकता ।
बन्द गली । बन्द घर । जमीन के नीचे । अंधेरा बन्द कमरा ।

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