रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 9

नितिन वाकई हक्का बक्का ही रह गया । क्या प्रथ्वी पर कोई युवती इतनी सुन्दर भी हो सकती है ? अकल्पनीय । अवर्णनीय । क्या हुआ होगा । जव यौवन विकास काल में यह लहराती पतंग की तरह उङी होगी । गुलावी कलियों सी चटकी होगी । अधखिले फ़ूलों सी महकी होगी । गदराये फ़लों जैसी फ़ूली होगी । क्या हुआ होगा ? क्या हुआ होगा । जब इसकी मादक अदाओं ने बिजलियाँ गिरायी होंगी । तिरछी  चितवन ने छुरियाँ चलायी होंगी । इसकी लचक मचक चाल से मोरनियाँ भी घबरायी होंगी । इसके इठलाते बलखाते बलों से नाजुक लतायें भी आभा हीन हुयी होंगी । लगता ही नहीं । ये कोई स्त्री है । ये तो अप्सरा ही है । रम्भा । या मेनका । या लोचना । या उर्वशी । जो स्वर्ग से मध्य प्रदेश की धरती पर उतर आयी । फ़िर क्यों न इस पर श्रंगार गीत लिखे गये । क्यों न इस पर प्रेम कहानियाँ गढी गयीं । क्यों न किसी चित्रकार ने इसे केनवास पर उतारा । क्यों न किसी मूर्तिकार ने इसे शिल्प में ढाला । क्यों ? क्यों ? क्योंकि ये कवित्त के श्रंगार शब्दों । प्रेम कथा के रसमय संवादों । चित्र तूलिका के रंगो । और संगेमरमर के मूर्ति शिल्प में समाने वाला सौन्दर्य ही नहीं था । ये उन्मुक्त रसीला नशीला मधुर तीखा खट्टा चटपटा अनुपम असीम सौन्दर्य था । वाकई । वाकई वह जङवत होकर रह गया ।
पहले वह सोच रहा था । किशोरावस्था के नाजुक रंगीन भाव के कल्पना दौर से ये लङका गुजर रहा है । और इसकी काम वासना ही इसे इसकी भाभी में  बेपनाह सौन्दर्य दिखा रही है । पर अब वह खुद के लिये क्या कहता ? क्योंकि पदमा काम से बनी कल्पना नहीं । सौन्दर्य की अनुपम छटा बिखेरती हकीकत थी । एक सम्मोहित कर देने वाली । जीती जागती हकीकत । और वो हकीकत । अब उसके सामने थी ।
- नितिन जी ! अचानक उसकी बेहद सुरीली मधुर आवाज की खनखन पर वह चौंका - कहाँ खो गये आप ? चाय लीजिये ना ।
- रूप । सुन्दर रूप । रूप की देवी । रूपमती । रूपमाला । रूपसी । रूपशीला । रूप कुमारी । रूपचन्द्रा । रूपवती । रूपा । रूप ही रूप । हर अंग रंगीली । हर रंग रंगीली । हर संग रंगीली । रूप छटा । रूप आभा । चारों और रूप ही रूप । किन शब्दों का चयन करे वो । खींचता रूप । बाँधता रूप । कैसे बच पाये वो । वह खोकर रह गया । यकायक..यकायक उसे झटका लगा - कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । राजीव ।.. कहानी

जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है । ये कहानी है । सौन्दर्य के तिरस्कार की । चाहत के अपमान की । प्यार के निरादर की । जजबातों पर कुठाराघात की । वह कहता है । मैं माया हूँ । स्त्री माया है । उसका सौन्दर्य बस माया जाल है । और ये कहानी बस यही तो है । पर..पर मैं उसको साबित करना चाहती हूँ - मैं माया नहीं हूँ । मैं अभी यही तो साबित कर रही थी । तेरे द्वारा । पर तू फ़ेल हो गया । और तूने मुझे भी फ़ेल करवा दिया । राजीव फ़िर जीत गया । क्योंकि .. क्योंकि तू .. तू भी फ़ँस गया ना । मेरे माया जाल में ।
- मनसा जोगी ! वह मन ही मन सहम कर बोला - रक्षा करें ।
- अब गौर से याद कर कहानी । उसके कानों में फ़िर से भूतकाल बोला - मैंने कहा था । मैं राजीव जी से प्यार करती थी । पर वह कहता था । स्त्री माया है । ये मैंने तुझे कहानी के शुरू में बताया । मध्य में बताया । इशारा किया । फ़िर मैंने तुझ पर जाल फ़ेंका । दाना डाला । और तुझसे अलग हट गयी । फ़िर भी तू खिंचा चला आया । और खुद जाल में फ़ँस गया । मेरा जाल । माया जाल ।.. राजीव जी तुम फ़िर जीत गये । मैं फ़िर हार गयी । ये मूर्ख लङका मुझसे प्रभावित न हुआ होता । तो मैं जीत.. न गयी होती ।
उसे फ़िर झटका सा लगा । ठीक यही तो उसके साथ भी हुआ जा रहा है । उसका भी हाल वैसा ही हो रहा है । शमशान में जलते तंत्र दीप से बनी सामान्य जिज्ञासा से कहानी शुरू तो हो गयी । पर अभी मध्य को भी नहीं पहुँची । और अन्त का तो दूर दूर तक पता नहीं । कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । उसने अपनी समूची एकाग्रता को केन्द्रित किया । और बङी मुश्किल से उस रूपसी से ध्यान हटाया ।
कल रात वे दोनों चार बजे लौटे थे । मनोज सामान्य हो चुका था । वह उसे उसके घर छोङ आया था । और  फ़िर अपने घर न जाकर सीधा मनसा की कुटिया पर जाकर सो गया था । सुबह वह कोई दस बजे उठा ।
- इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं मेरे बच्चे । उसकी बात सुनकर मनसा कतई अप्रभावित स्वर में बोला - ये जीवन का असली गणित है । गणित । जिसके सही सूत्र पता होने पर जिन्दगी का हर सवाल हल करना आसान हो जाता है । एक सामान्य मनुष्य दरअसल तत्क्षण उपस्थिति चीजों से हर स्थिति का आंकलन करता है । जैसे कोई झगङा हुआ । तो वह उसी समय की घटना और क्रिया पर विचार विमर्श करेगा । पर ज्यों ज्यों खोजेगा । झगङे की जङ भूतकाल में दबी होगी । जैसे कोई यकायक रोगी हुआ । तो वह सोचेगा । अभी की इस गलती से हुआ । पर ऐसा नहीं । रोग की जङ कहीं भूतकाल में पनप रही होगी । धीरे धीरे ।
- मैं कुछ समझा नहीं । वह उलझकर बोला - आपका आशय क्या है ?
- हुँऽ । जोगी विचार युक्त भाव से गहरी सांस लेकर बोला - मेरे कहने का मतलब है । आज जो तुम्हारे सामने है । उसकी जङे बीज कहीं दूर भूतकाल में है । और तुम्हारे लिये अदृश्य भूमि में अंकुरित हो रहे हैं । धीरे धीरे बढ रहे हैं । मैं सीधा तुम्हारे केस पर बात करता हूँ । पदमा के रहस्य की हकीकत जानने के लिये तुम्हें भूतकाल को देखना होगा । उसकी जिन्दगी के पिछले पन्ने पलटने होंगे । अब उनमें कुछ भी लिखा हो सकता है । मगर उस इबारत को पढकर ही तुम कुछ या सब कुछ जान पाओगे । अब ये तुम पर निर्भर है कि तुम क्या कैसे और कितना पढ पाते हो ?
- पर । उसने जिद सी की - इसमें पढने को अब बाकी क्या है ? पदमा 30 साल की है । विवाहित । अति सुन्दर । उसका एक देवर है । पति है । बस । वह अपने पति से न सन्तुष्ट है । न असन्तुष्ट ।..लेकिन अपनी तरुणाई में वह

किसी राजीव से प्यार करती थी । मगर वह साधु हो गया । बस अपने उसी पहले प्यार को वह दिल से निकाल नहीं पाती । क्योंकि कोई भी लङकी नहीं निकाल पाती ।.. और शायद उसी प्यार को हर लङके में खोजती है । क्योंकि पति में ऐसा प्रेमी वाला प्यार खोजने का सवाल ही नहीं उठता । पति और प्रेमी में जमीन आसमान का अंतर होता है ।..इसके लिये वह किसी लङके को आकर्षित करती है । उसे अपने साथ खेलने देती है । यहाँ तक कि काम धारा भी बहने लगती है । यकायक वह विकराल हो उठती है । और तब सब सौन्दर्य से रहित होकर वह घिनौनी और कुरूप हो उठती है । उसकी मधुर सुरीली आवाज भी चुङैल जैसी भयानक विकृत हो उठती है । अब रहा उस तंत्र दीप का सवाल । कोई साधारण आदमी भी जान सकता है । वह कोई प्रेतक उपचार है । कोई रूहानी बाधा । बस एक रहस्य और बनता है । वह काली छाया औरत । लेकिन मुझे वह भी कोई रहस्य नहीं लगती । वह वहीं शमशान में रहने वाली कोई साधारण स्त्री रूह हो सकती है । जो उस वीराने में हम दोनों को देखकर महज जिज्ञासा वश आ जाती होगी । क्योंकि उसने इसके अलावा कभी कोई और रियेक्शन नहीं किया । या शायद इंसानी जीवन से दूर हो जाने पर उसे दो मनुष्यों के पास बैठना सुखद लगता हो ।
- शिव शिव । मनसा आसमान की ओर दुआ के अन्दाज में हाथ उठाकर बोला - वाह रे प्रभु ! तू कैसी कैसी कहानी लिखता है । मेरे बच्चे की रक्षा करना । उसे सही राह दिखाना ।
- सही राह । उसने सोचा । और बहुत देर बाद एक सिगरेट सुलगायी - कहाँ हो सकती है । सही  राह । इस घर में । पदमा के  पीहर में । या अनुराग में । या उस राजीव में । या फ़िर कहीं और ?
एकाएक फ़िर उसे झटका सा लगा । उसे सिगरेट पीते हुये पदमा बङे मोहक भाव से देख रही थी । जैसे उसमें डूबती जा रही हो । सिगरेट का कश लगाने के बाद जब वह धुँये के छल्ले छोङता । तो उसके सुन्दर चेहरे पर स्मृति विरह के ऐसे आकर्षक भाव बनते । मानों उन छल्लों में लिपटी हुयी ही वह गोल गोल घूमती उनके साथ ही आसमान में जा रही हो । वह घबरा सा गया । उसकी एक दृष्टि मात्र से घबरा गया । ऐसे क्या देख रही थी वह । क्यों देख रही थी वह ?
- राजीव जी भी ! वह दूर अतीत में कहीं खोयी सी बोली - सिगरेट पीते थे । मुझे उन्हें सिगरेट पीते देखना बहुत अच्छा लगता था । तब मैं महसूस करती थी कि सिगरेट की जगह मैं उनके होंठों से चिपकी हुयी हूँ । और हर कश के साथ उनके अन्दर उतर रही हूँ । उतरती ही जा रही हूँ । मेरा अस्तित्व धुँआ धुँआ हो रहा है । और मैं धुँआ के छल्ले सी ही गोल गोल आकाश में जा रही हूँ ।
उसके दिमाग में एक भयंकर विस्फ़ोट हुआ । उसके अस्तित्व के मानों परखच्चे से उङ गये । कमाल की औरत थी । उसने मामूली सिगरेट पीने में ही इतना सेक्स डाल दिया कि उसे XXX उत्तेजना सी महसूस होने लगी । वह

उसका केस जानने आया था । पर अब उसे लग रहा था । वह खुद केस होने वाला है । इसका  तो बङे से बङा डाक्टर भी इलाज नहीं कर सकता । ये विकट सेक्सी लेडी तो उल्टा उसे ही मरीज बना देगी । भाङ में गयी । ये देवर भाभी रहस्य कथा । और भाङ में गयी ये सी आई डी कि तंत्र दीप क्या । छाया औरत क्या ? यहाँ उसे अपने वजूद बचाने के लाले थे । उसने तय किया । अब इस चक्कर में कोई दिलचस्पी नहीं लेगा । क्योंकि ये उसके बस का है भी नहीं ।
- वैसे कुछ भी बोलो । तब वह जान छुङाने के उद्देश्य से जाने का निश्चय करता हुआ अन्तिम औपचारिकता से बोला - राजीव जी ने आपका दिल तोङकर अच्छा नहीं किया ।
- डांट माइंड !  बट शटअप मि. नितिन । वह शटअप भी ऐसी दिलकश अदा से बोली कि वह फ़िर विचलित होने लगा - मुझे राजीव जी की बुराई सुनना कतई बर्दाश्त नहीं । अगेन डांट माइंड । बिकाज यू आर फ़ुल्ली फ़ूल । सोचो

। अगर वो ऐसा न करते । तो फ़िर इतनी दिलचस्प कहानी बन सकती थी ? क्या कमाल की कहानी लिखी उन्होंने ।
और ये खुला चैलेंज था । उसके लिये । जैसे वह उसका मतलब समझ गयी थी । और कह रही थी । इस कहानी के तारतम्य को आगे बढाना । उसके  सूत्र जोङना । तुम जैसे बच्चों का खेल नहीं । उसने एक नजर खामोश बैठे मनोज पर डाली । क्या अजीव सी रहस्यमय फ़ैमिली थी । उनके घर में सब कुछ उसे अजीव सा लगा था । और वे एक अजीव ढंग से ही शान्त भी थे । और अप्रभावित भी । कोई बैचेनी लगता ही नहीं । उन्हें थी । जबकि उनसे ज्यादा बैचेनी उसे हो रही थी ।
क्या करना चाहिये उसे ? उसने सोचा । यदि वह ऐसे मामूली से चक्रव्यूह से घबरा जाता । तो फ़िर उसका तंत्र संसार में जाना ही बेकार था । बल्कि उसका संसार में जीना ही बेकार था । फ़िर उससे अच्छे और साहसी तो ये पदमा और मनोज थे । जो कि उस कहानी के पात्र थे । कहानी । जो साथ के साथ जैसे हकीकत में बदल रही थी ।
उसने फ़िर से पदमा के शब्दों पर गौर किया -  सोचो । अगर वो ऐसा न करते । तो फ़िर इतनी दिलचस्प कहानी

बन सकती थी ? क्या कमाल की कहानी लिखी उन्होंने ।
वह सही ही तो कह रही थी । किसी राजीव ने सुन्दरता की देवी समान पदमा के प्यार का तिरस्कार करके ही तो इस कहानी की शुरूआत कर दी थी । अगर उन दोनों का आपस में सामान्यतः प्रेम संयोग हो जाता । तो फ़िर कोई कहानी बन ही नहीं सकती थी । फ़िर न मनोज जीवन का वह अजीव देवर भाभी प्रेम रंग देखता । और न शायद वह किसी वजह से तंत्र दीप जलाता । न उनकी मुलाकात होती । और न आज वह इस घर में बैठा होता । क्या मजे की बात थी । इस कहानी का दूर दूर तक कोई रियल प्लाट नहीं था । और कहानी निरंतर लिखी जा रही थी । ठीक उसी तरह । जैसे  बिना किसी बुनियाद के कोई भवन महज हवा में बन रहा हो । वो भी बाकयदा पूरी मजबूती से । बङा और आलीशान भी ।
जिन्दगी को करीब से देख चुके अनुभवी जानकार कहते हैं - बङा कौर खा लेना चाहिये । उसने सोचा - लेकिन बङी बात कभी नहीं कहनी चाहिये । क्योंकि हो सकता है । फ़िर वह बात पूरी ही न हो । कभी न हो । इसलिये उसने मन ही मन में तय किया । इस खोज का परिणाम क्या हो । ऐसा कोई दावा । ऐसी कोई आशा वह नहीं करेगा । लेकिन जब यह कहानी उसके सामने आयी है । वह उसका निमित्त बना है । तब वह उसकी  तह में जाने की पूरी पूरी कोशिश करेगा । और फ़िर उसने यही निश्चय किया ।

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

राजीव जी नमस्कार। ऐसी कहानी तो आज तक नहीं पढ़ी। अभी 9 भाग ही पढ़े हैं कि आपने तो बैंड बजा के रख दी ।परास्त क्या धाराशायी ही कर दिया। कहानी के साथ साथ पाठक के मन का निरीक्षण भी स्वतः चलता रहता है और आपाधापी भी।कहानी को बीच में छोड़ना मुश्किल हो जाता है क्योंकि राजीव बाबा आदमी का मनोविज्ञान बखूबी जानते हैँ ।:आपके ब्लाग का नवीन पाठक

बेनामी ने कहा…

राजीव जी नमस्कार। ऐसी कहानी तो आज तक नहीं पढ़ी। अभी 9 भाग ही पढ़े हैं कि आपने तो बैंड बजा के रख दी ।परास्त क्या धाराशायी ही कर दिया। कहानी के साथ साथ पाठक के मन का निरीक्षण भी स्वतः चलता रहता है और आपाधापी भी।कहानी को बीच में छोड़ना मुश्किल हो जाता है क्योंकि राजीव बाबा आदमी का मनोविज्ञान बखूबी जानते हैँ ।:आपके ब्लाग का नवीन पाठक

umesh ने कहा…

राजीव जी नमस्कार। ऐसी कहानी तो आज तक नहीं पढ़ी। अभी 9 भाग ही पढ़े हैं कि आपने तो बैंड बजा के रख दी ।परास्त क्या धाराशायी ही कर दिया। कहानी के साथ साथ पाठक के मन का निरीक्षण भी स्वतः चलता रहता है और आपाधापी भी।कहानी को बीच में छोड़ना मुश्किल हो जाता है क्योंकि राजीव बाबा आदमी का मनोविज्ञान बखूबी जानते हैँ ।:आपके ब्लाग का नवीन पाठक

umesh ने कहा…

राजीव जी नमस्कार। ऐसी कहानी तो आज तक नहीं पढ़ी। अभी 9 भाग ही पढ़े हैं कि आपने तो बैंड बजा के रख दी ।परास्त क्या धाराशायी ही कर दिया। कहानी के साथ साथ पाठक के मन का निरीक्षण भी स्वतः चलता रहता है और आपाधापी भी।कहानी को बीच में छोड़ना मुश्किल हो जाता है क्योंकि राजीव बाबा आदमी का मनोविज्ञान बखूबी जानते हैँ ।:आपके ब्लाग का नवीन पाठक

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