रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 1

उस दिन मौसम अपेक्षाकृत शान्त था । पर आकाश में घने काले बादल छाये हुये थे । जिनकी वजह से सुरमई अंधेरा सा फ़ैल चुका था । अभी 4 ही बजे होंगे । पर गहराती शाम का आभास हो रहा था । उस एकान्त वीराने स्थान पर एक अजीव सी डरावनी खामोशी छायी हुयी थी । किसी सोच विचार में मगन चुपचाप खङे वृक्ष भी किसी रहस्यमय प्रेत की भांति मालूम होते थे ।
नितिन ने एक सिगरेट सुलगाई । और वृक्ष की जङ के पास मोटे तने से टिक कर बैठ गया । सिगरेट । एक अजीव चीज । अकेलेपन की बेहतर साथी । दिलो दिमाग को सुकून देने वाली । एक सुन्दर समर्पित प्रेमिका सी । जो अन्त तक सुलगती हुयी सी प्रेमी को उसके होठों से चिपकी सुख देती है । उसने एक हल्का सा कश लगाया । और उदास निगाहों से सामने देखा । सामने । जहाँ टेङी मेङी अजीव से बल खाती हुयी नदी उससे कुछ ही दूरी पर बह रही थी ।
- कभी कभी कितना अजीव सा लगता है सब कुछ । उसने सोचा - जिन्दगी भी क्या ठीक ऐसी ही नहीं है । जैसा दृश्य अभी है । टेङी मेङी होकर बहती उद्देश्य रहित जिन्दगी । दुनियाँ के कोलाहल में भी छुपा अजीव सा सन्नाटा । प्रेत जैसा जीवन । इंसान का जीवन और प्रेत का जीवन समान ही है । दोनों ही अतृप्त । बस तलाश वासना तृप्ति की ।
- उफ़्फ़ोह ! ये लङका भी अजीव ही है । उसके कानों में दूर माँ की आवाज गूँजी - फ़िर से अकेले में बैठा बैठा क्या सोच रहा है ? इतना बङा हो गया । पर समझ नहीं आता । ये किस समझ का है । आखिर क्या सोचता रहता है । इस तरह ।
- क्या सोचता है । इस तरह ? उसने फ़िर से सोचा - उसे खुद ही समझ नहीं आता । वह क्या सोचता है । क्यों

सोचता है ? या कुछ भी नहीं सोचता है ? जिसे लोग सोचना कहते हैं । वह शायद उसके अन्दर है ही नहीं । वह तो जैसा भी है है ।
उसने एक नजर पास ही खङे स्कूटर पर डाली । और छोटा सा कंकर उठाकर नदी की ओर उछाल दिया ।
नितिन B.A का छात्र था । और मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर का रहने वाला था । उसके पिता शहर में ही मध्य स्तर के सरकारी अफ़सर थे । और उसकी माँ साधारण सी घरेलू महिला थी । उसकी 1 बडी बहन थी । जिसकी मध्य प्रदेश में ही दूर किसी अच्छे गाँव मे शादी हो चुकी थी । उसका कद 5 फ़ुट 9 इंच था ।
वह साधारण शक्ल सूरत वाला । सामान्य से पैन्ट शर्ट पहनने वाला । एक कसरती युवा था । उसके बालों का स्टायल साधारण था । और वाहन के रूप में उसका अपना स्कूटर ही था ।
वह शुरु से ही अकेला और तनहाई पसन्द था । शायद इसीलिये उसकी कभी कोई प्रेमिका नही रही । और न ही उसका कोई खास दोस्त ही था । दुनियाँ के लोगों की भीङ में भी वह खुद को बेहद अकेला महसूस करता था । वो हमेशा चुप और खोया खोया रहता । यहाँ तक कि काम भाव भी उसे स्पर्श नही करता ।
तब इसी अकेलेपन और ऐसी आदतों ने उसे 16 साल की उमर मे ही गुप्त रूप से तन्त्र मन्त्र और योग की रहस्यमयी दुनिया की तरफ़ धकेल दिया । लेकिन उसके जीवन के इस पहलू को कोई नही जानता था ।
अंतर्मुखी स्वभाव का ये लङका स्वभाव से शिष्ट और बेहद सरल था । बस उसे एक ही शौक था । कसरत करना ।
कसरत । वह उठकर खङा हो गया । उसने खत्म होती सिगरेट में आखिरी कश लगाया । और सिगरेट को दूर

उछाल दिया । स्कूटर की तरफ़ बढते ही उसकी निगाह साइड में कुछ दूर खङे बङे पीपल पर गयी । और वह हैरानी से उस तरफ़ देखने लगा । कोई नवयुवक पीपल की जङ से दीपक जला रहा था । उसने घङी पर निगाह डाली । ठीक छह बज चुके थे । अंधेरा तेजी से बङता जा रहा था । उसने एक पल के लिये कुछ सोचा । फ़िर तेजी से उधर ही जाने लगा ।
- क्या बताऊँ दोस्त ? वह गम्भीरता से दूर तक देखता हुआ बोला - शायद तुम कुछ न समझोगे । ये बङी अजीव कहानी ही है । भूत प्रेत जैसी कोई चीज क्या होती है ? तुम कहोगे । बिलकुल नहीं । मैं भी कहता हूँ । बिलकुल नहीं । लेकिन कहने से क्या हो जाता है । फ़िर क्या भूत प्रेत नहीं ही होते ।
- ये दीपक ? नितिन हैरानी से बोला - ये दीपक आप यहाँ क्यों ..मतलब ?
- मेरा नाम मनोज है । लङके ने एक निगाह दीपक पर डाली - मनोज पालीवाल । ये दीपक क्यों ? दरअसल मुझे खुद पता नहीं । ये दीपक क्यों ? इस पीपल के नीचे ये दीपक जलाने से क्या हो सकता है । मेरी समझ के बाहर है । लेकिन फ़िर भी जलाता हूँ ।
- पर कोई तो वजह ..वजह ? नितिन हिचकता हुआ सा बोला - जब आप ही..आप ही तो जलाते हैं ।
- बङे भाई ! वह गहरी सांस लेकर बोला - मुझे एक बात बताओ । घङे में ऊँट घुस सकता है । नहीं ना । मगर कहावत है । जब अपना ऊँट खो जाता है । तो वह घङे में भी खोजा जाता है । शायद इसका मतलब यही है कि समस्या का जब कोई हल नजर नहीं आता । तव हम वह काम भी करते हैं । जो देखने सुनने में हास्यास्पद लगते हैं । जिनका कोई सुर ताल ही नहीं होता ।
उसने बङे अजीव भाव से एक उपेक्षित निगाह दीपक पर डाली । और यूँ ही चुपचाप सूने मैदानी रास्ते को देखने लगा । उस बूङे पुराने पीपल के पत्तों की अजीव सी रहस्यमय सरसराहट उन्हें सुनाई दे रही थी । अंधेरा फ़ैल चुका था । वे दोनों एक दूसरे को साये की तरह देख पा रहे थे । मरघट के पास का मैदान । उसके पास प्रेत स्थान युक्त ये पीपल । और ये तन्त्र दीप । नितिन के रोंगटे खङे होने लगे । उसके बदन में एक तेज झुरझुरी सी दौङ गयी । उसकी समस्त इन्द्रियाँ सजग हो उठी । वह मनोज के पीछे भासित उस आकृति को देखने लगा । जो उस कालिमा में काली छाया सी ही उसके पीछे खङी थी । और मानों उस तन्त्र दीप का उपहास उङा रही हो ।
- मनसा जोगी ! वह मन में बोला - रक्षा करें । क्या मामला है । क्या होने वाला है ?
- कुछ..सिगरेट वगैरह..। मनोज हिचकिचाता हुआ सा बोला - रखते हो । वैसे अब तक कब का चला जाता । पर तुम्हारी वजह से रुक गया । तुमने दुखती रग को छेङ दिया । इसलिये कभी सोचता हूँ । तुम्हें सब बता डालूँ ।

दिल का बोझ कम होगा । पर तुरन्त ही सोचता हूँ । उसका क्या फ़ायदा । कुछ होने वाला नहीं है ।
- कितना शान्त होता है ये मरघट । फ़िर वह एक गहरा कश लगाकर दोबारा बोला - ओशो कहते हैं । दरअसल मरघट ठीक बस्ती के बीच होना चाहिये । जिससे आदमी अपने अन्तिम परिणाम को हमेशा याद रखें ।
मनोज को देने के बाद उसने भी एक सिगरेट सुलगा ली थी । और जमीन पर ही बैठ गया था । लेकिन मनोज ने सिगरेट को सादा नहीं पिया था । उसने एक पुङिया में से चरस निकाला था । उसने वह नशा नितिन को भी आफ़र किया । लेकिन उसने शालीनता से मना कर दिया ।
तेल से लबालब भरे उस बङे दिये की पीली रोशनी में वे दोनों शान्त बैठे थे । नितिन ने एक निगाह ऊपर पीपल की तरफ़ डाली । और उत्सुकता से उसके अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा । उसे हैरानी हो रही थी । वह काली अशरीरी छाया उन दोनों से थोङा दूर ही शान्ति से बैठी थी । और कभी कभी एक उङती निगाह मरघट की तरफ़ डाल लेती थी । नितिन की जिन्दगी में यह पहला वास्ता था । जब उसे ऐसी कोई छाया नजर आ रही थी । रह रह कर उसके शरीर में प्रेत की मौजूदगी के लक्षण बन रहे थे । उसे वायु रूहों का पूर्ण अहसास हो रहा था । और

एकबारगी तो वह वहाँ से चला जाना ही चाहता था । पर किन्हीं अदृश्य जंजीरों ने जैसे  उसके पैर जकङ दिये थे ।
- मनसा जोगी ! वह हल्का सा भयभीत हुआ - रक्षा करें ।
मनोज पर चरसी सिगरेट का नशा चढने लगा । उसकी आँखें सुर्ख हो उठी ।
- ये जिन्दगी बङी अजीव है मेरे दोस्त । वह किसी कथावाचक की तरह गम्भीरता से बोला - कब किसको बना दे । कब किसको उजाङ दे । कब किसको मार दे । कब किसको जिला दे ।
- आपको । नितिन सरल स्वर में बोला - घर नहीं जाना । रात बढती जा रही है । मेरे पास स्कूटर है । मैं आपको छोङ देता हूँ ।
- एक सिगरेट..सिगरेट और दोगे । वह प्रार्थना सी करता हुआ बोला - प्लीज प्लीज बङे भाई ।
उसने बङे अजीव ढंग से फ़िर उस काली छाया को देखा । और पैकेट उसे थमा दिया । थोङी थोङी हवा चलने लगी थी । दिये की लौ लपलपा उठती थी । मनोज ने उसे जङ की आङ में कर दिया । और दोबारा पुङिया निकाल ली ।
- बताऊँ । वह फ़िर से उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला - या ना बताऊँ ?
वह उसे फ़िर से सिगरेट में चरस भरते हुये देखता रहा । उसे इस बात पर हैरानी हो रही थी कि जो प्रेतक उपस्थिति के अनुभव उसे हो रहे हैं । क्या उसे नहीं हो रहे । या फ़िर नशे की वजह से वह उन्हें महसूस नहीं कर पा रहा । या

फ़िर अपने किसी गम की वजह से वह उसे महसूस नहीं कर पा रहा । या या..उसके दिमाग में एक विस्फ़ोट सा हुआ - या वह ऐसे अनुभवों का अभ्यस्त तो नहीं है । उसकी निगाह तुरन्त तन्त्र दीप पर गयी । और स्वयं ही उस काली छाया पर गयी । छाया जो किसी औरत की थी । और पीली मुर्दार आँखों से उन दोनों को ही देख रही थी ।
एकाएक जैसे उसके दिमाग में सब तस्वीर साफ़ हो गयी । वह निश्चित ही प्रेत वायु का लम्बा अभ्यस्त था । साधारण इंसान किसी हालत में इतनी देर प्रेत के पास नहीं ठहर सकता था ।
- मेरा बस चले तो साली की माँ ही...। उसने भरपूर सुट्टा लगाया । और घोर नफ़रत से बोला - पर कोई सामने तो हो । कोई नजर तो आये । अदृश्य को कैसे क्या करूँ । बोलो । तुम बोलो । गलत कह रहा हूँ मैं ।
- लेकिन मनोज जी ?
- बताता हूँ । सब बताता हूँ । बङे भाई । जाने क्यों अन्दर से आवाज आ रही है । तुम्हें सब बताऊँ । जाने क्यों । जाने क्यों । मेरे गाली बकने को गलत मत समझना । आदमी जब वेवश हो जाता है । तो फ़िर उसे और कुछ नहीं सूझता । सिवाय गाली देने के ।

कामवासना 2

पदमा ने धुले हुये कपङों से भरी बाल्टी उठाई । और बाथरूम से बाहर आ गयी । उसके बङे से आंगन में धूप खिली हुयी थी । वह फ़टकारते हुये एक एक कपङे को तार पर डालने लगी । उसकी लटें बार बार उसके चेहरे पर झूल जाती थी । जिन्हें वह नजाकत से पीछे झटक देती थी । विवाह के चार सालों में ही उसके यौवन में भरपूर निखार आया था । उसका अंग अंग खिल सा उठा था । अपने ही  सौन्दर्य को देखकर वह मुग्ध हो जाती थी । उसकी छातियों में एक अजीव सा रोमांच भर उठता था । वाकई पुरुष के हाथ में कोई जादू होता है । उसकी समीपता में एक विचित्र ऊर्जा सी होती है । जो लङकी की जवानी को फ़ूल की तरह से महका देती है ।
विवाह के बाद उसका शरीर तेजी से भरा था । उसके एकदम गोल उन्नत स्तन और भी विकसित हुये थे । ये सोचते ही उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौङ गयी । कितने बेशर्म और लालची होते हैं सब पुरुष । सब यहीं ताकते हैं । बूढी हो या जवान । इन्हें एक ही काम । इसके लिये शायद औरत कहीं भी सेफ़ नहीं । शायद अपने ही घर में भी नहीं ।
उसने एक गहरी सांस ली । और उदास नजरों से नितिन को देखा । उसकी आँखें हल्की हल्की नम हो चली थी ।
- नितिन जी ! वह फ़िर से बोला - कैसा अजीव बनाया है । दुनियाँ का ये सामाजिक ढांचा भी । और कैसा अजीव बनाया है । देवर भाभी का सम्बन्ध भी । दरअसल..मेरे दोस्त । ये समाज समाज नहीं । पाखण्डी लोगों का समूह मात्र है । हम ऊपर से कुछ और बरताव करते हैं । हमारे अन्दर कुछ और ही मचल रहा होता है । हम सब पाखण्डी हैं । तुम । मैं । और सब ।
मेरी भाभी ने मुझे माँ के समान प्यार दिया था । मैं पुत्रवत ही उसके सीने से लिपट जाता था । कहीं भी छू लेता था । क्योंकि तब उस स्पर्श में काम वासना नहीं थी । इसलिये मुझे कहीं भी छूने में झिझक नहीं थी । और फ़िर वही भाभी कुछ समय बाद मुझे एक स्त्री नजर आने लगी । सिर्फ़ एक भरपूर जवान स्त्री । मेरे अन्दर का पुत्र लगभग मर गया । और उसकी जगह सिर्फ़ पुरुष बचा रह गया । अपनी भाभी के ही स्तन मुझे अच्छे लगने लगे । चुपके चुपके उन्हें देखना ।  और झिझकते हुये छूने को जी सा ललचाने लगा । जिस भाभी को मैं कभी भी गोद में ऊँचा उठा लेता था । भाभी मैं नहीं मैं नहीं.. कहता उनके सीने से लग जाता । अब उसी को  छूने में एक अजीव सी

झिझक होने लगी । इस काम वासना ने हमारे पवित्र माँ बेटे जैसे प्यार को गन्दगी का कीचङ सा लपेट दिया । लेकिन शायद ये बात सिर्फ़ मेरे अन्दर ही थी । भाभी के अन्दर नहीं । उसे पता भी नहीं कि मेरी निगाहों में क्या रस पैदा हो गया ? मैं यही सोचता था ।
बाल्टी से निकालकर कपङे निचोङती हुयी पदमा की निगाह अचानक सामने बैठे मनोज पर गयी । फ़िर अपने ब्लाउज पर गयी । आँचल रहित सीना । साङी का आँचल उसने कमर में खोंस लिया था । वह चोर नजरों से उसके ब्लाउज से बाहर छलकते सुडौल स्तनों को देख रहा था ।
- क्या गलती है इसकी ? पदमा ने सोचा - कुछ भी तो नहीं । ये होने जा रहा मर्द है । कौन ऐसा शरीफ़ है । जो स्त्री कुचों का दीवाना नहीं । बूढा । जवान । बच्चा । अधेङ । शादीशुदा । या फ़िर कुंवारा । भूत प्रेत । या देवता भी । सच तो ये है । स्त्री भी स्त्री के स्तनों को देखती है । स्वयं से तुलनात्मक या फ़िर वासनात्मक भी । शायद ईश्वर की कुछ खास रचना हैं । नारी स्तन । नारी का सौन्दर्य है । नारी स्तन ।
उसने अपने आँचल को ठीक करने का कोई उपकृम नहीं किया । और सीधे ही तपाक से पूछा - सच  बता । क्या देख रहा था ?
मनोज एकदम हङबङा गया । उसने झेंप कर मुँह फ़ेर लिया । उसके चेहरे पर ग्लानि के भाव थे । पदमा ने आखिरी कपङा तार पर डाला । और उसके पास ही सामने चारपाई पर बैठ गयी । उसने अपने आँचल को अभी भी ज्यों का त्यों ही रखा । उसके मन में एक अजीव सा भाव था । शायद एक शाश्वत प्रश्न जैसा ।
औरत । पुरुष की कामना । औरत ।.. औरत । पुरुष की वासना । औरत ।.. औरत । पुरुष की भावना । औरत ।
फ़िर वह मनोज के स्वाभाविक भावों को कौन से नजरिये से गलत समझे । उसकी जगह उसका कोई दूर दराज का चाचा ताऊ भी निश्चित ही उसके लिये यही आंतरिक भाव रखता । क्योंकिं वह एक सम्पूर्ण लौकिक औरत थी ।
भांति भांति के कुदरती सुन्दर फ़ूलों की तरह ही सृष्टि कर्ता ने औरत को भी विशेष सांचे में ढाल कर बनाया  । जहाँ उसके अंगों में फ़लों का सा मधुर रस भर दिया । वहीं उसके सौन्दर्य में फ़ूलों की अनुपम महक भी डाल दी ।  जहाँ उसके मादक अंगों से सुरा के पैमाने  छलका दिये । वहीं उसकी सादगी में एक शान्त धीर गम्भीर देवी नजर आयी ।
कुछ ऐसी ही थी पदमा भी । उसकी बङी बङी काली आँखों में एक अजीव सा सम्मोहन था । जो साधारण दृष्टि से 


देखने पर भी यौन आमन्त्रण जैसा मालूम होता था । पदमिनी स्त्री प्रकार की ये नायिका मानों धरा के फ़लक पर कयामत बनकर उतरी थी । उसके लहराते लम्बे रेशमी बाल उसके कन्धों पर फ़ैले रहते थे । वह नये नये स्टायल का जूङा बनाने और इत्र लगाने की बेहद शौकीन थी ।
पदमा की लम्बाई 5 फ़ीट 8 इंच थी । और उसका फ़िगर 34-26-34 की मनमोहक बनाबट में खूबसूरती से गढा गया था । अपनी 5 फ़ीट 8 इंच की लम्बाई के बाद भी वह 2 इंच ऊँची हील वाली सेंडल पहनती थी । और अपनी मदमस्त चाल से पुरुषों के दिल में उथल पुथल मचा कर रख देती थी । उसके लचकते मांसल नितम्बों की थिरकन कब्र में पैर लटकाये बूङों में जोश की तरंग पैदा कर देती थी ।
- मनोज ! वह सम्मोहनी आँखों से देखती हुयी बोली - मैं जानना चाहती हूँ । तुम चोरी चोरी अभी क्या देख रहे थे । डरो मत । सच बताओ । मैं किसी को बोलूँगी नहीं । शायद मेरे तुम्हारे मन में एक ही बात हो ।
- भाभी ! वह कठिनता से कांपती आवाज में बोला - आपने कभी किसी से प्यार किया है ?
- प्यार..प्यार ? हाँ किया है ना । वह सहजता से सरल स्वर में बोली - देख मनोज । हर लङका लङकी किशोरावस्था में किसी न किसी विपरीत लिंगी से प्यार करते ही हैं । भले ही वो प्यार एक तरफ़ा हो । दो तरफ़ा हो । सफ़ल हो । असफ़ल हो । मैंने भी अपने गाँव में एक लङके राजीव से प्यार किया । पर वो ऐसा पागल निकला । मुझ रूप की रानी के प्यार की परवाह न कर साधु बाबा हो गया । हाँ मनोज । उसका मानना था । ईश्वर से प्यार ही सच्चा प्यार है । बाकी मेरी जैसी सुन्दर रसीली रस भरी औरत तो जीती जागती माया है । माया ।
माया । उसने एक गहरी सांस ली । वह चुप ही रहा । पर रह रह कर भाभी के सीने का आकर्षण उसे वहीं देखने को विवश कर देता । और पदमा उसे इसका भरपूर मौका दे रही थी । इसीलिये वह अपनी नजरें उससे मिलाने के बजाये इधर उधर कर लेती ।
- बस । कुछ देर बाद वह बोली - एक बार तुम बिलकुल सच बताओ । तुम चोरी चोरी क्या देख रहे थे । फ़िर मैं भी तुम्हें कुछ बताऊँगी । शायद जिस सौन्दर्य की झलक मात्र से तुम बैचेन हो । वह सम्पूर्ण सौन्दर्य खुल कर तुम्हारे सामने हो । क्योंकि..कहते कहते वह रुकी - मैं भी एक औरत हूँ । और मैं अपने सौन्दर्य प्रेमी को अतृप्त नहीं रहने दे सकती । कभी नहीं ।
- नहीं । वह तेजी से बोला - ऐसा कुछ नहीं । ऐसा कुछ नहीं है भाभी माँ । मैं ऐसा कुछ नहीं चाहता । पर मैं सच कहूँगा । ये..ये आपके ब्लाउज के अन्दर जो हैं । बस ना जाने क्यों । इन्हें देखने को दिल सा करता है ।..भाभी.वो गाना है ना - तेरे दो अनमोल रतन । एक है राम । और एक लखन । जाने क्यों मुझे ये गाना आपके इनके लिये  गाना अच्छा लगता है । जब भी मुझे आपकी बाहर कहीं याद आती है । मैं इन्हीं को याद कर लेता हूँ - तेरे दो अनमोल रतन । एक है राम । और एक लखन ।
उसकी साफ़ सरल सीधी सच्ची स्पष्ट बात और मासूमियत पर पदमा हँसते हँसते पागल हो उठी । यकायक उसके मोतियों जैसे चमकते दाँतों की बिजली सी कौंधती । और उसके हँसने की मादक मधुर स्वर लहरी वातावरण में काम रस सा घोल देती । वह भी मूर्खों की भांति उसके साथ हँसने लगा ।
- एक मिनट एक मिनट यार । वह अपने को संयमित करती हुयी बोली - क्या बात कही । मनोज मुझे तेरी बात पर अपनी एक सहेली की याद आ गयी । उसकी नयी नयी शादी हुयी थी । पहली विदाई में जब वह पीहर आने लगी । तो उसका पति बहुत उदास हो गया । वह बोली - ऐसे क्यों मुँह लटका लिया । मैं मर थोङे ना गयी । सिर्फ़ 8 दिन को ही तो जा रही हूँ । तब उसका पति बोला - मुझे तेरे जाने का दुख नहीं । तू जाती हो तो जा । पर मुझे इन दोनों 


की बहुत याद आयेगी । ऐसा कर इन्हें काट कर मुझे दे जा ।
अचानक अब तक गम्भीर बैठे नितिन ने जोरदार ठहाका लगाया । ऐसी अजीव बात उसने पहली बार ही सुनी थी । माहौल की मनहूसियत एकाएक छँट सी गयी । मनोज हल्के नशे में था । वह भी उसके साथ हँसा ।
 - तेरे दो अनमोल रतन । एक है राम । और एक लखन । फ़िर वह धीमे धीमे सुबकने लगा ।
अजीव सस्पेंस फ़ैलाया था । इस लङके ने । वह सिर्फ़ इस जिज्ञासा के चलते उसके पास आया था कि वो ये तन्त्र दीप क्यों जला रहा था ? कौन सी प्रेत बाधा का शिकार हुआ था । और अभी इस साधारण से प्रश्न का उत्तर मिल पाता । वह काली अशरीरी छाया एक बङे अनसुलझे रहस्य की तरह वहाँ प्रकट हुयी । एक और प्रश्न ?
- मनसा जोगी ! वह मन में बोला - रक्षा करें ।
वह काली छाया अभी भी बूङे पीपल के आसपास ही टहल सी रही थी । वह शहर से बाहर स्थानीय उजाङ और खुला

शमशान ही था । सो अशरीरी रूहों के आसपास होने का अहसास उसे बारबार हो रहा था । पर मनोज इस सबसे बिलकुल बेपरवाह बैठा था ।
दरअसल नितिन ने प्रत्यक्ष अशरीरी भासित रूह को पहली बार ही देखा था । पर वह तन्त्र क्रियाओं से जुङा होने के कारण ऐसे अनुभवों का कुछ हद अभ्यस्त था । लेकिन वह युवक तो उपचार के लिये आया था । फ़िर वह कैसे ये सब महसूस नहीं कर रहा था ? और उसके ख्याल में कारण दो ही हो सकते थे । उसका भी प्रेतों के सामीप्य का अभ्यस्त होना । या फ़िर नशे में होना । या उसकी  निडरता अजानता का कारण वह भी हो सकता था । या फ़िर वह अपने ख्याली गम में इस तरह डूबा था कि उसे माहौल की भयंकरता पता ही नहीं चल रही  थी । उसकी निगाह फ़िर एक बार काली छाया पर गयी ।
- मैं सोचता हूँ । वह कुछ अजीव से स्वर में बोला - हमें अब घर चलना चाहिये ।
- अरे बैठो दोस्त ! मनोज फ़िर से गहरी सांस भरता हुआ बोला - कैसा घर । कहाँ का घर । सब मायाजाल है साला । चिङा चिङी के घोंसले । चिङा चिङी..अरे हाँ ..मुझे एक बात बताओ । तुमने औरत को कभी वैसे देखा है । बिना वस्त्रों में । एक खूबसूरत जवान औरत । पदमिनी नायिका । रूपसी । रूप की रानी जैसी । एक नंग्न औरत ।
- सुनो ! वह हङबङा कर बोला - तुम बहकने लगे हो । हमें अब चलना चाहिये ।
- ठ ठ ठहरो भाई ! तुम गलत समझे । वह उदास हँसी हँसता हुआ बोला - शायद फ़िर तुमने ओशो को नहीं पढा । मैं आंतरिक भावों से नग्न औरत की बात कर रहा हूँ । और इस तरह औरत को कोई नग्न नहीं कर पाता । शायद 


उसका पति भी नहीं । शायद उसका पति । यानी मेरा सगा  भाई । भाई । भाई मुझे समझ नहीं आता । मैं कसूरवार हूँ या नहीं । याद रखो ।.. वह दार्शनिकता दिखाता हुआ बोला - औरत को नग्न करना आसान नहीं । वस्त्र रहित नग्नता नग्नता नहीं है ।
- ठीक है मनोज । पदमा जबरदस्त मादक अंगङाई लेकर अपनी बङी बङी आँखों से सीधी उसकी आँखों में झांकती हुयी सी बोली - तुमने बिलकुल सही और सच बोला । हाँ ये सच है । किसी भी लङकी में जैसे ही यौवन सुन्दरता के ये पुष्प खिलना शुरू होते हैं । वह सबके आकर्षण का केन्द्र बन जाती है । एक सादा सी लङकी मोहक मोहिनी में रूपांतरित होने लगती है । तुमने कभी इस तरह सोचा ।..मैं जानती हूँ । तुम मुझे पूरी तरह देखना चाहते हो । छूना चाहते हो । खेलना चाहते हो । क्योंकि ये सब सोचते समय तुम्हारे अन्दर मैं तुम्हारी भाभी नहीं । सिर्फ़ एक खूबसूरत औरत होती हूँ ।  उस समय भाभी मर जाती है । सिर्फ़ औरत । सिर्फ़ औरत ही रह जाती है । बताओ मैंने सच कहा ना ?
- गलत । वह कठिन स्वर में बोला - एकदम गलत । ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी नहीं । बस सच इतना ही है कि जब भी इस घर में तुम्हें चलते फ़िरते देखता हूँ । तो मैं तुम्हें पहले पूरा ही देखता हूँ । लेकिन फ़िर न जाने क्यों मेरी निगाह इधर हो जाती है । यहाँ देखना क्यों आकर्षित करता है । मैं समझ नहीं पाता ।

- क्या । वह हैरत से बोली - तुम्हें मुझे पूरी तरह से देखने की इच्छा नहीं करती ?
- कभी नहीं । वह एक झटके से सख्त स्वर में बोला - क्योंकि साथ ही मुझे ये भी पता है । तुम मेरी भाभी हो । भाभी माँ । और एक बच्चा भी अपने माँ के आँचल से प्यार करता है । सम्मोहित होता है । उसे भी उन स्तनों से लगाव होता है । जिनसे वह पोषण पाता है । वह ठीक पति की तरह माँ के शरीर को कहीं भी स्पर्श करता है । उसके पूर्ण शरीर पर जननी भूमि की तरह खेलता है । पर आप बताओ । उसकी ऐसी इच्छा कभी हो सकती है कि मैं अपनी माँ को नंगा देखूँ ।
पदमा की बङी बङी काली आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयी । उसका सौन्दर्य अभिमान पल में चूर चूर हो गया । मनोज जितना बोल रहा था । एकदम सच बोल रहा था ।
क्या अजीव झमेला सा था । नितिन बङी हैरत में था । वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था । यहाँ रुके । या घर चला जाये । इसको साथ ले जाये । या इसके हाल पर छोङ जाये । कौन था ये लङका ? कैसी अजीव सी थी इसकी कहानी । और वह काली स्त्री छाया ।
उसने फ़िर से उधर देखा । वह भी मानों थक कर जमीन पर बैठ गयी थी । और अचानक वह चौंका । मनोज ने जेब से देशी तमंचा निकाला । और उसकी ओर बङाया ।
- मेरे अजनबी दोस्त ।  वह डूबे स्वर में बोला - आज तुम मेरी कहानी सुन लो । मुझे कसूरवार पाओ । तो बे झिझक मुझे शूट कर देना । और यदि तुम मेरी कहानी नहीं सुनते । बीच में ही चले जाते हो । फ़िर मैं ही अपने आपको शूट कर लूँगा । और इसके जिम्मेदार तुम होगे । सिर्फ़ तुम ।
उसने उँगली नितिन की तरफ़ उठाई । वह कुछ न बोला । और चुप बैठा हुआ उसके अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा ।

कामवासना 3

मध्य प्रदेश । यानी मध्य भारत का 1 राज्य । राजधानी भोपाल । यह प्रदेश 1 NOV 2000 तक क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बडा राज्य था । लेकिन 1 NOV 2000 के दिन इस राज्य के कई नगर उससे हटा कर छत्तीसगढ़ बना दिया गया । इस प्रदेश की सीमायें - महाराष्ट्र । गुजरात । उत्तर प्रदेश । छत्तीसगढ़ । और राजस्थान से मिलती है ।
भारत की गौरवशाली संस्कृति में मध्य प्रदेश किसी जगमगाते दीप के जैसा है । जिसकी रोशनी की अलग ही चमक और अलग प्रभाव है । विभिन्न संस्कृतियों की अनेकता में एकता के आकर्षक गुलदस्ता जैसा । जिसे प्रकृति ने स्वयं अपने हाथों से सजाया हो । और जिसका सौन्दर्य और सुगन्ध चारों ओर फैल रहे हों । यहाँ की आबोहवा में कला । साहित्य । संस्कृति की मधुर गन्ध सी बहती है । यहाँ के लोक समूहों और जन जाति समूहों में प्रतिदिन नृत्य । संगीत । गीत की रसधार सहज प्रवाहित होती है । इसलिये हर दिन ही उत्सव जैसा होकर जीवन में आनन्द रस घोल देता है । मध्य प्रदेश के तुंग उतुंग पर्वत शिखर । विन्ध्य सतपुड़ा । मैकल कैमूर की उपत्यिकाओं के अन्तर से गूँजती अनेक पौराणिक कथायें । नर्मदा । सोन । सिन्ध । चम्बल । बेतवा । केन । धसान । तवा । ताप्ती आदि नदियों के उदगम और मिलन की कथाओं से फूटती हजारों धारायें यहाँ के जीवन को हरा भरा कर तृप्त करती हैं ।
इस राज्य में 5 लोक संस्कृतियों का समावेश है । ये 5 साँस्कृतिक क्षेत्र है - निमाड़ । मालवा । बुन्देलखण्ड । बघेलखण्ड । ग्वालियर ( चंबल ) प्रत्येक भू भाग का अलग जीवंत लोक जीवन । साहित्य । संस्कृति । इतिहास । कला । बोली और परिवेश है ।
इस राज्य की संस्कृति बहुरंगी है । महाराष्ट्र । गुजरात । उड़ीसा की तरह मध्य प्रदेश को खास भाषाई संस्कृति से नहीं पहचाना जाता । बल्कि यहाँ विभिन्न लोक और जन जातीय संस्कृतियों का समागम है । इसलिये कोई एक लोक संस्कृति नहीं है । एक तरफ़ यहाँ 5 लोक संस्कृतियों का आपसी समावेश है ।  दूसरी ओर अनेक जन जातियों की आदिम संस्कृतियों का सुखद नजारा है ।
मध्य प्रदेश के 5 सांस्कृतिक क्षेत्र - निमाड़ । मालवा । बुन्देलखण्ड । बघेलखण्ड । ग्वालियर और धार - झाबुआ । मंडला - बालाघाट । छिन्दवाड़ा । होशंगाबाद । खण्डवा - बुरहानपुर । बैतूल । रीवा - सीधी । शहडोल आदि जन जातीय क्षेत्रों में विभक्त है ।
निमाड़ मध्य प्रदेश के पश्चिमी अंचल में आता है । इसकी भौगोलिक सीमाओं में एक तरफ़ विन्ध्य की उतुंग पर्वत श्रृंखला । और दूसरी तरफ़ सतपुड़ा की सात उपत्यिकाएँ हैं । और मध्य में बहती है । नर्मदा की जल धार । पौराणिक काल में निमाड़ अनूप जनपद कहलाता था । बाद में इसे निमाड़ कहा गया ।
महाकवि कालीदास की धरती मालवा हरी भरी धन धान्य से भरपूर रही है । यहाँ के लोगों ने कभी अकाल नहीं

देखा । विन्ध्याचल के पठार पर प्रसरित मालवा की भूमि सस्य । श्यामल । सुन्दर और उर्वर तो है ही । ये धरती पश्चिम भारत की सबसे अधिक स्वर्णमयी और गौरवमयी भूमि रही है ।
उत्तर में यमुना । दक्षिण में विंध्य प्लेटों की श्रेणियों । उत्तर - पश्चिम में चंबल । और दक्षिण पूर्व में पन्ना । आजमगढ़ श्रेणियों से घिरे भू भाग को बुंदेलखंड नाम से जाना जाता है । कनिंघम ने बुंदेलखंड के अधिकतम विस्तार के समय इसमें गंगा और यमुना का समस्त दक्षिणी प्रदेश जो पश्चिम में बेतवा नदी से पूर्व में चन्देरी और सागर के जिलों सहित विंध्यवासिनी देवी के मन्दिर तक तथा दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने के निकट बिल्हारी तक प्रसरित था
बघेलखण्ड का सम्बन्ध भी अति प्राचीन भारतीय संस्कृति से है । यह भू भाग रामायण काल में कोसल प्रान्त के अन्तर्गत था । महाभारत काल में विराट नगर बघेलखण्ड भूमि पर ही था । जिसका नाम आजकल सोहागपुर है । भगवान राम की वनवास यात्रा इसी क्षेत्र से हुई थी । यहाँ के लोगों में शिव । शाक्त । वैष्णव सम्प्रदाय की परम्परा विद्यमान है । नाथ पंथी योगियो का भी खासा प्रभाव है । पर कबीर पंथ का प्रभाव सर्वाधिक है । कबीर के खास शिष्य धर्मदास बाँदवगढ़ निवासी ही थे ।
ग्वालियर मध्य प्रदेश का चंबल क्षेत्र । भारत का मध्य भाग । यहाँ भारतीय इतिहास की अनेक महत्त्वपूर्ण  घटनायें हुई हैं । इस क्षेत्र का सांस्कृतिक आर्थिक केंद्र ग्वालियर शहर है । सांस्कृतिक रुप से भी यहाँ अनेक संस्कृतियों का आवागमन और संगम हुआ है । 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम झाँसी की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने इसी भूमि पर लड़ा था ।
इसी मध्य प्रदेश के निमाङ की अमराइयो में कोयल की कूक गूंजने लगी थी । पलाश के फूलो की लाली फ़ैल रही थी । होली का खुमार सिर चढकर बोल रहा था । मधुर गीतों की गूँज से निमाङ चहक रहा था ।
दिल में ढेरों रंग बिरंगे अरमान लिये रंग बिरंगे ही वस्त्रों में सजी सुन्दर युवतियों के होंठ गुनगुना रहे थे - म्हारा हरिया ज्वारा हो कि । गहुआ लहलहे मोठा हीरा भाई वर बोया जाग । कि लाड़ी बहू सींच लिया ।


रानी सिंची न जाण्य हो कि ज्वारा पेला पडया । उनकी सरस क्थो लाई हो । हीरा भाई ढकी लिया ।
इसी रंग बिरंगी धरती पर वह रूप की रंगीली रानी आँखों में रंग बिरंगे ही सपने सजाये जैसे सब बन्धन तोङ देने को मचल रही थी । उसकी छातियों में मीठी मीठी कसक सी होती थी । उसके दिल में कोई अनजान सी हूक उठती थी । हाय वो कौन होगा । जो उसे बाँहों में भींच कर रख देगा ।
सासु न बहू गौर पूजा ही रना देव । अडोसन पड़ोसन गौर पूजा हो रना देव । पड़ोसन पर तुटयो गरबो भान हो रना देव । कसी पट तुटयो गरबो भान हो रना देव ।  दूध केरी दवनी मङ घेर हो रना देव । पूत करो पालनों पटसल हो रना देव । स्वामी सुत सुख लड़ी सेज हो रना देव । असी पट तुटयो गरबो भान हो रना देव ।
आज की रात । उसने सोचा । इसी वीराने में बीतने वाली थी । कहाँ का फ़ालतू लफ़ङा उसे आ लगा था । साँप के मुँह छछूँदर । न निगलते बने । न उगलते ।
- पर पर मेरे दोस्त । वह फ़िर से बोला - जिन्दगी किसी हसीन ख्वाव जैसी नहीं होती । कभी नहीं होती । जिन्दगी की ठोस हकीकत कुछ और ही होती है ? कुछ और ही ।
यकायक वह उकता सा उठा । वह उठ खङा हुआ । और फ़िर बिना बोले ही चलने को हुआ । मनोज ने उसे कुछ नहीं कहा । और तमंचा कनपटी से लगा लिया - ओ के मेरे अजनबी दोस्त अलबिदा ।
आ वैल मुझे मार । जबरदस्ती गले लग जा । शायद इसी के लिये कहा गया है । हारे हुये जुआरी की तरह वह फ़िर से बैठ गया । उसने एक सिगरेट निकाली । और सुलगा ली । लेकिन नितिन खामोशी से उस छाया को ही देखता रहा ।
- लेकिन मैं शर्मिन्दा नहीं हूँ । पदमा सहजता से बोली - अभी भी नहीं हूँ । अभी अभी तुमने कहा । तुम्हें मुझे यहाँ देखना भाता है । फ़िर बताओ । क्यों । बोलो बोलो । ऐसे ही मैं भी तुमको बहुत निगाहों से देखती हूँ । अगर तुम्हारे दिल में कुछ काम रस सा जागता है । फ़िर मेरे दिल में क्यों नहीं ? और वैसे भी देवर भाभी का सम्बन्ध अनैतिक नहीं है । देवर को द्वय वर कहा गया है । दूसरा वर । यह एक तरह से समाज का अलिखित कानून है । देवर भाभी के शरीरों का मिलन हो सकता है ।
मनोज शायद तुम्हें मालूम न हो । अभी तुम दुनियादारी के मामले में बच्चे हो । अगर किसी स्त्री को उसके पति की कमी से औलाद ना होती हो । तो उसकी अतृप्त जमीन में देवर ही बीजारोपण का प्रथम अधिकारी होता है । उसके बाद । कुछ परिस्थितियों में जेठ भी । और जानते हो । ऐसा हमेशा घर वालों की मर्जी से उनकी जानकारी में होता है । वे कुँवारे और शादीशुदा देवर को प्रेरित करते हैं कि वह भाभी की उजाङ जमीन पर खुशियों की फ़सल लहलहा दे ।
नितिन के दिमाग में एक विस्फ़ोट सा हुआ । कैसा अजीव संसार है यह । शायद यहाँ बहुत कुछ ऐसा  विचित्र है । जिसको उस जैसे लोग कभी नहीं जान पाते । तन्त्र दीप से शुरू हुयी उसकी मामूली प्रेतक जिज्ञासा इस लङके के दिल में घुमङते कैसे तूफ़ान को सामने ला रही थी । उसने सोचा तक न था । सोच भी न सकता था ।
- शब्द । शब्द । वह तमंचा जमीन पर रखता हुआ बोला - और शब्द । शब्दों का कमाल । कितनी हैरानी की बात थी । भाभी के शब्द आज मुझे जहर से लग रहे थे । उसके चुलवुले पन में मुझे एक नागिन नजर आ रही थी । उसके बेमिसाल सौन्दर्य में मुझे काली नागिन नजर आ रही थी । एक खतरनाक चुङैल । खतरनाक चुङैल । मुझे..अचानक उसे कुछ याद सा आया - एक बात बताओ । तुम भूत प्रेतों में विश्वास करते हो । मेरा मतलब । भूत होते हैं । या नहीं होते हैं ?
नितिन ने एक सिहरती सी निगाह काली छाया पर डाली । उसका ध्यान सरसराते पीपल के पत्तों पर गया ।

निरन्तर कभी कभी आसपास महसूस होती अदृश्य रूहों पर गया । उसने गौर  से मनोज को देखा ।
और बोला - पता नहीं । कह नहीं सकता । शायद होते हों । शायद न होते हों ।
अब वह बङी उलझन में था । उसने सोचा । ये अपने दिल का गम हल्का करना चाहता है । क्या वह स्वयं इससे प्रश्न पूछे । और जल्दी जल्दी ये बताता चला जाये । और बात खत्म हो । पर तुरन्त ही उसका दिमाग रियेक्ट करता । इसके अन्दर कोई बहुत बङा रहस्य । कोई बहुत बङी आग जल रही है । जिसका निकल जाना जरूरी है । वरना शायद ये खुद को गोली भी मार ले । मार सकता था । इसलिये एक जिन्दगी की खातिर उसमें स्वयं जो क्रिया हो रही थी । वही तरीका अधिक उचित था । और तब उसे सिर्फ़ सुनना था । देखना था ।
- मनसा जोगी । वह भाव से बे स्वर बोला - रक्षा करें ।
- लेकिन मैं जानता हूँ । वह फ़िर से बोला - मैंने उन्हें कभी देखा तो नहीं । पर मुझे 100% पता है । होते हैं । और तुम जानते हो । इनके भूत प्रेत होने का जो मुख्य कारण है । बस एक ही । सेक्स । काम वासना । व्यक्ति में निरन्तर सुलगती काम वासना । काम वासना से पीङित । काम वासना से अतृप्त रहा । इंसान निश्चय ही भूत प्रेत के अंजाम को प्राप्त होता है ।


ये अचानक से क्या हो गया था । पदमिनी नायिका पदमा भावहीन चेहरे से आंगन में खिलते गमलों को देख रही थी । उसे लग रहा था । कुछ असामान्य सा था । जो एकदम घटित हुआ था । वह इतना अनुभवी भी नहीं था कि इन बातों का कोई ठीक अर्थ निकाल सके । बस यार दोस्तों के अनुभव के चलते उसे कुछ जानकारी थी ।
- भाभी ! तब अचानक वह उसकी ओर देखता हुआ बोला - एक बात बोलूँ । सच सच बताना । क्या तुम भैया से खुश नहीं हो ? क्या तुम्हें तृप्ति नहीं होती ।
दूसरी तरफ़ देखती पदमा ने यकायक झटके से मुँह घुमाया । उसने तेजी से ब्लाउज के ऊपरी तीन हुक खोल दिये । और नागिन सी चमकती आँखों से उसकी तरफ़ देखा ।
- देखो इधर । वह सख्त स्वर में बोली - ये दो बङे बङे माँस के गोले । सिर्फ़ चर्बी माँस के गोले । अगर एक सुन्दर जवान मरी औरत का शरीर लावारिस फ़ेंक दिया जाये । तो फ़िर इस शरीर को कौवे कुत्ते ही खायेंगे । मेरी ये मृगनयनी आँखें किसी प्यासी चुङैल के समान भयानक हो जायेंगी । मेरे इस सुन्दर शरीर से बदबू और घिन आयेगी । बताओ । इसमें ऐसा क्या है ? जो किसी स्त्री को नहीं पता । जो किसी पुरुष को नहीं पता । फ़िर भी कोई तृप्त हुआ आज तक । अन्तिम अंजाम । जानते हुये भी ।
- नितिन जी ! वह ठहरे स्वर में बोला - बङे ही अजीव पल थे वो । वक्त जैसे थम गया था । उस पर काम देवी सवार थी । और मुझे ये भी नहीं पता । उस वक्त उसकी मुझसे क्या ख्वाहिश थी । सच ये है कि मैं किसी सम्मोहन सी स्थिति में था । लेकिन उसका सौन्दर्य । उसके अंग । सभी मुझे विषैले नाग बिच्छू जैसे लग रहे थे । और जैसे कोई अज्ञात शक्ति मेरी रक्षा कर रही थी । मुझे सही गलत का बोध करा रही थी । शब्द जैसे अपने आप मेरे मुँह से निकल रहे थे । जैसे शायद अभी भी निकल रहे हैं । शब्द ।
- लेकिन भाभी ! मेरा ये मतलब नहीं था । मैंने सावधानी से कहा - औरत की काम वासना को यदि उसके लिये

नियुक्त पुरुष मौजूद हो । तब ऐसी बात कुछ अजीब सी लगती है ना । इसीलिये मैंने कहा । शायद आप अतृप्त तो नहीं हो ।
-  अतृप्तऽऽऽ । अतृप्तऽऽ । अतृप्तऽऽ । अतृप्तऽऽ । अतृप्त । अतृप्त । अतृप्त । मनोज का यह शब्द रह रह कर उसके दिमाग में हथौङे सी चोट करने लगा । एकाएक उसकी मुखाकृति बिगङने लगी । उसका बदन ऐंठने लगा । उसका सुन्दर चेहरा बेहद कुरूप हो उठा । उसके चेहरे पर राख सी पुती नजर आने लगी । वह बङी जोर से हँसी । और
- हाँ ! हाँ ! उसने ब्लाउज के पल्ले पकङकर एक झटका मारा । एक झटके से ब्लाउज दूर जा गिरा - हाँ मैं अतृप्त ही हूँ । सदियों से प्यासी । एक अतृप्त औरत । एक प्यासी आत्मा । जिसकी प्यास आज तक कोई दूर न कर सका । कोई भी ।
अब तक उकताहट महसूस कर रहा नितिन एकाएक सजग हो गया । उसकी निगाह स्वतः ही काली छाया पर गयी । जो बैचेनी से पहलू बदलने लगी थी । पर मनोज उन दोनों की अपेक्षा शान्त था ।
- फ़िर क्या हुआ ? बेहद उत्सुकता में उसके मुँह से निकला ।
- कुछ नहीं । उसने  भावहीन स्वर में उत्तर दिया - कुछ नहीं हुआ । वह बेहोश हो गयी ।

कामवासना 4

रात के दस बजने वाले थे । बादलों से फ़ैला अंधेरा कब का छँट चुका था । नीले आसमान में चाँद निकल आया था । उस शमशान में दूर दूर तक कोई रात्रिचर जीव भी नजर नहीं आ रहा था । सिर्फ़ सिर के ऊपर उङते चमगादङों की सर्र सर्र कभी कभी उन्हें सुनाई दे जाती थी । बाकी भयानक सन्नाटा ही सांय सांय कर रहा था । पर मनोज अब काफ़ी सामान्य हो चुका था । और बिलकुल शान्त था ।
लेकिन अब उसके मन में भयंकर तूफ़ान उठ रहा था । क्या बात को यूँ ही छोङ दिया जाये । इसके घर या अपने घर चला जाये । या घर चला ही नहीं जाये । यहीं । या फ़िर और कहीं । वह सब जाना जाये । जो इस लङके के दिल में दफ़न था । यदि वह मनोज को यूँ ही छोङ देता । तो फ़िर पता नहीं । वह कहाँ मिलता । मिलता भी या नहीं मिलता । आगे क्या कुछ होने वाला था । ऐसे ढेरों सवाल उसके दिलोदिमाग में हलचल कर रहे थे ।
- बस हम तीन लोग ही हैं घर में । वह बिलकुल सामान्य होकर बोला - मैं । मेरा भाई । और मेरी भाभी ।
वे दोनों वापस पुल पर आ गये थे । और पुल की  रेलिंग से टिके बैठे थे । यह वही स्थान था । जहाँ नीचे बहती नदी से नितिन उठकर उसके पास गया था । और जहाँ उसका वेस्पा स्कूटर भी खङा था । आज क्या ही अजीव सी बात हुयी थी । उन्हें यहाँ आये कुछ ही देर हुयी थी । और ये बहुत अच्छा था । वह काली छाया यहाँ उनके साथ नहीं आयी थी । बस कुछ दूर पीछे चलकर अंधेरे में चली गयी थी । यहाँ बारबार आसपास ही महसूस होती अदृश्य रूहें भी नहीं थी । और सबसे बङी बात । जो उसे राहत पहुँचा रही थी । मनोज यहाँ एकदम सामान्य व्यवहार कर रहा था । उसके बोलने का लहजा शब्द आदि भी सामान्य थे । फ़िर वहाँ क्या बात थी ? क्या वह किसी अदृश्य प्रभाव में था । किसी जादू टोने । किसी सम्मोहन । या ऐसा ही और कुछ अलग सा ।
- फ़िर क्या हुआ ? अचानक जब देर तक नितिन अपनी उत्सुकता रोक न सका । तो स्वतः ही उसके मुँह से निकला - उसके बाद क्या हुआ ?
- कब ? मनोज हैरानी से बोला - कब क्या हुआ ? मतलब ?
नितिन के छक्के छूट गये । क्या वह किसी ड्र्ग्स आदि का आदी था । या कोई प्रेत रूह । या कोई शातिर इंसान । अब उसके इस कब का वह क्या उत्तर देता । सो चुप ही रह गया ।
- मुझे अब चलना चाहिये । अचानक वह उठता हुआ बोला - रात बहुत हो रही है । तुम्हें भी घर जाना होगा । कह कर वह तेजी से एक तरफ़ बढ गया ।
- अरे सुनो सुनो । वह हङबङा कर जल्दी से बोला - कहाँ रहते हो आप । मैं छोङ देता हूँ । सुनो भाई । एक मिनट..मनोज । तुम्हारा एड्रेस क्या है ?
- बन्द गली । उसे दूर से आते मनोज के शब्द सुनाई दिये - बन्द घर । जमीन के नीचे । अंधेरा बन्द कमरा ।
- हा हा हा । जोगी ने भरपूर ठहाका लगाया -  बन्द गली । बन्द घर । जमीन के नीचे । अंधेरा बन्द कमरा । हा हा हा । एकदम सही पता ।
वह एकदम हैरान रह गया । हमेशा गम्भीर सा रहने वाला उसका तांत्रिक गुरु खुल कर हँस रहा था । उसके चेहरे 


पर रहस्यमय मुस्कान खेल रही थी । मनसा जोगी कुछ कुछ काले से रंग का विशालकाय काले पहाङ जैसा भारी भरकम इंसान था । और कोई भी उसको देखने सुनने वाला धोखे से गोगा कपूर समझ सकता था । बस उसकी एक आँख छोटी और सिकुङी हुयी थी । जो उसकी भयानकता में वृद्धि करती थी । मनसा बहुत समय तक अघोरियों के सम्पर्क में उनकी शिष्यता में रहा था । और मुर्दा शरीरों पर शव साधना करता था । पहले उसका झुकाव पूरी तरह तामसिक शक्तियों के प्रति था । लेकिन भाग्यवश उसके जीवन में यकायक बदलाव आया । और वह उसके साथ साथ द्वैत की छोटी सिद्धियों में हाथ आजमाने लगा । अघोर के उस अनुभवी को उम्मीद से पहले सफ़लता मिलने लगी । और उसके अन्दर का सोया इंसान जागने लगा । तब ऐसे ही किन्ही क्षणों में नितिन से उसकी मुलाकात हुयी । जो एकान्त स्थानों पर घूमने की आदत से हुआ महज संयोग भर था ।
मनसा जोगी शहर से बाहर थाने के पीछे टयूब वैल के पास घने पेङों के झुरमुट में एक कच्चे से बङे कमरे में रहता था । कमरे के आगे पङा बङा सा छप्पर उसके दालान का काम करता था । जिसमें अक्सर दूसरे साधु बैठे रहते थे ।
नितिन को रात भर ठीक से नींद नहीं आयी थी । तब वह सुबह इसी आशा में चला आया था कि मनसा शायद  कुटिया पर ही हो । और संयोग । वह उसे मिल भी गया था । वह भी बिलकुल अकेला । इससे नितिन के उलझे दिमाग को बङी राहत मिली थी । पूरा विवरण सुनने के बाद जब मनसा एड्रेस को लेकर बेतहाशा हँसा । तो वह सिर्फ़ भौंचक्का सा उसे  देखता ही रह गया ।
- भाग जा बच्चे । मनसा रहस्यमय अन्दाज में उसको देखता हुआ बोला -  ये साधना सिद्धि तन्त्र मन्त्र बच्चों के खेल नहीं । इनमें दिन रात ऐसे ही झमेले हैं । इसलिये अभी भी समय है । दरअसल ये वो मार्ग है । जिस पर जाना तो आसान है । पर लौटने का कोई विकल्प ही नहीं है ।
- मेरी ऐसी कोई खास ख्वाहिश भी नहीं । वह साधारण स्वर में बोला - पर इस  दुनियाँ में कुछ चीजें लोगों को इस तरह भी प्रभावित कर सकती हैं क्या ? कि जीवन उनके लिये एक उलझी हुयी पहेली बनकर रह जाये । उनका जीना ही दुश्वार हो जाये । मैं उसे बुलाने नहीं गया था । उससे मिलना एक संयोग भर था । जिस मुसीवत में वो 


आज था । उसमें कल मैं भी हो सकता हूँ । अन्य भी हो सकते हैं । तब क्या हम हाथ पर हाथ रखकर ऐसे ही बैठे देखते रहें ।
शायद यही होता है । एक पढे लिखे इंसान । और लगभग अनपढ साधुओं में फ़र्क । मनसा इन थोङे ही शब्दों से बेहद प्रभावित हुआ । उसे इस सरल मासूम लङके में जगमगाते हीरे सी चमक नजर आयी । शायद वह एक सच्चा इंसान था । त्यागी था । और उसके हौंसलों में शक्ति का उत्साह था । सो वह तुरन्त ही खुद  भी सरल हो गया ।
वही उस दिन वाला स्थान आज भी था । नदी के पुल से नीचे उतरकर । बहती नदी के पास ही बङा सा पेङ । पिछले तीन दिन से वह यहीं मनोज का इंतजार कर रहा था । पर वह नहीं आया था । मनसा ने उसे - बन्द गली । बन्द घर । जमीन के नीचे । अंधेरा बन्द कमरा । का मतलब भी समझा दिया था । और भी बहुत कुछ समझा दिया था । बस रही बात मनोज को फ़िर से तलाशने की । तो मनसा ने जो उपाय बताया । वो कोई गुरु ज्ञान जैसा नहीं था । बल्कि एक साधारण बात ही थी । जो अपनी हालिया उलझन के चलते यकायक उसे नहीं सूझी थी कि - वो निश्चित ही उपचार के लिये तन्त्र दीप जलाने उसी स्थान पर आयेगा ।
सो वह पिछले तीन दिन से उसे देख रहा था । पर वह नहीं आया था । उसने एक सिगरेट सुलगायी । और यूँ ही कंकङ उठाकर नदी की तरफ़ उछालने लगा ।
- कमाल के आदमी हो भाई । मनोज उसे हैरानी से देखता हुआ बोला - क्या करने आते हो । इस मनहूस शमशान में । जहाँ कोई मरने के बाद भी आना पसन्द न करे । पर आना उसकी मजबूरी है । क्योंकि आगे जाने के लिये गाङी यहीं से मिलेगी ।
- यही बात । अबकी वह सतर्कता से बोला - मैं आपसे भी पूछ सकता हूँ । क्या करने आते हो । इस मनहूस शमशान में । जहाँ कोई मरने के बाद भी आना पसन्द न करे ।
ये चोट मानों सीधी उसके दिल पर लगी । वह बैचेन सा हो गया । और कसमसाता हुआ पहलू बदलने लगा ।
- दरअसल मेरी समझ में नहीं आता । आखिर वह सोचता हुआ सा बोला - क्या बताऊँ । और कैसे बताऊँ । मेरे परिवार में मैं मेरी भाभी और मेरे भाई हैं । हमने कुछ साल पहले एक नया घर खरीदा है । सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक कुछ अजीव सा घटने लगा । और उसी के लिये मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस तरह के शब्दों का प्रयोग करूँ । जो अपनी बात ठीक उसी तरह कह सकूँ । जैसे वह होती है । पर मैं कह ही नहीं पाता । ये दीपक..उसने दीप की तरफ़ इशारा किया - एक उपचार जैसा बताया गया है । मुझे नहीं पता कि इसका सत्य क्या है ? यहाँ शमशान में । खास इस पीपल के वृक्ष के नीचे । कोई दीपक जला देने से भला क्या हो सकता है । मेरी समझ से बाहर है । पर आश्वासन यही दिया है । इससे हमारे घर का अजीव सा माहौल खत्म हो जायेगा ।
- क्या अजीव सा ? वह दूर देखता हुआ बोला ।
- कुछ सिगरेट वगैरह पीते हो ? वह बैचेनी से बोला ।
उसने आज एक बात अलग की थी । वह अपना स्कूटर ही यहीं ले आया था । और उसी की सीट पर आराम से बैठा था । शायद कोई रात उसे पूरी तरह वहीं बितानी पङ जाये । इस हेतु उसने बैटरी से छोटा बल्ब जलाने का खास इंतजाम अपने पास कर रखा था । और सिगरेट के एक्स्ट्रा पैकेट भी ।
सुबह के ग्यारह बजने वाले थे । पदमा काम से फ़ारिग हो चुकी थी । वह अनुराग के आफ़िस चले जाने के बाद सारा काम जल्दी से निबटाकर तब नहाती थी । उतने समय तक मनोज पढता रहता । और उसके घरेलू कार्यों में भी हाथ बँटा देता । भाभी के नहाने के बाद दोनों साथ खाना खाते ।
दोनों के बीच एक अजीव सा रिश्ता था । अजीव सी सहमति थी । अजीव सा प्यार था । अजीव सी भावना थी । जो काम वासना थी भी । और बिलकुल भी नहीं थी ।
पदमा ने बाथरूम में घुसते घुसते कनखियों से मनोज को देखा । एक चंचल शोख रहस्यमय मुस्कान उसके होठों पर तैर उठी । उसने बाथरूम का दरवाजा बन्द नहीं किया । और सिर्फ़ हलका सा परदा ही डाल दिया । परदा । जो मामूली हवा के झोंके से उङने लगता था ।
आंगन में कुर्सी पर पढते मनोज का ध्यान अचानक भाभी की मधुर गुनगुनाहट हु हु हु हूँ हूँ आऽऽ आऽऽ । पर गया । वह किताब में इस कदर खोया हुआ था कि उसे पता ही नहीं था कि भाभी कहाँ है । और क्या कर रही है ? तब उसकी दृष्टि ने आवाज का तार पकङा । और उसका दिल धक्क से रह गया । उसके कुंवारे शरीर में एक गर्माहट सी दौङ गयी ।
बाथरूम का पर्दा रह रह कर हवा से उङ जाता था । पदमा ऊपरी हिस्से से निर्वस्त्र थी । उसके पुष्ट तने दूधिया उरोज उठे हुये थे । और वह आँखें बन्द किये अपने ऊपर पानी उङेल रही थी ।
- मेरे दो अनमोल रतन । वह मादक स्वर में गुनगुना रही थी - एक है ...हु हु हु हूँ हूँ
नैतिकता अनैतिकता के मिले जुले संस्कार उस किशोर लङके के अंतर्मन को बारबार थप्पङ से मारने लगे ।

नैतिकता बारबार उसका मुँह विपरीत ले जाती थी । और प्रबल अनैतिकता का वासना संस्कार उसकी निगाहों को सीधा बहीं ले जाता था । लेकिन ये अच्छा था कि भाभी की आँखें बन्द थी । और वह उसे देखते हुये नहीं देख रही थी । फ़िर अट्टाहास करती हुयी अनैतिकता ही विजयी हुयी । और न चाहते हुये भी वह कामुक भाव से लगातार पदमा को देखने लगा ।
- औरत..औरत .एक .नग्न औरत । वह चरस के नशे में झूमता हुआ सा बोला - मैंने सुना है । शास्त्रों में ऐसा लिखा है । औरत को उसका बनाने वाला भगवान भी नहीं समझ पाया कि - आखिर ये चीज क्या बन गयी ? फ़िर मैं तो एक सीधा सादा सामान्य लङका ही था । मगर ..?
उस दिन से विपरीत आज नितिन के चेहरे पर एक अदृश्य आंतरिक खुशी सी दौङ गयी । ठीक आज भी बही स्थिति बन गयी थी । जो उस दिन खुद ब खुद थी । और बकौल मनोज के हकीकत ज्यों की त्यों उसी  स्थिति में उसके मुँह से निकलती थी ।
- और उसी के लिये । उसे मनोज के शब्द याद आये - मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस तरह के शब्दों का प्रयोग करूँ । जो अपनी बात ठीक उसी तरह कह सकूँ । जैसे वह होती है । पर मैं कह ही नहीं पाता ।

फ़िर अभी तो बहुत समय था । रात के नौ बजने में भी अभी बीस मिनट बाकी थे ।
- मनोज भाई । पदमा उसके सामने चारपाई पर बैठते हुये बोली - तुम्हें कैसी लङकियाँ अच्छी लगती हैं ? दुबली । मोटी । लम्बी । नाटी । गोरी । काली । पढी । अनपढ । शहरी । ग्रामीण ।
- क्यों पूछा ? वह हैरानी से बोला - ऐसा प्रश्न आपने ।
- क्यूँ पूछा । मतलब ? वह आँखें निकाल कर बोली -  मैं तेरी भाभी हूँ । सुबह सुबह जब मैं उठती हूँ । मुझे तम्बू में बम्बू तना दिखाई नहीं देता क्या । देख मेरी आँखें कितनी बङी बङी हैं । ये अन्दर तक देख सकती हैं । पर ओ डवल्यू एल तूने पूछा ही है । क्यूँ पूछा । तो बता देती हूँ । उसमें कौन सी कोई चोरी वाली बात है । बता तेरे लिये लङकी कौन तलाश करेगा ? बोल । बोल । फ़िर अपना बम्बू किस तम्बू में..?
- लगता है ना । सब कुछ अश्लील सा । वह फ़िर से बोला - मगर सोचो । तो वास्तव में है नहीं । ये सिर्फ़ पढने सुनने में अश्लील लग सकता है । किसी पोर्न चीप स्टोरी जैसा । पर ठीक से सोचो । भाभियों को इससे भी गहरे और खुले मजाक करने का सामाजिक अधिकार हासिल है । प्रायः ऐसे खुले शब्दों वाक्यों का प्रयोग उस समय होता है । जिनको कहीं लिखा भी नहीं जा सकता । और मैं तुमसे कह भी नहीं सकता । बताओ इसमें कुछ गलत है क्या ?
नितिन ने पहली बार सहमति में सिर हिलाया । वह सच्चाई के धरातल पर बिलकुल सत्य ही बोल रहा था । यकायक फ़िर उसकी  निगाह पीछे से चलकर आती उसी  काली छाया पर गयी । शायद आज वह देर से आयी थी ।  उसने एक नजर शमशान के उस हिस्से पर डाली । जहाँ चिता सजायी जाती थी । वह गौर से उधर देखती रही । फ़िर चुपचाप उनसे कुछ ही दूर बैठ गयी ।

कामवासना 5

कहते हैं । सौन्दर्य और कुरूपता । नग्नता और वस्त्र आदि आवरण । देखने वाले की आँखों में होते हैं । दिमाग में होते हैं । न कि उस व्यक्ति में । जिसमें ये दिखाई दे रहा है । हम किसी को जब बेहद प्यार करते हैं । तो साधारण शक्ल सूरत वाला वह व्यक्ति भी हमें खास नजर आता है । बहुत सुन्दर नजर आता है । और लाखों में एक नजर आता है । क्योंकि हम अपने भावों की गहनता के आधार पर उसका चित्रण कर रहे होते हैं ।
- नितिन जी  ! वह फ़िर से बोला - ये ठीक है कि मेरी भाभी एक आम स्त्री के चलते वाकई सुन्दर थी । और सर्वांग सुन्दर थी । इतनी सुन्दर । इतनी मादक । इतनी नशीली कि खुद शराब की बोतल अपने अन्दर भरी सुरा से मदहोश होकर झूमने लगे ।
पर मेरे लिये वह एक साधारण स्त्री थी । एक मातृवत औरत । जो पूर्ण ममता से मेरे भोजन आदि का ख्याल रखती थी । वह हमारे छोटे से घर की शोभा थी । मैं उसकी  सुन्दरता पर गर्वित तो था । पर मोहित नहीं । उसकी सुन्दरता उस दृष्टिकोण से मेरे लिये आकर्षण हीन थी कि मैं उसे अपनी बाँहों में मचलने वाली रूप अप्सरा की ही कल्पनायें करने लगता । मुझे ठीक समझने की कोशिश करना भाई । मैं उसके स्तन नितम्ब आदि काम अंगों को कभी कभी खुद को सुख पहुँचाने वाले भाव से अवश्य देख लेता था । पर इससे आगे मेरा भाव कभी न बढा था । और ये भाव शायद मेरा नहीं । सबका होता है । एक सामान्य स्त्री पुरुष आकर्षण भाव । क्योंकि मैं ये भी अच्छी तरह जानता था कि वह मेरी भाभी है । और भाभी माँ समान भी होती है । होती है । क्या वो थी । मेरी माँ । भाभी माँ । बोलो कुछ गलत कहा मैंने ?
नितिन एक अजीव से मनोबैज्ञानिक झमेले में फ़ँस गया । उसका इंट्रेस्ट सिर्फ़ इस बात में था कि उसके घर में ऐसी क्या परेशानी है । जिसके चलते वह शमशान में तंत्र दीप जलाता है । ये काली औरत की अशरीरी छाया से इस लङके का क्या सम्बन्ध है ? और वो उसको मनुष्य के काम सम्बन्धों काम भावनाओं का मनोबिज्ञान पूरी दार्शनिकता से समझा रहा था । शायद । उसने सोचा । अपनी बात पूरी करते करते ये गलत को सही सिद्ध कर दे । और कर क्या दे । बराबर करे ही जा रहा था ।
- लेकिन । उसने उकता कर बात का रुख मोङने की कोशिश की ।
- हाँ लेकिन । वह फ़िर से जैसे दूर से आते स्वर में बोला - ठीक यही कहा था मैंने । लेकिन भाभी किसी और लङकी की जरूरत ही क्या है ? तुम मेरे लिये खाना बना देती हो । कपङे धो देती हो । फ़िर दूसरी और लङकी क्यों ?
पदमा वाकई पदमिनी नायिका थी । अंग अंग से छलकती मदिरा । बंधन तोङने को मचलता सा उन्मुक्त यौवन । नहाने के बाद उसने आरेंज कलर की ब्रा रहित मैक्सी पहनी थी । और लगभग पारदर्शी उस झिंगोले में आरेंज फ़्लेवर सी ही गमक रही थी । रूप की रानी । स्वर्ग से प्रथ्वी पर उतर आयी अप्सरा ।


उसने मैक्सी के बन्द ऊपर नीचे अजीव आङे टेङे अन्दाज में लगाये थे कि उसे चोरी चोरी देखने की इच्छा का सुख ही समाप्त हो गया । उसका अंग अंग खिङकी से झांकती सुन्दरी की तरह नजर आ रहा था । उसके सामने भाभी नहीं । सिर्फ़ एक कामिनी औरत ही थी ।
- मनोज ! उसने भेदती निगाहों से उसे देखा - अभी शायद तुम उतना न समझो । पर हर आदमी में दो आदमी होते हैं । और हर औरत में दो औरत । एक जो बाहर से नजर आता है । और एक जो अन्दर होता है । अन्दर..उसने एक निगाह उसके शरीर पर खास डाली -  इस अन्दर के आदमी की हर औरत दीवानी है ।                                                                                                                                                                                                                                                                          और क्योंकि अन्दर से तुम पूर्ण पुरुष हो । पूर्ण पुरुष । छोटे स्केल से दो इंच बङे । और बङे स्केल से चार इंच छोटे ।
नितिन हैरान रह गया । यकायक तो उसकी समझ में नहीं आया कि ये क्या कह रहा है । फ़िर वह ठहाका लगा उठा । नशे मे हुआ बेहद गम्भीर मनोज भी सब कुछ भूलकर उसके साथ ही हँसने लगा ।
- हाँ बङे भाई ! वह फ़िर से बोला - ठीक यही भाव मेरे मन में आया । जो सामान्यतः इस वक्त तुम्हारे मन में आया । पहले तो मैं समझा ही नहीं कि भाभी क्या बोल रही है । और कहाँ बोल रही है ? शब्द । इसलिये कमाल के होते है ना शब्द भी । पवित्र । अपवित्र । द्वेष । कामुक । अश्लील । राग । वैराग । सब शब्द ही तो हैं ।..सोचो मेरे भाई । कोई भी हमारे बारे में जाने क्या क्या सोच रहा है । क्या देख रहा है ? हम कभी जान सकते हैं क्या ? बोलो कभी जान सकते हैं क्या ?
- अरे पगले राजा ! पदमा फ़िर इठला कर बोली - इन सब बातों को इतना सीरियस भी मत ले । ये देवर भाभी की कहानी है । एक ऐसा रोमांस है । जिसको रोमांस नहीं कह सकते । फ़िर भी होता रोमांस जैसा ही है ।.देख मैं ही बताती हूँ । मेरी सोच क्या है ? मैं रूप कला । रूप की रानी । रूपसी । रूप स्वरूपा । फ़िर यदि लोग मुझे देख कर आहें ना भरें । तब इस रूप के रूप का क्या मतलब ? हर रूपवती चाहती है कि लोगों पर उसक्के रूप का यही असर हो । रूप का रूप जाल । और निसंदेह तब मैं भी ऐसा ही चाहती हूँ । क्योंकि मेरा रूप अच्छी अच्छों का रूप फ़ीका कर देता है ।
फ़िर एक बात और । अभी तुम आयु के जिस दौर से गुजर रहे हो । तुम्हें औरत को सिर्फ़ इसी रूप में देखना अच्छा लगेगा । न कोई माँ । न कोई बहन । न भाभी बुआ मौसी आदि । सिर्फ़ औरत । औरत । जो पहले कभी लङकी होती है । फ़िर औरत । औरत । तव हम दोनों की ये नयन सुख वासना पूर्ति घर में ही हो जायेगी । क्यों मुझे कोई और ताके । और क्यों तुम बाहर ललचाओ ।
- काफ़ी एक्सपर्ट लगती है आपकी भाभी । नितिन भी थोङा थोङा रस सा लेता हुआ बोला - मेरे ख्याल में ऐसी

गुणवान रूपवती  स्त्री का कोई विवरण न मैंने आज तक सुना । न कभी पढा ।
- एक बात बताओ । अचानक मनोज उसे गौर से देखता हुआ बोला - तुमने कभी किसी लङकी किसी औरत से प्यार किया है ?
उसने ना में सिर हिलाया । और बोला - इस तरफ़ कभी ध्यान ही नहीं गया । शायद मेरे स्वभाव में एक रूखापन है । और इससे उत्पन्न चेहरे की रिजर्वनेस से किसी लङकी की हिम्मत नहीं पङी होगी । मनोज जैसे सब कुछ समझ गया ।
- एक बात बताओ भाभी ! मनोज हैरानी से बोला - ऐसी जबरदस्त लङकी । मीन यू । मनचले लफ़ंगों से किस तरह बची रही । और खुद तुम कभी किसी से प्यार नहीं कर पायीं । ऐसा कैसे सम्भव हो सका ?
पदमिनी पदमा ने एक गहरी सांस ली । जैसे उसकी दुखती रग को किसी ने छेङ दिया हो ।
- अभी क्या बोलूँ मैं । वह माथे पर हाथ रख कर बोली - पहले बताया तो था । उसकी वजह से तो ये पूरा लफ़ङा ही बना है । वरना आज कहानी कुछ और ही होती । फ़िर उसे या मुझे रोज रोज नयी नयी कहानी क्यों लिखनी होती ? अजीव पागल था । मुझ साक्षात रूप की रानी में उसकी कोई दिलचस्पी ही न थी । अदृश्य के चक्करों में ही पङा रहता ।.. हाय राजीव ! तुमने ऐसा क्यों किया ? मेरा रूप जवानी एक बार तो देखा होता ।..अब मैं क्या करती । वो फ़िर साधु हो गया ।
- ले लेकिन । वह बोला - किसी एक के न होने से क्या होता है । बहुत से सुन्दर हेल्दी  छोरे आपके आगे पीछे घूमते ।
- मनोज ! एकाएक वह सामान्य स्वर में बोली - तुम किसी लङकी का दिल नहीं समझ सकते । कोई भी लङकी अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूल पाती । उसका तिरस्कार करने उपेक्षा करने वाले प्रेमी के लिये फ़िर उसकी एक जिद सी बन जाती है । तब मेरी भी ये जिद बन गयी कि मैं उसे अपना प्यार मानने पर मजबूर कर दूँगी । पर करती तो तब ना । जब वह सामान्य आदमी रहता । वह तो साधु ही बन गया । तब बताओ । मैं क्या करती । साधुओं के आगे पीछे घूमती क्या ? फ़िर भी वो मेरे दिल से आज तक नहीं निकला ।
कैसी अजीव उलझन थी । अगर वह इसको कोई केस मानता । कोई अशरीरी रूह प्रयोग मानता । तो फ़िर उसकी शुरूआत भी नहीं हुयी थी । देवर भाभी सम्बन्ध पर मनोबैज्ञानिक मामला मानता । तो भी बात ठीक ठीक समझ में नहीं आ रही थी । उसे अब तक यही लगा था कि एक भरपूर सुन्दर और जवान युवती देवर में अपने वांछित प्रेमी को खोज रही है । अब कोई आम देवर होता । तो उसने देवर दूसरा वर का सिद्धांत सत्य कर दिया होता । लेकिन मामला कुछ ऐसा था । भाभी डाल डाल तो देवर पात पात । पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है ।
एक बात और भी थी । ये भाभी देवर की लोलिता टायप सेक्स स्टोरी होती । तो भी वह उसे उसके हाल पर छोङकर 


कब का चला गया होता । पर उसका अजीवोगरीब व्यवहार । उसके पास रहती काली छाया । उसका एड्रेस बताने का अजीब स्टायल । वह इनमें आपस में कोई मिलान नहीं कर पा रहा था । और सबसे बङी प्राब्लम ये थी कि वह शायद किसी सहायता का इच्छुक ही न था । वह किसी प्रेत बाधा को लेकर परेशान था भी या नहीं । तय करना मुश्किल था । उससे सीधे सीधे कुछ पूछा नहीं जा सकता था । और जब वह बोलता था । तो भाभी पुराण शुरू कर देता । यहाँ तक कि नितिन की इच्छा अपने बाल नोचने की होने लगी । या तो ये लङका खुद पागल था । या उसे पागल करने वाला था । उसने एक नजर फ़िर उस काली छाया पर डाली । वो भी बङी शान्ति से किसी जासूस की तरह बस उनकी बातें ही सुन रही थी । अचानक ही उसे ख्याल आया । कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी चक्र व्यूह में फ़ँसा जा रहा हो । वह खुद को होशियार समझ रहा हो । जबकि ये दोनों उसे पागल बनाकर कोई मोहरा आदि बना रहे हों । वह तेजी से समूचे घटना कृम पर विचार करने लगा । तब एकाएक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी । और फ़िर ।
- देखिये मनोज जी ! वह सामान्य स्वर में वोला - एक बात होती है । जैसे  हर युवा होती लङकी को स्वयँ में ही खास सुन्दरता नजर आती है । उसे लगता है वह कुछ खास है । और सबकी निगाह बस उसी पर रहती है । पर ये

सच नहीं होता । लोगों को वह लङकी नहीं । उसमें पैदा हो चुका सेक्स आकर्षण प्रभावित करता है । एक तरह से इसको मानसिक सम्भोग भी कह सकते हैं । और सामान्यतयाः ये हरेक स्त्री पुरुष करता है । फ़िर वह विवाहित हो । या शादीशुदा । वृद्ध । अधेङ । जवान हो । या किशोर । काम भावना वह जन्म के साथ लेकर ही आता है । अटैच्ड ।
इसलिये मुझे नहीं लगता । आप जो भी बता रहे हैं । उसमें कुछ खास बताने जैसा है । ये बस एकान्त के वे अंतरंग क्षण हैं । जिनमें हम विपरीत लिंगी से अपनी कुछ खास भावनायें जाहिर करते हैं । आपकी भाभी सुन्दर थी । उन्हें खुद का सौन्दर्य बोध था । और इसलिये वह स्वाभाविक ही चाहती थी कि उनके रूप का जादू हरेक के सर चढकर बोले । अतः इसमें कुछ अजीव नहीं । कुछ खास नहीं ।
- हाँ ! वह कुछ ठहर कर उसका चेहरा पढता हुआ सा बोला - एक बात है । जो अलग हो सकती है । आपकी भाभी में काम भावना सामान्य से बेहद अधिक हो । और वह आपके भाई से पूर्ण सन्तुष्टि न पाती हों । या उन्हें अलग अलग पुरुषों को भोगना अच्छा लगता हो । और इस स्तर पर वह अपने आपको अतृप्त महसूस करती हो । यस अतृप्त । अतृप्प्त ।
मनोज के चेहरे पर जैसे भूचाल नजर आने लगा । वह एक झटके से उठकर खङा हो गया । उसने नितिन का गिरहबान पकङ लिया ।
और दांत पीसता हुआ बोला - हरामजादे । क्या बोला तू ? अतृप्त ।

कामवासना 6

नितिन के मानों छक्के ही छूट गये । उसे ऐसी कतई उम्मीद ही न थी । वह एकदम हङबङा कर रह गया । मनोज ने तमंचा निकाला । और उसकी तरफ़ तानता हुआ बोला - मैं तुझे बुलाने गया था कि सुन मेरी बात ? फ़िर तूने मेरी भाभी को अतृप्त कैसे बोला । प्यासी । प्यासी औरत । वासना की भूखी ? हरामजादे ! मैं तेरा खून कर दूँगा ।
वह चाहता । तो एक भरपूर मुक्के में ही इस नशेङी को धराशायी कर देता । उसकी सब दादागीरी निकाल देता । पर इसके ठीक उलट उसने अपना कालर छुङाने की कोशिश भी नहीं की । मनोज कुछ देर उसे खूँखार नजरों से देखता रहा ।
फ़िर बोला - बता कौन ऐसा है । जो अतृप्त नहीं है । तू मुझे सेक्स से तृप्त हुआ एक भी आदमी औरत बता । तू मुझे धन से तृप्त हुआ एक भी आदमी औरत बता । तू मुझे सभी इच्छाओं से त्रुप्त हुआ एक भी बन्दा बता । फ़िर तू ही कौन सा तृप्त है ? कौन सी प्यास तुझे यहाँ मेरे पास रोके हुये है । साले मैंने कोई तुझसे मिन्नते की क्या ? बोल बोल ? अब बोल । अतृप्त ।
- मनोज ! यदि तुम ऐसा सोचते हो । पदमा अपनी हिरनी जैसी बङी बङी काली आँखों से उसकी आँखों में झांक कर बोली - कि मैं तुम्हारे भाई से तृप्त नहीं होती । तो तुम गलत सोचते हो । दरअसल वहाँ त्रुप्त अतृप्त का प्रश्न ही नहीं है । वहाँ सिर्फ़ रुटीन है । पति को यदि पत्नी शरीर की भूख है । तो पत्नी उसका सिर्फ़ भोजन है । वह जब चाहते हैं । मुझे नंगा कर देते हैं । और जो जैसा चाहते हैं । करते हैं । मैं एक खरीदी हुयी वैश्या की तरह मोल चुकाये पुरुष की इच्छानुसार आङी तिरछी होती रहती हूँ ।
तुम यकीन करो । उन्हें मेरे अपूर्व सौन्दर्य में कोई रस नहीं । मेरे अप्सरा बदन में उन्हें कोई खासियत कभी नजर ही नहीं आती । उनके लिये मैं सिर्फ़ एक शरीर मात्र हूँ । घर की मुर्गी । जो किसी खरीदी गयी वस्तु की तरह उनके लिये मौजूद रहता है । अगर समझ सको । तो मेरे जगह साधारण शक्ल सूरत वाली । साधारण देहयष्टि वाली औरत भी उस समय हो । तो भी उन्हें बस उतना ही ? मतलब है । उन्हें इस बात से फ़र्क नहीं । वह सुन्दर है । या फ़िर कुरूप । उस समय बस एक स्त्री शरीर । यही हर पति की जरूरत भर है । और मैं उनकी भी गलती नहीं मानती । उनके काम व्यवहार के समय मैं खुद रोमांचित होने की कोशिश करूँ । तो मेरे अन्दर कोई तरंगे ही नहीं उठती । जबकि हमारी शादी को अभी सिर्फ़ चार साल ही हुये हैं ।
- एक सिगरेट .सिगरेट । मनोज नदी की तरफ़ देखता हुआ बोला - दे सकते हो ।
खामोश से खङे उस बूढे पीपल के पत्ते रहस्यमय ढंग से सरसरा रहे थे । काली छाया औरत जाने किस उद्देश्य से शान्त बैठी थी । और रह रह कर बीच बीच में शमशान के उस आयताकार काले स्थान को देख लेती थी । जहाँ आदमी जिन्दगी के सारे झंझटों को त्याग कर एक शान्ति की मीठी गहरी नींद में सोने के लिये हमेशा को लेट जाता था ।
- तुमने कभी सोचा मनोज ! पदमा जैसे बैठे बैठे हुये थक कर उसके पास ही लेटती हुयी बोली - एक सुन्दर जवान

औरत कितनी आकर्षक लगती है । रंग बिरंगे लचकते मचकते फ़ूलों की डाली जैसी । तुम ध्यान दो । तो औरत के हर अंग से रस टपकता है । वह रस से लबालब भरी रसभरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस । जंघाओं में रस । नाभि में रस । नितम्बों में रस । अदाओं में रस । वाणी में रस । चितवन में रस । सर्वांग रस ही रस । सोचो । कोई एक स्थान बता सकते हो । जहाँ रस ना हो ? पूर्ण रसमय औरत । प्रकृति का मधुर संगीत औरत । देव की अनूठी कलाकृति । और वो राजीव कहता था - माया । नारी साक्षात माया । बताओ । मुझ में अखिर माया वाली क्या बात है ?
- सुनो बङे भाई ! मनोज उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला - मैंने अब तक जो भी कहा । उसमें तुम ऐसा एक भी शब्द बता सकते हो । जो झूठा हो । असत्य हो । जिसकी बुनियाद न हो । इसीलिये मैं कहता हूँ । ये दुनियाँ साली एक पाखण्ड है । एक झूठ रूपी बदबू मारते कूङे का ढेर । ये जिस जीने को जीना कहती है । वह जीना जीना नहीं । एक गटर लाइफ़ है । जिसमें बिजबिजाते कीङे भी अपने को श्रेष्ठ ही समझते हैं ।
जैसे ठीक उलटा हो रहा था । खरबूजा छुरी को काटने पर आमादा था । वह उसका इलाज करना चाहता था । यह लङका खुद उसका इलाज किये दे रहा था । उसकी सोच झटका सा खाने लगी थी । उसकी विचार धारा ही चेंज हो जाना चाहती थी । और आज जिन्दगी में वह कितना वेवश खुद को महसूस कर रहा था । वह इस कहानी को बीच में अधूरा भी नहीं छोङ सकता था । और पूरी कब होगी । उसे कोई पता न था । होगी भी या न होगी । ये भी नहीं पता । उसकी कोई भाभी है । नहीं है । कहाँ है ? कैसी है । कुछ पता नहीं । देखना नसीब होगा । नहीं होगा । आगे क्या होगा । कुछ भी पता नहीं । क्या कमाल का लेखक था इसका । कहानी न पढते बनती । न छोङते बनती । बस सिर्फ़ जो आगे हो । उसको जानते जाओ ।
- लेकिन तुम औरत को कभी नहीं जान सकते मनोज । पदमा उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाती हुयी बोली - जब तक कि वह खुद न चाहे कि तुम उसे जानो । और कितना जानो । किसी औरत को ऐसा नंगा करना असंभव है । उसके पति के लिये भी । वह जिसको पूर्ण समर्पित होती है । बस उसी के लिये नंगी होती है । दूसरा उसे कोई कभी नंगी कर ही नहीं सकता ।
उसने उसका हाथ सहलाते सहलाते हुये अपने लगभग अर्धनग्न स्तन पर सटा लिया । और घुटना उठाकर मोङा ।

उसकी सिल्की मैक्सी घुटने से नीचे सरक गयी । बस फ़िर वह मुर्दा सी होकर रह गयी ।
उसकी हथेली से सटे उस दूधिया गोरे पुष्ट स्तन से निकलती ऊर्जा तरंगे मनोज के जिस्म में एक नयी अनुभूति का संचार करने लगी । वह अनुभूति जिसकी उसने आज तक कल्पना भी नहीं की थी । मात्र एक निष्क्रिय रखा हाथ स्त्री उरोज के सिर्फ़ स्पर्श से ऐसी सुखानुभूति करा सकता है । शायद बिना अनुभव के वह कभी सोच तक नहीं पाता ।
- भूल जाओ ।.. भूल जाओ । अपने आपको । उसे आँख बन्द किये पदमा की बेहद मादक बुदबुदाती सी धीमी आवाज सुनाई दी - भूल जाओ कि तुम क्या हो । भूल जाओ कि मैं क्या हूँ । जो स्वयं होता है । होने दो । उसे रोकना मत ।
एक विधुत प्रवाह सा निरन्तर उसके शरीर में दौङता जा रहा था । उस पदमिनी के अस्फ़ुट शब्दों में एक जादू सा समाया था । वह वास्तव में ही खुद को भूलने लगा । उसे भाभी भी नजर नहीं आ रही थी । पदमा भी नजर नही आ रही थी । पदमिनी नायिका भी नहीं । कोई औरत भी नहीं । बस एक प्राकृतिक मादक सा संगीत उसे कहीं दूर से आता सा प्रतीत हो रहा था - प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
स्वतः ही उसके हाथ उंगलियाँ शरीर सब कुछ हलचल में आ गये । उसके हाथों ने मैक्सी को वक्ष से हटा दिया । और आहिस्ता आहिस्ता वह उन साजों पर सुर ताल की सरगम सी छेङने लगा ।
- आऽऽह ..आऽऽ  ! उस जीते जागते मय खाने बदन से उस अंगूरी के मादक स्वर उठे -  आऽऽई ..प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
- सोचो बङे भाई । वह ऊपर पीपल को देखता हुआ बोला - इसमें क्या गलत था ? कोई जबरदस्ती नहीं । यदि अच्छा न लग रहा हो । तो कहानी पढना सुनना बन्द कर सकते हो । पढना मैंने इसलिये कहा । क्योंकि ये कहानी तुम्हारे अन्दर उतरती जा रही है । इसलिये तुम मेरे बोले को लिखे की तरह सुनने द्वारा पढ ही तो रहे हो ।
- छोङो मुझे । अचानक पदमा उसे चौंकाती हुयी सी झटके से उठी । उसने जबरदस्ती उसका हाथ अपने स्तनों से हटाया । और मैक्सी के बन्द सही से लगाती हुयी बोली - ये सब गलत है । मैं तुम्हारी भाभी हूँ । ये अनैतिक है । पाप है । हमें नरक होगा ।
नितिन भौंचक्का रह गया । अजीव औरत थी । ये लङका पागल होने से कैसे बचा रहा ? जबकि वह सुनकर ही पागल सा हो रहा था । वास्तव में वह सही कह रहा था - कोई जबरदस्ती नहीं । यदि अच्छा न लग रहा हो । तो कहानी पढना सुनना बन्द कर सकते हो । और उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि कहानी अच्छी है । या बुरी । वह सुने । या ना सुने ।
- चौंको मत राजा ! वह अपने कजरारे नयनों से उसे देख कर बोली - अब ये मैं हूँ । तुम्हारी भाभी । पदमिनी पदमा । फ़िर वह कौन थी ? जो मादक आंहे भर रही थी । और सोचो मेरे दिलवर । ये तुम हो । लेकिन मेरे यौवन फ़लों का रस लेने वाला वह कौन था ? दरअसल ये सब हो रहा है । जो अभी हुआ । वो खुद हुआ ना । ना मैंने किया । ना तुमने किया । खुद हुआ ना । बोलो हुआ कि नहीं ?
लेकिन अब हमारे सामाजिक नैतिक बोध फ़िर से जागृत हो उठे । सिर्फ़ इतनी ही बात के लिये मुझे घोर नरक होगा । तुम्हें भी होगा । फ़िर वहाँ हम दोनों को तप्त जलती विपरीत लिंगी मूर्तियों से सैकङों साल लिपटाया जायेगा । क्योंकि मैंने पर पुरुष का सेवन किया है । और तुमने माँ समान भाभी का । और ये धार्मिक कानून के तहत घोर अपराध है । लेकिन मैं तुमसे पूछती हूँ । जब तुम मेरे स्तनों को मसल रहे थे । और मैं आनन्द में डूबी सिसकियाँ भर रही थी । तब क्या वहाँ कोई पदमा मौजूद थी । या कोई भाभी थी । तब क्या वहाँ कोई मनोज

मौजूद था । या कोई देवर था । वहाँ थे सिर्फ़ एक स्त्री । और एक पुरुष । एक दूसरे में समा जाने को आतुर । प्यासे.. प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त । फ़िर हमें सजा किस बात की ? हमें नरक क्यों ?
उसे बहुत बुरा लग रहा था । ये अचानक उस बेरहम औरत ने क्या कर दिया । वह बेखुद सा मस्ती की रसधार में बहा जा रहा था । वह सोचने लगा था कि वो उसको पूर्ण समर्पित है । पर यकायक ही उसने कैसा तिलिस्मी रंग बदला था ।
- बोलो । जबाब दो मुझे । मनोज तुम जबाब दो मुझे । वह उसकी आँखों में आँखें डालकर बोली - अब कैसा लग रहा है तुम्हें ? मैंने तो तुम्हें कुछ दिया ही । तुम्हारा कूछ लिया क्या । फ़िर क्यों बैचेन हो । क्यों ऐसा लग रहा है । तुमसे यकायक कुछ छीन लिया गया । तुम्हारी चाह भटक कर रह गयी । तृप्त नहीं हुयी । क्यों अपने को अतृप्त महसूस कर रहे हो ?
- बोलो बङे भाई । मनोज बोला - है कोई जबाब ? उसने एक करारा तमाचा सा मारा था । इस दुनियाँ के कानून को । ये कानून जो मचलते जवान अरमानों का सिर्फ़ गला घोंटना ही जानता है ।
उसे एक तेज झटका सा लगा । कमाल की कहानी है । जो नियम अनुसार पूरी गलत है । पर सच्चाई के धरातल

पर पूरी सही । क्या कहता वह । ये लङका और उसकी अनदेखी अपरचित नायिका भाभी मानों उसकी पूरी फ़िलासफ़ी ही बदल देना चाहते थे ।
उसे परम्परागत धारणा से उपजे अपने ही तर्क में कोई दम नजर न आया । फ़िर भी वह जिद भरे खोखले स्वर में बोला - किसी भी बात को अपने भाव अनुसार अच्छे बुरे में बदला जा सकता है । जन्मदायी माँ को । बाप की लुगाई । पिता की जोरू भी कह सकते हैं । और आदरणीय माँ भी कह सकते हैं । माँ तूने मुझे जन्म दिया । ऐसा भी कह सकते है । और तेरे और पिता की वासनामयी भूख का परिणाम हूँ मैं । ऐसा भी कह सकते हैं । ये सब अपनी अपनी जगह ठोस सत्य हैं । पर तुम कौन सा सत्य पसन्द करोगे ? एक ही बात स्थिति से बने भाव अनुसार मधुर और तल्ख दोनों हो सकती है ।
- हुँऽऽ ! मनोज ने एक गहरी सांस ली । और वह गम्भीर होकर विचार मग्न सा हो गया । उसने एक गहरा कश लगाया । और ढेर सा धुँआ बाहर निकाला ।

कामवासना 7

सुबह 6 बजे से कुछ पहले ही पदमा उठी । अनुराग अभी भी सोया पङा था । मनोज हमेशा की तरह खुली छत पर निकल गया था । और कच्छा पहने कसरत कर रहा था । नित्य निवृत होकर उसने अपने हर समय ही खिले खिले मुँह पर अंजुली से पानी के छींटे मारे । तो वे खूबसूरत गुलाव पर ओस की बूँदों से बने मोतियों के समान चमक उठे । वह अभी भी रात वाला झिंगोला ही पहने थी । जो स्तनों के पास से अधखुला था । उसने चाय तैयार की । और कमरे में अनुराग के पास आ गयी । पर उसकी सुबह अभी भी नहीं हुयी थी ।
उसकी सुबह शायद कभी होती ही न थी । एक भरपूर मीठी लम्बी नींद के बाद उत्पन्न स्वतः ऊर्जा और नव स्फ़ूर्ति का उसमें अभाव सा ही था । वह थका हुआ इंसान था । जो गधे घोङे की तरह जिन्दगी का बोझा ढो रहा था । वे दोनों एक ही बिस्तर पर पास पास लेटते थे । पर इस पास होने से शायद दूर होना बहुत अच्छा था । तब दिल को सबर तो हो सकता था ।
कल रात वह बेकल हो रही थी । घङी टिक टिक करती हुयी ग्यारह अंक को स्पर्श करने वाली थी । ग्यारह । यानी एक और एक । एक पदमा । एक अनुराग । पर क्या इसमें कोई अनुराग था ? वह एक उमगती स्त्री । और वह एक अलसाया बुझा बुझा पुरुष । वह हल्का हल्का सा नींद में था । घङी की छोटी सुई 54 बिन्दु पर थी । बङी सुई 45 बिन्दु पर थी । सेकेण्ड की सुई बैचेन सी चक्कर लगा रही थी ।
हर सेकेण्ड के साथ उसकी भी बैचेनी बढती जा रही थी । उसने अपनी ढीली ढाली मैक्सी को ऊपर से खोल लिया ।  और उससे सटती हुयी उसके सीने पर हाथ फ़ेरने लगी ।
- शऽऽ शीऽऽ ऐऽ..सुनो । वह फ़ुसफ़ुसाई । उसने हूँ हाँ करते हुये करवट बदला । और पलट कर सो गया - बहुत थका हूँ.. पद..मा । सोने.. दे ।
वह तङप कर रह गयी । उसने उदास नजर से घङी को देखा । छोटी सुई हल्का सा और सरक गयी थी । बङी सुई उसके ऊपर छाने लगी थी । फ़िर बङी सुई ने छोटी को कसकर दबा लिया । और छोटी सुई मिट सी गयी । सेकेण्ड की सुई खुशी से गोल गोल घूमने लगी । टिक टिक .. प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
कितना मधुरता आनन्द से भरा जीवन है । बारह घण्टे में बारह बार मधुर मिलन । टिक टिक .. प्यास .. प्यास .. त्रुप्त..त्रुप्त..अतृप्त ..अतृप्त
- अब उठो ना । वह उसे झिंझोङती हुयी पूर्ण मधुरता से बोली - जागो मोहन प्यारे । कब तुम्हारी सुबह होगी ? कब तुम जागोगे । देखो । चिङियाँ चहकने लगी हैं । कलियाँ खिलने लगी हैं ।
वह हङबङाकर उठ गया । उसकी आँखों के सामने सौन्दर्य की साक्षात देवी थी । उसकी बङी बङी काली आँखें अनोखी आभा से चमक रही थी । उसके अधखुले उरोज किन्हीं पक्षियों के समान घोसलों से झांक रहे थे । पतली पतली काली लटें उसके सुन्दर चेहरे को चूम रही थी । खन खन बजती उसकी चूङियाँ संगीत के सुर छेङ रही थी । उसके पतले पतले सुर्ख रसीले होठों में एक प्यास सी मचल रही थी ।
- इस तरह.. क्या देख रहे हो ?  वह फ़ुसफ़ुसा कर उसको चाय देती हुयी बोली - मैं पदमा हूँ ।.. तुम्हारी बीबी ।
वह जैसे मोहिनी सम्मोहन से बाहर आया । और उसके स्तनों पर हाथ फ़ेरता हुआ बोला - सारी यार ! बङा थक 


जाता हूँ । कभी कभी..मैं महसूस करता हूँ । तुम्हें समय नहीं दे पाता ।
- मैं.. जानती.. हूँ । वह घुंघरुओं की झंकार जैसे मधुर स्वर में बोली - लेकिन मुझे शिकायत नहीं । बाद में ..ऐसा हो ही जाता है ।..सभी पुरुष..ऐसा ही तो करते हैं ।..फ़िर उसको सोचना कैसा ? है ना ।
- बङे भाई ! मनोज उसको सपाट नजरों से देखता हुआ बोला - उस दिन मैंने हारा हुआ पुरुष देखा । मैं नीचे उतर आया था । मेरा भाई पराजित योद्धा । हारे हुये जुआरी के समान । लज्जित सा नजरें झुकाये । उसके सौन्दर्य की चमक से चकाचौंध हो रहा था । पत्नी की जगमग जगमग आभा के समक्ष । आभाहीन पति । जबकि वह बिना किसी शिकायत के । बिना किसी व्यंग्य के । पूर्ण प्रेम भाव से ही उसे देख रही थी । उसे । जो उसका पति था । स्वामी । पतिदेव ।
- बोलो । अचानक वह जोर से चिल्लाया - इसमें क्या माया थी ? फ़िर कोई राजीव । कोई साधु । कोई धर्म शास्त्र । इस देवी समान गुण युक्त स्त्री को माया क्यों कहते हैं ? बोलो । जबाब दो । या देवी सर्वभूते । नमस्तुभ्ये । नमस्तुभ्ये । नमस्तुभ्य ।
- फ़िर क्या हुआ ? अचानक हैरतअंगेज ढंग से नितिन के मुँह से स्वतः निकल गया । इतना कि अपनी उत्सुकता पर उसे स्वयं आश्चर्य हुआ ।
मनोज ने एक नजर आसमान पर चमकते तारों पर डाली । आसमान में भी जैसे उदासी सी फ़ैली हुयी थी ।
अनुराग आफ़िस चला गया था । पदमा रसोई का सारा काम निबटा चुकी थी । ग्यारह बजने वाले थे । लेकिन रोज की भांति आज वह बाथरूम में नहीं गयी थी । बल्कि उसने एक पुरानी सी झीनी मैक्सी पहन ली थी । और हाथ में डण्डा लगा बङा सा झाङू उठाये दीवालों परदों आदि को साफ़ कर रही थी ।
- नितिन जी ! मैंने एक अजीव सी कहानी सुनी है । वह फ़िर बोला - पता नहीं क्यों । मुझे तो वह बङा अजीव सी ही लगती है । एक आदमी ने एक शेर का बच्चा पाल लिया । लेकिन वह उसे कभी माँस नहीं खिलाता था । खून का नमकीन नमकीन स्वाद उसके मुँह को न लगा था । वह सादा रोटी दूध ही खाता था । फ़िर एक दिन शेर को अपने ही पैर में चोट लग गयी । और उसने घाव से बहते खून को चाटा । खून । नमकीन खून । उसका स्वाद । अदभुत स्वाद । उसके अन्दर का असली शेर जाग उठा । शेर के मुँह को खून लग गया । उसने एक शेर दहाङ मारी और...।
पदमा बङी तल्लीनता से धूल को झाङ रही थी । वह झाङू को रगङती । फ़ट फ़ट करती । और धूल उङने लगती । कितनी कुशल गृहणी थी वो । वह उस दिन का नमकीन स्वाद भूला न था । उसके सीने की  गर्माहट अभी भी

उसके शरीर में रह रह कर दौङ जाती थी । वह उन अनमोल रतनों को देखने के लिये फ़िर से प्यासा होने लगा था । पर वह उसकी तरफ़ पीठ किये थी । उसके लहराते लम्बे रेशमी बाल उसके विशाल नितम्बों को स्पर्श कर रहे थे ।
तुमने कभी सोचा मनोज ! पदमा की मधुर झंकार जैसी आवाज फ़िर से उसके कानों में गूँजी  - एक सुन्दर जवान औरत कितनी आकर्षक लगती है । रंग बिरंगे लचकते मचकते फ़ूलों की डाली जैसी । तुम ध्यान दो । तो औरत के हर अंग से रस टपकता है । वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस । जंघाओं में रस । नाभि में रस । नितम्बों में रस ।
कितना सच कहा था उसने । इस छ्लकते रस को उसने जाना ही न था । वह चित्रलिखित सा खङा रह गया । एक आवरण रहित सुन्दरता की मूर्ति । जैसे उस नाम मात्र मैक्सी के झीने पर्दे के पार थी । और तबसे बराबर उसकी उपेक्षा सी कर रही थी । उसे अनदेखा कर रही थी । वह चाह रहा था । वह फ़िर से स्नान करे । फ़िर से उसे अंगों की झलक दिखाये । फ़िर से उसकी आँखों में आँखे डाले । पर वह तो जैसे यह सब जानती ही न थी । बारबार पारदर्शी परदे की तरह हिलती ऊपर नीचे होती मैक्सी । और उसके पार खङी वो वीनस । सुन्दरता की मूरत ।
उससे ये उपेक्षा सहन नहीं हो रही थी । उसके कदम खुद ब खुद उसके पास बढते गये । वह धीरे धीरे उसके पास पहुँच गया । और लगभग सट कर खङा हो गया । उसके नथुनों से निकलती गर्म भाप पदमा की गर्दन को छूने लगी ।
- क्या हुआऽऽ । वह लगभग फ़ुसफ़ुसाई । और बिना मुङे ही रुक रुक कर बोली - क्या बात है । तुम बैचेन हो क्या । तुम्हारी कठोरता का स्पर्श.. मुझे पीछे हो रहा है । ..पूर्ण पुरुष । तुम स्त्री को आनन्दित करने वाले हो ।
- ह हाँ । उसका गला सा सूखने लगा - समझ नहीं आता । कैसा लग रहा है । शरीर में अज्ञात धारायें सी दौङ रही है । ये खुद आ तुमसे आलिंगित हुआ है..कामिनी ।
- भूल जाओ ।.. भूल जाओ ।.. अपने आपको । वह बेहद कामुक झंकृत स्वर में बोली - भूल जाओ कि तुम क्या हो । भूल जाओ कि मैं क्या हूँ । जो स्वयं होता है । होने दो । उसे रोकना मत ।
स्वयं । स्वयं उसके हाथ पदमा के इर्द गिर्द लिपट गये । वह अपने शरीर में एक तूफ़ान सा उठता हुआ महसूस कर रहा था । उसे कोई सुध बुध न रही थी । बस तेजी से चलती सांसे ही वह सुन समझ पा रहा था । उसके हाथ स्वयं पदमा की नाभि से नीचे फ़िसलने लगे । एक मखमली दूब के रेशमी मुलायम अहसास से झंकृत होता हुआ वह बारबार जैसे ढलान पर फ़िसलने लगा ।
- आऽऽह ..आऽऽ  ! उसकी खनकती आवाज में जैसे काम गीत बजा -  आऽऽई ..प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।..रुको.. मत..आऽऽ ।
- औरत के हर अंग से रस टपकता है । भूतकाल के शब्द फ़िर उसके दिमाग में गूँजे - वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस ।
उसके हाथ मैक्सी के बन्द पर गये । और मैक्सी कन्धों से नीचे सरक गयी । झीने परदे के पार खङी वीनस

साक्षात हो उठी । उसमें एक अजीव सी हिंसकता स्वतः जाग उठी । शेर के मुँह को खून लग गया । उसके हाथ उसके कम्पित स्तनों पर कस गये । एक ताकतवर बलिष्ट शेर । और उसके खूँखार पंजो में तङपती नाजुक बदन हिरनी । आऽऽ..मा.. प्यास .. प्यास .. त्रुप्त..त्रुप्त..अतृप्त । पदमा का वक्ष तेजी से ऊपर नीचे हो रहा था । वह प्यासी नागिन की भांति कसकर उससे  चिपक गयी ।
- क्यों पढ रहे हो ? ये घटिया वल्गर चीप अश्लील पोर्न सेक्सी कामुक सस्ती सी वाहियात कहानी । वह सीधे उसकी आँखों में भाव हीनता से देखता हुआ बोला - यही शब्द देते हो ना तुम । ऐसे वर्णन को । पाखण्डी पुरुष । तुम भी तो उसी समाज का हिस्सा हो । जहाँ इसे घटिया अनैतिक वर्जित प्रतिबंधित हेय मानते हैं । फ़िर क्या रस आ रहा है । तुम्हें इस कहानी में ।..गौर से सोचो । तुम उसी ईडियट सोसाइटी का अटूट हिस्सा हो । उसी मूर्ख दोगले समाज का अंग हो । जहाँ दिमाग में तो यही सब भरा है । हर छोटे बङे  सभी की चाहत यही है । पर बातें उच्च सिद्धांतों आदर्श और नैतिकता की है ।

बङे भाई ! किसी मेमोरी चिप की तरह यदि ब्रेन चिप को भी पढा जा सकता । तो हर पुरुष नंगा हो जाता । और हर स्त्री नंगी । हर स्त्री की चिप में नंगे पुरुषों की फ़ाइलें ओपन होती । और हर पुरु्ष की चिप में खुलती - बस नंगी औरत । प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।
वह हैरान रह गया । उसकी इस मानसिकता को क्या शब्द दे । ब्रेन वाशिंग । या ब्रेन फ़ीडिंग । या कोई सम्मोहन । या उस कयामत स्त्री का जादू । या रूप का वशीकरण । या .या स्त्री पुरुष के रोम रोम में समायी स्त्री पुरुष की अतृप्त चाहत । या फ़िर एक महान सच । महान सच । अतृप्त ।
- म..नोज..कैसा लग ..रहा है । वह कांपती थरथराती आवाज में बोली - तुम्हे..आऽऽ..तुम मुझे मारे दे रहे हो । ऊऽऽई ओऽऽ आईऽऽ ये कैसा आनन्द है ।
- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः । उसके दिमाग में भूतकाल की पदमा आकृति उभरी । साङी का पल्लू कमर में खोंसे हुये वह नजाकत से खङी हो गयी । और बोली - इनको स्वर कहते हैं । vowel । हर बच्चे को शुरू से यही सिखाया जाता है । पढाई का पहला वास्ता इन्ही से है । पर तुम इनका असली रहस्य जानते हो ? स्वर । यानी 


आवाज । ध्वनि । काम ध्वनि । सीत्कार । अतृप्त शब्द । अतृप्त ।
नहीं समझे ।.. फ़िर से उसकी पतली पतली भौंह रेख किसी तीर का लक्ष्य साधते हुये कमान की तरह ऊपर नीचे हुयीं - एक सुन्दर इठलाती मदमदाती औरत के मुख से इन स्वर अक्षरों की संगीतमय अन्दाज में कल्पना करो । जैसे वह आनन्द में सिसकियाँ भर रही हो । अऽऽ । आऽऽ । इऽऽ । ईऽऽ । उऽऽ । ऊऽऽ । ओऽऽ । देखोऽ..वह महीन मधुर झनकार सी झन झन होती हुयी बोली - हर अक्षर को मीठे काम रस से सराबोर कर दिया गया है ना । सोचो । क्यों ?.. सेक्स । काम ।.. काम ही तो हमारे शरीर में बिजली सा दौङता रहता है । हाँ । जन्म से ही । पर हम समझ नहीं पाते । इन स्वर ध्वनियों में वही उमगता काम ही तो गूँज रहा है । काम । काम । सिर्फ़ काम । अतृप्त । अतृप्त ।
फ़िर इन्ही शब्दों के बेस पर व्यंजन रूप ध्वनि बनती है । क ख में अ और वासना वायु की गूंज है या नहीं । बस थोङा सा ध्यान से देखो । फ़िर इन काम स्वर और व्यंजन के मधुर मिलन से इस सुन्दर संसार की रचना होती है । गौर से देखो । तो ये पूरा रंगीन मोहक संसार इसी छोटी सी वर्णमाला में समाहित है ना ।
प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।

कामवासना 8

- कमाल की हैं । मनोज जी आपकी भाभी भी । नितिन हँसते हँसते मानों पागल हुआ जा रहा था - आय थिंक । किसी भाषा शास्त्री किसी महा विद्वान ने भी स्वर रहस्य को इस कोण से कभी न जाना होगा । लेकिन अब मुझे उत्सुकता है । फ़िर क्या हुआ ?
आज रात ज्यादा हो गयी थी । आसमान बिलकुल साफ़ था । और रात का शीतल शान्त प्रकाश बङी सुखद अनुभूति का अहसास करा रहा था । काली छाया औरत बूढे पीपल के तने से टिक कर शान्त खङी थी । नितिन के स्त्री रहित बृह्मचर्य शरीर मन मष्तिष्क में स्त्री तेजी से घुलती सी जा रही थी । एक दिलचस्प रोचक आकर्षक किताब की तरह । किताब । जिसे बहुत कम लोग ही सही पढ पाते हैं । किताब । जिसे बहुत कम लोग ही सही पढना जानते हैं । बहुत कम ।
- लेकिन पढना । बहुत कठिन भी नहीं । पदमा अपना हाथ उसके शरीर पर घुमाती हुयी बोली - एक स्वस्थ दिमाग स्वस्थ अंगों वाली खूबसूरत औरत खुली किताब जैसी ही होती है । एक नाजुक और पन्ना पन्ना रंग बिरंगी अल्पना कल्पना से सजी सुन्दर सजीली किताब । जिसके हर पेज पर उसके  सौन्दर्य की कविता लिखी है । बस पढना होगा । फ़िर पढो ।
पर उसकी हालत बङी ही अजीव सी थी । वह इस  नैसर्गिक संगीत का सा रे गा मा भी न जानता था । उसे तो बस ऐसा लग रहा था । जैसे एकदम अनाङी इंसान को उङते घोङे पर सवार करा दिया हो । लगाम कब खींचनी है । कहाँ खींचनी है । घोङा कहाँ मोङना है । कहाँ सीधा करना है । कहाँ उतारना है । कैसे चढाना है । उसे कुछ भी तो न पता था । कुछ भी ।
अचानक वह मादकता से चलती हुयी बिस्तर पर चढ गयी । और आँखे बन्द कर ऐसी मुर्दा पङ गयी । जैसे थकन से बेदम हो गयी हो । वह हक्का बक्का सा इस तरह उसके पास खिंचता चला गया । जैसे घोङे की लगाम उसी के हाथ हो ।
- भूल जाओ ।.. भूल जाओ ।.. अपने आपको । वह जैसे बेहोशी में बुदबुदाई - भूल जाओ कि तुम क्या हो । भूल जाओ कि मैं क्या हूँ । जो स्वयं होता है । होने दो । उसे रोकना मत ।
स्वयं । वह हैरान था । वह कितनी ही देर से उसके सामने आवरण रहित थी । लेकिन फ़िर भी वह उसको ठीक से देख न सका था । वह उसके अधखुले स्तनों को स्पष्ट देखता था । तब उनकी एकदम साफ़ तस्वीर उसके दिमाग

में बनती थी । वह उसके लहराते बालों को स्पष्ट देखता था । तब उसे घिरती घटायें साफ़ दिखाई देती थी । वह उसके रसीले होठों को स्पष्ट देखता था । तब सन्तरे की खट्टी मीठी मिठास उसके अन्दर स्वतः महसूस होती थी । जब वह उसको टुकङा टुकङा देखता था । तब वह पूर्णता के साथ नजर आती थी । और जब वह किताब की तरह खुद ही खुल गयी थी । तब उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । कुछ भी तो न था ।
उसने फ़िर से भूतकाल के बिखरे शब्दों को जोङने की कोशिश की - तुम ध्यान दो । तो औरत के हर अंग से रस टपकता है । वह रस से लबालब भरी रस भरी होती है । होठों में रस । गालों में रस । आँखों में रस । छातियों में रस । जंघाओं में रस । नाभि में रस । नितम्बों में रस ।
पर कहाँ था । कोई रस ।  जिनमें रस था । अब वो अंग ही न थे । कोई अंग ही न था । अंगहीन । बस हवा में फ़ङफ़ङाते खुले पन्नों की किताब । और बस वहाँ वासना की हवा ही अब बह रही थी । प्रकृति में समाई सुन्दर खिले नारी फ़ूल की मनमोहक खुशबू । जिसको वह मतवाले भंवरे के समान अपने अन्दर खींच रहा था ।
फ़िर कब वह उल्टी हुयी । कब वह सीधा हुआ । कब वह तिरछी हुयी । कब वह टेङा हुआ । कब वह उसको मसल देता । कब वह चीख उठती । कब वह उसको दबा डालता ।  कब वह कलाबाजियाँ सी पलटती । कब वह उसको काट लेता । कब वे खङे होते । कब लेट जाते । कब वह उसमें चला जाता । कब वह उसमें आ जाती । कब ? ये सब कब हुआ । कौन कह सकता है ? वहाँ इसको जानने वाला कोई था ही नहीं । थी तो बस वासना की गूँज । आऽऽह ..आऽऽ  !  आऽऽई ..प्यास .. प्यास .. अतृप्त ..अतृप्त ।..रुको.. मत..आऽऽ ।
- बङे भाई ! वह सिगरेट का कश लेता हुआ बोला - मैं अब अन्दर कहीं सन्तुष्ट था । मैं उसके काम आया था । मैं अब सन्तुष्ट था । भाई की पराजय को भाई ने दूर कर दिया था । नैतिक अनैतिक का गणित मैं भूल चुका था । खुशी बस इस बात की थी । सवाल हल हो गया था । सवाल । उलझा हुआ सवाल ।
मैंने देखा । वह अधलेटी सी नग्न ही शून्य निगाहों से दीवाल पर चिपकी छिपकली को देखे जा रही थी । जो बङी साबधानी सतर्कता से पतंगे पर घात लगाये जहरीली जीभ को लपलपा रही थी । उसकी आँखों में खौफ़नाक चमक लहरा रही थी । और उसकी आँखे अपलक थी । एकदम स्थिर । मुर्दा ।
मैं उसके पास ही बैठ गया । और बेमन से उसका स्तन टटोलता हुआ बोला - अब प्यास तो नहीं । क्यों हो कोई अतृप्त । खत्म । कहानी खत्म ।
यकायक उसके मुँह से तेज फ़ुफ़कार सी निकली । उसकी आँखें दोगुनी हो गयी । उसका चेहरा काला बाल रूखे और उलझे हो गये । उसकी समस्त पेशियाँ खिंच उठी । और वह किसी बदसूरत घिनौनी चुङैल की तरह दांत पीसने लगी ।
- मूर्ख ! वह गुर्राकर बोली - औरत कभी तृप्त नहीं होती । फ़िर तू उसकी वासना को क्या तृप्त करेगा । तू क्या कहानी खत्म करेगा ।
- बङे भाई ! वह अजीव से स्वर में बोला - मैं हैरान रह गया । वह कह रही थी ।.. कमाल की कहानी लिखी है । इस

कहानी के लेखक ने । राजीव ।.. कहानी जो उसने शुरू की । उसे कैसे कोई और खत्म कर सकता है । ये कहानी है । सौन्दर्य के तिरस्कार की । चाहत के अपमान की । प्यार के निरादर की । जजबातों पर कुठाराघात की । वह कहता है । मैं माया हूँ । स्त्री माया है । उसका सौन्दर्य मायाजाल है । और ये कहानी बस यही तो है । पर..पर मैं उसको साबित करना चाहती हूँ - मैं माया नहीं हूँ । मैं अभी यही तो साबित कर रही थी । तेरे द्वारा । पर तू फ़ेल हो गया । और तूने मुझे भी फ़ेल करवा दिया । राजीव फ़िर जीत गया । क्योंकि .. वह भयानक स्वर में बोली - क्योंकि तू..तू फ़ँस गया ना । मेरे मायाजाल में ।
अब गौर से याद कर कहानी । मैंने कहा था । मैं राजीव जी से प्यार करती थी । पर वह कहता था । स्त्री माया है । ये मैंने तुझे कहानी के शुरू में बताया । मध्य में बताया । इशारा किया । फ़िर मैंने तुझ पर जाल फ़ेंका । दाना डाला । और तुझसे अलग हट गयी । फ़िर भी तू खिंचा चला आया । और खुद जाल में फ़ँस गया । मेरा जाल । मायाजाल ।.. वह फ़ूट फ़ूट कर रो पङी - राजीव जी तुम फ़िर जीत गये । मैं फ़िर हार गयी । ये मूर्ख लङका मुझसे प्रभावित न हुआ होता । तो मैं जीत.. न गयी होती ।
नितिन हक्का बक्का रह गया । देवर भाभी की लव स्टोरी के इस द एण्ड की तो कोई कल्पना ही न हो सकती थी ।
- सोचो बङे भाई । वह उदास स्वर में बोला - मैं हार गया । इसका अफ़सोस नहीं । पर तुम भी हार गये । इसका है । मैंने कई बार कहा । क्यों पढ रहे हो । इस कामुक कथा को । फ़िर भी तुम पढते गये । पढते गये । उसने जो सबक मुझे पढाया था । वही तो मैंने तुम पर आजमाया । पर तुम हार गये । और ऐसे ही सब एक दिन हार जाते हैं । और जीवन की ये वासना कथा अति भयानकता के साथ खत्म हो जाती है ।
नितिन को तेज झटका सा लगा । वह जो कह रहा था । उसका गम्भीर दार्श भाव अब उसके सामने एकदम स्पष्ट हो गया था । वह उसे रोक सकता था । कहानी का रुख मोङ सकता था । और तब वह जीत जाता ।  और कम से कम तब मनोज उदास न होता । पर वह तो कहानी के बहाव में बह गया । ये कितना बङा सत्य था ।
मनोज की आँखों से आँसू बह रहे थे । अब जैसे उसे कुछ भी सुनाने का उत्साह न बचा था । नितिन असमंजस में उसे देखता रहा । उसने मोबायल में समय देखा । रात का एक बज चुका था । चाँद ऊपर आसमान से जैसे इन दोनों को ही देख रहा था । काली छाया भी जैसे उदास सी थी । और अब जमीन पर बैठ गयी थी ।
चलो हार जीत कुछ हुआ । इसका भाभी पुराण तो समाप्त हो गया । उसने सोचा । और बोला - ये शमशान में तंत्र दीप ..मेरा मतलब ।
- तुम्हें फ़िर गलतफ़हमी हो गयी । वह रहस्यमय आँखों से उसे देखता हुआ बीच में ही बोला - कहानी अभी खत्म नहीं हुयी । कमाल की कहानी लिखी है । इस कहानी के लेखक ने । कहानी जो उसने शुरू की । उसे कोई और कैसे खत्म कर सकता है ? जिसकी कहानी । वही इसे खत्म करेगा ।
लेकिन अबकी बार वह सतर्क था । एक बार जो किसी बात पर कोई पागल बन जाये । कोई बात नहीं । सबके साथ

ही हो जाता है । दोबारा फ़िर उसी बात पर पागल बन जाये । चलो जानते हुये भी ठोकर लग गयी । मजबूती आ गयी । यही जीवन है । लेकिन तीन बारा फ़िर उसी बात पर पागल बन जाये । उसे पागल ही कहा जायेगा । और अब वह पागल हरगिज नहीं बनना चाहता था ।
- मनसा जोगी । वह मन ही मन बोला - रक्षा करें ।
- इसीलिये मैंने कहा था ना । तुम्हें फ़िर गलतफ़हमी हो गयी । वह एक नयी सिगरेट सुलगाता हुआ बोला - कहानी अभी खत्म नहीं हुयी । बल्कि इसे यूँ कहो । कहानी अब शुरू हुयी । रात आधे से ज्यादा हो रही है । पूरा शहर सो रहा है  । और सिर्फ़ हम तीन जाग रहे हैं । तो क्या । किसी ब्लू फ़िल्म सी इस कामुक कथा का रस लेने के लिये ।
अभी वह हम तीन की बात पर चौंका ही था कि मनोज बोला - ये बूढा पीपल भी । ये पीपल भी तो हमारे साथ है ।
नितिन ने चैन की सांस ली । एक और संस्पेंस क्रियेट होते होते बचा था । लेकिन हम तीन सुनते ही उसकी निगाह सीधी उस काली छाया औरत पर गयी । जो अब भी वैसी ही शान्ति से बैठी थी । कौन थी । यह रहस्यमय अशरीरी रूह ? क्या इसका इस सबसे कोई सम्बन्ध था । या ये महज उनके यहाँ क्यों ? होने की उत्सुकता वश ही थी । कुछ 


भी हो । एक अशरीरी छाया को उसने पहली बार बहुत निकट से देर तक देखा था । और देखे जा रहा था ।
लेकिन कितना वेवश भी था वो । अगर मनोज वहाँ न होता । तो वह उससे बात करने की कोई कोशिश करता । एक वायु शरीर से पहली बार सम्पर्क का अनुभव करता । जो कि इस लङके और उसकी ऊँट पटांग कहानी के चलते न हो पा रहा था । एक मामूली जिज्ञासा से बढ गयी कहानी कितनी नाटकीय हो चली थी । समझना कठिन हो रहा था । और कभी कभी तो उसे लग रहा था कि वास्तव में कोई कहानी है ही नहीं । ये लङका मनोज सिर्फ़ चरस के नशे का आदी भर है ।
- नितिन जी ! अचानक वह सामान्य स्वर में बोला - अगर आप सोच रहे हैं कि मैं आपको उलझाना चाहता हूँ । और मुझे इसमें कोई मजा आता है । या मैं कोई नशा वशा करता हूँ । तो सारी । आप फ़िर गलत है । तब आपने मेरे शब्दों पर ध्यान नहीं दिया -  और उसी के लिये मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस तरह के शब्दों का प्रयोग करूँ । जो अपनी बात ठीक उसी तरह से कह सकूँ । जैसे वह होती है । पर मैं कह ही नहीं पाता । ..हाँ । यही सच है । अचानक ही सामान्य या खास शब्द अपने आप मेरे मुँह से निकलते हैं । यदि मैं इन्हें कहना चाहूँ । तो नहीं कह सकता ।
बन्द गली । बन्द घर । जमीन के नीचे । अंधेरा बन्द कमरा ।
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