शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

प्रेतकन्या. 1

ये बात लगभग बीस साल पुरानी होगी । संजय मेरा दोस्त था । हम दोनों एक ही कालेज में थे । पर मैं उससे एक क्लास आगे था । इसके बाबजूद मेरी उससे मित्रता थी । संजय और उसका परिवार किसी अन्य प्रदेश से थे । और नौकरी की वजह से उत्तर प्रदेश में रहने के लिये आ गये थे । जाने क्या वजह थी । संजय मुझे बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिया था । शायद इसकी एक वजह ये भी हो सकती थी कि मैं स्वयं कालेज के बाद अपने शोध हेतु वन क्षेत्र के एक निर्जन और गुप्त स्थान पर चला जाता था । और प्रायः घर और शहर में कम ही रहता था ।
लेकिन उस दिन जब मैं बाजार में था । मुझे संजय की मम्मी रजनी आंटी की आवाज सुनायी दी - हेय प्रसून ! क्या ये तुम हो..जरा सुनो ।
मैंने स्कूटर रोक दिया । रजनी आंटी मेरे करीब आ गयी । वे बेहद उदास नजर आ रही थी ।
- संजय कैसा है । और आजकल दिखायी नहीं देता ?  मैंने आंटी से पूछा ।
- मैंने उसी के बारे में बात करने के लिये तुझे रोका है । तुमने एक बार बताया था कि तुम वनखन्डी गुफ़ा में रहने वाले बाबा से परिचित हो । और अक्सर वहाँ आते जाते भी रहते हो । प्लीज प्रसून ! मैं बाबाजी से मिलना चाहती हूँ । तुम्हारे दोस्त की खातिर । अपने बेटे की खातिर ।
मामला सीरियस था । आंटी डरी हुयी सी प्रतीत होती थी । मुझे आश्चर्य था कि आज वे बाबाजी के बारे पूछ रही थी । और कभी इस पूरे परिवार ने मेरी हंसी इस बात को लेकर बनायी थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?
आंटी ने मुझे भीङ से हटकर एक तरफ़ आने का इशारा किया । और एकान्त में आते ही बोली - प्रसून ! तीन महीने से संजय कुछ अजीब......मेरे बेटे को किसी तरह उससे बचा लो ?
मामला वाकई गम्भीर था । मैंने पूछा - संजय अक्सर कहाँ मिलता है ?
इत्तफ़ाकन वो जगह मेरे प्रतिदिन के आवागमन मार्ग के बीच में ही थी । पर ये बात अलग थी कि संजय जहाँ जाता था । वो उस रास्ते से आधा किलोमीटर हटकर थी ।
मैं तुरन्त स्कूटर से उसी टायम संजय के पास पहुँचा । वो आराम से मुझे एक आम के पेङ के नीचे बैठा नजर आया । और अपलक सामने बहती नदी की धारा को देख रहा था । मैं यह देखकर चौंक गया कि कुछ ही दिनों में उसका हष्टपुष्ट शरीर हड्डियों का ढांचा सा रह गया था ।
उसने स्कूटर की आवाज सुनकर एक बार मुझे देखा । और फ़िर उसी तरह नदी की धारा को देखने लगा । जैसे मुझे पहचानता भी न हो । पर अबकी बार मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । मैंने स्कूटर स्टेंड पर खङा करके एक सिगरेट सुलगाई । और लगभग टहलता हुआ संजय के पास पहुँचा ।
- हाय संजय ! हाउ आर यू ।  मैंने मुस्कराते हुये कहा ।
- तुम यहाँ क्यों आये हो ।  वह नफ़रत से बोला - मैं पहले ही काफ़ी परेशान हूँ ।
- आई नो डियर..आइ नो । मैंने उसकी निगाह का अनुसरण करते हुये कहा - शीरीं आयी नहीं क्या.. अभी तक.?
- हेय..व्हाट आर यू सेयिंग ? वह चिढकर बोला - तुम सब मेरे दुश्मन हो ।..माय मदर..फ़ादर..।
- सब जानता हूँ बेटा । मैंने मन ही मन कहा ।
मैंने मन ही मन बाबा को याद किया । और झन्नाटेदार चाँटा उसके गाल पर मारा । वह लगभग लङखङाता हुआ सा जमीन पर गिरने को हुआ । मैंने उसे संभाल कर पेङ के सहारे से बैठाया । और वापस आकर स्कूटर का हार्न बजाया ।
उस सुनसान स्थान पर वो हार्न एक डरावनी आवाज की तरह दूर तक गूँज गया । कुछ ही क्षणों में दूर एक पेङ की ओट में छिपी रजनी आंटी मुझे अपनी तरफ़ आती नजर आयी । मैं इतमीनान से सिगरेट के कश लगाने लगा ।
- हमें अभी इसे लेकर बाबाजी की गुफ़ा पर जाना होगा ।  मैंने आंटी की तरफ़ देखते हुये कहा - अफ़सोस आपको ये सब मुझे पहले ही बताना था ।
आंटी ने लगभग सुबकते हुये दूसरी तरफ़ देखा । मैंने सहारा देकर संजय को स्कूटर पर बैठाया । और आंटी से कहा कि वह पीछे बैठकर संजय को सहारा देती रहें । वह इस वक्त अपने होश में नहीं हैं ।
मैंने स्कूटर दौङा दिया । निर्जन वन का वह क्षेत्र आम आदमी को डराबने अहसासों से रूबरू कराता था । पर मेरे लिये तो वह रोज की परिचित जगह थी । मैं महसूस कर रहा था कि रजनी आंटी भयभीत हो रहीं हैं । और संजय तो अपने होश में ही नहीं था ।
आधा घंटे के सफ़र के बाद हम वनखन्डी गुफ़ा के सामने पहुँच गये । मेरे लिये बेहद परिचित वह स्थान किसी भी आदमी के रोंगटे खङे करने के लिये काफ़ी था । वातावरण अजीव अजीव बेहद धीमी आवाजों के साथ डराबना संगीत सा सुना रहा था । दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था ।
- प्रसून !  मुझे आंटी की भयभीत आवाज सुनायी दी ।
- डरो मत ।  मैंने उनकी तरफ़ बिना देखे ही कहा । और गुफ़ा के दरबाजे पर प्रवेश आग्या हेतु सम्बोधन सूचक बोला - अलख बाबा अलख ।
- तेरा कल्याण हो..। अन्दर से बाबा की रहस्यमय आवाज आयी - इस औरत को बोल । डरे नहीं । इसका
पुत्र ठीक होगा ।
बिना कुछ बताये बाबा रजनी आंटी के बारे में बोल रहे हैं । इसकी उन पर क्या प्रतिक्रिया हुयी । ये देखे बिना मैंने संजय को सहारा दिया । और अन्दर गुफ़ा में आंटी के साथ प्रवेश किया । आंटी भयवश लगभग मुझसे सटी हुयी थी । हम लोग अन्दर जाकर बैठ गये ।
आंटी बेहद हैरत से गुफ़ा का मुआयना कर रही थी । मुझे उनकी हैरत की वजह मालूम थी । वो ये कि बेहद भीतरी इस गुफ़ा में हमेशा दूधिया प्रकाश फ़ैला रहता था । पर वह प्रकाश किस चीज से हो रहा है । ये कहीं से पता नहीं चलता था । और बाहर से जंगल जितना ही डराबना था । अन्दर उतनी ही शान्ति सकून का माहौल था । गुफ़ा में डराबना अहसास कराने वाली कोई चीज नहीं थी ।
बाबा एक बङे चबूतरे पर कम्बल के आसन पर बैठे थे । उनकी बङी बङी तेजयुक्त आँखो में मानव मात्र के लिये स्नेह था । उनकी लम्बी लम्बी जटायें दाङी आदि उनके व्यक्तित्व को भव्यता प्रदान कर रही थी ।
- इसको आराम से लिटा दो ।  बाबा ने संजय की तरफ़ इशारा करके कहा ।
मैंने संजय को आराम से लिटा दिया । रजनी आंटी अपलक बाबाजी को देख रही थी । बाबा के लिये जो धारणा उनके मन में थी । कि बाबा डराबनी वेशभू्षा.. डराबने माहौल में रहते होंगे । वह बाबा को देखते ही जाती रही । आगे जो होने वाला था । वह बाबाजी के सानिध्य में काफ़ी समय से रहने के कारण मैं कुछ कुछ जानता था ।
- बाबाजी !  रजनी आंटी ने कुछ बोलने की कोशिश की ।
- शान्त..बेटी ..शान्त.। बाबा ने बीच में ही हाथ उठाकर कहा - ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि इसे क्या परेशानी है । और कैसे हुयी । और क्या होगा ?
फ़िर बाबा मुझसे एक गुप्त भाषा में बात करने लगे । जिसका मतलब ये था कि मुझसे एक गलती हो गयी थी । वो ये कि मुझे किसी एक हिम्मती पुरुष को साथ लाना था । जो तमाम कार्यक्रम के क्रियान्वन के दौरान रजनी को संभाले रहता ।
दरअसल एक विशेष ट्रान्स विधि द्वारा मुझे बाबाजी के साथ " किनझर " नामक प्रेतलोक में जाना था । जहाँ की एक प्रेतकन्या संजय को ले गयी थी । अब ये बङी रहस्यमय हकीकत थी कि संजय यहाँ एक चलती फ़िरती लाश के रूप में नजर अवश्य आता था । पर वास्तव में वह प्रेतलोक का वासी हो चुका था ।
और बाबाजी के अनुसार वह अगले छह महीने में मर जाने वाला था । क्योंकि उसने ये रास्ता खुद ही चुना था । और एक प्रेत कन्या के रूपजाल में आसक्त होकर वह धीरे धीरे प्रेत देही हो रहा था ।
ये सामान्य ओझाओं के झाङ फ़ूंक का मामला न था । दरअसल मुझे " माध्यम " बनकर बाबा के साथ किनझर जाना था । और संजय के विगत तीन महीने का प्रेतकन्या के साथ गुजारा समय संजय के दिमाग को अपने दिमाग से कनेक्ट करके मिटाना था ।
इसको इस तरह से समझ सकते हैं कि किसी टेप की रील को बैक स्थिति में लाकर खाली करना । या किसी कापी में लिखे गये अनपयुक्त मैटर को इरेजर द्वारा मिटाना । तब संजय अपनी पूर्व स्थिति में उसी तरह से आ जाता । मानों गहरी नींद के बाद जागा हो । और इस तरह वो मरने से वच जाता ।
अब समस्या ये थी कि मैं और बाबाजी जब किनझर प्रेतलोक की यात्रा पर जाते । तो हमारे शरीर निर्जीव के समान हो जाते । और संजय पहले ही बेहोशी जैसी अवस्था में पङा हुआ था । तब पीछे अकेली रह जातीं रजनी आंटी । जो निश्चय ही उस बियाबान जंगल में बारह घन्टे तक नहीं रह सकती थी ।
जबकि प्रेतकन्या से उलझने में पन्द्रह या बीस घन्टे भी लग सकते थे । अगर मान लो । उन्हें भी एक विशेष मूर्क्षावस्था में कर दिया जाता । तो गुफ़ा में मौजूद चारों शरीर मृतक के समान होते । और कोई दुर्घटना ( किसी जंगली जानवर या आकस्मिक आपदा से हुआ शारीरिक नुकसान ) हो जाने पर शरीर किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता था । अतः शरीरों की रक्षा करने वाले किसी जिगरवाले इंसान का होना जरूरी था । इसलिये एक बार तो बाबाजी ने तय किया कि किसी आदमी का बन्दोबस्त करके ही किनझर जायेंगे ।
मैं बङे असमंजस में था कि क्या करूँ क्या न करूँ । दरअसल मैं अब अकेले ही किनझर जाने की सोच रहा था । क्योंकि इससे पूर्व भी मैंने बाबाजी से कई बार कहा था कि मैं किसी सुदूरलोक की यात्रा पर अकेले जाने का अनुभव प्राप्त करना चाहता हूँ । और बाबाजी ने कहा भी था कि वे मुझे ऐसा मौका अवश्य देंगे । पर यहाँ मामला दूसरा था । मेरी थोङी सी गलती संजय को मौत के मुँह में ले जा सकती थी ।
और यह भी संभव था कि मैं वहाँ से वापस न आ पाता । क्योंकि किसी शक्तिशाली प्रेत से मुकाबले में यदि मैं हार जाता । और उन्हें पता चल जाता कि मैं एक मानव हूँ । तो वो मुझे दिमागी परिवर्तन करके प्रेत बना देते । और इस तरह की फ़ीडिंग से मैं खुद को प्रेत ही समझने लगता । इस तरह के रिस्क की ढेरों बातें थी । जिनको ज्यों का त्यों समझाना मुश्किल है । पर कहने का अर्थ यही है कि इस तरह मैं संजय और अपनी दोनों की जान जोखिम में डाल रहा था । और बाबाजी इसके लिये तैयार नहीं थे ।
- ओ . के । मैंने अंग्रेजी में कहा - सिम्पल सी बात है । मैं अकेला ही चला जाता हूँ ।
फ़िर मैंने आंटी को जो हमारे वार्तालाप को बङे अजीव भाव से सुन रही थीं ( क्योंकि वो भाषा उनके पल्ले ही नहीं पङ रही थी ) को समझाया कि कोई दो तीन घन्टे ( जबकि मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि किनझर से मेरी वापसी अगली सुबह तक ही हो पायेगी । पर मैं इसलिये निश्चित था । क्योंकि एक तो बाबाजी प्रथ्वी पर ही रुक रहे थे । अतः आंटी यदि घबराती भी । तो वो उन्हें मूर्क्षा में भेज देंगे । और आंटी को ऐसा प्रतीत होगा । मानों उन्हें स्वाभाविक नींद आ गयी हो । दूसरे ये एक इंसान । मेरे दोस्त की जिन्दगी का सवाल भी था । तीसरे मैं अकेला जाने का बेहद इच्छुक था । क्योंकि बाबाजी के साथ तो मैं सैकङों बार अंतरिक्ष यात्रा पर गया था । ) तक मैं ध्यान में जाऊँगा । और आप फ़िक्र न करें । संजय ठीक हो जायेगा ।
आंटी ने किंकर्तव्यबिमूढ अवस्था में सिर हिला दिया । बाबाजी हल्के से मुस्कराये । उन्हें मेरा साहस अच्छा लग रहा था ।

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