शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

मायावी नगरी 2

हे दिव्य । सहसा मैं उसकी जलतरंग जैसी आवाज सुनकर मानों ख्यालों से बाहर आया । तुम कहां खोये हुये हो ? क्या मैं अच्छी नहीं हूं ? या तुम्हारे दिल मैं कोई और रहती है ?
अन्य लोक के प्राणियों से बात करने का अच्छा अभ्यास होने के बाबजूद भी । अपनी उस विचित्र और आगे की स्थिति पर कोई नियन्त्रण न होने के कारण । मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूं और क्या बात करूं ? फ़िर भी मैंने नशे कैसी अवस्था में एक फ़ालतू सवाल ही उस समय पूछा । तुम्हारा नाम क्या है ? अदभुत सुन्दरी ? और तुम किस योनि की हो ?
एक मधुर हंसी के साथ । उसकी दंतपंक्ति बिजली के समान चमकी । और वह बोली । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी । और मैं किसी योनि की नहीं हूं । मैं सिर्फ़ अहसास हूं ? डियेना मेरी स्थिति के घटकों के अनुसार मेरा नाम हुआ । यानी जैसे मेरे अणु परमाणु हैं । उस के हिसाब से मुझे अभी डियेना कहते हैं । दीपा और  रोशनी भी मेरे नाम नहीं हैं । क्योंकि मैं अभी तुम्हारे सम्पर्क से जुडी हूं । इसलिये डियेना कनवर्ट होकर खुद ही तुम्हारी भाषा के अनुसार पहले दीपा और फ़िर रोशनी हो रहा है । तुम्हारी भाषा हिनदी सनसकरत जैसे शब्द बना रही है । अगर मैं किसी दूसरी भाषा वाले के पास होती । तो ये डियेना नाम उसी भाषा के अनुसार कनवर्ट हो जाता । जैसे मान लो तुम्हारा नाम आदित्य होता तो मुझे सूर्य की फ़ीलिंग होती । तुम्हारा नाम राजीव होता । तो मुझे स्वतः ही कमल की फ़ीलिंग होती ।
जैसा कि वह बता रही थी । अंतरिक्ष और सूक्ष्म शरीर के इस स्वचालित सिस्टम या विग्यान से मैं बखूबी
वाकिफ़ था । फ़िर भी उस बेहद रहस्यमय रात मैं मेरे मुंह से नान स्टाप हंसी के ठहाके निकलने लगे । ये
ठहाके उन प्रथ्वी वासियों की मासूम अग्यानता पर थे । जो पिछले पचास साठ सालों में विग्यान के मुठ्ठी
भर आविष्कारों पर इतराते थे । दरअसल मुझे भरपूर हंसी इस बात पर आयी थी कि कोई वैग्यानिक मेरी
जगह दीपा की बात सुन रहा होता । तो उसे कैसा फ़ील होता । क्या वह अपने बाल नोचता ?  चलो
घटक के अनुसार नाम वाली बात हाजमोला खाकर हजम भी कर लेता । पर वह कह रही थी कि वह किसी
योनि से नही है । और सिर्फ़ अहसास है ? ये बात सुनकर मेरे जैसा दिव्य विग्यानी झटका खा गया । तो
पदार्थ विग्यानी क्या करता ?
हे । वह फ़िर मेरे साथ कांच के टुकडों के टूटने जैसी खनखनाती हुयी हंसी हंसी । तुम क्यों हंस रहे हो ?
क्या मेरे मादक अंग तुम्हें बैचेन नहीं कर रहे ?
मेरे मुंह से अबकी बार निकलने वाले ठहाके पन्द्रह मिनट से पहले किसी कीमत पर नहीं रुके । और मैं बोला ..तुम्हारे मादक अंग..कहां हैं । तुम्हारे मादक अंग ? सिनेमा के परदे पर खडी डायलाग बोलती । तू सेलिना जेटली । केटरीना कैफ़ । जैसी मेरी कोई हीरोइन । आज की रात तू मुझे पागल करके ही छोडेगी क्या ? तू 3 D परदे का अहसास भी नहीं है । जिसे सच मानता हुआ । कल्पना में खोकर मैं तुझसे संभोग की खुशनुमा कल्पना करूं ? और जैसा कि मैं भूतकाल से ही सोच पा रहा था । परिणाम मेरी आशा के अनुसार निकला । जो कि मात्र एक संयोग ही था । क्योंकि भविष्य मेरे नियन्त्रण में नहीं था । वह क्रोधित हो गयी । और उसने मुझे एक  अदृश्य शक्तिशाली किरणों के घेरे मे बांध दिया । और इसका रिजल्ट वही था । जो मुझे कुछ कुछ अहसास होने जैसा था । मेरे ठहाके उसी किरण घेरे में कैद होकर बार बार गूंजने लगे । यानी वे सामान्य क्रिया से आकाश में जाकर अक्षर के द्वारा होते वायव्रेशन में विलीन होने वाले नहीं थे । जैसा कि साधारण बातचीत के शब्द जाकर हो जाते हैं । अब ये किरण घेरा जब तक रहता । ठहाके किसी रिपीट मोड पर सेट सी .डी की तरह मुझे सुनाई ही देते रहते । और इनका वाल्यूम या अन्य कोई परिवर्तन भी मैं अपनी इच्छा से नहीं कर सकता था ।
साली कुतिया । न चाहते हुये भी मन ही मन मेरे मुंह से गाली निकल गयी । मैं पहले ही अपने भविष्य
खो जाने की टेंशन से परेशान था । और ये तूने मेरे ही हा हा हो हो हू हू ही ही की रिंगटोन मेरे आगे पीछे
फ़िक्स कर दी ।
दरअसल हम दोनों के ही सामने एक बडी समस्या थी । न तो मैं उसका माइंड रीड कर सकता था । क्योंकि
उसके पास स्थूल शरीर ही नहीं था । तो माइंड कहां से होता ? और वह मेरे पास स्थूल शरीर होते हुये भी
मेरा माइंड रीड नहीं कर सकती थी । क्योंकि मैं स्थूल शरीर की भूमिका में नही था । दूसरे यदि मैं उस
भूमिका में होता भी । तो मैं उसके किसी काम का नहीं था । क्योंकि मनुष्य से । परिचय के रूप में कोई
भी अलौकिक आवेश अवैध होता है । जिसकी सजा अलौकिक जगत में बहुत बडी है ।
you idiot ..किन्नर ( हिजडा ) । वह अपने दांत पीसती हुयी बोली । हायो रब्बा । ये मैं क्या बोली ?
ओमियो तारा । ओमियो तारा । फ़िर वह पहले की तरह ही खिलखिलाने लगी ।
दीपा डार्लिंग । आय म प्रसून । ओनली वन प्रसून । वन मेन प्रसून । परफ़ेक्ट मेन प्रसून । इस वक्त । वक्त का
मारा प्रसून । जिसका फ़्यूचर कहीं खो गया वो प्रसून । और तू कौन है ? एक यक्षिणी या कुलक्षिणी ।
या इस मायावी परदे की बनाबटी हीरोइन ? और ये साला । ओमियो तारा कौन है ? जिसकी माला
तू बार बार जप रही है ?
ओमियो तारा । उसके चेहरे पर भय के भाव आये । ये तो नास्तिक है ? ये कैसा दिव्य है ? जो भगवान
ओमियो तारा को नही जानता ? सर्व शक्तिमान ओमियो तारा को नहीं जानता । अरे पागल प्रसून वही
तो सबका भगवान है ?
ये शब्द जो मैंने ऊपर कहे मेरे मुंह से स्वतः ही निकल रहे थे । मैंने पहले ही बताया । भूतकाल पर मेरा पूरा
नियन्त्रण था । पर अगले ही पल मैं क्या करूंगा ? अगले ही पल मैं क्या कहूंगा । यह मैं तय नहीं कर सकता
था । मेरा भविष्य कहीं अग्यात में खो गया था ।
अलौकिक दुनियां । के इस उलझे से लगने वाले कथानक को ठीक से समझने के लिये आपको ये हर हालत
में याद रखना होगा । कि इसी प्रथ्वीलोक के उस डेंजर जोन काटेज से । मेरे दिमाग की मेमोरी या सिस्टम
से भविष्य नाम का वह भाग गायब हो गया । जो आपके आने वाले कल को आज या गुजरे हुये कल से जोडता है । जैसे आज 20  तारीख हो । और आपको अगले महीने या अगले साल तक क्या क्या करना है । ये बहुत लोगों को पता होता है । अगर बहुत ही free टायप आदमी हो । तो उसे भी पता होता है कि शाम को उसे क्या करना है । पर मुझे अगले क्षण क्या करना है । इसका ही पता नहीं था । ऐसी स्थिति में मैं बिना पतवार की नाव था । बिना ड्रायवर के चलता हुआ वाहन था । ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ था । किसने किया था । मुझे कुछ नहीं पता । अपनी इस स्थिति को मैंने डेंजर जोन काटेज से ही महसूस किया था । अतः ये शायद वहीं से शुरू हुयी थी । जबकि पिछली जिन्दगी में मैं अब भी वही वन मेन प्रसून था ।
अलौकिक दुनियां की रहस्यमयी सुन्दरी ने मेरा किरण घेरा तोड दिया था । मैं भूतकाल में विचरता हुआ
भविष्य की कैद से आजाद होने की कोशिश कर रहा था । और इस कोशिश में बाबाजी भी मेरे साथ नहीं
थे । बाबाजी कहां थे । ये भी मुझे पता नहीं था । दिव्य साधना DIVY SADHNA  की कनेक्टविटी जोडना
तो उस हालत मैं कतई सम्भव ही नहीं था । मैंने दीपा की तरफ़ देखा और एक सिगरेट सुलगायी । तीस फ़ुट
की वह दूधिया बल्बों की झालर जैसी जगमगाती डिजिटल हसीना बेहद आश्चर्य से मुझे ही देख रही थी । और मेरी खुद समझ में नहीं आ रहा था । कि अगले पल मैं क्या करने वाला हूं ?
दरअसल भूतकाल की मेमोरी मुझे  4 D के रिजल्ट दे रही थी । और तब पहली बार मुझे आश्चर्य हुआ ।
अब आप सरलता से इसको यूं समझिये । 4 D का विचार बहुत देर से आते आते मैं दिमाग के उस हिस्से
मैं पहुंच गया । जहां 4 D रिलेटिव डाटा फ़ीड था । यह समय मेरी जिन्दगी मैं आज से दस साल पहले का था । जब मैं बीस साल का साधक प्रसून था । और 4 D नामक बला से पहली बार परिचित हुआ था ।
मैं 4 D को केवल थ्योरी के रूप में जानता था । 4 D के प्रक्टीकल से मेरा वास्ता आज तक न पडा था ।
या कहिये । आज तक नौबत ही न आयी थी । और तब । तब ?  wonderful ..? मेरे दिमाग में स्वाभाविक
ही पहली बार विस्फ़ोट हुआ । मैं एक्टिव हो सकता था । भले ही दस साल पीछे जाकर । बल्कि एक स्वाभाविक ही अनजाने में घटित हुयी क्रिया से मैं एक्टिव हो चुका था । अब मैं बीस साल का प्रसून था ।
और उस दायरे में रहकर मैं नये हालातों का मुकाबला कर सकता था । भले ही मैं तीस साल के प्रसून का
भविष्य न जान पाता । और अब मैं आगे सोच सकता था । ये एक तरह से मेरे गुजरे हुये भूतकाल में आज
का भविष्य एक अनोखे रियेक्शन से बिना प्रयास खुद ब खुद  जुड गया । और मेरे स्वभाव में बीस साल
पहले का प्रसून आ गया । मैंने दीपा की तरफ़ देखा । स्वाभाविक ही मेरी लोलुप निगाह उसके स्तनों पर
गयी । अच्छे हैं । मैं बीस साल पहले की भावना अनुसार बोला ।
क्या ? वह हडबडायी । क्या अच्छे हैं ? ओमियो तारा । ये दिव्य तो बडा ही मायावी है ?
नहीं । तुम्हारी चमकती माला के मोती । मैंने कहा । क्या तुम एक माला मुझे भी दोगी ?
अवश्य । उसने एक मादक अंगडाई ली । पर तुम्हें मेरे पास आना होगा । एक कली खिलने की तमन्ना में
भंवरे का इंतजार कर रही है ?
तुम ही मेरे पास क्यों नहीं आ जाती । मैंने मन ही मन तेजी से सोचते हुये कहा । बीस फ़ुट की दूरी के कारण ही अपने को क्यों तरसा रही हो ?
मेरी बात सुनकर वह तेजी से कसमसाई । उसने बैचेनी से पहलू बदला । और अपने होठों पर जीभ फ़िराई । दाता । मेरे मुंह से आह निकली । अपने उस खोये हुये भविष्य में । अन एक्टिव स्थिति में । मैं धोखे से भी
इस मायावी । 4 D में प्रवेश कर जाता । तो बरमूडा ट्रायएंगल मैं गायब हुये जहाज या अन्य चीजों की
तरह कभी वापस नहीं लौट सकता था ? अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह में घुसना तो बहुत आसान था ।
पर कोई भी अर्जुन इस 4 D का चक्रव्यूह नहीं तोड सकता था । द्वैत के महायोगियों की यह भूमि थी ।
श्रीकृष्ण जैसे गिने चुने  योगी ही इसका छेदन भेदन कर सकते थे । द्वैत के गोरखनाथ आदि कुछ योगियों को इस कला का कुछ कुछ ग्यान था । लेकिन अद्वैत के संतो के लिये ये चुटकी बजाने का खेल था । जिनमें
सतगुरु कबीर साहेब  का नाम सर्वोपरि था । परमहंस के इशारे से भी भयभीत हो जाने वाली ये 4 D
रूपी महामाया एक विलक्षण रहस्य ही थी । तो आइये पहले आपको उस थ्योरी के अनुसार जो मेरी मेमोरी
में 4 D डाटा रूपी जो जानकारी फ़ीड थी । 4 D का रहस्य बताता हूं ?

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