शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

मायावी नगरी 3

भले ही मैं PAST में 10 साल पीछे BACK  होकर एक्टिव हुआ था । पर अब पहले से सकून महसूस कर रहा था । कुछ न करने से कुछ भी करना अधिक अच्छा था । एक्टिव होते ही मेरे दिमाग में जो सवाल
स्वतः उत्पन्न हुये वे ये थे । आखिर मेरा भविष्य कहां खो गया था ? इसके पीछे क्या कारण था ? या
इसके पीछे कौन था । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी की हकीकत क्या थी ? ओमियो तारा नाम का ये
नया नया पैदा हो गया भगवान कौन था ? दीपा जिस स्पेस में थी । उसकी हकीकत क्या थी ? 10 साल पीछे जाने पर मेरा ग्यान और शक्ति जो उसी स्थिति के अनुसार लगभग 70 % कम होकर 30 %  ही रह
गये थे । उनमें क्या मैं इन विकट  स्थितियों का मुकाबला कर पाऊंगा ? लेकिन जिन्दगी में कुछ समय
ऐसा आता है । जब कोई भी इंसान अपनी चलाने । या अपनी शर्तों पर काम करने की स्थिति में नहीं होता । जैसे मिसाल के तौर पर समुद्र में डूबता हुआ आदमी ये निर्णय नहीं ले सकता । डूबूंगा । वो कोई बात नहीं ।पर पिज्जा खाकर ही डूबूंगा ? इस तरह ये शेर की सवारी थी । जिस पर बैठे रहना और उतर जाना दोनों
ही खतरनाक थे । सबसे पहले मैंने 4 D का रहस्य जानने का फ़ैसला किया । अगर वह 4 D स्पेस नहीं था ।
तो बाकी युद्ध मेरे लिये आसान था । लेकिन अगर वह 4 D स्पेस था  । तो शतरंज की बिसात की तरह
अगली चाल क्या गुल खिलायेगी ? ये जानना किसी दिग्गज के लिये भी मुश्किल था । लिहाजा मैंने वही
किया । प्रत्येक योगी की तरह मेरी भी अपनी एक स्टायल थी । मैंने एक ढेला उठाया । अभिमन्त्रित किया ।
और उस बीस फ़ुट दूर अननोन जोन में उछाल दिया । जैसी कि मुझे अपेक्षा थी । उस स्पेस की सीमा में जाते ही ढेला गायब हो गया । लेकिन इसका एक दूसरा भी पहलू भी हो सकता था । वास्तव में ढेला कहीं गायव नहीं हुआ हो ? बल्कि वह फ़ेंकी गयी दूरी तय करके वहीं जमीन पर गिरा हो । जहां उसे गिरना चाहिये ? इस रहस्य को ठीक से समझने के लिये आपको कहानी के पीछे की वह घटना बताता हूं । जब चार किलोमीटर की दूरी आठ सेकेंड में तय करके दीपा एक झपाका स्टायल में मुझसे बीस फ़ुट की दूरी पर
आकर रुक गयी थी । ये योग विध्या का एक तरह से बेहद मायावी गुप्त और रहस्यमय खेल था । वास्तव
में दीपा सिर्फ़ अपनी जगह हिली भर थी । और चार किलोमीटर का फ़ासला बीस फ़ुट के गैप में सिमट
गया था । अब जैसे दीपा मुझसे बीस फ़ुट दूर थी । अगर मैं 19.90 फ़ुट का फ़ासला खुद तय करके उसके पास पहुंच जाता । तो भी वह मुझसे बीस फ़ुट दूर ही रहती । और अगर ऐसा था । तो इसका अर्थ था ।
कि दीपा 100 % मायावी 4 D स्पेस में थी । जो कि सूक्ष्म शरीर सिस्टम अनलाक होने के कारण मुझे
दिख रहा था । और आम आदमी को नहीं दिख सकता था । और इसका साफ़ सा मतलब था । कि वहां
प्रथ्वीलोक का ही स्पेस था । मुझे लगता है कि आपको इस उलझाऊ मैटर को समझने में काफ़ी कठिनाई
हो रही है । इसको और समझिये । जिस तरह  आप इंटरनेट पर कोई blog  या साइट खोले हुये हैं । और वह दिल्ली के मालिक की है । और आप हरिद्वार में वह साइट खोले हुये हो । इसके बाद आपने आस्ट्रेलिया की साइट खोली । इसके बाद आपने लास वेगास की साइट खोली । इसके बाद आपने यूक्रेन की साइट खोली । तो कितने स्थान और कितनी दूरी आपकी समझ से बदल गये । लेकिन साइट से आपकी दूरी सिर्फ़ उतनी ही है । जितनी दूर आपका कम्प्यूटर है । चेतन दृष्टा ज्यों का त्यों है । सामने का चित्रपट ज्यों का त्यों है । सिर्फ़ उस  पर दृश्य का बदलाब हो रहा है । जो आपको मन से ही तो महसूस हो रहा है । लेकिन फ़िर भी 4 D स्पेस मेरे लिये वो चक्रव्यूह था । जिसमें से बाहर आना मुझे नहीं पता था । और ऐसी हालत में मेरे ग्यान की ये बडी बडी बातें सिर्फ़ गाल बजाऊ ही थी । मैंने दीपा की तरफ़ देखा और सोचा कि ऐसे हालातों
में मुझे क्या करना चाहिये ? कुछ विचार थे । जो मेरे दिमाग में तेजी से आ रहे थे । पहला 4 D स्पेस का
रहस्य और प्रक्टीकल अच्छे अच्छे योगियों के लिये दुर्लभ होता है । अगर इसमें मैं सफ़ल हो जाता । तो प्रकृति के अनेक रहस्य मेरे सामने खुल जाने थे । कोई क्रिया ऐसी भी हो सकती थी कि प्रकृति पर मेरा
नियन्त्रण हो जाता । और इसके रिस्की प्वाइंट ये थे कि मैं अपना मूल भी खो बैठता । दूसरा अगर इसको छोड भी दिया जाय । तो मेरा भविष्य खो चुका था । तीसरा जीवन में खतरा और मौत पग पग पर होते हैं । तो इंसान इसके डर से क्या क्या चीज त्याग देगा ? अपने ऐसे ही विचारों के झंझावात में मैंने 4 D चक्रव्यूह का रहस्य जानने का निश्चय कर लिया । दूसरे शब्दों में उस समय मेरे पास इसके अलावा उसी
हालत में लौट जाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था । इसलिये कर या मर । इसलिये आर या पार ?
मैंने एक सिगरेट सुलगायी । और तीस फ़ुट की उस डिजिटल सुन्दरी को देखते हुये मजाक में कहा । दीपा डार्लिंग । तुमने सम्भोग के लिये थोडा गलत आदमी नहीं चुना क्या ? दरअसल तुम्हें खली को चुनना चाहिये था । किसी w w F को चुनना चाहिये था । किसी हट्टे कट्टे फ़्रांसीसी या नाइजीरियन को चुनना चाहिये था । ये तुमने चींटे से हथिनी की सुहागरात वाला फ़ार्मूला मेरे ऊपर ही क्यों अपनाया ?
ओमियो तारा । उसने अपनी छातियों पर हाथ रखते हुये घबराकर कहा । हे । दिव्य । तुम किस तरह की
बात कहते हो  ? GOD ओमियो तारा को पता लग गया । तो मेरा क्या होगा ?
उसकी बात की परवाह न करते हुये मैं तेजी से अपनी स्थिति पर विचार कर रहा था । मैंने कहा । बहुत देर
से तुम किसी देवी देवता की तरह खडी हो । किसी आसन पर बैठ जाओ । तब संभवतः वह मेरी अग्यानता
पर आश्चर्यचकित होकर हंसी । और दूसरे ही पल सरकार स्टायल में एक सुसज्जित सिंहासन पर बैठ गयी ।
अब मुझे पक्का यकीन हो गया कि वह 4 D स्पेस ही था । 4 D स्पेस क्या बला होता है । इस बात पर विचार करना और तेजी से निर्णय लेना अब आवश्यक था ।
हमारी प्रथ्वी और इस पर उपलब्ध तमाम चीजें 3 D होती हैं । यानी Three Dimension यानी त्रि आयामी । त्रि आयामी । का मतलव लम्बाई । चौडाई या मोटाई । और ऊंचाई । कोई भी वस्तु या पदार्थ
में ये तीन किसी न किसी रूप में कम ज्यादा होते ही हैं । और हमें एक मनमोहक सृष्टि का अहसास होता है । पर वास्तव में क्या ये पूरा सत्य है । हरगिज नहीं । ये उस सत्य का प्रतिबिंब बन रहा है । जो मूल सत्य और इस सत्य के मध्य है । दरअसल अखिल ब्रह्माण्ड सृष्टि का मेरे ग्यान के अनुसार मूल सिद्धांत यही है । इसे ठीक से समझने के लिये पहला उदाहरण जल का लेते हैं । आप दस लीटर जल को फ़ैलाकर विभिन्न आकार दे सकते हैं । जैसे बाल्टी में । जैसे परात में । जैसे जमीन पर । जैसे पौली बैग में । इसी दस लीटर जल को बर्फ़ के रूप में जमाकर और हजारों लाखों आकार दिये जा सकते हैं । फ़िर इसी जल को भाप बनाकर असंख्य आकार दिये जा सकते है । फ़िर इसी जल को गैस रूप में और भी रूपों में बदला जा सकता है । अब सवाल ये है कि इन तमाम आकारों में से जल का वास्तविक आकार क्या है  ? और यही जल तेजी से तुरन्त हमारी इच्छानुसार किसी भी रूप में परिवर्तित हो जाय । तो कैसा रहे ? यही 4 D स्पेस का मूल रहस्य है । अब क्योंकि ये सारी क्रियायें प्रकृति के  नियम के तहत प्रतिक्रिया और एक निश्चित समय में रूपांतरित होती है । क्योंकि Three Dimension । TIME ZONE के अंतर्गत ही आता है । जिसे कालचक्र भी कहते हैं । लेकिन यदि कोई ZONE ऐसा हो । जो टाइम से मुक्त हो । तो इच्छानुसार तेजी से आकृतियां बदली जा सकती है । 4 D स्पेस की वास्तविकता को इसी तरह समझा जा सकता है  । जल की ही तरह हम लकडी । लोहा या अन्य किसी भी पदार्थ के साथ ये घटना कर सकते हैं । क्योंकि असल में तो सभी अणु परमाणु ही हैं । जो TIME ZONE  की कैद में एक निश्चित समय तक उस रूप आवरण में
बने रहने को विवश है । अब ये 4 D स्पेस की डिजिटल कन्या । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी मुझसे कैसा
सम्भोग चाहती थी ? मैं बखूबी समझने लगा था । पर जानबूझकर अन्जान बन रहा था । वह सम्भोग क्या होता ? कैसा होता ? और किस तरह होता ? इसको समझाने के लिये मैं इसी पदार्थ जगत के उस दुर्लभ रहस्य को बताता हूं । जिसको कई बार देखने के बाबजूद आपने मोटे तौर पर भी नहीं समझा होगा । वह उदाहरण है । किसी भी टाकीज में बैठकर मूवी देखना । 4 D स्पेस क्या होता है । और उसमें क्या परिवर्तन
हो जाते हैं । उसे समझने के लिये इससे सरल और रोचक उदाहरण मेरी निगाह में दूसरा नहीं है । अब
थोडी देर के लिये फ़िल्म की शूटिंग करने वाले कैमरे के लेंस और लेंस होल को 4 D स्पेस का entry gate मान लीजिये । कोई भी आर्टिस्ट इसके सामने आते ही रियल टू रील में परिवर्तित हो जाता है । यही रील 2nd स्टेप में मूवी थियेटर में प्रोजेक्टर लाइट के सामने जाकर रंग बिरंगे फ़ोकस में बदल जाती है । जो हमारे सिरों के ऊपर से होता हुआ सिनेमा के परदे पर पड रहा है ।  3rd स्टेप में वह परदे पर जाकर आर्टिस्ट की उसी गतिविधि का एक चित्रमय रूप ले लेती है । और ठीक वही दृश्य प्रस्तुत करती है । जो कैमरे के सामने घटा था । अब जरा सोचिये । असली सत्य क्या है ? वह रील ? या वह फ़ोकस  ? या परदे पर बनता चित्र ? अब ये संसार क्योंकि भृममात्र है । और वह फ़िल्म कृतिम है । असली 4 D स्पेस में क्या होता है ? फ़िल्म की शूटिंग करने वाला आर्टिस्ट तो शूट के बाद मूल रूप में बचा रह गया  । इसकी शूटिंग करने वाला कलाकार 1st स्टेप में ही हमेशा के लिये गायब होकर पहले रील के घटकों में बदल गया । और 2nd स्टेप में शीघ्र ही स्वतः वह फ़ोकस की तरह हमेशा के लिये ही अणु परमाणुओं में बदल गया । यहीं आकर सिनेमा और 4 D स्पेस में अंतर हो जाता है । सिनेमा की रील में मान लीजिये । 15  आर्टिस्ट है । तो वो रील में भरा हुआ ही एक्शन करेंगे । यह परिवर्तन फ़ोकस में भी हो रहा है । और परदे पर भी हो रहा है । लेकिन उनका संचालन केंद्रक प्रोजेक्टर लाइट के हाथ में है । यानी केन्द्रक एक ही है । लेकिन 4 D स्पेस में घुसने वाले प्रत्येक आर्टिस्ट का केन्द्रक वह स्वयं होता है । और उसकी मेन स्थिति फ़ोकस वाली होती है । न कि परदे वाली ? इसलिये आप पूरा ध्यान इसी फ़ोकस पर लगायें । जिसकी प्रोजेक्टर लाइट यानी ऊर्जा केन्द्र उसी फ़ोकस में ही होता है । न कि किसी अन्य स्थान पर । इस तरह जीता जागता आदमी फ़ोकस में बदल जाता है । क्या ऐसी शूटिंग करना कोई पसन्द करेगा ? जिसमें आर्टिस्ट की आरीजनलिटी ही चेंज हो जाय । दीपा मुझसे यही तो कह रही थी । मैंने आसमान की तरफ़ देखा । उस रहस्यमय शान्त रात में असंख्य तारों का झिलिमिलाता आकर्षण भी मुझे बेकार लगा ।
ओमियो तारा । हठात मेरे मुंह से निकल गया । दीपा ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा । क्रमशः ।

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