शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

पिशाच का बदला 4

आप जानते ही हैं कि रामवीर और ब्रिजेश गहरे दोस्त हैं । पिशाच आगे बोला । लेकिन वर्मा जी का घर जितना ही पवित्र और सदाचारी है । ब्रिजेश का घर मांस मदिरा के सेवन से उतना ही अपवित्र है । और ब्रिजेश स्वभाव से दुराचारी भी है । हम ब्रिजेश को सीधे सीधे निशाना बना सकते थे । और आसानी से बना सकते थे । लेकिन बिना रामवीर को साथ लिये हमारा बदला पूरा नहीं होता । यदि हम ब्रिजेश को पहले ही बरबाद करके मार डालते । तो हो सकता है कि हम नन्दू की मां को वो इंसाफ़ नहीं दिला पाते । जो कि हम दिलाना चाहते थे...? इसलिये हमने रामवीर से ही शुरूआत की । इसके बाद हम यही क्रिया अपनाते हुये ब्रिजेश की पत्नी मिथलेश को किसी शाकिनी द्वारा भृष्ट करते । और फ़िर ब्रिजेश को प्रेत प्रभावित करते हुये प्रेत महीनों तक उन दोनों के शरीर से स्त्री पुरुष सम्भोग का आनन्द लेते । जो कि मनुष्य की तरह प्रेतों की भी एक बडी कमजोरी होती है । फ़िर हम रामवीर की ब्रिजेश के साथ संगति बडाते हुये उसे अत्यन्त शराब का शौक लगा देते । और एक दिन दोनों को प्रभावित कर नदी के उसी स्थान पर ले आते । जहां नन्दू डूबकर मरा था । ये दोनों दोस्त नशे के प्रभाव के कारण या तो कोई शेखी दिखाते हुये । या आपस में झगडा कर उसी हालत में ( पूरे कपडे और जूते आदि पहने ही ) नदी में कूद जाते । उस स्थान पर नदी में ढायकुला ( नदी के बीच में कुंआ ) है । जिसमें ये कपडे आदि पहने होने के कारण । और नशे में होने के कारण कुछ नहीं कर पाते । और डूबकर मर जाते । फ़िर हम किसी बहाने से इनके खलिहानों में । इनके घरों मे आग लगा देते ..और इस तरह हमारा आधा बदला पूरा हो जाता ?
- क्या..। अबकी बार मुझे भी आश्चर्य हुआ । आधा बदला..? इसके अलावा तुम और क्या करते ? और तुम आग किस तरह लगा सकते थे ..?
मैंने देखा वर्मा परिवार इस रहस्योदघाटन पर लगभग थरथर कांपने लगा ।
- हे महात्मा । रेशमा फ़िर से प्रेतवाणी बोली । आप आश्चर्य न करें । आग हम स्वयं नहीं लगाते । बल्कि किसी बच्चे द्वारा । या किसी महिला द्वारा हम ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर देते कि आग लग जाती । जिस तरह इन लोगों ने नन्दू के परिवार को बरबाद कर दिया था । हमें भी इसी तरह इनको बरबाद कर देना था । अब ये आधा बदला..किस तरह से हुआ । ये.. अब आगे सुनिये.. फ़िर ये अकाल मृत्यु के बाद निश्चित ही एक छोटे प्रेत के रूप मे हमें मिलते । इन बेचारों को यह सब बात बिलकुल पता नही होती । और यदि होती भी । तो ये उस स्थिति में कुछ नहीं कर सकते थे । जैसा कि आप जानते ही है । नन्दू की बहन लक्ष्मी की शादी हो चुकी है । आगे उसको गर्भ भी रुकेगा । उस गर्भ में हम ब्रिजेश को जाने पर मजबूर कर देते । और वह बेचारा प्रेतयोनि से निकलने पर बेहद खुशी महसूस करता । इस तरह जिस योनि के साथ बलात्कार करते हुये ब्रिजेश ने पति जैसी भूमिका निभायी थी । उसी योनि से वह एक दलित संतान के रूप में जन्म लेता । और इसका साथी....होने...( कहते कहते पिशाच रुक गया और बात घुमाकर बोला ) ..और इसी तरह रामवीर को भी किसी दलित गर्भ में जाने पर मजबूर कर देते । और इस तरह हमारा बदला पूरा हो जाता ।
- अब । लाख टके की बात । मैं साबधान होकर बोला । जाहिर है कि तुम्हारा प्लान तो फ़ेल हो गया । अब हमारा सौदा किस तरह पटे । यानी compromise किस तरह होगी ? कहने का मतलब । समझौते के रूप में तुम क्या चाहते हो ?
- इसके लिये ..? पिशाच बोला । वर्मा जी को गद्दी पर बिठायें । ( अक्सर प्रेत पीडित और आहवान माध्यम का शरीर अकडा हुआ । और गर्दन ऐंठी सी और सामने होती है । इसलिये वह अगल बगल बैठे लोगों से बात नहीं कर पाता । और कोई भी आवेश सामने वाले को ही जबाब देता है । )
ये उसने मेरे मन की बात कही थी । दरअसल मैं सिगरेट पीने का मौका चाहता था । और मैं ये भी जानता था कि आगे वह क्या कहने वाला है । मैं गद्दी छोडकर तुरन्त उठ खडा हुआ । और भयभीत होते हुये वर्मा जी धडकते दिल से गद्दी पर बैठ गये । पूरे वर्मा परिवार का दिल धाड धाड कर बजने लगा । रामवीर का मुंह सफ़ेद पड गया । मैंने एक सिगरेट सुलगायी । और भरपूर अंगडाई लेते हुये गहरी सांस भरी । फ़िर मैंने पिशाच की तरफ़ देखा ।
- क्षमा करें वर्मा जी । रेशमा के मुंह से पिशाच बोला । आप दुनिंया का कानून ( स्वयं लेखपाल और पुत्र पुलिस में होने के कारण ) अच्छी तरह जानते होंगे । अगर किसी के साथ बलात्कार हो ? और एक लडका भी मर जाय । तो दोनों का मुआवजा लगभग कितना हुआ ?
- मेरे ख्याल से दस लाख । वर्मा जी ने दृणता से भावहीन स्वर में जबाब दिया ।
- बिलकुल सही । पिशाच ने प्रशंसा की । फ़िर आप नन्दू की मां और बहन को दस लाख रुपये देने का इंतजाम करें । इसकी वजह क्या है ? और ये काम क्यों करना होगा । इस सम्बन्ध में आप इन महात्मा से ही पूछ सकते हैं ।
मैंने देखा । माहौल से प्रभावित होकर वर्मा जी अधिक भावुक हो गये हैं । अतः मैंने तुरन्त बात संभाली । और कहा - दस लाख । तो बहुत हैं । हालांकि किसी की मृत्यु की कीमत रुपयों से नहीं आंकी जा सकती । फ़िर भी मेरे ख्याल से दोनों बातों का मुआवजा छह लाख रुपये बहुत है ? खैर । जो भी होगा । इसको हम तय कर लेंगे । अब तुम बताओ । तुम इस कार्य के बदले क्या चाहते हो ?
तब जैसा कि सभी प्रेत मांगते हैं । उसने एक वर्ष तक प्रेत दीपक ( जो प्रेतों को शान्ति देता है । ) और खाने की सामिग्री आदि एक स्थान पर रखने को बताया । और दो चार कार्य और बताये । यानी सारा मामला शान्ति से निपट गया ।
तब मैंने कहा - हे पिशाच । बहुत दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न है । आज उसको पूछने का उचित समय है ? ये जो ओझा आदि आमतौर पर झाड फ़ूंक करते हैं । प्रेत बाधा हटाते हैं । क्या ये ताकतवर होते हैं ? इनकी सच्चाई के बारे में बताओ ?
- हे महात्मा । रेशमा के मुंह से पिशाच बोला - इनमें एक दो सच्चे साधु या सच्चे तान्त्रिक को छोडकर ज्यादातर बनाबटी होते हैं । फ़िर भी उनके ( बनाबटी ) द्वारा भी प्रेत वाधा ठीक हो जाती है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । दरअसल प्रेत तो खुद चाहता है कि मनुष्य उससे बात करके उसकी मांग पूरी कर दे । जिस पर प्रेत छाया होती है । वो बिना किसी तान्त्रिक के ही सब बात बताता है । ऐसी हालत में घर का कोई समझदार आदमी भी यदि प्रेत से बात करके उसकी मांग पूरी कर दे । तो भी प्रेत उसको छोड देते हैं । और किसी तान्त्रिक की आवश्यकता नहीं होती । और ऐसी हालत में किसी भक्ति भाव वाले घर में धोखे से । गलती से । प्रेत बाधा हो जाने पर । प्रेत उससे मांस मदिरा सम्भोग बलि जैसी अनुचित मांग नहीं करते । लेकिन आदमी डर कर इन तान्त्रिकों के पास पहुंच जाता है । और ये तमाम ऐसी क्रियायें कराते हैं । जिनका कोई मतलब ही नहीं होता । और जिनकी कोई जरूरत ही नहीं होती । प्रेत ईश्वरीय नियम के अनुसार ही किसी को पीडित करते हैं । और उसी नियम के अनुसार उन्हें छोडना भी पडता है । इसलिये झूठा तान्त्रिक एक दिखावा मात्र है । उसके मन्त्र आडम्बर दिखावा है ।
वास्तविक बात । प्रेत ने क्यों सताया । और कैसे छोडेगा । ये सिर्फ़ बातचीत से होता है । हां ये बात अवश्य हैं कि प्रेतों में भी अच्छे बुरे स्वभाव के प्रेत होते हैं । और मुझे बार बार हैरत होती है कि आप ( इंसान ) भूल जाते हैं कि हम भी कभी इंसान थे ?
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दूसरी सुबह जब मेरी आंख खुली तो दस बज चुके थे । यानी मैं लगभग छह घन्टे सोया था । मेरे अनुमान के मुताबिक तीन बजे ही प्रेत क्रिया पूर्ण हुयी थी । सब मामला शान्ति से निबट गया । प्रेतों ने वर्मा परिवार को छोड दिया था । रेशमा अब सामान्य नजर आ रही थी ।
 वर्मा जी का पूरा घर भाग भागकर मेरी आवभगत में लगा हुआ था । मैंने चलने की इजाजत मांगी । तो सब लोगों ने बेहद आग्रह करके शाम तक के लिये मुझे रोक लिया ।
और दूसरे मुझे वर्मा जी को अकेले में कुछ समझाना भी था कि आगे क्या करना है । इसके बाद दोपहर खाने के बाद सब लोग मेरे पास बैठे । तो वर्मा जी ने कहा - प्रसून जी । रात को आपका चमत्कार देखने के बाद आप जब सो रहे थे । मैंने वीरी को फ़ोन किया था । उसने बताया कि आप अपने बारे में कोई जानकारी देना पसन्द नहीं करते । इसलिये मैं वो सब तो नहीं पूछूंगा । पर मुझे एक जिग्यासा है कि आप एक student जैसे नजर आते हैं । आपका महात्मा तान्त्रिक जैसा वेश भी नही है । फ़िर आपने ये क्या और कैसे ग्यान प्राप्त किया ?
देखिये वर्मा जी । मैंने कहा । यह कोई बडा रहस्य नहीं हैं । द्वैत ग्यान के अंतर्गत आने वाला कुन्डलिनी योग ऐसे सभी उच्च ग्यान का दाता होता है । संत मत के अंतर्गत आने वाला अद्वैत ज्ञान इससे भी उच्च होता है । जो वास्तविक मोक्ष का दाता होता है । ये सिर्फ़ आन्तरिक रहस्य रहस्यों को जानने वाले सच्चे संतो से ही प्राप्त होता है । यदि आपको ऐसे ग्यान को प्राप्त करने में दिलचस्पी है । तो मैं आपको इसका सही तरीका और सही रास्ता बता दूंगा । कम से कम इतना तो मैं कर सकता हूं ।
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इसके आठ महीने बाद अचानक मुझे वर्मा जी की याद आ गयी । मैंने मोबायल फ़ोन से उनका नम्बर देखकर एक फ़ोन बूथ से उन्हें फ़ोन किया । अपना फ़ोन नम्बर गुप्त ही बना रहे । इसलिये मुझे ऐसा करना पडा । वर्मा जी मेरे द्वारा फ़ोन करने पर बेहद खुश हुये । और उत्साहित स्वर में बोले । आप उस रात मेरे घर क्या आये । मेरा और मेरे घर वालों का पूरा जीवन ही बदल गया । बल्कि गांव का माहौल ही बदल गया । मैं आपको फ़ोन पर पाकर बेहद उत्साहित महसूस कर रहा हूं । यदि इजाजत हो तो बताऊं । कि आपके जाने के बाद क्या क्या बदलाव हुआ ?
- जी । वर्मा जी । अवश्य बताईये । मैं खुशी से बोला । दरअसल आपकी याद । और फ़िर क्या हुआ । ये जानने के लिये ही मैंने फ़ोन किया ।
- तो सुनिये । वह बोले । आपसे मिलने के पहले मैं और मेरा परिवार धार्मिक तो थे । पर अपना ही परिवार और पैसा ही सब कुछ है । ये हम सब सभी संसार वालों की तरह मानते थे । पर आपने प्रेत द्वारा असली रहस्य कथा करवाकर मेरी सोच ही बदल दी । और असली धार्मिकता । जीवन का असली उद्देश्य । असली आनन्द हम अब महसूस कर रहें हैं । मैं एक एक करके बताता हूं । सबसे पहले तो मैंने अपना फ़ार्म हाउस और उसमें जो खन्डित मन्दिर था । उसका एक आश्रम बना दिया । खन्डित मन्दिर की जगह नये मन्दिर का निर्माण करा दिया । अब उसमें कुछ साधु रहतें हैं । और सुबह शाम प्रभु का भजन कीर्तन होता है । गांव के भी मन्दिर का जीर्णोंद्धार करा दिया । उसमें भी गांव वाले सुबह शाम नियम से पूजा आरती आदि करने लगे । गांव के शमशान की बाउंड्री आदि कराके पक्का करवा दिया । जिससे लोग दाह संस्कार के समय ही वहां जाते हैं । लेकिन सबसे बडी खुशी इस बात की हुयी । कि हम नन्दू की मां को वापस गांव में ले आये । और उसकी जमीन वापस कर दी । आपने जो छह लाख का मुआवजा तय किया था । वो नन्दू की मां ने किसी कीमत पर नहीं लिया । एक पैसा नहीं लिया । तब हमने मिलकर उसकी इच्छा से उसी पैसे से महुआ बगीची के पास एक आलीशान मन्दिर बनबा दिया । उसका घर तो बिक गया था । अतः वापस नही हुआ । इसलिये उसी मन्दिर को आश्रम का रूप देकर वहां रहने की व्यवस्था कर दी । गांव वालों और सरकारी सहयोग से अब वहां बिजली और सडक दोनों है । नन्दू की जहां मृत्यु हुयी थी । वहां उसकी एक समाधि बनवा दी । इस सबसे हटकर हमें प्रेतों की अच्छाई बुराई भी उस रात ही पता चली । तो आपका फ़ोन नम्बर तो था नहीं ।
इसलिये अपने आप ही सोचकर मैंने महुआ बगीची से पीछे उनका घने पेडों वाले एकान्त स्थान पर प्रेत स्थान बना दिया । और उस स्थान के चबूतरे पर एक बोर्ड पर लिखवा दिया । कि यह पितर स्थान हैं । यहां आप जो कुछ खाने का सामान रखते हैं । वह अदृश्य आत्माओं को त्रप्त करता है । इससे लोग वहां खाने आदि का सामान रख आते हैं । और गांव में सभी बहुत खुश हैं । लेकिन..?
लेकिन..? मैंने चौंककर कहा । लेकिन क्या..?
- लेकिन ये । वर्मा जी बोले । ये सब आपके आने से संभव हुआ । इसलिये हम सभी चाहते हैं कि आप एक बार आकर ये सब देखें अवश्य ।
- देखिये वर्मा जी । मैंने सरल स्वर में कहा - जो होता है । प्रभु की कृपा से होता है । जो भी हुआ आपके भाग्य से हुआ । अगर मैं करने वाला होता । तो मैं सब जगह ही ऐसा न कर देता । लेकिन आपने जो भी बदलाव किया । उससे मुझे बेहद खुशी हुयी । अतः मैं अवश्य आऊंगा । समाप्त ।

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