शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

मायावी नगरी 1

मैं इसी प्रथ्वी के एक गुप्त स्थान पर मौजूद था । वैसे इसको एक तरीके से गुप्त कहने की कोई तुक नही हैं ।
क्योंकि यहां स्थानीय चालीस परिवार महज दो किलोमीटर की दूरी पर रहते थे । जो बर्फ़ीले क्षेत्रों में
पाया जाने वाला एक विशेष किस्म का हिरन पालते थे । और हिरन के मांस तथा उस बर्फ़ीले क्षेत्र में
पायी जाने वाली वनस्पतियों और अन्य चीजों को बेचकर जीवन यापन करते थे । ये लगभग सभी परिवार
अस्थायी रूप से बनाये गये घरों और टेंटो में रहते थे । और मौके के अनुसार अपने घरों को दूसरी जगह
भी शिफ़्ट कर लेते थे । इन परिवारों में पुरुष । स्त्रियां । बच्चे । वृद्ध सभी मौजूद थे । मुझे लगभग आदिवासियों जैसी जीवन शैली में रहते इन परिवारों को देखकर हैरत होती थी कि क्या ये प्रथ्वी की उन्नति या आधुनिक जीवन शैली से अनभिग्य है । पर ऐसा नहीं था । इस स्थान से लगभग तेरह किलोमीटर ऊपर का इलाका बर्फ़ पसन्द करने वाले पर्यटकों की पसन्दीदा जगहों में से एक था । जहां साल के सात आठ महीने अक्सर पर्यटकों का आना जाना लगा रहता था । शेष चार महीने बर्फ़ीले तूफ़ान और अत्यन्त बर्फ़वारी होने की वजह से जहाजों का आना जाना रुक जाता था । आने वाले पर्यटकों को ये परिवार जरूरत की चीजें मुहैया कराते थे । और बदले में अच्छा मूल्य और भेंट भी प्राप्त करते थे । दुनिंया के विभिन्न देशों से आये पुरुषों से आकर्षित होकर सम्भोग करने की एक परम्परा सी शुरू हो जाने के कारण इन परिवारों की महिलाओं ने तमाम सुन्दर और अलग अलग नस्ल के से दिखने वाले बच्चों को जन्म दिया था । जिससे इनकी मूल जाति नष्ट सी हो गयी थी और उसके अवशेष ही रह गये थे । इन परिवारों के गिने चुने लोग मुझसे एक शोधार्थी के तौर पर परिचित थे ।
फ़िर भी इस स्थान को गुप्त मैंने इसलिये कहा है । कि उनके रहने के स्थान से कुछ ही दूर होने के बाबजूद
घाटी में स्थित चार काटेज को उन्होंने दूर से भी नहीं देखा था । इसकी वजह थी । एक अग्यात भय ।
और इसका सबूत थे । वे शव । जो बर्फ़ के ढेर में से अक्सर निकलते थे । हांलाकि कुछ दिलेर और दुस्साहसी
किस्म के पर्यटको ने इस तरफ़ एक " चैलेंज " के रूप में आने की कोशिश की । और नतीजा । मौत । या
मौत के अनुभव जैसा । या मौत को छूने जैसा रहा ।
और इस नतीजे का नतीजा ये था । कि बेहद रहस्यमय ये जगह " बरमूडा ट्रायएंगल " जैसी प्रसिद्ध थी ।
क्योंकि इसके परिणाम बरमूडा से मिलते थे । घाटी से काफ़ी ऊंचाई पर स्थित जिस पहाड पर मैं मौजूद
था । वो " डेंजर जोन " में आता था । इस पहाड से नीचे तलहटी में जहां काटेज मौजूद थी । लगभग
32 किलोमीटर का इलाका मानव क्या पशुओं से भी अछूता रहता था । और अगर कोई गलती से इसमें
घुस आता था तो कभी वापस नहीं जाता था ? इस अछूते स्थान पर अधिकांश जगह घास युक्त और
रंगविरंगे फ़ूलों वाले पेडों से भरी थी । जिनमें वहुत तीखी दिमाग को सुन्न कर देने वाली खुशबू निकलती
थी । इस तरह इसकी बहुत कुछ कहानी भारत के गन्धमादन पर्वत से मिलती थी । जबकि इसके विपरीत मेरे पहाड से दो सौ मीटर दूर ही बर्फ़ का सिलसिला शुरू हो जाता था । बर्फ़ डेंजर जोन में भी थी । पर टुकडों के रूप में दिखाई देती थी ।
मुझे अपने जीवन में पहली बार एक अनोखी हैरत का अनुभव हो रहा था ? मैं कौन था ? ये मैं जानता
था । मैं कहां से आया हूं ? ये मैं जानता था । ये जगह कौन सी है  ? ये मुझे भलीभांति मालूम था । आज की तारीख से । अपने पिछले जीवन के बारे में एक एक बात बखूबी मुझे मालूम थी । फ़िर हैरत किस बात की थी ? ये मेरे लिये । मुझसे ही एक बडा सवाल था । मुझे हैरत तो हो रही थी । पर मैं खुद अपनी हैरत की
असली वजह नहीं जानता था ?
दरअसल ये हैरत इस बात की थी । कि मैं यहां क्यों आया हूं ? आगे मुझे क्या करना है ? यहां से मुझे कहां जाना हैं ? इस बार में स्वयं मुझे ही खुद कुछ नहीं पता था ? बस यही हैरत की वजह थी । बहुत बडी वजह
थी । और मजे की बात ये थी कि अपनी इस स्थिति से हैरत होने के बाबजूद मुझे कोई भी परेशानी महसूस
नहीं हो रही थी । और मैं इस स्थान पर कल से इस तरह से मौजूद था । जैसे मैं यहीं का रहने वाला होऊं ।
इस स्थिति को ठीक से समझने के लिये । आप उस उपन्यास की कल्पना करें । जो आधा फ़टा हुआ हो । और
आगे की कहानी आपको मालूम ही न हो । उस सीरियल की कल्पना करें । जिसके आगे की कडी आपने न देखी हो । बिलकुल ठीक यही स्थिति मेरे साथ थी । मुझे अच्छी तरह मालूम था । मैं प्रसून हूं । इस समय से लेकर अपनी पिछली जिन्दगी मुझे बखूबी मालूम थी । नहीं मालूम था । तो आगे का कोई उद्देश्य ।
क्या ये हैरत की बात नहीं थी ?
मैंने एक सिगरेट सुलगाई और निरुद्देश्य ही बर्फ़ के छोटे छोटे ढेले उठाकर फ़ेंकने लगा । शाम का धुंधलका
तेजी से फ़ैलता जा रहा था । पहाडी पर बर्फ़ीली हवाओं का अहसास तेज होता जा रहा था । रात को कोई छोटा बर्फ़ीला तूफ़ान आने के संकेत लग रहे  थे । पर मैं इन सबसे बेपरवाह था ।  मैंने जेकेट की जेबों में हाथ डाले और तेजी से घाटी में नीचे उतरने लगा । उन काटेज की तरफ़ । जहां यहां के निवासी या कोई
भी सैलानी भूल से भी नहीं जाता । काटेज में पहुंचते पहुंचते अंधेरा काफ़ी हो गया था । मैंने चर्बी का दिया
जलाकर रोशनी की । और बेड पर लेटकर " साधना " का विशेष उपयोग करते हुये ये जानने की कोशिश
करने लगा कि आखिर ये मेरे साथ क्या अजीव हो रहा है ? काफ़ी देर की कोशिश के बाद भी मुझे कोई
सफ़लता नहीं मिली । दूसरों के माइंड रीड करने वाला आज अपने को ही रीड करने में असफ़ल था । मुझे नहीं पता था कि अगले चार घन्टे बाद मेरे साथ क्या घटने वाला है ?
अगले चार घन्टे ? यानी रात के बारह बजे । जब मेरी आंख खुली तो मैं चमत्कार की तरह एक वृक्ष की
वी शेप डाली पर टहनियों की सहायता से बांधी गयी एक लम्बी बेड शीट पर लेटा हुआ था । दाता । मेरे
मुंह से आह निकली । ये सब मैंने ही किया था । और काटेज के उस गर्म और बेहद आरामदायक माहौल से
इस बर्फ़ीली रात में इस खुले में भी मैं ही आया था । पर क्यों आया था । और कब आया था ? ये मुझे अब
भी मालूम नहीं था । शाम लगभग आठ बजे के बाद । अभी आंख खुलने पर बारह बजे के बीच मेरे साथ
क्या घटा था ? ये मेरे लिये आधा रहस्य था । आधा इसलिये । क्योंकि ये मुझे भलीभांति मालूम था ।
कि मैं डेंजर जोन की उस रहस्यमय काटेज से खुद ही यहां आया होऊंगा । पेडों की ऊंची वी शेप डालियों 
पर ये बिस्तर मैंने खुद ही बनाया होगा । बस हैरत और परेशानी की बात ये थी कि मेरे द्वारा जाग्रत अवस्था जैसी स्थिति में  मेरे ही द्वारा किया गया कार्य मुझे याद नहीं था । अपने जीवन के चार घन्टे मेरे दिमाग की मेमोरी में नहीं थे । यहां तक होता । तो फ़िर भी उसका कोई हल मैं निकालने की कोशिश करता । मुझे अब भी पता नहीं था कि मैं यहां किस उद्देश्य से हूं ? और आगे क्या करने वाला हूं ? या कोई अदृश्य मुझसे क्या कराने वाला है ? कोई अदृश्य ? मेरे दिमाग में विस्फ़ोट होना चाहिये था । पर कोई विस्फ़ोट नहीं हुआ । इसका साफ़ मतलब था । कि इस वक्त मेरी स्थिति एक रोबो मेन की तरह है । जो आदेश मिलने पर एक्टिव होता है । पर मुझे आदेश देने वाला कौन था ? मैं इस स्थित को बार बार समझने की कोशिश कर रहा था । पर नाकाम था । दरअसल समझता तो तब । जब आगे के क्षणों के लिये मेरा दिमाग
कार्य कर रहा होता । मेरे लिये आगे के क्षण थे ही नहीं । किसी कम्प्यूटर किसी रोबोट किसी अन्य स्वचालित सिस्टम में भी आगे उत्पन्न होने वाली विभिन्न परिस्थियों के लिये कई आप्शन होते हैं । पर मेरे लिये उस समय कोई आप्शन ही नहीं था । किसी प्रोग्राम किये गये साफ़्टवेयर की तरह इस क्षण से लेकर अपनी गुजरी जिन्दगी का एक एक लम्हा में विचार सकता था । पर आगे का एक सेकेन्ड भी विचार करने में नहीं आ रहा था । मैं यन्त्रचालित सा पेड की डाली पर उठकर बैठ गया । और निरुद्देश्य ही नीचे लटके हुये पैर हिलाने लगा । रात का ये सुनसान वातावरण आम आदमी की रूह कंपा देने वाला था । रात को निकलने वाले स्थानीय जीव जन्तु इधर उधर घूम रहे थे । और कुछ कुछ अनोखी आवाजें पैदा कर रहे थे । पर कम से कम रात और ऐसा रहस्यमय माहौल मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते थे । मेरा पूरा जीवन ही ऐसे वातावरण और ऐसी रातों में गुजरा था । अदृश्य अलौकिक शक्तियों । अदृश्य आत्माओं के सामने ये दृश्य जीव जन्तु और ये दृश्य सृष्टि एक परसेंट भी भय या रहस्य रोमांच पैदा नहीं करती । तब उस समय पहली बार मुझे कुछ कुछ  सर्दी का अहसास हुआ । मैंने हिक्की नामक एक जडी का टुकडा जेब से निकाला और मुंह में डालकर चूसने लगा । जडी के कसैले स्वाद का रस मुंह में घुलते ही मेरे शरीर में गर्माहट फ़ैलने लगी । अचानक मैं पेड की डाली से नीचे कूदा । और ऊंची नीची जमीन पर चलता हुआ एक समतल मैदान  में आकर वहां पडी हुयी लगभग आठ फ़ुट व्यास वाली शिला पर बैठ गया । मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कश लगाता हुआ उस अनोखे मंजर को देखने लगा । और तब उत्तर दिशा में लगभग चार किलोमीटर दूरी पर मुझे एक टावर पर लगी शक्तिशाली लाइट की तरह एक प्रकाश नजर आया ।  जो इधर उधर गति कर रहा था । और जिसका दायरा लगभग चालीस फ़ुट व्यास का था । मैंने जैसे ही सिगरेट का कश खींचा । उस प्रकाश वृत से लेजर किरण के समान एक आसमानी बिजली की तरह बेहद चमकीली सफ़ेद पतली प्रकाश रेखा आकर मुझे छूनी लगी । और उस अग्यात प्रकाश से मेरा सम्बन्ध जुड गया । तुरन्त ही मुझे एक पतली सी झनकारयुक्त स्त्री आवाज सुनायी दी ।  हे । तुम । मनुष्य के जैसे । पर मनुष्य नहीं । कौन हो ? और यहां क्यों हो ? मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । यह किसी औरत का सूक्ष्म शरीर था । जो अलौकिक विध्याओं की जानकार थी । और अब स्थूल देह से नाता तोड चुकी थी । मैं जीवित मनुष्य शरीर का उपयोग भी कर रहा था । और दिव्य साधना DIVY SADHNA  के द्वारा मेरा अंतरिक्ष आदि के अन्य लोकों से सम्पर्क करने वाला लाक भी खुला हुआ था । जो सामान्य मनुष्य का बन्द होता है । इसीलिये वो मुझसे मनुष्य के जैसे । पर मनुष्य नहीं । जैसी बात कह रही थी ।  पर तुम । मैंने सूक्ष्म शरीर वाली वाणी का उपयोग किया । ताकि मेरी बात वह आसानी से समझ सके । मेरे पास आकर बात क्यों नहीं करती ? क्या तुम्हें अपने गर्भवती होने का डर है । या तुम्हें कांटा घुसने पर ज्यादा दर्द होता है ?
हे । वह मधुर घन्टियों के समान बजती हुयी हंसी । तुम साले पुरुष । औरत में ऊपर नीचे दो ही जगह देखते
हो ।  दो नही तीन । मैं भी उसी के अन्दाज में हंसता हुआ बोला । पीछे भी । नहीं चार । रसीले होंठ भी । नहीं पांच । नहीं आठ । नहीं दस । अरे नहीं टोटल । सुन्दर काया । क्या रूप बनाया । आदमी को काठ का उल्लू बनाया । अब तू इतने तेवर भी क्यो दिखाती है ?
ओमियो तारा । उसने गहरी सांस ली । वाट ए डेयर ।  तुझे में अपनी उस गुफ़ा में एक महीने तक बन्द रखूं । हायो रब्बा । ये मैंने क्या कह दिया ।
अचानक से परिवर्तित हुये उस खुशनुमा माहौल से मुझे काफ़ी अच्छा लगा । कुछ देर के लिये मैं अपनी स्थिति भूल गया । और खडा होता हुआ बोला । अब पास भी आयेगी । या वायरलैस टाक ही करेगी ।
लेकिन । वह खिलखिलाती हुयी बोली । पहले वादा करो । कि तुम मेरे सिस्टम में अपना डाटा फ़ीड नहीं
करोगे ।
अगर तेरे फ़्यूज उड जाते हैं । मैंने अचानक सचेत होते हुये कहा । तो नहीं करूंगा ।
एक झपाका सा हुआ  । और प्रकाश वृत मुझसे बीस फ़ुट दूर आकर लहराने लगा । मैंने कहा । और पास आओ । नहीं आ सकती । उसने जबाब दिया । वह मृत्युलोक की भूमि है  ?
भले ही मैं आगे की बात नहीं सोच सकता था । पर उसने जो कहा । वह तो अब भूतकाल हो चुका था ।
इसी भूतकाल में मेरे दिमाग में विस्फ़ोट हुआ । वह मृत्युलोक की भूमि है । तो वह कहां खडी थी ?
बीस फ़ुट के बाद ही दूसरा लोक । भूमि से छूता हुआ । असम्भव ?
मैंने अपने जीवन में अनेकों रहस्य देखे थे । वह चार किलोमीटर दूरी से महज आठ सेकेंड में एक झपाके  से मेरे पास आयी । ये मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था । वह जिस प्रकाश वृत शरीर में थी । ये मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था । ये कोई प्रथ्वी से अलग अन्य लोक होता । तो भी वह सब मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था ।
रहस्य की बात ये थी कि सिर्फ़ बीस फ़ुट के फ़ासले के बाद वह कह रही थी कि वह मृत्युलोक की भूमि है । जहां मैं था । तो वह कहां खडी थी ? ये मेरे लिये बहुत बडा रहस्य था । और एक तरह से असम्भव था ।
पर ज्यादा समय नहीं था । और मजबूरी थी कि मैं आगे सोच नही सकता था । आगे के लिये कुछ तय नहीं कर सकता था । मुझे गुजरे हुये से ही अपने को तलाशना था । इस रहस्य को जानना था । और उसमें वह औरत बडे काम की चीज हो सकती थी । और इसके लिये मुझे उसकी रसीली बातों से वही रास्ता कारगर लगा । जो एक औरत की सबसे बडी कमजोरी होती है । और एक आदमी के लिये । सबसे ज्यादा कमजोर करने वाली । ऐसा ही लक्ष्य हो । ये मानकर मैंने अंतरिक्ष की भाषा में जहां अधिकतर स्त्री पुरुष के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध होता ही नहीं है । वही कामशस्त्र चलाया । और उसी भाषा में बोला । ये लाइट ही चमकायेगी देवी  । या रूप भी दिखायेगी ?
ओमियो तारा । बीस फ़ुट की दूरी से मुझे उसकी गहरी सांस अपने चेहरे पर महसूस हुयी । मैं कुछ गलत
तो नहीं कर रही ? लेकिन शायद मैं भी तो कब से प्यासी हूं । उफ़ । स्त्री का सौन्दर्य अगर कोई दीवाना बनकर न देखे । तो उसकी कीमत क्या ? उफ़ । भंवरा किसी कली को बार बार न चूमे ? तो कली कैसे फ़ूल
बने । फ़िर ये मनुष्य तो है नहीं । जो मैं कोई गलती कर रही होऊं ?
मैं उसकी फ़ुसफ़ुसाहट को आराम से सुन रहा था । और हिन्दू शास्त्र अनुसार पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की आठ गुणी अधिक कामवासना से भी बडकर अप्सराओं और यक्षणियों की उन्मुक्त भोग इच्छा से सैकडों बार का पूर्व परिचित था । ये गलत होता । तो भी एक अलौकिक पुरुष के सामीप्य से नागिन की तरह फ़ुंकारती
उसकी वासना उससे कुछ भी करा सकती थी । इतिहास में इसके हजारों उदाहरण मौजूद हैं । 
लिहाजा वही हुआ । कुछ ही देर मैं वह तीस फ़ुट लम्बी औरत और एक खूबसूरत भरे बदन की यक्षिणी के समान नजर आने लगी । बडे पपीते की आकृति के जैसे उसके स्तन थे । उसके नितम्ब अप्सराओं के समान पुष्ट थे । उसके शरीर पर रत्नमालाओं के आभूषण थे और कपडे का नामोनिशान नहीं था । उसके दोनों पुष्ट
उरोजों के बीच लटकती हुयी दिव्य मोतियों की माला झिलमिला रही थी  । जो दो पहाडों के बीच बहती हुयी स्फ़टिक मणि के समान चमकते हुये जल वाली नदी जैसी मालूम पड रही थी । उसकी योनि गहरे  गुलाबी रंग की आभा वाली थी । जो उसके अयोनिजा होने का सबूत थी । ये दैवीय योनियों की पहचान थी । ये मेरे लिये दूसरा झटका था । क्योंकि मेरे अनुभव के अनुसार वह देवयोनि नहीं थी ।
बोय..बोय..। हठात मेरे मुंह से निकला । क्यों तारीफ़ करूं । उसकी । जिसने तुझे नहीं बनाया ।
मुझे अपनी दिव्य साधना DIVY SADHNA  के वे शुरूआती दिन याद आ गये । जब मैंने और प्रोफ़ेसर
दीक्षित ने साधना आरम्भ की थी । हमारी मुलाकात करनपुर विलेज में बरी वृक्ष के नीचे सूबेदार बाबा से
हुयी थी । और उसने बरगदिया यक्षिणी को सिद्ध करने को कहा था । दरअसल प्रोफ़ेसर दीक्षित को भरे
बदन की मोटी औरतों से sex की बेहद चाहत रहती थी । वृषभ जाति का पुरुष । प्रोफ़ेसर दीक्षित । औरत
और sex के मामले में वास्तव में सांड जैसा ही व्यवहारी था । कई औरतों के सम्पर्क में रहने के बाद भी वह
हमेशा यही महसूस करता था । कि उसे त्रप्त कर सके । ऐसी औरत उसे अभी तक नहीं मिली । सूबेदार बाबा जो हमारी बात गौर से सुन रहा था । उसने कहा । कि तुम लोग बरगदिया यक्षिणी को सिद्ध कर
लो । वो तुम्हें हर तरह के मजे करायेगी । कैसे हर तरह के मजे ? मैंने पूछा ।
वह हर बार रात को तुम्हें नये रूप । नये सौन्दर्य । और नये किस्म के शरीर में मिलेगी । सूबेदार अर्थपूर्ण
ढंग से बोला । मतलब तुम्हें लगेगा । कि तुम प्रतिदिन नयी और मनचाही महबूबा के साथ हो । इतना ही
नहीं । वह तुम्हारी इच्छा के अनुसार कुछ ही मिनटों में शरीर की शेप में बदलाब कर लेगी । उदाहरण के
लिये तुम चाहो कि उसकी कमर कुछ और पतली और स्तन कुछ और बडे होते । तो वह ऐसा ही कर लेगी ।
इन सबके बाद तुम किसी खास औरत की चाहत रखते हो । तो तुरन्त ही वह तुम्हारी इच्छानुसार वही औरत के समान बन जायेगी । इसके बाद....एक यक्षिणी के साथ भोग का आनन्द ही अलग है ? सूबेदार
बाबा कहीं खोया खोया सा बोला ।
बोय..बोय..। उस दिन भी मेरे मुंह से निकला था । as you like it .. ये बरगदिया यक्षिणी  सिद्ध कैसे होती है ? सूबेदार बाबा हमें विस्तार से बताने लगा । उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी । वह कहीं खोया हुआ था । 

मायावी नगरी 2

हे दिव्य । सहसा मैं उसकी जलतरंग जैसी आवाज सुनकर मानों ख्यालों से बाहर आया । तुम कहां खोये हुये हो ? क्या मैं अच्छी नहीं हूं ? या तुम्हारे दिल मैं कोई और रहती है ?
अन्य लोक के प्राणियों से बात करने का अच्छा अभ्यास होने के बाबजूद भी । अपनी उस विचित्र और आगे की स्थिति पर कोई नियन्त्रण न होने के कारण । मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे कैसे बात करूं और क्या बात करूं ? फ़िर भी मैंने नशे कैसी अवस्था में एक फ़ालतू सवाल ही उस समय पूछा । तुम्हारा नाम क्या है ? अदभुत सुन्दरी ? और तुम किस योनि की हो ?
एक मधुर हंसी के साथ । उसकी दंतपंक्ति बिजली के समान चमकी । और वह बोली । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी । और मैं किसी योनि की नहीं हूं । मैं सिर्फ़ अहसास हूं ? डियेना मेरी स्थिति के घटकों के अनुसार मेरा नाम हुआ । यानी जैसे मेरे अणु परमाणु हैं । उस के हिसाब से मुझे अभी डियेना कहते हैं । दीपा और  रोशनी भी मेरे नाम नहीं हैं । क्योंकि मैं अभी तुम्हारे सम्पर्क से जुडी हूं । इसलिये डियेना कनवर्ट होकर खुद ही तुम्हारी भाषा के अनुसार पहले दीपा और फ़िर रोशनी हो रहा है । तुम्हारी भाषा हिनदी सनसकरत जैसे शब्द बना रही है । अगर मैं किसी दूसरी भाषा वाले के पास होती । तो ये डियेना नाम उसी भाषा के अनुसार कनवर्ट हो जाता । जैसे मान लो तुम्हारा नाम आदित्य होता तो मुझे सूर्य की फ़ीलिंग होती । तुम्हारा नाम राजीव होता । तो मुझे स्वतः ही कमल की फ़ीलिंग होती ।
जैसा कि वह बता रही थी । अंतरिक्ष और सूक्ष्म शरीर के इस स्वचालित सिस्टम या विग्यान से मैं बखूबी
वाकिफ़ था । फ़िर भी उस बेहद रहस्यमय रात मैं मेरे मुंह से नान स्टाप हंसी के ठहाके निकलने लगे । ये
ठहाके उन प्रथ्वी वासियों की मासूम अग्यानता पर थे । जो पिछले पचास साठ सालों में विग्यान के मुठ्ठी
भर आविष्कारों पर इतराते थे । दरअसल मुझे भरपूर हंसी इस बात पर आयी थी कि कोई वैग्यानिक मेरी
जगह दीपा की बात सुन रहा होता । तो उसे कैसा फ़ील होता । क्या वह अपने बाल नोचता ?  चलो
घटक के अनुसार नाम वाली बात हाजमोला खाकर हजम भी कर लेता । पर वह कह रही थी कि वह किसी
योनि से नही है । और सिर्फ़ अहसास है ? ये बात सुनकर मेरे जैसा दिव्य विग्यानी झटका खा गया । तो
पदार्थ विग्यानी क्या करता ?
हे । वह फ़िर मेरे साथ कांच के टुकडों के टूटने जैसी खनखनाती हुयी हंसी हंसी । तुम क्यों हंस रहे हो ?
क्या मेरे मादक अंग तुम्हें बैचेन नहीं कर रहे ?
मेरे मुंह से अबकी बार निकलने वाले ठहाके पन्द्रह मिनट से पहले किसी कीमत पर नहीं रुके । और मैं बोला ..तुम्हारे मादक अंग..कहां हैं । तुम्हारे मादक अंग ? सिनेमा के परदे पर खडी डायलाग बोलती । तू सेलिना जेटली । केटरीना कैफ़ । जैसी मेरी कोई हीरोइन । आज की रात तू मुझे पागल करके ही छोडेगी क्या ? तू 3 D परदे का अहसास भी नहीं है । जिसे सच मानता हुआ । कल्पना में खोकर मैं तुझसे संभोग की खुशनुमा कल्पना करूं ? और जैसा कि मैं भूतकाल से ही सोच पा रहा था । परिणाम मेरी आशा के अनुसार निकला । जो कि मात्र एक संयोग ही था । क्योंकि भविष्य मेरे नियन्त्रण में नहीं था । वह क्रोधित हो गयी । और उसने मुझे एक  अदृश्य शक्तिशाली किरणों के घेरे मे बांध दिया । और इसका रिजल्ट वही था । जो मुझे कुछ कुछ अहसास होने जैसा था । मेरे ठहाके उसी किरण घेरे में कैद होकर बार बार गूंजने लगे । यानी वे सामान्य क्रिया से आकाश में जाकर अक्षर के द्वारा होते वायव्रेशन में विलीन होने वाले नहीं थे । जैसा कि साधारण बातचीत के शब्द जाकर हो जाते हैं । अब ये किरण घेरा जब तक रहता । ठहाके किसी रिपीट मोड पर सेट सी .डी की तरह मुझे सुनाई ही देते रहते । और इनका वाल्यूम या अन्य कोई परिवर्तन भी मैं अपनी इच्छा से नहीं कर सकता था ।
साली कुतिया । न चाहते हुये भी मन ही मन मेरे मुंह से गाली निकल गयी । मैं पहले ही अपने भविष्य
खो जाने की टेंशन से परेशान था । और ये तूने मेरे ही हा हा हो हो हू हू ही ही की रिंगटोन मेरे आगे पीछे
फ़िक्स कर दी ।
दरअसल हम दोनों के ही सामने एक बडी समस्या थी । न तो मैं उसका माइंड रीड कर सकता था । क्योंकि
उसके पास स्थूल शरीर ही नहीं था । तो माइंड कहां से होता ? और वह मेरे पास स्थूल शरीर होते हुये भी
मेरा माइंड रीड नहीं कर सकती थी । क्योंकि मैं स्थूल शरीर की भूमिका में नही था । दूसरे यदि मैं उस
भूमिका में होता भी । तो मैं उसके किसी काम का नहीं था । क्योंकि मनुष्य से । परिचय के रूप में कोई
भी अलौकिक आवेश अवैध होता है । जिसकी सजा अलौकिक जगत में बहुत बडी है ।
you idiot ..किन्नर ( हिजडा ) । वह अपने दांत पीसती हुयी बोली । हायो रब्बा । ये मैं क्या बोली ?
ओमियो तारा । ओमियो तारा । फ़िर वह पहले की तरह ही खिलखिलाने लगी ।
दीपा डार्लिंग । आय म प्रसून । ओनली वन प्रसून । वन मेन प्रसून । परफ़ेक्ट मेन प्रसून । इस वक्त । वक्त का
मारा प्रसून । जिसका फ़्यूचर कहीं खो गया वो प्रसून । और तू कौन है ? एक यक्षिणी या कुलक्षिणी ।
या इस मायावी परदे की बनाबटी हीरोइन ? और ये साला । ओमियो तारा कौन है ? जिसकी माला
तू बार बार जप रही है ?
ओमियो तारा । उसके चेहरे पर भय के भाव आये । ये तो नास्तिक है ? ये कैसा दिव्य है ? जो भगवान
ओमियो तारा को नही जानता ? सर्व शक्तिमान ओमियो तारा को नहीं जानता । अरे पागल प्रसून वही
तो सबका भगवान है ?
ये शब्द जो मैंने ऊपर कहे मेरे मुंह से स्वतः ही निकल रहे थे । मैंने पहले ही बताया । भूतकाल पर मेरा पूरा
नियन्त्रण था । पर अगले ही पल मैं क्या करूंगा ? अगले ही पल मैं क्या कहूंगा । यह मैं तय नहीं कर सकता
था । मेरा भविष्य कहीं अग्यात में खो गया था ।
अलौकिक दुनियां । के इस उलझे से लगने वाले कथानक को ठीक से समझने के लिये आपको ये हर हालत
में याद रखना होगा । कि इसी प्रथ्वीलोक के उस डेंजर जोन काटेज से । मेरे दिमाग की मेमोरी या सिस्टम
से भविष्य नाम का वह भाग गायब हो गया । जो आपके आने वाले कल को आज या गुजरे हुये कल से जोडता है । जैसे आज 20  तारीख हो । और आपको अगले महीने या अगले साल तक क्या क्या करना है । ये बहुत लोगों को पता होता है । अगर बहुत ही free टायप आदमी हो । तो उसे भी पता होता है कि शाम को उसे क्या करना है । पर मुझे अगले क्षण क्या करना है । इसका ही पता नहीं था । ऐसी स्थिति में मैं बिना पतवार की नाव था । बिना ड्रायवर के चलता हुआ वाहन था । ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ था । किसने किया था । मुझे कुछ नहीं पता । अपनी इस स्थिति को मैंने डेंजर जोन काटेज से ही महसूस किया था । अतः ये शायद वहीं से शुरू हुयी थी । जबकि पिछली जिन्दगी में मैं अब भी वही वन मेन प्रसून था ।
अलौकिक दुनियां की रहस्यमयी सुन्दरी ने मेरा किरण घेरा तोड दिया था । मैं भूतकाल में विचरता हुआ
भविष्य की कैद से आजाद होने की कोशिश कर रहा था । और इस कोशिश में बाबाजी भी मेरे साथ नहीं
थे । बाबाजी कहां थे । ये भी मुझे पता नहीं था । दिव्य साधना DIVY SADHNA  की कनेक्टविटी जोडना
तो उस हालत मैं कतई सम्भव ही नहीं था । मैंने दीपा की तरफ़ देखा और एक सिगरेट सुलगायी । तीस फ़ुट
की वह दूधिया बल्बों की झालर जैसी जगमगाती डिजिटल हसीना बेहद आश्चर्य से मुझे ही देख रही थी । और मेरी खुद समझ में नहीं आ रहा था । कि अगले पल मैं क्या करने वाला हूं ?
दरअसल भूतकाल की मेमोरी मुझे  4 D के रिजल्ट दे रही थी । और तब पहली बार मुझे आश्चर्य हुआ ।
अब आप सरलता से इसको यूं समझिये । 4 D का विचार बहुत देर से आते आते मैं दिमाग के उस हिस्से
मैं पहुंच गया । जहां 4 D रिलेटिव डाटा फ़ीड था । यह समय मेरी जिन्दगी मैं आज से दस साल पहले का था । जब मैं बीस साल का साधक प्रसून था । और 4 D नामक बला से पहली बार परिचित हुआ था ।
मैं 4 D को केवल थ्योरी के रूप में जानता था । 4 D के प्रक्टीकल से मेरा वास्ता आज तक न पडा था ।
या कहिये । आज तक नौबत ही न आयी थी । और तब । तब ?  wonderful ..? मेरे दिमाग में स्वाभाविक
ही पहली बार विस्फ़ोट हुआ । मैं एक्टिव हो सकता था । भले ही दस साल पीछे जाकर । बल्कि एक स्वाभाविक ही अनजाने में घटित हुयी क्रिया से मैं एक्टिव हो चुका था । अब मैं बीस साल का प्रसून था ।
और उस दायरे में रहकर मैं नये हालातों का मुकाबला कर सकता था । भले ही मैं तीस साल के प्रसून का
भविष्य न जान पाता । और अब मैं आगे सोच सकता था । ये एक तरह से मेरे गुजरे हुये भूतकाल में आज
का भविष्य एक अनोखे रियेक्शन से बिना प्रयास खुद ब खुद  जुड गया । और मेरे स्वभाव में बीस साल
पहले का प्रसून आ गया । मैंने दीपा की तरफ़ देखा । स्वाभाविक ही मेरी लोलुप निगाह उसके स्तनों पर
गयी । अच्छे हैं । मैं बीस साल पहले की भावना अनुसार बोला ।
क्या ? वह हडबडायी । क्या अच्छे हैं ? ओमियो तारा । ये दिव्य तो बडा ही मायावी है ?
नहीं । तुम्हारी चमकती माला के मोती । मैंने कहा । क्या तुम एक माला मुझे भी दोगी ?
अवश्य । उसने एक मादक अंगडाई ली । पर तुम्हें मेरे पास आना होगा । एक कली खिलने की तमन्ना में
भंवरे का इंतजार कर रही है ?
तुम ही मेरे पास क्यों नहीं आ जाती । मैंने मन ही मन तेजी से सोचते हुये कहा । बीस फ़ुट की दूरी के कारण ही अपने को क्यों तरसा रही हो ?
मेरी बात सुनकर वह तेजी से कसमसाई । उसने बैचेनी से पहलू बदला । और अपने होठों पर जीभ फ़िराई । दाता । मेरे मुंह से आह निकली । अपने उस खोये हुये भविष्य में । अन एक्टिव स्थिति में । मैं धोखे से भी
इस मायावी । 4 D में प्रवेश कर जाता । तो बरमूडा ट्रायएंगल मैं गायब हुये जहाज या अन्य चीजों की
तरह कभी वापस नहीं लौट सकता था ? अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह में घुसना तो बहुत आसान था ।
पर कोई भी अर्जुन इस 4 D का चक्रव्यूह नहीं तोड सकता था । द्वैत के महायोगियों की यह भूमि थी ।
श्रीकृष्ण जैसे गिने चुने  योगी ही इसका छेदन भेदन कर सकते थे । द्वैत के गोरखनाथ आदि कुछ योगियों को इस कला का कुछ कुछ ग्यान था । लेकिन अद्वैत के संतो के लिये ये चुटकी बजाने का खेल था । जिनमें
सतगुरु कबीर साहेब  का नाम सर्वोपरि था । परमहंस के इशारे से भी भयभीत हो जाने वाली ये 4 D
रूपी महामाया एक विलक्षण रहस्य ही थी । तो आइये पहले आपको उस थ्योरी के अनुसार जो मेरी मेमोरी
में 4 D डाटा रूपी जो जानकारी फ़ीड थी । 4 D का रहस्य बताता हूं ?

मायावी नगरी 3

भले ही मैं PAST में 10 साल पीछे BACK  होकर एक्टिव हुआ था । पर अब पहले से सकून महसूस कर रहा था । कुछ न करने से कुछ भी करना अधिक अच्छा था । एक्टिव होते ही मेरे दिमाग में जो सवाल
स्वतः उत्पन्न हुये वे ये थे । आखिर मेरा भविष्य कहां खो गया था ? इसके पीछे क्या कारण था ? या
इसके पीछे कौन था । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी की हकीकत क्या थी ? ओमियो तारा नाम का ये
नया नया पैदा हो गया भगवान कौन था ? दीपा जिस स्पेस में थी । उसकी हकीकत क्या थी ? 10 साल पीछे जाने पर मेरा ग्यान और शक्ति जो उसी स्थिति के अनुसार लगभग 70 % कम होकर 30 %  ही रह
गये थे । उनमें क्या मैं इन विकट  स्थितियों का मुकाबला कर पाऊंगा ? लेकिन जिन्दगी में कुछ समय
ऐसा आता है । जब कोई भी इंसान अपनी चलाने । या अपनी शर्तों पर काम करने की स्थिति में नहीं होता । जैसे मिसाल के तौर पर समुद्र में डूबता हुआ आदमी ये निर्णय नहीं ले सकता । डूबूंगा । वो कोई बात नहीं ।पर पिज्जा खाकर ही डूबूंगा ? इस तरह ये शेर की सवारी थी । जिस पर बैठे रहना और उतर जाना दोनों
ही खतरनाक थे । सबसे पहले मैंने 4 D का रहस्य जानने का फ़ैसला किया । अगर वह 4 D स्पेस नहीं था ।
तो बाकी युद्ध मेरे लिये आसान था । लेकिन अगर वह 4 D स्पेस था  । तो शतरंज की बिसात की तरह
अगली चाल क्या गुल खिलायेगी ? ये जानना किसी दिग्गज के लिये भी मुश्किल था । लिहाजा मैंने वही
किया । प्रत्येक योगी की तरह मेरी भी अपनी एक स्टायल थी । मैंने एक ढेला उठाया । अभिमन्त्रित किया ।
और उस बीस फ़ुट दूर अननोन जोन में उछाल दिया । जैसी कि मुझे अपेक्षा थी । उस स्पेस की सीमा में जाते ही ढेला गायब हो गया । लेकिन इसका एक दूसरा भी पहलू भी हो सकता था । वास्तव में ढेला कहीं गायव नहीं हुआ हो ? बल्कि वह फ़ेंकी गयी दूरी तय करके वहीं जमीन पर गिरा हो । जहां उसे गिरना चाहिये ? इस रहस्य को ठीक से समझने के लिये आपको कहानी के पीछे की वह घटना बताता हूं । जब चार किलोमीटर की दूरी आठ सेकेंड में तय करके दीपा एक झपाका स्टायल में मुझसे बीस फ़ुट की दूरी पर
आकर रुक गयी थी । ये योग विध्या का एक तरह से बेहद मायावी गुप्त और रहस्यमय खेल था । वास्तव
में दीपा सिर्फ़ अपनी जगह हिली भर थी । और चार किलोमीटर का फ़ासला बीस फ़ुट के गैप में सिमट
गया था । अब जैसे दीपा मुझसे बीस फ़ुट दूर थी । अगर मैं 19.90 फ़ुट का फ़ासला खुद तय करके उसके पास पहुंच जाता । तो भी वह मुझसे बीस फ़ुट दूर ही रहती । और अगर ऐसा था । तो इसका अर्थ था ।
कि दीपा 100 % मायावी 4 D स्पेस में थी । जो कि सूक्ष्म शरीर सिस्टम अनलाक होने के कारण मुझे
दिख रहा था । और आम आदमी को नहीं दिख सकता था । और इसका साफ़ सा मतलब था । कि वहां
प्रथ्वीलोक का ही स्पेस था । मुझे लगता है कि आपको इस उलझाऊ मैटर को समझने में काफ़ी कठिनाई
हो रही है । इसको और समझिये । जिस तरह  आप इंटरनेट पर कोई blog  या साइट खोले हुये हैं । और वह दिल्ली के मालिक की है । और आप हरिद्वार में वह साइट खोले हुये हो । इसके बाद आपने आस्ट्रेलिया की साइट खोली । इसके बाद आपने लास वेगास की साइट खोली । इसके बाद आपने यूक्रेन की साइट खोली । तो कितने स्थान और कितनी दूरी आपकी समझ से बदल गये । लेकिन साइट से आपकी दूरी सिर्फ़ उतनी ही है । जितनी दूर आपका कम्प्यूटर है । चेतन दृष्टा ज्यों का त्यों है । सामने का चित्रपट ज्यों का त्यों है । सिर्फ़ उस  पर दृश्य का बदलाब हो रहा है । जो आपको मन से ही तो महसूस हो रहा है । लेकिन फ़िर भी 4 D स्पेस मेरे लिये वो चक्रव्यूह था । जिसमें से बाहर आना मुझे नहीं पता था । और ऐसी हालत में मेरे ग्यान की ये बडी बडी बातें सिर्फ़ गाल बजाऊ ही थी । मैंने दीपा की तरफ़ देखा और सोचा कि ऐसे हालातों
में मुझे क्या करना चाहिये ? कुछ विचार थे । जो मेरे दिमाग में तेजी से आ रहे थे । पहला 4 D स्पेस का
रहस्य और प्रक्टीकल अच्छे अच्छे योगियों के लिये दुर्लभ होता है । अगर इसमें मैं सफ़ल हो जाता । तो प्रकृति के अनेक रहस्य मेरे सामने खुल जाने थे । कोई क्रिया ऐसी भी हो सकती थी कि प्रकृति पर मेरा
नियन्त्रण हो जाता । और इसके रिस्की प्वाइंट ये थे कि मैं अपना मूल भी खो बैठता । दूसरा अगर इसको छोड भी दिया जाय । तो मेरा भविष्य खो चुका था । तीसरा जीवन में खतरा और मौत पग पग पर होते हैं । तो इंसान इसके डर से क्या क्या चीज त्याग देगा ? अपने ऐसे ही विचारों के झंझावात में मैंने 4 D चक्रव्यूह का रहस्य जानने का निश्चय कर लिया । दूसरे शब्दों में उस समय मेरे पास इसके अलावा उसी
हालत में लौट जाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था । इसलिये कर या मर । इसलिये आर या पार ?
मैंने एक सिगरेट सुलगायी । और तीस फ़ुट की उस डिजिटल सुन्दरी को देखते हुये मजाक में कहा । दीपा डार्लिंग । तुमने सम्भोग के लिये थोडा गलत आदमी नहीं चुना क्या ? दरअसल तुम्हें खली को चुनना चाहिये था । किसी w w F को चुनना चाहिये था । किसी हट्टे कट्टे फ़्रांसीसी या नाइजीरियन को चुनना चाहिये था । ये तुमने चींटे से हथिनी की सुहागरात वाला फ़ार्मूला मेरे ऊपर ही क्यों अपनाया ?
ओमियो तारा । उसने अपनी छातियों पर हाथ रखते हुये घबराकर कहा । हे । दिव्य । तुम किस तरह की
बात कहते हो  ? GOD ओमियो तारा को पता लग गया । तो मेरा क्या होगा ?
उसकी बात की परवाह न करते हुये मैं तेजी से अपनी स्थिति पर विचार कर रहा था । मैंने कहा । बहुत देर
से तुम किसी देवी देवता की तरह खडी हो । किसी आसन पर बैठ जाओ । तब संभवतः वह मेरी अग्यानता
पर आश्चर्यचकित होकर हंसी । और दूसरे ही पल सरकार स्टायल में एक सुसज्जित सिंहासन पर बैठ गयी ।
अब मुझे पक्का यकीन हो गया कि वह 4 D स्पेस ही था । 4 D स्पेस क्या बला होता है । इस बात पर विचार करना और तेजी से निर्णय लेना अब आवश्यक था ।
हमारी प्रथ्वी और इस पर उपलब्ध तमाम चीजें 3 D होती हैं । यानी Three Dimension यानी त्रि आयामी । त्रि आयामी । का मतलव लम्बाई । चौडाई या मोटाई । और ऊंचाई । कोई भी वस्तु या पदार्थ
में ये तीन किसी न किसी रूप में कम ज्यादा होते ही हैं । और हमें एक मनमोहक सृष्टि का अहसास होता है । पर वास्तव में क्या ये पूरा सत्य है । हरगिज नहीं । ये उस सत्य का प्रतिबिंब बन रहा है । जो मूल सत्य और इस सत्य के मध्य है । दरअसल अखिल ब्रह्माण्ड सृष्टि का मेरे ग्यान के अनुसार मूल सिद्धांत यही है । इसे ठीक से समझने के लिये पहला उदाहरण जल का लेते हैं । आप दस लीटर जल को फ़ैलाकर विभिन्न आकार दे सकते हैं । जैसे बाल्टी में । जैसे परात में । जैसे जमीन पर । जैसे पौली बैग में । इसी दस लीटर जल को बर्फ़ के रूप में जमाकर और हजारों लाखों आकार दिये जा सकते हैं । फ़िर इसी जल को भाप बनाकर असंख्य आकार दिये जा सकते है । फ़िर इसी जल को गैस रूप में और भी रूपों में बदला जा सकता है । अब सवाल ये है कि इन तमाम आकारों में से जल का वास्तविक आकार क्या है  ? और यही जल तेजी से तुरन्त हमारी इच्छानुसार किसी भी रूप में परिवर्तित हो जाय । तो कैसा रहे ? यही 4 D स्पेस का मूल रहस्य है । अब क्योंकि ये सारी क्रियायें प्रकृति के  नियम के तहत प्रतिक्रिया और एक निश्चित समय में रूपांतरित होती है । क्योंकि Three Dimension । TIME ZONE के अंतर्गत ही आता है । जिसे कालचक्र भी कहते हैं । लेकिन यदि कोई ZONE ऐसा हो । जो टाइम से मुक्त हो । तो इच्छानुसार तेजी से आकृतियां बदली जा सकती है । 4 D स्पेस की वास्तविकता को इसी तरह समझा जा सकता है  । जल की ही तरह हम लकडी । लोहा या अन्य किसी भी पदार्थ के साथ ये घटना कर सकते हैं । क्योंकि असल में तो सभी अणु परमाणु ही हैं । जो TIME ZONE  की कैद में एक निश्चित समय तक उस रूप आवरण में
बने रहने को विवश है । अब ये 4 D स्पेस की डिजिटल कन्या । डियेना उर्फ़ दीपा उर्फ़ रोशनी मुझसे कैसा
सम्भोग चाहती थी ? मैं बखूबी समझने लगा था । पर जानबूझकर अन्जान बन रहा था । वह सम्भोग क्या होता ? कैसा होता ? और किस तरह होता ? इसको समझाने के लिये मैं इसी पदार्थ जगत के उस दुर्लभ रहस्य को बताता हूं । जिसको कई बार देखने के बाबजूद आपने मोटे तौर पर भी नहीं समझा होगा । वह उदाहरण है । किसी भी टाकीज में बैठकर मूवी देखना । 4 D स्पेस क्या होता है । और उसमें क्या परिवर्तन
हो जाते हैं । उसे समझने के लिये इससे सरल और रोचक उदाहरण मेरी निगाह में दूसरा नहीं है । अब
थोडी देर के लिये फ़िल्म की शूटिंग करने वाले कैमरे के लेंस और लेंस होल को 4 D स्पेस का entry gate मान लीजिये । कोई भी आर्टिस्ट इसके सामने आते ही रियल टू रील में परिवर्तित हो जाता है । यही रील 2nd स्टेप में मूवी थियेटर में प्रोजेक्टर लाइट के सामने जाकर रंग बिरंगे फ़ोकस में बदल जाती है । जो हमारे सिरों के ऊपर से होता हुआ सिनेमा के परदे पर पड रहा है ।  3rd स्टेप में वह परदे पर जाकर आर्टिस्ट की उसी गतिविधि का एक चित्रमय रूप ले लेती है । और ठीक वही दृश्य प्रस्तुत करती है । जो कैमरे के सामने घटा था । अब जरा सोचिये । असली सत्य क्या है ? वह रील ? या वह फ़ोकस  ? या परदे पर बनता चित्र ? अब ये संसार क्योंकि भृममात्र है । और वह फ़िल्म कृतिम है । असली 4 D स्पेस में क्या होता है ? फ़िल्म की शूटिंग करने वाला आर्टिस्ट तो शूट के बाद मूल रूप में बचा रह गया  । इसकी शूटिंग करने वाला कलाकार 1st स्टेप में ही हमेशा के लिये गायब होकर पहले रील के घटकों में बदल गया । और 2nd स्टेप में शीघ्र ही स्वतः वह फ़ोकस की तरह हमेशा के लिये ही अणु परमाणुओं में बदल गया । यहीं आकर सिनेमा और 4 D स्पेस में अंतर हो जाता है । सिनेमा की रील में मान लीजिये । 15  आर्टिस्ट है । तो वो रील में भरा हुआ ही एक्शन करेंगे । यह परिवर्तन फ़ोकस में भी हो रहा है । और परदे पर भी हो रहा है । लेकिन उनका संचालन केंद्रक प्रोजेक्टर लाइट के हाथ में है । यानी केन्द्रक एक ही है । लेकिन 4 D स्पेस में घुसने वाले प्रत्येक आर्टिस्ट का केन्द्रक वह स्वयं होता है । और उसकी मेन स्थिति फ़ोकस वाली होती है । न कि परदे वाली ? इसलिये आप पूरा ध्यान इसी फ़ोकस पर लगायें । जिसकी प्रोजेक्टर लाइट यानी ऊर्जा केन्द्र उसी फ़ोकस में ही होता है । न कि किसी अन्य स्थान पर । इस तरह जीता जागता आदमी फ़ोकस में बदल जाता है । क्या ऐसी शूटिंग करना कोई पसन्द करेगा ? जिसमें आर्टिस्ट की आरीजनलिटी ही चेंज हो जाय । दीपा मुझसे यही तो कह रही थी । मैंने आसमान की तरफ़ देखा । उस रहस्यमय शान्त रात में असंख्य तारों का झिलिमिलाता आकर्षण भी मुझे बेकार लगा ।
ओमियो तारा । हठात मेरे मुंह से निकल गया । दीपा ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा । क्रमशः ।

पिशाच का बदला 1

16 june 2007    63 वर्षीय साहिब सिंह वर्मा मजबूत कद काठी वाले धनाडय व्यक्ति थे । 42 सदस्यों वाले साहिब सिंह का संयुक्त परिवार और उनका अमीरी रहन सहन पुराने जमाने के किसी जमीदार की याद दिलाता था ।
साहिब सिंह खुद लेखपाल पद पर सरकारी नौकरी कर चुके थे । और उनके आठ पुत्र भगवान की कृपा से पुलिस । इनकम टेक्स । इंजीनियर जैसे पदों पर नौकरियां कर रहे थे । कुल मिलाकर पैसा उनके यहां आता नहीं था । बल्कि बरसता था । नौकरी के अलावा खेती । ट्रेक्टर और ट्रकों से उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती थी ।
साहिब सिंह से मेरी मुलाकात । मानसी विला । पर कुछ ही देर पहले शाम तीन बजे हुयी थी । पांच हजार वर्ग मीटर जगह में बना मानसी विला चार मंजिला महल के जैसा था । जिसके ऊपर की तीन मंजिले आफ़िस के उद्देश्य से किराये पर उठी हुयी थी ।
और ग्राउंड फ़्लोर पर दो हजार वर्ग मीटर में बना सेपरेट पोर्शन नीलेश दी ग्रेट के निजी प्रयोग के लिये था । शेष तीन हजार वर्ग मीटर की भूमि आफ़िसों के वाहन आदि के उद्देश्य से बनी थी ।
 नीलेश मेरा मित्र और एक अच्छा साधक था । मानसी उसकी प्रेमिका का नाम था । मानसी विला में नीलेश के परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रहता था । उसकी देखभाल के लिये महादेव और ऊषा नामक दम्पत्ति नियुक्त थे । जो आसाम के रहने वाले थे ।
मानसी विला की उपरली तीन मंजिलो से ढाई लाख रुपया मंथली किराया आता था । जो नीलेश दी ग्रेट की पाकेट मनी के काम आता था । इस सबके बाबजूद मानसी विला पर मेरा या नीलेश का मिलना ईद के चांद जैसा ही था ।

इसलिये साहिब सिंह को एक इत्तफ़ाक के तौर पर जब मैं मिल गया । तो उन्हें बडी राहत महसूस हुयी ।
शुक्र है । शुक्र है कि आप मिल गये । वह बेहद खुशी से बोले । आप ही प्रसून जी हैं न ? लगातार छह दिनों से आपको कितने स्थानों पर तलाश किया तब जाकर आज आपके दर्शन हुये । आपका मोबायल फ़ोन भी स्विच आफ़ बता रहा था । खैर । मेरा नाम साहिब सिंह वर्मा है । और मैं रिटायर्ड लेखपाल हूं । आपके बारे में मुझे यादव ट्रांसपोर्ट के मालिक वीरी सिंह यादव ने बताया था । वीरी सिंह मेरा मित्र है ।
जी..कहिये । वर्मा जी । मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?
दरअसल..वह संकोच से बोला । मुझे पहले से मालूम है । जैसा कि वीरी ने मुझे बताया । आप आमतौर पर गुनिया ओझाओं जैसा झाडफ़ूंक करने का । प्रेतबाधा हटाने का कार्य नहीं करते हैं । और स्वाभाविक ही ऐसे पीडित से कह देते हैं । कि मैं वो प्रसून नहीं हूं ? आपको मेरे बारे में कोई गलतफ़हमी हुयी है ? या किसी ने आपको मेरे बारे में गलत बताया है ? एम आय राइट..प्रसून ?
जो बात अगले पलों में मैं कहने वाला था । उसे वर्मा जी के मुंह से सुनकर मैं सिर्फ़ मुस्कराकर रह गया ।
देखिये..प्रसून जी । वर्मा जी बेहद विनम्रता से बोले । मैं सीधा सीधा आपके पास दौडा नहीं चला आया । बल्कि अस्सी अलग अलग जगह गुनिया ओझा मजार मंदिरों में भटककर तब आपके पास आया हूं ।
जब मुझे लगा कि मेरी पुत्रवधू रेशमा को इस अनजानी मुसीबत से शायद आप ही छुटकारा दिला सकते हैं ..?
वर्मा जी बेहद दिलचस्पी से अपनी मुसीबत की कहानी सुना रहे थे । और मैं गौर से उनके साथ आये ढाई साल के बच्चे डब्बू को देख रहा था । वास्तव में मुझे वर्मा जी के मुंह से निकले शब्द कभी कभी ही सुनायी दे रहे थे ।
मेरा दिमाग डब्बू के दिमाग से कनेक्ट था । और मैं फ़ालतू की हां हूं कर रहा था ।
revenant..revenge..and very interesting .। कुछ देर की कनेक्टिविटी के बाद स्वतः ही मेरे मुंह से निकला । reborn case as nandoo @ dabboo ।
what..? वर्मा जी हक्का बका होकर बोले । ये आप क्या कह रहे हैं । प्रसून जी ?
मैंने रिस्टवाच पर निगाह डाली । शाम के पांच बज चुके थे । और वर्मा जी इस शहर से 75 किलोमीटर दूर खेडा रामपुर के नजदीक एक गांव से आये थे । उनके पास सफ़ारी गाडी होने के बाबजूद एक सवा घन्टे का सफ़र आराम से था । और मुझे रास्ते में कुछ और भी समय लग सकता था ।
इसलिये मैं तुरन्त उठ खडा हुआ । और एक छुपी निगाह डब्बू पर डालता हुआ बोला । चलिये वर्मा जी । आज का डिनर आपके यहां ही करते हैं । भूतों के साथ । साहिब सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा ।
साहिब सिंह वर्मा लोधे राजपूत थे । रेशमा उनकी छठवें नम्बर की पुत्रवधू थी । डब्बू चौथे नम्बर की पुत्रवधू पुष्पा का बच्चा था । रेशमा को चार महीने पूर्व प्रसव से एक लडका हुआ था । पिछले ढाई महीने से रेशमा की आदतों में जबरदस्त बदलाव आया था । जिनको देखकर कोई पागल भी बता सकता था । कि वह भयंकर प्रेतबाधा से ग्रस्त थी ।
लिहाजा वो जगह जगह । जहां जो बताता उसका इलाज कराने लगे । पर कोई सफ़लता नहीं मिली । हालांकि उन्होंने ये पूरी राम कहानी मुझे विस्तार से सुनाई थी । पर मैंने उसको ठीक से नहीं सुना था । मैं उस समय डब्बू को रीड कर रहा था ।
मेरी इस माइंड रीडिंग का रिजल्ट उस वक्त तक एक छोटा और दो बडे प्रेतों की पुष्टि कर चुके थे । साहिब सिंह वर्मा नाम का ये इंसान प्रेतों के मायाजाल में बुरी तरह फ़ंसा हुआ था । जिसके बेहद ठोस कारण थे ? और जिनके वारे में कोई सही निर्णय मैं घटनास्थल पर पहुंचकर ही ले सकता था ।
खेडा रामपुर से आठ किलोमीटर पहले ही शालिमपुर विलेज के पास मैंने वर्मा जी के ड्रायवर को गाडी रोकने का आदेश दिया । साहिब सिंह ने बेहद हैरत से मेरी तरफ़ देखा ।
मैंने खिडकी खोलकर डब्बू को कार से नीचे उतार दिया । और चारों तरफ़ निगाह घुमाते हुये लापरवाही से एक सिगरेट सुलगायी । डब्बू भागकर सामने स्थित फ़ार्म हाउस के खन्डित मन्दिर की ओर चला गया था ।
प्रसून जी । मुझे वर्मा जी की आवाज सुनाई दी । मुझे बेहद हैरत हो रही है । ये फ़ार्म हाउस मेरा ही है । लेकिन अभी तक की वार्ता में मैंने इस फ़ार्म हाउस का जिक्र तक नहीं किया । और आपने ठीक यहां पर गाडी रुकवायी । इसका क्या मतलब हुआ ?
वर्मा जी । मैंने सयंत स्वर में जबाब दिया । हर बात का कोई मतलब हो । ये आवश्यक नहीं होता । हर बात का मतलब बताया जाय । ये मुमकिन नहीं होता ?
फ़िर मेरे उत्तर का वर्मा जी पर क्या प्रभाव पडा । इससे बेफ़िक्र मैं थोडी ही दूर पर बहती हुयी नदी को देखने लगा । दरअसल वर्मा जी जिस बात की शुरूआत महज ढाई महीने पुरानी मान रहे थे । उसका बीज आज से पांच साल पहले इसी नदी के किनारे पडा था । मैंने एक निगाह इधर उधर भागते हुये डब्बू पर डाली और मेरे मुंह से निकला । नन्दू । नन्दू उर्फ़ नन्दलाल गौतम ?
अब हम लोग चलते चलते बिलकुल नदी के किनारे आ गये थे । मेरी उंगलियों में एक स्पेशल चाबी का गुच्छा घूम रहा था । जिसमें छोटे साइज के । मगर शक्तिशाली चाकू । टार्च । और लाइटर जैसे कुछ आयटम फ़ंसे हुये थे ।
चलते चलते ही मैंने एक बबूल की कलम जितनी पतली टहनी तोडी । और उसे कलम की ही तरह छीलने लगा ।
वर्मा जी । अचानक मैं बोला । आपकी जिस पुत्रवधू पर प्रेत की छाया है । उसके पति का नाम क्या है ?
रामवीर वर्मा । साहिब सिंह ने असमंजस की हालत में उत्तर दिया । वह बिजली विभाग में है ।
लेकिन प्रसून जी । भगवान के लिये मुझे कुछ तो बताईये । मैं बेहद सस्पेंस महसूस कर रहा हूं ?
वर्मा जी जो जानना चाह रहे थे । वह साधना के नियमों के विरुद्ध था । और अदृश्य जगत के किसी भी रहस्य को सम्बन्धित आदमी को बताना तो एकदम गलत था ।
 इसलिये मैंने वर्मा जी से झूठ बोला । और कहा । अभी मैं खुद जानने की कोशिश कर रहा हूं । तो आपको क्या बताऊं ? इस उत्तर पर वर्मा जी असहाय से हो गये । और बैचेनी से पहलू बदलने लगे ।
लेकिन हकीकत कुछ और ही थी ।
डब्बू नाम के reborn यानी पुनर्जन्म लेने वाले बच्चे का माइंड रीड करके मैं बहुत कुछ जान चुका था । हालांकि इस reborn child को अभी तक न तो अपने पिछले जन्म की याद थी । और न ही उसने ऐसी कोई बात अभी तक कही थी । जैसा कि reborn बच्चे अक्सर कहते हैं ।
पर यह एक संयोग ही था । कि वह अपने बाबा के साथ मानसी विला आया । और मैंने उसमें प्रेतत्व भाव महसूस किया । और स्वाभाविक ही मैंने उसका दिमाग रीड किया ।
और उसी के परिणामस्वरूप मैं पहले फ़ार्म हाउस और अब नदी के किनारे खडा था । यानी वह स्थान जहां से इस घटना की शुरूआत हुयी । यानी वह स्थान जहां से नन्दू उर्फ़ नन्दलाल गौतम एक जीवन की यात्रा अधूरी छोडकर । किसी बदले की खातिर । साहिब सिंह वर्मा के घर उनका नाती बन के आया ।
नन्दू उर्फ़ reborn डब्बू के दिमाग में दो घटनायें प्रमुखता से फ़ीड थी । एक तो उसका नदी में डूबकर मर जाना । और दूसरा उसकी बहन लक्ष्मी उर्फ़ लच्छो से कुछ लोगों द्वारा बलात्कार । लेकिन ये घटनायें पूरी स्पष्टता से नही थी । और मैं डब्बू की छोटी उम्र को देखते हुये किसी तरह का प्रयोग उस पर नहीं कर सकता था ।
इसका सीधा सा मतलब यह था कि ये जानकारी मैं रामवीर से ही हासिल करता । जो इस घटना में शामिल था । और तब आगे कोई निर्णय लेता ।
ये जमीन । मैं खेतों की तरफ़ इशारा करके बोला । आपने हाल फ़िलहाल यानी लगभग तीन साल पहले ही खरीदी है । जो कि विवादित होने के कारण कोई ले नहीं पा रहा था । और आपने दबंग होने के कारण ले ली है । जबकि आपको सरकारी कानून की वजह से इसकी डबल रजिस्ट्री करानी पडी ।
ओह माय गाड । साहिब सिंह के मुंह से स्वतः ही निकल गया । मैं तय नहीं कर पा रहा । आप को क्या समझूं ? और आपसे क्या व्यवहार करूं ?
आप जमीन के बारे में कुछ बताईये ?
ये जमीन । वर्मा जी अजीव भाव से बोले । राजाराम गौतम की थी । राजाराम आज से नौ साल पहले स्वर्गवासी हो गया था । उसके बाद उसके परिवार में उसकी पत्नी धन देवी । बडा लडका नन्दू । जवान लडकी लक्ष्मी । और ग्यारह साल का छोटा लडका मुकेश रह गये थे ।
मुझे इस घटना की सच्चाई तो ठीक से मालूम नहीं है । क्योंकि उस वक्त मैं गांव से बाहर था । लेकिन ऐसा कहा जाता है । कि गांव के कुछ लोगों ने बाहर के लोगों के साथ लक्ष्मी से बलात्कार किया । इस घटना को लेकर नन्दू बदला लेने की ताक में रहने लगा ।
लेकिन वह बेचारा बदला ले पाता । इससे पहले ही नदी में नहाते हुये डूबकर मर गया । क्योंकि धन देवी के लिये गांव का माहौल खराब हो चुका था । और उस पर उसका बडा लडका असमय ही मर गया । इसलिये धन देवी ये गांव छोडकर अपने दोनों बच्चों के साथ अपने भाई के गांव चली गयी ।
वह इस जमीन को बेचना चाहती थी । लेकिन कई दबंगो की इस पर नजर होने के कारण कोई ले नहीं पा रहा था । तब धन देवी के भाई ने मुझसे सम्पर्क किया । और ये दस बीघा जमीन और वो महुआ आम का बगीचा मैंने उससे खरीद लिया ।
राजाराम और उसका परिवार बहुत ही भले थे । उनके गांव से हमेशा के लिये चले जाने के कारण मुझे बहुत अफ़सोस हुआ ।...लेकिन प्रसून जी । आप यह सब कुछ क्यों पूछ रहे हैं । इसका रेशमा की परेशानी से क्या मतलब है । जिसके लिये मैं खासतौर पर आपको लाया हूं ?
मैंने एक निगाह डब्बू पर डाली । और बोला । चलिये । आपके घर चलते हैं ?

पिशाच का बदला 2

रात के ठीक दस बजे ! मैं वर्मा जी के साथ उनकी छत पर मौजूद था । और रेशमा को देखकर मैं पूरा हाल जान चुका था । रामवीर से भी मेरी मुलाकात हो चुकी थी । और बलात्कार के उस रहस्य पर से भी परदा उठ चुका था ।
दरअसल वर्मा जी के घर पहुंचने के बाद जब वर्मा जी मेरे खाने आदि की आवभगत में व्यस्त थे ।
मैंने रामवीर से कहा । चलो तुम्हारा गांव देखते है ।
रामवीर मेरे साथ साथ चलता हुआ गांव के मन्दिर तक आ गया । हम दोनों मन्दिर के सामने बनी पत्थर की बेंचों पर बैठ गये ।
मैंने एक सिगरेट सुलगायी । और कहा । रामवीर तुम बहानेवाजी और उलझाऊ बात पसन्द करते हो या सीधी और स्पष्ट बात ? अगर सीधी और स्पष्ट बात पसन्द करते हो । तो बिना लाग लपेट बताओ कि लक्ष्मी के बलात्कार में तुम्हारी क्या भूमिका थी । नन्दू उर्फ़ नन्दलाल गौतम जो कि डूबकर नहीं मरा था । बल्कि मरने पर विवश किया गया था । उसमें भी तुम्हारी क्या भूमिका थी ?
रामवीर एक झटके से उठकर खडा हो गया । उसका चेहरा तमतमा उठा । और वह बोला । प्रसून जी । अगर आप बाऊजी के मेहमान न होते । तो इसी क्षण में आपको धूल चटा देता । आखिर ये सब बकने की तेरी हिम्मत कैसे हो गयी ?
लातों का भूत । मेरे मुंह से निकला । मैं तुरन्त उठकर खडा हो गया । साथ ही मैंने एक जबरदस्त मुक्का उसके मुंह पर मारा ।
रामवीर फ़िरकनी की तरह घूम गया । इस अभिमंत्रित मुक्के से उसे जबरदस्त चक्कर आने लगे । वह जमीन पर गिरने को था कि मैंने उसे अपनी बाहों में संभाल लिया । और सहारा देकर बेंच पर बैठाया । जब वह कुछ संभला । तो उसने बेहद आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखा ।
सारी दोस्त । मैं बेहद अपनेपन से बोला । बात जल्दी तुम्हारी समझ मे आ जाय । इसलिये ये छोटी सी झलक न चाहते हुये भी तुम्हें दिखानी पडी । इसको शार्टकट में और समझने के लिये । तुम्हें याद रखना चाहिये । कि भूत प्रेत पिशाच आदि को डील करने वाले आदमी की गिनती साधारण आदमी के रूप में करना एक भारी भूल ही होती है ।
क्योंकि इस पूरे आपरेशन । जो मैं आपके फ़ादर की रिकवेस्ट पर कर रहा हूं । आपका और आपकी बीबी रेशमा का लीड रोल है । इसलिये आपको अपना परिचय देना आवश्यक था ? जो कि मैंने दे दिया है ।
रामवीर निश्चय ही समझदार था । सो तुरन्त समझ गया । उसने हाथ जोडे । और बोला । मैं आपको बताता हूं । पर ये बात मेरे घर और अन्य किसी से न कहें । क्योंकि इससे मेरी नौकरी और मेरे परिवार का विनाश हो जायेगा ...?
वास्तव में उस दुखद घटना में रामवीर एक तरीके से न चाहते हुये भी लपेटे में आ गया था ।
उस दिन रामवीर के दोस्त ब्रिजेश के घर दूसरे गांव सुजानपुर से कुछ मेहमान आये थे । शाम को सात बजे के लगभग ये नन्दू की महुआ बगीची के पास बैठे शराब पी रहे थे । और चारों लोगों पर नशा बुरी तरह हावी हो चुका था ।
ब्रिजेश नन्दू की जमीन औने पौने में ले लेना चाहता था । इसलिये हर हथकन्डा अपनाता था । गांव का दबंग होने के कारण नन्दू ब्रिजेश से भय खाता था । और दूसरे लोग भी उसके समर्थन में नहीं आते थे ।
लक्ष्मी उस दिन दुर्भाग्य से खेतों से लौट रही थी । ब्रिजेश को नशा बेहद चड गया था । सो अपनी शेखी दिखाते हुये उसने लक्ष्मी को पकड लिया । और दोस्तों के मना करने पर भी उसके कपडे फ़ाड डाले । और झाडी में ले जाकर बलात्कार किया ।
पहले जो दोस्त इस कार्य के लिये मना कर रहे थे । बलात्कार होते देख सभी की बुद्धि भृष्ट हो गयी । और कामवासना का भूत सर चढकर बोलने लगा । सो बाद में सभी ने उसके साथ बलात्कार किया ।
लक्ष्मी की शादी तय हो चुकी थी । इसलिये बात बिगड न जाय । लक्ष्मी की मां ने जमाने की ऊंच नीच समझाते हुये नन्दू और लक्ष्मी को अपमान का घूंट पीकर इस वारदात को कुछ समय तक के लिये भूल जाने के लिये राजी कर लिया ।
दूसरे दिन नशा उतर जाने पर बलात्कारियों को अपनी भूल का अहसास हुआ । और नशे में होने का हवाला देते हुये उन्होंने धन देवी से काकी काकी मौसी आदि कहकर बार बार क्षमा भी मांगी ।
लेकिन नन्दू इस अपमान को न भुला पाया । और बदले की आग में सुलगने लगा ।
पर एक तो वह घर में अकेला था । बाप मर चुके थे । और छोटा भाई लगभग ग्यारह साल का था । इसलिये वह कुछ कर न पाता था ।
अब कहते तो ये हैं कि इस घटना से भयभीत होकर नन्दू ने अपनी सुरक्षा हेतु एक देशी तमंचा खरीद लिया था । और हमेशा अपने साथ रखने लगा था । पर ब्रिजेश के चमचों ने उस तक खबर पहुंचा दी कि नन्दू तुझे मारने के लिये तमंचा रखकर घूमता है ।
होनी की बात नदी के जिस स्थान पर मैं ( प्रसून ) वर्मा जी के साथ खडा था । उसी स्थान पर शराब के नशे में धुत ब्रिजेश ने नन्दू को पकड लिया ।
और छाती खोलता हुआ बोला । ले मार गोली । मार साले । और चुका अपनी बहन की इज्जत का बदला । इत्तफ़ाक से उस दिन भी रामवीर ब्रिजेश के साथ था । वे पांच थे । और नन्दू अकेला ।
नन्दू बचकर भागना चाहता था । पर ब्रिजेश आ बैल मुझे मार की तरह कुछ करना चाहता था । उसने नन्दू को बहुत मारा । भयभीत नन्दू जान बचाने के लिये नदी में कूद गया । और घबराहट में डूबकर मर गया ।
दाता । मेरे मुंह से आह निकली । तेरे रंग न्यारे ।
नन्दू लगभग पांच साल पहले मरा था । और reborn child डब्बू के रूप में अभी ढाई साल का था ।
पांच महीने लगभग उसने गर्भ में बिताये ( गर्भ में बढते पिन्ड में जीव चार महीने पूरा होने पर प्रवेश करता है । ) इसका मतलब लगभग दो साल वह प्रेत बनकर भटकता रहा ।
और फ़िर वर्मा जी की चौथे नम्बर की पुत्रवधू पुष्पा जब गर्भवती हुयी । तो नियमानुसार वह अपना कर्ज वसूलने उनके घर ही आ गया ।
क्योंकि नन्दू अकाल मौत मरा था । निर्दोष मरा था । इसलिये प्रेतयोनि के तमाम कष्टों से उसे ज्यादा नहीं जूझना पडा ।
लेकिन इस बात से मेरे दिमाग में एक नया रहस्य मानसी विला से ही पैदा हो गया था ।
नन्दू  reborn child डब्बू अब प्रेत नहीं था । लेकिन उसके दिमाग का वह हिस्सा तीन । एक छोटा और दो बडे प्रेतों की पुष्टि कर रहे थे । और उस अध्याय का शीर्षक बदला था ।
तो ये तीन प्रेत कौन थे ? जो डब्बू को माध्यम बनाकर निर्दोष रेशमा को परेशान कर रहे थे ? ये सभी बातें मैं बिना किसी ओझाई आडम्बर के यानी किसी माध्यम को बैठाना और प्रेत आहवान यानी हीं क्लीं चामुन्डाय विच्चे ..आदि के बिना भी जान सकता था ।
और समस्या को बिना किसी नाटक के भी हल कर सकता था । पर यहां मामला दूसरा था ? मेरी नैतिकता के अनुसार मेरा पूरा प्रयास ये था कि न सिर्फ़ मैं वर्मा परिवार को प्रेत पीडा से मुक्ति दिलाऊं ।
बल्कि नन्दू के परिवार धन देवी और लक्ष्मी को भी यथासंभव न्याय दिला सकूं । इसलिये इस क्रिया को अब मैं पूरी तरह से expose तरीके से करना चाहता था ।
इसीलिये मैंने रामवीर को अकेले मन्दिर ले जाकर न सिर्फ़ सारी बातें कबुलवाईं । बल्कि उसे आगे की कार्यवाही हेतु एक evidence गवाह के तौर पर तैयार भी किया ।
रात के साढे दस बज चुके थे । वर्मा family के साथ साथ मैं भी डिनर से फ़ारिग हो चुका था । मैंने वर्मा जी को पहले ही समझा दिया था । कि इस प्रेत आपरेशन की बिलकुल publicity न होने पाये । जैसा कि आम ओझागीरी के समय तमाम गांव के लोग इकठ्ठा हो जाते हैं । और देर तक फ़ालतू की हू हा होती है ।
इसी का परिणाम था । कि गांव का या बाहर का कोई आदमी तो दूर स्वयं वर्मा जी के परिवार के अधिकांश लोग इस समय छत पर नहीं थे ।
इस समय रेशमा । वर्मा जी । रामवीर । वर्मा जी की पत्नी हरप्यारी देवी । पुष्पा । और पुष्पा का पति धर्म सिंह और सोता हुआ डब्बू ही मेरे साथ छत पर मौजूद थे । और आगामी दृश्यों की धडकते दिल से प्रतीक्षा कर रहे थे ।
मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कश लगाता हुआ छत की जालीदार बाउंड्री के पास आकर खडा हो गया । मेरे साथ सिर्फ़ वर्मा जी थे । बाकी लोग पीछे चारपाईयों पर बैठे थे ।
मैंने वर्मा जी की ओर देखा । और मुस्कराकर बोला ।  हां कहूं तो है नहीं । ना कही ना जाय । हां ना के बीच में साहिब रहो समाय । वर्मा जी आप इस बात का मतलब जानते हैं ? ये भगवान की स्थिति और आदमी की जिग्यासा की बात है ।
लेकिन इस वक्त ये सन्तवाणी दूसरे अर्थ में आपके ऊपर फ़िट हो रही है । आपका नाम साहिब सिंह वर्मा है । इस वक्त प्रेत प्रभावित लोग छत पर बैठे हैं । लेकिन प्रेत कहीं नजर आ रहा है ? और प्रेत यहां बिलकुल है नहीं । ऐसा कम से कम आप तो नहीं कह सकते । भूत प्रेत होते ही नहीं हैं । अब कम से कम भुक्तभोगी हो जाने के बाद आप ये बात नहीं कह सकते । लेकिन मैं आपसे प्रश्न करता हूं कि प्रेत यदि है । तो वो कहां है ?
वर्मा जी ने असमंजस की स्थिति में मेरी तरफ़ देखा । अपने परिवार की तरफ़ देखा । फ़िर असहाय भाव से सिर हिलाने लगे ।
मैंने बहुत हल्के उजाले में लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित गांव के मन्दिर और वर्मा जी की हवेली के ठीक बीच में खडे पीपल के पुराने और भारी वृक्ष की तरफ़ देखा ।
और उंगली से उसकी तरफ़ इशारा करते हुये कहा । वहां । वहां है वो प्रेत ।
और फ़िर उसी उंगली को । उसी अन्दाज में घुमाते हुये । मैं अपनी जगह पर घडी के कांटे के अन्दाज में घूमा । और उंगली को रेशमा की तरफ़ कर दिया ।
रेशमा का शरीर अकडने लगा । उसकी मुखाकृति विकृत होने लगी । इसी के साथ सोता हुआ डब्बू किसी चाबी लगे खिलोने की तरह उठकर बैठ गया । परिवार के अन्य लोग स्वाभाविक ही alert हो गये ।
पर उस वक्त मेरा ध्यान सिर्फ़ रेशमा पर था ।
मेरे मुंह से सख्त आदेश निकला । ..अकेला नहीं ..अपने साथियों को भी बुला । जिनका इस परिवार से लेना देना हैं । उन दोनों को भी बुला । मुझे साफ़ साफ़ बात करने की आदत है...?
प्रेत अवस्था में भी रेशमा के शरीर में भय की एक झुरझुरी हुयी ।
सारी तैयारी के बारे में मैंने पहले ही समझा दिया था । रामवीर ने तुरन्त रेशमा को गोद में उठाकर एक दस बाई दस फ़ुट के पहले से आटा पूरित चौक में आसन पर बैठा दिया ।
पुष्पा ने आनन फ़ानन अगरबत्ती के आठ पैकेट खोले । और बीस बीस अगरबत्तियों का एक गुच्छा चौक के किनारे आठ स्थानों पर लगाया । एक बडी थाली में तोडे गये फ़ूलों की ढेरों पखुंडिया और प्रेत आवाहन का अन्य जरूरी सामान मौजूद था । चन्दन गुलाब मोगरा बेला आदि की बेहद तेज मिली जुली खुशबू से छत महकने लगी ।
मैंने मुठ्ठी भरफ़ूल अभिमन्त्रित कर रेशमा के ऊपर उछाल दिये । वह तेजी से झूमने लगी ।
तीनों relative प्रेत छत पर आ चुके थे । और सहमें हुये थे ।
दरअसल मन्दिर से लौटते समय ही मैं उनसे एक introduction टायप hi..hallo कर आया था ।
इसका फ़ायदा ये हुआ था कि एक तान्त्रिक के तौर पर उन्होंने पहले से ही मेरा पूर्व अवलोकन कर लिया था । इससे प्रेत आहवान के समय की संघर्ष वाली हाय हुज्जत की नौबत पहले ही खत्म हो गयी थी । यदि प्रेत मुझ पर भारी पडने वाले थे । तो अडियल रुख अपनायेंगे । और यदि वे जानते थे कि व्यर्थ में पिटने से क्या फ़ायदा ? तो तुरन्त समर्पण कर देंगे ।
यह मेरा अपना एक शिक्षित तन्त्र जानकार होने का फ़ार्मूला था । मेरा अपना स्टायल था । जो अशिक्षित तान्त्रिको की परम्परा से एकदम अलग था ।
इसलिये मैंने कहा । ..बेहतर है..कि हम सीधे सीधे मतलब की बात करें । तुम वर्मा परिवार से क्या चाहते हो ? सो बताओ ? कैसे और किस नियम से तुमने रेशमा को अपना निशाना बनाया ? सो बताओ ? इस परिवार को छोडने के बदले मैं क्या चाहते हो । सो बताओ ? तुम लोग कौन हो ? सो भी बताओ ?
मेरे जीवन में बहुत कम केस ऐसे थे । जिनमें मैंने खुले रूप से ऐसी कार्यवाही की थी । यदि किसी केस से मुझे जुडना भी पडता था । तो मैं अधिकतर गुप्त रूप से ज्यादा से ज्यादा से कार्यवाही निबटाकर समस्या का हल कर देता था ।
पर ये मामला ऐसा था । जिसमें बात का पूरी तरह से खुलना सभी के हित में था ।
रेशमा के मुंह से एक पुरुष आवाज निकली...हे साधु । आपको हमारा प्रणाम है । मैं अशरीरी योनि में पिशाच श्रेणी का प्रेत हूं । मेरे साथ दूसरा ब्रह्म राक्षस और तीसरा छोटा यम प्रेत है । हम बरम देव के आश्रय में रहते हैं ।
वह हममें सबसे बडे हैं । इस गांव के आसपास तीन स्थानों पर हमारा बसेरा है ।
एक वह बरम देव ( पीपल ) दूसरा मन्दिर से आगे ( दो किलोमीटर दूर ) का शमसान । और तीसरा वर्मा का फ़ार्म हाउस । जिसमें खन्डित मन्दिर भी है ।
इन तीनों प्रमुख स्थानों पर डाकिनी शाकिनी यक्ष भूत प्रेत आदि अनेक प्रकार के लगभग तीस प्रेत बरम देब के आश्रय में रहते हैं । और नियमानुसार हम गलती करने वाले को ही परेशान करते हैं । बाकी हम इस गांव के आसपास से प्राप्त खुशबू और मनुष्य के त्याज्य मल ( कफ़ थूक उल्टी आदि ) कई चीजों का आहार करते हैं ।
 हे साधु । आप जानते ही हैं । इससे अधिक प्रेतों के रहस्य बताना उचित नहीं है । इस प्रेतपीडा निवारण के पूरा हो जाने के बाद वर्मा परिवार को भी नियम के अनुसार गांव आदि में ये बात खोलना वर्जित है । कि इन स्थानों पर प्रेत रहते हैं ...?
एक मिनट । मैंने बीच में हस्तक्षेप करते हुये मुस्कराकर कहा । यदि वर्मा परिवार । तुम्हारे रहस्य । तुम्हारे रहने के स्थान । तुम्हारे घर आदि के बारे में लोगों को बता देगा । तो क्या हो जायेगा ?
हे महात्मा । रेशमा के मुख से पिशाच बोला । मैं जानता हूं कि आप ये बात इन लोगों को ठीक से समझाने हेतु पूछ रहे हैं । जो कि उचित ही है ।
तो सुनिये प्रेतों का तो कुछ खास नहीं होगा । पर ग्रामवासियों के मन में एक अग्यात भय पैदा हो जायेगा । लोग इन तीनों स्थानों पर पहुंचते ही इस भाव से देखेंगे । मानों प्रेत को देख रहे हों ।
जिस प्रकार हे साधु । मन्दिर में जाने वाले भक्त के मन में पत्थर की मूर्ति देखते ही ये विचार आता है कि ये भगवान हैं । और उसका भाव भगवान से जुड जाता है । और ये एक तरह से अदृश्य सम्पर्क हो जाता है । इसी तरह ये जानकारी हो जाने पर कि इन स्थानों पर प्रेत हैं । वे भाव रूपी सम्पर्क हमसे बार बार । जिग्यासा की वजह से । भय की वजह से करेंगे ।
इस तरह ये प्रेतों के लिये आमन्त्रण होगा । और इस गांव के घर घर में प्रेतवासा हो जायेगा । तब इसका जिम्मेदार वर्मा परिवार होगा ।
वास्तव में अधिकतर प्रेत आवेश होने की मुख्य वजह यही होती है । किसी भी एकान्त अंधेरे स्थान पर पहुंचकर भयभीत हुआ आदमी भूत प्रेत के बारे में सोचकर खुद ही ( यदि वहां प्रेत हो ) उससे सम्पर्क जोड लेता है । एक तरह से उसे निमन्त्रण खुद ही दे देता है ।
दूसरे आवेश में नियम के विपरीत कार्य करने से भी प्रेत आवेश होता है । इसके अलावा भी प्रेत आवेश के अन्य कारण होते हैं । पर उनको न कहता हुआ । मैं उस कारण को कहता हूं । जिससे वर्मा परिवार प्रभावित हुआ ।
ये पांच साल पुरानी बात है । नन्दलाल गौतम उर्फ़ नन्दू नदी में डूबकर बुडुआ प्रेत या बूडा प्रेत ( जल में डूबने से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ ) बन गया ।
ये हर वक्त दुखी हुआ रोता सा रहता था । प्रेतयोनि में जाने के बाद भी इसे अपनी मां बहन भाई की बेहद चिंता रहती थी । ये प्रेत होकर आसानी से अपने ऊपर हुये जुल्म का खतरनाक बदला ले सकता था ।
लेकिन इसके बाबजूद सीधा स्वभाव होने के कारण ये बदले की बात भुलाकर अपने असहाय हो गये परिवार के विषय में सोचता रहता था । ये हम प्रेतो से भी कम वास्ता रखता था ।
तब इसके सीधेपन से प्रभावित होकर कुछ बडे शक्तिशाली प्रेतों ने इसकी मदद करने का निश्चय किया । जिनमें मैं भी शामिल था । हमें इससे बेहद सहानुभूति थी । क्योंकि हम भी कभी इंसान थे ?
और अब हमारे पास सिर्फ़ ये दुर्लभ मनुष्य शरीर ही तो नहीं है । बाकी हमारी भावनायें आदि लगभग वैसे ही होते है । हे साधु । आप जानते ही हैं । इंसानों और हम में सिर्फ़ शरीरों का ही फ़र्क है..?
मैंने देखा । पूरा वर्मा परिवार बडी उत्सुकता से इस दिलचस्प । प्रेतकथा । को सुन रहा था । वास्तव में इस प्रेतकथा में मेरे लिये कुछ भी दिलचस्प नहीं था । पर एक विशेष कारण से वह प्रेतकथा मैं पिशाच के द्वारा रेशमा के मुख से करवा रहा था ।

पिशाच का बदला 3

हे महात्मा । रेशमा कुछ देर रुककर फ़िर प्रेतवाणी में बोलने लगी । नन्दू प्रेतयोनि में लगभग दो साल भटका । हमने अपने ग्यान के आधार पर उसे समझाते हुये उसका प्रेतत्व प्रबल होने से रोका ।
क्योंकि ऐसा हो जाने पर यह अपनी मनुष्य देह की प्राप्त आयु में से शेष आयु का उपयोग पुनर्जन्म के रूप में नहीं कर पाता और हजारों सालों के लिये घृणित और कष्टदायी प्रेत योनि को भोगता ।
लेकिन हमें कोई भी ऐसा अवसर नहीं मिल रहा था । जिससे हम अपराधी ब्रिजेश या अन्य का संबन्ध इससे जोड पाते ।
प्रेतयोनि के नियम अनुसार बदला या कर्म संस्कार खत्म करने हेतु उस प्रेतात्मा को पहले तो उसी घर में जन्म लेना चाहिये । जिससे उसका बदले का कर्म जुडा हो । इसके लिये संबन्धित घर में किसी औरत का गर्भवती होना आवश्यक होता है ।
ऐसा न होने पर । जबकि समय खत्म हो रहा हो । वह प्रेतात्मा दूसरे नियम अनुसार किसी रिश्तेदार या फ़िर बाहर के घरों में जन्म ले सकता है ।
ब्रिजेश और उसकी पत्नी के पहले ही कोई संतान नहीं है । और न भविष्य में होगी । उसके घर में ऐसी कोई अन्य स्त्री भी नहीं है । जिसके निकट भविष्य ( लगभग पांच साल ) में गर्भधारण की उम्मीद हो ।
 हे साधु । तब हम बडे ना उम्मीद हो चले थे कि क्या करना चाहिये ?
तभी । ठीक तीन साल पहले की बात है । एक दिन फ़ार्म हाउस में कृषि कार्य ( जब कटी फ़सल से गल्ला अनाज आदि निकाला जाता है ) हेतु देखरेख के लिये धर्मपाल और उसकी पत्नी पुष्पा रात को रुके ।
रात दो बजे के लगभग जब कार्य लगभग खत्म सा हो गया । एकान्त स्थान होने से धर्मपाल की कामवासना जाग उठी । और उसने फ़ार्म हाउस के कमरे में पुष्पा से सहवास किया ।
बस यहीं हमें मौका मिल गया । मन्दिर । खन्डित मन्दिर । प्रेतवासा आदि बहुत से ऐसे स्थान होते हैं । जहां पत्नी से भी सहवास वर्जित है । ये स्थिति प्रेतों को आसान निमन्त्रण देती है ।
हमने नन्दू से पुष्पा के गर्भ से जन्म लेने का संकल्प करवा दिया । पुष्पा को योनि द्वारा गर्भाधान हो ही चुका था । ठीक समय आ जाने पर नन्दू प्रेत भाव छोडकर पुष्पा के गर्भ में चला गया । और प्रेत योनि से मुक्त हो गया । इसके बाद इसने पुष्पा के गर्भ से जन्म लिया । आप लोगों के बीच डब्बू के रूप में बैठा हुआ पिछले जन्म का दलित नन्दू ही है ।
अचानक पुष्पा ही क्या सबने डब्बू की तरफ़ देखा । पुष्पा के शरीर में जोरों की झुरझुरी हुयी । प्रेत द्वारा
उसके सम्भोग की बात सुनाते ही उसके होश उड गये । पर वह कर भी क्या सकती थी ।
धर्मपाल का मुंह भी शर्म और लज्जा से लाल हो गया । पर वह मजबूर था । सब मजबूर थे ?
एक मिनट पिशाच । मैंने यकायक बदल गये माहौल को संभालने के उद्देश्य से बीच में हस्तक्षेप किया । जब नन्दू पुष्पा की संतान के रूप में जन्म ले चुका था । तो उसका बदला तो पूरा हो गया था । फ़िर तुमने निर्दोष रेशमा को क्यों सताया ?
मुझे क्षमा करें । महात्मन । रेशमा गम्भीर प्रेतवाणी मे बोली । आप उच्च स्तर के साधक हैं । ये वरम देव ने हमें बता दिया है । और खुद हम अपने अनुभव से भी जान चुके हैं । ये आपकी सात्विक साधना का ही असर है कि हम प्रेत अपने उग्र स्वभाव के विपरीत प्रेत आहवान के समय शान्त आचरण कर रहे हैं ।
वरना सोखा गुनिया छोटे मोटे ओझा होने पर यहां का माहौल तामसी होता । और ये आवेशित औरत निर्वस्त्र होती । यहां चीख चिल्लाहट का माहौल होता । और हम कबूलने से अधिक मांस मदिरा की मांग कर उसका उपयोग कर रहे होते ।
किसी भी प्रेत को नियम अनुसार पूजा होने पर पीडित को छोडना ही पडता है । पर जिस तरह का शान्त माहौल । और जिस तरह हम लोगों द्वारा आप प्रेतकथा का पाठ करवा रहे हैं । ये बेहद उच्च स्तर के सात्विक साधुओं के द्वारा ही संभव है ।
 हे महात्मा । आप सब कुछ जानते हुये भी अनजान होने का दिखावा कर रहें हैं । ताकि ये लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रेत जगत के बारे में ठीक ठीक जान सकें । इसके अलावा आपका और गूढ उद्देश्य क्या है ? ये हम नहीं जान सकते ? अर्थात आप ही बेहतर जानते होगे ? अब मैं आपके पूछे गये प्रश्न का उत्तर देता हूं ?
हे महात्मन । जैसा कि मैंने पूर्व में ही कहा था । नन्दू के सीधा होने के कारण हम प्रेतों ने इसका बदला चुकाने का निश्चय किया था । इसका जिम्मा उपस्थित हम तीनों प्रेतों का था । नन्दू डब्बू के रूप में इस घरका सदस्य बन चुका था । अब वह बडे होकर कुपुत्र के रूप में या सुपुत्र के रूप में क्या करता । यह हमको ग्यात नहीं हैं ।
 वह अपना बदला ले पाता या नहीं ? यह भी हम नहीं कह सकते ? आप जानते ही हैं कि हम प्रेतों के स्थान बदलते रहते हैं । हो सकता है कि कुछ समय बाद हमें किसी दूर वन या अन्य स्थान पर जाना पडता । तब हमारे दिये हुये वचन का क्या होता । अब क्योंकि रामवीर भी....?
रुको पिशाच । मैंने उसे रोकते हुये कहा । रामवीर वाली बात छोडकर बात कहो । हालांकि बदले हुये हालात में मैं स्वयं सभी बात वर्मा जी को बता दूंगा । लेकिन मेरे अनुसार जब रामवीर अपनी गलती मान चुका है । और मुझसे वचन ले चुका है । तो उसके बारे में कहना उचित नहीं ..?
जैसा आप कहें । महात्मा । रामवीर की पत्नी रेशमा प्रेतवाणी में बोली ।
सब लोग चौंककर रामवीर की तरफ़ देखने लगे । वह लज्जा से सिर नीचे किये दूसरी तरफ़ देख रहा था । अपनी गलती को याद कर उसकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे ।
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मैंने रिस्टवाच पर निगाह डाली । रात के साढे बारह बजने वाले थे । मुझे सिगरेट की बहुत तेज तलब लग रही थी । और अभी मेरे गणित के अनुसार यह कार्यक्रम करीब तीन बजे तक चलने वाला था ।
रेशमा पर दो घन्टे का प्रेत आहवान हो चुका था । डब्बू भी इस समय आवेशित जैसा था । यानी सबको थोडा रेस्ट देना ठीक था । आवेश से बार बार रेशमा का गला सूख रहा था । और उसे बोलने मैं कठिनाई हो रही थी । मैंने पिशाच और उपस्थित प्रेतों को पहले से तैयार सुगन्धित खाध्य पदार्थ सुलगाकर आहार दिया । और उन्हें आधा घन्टे को रेशमा से आवेश हटाने को कहा । इसके बाद प्रेत आवेश हटते ही मैंने रेशमा और डब्बू को दो दो गिलास मोसम्बी का जूस पिलवाया । और रामवीर ने उसे गोद में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया । मेरे इशारे पर धर्मपाल ने पुष्पा को सबके लिये चाय बनाकर लाने का आदेश दिया । पुष्पा के जाते ही मैं गद्दी छोडकर खडा हो गया । और सिगरेट सुलगाकर कश लेते हुये टहलने लगा । छत पर एक अजीव सा रहस्यमय सन्नाटा था । और किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो आपस में क्या बात करें । तब वर्मा जी बिना किसी कारण ही मेरे साथ साथ ही टहलने लगे । मैंने देखा । प्रेत पीपल पर पहुंच गये थे ।..अगली बार प्रेतक्रिया आधा घन्टे के बजाय पचास मिनट बाद ही शुरू हो सकी । सब कुछ पहले जैसा हो गया । रेशमा फ़िर से गद्दी के सामने पूरित चौक पर बैठ गयी थी । पिशाच के आवेश के फ़लस्वरूप उसका शरीर ऐंठा हुआ सा था । और शरीर अजीव अन्दाज में थका हुआ सा था ।
इसका एक गुप्त कारण था । कोई भी सम्भोग का अभ्यस्त प्रेत आवेश । आवेश के समय सम्भोग या वैसी हरकतों की मांग करता है । या फ़िर मांस मदिरा जैसी उत्तेजक वस्तुओं की । जिससे उनमें एक ऊर्जा बनी रहती है । वर्मा जी के सदाचारी घर में ये दोनों बातें सम्भव नहीं थी । और मेरी इस तरह की कोई दिलचस्पी भी नहीं थी कि उन्हें मांस मदिरा आवश्यक बताकर वर्मा परिवार को मजबूर करूं । लिहाजा इस कार्यवाही को जल्दी निपटाने के उद्देश्य से मैंने कहा । हां तो पिशाच । हम आगे की बात करते हैं ..?
ठीक है । महात्मन । वह बोला । रामवीर को भी दोषी मानते हुये । हम इसको सजा देना चाहते थे । लेकिन इस घर में सदाचार । भक्ति । और पूजा इतनी थी कि सम्भव नहीं हो पा रहा था ।
 लेकिन एक दिन रेशमा की बहुत छोटी सी गलती से हमें यह मौका मिल गया । रेशमा ने हाल ही में ( चार महीने पहले ) एक पुत्र को जन्म दिया है । और यह अशौच की स्थिति में न सिर्फ़ वरम देव के पास से गुजरी । इसने अनजाने में गलत स्थान पर मूत्र त्याग किया ।
हालांकि ये कोई बडी गलती नहीं थी । फ़िर भी बदला लेने के लिये इसकी जच्चा स्थिति को उचित समझते हुये हमने इसे प्रभावित कर दिया । क्योंकि हमें तो रामवीर और फ़िर ब्रिजेश से विशेष मतलब था ।
रेशमा के प्रभावित होते ही हमने रेशमा के जरिये रामवीर को भृष्ट करना शुरू कर दिया । हम एक शाकिनी के माध्यम से रेशमा की काम भावना भडकाते थे । और स्वयं मैं रामवीर के ऊपर भाव आवेश करके उसे काम प्रेरित करते थे । और इस तरह इन पति पत्नी का शरीर हम अपनी कामवासना त्रप्त करने के लिये करते थे । इस तरह ये शरीर बहुत शीघ्र प्रेत प्रभावित होने लगते हैं ।
दरअसल हमारा उद्देश्य रामवीर के शरीर को कुछ इसी तरह से भोगते हुये कुछ दिन बाद ब्रिजेश के साथ उसी नदी में डुबाकर मार देने का था... ।
पिशाच की इस बात से मानों विस्फ़ोट हुआ हो । वर्मा परिवार एकदम ये बात सुनकर कांप गया । उनके रोंगटे खडे हो गये ।
मैं सबकी नजर बचाकर मुस्कराया । और मुझे इटावा के संजीव की याद आ गयी । जो ऐसे ही मिलते जुलते घटनाक्रम में अपने दोस्त के साथ नहर में स्वतः कूदकर मर गया था ।
क्योंकि मैं संजीव को जानता था । इसलिये इस घटना की वास्तविकता में जानता था । और संसार के लोग इसकी वास्तविकता कुछ और जानते थे । जो कि एकदम असत्य थी । क्योंकि जैसा कि पिशाच कह रहा था । वैसा कौन सोच सकता था ?
खैर..सच्चाई तो सच्चाई ही थी ।
इसलिये मैंने आगे कहा । हे पिशाच । ये काम तुम किस तरह करते ? और निर्दोष रेशमा को क्या इतनी बडी सजा देना उचित था ? और साथ ही तुम नन्दू के घरवालों के साथ इंसाफ़ करने की सोच चुके थे ? वह किस तरह करते ?
हे महात्मा । रेशमा के मुख से पिशाच बोला । आप की यह बात उचित ही है कि रेशमा को दन्ड बिना बात के मिल रहा था । पर रेशमा क्योंकि रामवीर की पत्नी है । अतः उसके आधे की भागीदार बनती है । जिस प्रकार कि घर में किसी एक सदस्य के दुष्ट ( चोर बदमाश ) होने पर घर के अन्य सज्जन सदस्यों को भी फ़लस्वरूप कुछ न कुछ भोगना ही पडता है ।
इसी तरह रेशमा को एक अपराधी की पत्नी होने का दन्ड भोगना पड रहा था । और फ़िर कुछ दिनों बाद हम रामवीर को मार ही डालने वाले थे ।
हे साधु । आप जानते ही हैं । क्रूर और उग्र व्यवहार । अधर्म ये सब प्रेत धर्म के अंतर्गत आते हैं । अर्थात ये क्रियायें ऐसा लगता हैं कि प्रेत कर रहे हैं । जब कि प्रेत सिर्फ़ निमित्त होते हैं । व्यक्ति के अतीत का कर्मफ़ल ऐसी घटनायें कराता हैं । इसलिये इसमें हमारा कोई दोष नहीं होता । और हमारा कोई पाप कर्म भी नहीं बनता । अब जैसा कि हमने आगे सोचा था । उसके बारे में सुनिये ...?

पिशाच का बदला 4

आप जानते ही हैं कि रामवीर और ब्रिजेश गहरे दोस्त हैं । पिशाच आगे बोला । लेकिन वर्मा जी का घर जितना ही पवित्र और सदाचारी है । ब्रिजेश का घर मांस मदिरा के सेवन से उतना ही अपवित्र है । और ब्रिजेश स्वभाव से दुराचारी भी है । हम ब्रिजेश को सीधे सीधे निशाना बना सकते थे । और आसानी से बना सकते थे । लेकिन बिना रामवीर को साथ लिये हमारा बदला पूरा नहीं होता । यदि हम ब्रिजेश को पहले ही बरबाद करके मार डालते । तो हो सकता है कि हम नन्दू की मां को वो इंसाफ़ नहीं दिला पाते । जो कि हम दिलाना चाहते थे...? इसलिये हमने रामवीर से ही शुरूआत की । इसके बाद हम यही क्रिया अपनाते हुये ब्रिजेश की पत्नी मिथलेश को किसी शाकिनी द्वारा भृष्ट करते । और फ़िर ब्रिजेश को प्रेत प्रभावित करते हुये प्रेत महीनों तक उन दोनों के शरीर से स्त्री पुरुष सम्भोग का आनन्द लेते । जो कि मनुष्य की तरह प्रेतों की भी एक बडी कमजोरी होती है । फ़िर हम रामवीर की ब्रिजेश के साथ संगति बडाते हुये उसे अत्यन्त शराब का शौक लगा देते । और एक दिन दोनों को प्रभावित कर नदी के उसी स्थान पर ले आते । जहां नन्दू डूबकर मरा था । ये दोनों दोस्त नशे के प्रभाव के कारण या तो कोई शेखी दिखाते हुये । या आपस में झगडा कर उसी हालत में ( पूरे कपडे और जूते आदि पहने ही ) नदी में कूद जाते । उस स्थान पर नदी में ढायकुला ( नदी के बीच में कुंआ ) है । जिसमें ये कपडे आदि पहने होने के कारण । और नशे में होने के कारण कुछ नहीं कर पाते । और डूबकर मर जाते । फ़िर हम किसी बहाने से इनके खलिहानों में । इनके घरों मे आग लगा देते ..और इस तरह हमारा आधा बदला पूरा हो जाता ?
- क्या..। अबकी बार मुझे भी आश्चर्य हुआ । आधा बदला..? इसके अलावा तुम और क्या करते ? और तुम आग किस तरह लगा सकते थे ..?
मैंने देखा वर्मा परिवार इस रहस्योदघाटन पर लगभग थरथर कांपने लगा ।
- हे महात्मा । रेशमा फ़िर से प्रेतवाणी बोली । आप आश्चर्य न करें । आग हम स्वयं नहीं लगाते । बल्कि किसी बच्चे द्वारा । या किसी महिला द्वारा हम ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर देते कि आग लग जाती । जिस तरह इन लोगों ने नन्दू के परिवार को बरबाद कर दिया था । हमें भी इसी तरह इनको बरबाद कर देना था । अब ये आधा बदला..किस तरह से हुआ । ये.. अब आगे सुनिये.. फ़िर ये अकाल मृत्यु के बाद निश्चित ही एक छोटे प्रेत के रूप मे हमें मिलते । इन बेचारों को यह सब बात बिलकुल पता नही होती । और यदि होती भी । तो ये उस स्थिति में कुछ नहीं कर सकते थे । जैसा कि आप जानते ही है । नन्दू की बहन लक्ष्मी की शादी हो चुकी है । आगे उसको गर्भ भी रुकेगा । उस गर्भ में हम ब्रिजेश को जाने पर मजबूर कर देते । और वह बेचारा प्रेतयोनि से निकलने पर बेहद खुशी महसूस करता । इस तरह जिस योनि के साथ बलात्कार करते हुये ब्रिजेश ने पति जैसी भूमिका निभायी थी । उसी योनि से वह एक दलित संतान के रूप में जन्म लेता । और इसका साथी....होने...( कहते कहते पिशाच रुक गया और बात घुमाकर बोला ) ..और इसी तरह रामवीर को भी किसी दलित गर्भ में जाने पर मजबूर कर देते । और इस तरह हमारा बदला पूरा हो जाता ।
- अब । लाख टके की बात । मैं साबधान होकर बोला । जाहिर है कि तुम्हारा प्लान तो फ़ेल हो गया । अब हमारा सौदा किस तरह पटे । यानी compromise किस तरह होगी ? कहने का मतलब । समझौते के रूप में तुम क्या चाहते हो ?
- इसके लिये ..? पिशाच बोला । वर्मा जी को गद्दी पर बिठायें । ( अक्सर प्रेत पीडित और आहवान माध्यम का शरीर अकडा हुआ । और गर्दन ऐंठी सी और सामने होती है । इसलिये वह अगल बगल बैठे लोगों से बात नहीं कर पाता । और कोई भी आवेश सामने वाले को ही जबाब देता है । )
ये उसने मेरे मन की बात कही थी । दरअसल मैं सिगरेट पीने का मौका चाहता था । और मैं ये भी जानता था कि आगे वह क्या कहने वाला है । मैं गद्दी छोडकर तुरन्त उठ खडा हुआ । और भयभीत होते हुये वर्मा जी धडकते दिल से गद्दी पर बैठ गये । पूरे वर्मा परिवार का दिल धाड धाड कर बजने लगा । रामवीर का मुंह सफ़ेद पड गया । मैंने एक सिगरेट सुलगायी । और भरपूर अंगडाई लेते हुये गहरी सांस भरी । फ़िर मैंने पिशाच की तरफ़ देखा ।
- क्षमा करें वर्मा जी । रेशमा के मुंह से पिशाच बोला । आप दुनिंया का कानून ( स्वयं लेखपाल और पुत्र पुलिस में होने के कारण ) अच्छी तरह जानते होंगे । अगर किसी के साथ बलात्कार हो ? और एक लडका भी मर जाय । तो दोनों का मुआवजा लगभग कितना हुआ ?
- मेरे ख्याल से दस लाख । वर्मा जी ने दृणता से भावहीन स्वर में जबाब दिया ।
- बिलकुल सही । पिशाच ने प्रशंसा की । फ़िर आप नन्दू की मां और बहन को दस लाख रुपये देने का इंतजाम करें । इसकी वजह क्या है ? और ये काम क्यों करना होगा । इस सम्बन्ध में आप इन महात्मा से ही पूछ सकते हैं ।
मैंने देखा । माहौल से प्रभावित होकर वर्मा जी अधिक भावुक हो गये हैं । अतः मैंने तुरन्त बात संभाली । और कहा - दस लाख । तो बहुत हैं । हालांकि किसी की मृत्यु की कीमत रुपयों से नहीं आंकी जा सकती । फ़िर भी मेरे ख्याल से दोनों बातों का मुआवजा छह लाख रुपये बहुत है ? खैर । जो भी होगा । इसको हम तय कर लेंगे । अब तुम बताओ । तुम इस कार्य के बदले क्या चाहते हो ?
तब जैसा कि सभी प्रेत मांगते हैं । उसने एक वर्ष तक प्रेत दीपक ( जो प्रेतों को शान्ति देता है । ) और खाने की सामिग्री आदि एक स्थान पर रखने को बताया । और दो चार कार्य और बताये । यानी सारा मामला शान्ति से निपट गया ।
तब मैंने कहा - हे पिशाच । बहुत दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न है । आज उसको पूछने का उचित समय है ? ये जो ओझा आदि आमतौर पर झाड फ़ूंक करते हैं । प्रेत बाधा हटाते हैं । क्या ये ताकतवर होते हैं ? इनकी सच्चाई के बारे में बताओ ?
- हे महात्मा । रेशमा के मुंह से पिशाच बोला - इनमें एक दो सच्चे साधु या सच्चे तान्त्रिक को छोडकर ज्यादातर बनाबटी होते हैं । फ़िर भी उनके ( बनाबटी ) द्वारा भी प्रेत वाधा ठीक हो जाती है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं । दरअसल प्रेत तो खुद चाहता है कि मनुष्य उससे बात करके उसकी मांग पूरी कर दे । जिस पर प्रेत छाया होती है । वो बिना किसी तान्त्रिक के ही सब बात बताता है । ऐसी हालत में घर का कोई समझदार आदमी भी यदि प्रेत से बात करके उसकी मांग पूरी कर दे । तो भी प्रेत उसको छोड देते हैं । और किसी तान्त्रिक की आवश्यकता नहीं होती । और ऐसी हालत में किसी भक्ति भाव वाले घर में धोखे से । गलती से । प्रेत बाधा हो जाने पर । प्रेत उससे मांस मदिरा सम्भोग बलि जैसी अनुचित मांग नहीं करते । लेकिन आदमी डर कर इन तान्त्रिकों के पास पहुंच जाता है । और ये तमाम ऐसी क्रियायें कराते हैं । जिनका कोई मतलब ही नहीं होता । और जिनकी कोई जरूरत ही नहीं होती । प्रेत ईश्वरीय नियम के अनुसार ही किसी को पीडित करते हैं । और उसी नियम के अनुसार उन्हें छोडना भी पडता है । इसलिये झूठा तान्त्रिक एक दिखावा मात्र है । उसके मन्त्र आडम्बर दिखावा है ।
वास्तविक बात । प्रेत ने क्यों सताया । और कैसे छोडेगा । ये सिर्फ़ बातचीत से होता है । हां ये बात अवश्य हैं कि प्रेतों में भी अच्छे बुरे स्वभाव के प्रेत होते हैं । और मुझे बार बार हैरत होती है कि आप ( इंसान ) भूल जाते हैं कि हम भी कभी इंसान थे ?
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दूसरी सुबह जब मेरी आंख खुली तो दस बज चुके थे । यानी मैं लगभग छह घन्टे सोया था । मेरे अनुमान के मुताबिक तीन बजे ही प्रेत क्रिया पूर्ण हुयी थी । सब मामला शान्ति से निबट गया । प्रेतों ने वर्मा परिवार को छोड दिया था । रेशमा अब सामान्य नजर आ रही थी ।
 वर्मा जी का पूरा घर भाग भागकर मेरी आवभगत में लगा हुआ था । मैंने चलने की इजाजत मांगी । तो सब लोगों ने बेहद आग्रह करके शाम तक के लिये मुझे रोक लिया ।
और दूसरे मुझे वर्मा जी को अकेले में कुछ समझाना भी था कि आगे क्या करना है । इसके बाद दोपहर खाने के बाद सब लोग मेरे पास बैठे । तो वर्मा जी ने कहा - प्रसून जी । रात को आपका चमत्कार देखने के बाद आप जब सो रहे थे । मैंने वीरी को फ़ोन किया था । उसने बताया कि आप अपने बारे में कोई जानकारी देना पसन्द नहीं करते । इसलिये मैं वो सब तो नहीं पूछूंगा । पर मुझे एक जिग्यासा है कि आप एक student जैसे नजर आते हैं । आपका महात्मा तान्त्रिक जैसा वेश भी नही है । फ़िर आपने ये क्या और कैसे ग्यान प्राप्त किया ?
देखिये वर्मा जी । मैंने कहा । यह कोई बडा रहस्य नहीं हैं । द्वैत ग्यान के अंतर्गत आने वाला कुन्डलिनी योग ऐसे सभी उच्च ग्यान का दाता होता है । संत मत के अंतर्गत आने वाला अद्वैत ज्ञान इससे भी उच्च होता है । जो वास्तविक मोक्ष का दाता होता है । ये सिर्फ़ आन्तरिक रहस्य रहस्यों को जानने वाले सच्चे संतो से ही प्राप्त होता है । यदि आपको ऐसे ग्यान को प्राप्त करने में दिलचस्पी है । तो मैं आपको इसका सही तरीका और सही रास्ता बता दूंगा । कम से कम इतना तो मैं कर सकता हूं ।
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इसके आठ महीने बाद अचानक मुझे वर्मा जी की याद आ गयी । मैंने मोबायल फ़ोन से उनका नम्बर देखकर एक फ़ोन बूथ से उन्हें फ़ोन किया । अपना फ़ोन नम्बर गुप्त ही बना रहे । इसलिये मुझे ऐसा करना पडा । वर्मा जी मेरे द्वारा फ़ोन करने पर बेहद खुश हुये । और उत्साहित स्वर में बोले । आप उस रात मेरे घर क्या आये । मेरा और मेरे घर वालों का पूरा जीवन ही बदल गया । बल्कि गांव का माहौल ही बदल गया । मैं आपको फ़ोन पर पाकर बेहद उत्साहित महसूस कर रहा हूं । यदि इजाजत हो तो बताऊं । कि आपके जाने के बाद क्या क्या बदलाव हुआ ?
- जी । वर्मा जी । अवश्य बताईये । मैं खुशी से बोला । दरअसल आपकी याद । और फ़िर क्या हुआ । ये जानने के लिये ही मैंने फ़ोन किया ।
- तो सुनिये । वह बोले । आपसे मिलने के पहले मैं और मेरा परिवार धार्मिक तो थे । पर अपना ही परिवार और पैसा ही सब कुछ है । ये हम सब सभी संसार वालों की तरह मानते थे । पर आपने प्रेत द्वारा असली रहस्य कथा करवाकर मेरी सोच ही बदल दी । और असली धार्मिकता । जीवन का असली उद्देश्य । असली आनन्द हम अब महसूस कर रहें हैं । मैं एक एक करके बताता हूं । सबसे पहले तो मैंने अपना फ़ार्म हाउस और उसमें जो खन्डित मन्दिर था । उसका एक आश्रम बना दिया । खन्डित मन्दिर की जगह नये मन्दिर का निर्माण करा दिया । अब उसमें कुछ साधु रहतें हैं । और सुबह शाम प्रभु का भजन कीर्तन होता है । गांव के भी मन्दिर का जीर्णोंद्धार करा दिया । उसमें भी गांव वाले सुबह शाम नियम से पूजा आरती आदि करने लगे । गांव के शमशान की बाउंड्री आदि कराके पक्का करवा दिया । जिससे लोग दाह संस्कार के समय ही वहां जाते हैं । लेकिन सबसे बडी खुशी इस बात की हुयी । कि हम नन्दू की मां को वापस गांव में ले आये । और उसकी जमीन वापस कर दी । आपने जो छह लाख का मुआवजा तय किया था । वो नन्दू की मां ने किसी कीमत पर नहीं लिया । एक पैसा नहीं लिया । तब हमने मिलकर उसकी इच्छा से उसी पैसे से महुआ बगीची के पास एक आलीशान मन्दिर बनबा दिया । उसका घर तो बिक गया था । अतः वापस नही हुआ । इसलिये उसी मन्दिर को आश्रम का रूप देकर वहां रहने की व्यवस्था कर दी । गांव वालों और सरकारी सहयोग से अब वहां बिजली और सडक दोनों है । नन्दू की जहां मृत्यु हुयी थी । वहां उसकी एक समाधि बनवा दी । इस सबसे हटकर हमें प्रेतों की अच्छाई बुराई भी उस रात ही पता चली । तो आपका फ़ोन नम्बर तो था नहीं ।
इसलिये अपने आप ही सोचकर मैंने महुआ बगीची से पीछे उनका घने पेडों वाले एकान्त स्थान पर प्रेत स्थान बना दिया । और उस स्थान के चबूतरे पर एक बोर्ड पर लिखवा दिया । कि यह पितर स्थान हैं । यहां आप जो कुछ खाने का सामान रखते हैं । वह अदृश्य आत्माओं को त्रप्त करता है । इससे लोग वहां खाने आदि का सामान रख आते हैं । और गांव में सभी बहुत खुश हैं । लेकिन..?
लेकिन..? मैंने चौंककर कहा । लेकिन क्या..?
- लेकिन ये । वर्मा जी बोले । ये सब आपके आने से संभव हुआ । इसलिये हम सभी चाहते हैं कि आप एक बार आकर ये सब देखें अवश्य ।
- देखिये वर्मा जी । मैंने सरल स्वर में कहा - जो होता है । प्रभु की कृपा से होता है । जो भी हुआ आपके भाग्य से हुआ । अगर मैं करने वाला होता । तो मैं सब जगह ही ऐसा न कर देता । लेकिन आपने जो भी बदलाव किया । उससे मुझे बेहद खुशी हुयी । अतः मैं अवश्य आऊंगा । समाप्त ।

प्रेतकन्या. 1

ये बात लगभग बीस साल पुरानी होगी । संजय मेरा दोस्त था । हम दोनों एक ही कालेज में थे । पर मैं उससे एक क्लास आगे था । इसके बाबजूद मेरी उससे मित्रता थी । संजय और उसका परिवार किसी अन्य प्रदेश से थे । और नौकरी की वजह से उत्तर प्रदेश में रहने के लिये आ गये थे । जाने क्या वजह थी । संजय मुझे बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिया था । शायद इसकी एक वजह ये भी हो सकती थी कि मैं स्वयं कालेज के बाद अपने शोध हेतु वन क्षेत्र के एक निर्जन और गुप्त स्थान पर चला जाता था । और प्रायः घर और शहर में कम ही रहता था ।
लेकिन उस दिन जब मैं बाजार में था । मुझे संजय की मम्मी रजनी आंटी की आवाज सुनायी दी - हेय प्रसून ! क्या ये तुम हो..जरा सुनो ।
मैंने स्कूटर रोक दिया । रजनी आंटी मेरे करीब आ गयी । वे बेहद उदास नजर आ रही थी ।
- संजय कैसा है । और आजकल दिखायी नहीं देता ?  मैंने आंटी से पूछा ।
- मैंने उसी के बारे में बात करने के लिये तुझे रोका है । तुमने एक बार बताया था कि तुम वनखन्डी गुफ़ा में रहने वाले बाबा से परिचित हो । और अक्सर वहाँ आते जाते भी रहते हो । प्लीज प्रसून ! मैं बाबाजी से मिलना चाहती हूँ । तुम्हारे दोस्त की खातिर । अपने बेटे की खातिर ।
मामला सीरियस था । आंटी डरी हुयी सी प्रतीत होती थी । मुझे आश्चर्य था कि आज वे बाबाजी के बारे पूछ रही थी । और कभी इस पूरे परिवार ने मेरी हंसी इस बात को लेकर बनायी थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
- आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?
आंटी ने मुझे भीङ से हटकर एक तरफ़ आने का इशारा किया । और एकान्त में आते ही बोली - प्रसून ! तीन महीने से संजय कुछ अजीब......मेरे बेटे को किसी तरह उससे बचा लो ?
मामला वाकई गम्भीर था । मैंने पूछा - संजय अक्सर कहाँ मिलता है ?
इत्तफ़ाकन वो जगह मेरे प्रतिदिन के आवागमन मार्ग के बीच में ही थी । पर ये बात अलग थी कि संजय जहाँ जाता था । वो उस रास्ते से आधा किलोमीटर हटकर थी ।
मैं तुरन्त स्कूटर से उसी टायम संजय के पास पहुँचा । वो आराम से मुझे एक आम के पेङ के नीचे बैठा नजर आया । और अपलक सामने बहती नदी की धारा को देख रहा था । मैं यह देखकर चौंक गया कि कुछ ही दिनों में उसका हष्टपुष्ट शरीर हड्डियों का ढांचा सा रह गया था ।
उसने स्कूटर की आवाज सुनकर एक बार मुझे देखा । और फ़िर उसी तरह नदी की धारा को देखने लगा । जैसे मुझे पहचानता भी न हो । पर अबकी बार मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । मैंने स्कूटर स्टेंड पर खङा करके एक सिगरेट सुलगाई । और लगभग टहलता हुआ संजय के पास पहुँचा ।
- हाय संजय ! हाउ आर यू ।  मैंने मुस्कराते हुये कहा ।
- तुम यहाँ क्यों आये हो ।  वह नफ़रत से बोला - मैं पहले ही काफ़ी परेशान हूँ ।
- आई नो डियर..आइ नो । मैंने उसकी निगाह का अनुसरण करते हुये कहा - शीरीं आयी नहीं क्या.. अभी तक.?
- हेय..व्हाट आर यू सेयिंग ? वह चिढकर बोला - तुम सब मेरे दुश्मन हो ।..माय मदर..फ़ादर..।
- सब जानता हूँ बेटा । मैंने मन ही मन कहा ।
मैंने मन ही मन बाबा को याद किया । और झन्नाटेदार चाँटा उसके गाल पर मारा । वह लगभग लङखङाता हुआ सा जमीन पर गिरने को हुआ । मैंने उसे संभाल कर पेङ के सहारे से बैठाया । और वापस आकर स्कूटर का हार्न बजाया ।
उस सुनसान स्थान पर वो हार्न एक डरावनी आवाज की तरह दूर तक गूँज गया । कुछ ही क्षणों में दूर एक पेङ की ओट में छिपी रजनी आंटी मुझे अपनी तरफ़ आती नजर आयी । मैं इतमीनान से सिगरेट के कश लगाने लगा ।
- हमें अभी इसे लेकर बाबाजी की गुफ़ा पर जाना होगा ।  मैंने आंटी की तरफ़ देखते हुये कहा - अफ़सोस आपको ये सब मुझे पहले ही बताना था ।
आंटी ने लगभग सुबकते हुये दूसरी तरफ़ देखा । मैंने सहारा देकर संजय को स्कूटर पर बैठाया । और आंटी से कहा कि वह पीछे बैठकर संजय को सहारा देती रहें । वह इस वक्त अपने होश में नहीं हैं ।
मैंने स्कूटर दौङा दिया । निर्जन वन का वह क्षेत्र आम आदमी को डराबने अहसासों से रूबरू कराता था । पर मेरे लिये तो वह रोज की परिचित जगह थी । मैं महसूस कर रहा था कि रजनी आंटी भयभीत हो रहीं हैं । और संजय तो अपने होश में ही नहीं था ।
आधा घंटे के सफ़र के बाद हम वनखन्डी गुफ़ा के सामने पहुँच गये । मेरे लिये बेहद परिचित वह स्थान किसी भी आदमी के रोंगटे खङे करने के लिये काफ़ी था । वातावरण अजीव अजीव बेहद धीमी आवाजों के साथ डराबना संगीत सा सुना रहा था । दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था ।
- प्रसून !  मुझे आंटी की भयभीत आवाज सुनायी दी ।
- डरो मत ।  मैंने उनकी तरफ़ बिना देखे ही कहा । और गुफ़ा के दरबाजे पर प्रवेश आग्या हेतु सम्बोधन सूचक बोला - अलख बाबा अलख ।
- तेरा कल्याण हो..। अन्दर से बाबा की रहस्यमय आवाज आयी - इस औरत को बोल । डरे नहीं । इसका
पुत्र ठीक होगा ।
बिना कुछ बताये बाबा रजनी आंटी के बारे में बोल रहे हैं । इसकी उन पर क्या प्रतिक्रिया हुयी । ये देखे बिना मैंने संजय को सहारा दिया । और अन्दर गुफ़ा में आंटी के साथ प्रवेश किया । आंटी भयवश लगभग मुझसे सटी हुयी थी । हम लोग अन्दर जाकर बैठ गये ।
आंटी बेहद हैरत से गुफ़ा का मुआयना कर रही थी । मुझे उनकी हैरत की वजह मालूम थी । वो ये कि बेहद भीतरी इस गुफ़ा में हमेशा दूधिया प्रकाश फ़ैला रहता था । पर वह प्रकाश किस चीज से हो रहा है । ये कहीं से पता नहीं चलता था । और बाहर से जंगल जितना ही डराबना था । अन्दर उतनी ही शान्ति सकून का माहौल था । गुफ़ा में डराबना अहसास कराने वाली कोई चीज नहीं थी ।
बाबा एक बङे चबूतरे पर कम्बल के आसन पर बैठे थे । उनकी बङी बङी तेजयुक्त आँखो में मानव मात्र के लिये स्नेह था । उनकी लम्बी लम्बी जटायें दाङी आदि उनके व्यक्तित्व को भव्यता प्रदान कर रही थी ।
- इसको आराम से लिटा दो ।  बाबा ने संजय की तरफ़ इशारा करके कहा ।
मैंने संजय को आराम से लिटा दिया । रजनी आंटी अपलक बाबाजी को देख रही थी । बाबा के लिये जो धारणा उनके मन में थी । कि बाबा डराबनी वेशभू्षा.. डराबने माहौल में रहते होंगे । वह बाबा को देखते ही जाती रही । आगे जो होने वाला था । वह बाबाजी के सानिध्य में काफ़ी समय से रहने के कारण मैं कुछ कुछ जानता था ।
- बाबाजी !  रजनी आंटी ने कुछ बोलने की कोशिश की ।
- शान्त..बेटी ..शान्त.। बाबा ने बीच में ही हाथ उठाकर कहा - ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि इसे क्या परेशानी है । और कैसे हुयी । और क्या होगा ?
फ़िर बाबा मुझसे एक गुप्त भाषा में बात करने लगे । जिसका मतलब ये था कि मुझसे एक गलती हो गयी थी । वो ये कि मुझे किसी एक हिम्मती पुरुष को साथ लाना था । जो तमाम कार्यक्रम के क्रियान्वन के दौरान रजनी को संभाले रहता ।
दरअसल एक विशेष ट्रान्स विधि द्वारा मुझे बाबाजी के साथ " किनझर " नामक प्रेतलोक में जाना था । जहाँ की एक प्रेतकन्या संजय को ले गयी थी । अब ये बङी रहस्यमय हकीकत थी कि संजय यहाँ एक चलती फ़िरती लाश के रूप में नजर अवश्य आता था । पर वास्तव में वह प्रेतलोक का वासी हो चुका था ।
और बाबाजी के अनुसार वह अगले छह महीने में मर जाने वाला था । क्योंकि उसने ये रास्ता खुद ही चुना था । और एक प्रेत कन्या के रूपजाल में आसक्त होकर वह धीरे धीरे प्रेत देही हो रहा था ।
ये सामान्य ओझाओं के झाङ फ़ूंक का मामला न था । दरअसल मुझे " माध्यम " बनकर बाबा के साथ किनझर जाना था । और संजय के विगत तीन महीने का प्रेतकन्या के साथ गुजारा समय संजय के दिमाग को अपने दिमाग से कनेक्ट करके मिटाना था ।
इसको इस तरह से समझ सकते हैं कि किसी टेप की रील को बैक स्थिति में लाकर खाली करना । या किसी कापी में लिखे गये अनपयुक्त मैटर को इरेजर द्वारा मिटाना । तब संजय अपनी पूर्व स्थिति में उसी तरह से आ जाता । मानों गहरी नींद के बाद जागा हो । और इस तरह वो मरने से वच जाता ।
अब समस्या ये थी कि मैं और बाबाजी जब किनझर प्रेतलोक की यात्रा पर जाते । तो हमारे शरीर निर्जीव के समान हो जाते । और संजय पहले ही बेहोशी जैसी अवस्था में पङा हुआ था । तब पीछे अकेली रह जातीं रजनी आंटी । जो निश्चय ही उस बियाबान जंगल में बारह घन्टे तक नहीं रह सकती थी ।
जबकि प्रेतकन्या से उलझने में पन्द्रह या बीस घन्टे भी लग सकते थे । अगर मान लो । उन्हें भी एक विशेष मूर्क्षावस्था में कर दिया जाता । तो गुफ़ा में मौजूद चारों शरीर मृतक के समान होते । और कोई दुर्घटना ( किसी जंगली जानवर या आकस्मिक आपदा से हुआ शारीरिक नुकसान ) हो जाने पर शरीर किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता था । अतः शरीरों की रक्षा करने वाले किसी जिगरवाले इंसान का होना जरूरी था । इसलिये एक बार तो बाबाजी ने तय किया कि किसी आदमी का बन्दोबस्त करके ही किनझर जायेंगे ।
मैं बङे असमंजस में था कि क्या करूँ क्या न करूँ । दरअसल मैं अब अकेले ही किनझर जाने की सोच रहा था । क्योंकि इससे पूर्व भी मैंने बाबाजी से कई बार कहा था कि मैं किसी सुदूरलोक की यात्रा पर अकेले जाने का अनुभव प्राप्त करना चाहता हूँ । और बाबाजी ने कहा भी था कि वे मुझे ऐसा मौका अवश्य देंगे । पर यहाँ मामला दूसरा था । मेरी थोङी सी गलती संजय को मौत के मुँह में ले जा सकती थी ।
और यह भी संभव था कि मैं वहाँ से वापस न आ पाता । क्योंकि किसी शक्तिशाली प्रेत से मुकाबले में यदि मैं हार जाता । और उन्हें पता चल जाता कि मैं एक मानव हूँ । तो वो मुझे दिमागी परिवर्तन करके प्रेत बना देते । और इस तरह की फ़ीडिंग से मैं खुद को प्रेत ही समझने लगता । इस तरह के रिस्क की ढेरों बातें थी । जिनको ज्यों का त्यों समझाना मुश्किल है । पर कहने का अर्थ यही है कि इस तरह मैं संजय और अपनी दोनों की जान जोखिम में डाल रहा था । और बाबाजी इसके लिये तैयार नहीं थे ।
- ओ . के । मैंने अंग्रेजी में कहा - सिम्पल सी बात है । मैं अकेला ही चला जाता हूँ ।
फ़िर मैंने आंटी को जो हमारे वार्तालाप को बङे अजीव भाव से सुन रही थीं ( क्योंकि वो भाषा उनके पल्ले ही नहीं पङ रही थी ) को समझाया कि कोई दो तीन घन्टे ( जबकि मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि किनझर से मेरी वापसी अगली सुबह तक ही हो पायेगी । पर मैं इसलिये निश्चित था । क्योंकि एक तो बाबाजी प्रथ्वी पर ही रुक रहे थे । अतः आंटी यदि घबराती भी । तो वो उन्हें मूर्क्षा में भेज देंगे । और आंटी को ऐसा प्रतीत होगा । मानों उन्हें स्वाभाविक नींद आ गयी हो । दूसरे ये एक इंसान । मेरे दोस्त की जिन्दगी का सवाल भी था । तीसरे मैं अकेला जाने का बेहद इच्छुक था । क्योंकि बाबाजी के साथ तो मैं सैकङों बार अंतरिक्ष यात्रा पर गया था । ) तक मैं ध्यान में जाऊँगा । और आप फ़िक्र न करें । संजय ठीक हो जायेगा ।
आंटी ने किंकर्तव्यबिमूढ अवस्था में सिर हिला दिया । बाबाजी हल्के से मुस्कराये । उन्हें मेरा साहस अच्छा लग रहा था ।

प्रेतकन्या 2

मैं लेट गया । और गहरी सांस लेते हुये मृतप्राय सा होने लगा । बाबाजी भी धीरे धीरे मेरे साथ आने लगे । दरअसल बाबाजी ने तय किया था कि प्रथ्वी के बृह्माण्ड की सीमा तक वे मेरे साथ आयेंगे । ऐसी हालत में नीचे रजनी आंटी को लगेगा कि वे कुछ सोच रहे हैं । और अगर वो उस हालत में उनसे कोई बातचीत भी करती हैं । तो बाबाजी आसानी से उसका जबाब देते रहेंगे ।
लेकिन अगर बाबाजी बृह्माण्ड की सीमा पार करते हैं । तो उसी समय उनका शरीर निर्जीव समान हो जायेगा । और मुझे बृह्माण्ड सीमा पर छोङकर बाबाजी ज्यों ज्यों वापस गुफ़ा के पास आते जायेंगे । उनका शरीर सचेत प्रतीत होने लगेगा । मानों किसी सोच से बाहर आये हों ।
मुझे इस विचार से हँसी आ गयी कि आम मनुष्यों के लिये ये किसी गङबङझाला से कम नहीं था । पर ये भी सत्य है कि अलौकिक रहस्यों को जानना । और उनमें प्रविष्ट कर पाना । बच्चों का खेल नहीं होता ।
बृह्माण्ड की सीमा आते ही मैंने " अलख बाबाजी अलख " कहा । और गहन सुदूर अंतरिक्ष में छलांग लगा दी ।
बाबाजी के मच्छर भिनभिनाने जैसी आवाज में सुनायी दे रहे शब्द " तेरा कल्याण हो.. .तेरा कल्याण हो " लगातार मेरे साथ चल रहे थे ।
वास्तव में ये एक प्रकार की कनेक्टिविटी थी । अब ऐसी ही आवाज में जब तक बाबाजी को मेरे शब्द " अलख बाबाजी अलख " और मुझे तेरा कल्याण हो सुनाई देते रहते । तब तक मैं बाबाजी के सम्पर्क में था । शब्द बन्द हो जाने का मतलब साफ़ था कि सम्पर्क टूट गया । बाबाजी तेजी से वापस गुफ़ा की तरफ़ जाने लगे । और मैं अंतरिक्ष की गहराईयों में बढ रहा था ।
अंतरिक्ष में किसी भी लोकवासी या अन्य जीव की आवाज प्रथ्वी की तरह भारी ( बेसयुक्त ) और क्लियर न होकर एक भिनभिनाहट या छनछनाहट युक्त होती है । इस बात को इस तरह समझे कि टीवी  मोबायल फ़ोन या अन्य किसी खराव प्रसारण में जब कभी मुख्य आवाज हल्की और उसके साथ छनछनाहट की आवाज अक्सर सुनाई देती है । कुछ कुछ वैसी ही मिलती जुलती आवाज अंतरिक्ष में परस्पर सम्पर्क का माध्यम होती है ।
और अंतरिक्ष की एक निश्चित सीमा पार करते ही किसी भी सामान्य आदमी की आवाज स्वतः ही हल्की और वैसी ही छनछनाहटयुक्त हो जाती है । आप कल्पना करें कि प्रथ्वी पर करोंङो लोग मोबायल पर बात कर रहे हों । और बो सभी आवाजें आपको बिना किसी मोबायल या यन्त्र के इकठ्ठी सुनाई दें । वस ऐसी स्थिति होती है ।
जब ये आवाजें बेहद हल्की या ना के बराबर हों । तो हम किसी भी लोक से उस समय दूर हैं । और आवाज जितनी क्लियर होती जाय । उतना ही हम किसी लोक के नजदीक हैं । दूसरी बात अंतरिक्ष की यात्रा में अधिक परिश्रम नहीं होता । और न ही किसी प्रकार का खतरा होता है कि हम गिर जायेंगे । या टकरा जायेंगे । लेकिन अन्य अंतरिक्ष जीवों से मुकाबला या दोस्ती का गुण होना अनिवार्य होता है । अन्यथा कदम कदम पर खतरा ही समझो ।
तब जब मैं कई लाख योजन की ऊँचाईयों पर पहुँच चुका था । और इस प्रकार के विचारों के बीच अपना सफ़र तय कर रहा था कि प्रथ्वी पर भी कितना रहस्यमय जीवन है । मेरे परिवार के लोग या अन्य परिचित कोई भी तो नहीं जानता कि मैं अंतरिक्ष की अनंत ऊँचाईयों पर अक्सर भृमण करता हूँ । बाइचान्स अगर मुझे यहाँ कुछ हो जाय । तो यही कहावत सटीक बैठेगी कि जमीन निगल गयी । या आसमान खा गया । और बाबाजी के सम्पर्क में होने से सौ के लगभग मैं ऐसे लोगों को जानता था । जो आराम से अदृश्य लोकों का भृमण करते थे । पर उन्हें आम लोग नहीं जानते थे ।
ऐसे ही विचारों के बीच मेरे दिमाग में मानों विस्फ़ोट सा हुआ । जल्दबाजी में मैं प्रेतकन्या का हुलिया ( जो कि मुझे बाबाजी द्वारा अपने दिमाग में फ़ीड कराना था ) और वास्तविक नाम का पता करना भूल गया था ।
संजय की मम्मी ने तो लङकी ( अपनी समझ से ) का नाम शीरीं बताया था । जो कि संजय बङबङाता था । पर ये एकदम झूठा भी हो सकता था । और उस वक्त तो मेरे छक्के ही छूट गये । जब मुझे पता चला कि विचारों के भंवरजाल में डूबकर मैं कनेक्टिविटी लाइन से कब अलग हो गया । इसका मुझे पता ही नहीं चला । अलख..बाबा..अलख..बार बार ये शब्द पुकारता हुआ मैं सम्पर्क जोङने की कोशिश करने लगा । पर तेरा कल्याण हो । मुझे दूर दूर तक सुनायी नहीं दिया ।
अब ये सांप के मुँह में छंछूदर बाली बात हो रही थी । अतः मेरे सामने दो ही रास्ते थे कि वापस प्रथ्वी पर जाऊँ । या रास्ता बदलकर किसी अन्य जान पहचान वाले प्रेतलोक पर उतरकर सहायता लूँ । तब मुझे लूढा याद आया ।
लूढा सरल स्वभाव का प्रेत था । जो एक सच्चे साधु का तिरस्कार करने से प्रेतभाव को प्राप्त हुआ था । लूढा से सम्पर्क वाक्य था..तो तू ही बता दे..। इसके प्रत्युत्तर में अगर मुझे ये सुनाई पङ जाता कि ..वो जो कोई नही जानता..। तो लूढा से मेरी कनेक्टिविटी जुङी समझो ।
अतः मैं बार बार कहने लगा । तो तू ही बता दे..पर कोई लाभ न हुआ । लूढा वहाँ से पता नहीं कहाँ था । और मेरी यात्रा के चार घन्टे पूरे हो चुके थे । और तभी मेरी कनेक्टिविटी में एक नया वाक्य आने लगा..। लेकिन तू जो है.. ।
पर ये सम्पर्क अस्पष्ट था । और इसकी वजह मैं अच्छी तरह से जानता था । दरअसल प्रेतलोकों से अंतरिक्ष यात्री की कनेक्टिविटी में मेरे शब्द इस कोड से मेल खा रहे थे । पर इसका एकदम सही अन्य कोड क्या था । ये मुझे नहीं पता था । तभी मेरे पास कोड के साथ भीनी भीनी तेज खुशबू आने लगी । और मैं एक अग्यात लोक में उतर गया ।
अभी मेरे लिये ये कहना मुश्किल था कि ये प्रेतलोक है । या अन्य प्रकार के जीवों का लोक ।
- स्वागत..हे.. मैंने तुम्हें यहाँ उतारा है । कौन हो तुम । और किस प्रयोजन से अंतरिक्ष में हो ?
- अंतरिक्ष क्या किसी के बाप की जागीर है.. और तू.. मुझे इस तरह उतारने वाली कौन भला ?
कहते हुये मैंने उस प्रेतकन्या को देखा । अब मैं अपने पूर्व अनुभवों से जान गया था कि ये भी कोई अन्य प्रेतलोक है ।
दरअसल इन लोकों में प्रथ्वी की तरह मर्दानगी वाला सिद्धांत चलता है । यदि आपने सभ्यता का प्रदर्शन किया । तो आपको डरपोक माना जायेगा । और ये भी पहचान हो जायेगी कि आप पहली बार यहाँ आये है । न सिर्फ़ नये बल्कि अंतरिक्ष के लिये अजनबी भी । और ये दोनों बातें बेहद खतरनाक हैं ।
प्रेतकन्या एक सफ़ेद घांघरा पहने थी । और कमर से ऊपर निर्वस्त्र थी । उसके बेहद लम्बे बाल हवा में लहरा रहे थे ।
- तुम वाकई सख्त और बङे..। उसने मेरे कमर के पास निगाह फ़ेंकते हुये होठों पर जीभ फ़िरायी - जिगर
वाले हो । आओ..मेरे जैसा सुख पहुँचाने वाली । यहाँ दूसरी नहीं है । क्या तुम..। उसने पुनः अपने उन्नत
उरोजों को उभारते हुये कहा - भोग करना चाहोगे ।
मैं एक अजीव चक्कर में पङ गया । दरअसल उससे सम्भोग करने का मतलब था कि अपने दिमाग को उसे रीड करने देना । और लगभग दस परसेंट प्रेतभाव का फ़ीड हो जाना । और सम्भोग नहीं करने का मतलब था कि उसका रुष्ट हो जाना । तो जो जानकारी मैं उससे प्राप्त करना चाहता था । उससे वंचित रह जाना । मैंने फ़ैसला लेते हुये बीच का रास्ता अपनाया । और उसे पेङ के नीचे टेकरी पर गिराकर उसके उरोजों से खेलने लगा ।
- पहले तुझे कभी नहीं देखा..। किस लोक का प्रेत है तू ?  वह आनन्द से आँखे बन्द करते हुये बोली ।
- देख इस बक्त मेरे दिमाग में सिर्फ़ एक ही बात है..। उस साली किनझर वाली की अकङ ढीली करना .।
मानों विस्फ़ोट सा हुआ हो । " किनझर " सुनते ही वह चौंककर उठकर बैठ गयी । और लगभग चिल्लाकर
बोली - तू प्रेत नहीं हैं ।..अन्य है.. । प्रेत किनझर का मुकाबला नहीं कर सकता..।
- देख मैं जो भी हूँ ।  मैंने प्रेतकन्या की कमजोर नस पर चोट की - तू मुझे किनझर का शार्टकट बता दे । मेरे पास समय कम है । लेकिन लौटते समय..समझ गयी । कहाँ चोट मारूँगा..।
मेरा पेंतरा काम कर गया । वह बेहद अश्लील भाव से हँसी । चींटी से लेकर..मनुष्य..देवता..किसकी कमजोरी नहीं होती । ये कामवासना ।
अबकी बार जब मैंने अंतरिक्ष में छलांग लगायी । तो मेरे पास पूरी जानकारी थी ।
किनझर बेहद शक्तिशाली किस्म के वेताल प्रेतों का लोक था । वहाँ का आम जीवन बेहद उन्मुक्त किस्म का था । हस्तिनी किस्म की स्थूलकाय प्रेतनियां पूर्णतः नग्न अवस्था में रहती थी । और लगभग दैत्याकार पुरुष भी एकदम निर्वस्त्र रहते थे । सार्वजनिक जगहों पर सम्भोग और सामूहिक सम्भोग वहाँ के आम दृश्य थे । कुछ ही देर में मैं किनझर पर मौजूद था । किनझर क्षेत्रफ़ल की दृष्टि से काफ़ी विशालकाय प्रेतलोक था । अभी मैं सोच विचार में मग्न ही था कि मेरे पास से बीस बाईस युवतियों का दल गुजरा । वे बङे कामुक भाव से मुझ अजनबी को देख रही थी ।
अब मुझे ट्रिक से काम लेना था । मैंने बेलनुमा एक पेङ की टहनी तोङी । और उसे यूँ ही हिलाता हुआ एक प्रेतकन्या के पास पहुँचा । और उसके नितम्ब पर सांकेतिक रूप से हल्का सा वार काम आमन्त्रण हेतु किया । उसने आश्चर्य से पलटकर देखा । मैंने उसका हाथ पकङकर अपनी तरफ़ खींच लिया ।
ये वहाँ की जीवन शैली का स्टायल था । इसके विपरीत अगर मैं प्रथ्वी की तरह बहन जी या भाभी जी जरा सुनना ...जैसी स्टायल में बात करता । तो वो तुरन्त समझ जाती कि मैं प्रथ्वी या उस जैसे किसी अन्य लोक का हूँ । और ये स्थिति मुझे कैद करा सकती थी ।
मेरे शरीर से मानव की बू नहीं आती थी । क्योंकि पूर्व की अंतरिक्ष यात्राओं में ही मैं वह बू छिपाने की तरकीबें जान गया था । वह कामक्रीङा हेतु तैयार होकर एक पेङ के नीचे लेट गयी । और मदभरी नजरों से मुझे देखने लगी ।
मुझे उससे सम्भोग तो करना ही नही था । सो उसे गोद में लिटाकर उसके उरोंजो पर हाथ फ़िराते हुये मैंने कहा - ये शीरीं आज मुझे कहीं नजर नहीं आयी...। मुझे उसे एक सन्देश देना था..।
- शैरी..ओह..इधर भी..। वह मेरा हाथ अपनी इच्छानुसार करती हुयी बोली - वह नदी पार अजगर के साथ सम्भोग करती है । और अक्सर वहीं मिलती हैं ।
- पर अजगर के साथ क्यूँ । प्रेतों की कमी है क्या..?
- वो अजगर नहीं हैं । वो कामुक भाव से हँसी - वो एक इंसान की रूह में है । और जल्दी ही प्रेत हो जाने वाला है । क्योंकि वो अपनी इच्छा से प्रेत बन रहा है । अतः वो बहुत शक्तिशाली प्रेत होगा । सौ प्रेतनी को एक साथ कामत्रप्त करने की क्षमता बाला होगा वो । अरे तू क्या फ़ालतू की बात ले बैठा । अन्दर नहीं जायेगा ।
मैंने उसे एक झटके से अलग कर दिया । और बोला - अभी मैं उसको संदेश दे आऊँ । फ़िर तुझे घायल करता हूँ..।
फ़िर उसकी प्रतिक्रिया जाने विना मैं कुछ ही दूर पर स्थिति एक पेङ पर बैठ गया । और ध्यान स्थिति में संजय को रीड करने की कोशिश करने लगा । लेकिन मुझे बेहद थोङी सफ़लता ही मिली । अब मुझे उसी हथियार को फ़िर से इस्तेमाल करना था । यानी नारी की कामलोलुपता का लाभ उठाकर उसे सही बात सोचने का अवसर न देना । और इसके लिये अब मैं पूरी तरह से तैयार था ।
मुझे शीरी का सही नाम शैरी पता चल चुका था । मैंने खुद को संजय के रूप में ढाला । और कुछ ही देर में मैं शैरी के सामने था । वो वास्तव में अजगर को लिपटाये हुये थी । जो उसके कामुक अंगों को स्पर्श सुख दे रहा था ।
- हे ..शैरी..अब फ़ेंक इसे..मैं असली जो आ गया ..।
उसने अविश्वसनीय निगाहों से मुझे देखा । मैं उसे सोचने का कोई मौका नहीं देना चाहता था । मैंने अजगर को छीनकर बाबाजी को स्मरण किया । और उनकी गुफ़ा को लक्ष्य बनाकर अलौकिक शक्ति का उपयोग करते हुये अजगर को पूरी ताकत से अंतरिक्ष में फ़ेंक दिया ।
अब ये अजगर अपनी यात्रा पूरी करके गुफ़ा के द्वार पर गिरने बाला था । और इस तरह से संजय की रूह प्रेतभाव से आधी मुक्त हो जाती । इसके बाद संजय के दिमाग ( जो अब मेरे दिमाग से जुङा था ) से मुझे वह लिखावट ( फ़ीडिंग ) मिटा देनी थी । जो उसके और शैरी के वीच हुआ था । बस इस तरह संजय मुक्त हो जाता ।
इस हेतु मैंने शैरी को बेहद उत्तेजित भाव से पकङ लिया । और पूरी तरह कामुकता में डुबोने की कोशिश करने लगा । शैरी सम्भोग के लिये व्याकुल हो रही थी ।
जब मैंने कहा - हे ..शैरी ! अब जब कि मैं पूरी तरह से प्रथ्वी छोङकर तेरे पास आ गया हूँ । मेरा दिल कर रहा है कि तू मुझे हमारी प्रेमकहानी खुद सुनाये । ताकि आज से हम नया जीवन शुरू कर सके । वरना तू जानती ही है कि मैं सौ प्रेतनी को एक साथ संतुष्ट करने वाला वेताल हूँ । तेरी जैसी मेरे लिये लाइन लगाये खङी हैं..।
मेरी चोट निशाने पर बैठी । उसे और भी सोचने का मौका न मिले । इस हेतु मैं उसके स्तनों को सहलाने लगा ।
- तुम कितने शर्मीले थे । वह जैसे तीन महीने पहले चली गयी - मैं प्रथ्वी पर नदी में निर्वस्त्र नहा रही थी । जब तुम उस रास्ते से स्कूल से लौटकर आये थे । मैं प्रथ्वी पर नया वेताल बनाने के आदेश पर गयी थी । क्योंकि आकस्मिक दुर्घटना में मरे हुये का प्रेत बनना । और स्वेच्छा से प्रेतभाव धारण करने वाला प्रेत इनकी ताकत में लाख गुने का फ़र्क होता है ।
तुम फ़िर अक्सर उधर से ही आने लगे । लेकिन तुम इतने शर्मीले थे कि सिर्फ़ मेरी नग्न देह को देखते रहते थे । जबकि तुम्हारे द्वारा सम्भोग किये बिना मैं तुम में प्रेतभाव नहीं डाल सकती थी..तब एक दिन हारकर मैंने योनि को सामने करते हुये तुम्हें आमन्त्रण दिया और पहली बार तुमने मेरे साथ सम्भोग किया..वो कितना सुख पहुँचाने वाला था.. मैं....संजय तुम .. अब ..... दिनों ... उसने ... गयी ... कि ... जब .... दिया ....देना..नदी..किनझर..।
शैरी नही जानती थी कि मैं उसके बोलने के साथ साथ ही संजय के दिमाग से वह लेखा मिटाता जा रहा
था । हालाँकि इस प्रयास में कामोत्तेजना से मेरा भी बुरा हाल हो चुका था । उसके नाजुक अंगो से खिलवाङ करते हुये मुझे उत्तेजना हो रही थी । पर सम्भोग करते ही मेरी असलियत खुल जाती । और संजय तो मुक्त हो जाता । उसकी जगह मैं प्रेतभाव से ग्रसित हो जाता । आखिरकार संयम से काम लेते हुये मैं वो पूरी फ़ीडिंग मिटाने में कामयाब हो गया ।
शैरी कामभावना को प्रस्तुत करती हुयी मेरे सामने लेट गयी । जब अचानक मैं उसे छोङकर उठ खङा हुआ । और बोला कि अभी मैं थकान महसूस कर रहा हूँ । कुछ देर आराम के बाद मैं तुम्हें संतुष्ट करता हूँ ।
कहकर मैं लगभग दस हजार फ़ीट ऊँचाई वाले उस वृक्ष पर चढ गया । और एक निगाह किनझर को देखते हुये मैंने विशाल अंतरिक्ष में नीचे की और छलांग लगा दी । अब मैं बिना किसी प्रयास के प्रथ्वी की तरफ़ जा रहा था । मेरा ये सफ़र लगभग तीन घन्टे में पूरा होना था । जब मैं बाबाजी के गुफ़ा द्वार पर होता ।
इस पूरे मिशन में मुझे लगभग तेरह घन्टे का समय लगा था । यानी कल शाम तीन बजे से जब आज मैं गुफ़ा के द्वार पर होऊँगा । उस समय सुबह के चार बज चुके होंगे ।
मेरा अनुमान लगभग सटीक ही बैठा । ठीक सवा चार पर मैं गुफ़ा के द्वार पर था । बाबाजी ने मेरी सराहना की । और शेष कार्य खत्म कर दिये । आंटी सोकर उठी थी । संजय अभी भी अर्धबेहोशी की हालत में था ।
बाबाजी ने एक विशेष भभूत आंटी और संजय के माथे पर लगा दी । जिसके प्रभाव से वे अपनी तीन महीने की इस जिन्दगी के ये खौफ़नाक लम्हें हमेशा के लिये भूल जाने वाले थे । यहाँ तक कि उन्हें कुछ ही समय बाद ये गुफ़ा और बाबाजी भी याद नहीं रहने वाले थे ।
मैंने आंटी को साथ लेकर उन्हें और संजय को उनके घर छोङ दिया । मैं काफ़ी थक चुका था अतः घर जाकर गहरी नींद में सो गया ।
अगले दिन सुबह दस बजे मैं संजय की स्थिति पता करने उसके घर पहुँचा । तो दोनों माँ बेटे बेहद गर्मजोशी से मिले - हे प्रसून तुम इतने दिनों बाद मिले । आज छह महीने बाद तुम घर पर आये हो ।
आंटी ने भी कहा - प्रसून तुम तो हमें भूल ही जाते हो । कहाँ व्यस्त रहते हो ?
उन्हे अब कुछ भी याद नहीं था । मैंने देखा संजय कल की तुलना में स्वस्थ और प्रसन्नचित्त लग रहा था । आंटी में भी वही खुशमिजाजी दिखायी दे रही थी । उनके साथ क्या घटित हो चुका था । इसका उन्हें लेशमात्र भी अन्दाजा न था । बाबाजी ने उनकी दुखद स्मृति को भुला दिया था । एक तरह से वो पन्ने ही उनकी जिन्दगी की किताब से फ़ट चुके थे ।
 मैंने एक सिगरेट सुलगायी और हौले हौले कश लगाने लगा ।
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